अवन्ती खण्ड · अध्याय 35
अगस्त्येश्वरमाहात्म्य-वर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.5.35.1)
सनत्कुमार उवाच । स्वर्णक्षुरे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा देवं महेश्वरम् । कपिलाशतदानस्य फलमप्यधिकं भवेत्
sanatkumāra uvāca svarṇakṣure naraḥ snātvā dṛṣṭvā devaṁ maheśvaram kapilāśatadānasya phalamapyadhikaṁ bhavet
सनत्कुमार ने कहा -- स्वर्णक्षुर में स्नान कर देव महेश्वर का दर्शन करने वाला मनुष्य सौ कपिला गौओं के दान से भी अधिक फल पाता है।
श्लोक 2 (skanda.5.35.2)
वाप्यां पितामह स्यापि यः स्नायाद्विजितेंद्रियः । हंसयुक्तेन यानेन ब्रह्मलोकं स गच्छति
vāpyāṁ pitāmaha syāpi yaḥ snāyādvijiteṁdriyaḥ haṁsayuktena yānena brahmalokaṁ sa gacchati
जो इन्द्रियसंयमी होकर पितामह की बावड़ी में भी स्नान करता है, वह हंसयुक्त विमान से ब्रह्मलोक को जाता है।
श्लोक 3 (skanda.5.35.3)
तैलाभिधानमातॄणां रात्रौ यच्छति यो बलिम् । तस्य सिद्धिर्भवे त्सद्यो मृतः शिवपुरं यजेत्
tailābhidhānamātṝṇāṁ rātrau yacchati yo balim tasya siddhirbhave tsadyo mṛtaḥ śivapuraṁ yajet
जो रात्रि में मातृकाओं के नाम पर तैल-बलि अर्पित करता है, उसे तत्काल सिद्धि प्राप्त होती है; मरणोपरान्त वह शिवपुर को जाता है।
श्लोक 4 (skanda.5.35.4)
विष्णुवाप्यां नरः स्नात्वा चैत्रे वा फाल्गुनेऽथवा । जागरं यस्तु कुर्वीत सोपवासो जितेन्द्रियः । मुच्यते सर्व पापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति
viṣṇuvāpyāṁ naraḥ snātvā caitre vā phālgune'thavā jāgaraṁ yastu kurvīta sopavāso jitendriyaḥ mucyate sarva pāpebhyo viṣṇulokaṁ sa gacchati
चैत्र या फाल्गुन मास में विष्णुवापी में स्नान कर, उपवास रखकर इन्द्रियसंयमी होकर रात्रि-जागरण करने वाला मनुष्य सर्वपापों से मुक्त होकर विष्णुलोक को जाता है।
श्लोक 5 (skanda.5.35.5)
अभयेश्वरदेवस्य भक्त्या नियतमानसः । पूजाबन्धमथो दृष्ट्वा रुद्रलोकं स गच्छति
abhayeśvaradevasya bhaktyā niyatamānasaḥ pūjābandhamatho dṛṣṭvā rudralokaṁ sa gacchati
अभयेश्वर देव में भक्तिपूर्वक संयमित मन वाला, पूजाबन्ध का दर्शन कर रुद्रलोक को जाता है।
श्लोक 6 (skanda.5.35.6)
लोके तु जायते दाता सार्वभौमो महीपतिः । यस्त्वगस्त्वेश्वरं गच्छेदेकचित्तो नरो मुने
loke tu jāyate dātā sārvabhaumo mahīpatiḥ yastvagastveśvaraṁ gacchedekacitto naro mune
वह इस लोक में दानशील सार्वभौम राजा बनता है। हे मुने! जो मनुष्य एकाग्रचित्त होकर अगस्त्येश्वर के पास जाता है --
श्लोक 7 (skanda.5.35.7)
दृष्ट्वागस्त्येश्वरं देवं सोपवासो जितेंद्रियः । अगस्त्योदयवेलायां मुच्यते सर्वपातकैः
dṛṣṭvāgastyeśvaraṁ devaṁ sopavāso jiteṁdriyaḥ agastyodayavelāyāṁ mucyate sarvapātakaiḥ
-- और उपवास रखकर इन्द्रियसंयमी होकर अगस्त्य के उदय-काल में देव अगस्त्येश्वर का दर्शन करता है, वह सर्वपापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 8 (skanda.5.35.8)
कृत्वागस्त्यं च सौवर्णं रौप्यं वाथ स्वशक्तितः । पञ्चरत्नसमायुक्तं वस्त्रेण च समन्वितम्
kṛtvāgastyaṁ ca sauvarṇaṁ raupyaṁ vātha svaśaktitaḥ pañcaratnasamāyuktaṁ vastreṇa ca samanvitam
अपनी शक्ति के अनुसार सोने या चाँदी से अगस्त्य की मूर्ति बनाकर, पंचरत्नों से युक्त और वस्त्र सहित --
श्लोक 9 (skanda.5.35.9)
तत्कालीनैः फलैः पुष्पैः पूजनीयो विधानतः । विधानं तस्य वक्ष्यामि चातुर्वर्ण्ये द्विजोत्तम
tatkālīnaiḥ phalaiḥ puṣpaiḥ pūjanīyo vidhānataḥ vidhānaṁ tasya vakṣyāmi cāturvarṇye dvijottama
-- उस काल के फलों और पुष्पों से विधिपूर्वक उसका पूजन करना चाहिए। हे द्विजश्रेष्ठ! उसकी विधि मैं बताता हूँ, जो चारों वर्णों के लिए है।
श्लोक 10 (skanda.5.35.10)
सप्तधान्यानि मुख्यानि तावन्त्येव फलानि च । एकं धान्यं फलं चैकमग्रे त्याज्यं भवेन्मुने
saptadhānyāni mukhyāni tāvantyeva phalāni ca ekaṁ dhānyaṁ phalaṁ caikamagre tyājyaṁ bhavenmune
सात प्रमुख धान्य और उतने ही फल लेने चाहिए; हे मुने! एक धान्य और एक फल प्रतिदिन आगे अर्पित करना चाहिए।
श्लोक 11 (skanda.5.35.11)
यावद्वै सप्त वर्षाणि व्रतमेवं समाचरेत्
yāvadvai sapta varṣāṇi vratamevaṁ samācaret
यह व्रत सात वर्षों तक इसी प्रकार करना चाहिए।
श्लोक 12 (skanda.5.35.12)
अर्घ्यमन्त्रः । काशपुष्पप्रतीकाश वह्निमारुतसं भव । मित्रावरुणयोः पुत्र कुम्भयोने नमोऽस्तु ते
arghyamantraḥ kāśapuṣpapratīkāśa vahnimārutasaṁ bhava mitrāvaruṇayoḥ putra kumbhayone namo'stu te
अर्घ्य-मन्त्र -- 'हे काश-पुष्प के समान वर्णवाले, अग्नि और वायु से उत्पन्न, मित्र-वरुण के पुत्र, कुम्भ से उत्पन्न! आपको नमस्कार है।'
श्लोक 13 (skanda.5.35.13)
दत्तेऽर्घे यत्फलं व्यास तद्वै ह्येकमनाः शृणु । पुत्रवान्धनवांश्चैव जायते नात्र संशयः
datte'rghe yatphalaṁ vyāsa tadvai hyekamanāḥ śṛṇu putravāndhanavāṁścaiva jāyate nātra saṁśayaḥ
हे व्यास! अर्घ्य दिए जाने पर जो फल मिलता है, वह एकाग्रचित्त होकर सुनो -- मनुष्य पुत्रवान और धनवान होता है, इसमें कोई संशय नहीं।
श्लोक 14 (skanda.5.35.14)
मृतः स्वर्गमवाप्नोति संपन्ने जायतेकुले । मर्त्यलोकं पुनः प्राप्य महायोगीश्वरो भवेत्
mṛtaḥ svargamavāpnoti saṁpanne jāyatekule martyalokaṁ punaḥ prāpya mahāyogīśvaro bhavet
मरणोपरान्त वह स्वर्ग प्राप्त करता है, समृद्ध कुल में जन्म लेता है; मर्त्यलोक को पुनः प्राप्त कर वह महायोगीश्वर बनता है।
श्लोक 15 (skanda.5.35.15)
यश्चैतच्छृणुयान्नित्यं पठेद्वा सुसमाहितः । सर्वपापविनिर्मुक्तो मुनिलोके स मोदते
yaścaitacchṛṇuyānnityaṁ paṭhedvā susamāhitaḥ sarvapāpavinirmukto muniloke sa modate
और जो समाहितचित्त होकर इसे सदा सुनता या पढ़ता है, वह सर्वपापों से मुक्त होकर मुनिलोक में आनन्दित होता है।