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अवन्ती खण्ड · अध्याय 36

नरदीपमाहात्म्य-वर्णनम्

अध्याय 35अध्याय-सूचीअध्याय 37

श्लोक 1 (skanda.5.36.1)

व्यास उवाच । महाकालं किमर्थं तु किं वा शिवपदं स्मृतम् । कोटीश्वरं किमर्थं तु पावकं तत्किमुच्यते

vyāsa uvāca mahākālaṁ kimarthaṁ tu kiṁ vā śivapadaṁ smṛtam koṭīśvaraṁ kimarthaṁ tu pāvakaṁ tatkimucyate

व्यास ने कहा -- महाकाल यह नाम किसलिए है, अथवा शिवपद किस कारण स्मरण किया जाता है? कोटीश्वर किसलिए, और पावक उसे क्यों कहा जाता है?

श्लोक 2 (skanda.5.36.2)

नरदीपं किमर्थं तु द्वितीया वटमातरः । अभयेश्वरं किमर्थं तु शंखोद्धा रणमेव च

naradīpaṁ kimarthaṁ tu dvitīyā vaṭamātaraḥ abhayeśvaraṁ kimarthaṁ tu śaṁkhoddhā raṇameva ca

नरदीप किसलिए, और दूसरी वटमातर कौन हैं? अभयेश्वर किसलिए, और शंखोद्धारण भी किस कारण?

श्लोक 3 (skanda.5.36.3)

शूलेश्वरं किमर्थं तु किमोंकारस्तु कथ्यते । धूतपापं किमर्थं तु किमंगारेश्वरं तथा

śūleśvaraṁ kimarthaṁ tu kimoṁkārastu kathyate dhūtapāpaṁ kimarthaṁ tu kimaṁgāreśvaraṁ tathā

शूलेश्वर किसलिए, और ओंकार किस कारण कहा जाता है? धूतपाप किसलिए, और उसी प्रकार अंगारेश्वर भी क्यों?

श्लोक 4 (skanda.5.36.4)

पुरी चोज्जयिनी दिव्या सप्तकल्पा कथं स्मृता । कथयस्व मुनिश्रेष्ठ तस्या नामानि यानि च

purī cojjayinī divyā saptakalpā kathaṁ smṛtā kathayasva muniśreṣṭha tasyā nāmāni yāni ca

और दिव्य नगरी उज्जयिनी को सप्तकल्पा क्यों स्मरण किया जाता है? हे मुनिश्रेष्ठ! उसके जो भी नाम हैं, वे भी बताइए।

श्लोक 5 (skanda.5.36.5)

सनत्कुमार उवाच । शृणु व्यास यथा ख्याता पुरी दिव्या कुश स्थली । नामतः कर्मतः श्रेष्ठा सप्तकल्पानुवासिनी

sanatkumāra uvāca śṛṇu vyāsa yathā khyātā purī divyā kuśa sthalī nāmataḥ karmataḥ śreṣṭhā saptakalpānuvāsinī

सनत्कुमार ने कहा -- हे व्यास! सुनो, दिव्य नगरी कुशस्थली नाम और कर्म दोनों से श्रेष्ठ, सप्त कल्पों में निरन्तर निवास की गई है।

श्लोक 6 (skanda.5.36.6)

प्राक्कल्पे स्वर्णशृंगाख्या द्वितीये तु कुशस्थली । तृतीयेऽवंतिका प्रोक्ता चतुर्थेत्वमरा वती

prākkalpe svarṇaśṛṁgākhyā dvitīye tu kuśasthalī tṛtīye'vaṁtikā proktā caturthetvamarā vatī

प्रथम कल्प में स्वर्णशृंगा नाम, दूसरे में कुशस्थली; तीसरे में अवन्तिका कही गई, चौथे में अमरावती।

श्लोक 7 (skanda.5.36.7)

विख्याता पञ्चमे कल्पे पुरी चूडामणीति च । षष्ठे पद्मावती ज्ञेया सप्तमे चोज्जयिनी पुरी

vikhyātā pañcame kalpe purī cūḍāmaṇīti ca ṣaṣṭhe padmāvatī jñeyā saptame cojjayinī purī

पाँचवें कल्प में नगरी चूडामणि नाम से विख्यात हुई; छठे में पद्मावती जानो, सातवें में उज्जयिनी नगरी।

श्लोक 8 (skanda.5.36.8)

पुनरंते तु कल्पस्य स्वर्णशृङ्गादि का स्मृता । एतानि सप्त नामानि प्रातरुत्थाय यः पठेत्

punaraṁte tu kalpasya svarṇaśṛṅgādi kā smṛtā etāni sapta nāmāni prātarutthāya yaḥ paṭhet

और कल्प के अन्त में पुनः स्वर्णशृंगा आदि नाम स्मरण किया जाता है। जो प्रातःकाल उठकर ये सातों नाम पढ़ता है --

श्लोक 9 (skanda.5.36.9)

सप्तजन्मकृतात्पापान्मुच्यते नात्र संशयः । उज्जयिन्यां पुरा राजा बभूव किल चांधकः

saptajanmakṛtātpāpānmucyate nātra saṁśayaḥ ujjayinyāṁ purā rājā babhūva kila cāṁdhakaḥ

-- वह सात जन्मों में किए गए पापों से मुक्त हो जाता है, इसमें कोई संशय नहीं। उज्जयिनी में पूर्वकाल अंधक नामक एक राजा था।

श्लोक 10 (skanda.5.36.10)

तस्य पुत्रो महावीर्यो नाम्ना कनकदानवः । युद्धार्थं स महावीर्यः शक्रं युद्धे समाह्वयत्

tasya putro mahāvīryo nāmnā kanakadānavaḥ yuddhārthaṁ sa mahāvīryaḥ śakraṁ yuddhe samāhvayat

उसका पुत्र महापराक्रमी, कनक नामक दानव था। उस महाबली ने युद्ध हेतु शक्र को ललकारा।

श्लोक 11 (skanda.5.36.11)

क्रोधादिंद्रेण संग्रामे युध्य मानो निपातितः । निहत्य दानवं शक्रो भयादंधासुरस्य तु

krodhādiṁdreṇa saṁgrāme yudhya māno nipātitaḥ nihatya dānavaṁ śakro bhayādaṁdhāsurasya tu

युद्ध में लड़ते हुए वह क्रोधवश इन्द्र द्वारा मार गिराया गया। उस दानव का वध कर शक्र, अंधकासुर के भय से --

श्लोक 12 (skanda.5.36.12)

जगाम शंकरान्वेषी कैलासं शंकरालयम् । दृष्ट्वा प्रणम्य देवेशं चंद्रार्धकृत शेखरम्

jagāma śaṁkarānveṣī kailāsaṁ śaṁkarālayam dṛṣṭvā praṇamya deveśaṁ caṁdrārdhakṛta śekharam

-- शंकर को खोजते हुए कैलास पहुँचा, जो शंकर का निवास है। अर्धचन्द्र-शेखर देवेश को देखकर, प्रणाम कर --

श्लोक 13 (skanda.5.36.13)

भीतो विज्ञापयामास स चाश्र्वाकुललोचनः । अभयं देहि मे देव दानवादंधकाच्च वै

bhīto vijñāpayāmāsa sa cāśrvākulalocanaḥ abhayaṁ dehi me deva dānavādaṁdhakācca vai

-- भयभीत, अश्रुपूरित नेत्रों वाला वह विनती करने लगा -- 'हे देव! मुझे अंधक दानव से अभय दीजिए।'

श्लोक 14 (skanda.5.36.14)

शक्रस्येत्थं वचः श्रुत्वा शरणा गतवत्सलः । ददावभयमेवासौ मा भैस्त्वमंधकाद्धि वै

śakrasyetthaṁ vacaḥ śrutvā śaraṇā gatavatsalaḥ dadāvabhayamevāsau mā bhaistvamaṁdhakāddhi vai

शक्र के इस वचन को सुनकर, शरणागतवत्सल शिव ने उसे अभय दे दिया -- 'तुम अंधक से भयभीत मत होओ।'

श्लोक 15 (skanda.5.36.15)

कृत्वा रूपं महादेवो विश्वरूपं सुभैरवम् । सर्पैर्ललद्भिरत्युग्रैस्तीक्ष्णदंष्ट्रैर्विषोल्बणैः

kṛtvā rūpaṁ mahādevo viśvarūpaṁ subhairavam sarpairlaladbhiratyugraistīkṣṇadaṁṣṭrairviṣolbaṇaiḥ

महादेव ने विश्वरूप, अत्यन्त भयंकर रूप धारण किया, जो अत्यन्त उग्र, तीक्ष्ण दाढ़ों और विषयुक्त लपलपाते सर्पों से युक्त था --

श्लोक 16 (skanda.5.36.16)

पातालोदररूपैश्च भैरवारावनादिभिः । भुजैरनेकसाहस्रैर्बहुशस्त्रधृतैस्तथा

pātālodararūpaiśca bhairavārāvanādibhiḥ bhujairanekasāhasrairbahuśastradhṛtaistathā

-- पाताल के गर्भ जैसे रूपों वाला, भैरव-गर्जना वाला, अनेक सहस्रों भुजाओं वाला, बहुत शस्त्र धारण किए हुए --

श्लोक 17 (skanda.5.36.17)

सिंहचर्मपरीधानं व्याघ्रत्वगुत्तरीयकम् । गवाजिन कृताटोपं चंद्राग्निरविलोचनम्

siṁhacarmaparīdhānaṁ vyāghratvaguttarīyakam gavājina kṛtāṭopaṁ caṁdrāgniravilocanam

-- सिंहचर्म धारण किए, व्याघ्रचर्म का उत्तरीय ओढ़े, गोचर्म से युक्त, चन्द्र-अग्नि-सूर्य को नेत्र बनाए --

श्लोक 18 (skanda.5.36.18)

महामहीध्रतुल्याभ्यां जंघाभ्यां भूषितं सदा । क्षोभयंश्चालयन्सर्वान्पातालस्य तलावधि

mahāmahīdhratulyābhyāṁ jaṁghābhyāṁ bhūṣitaṁ sadā kṣobhayaṁścālayansarvānpātālasya talāvadhi

-- महापर्वतों के समान दोनों जंघाओं से सदा सुशोभित, पाताल के तल तक सब कुछ हिलाते-कँपाते हुए --

श्लोक 19 (skanda.5.36.19)

ईदृग्रूपं विधायेशो दनुदैत्यभयावहम् । अवातरन्महीं भीमः पादेनैकेन शंकरः

īdṛgrūpaṁ vidhāyeśo danudaityabhayāvaham avātaranmahīṁ bhīmaḥ pādenaikena śaṁkaraḥ

-- ऐसा दैत्यों को भयभीत करने वाला रूप धारण कर, भयंकर शंकर ने एक ही पैर से पृथ्वी पर अवतरण किया।

श्लोक 20 (skanda.5.36.20)

तत्रैव हि ह्रदो जातः सर्वदैवतवंदितः । ख्यातं शिवपदं तद्धि यत्पदाऽऽक्रांतवान्विभुः

tatraiva hi hrado jātaḥ sarvadaivatavaṁditaḥ khyātaṁ śivapadaṁ taddhi yatpadā''krāṁtavānvibhuḥ

वहीं एक सरोवर उत्पन्न हुआ, जो सभी देवताओं द्वारा वन्दित है; विभु के उस पद से आक्रान्त वह स्थान 'शिवपद' नाम से विख्यात हुआ।

श्लोक 21 (skanda.5.36.21)

पापानां च पुरा कोटिः पादांगुष्ठेन दारिता । कोटितीर्थमतः ख्यातं सर्वपापप्रणाशनम्

pāpānāṁ ca purā koṭiḥ pādāṁguṣṭhena dāritā koṭitīrthamataḥ khyātaṁ sarvapāpapraṇāśanam

पूर्वकाल में उनके पैर के अँगूठे से करोड़ों पाप विदीर्ण हुए थे; अतः 'कोटितीर्थ' यह नाम विख्यात हुआ, जो सर्वपापनाशक है।

श्लोक 22 (skanda.5.36.22)

अगस्त्येन तथा कोटिस्तीर्थानामवधारिता । अतोऽपीदं शुभं लोके कोटितीर्थं सदा स्मृतम्

agastyena tathā koṭistīrthānāmavadhāritā ato'pīdaṁ śubhaṁ loke koṭitīrthaṁ sadā smṛtam

इसी प्रकार अगस्त्य ने भी वहाँ करोड़ों तीर्थों को निश्चित किया; अतः यह शुभ कोटितीर्थ लोक में सदा स्मरण किया जाता है।

श्लोक 23 (skanda.5.36.23)

दृष्ट्वा तु त्रिदशाः सर्वे स्नाता वै हितकाम्यया । महा कालकृतं रूपं महाकालस्ततः स्मृतः

dṛṣṭvā tu tridaśāḥ sarve snātā vai hitakāmyayā mahā kālakṛtaṁ rūpaṁ mahākālastataḥ smṛtaḥ

यह देखकर सभी देवगण अपने कल्याण की कामना से वहाँ स्नान करने लगे; और महाकाल के रूप में प्रकट होने से वे 'महाकाल' नाम से स्मरण किए गए।

श्लोक 24 (skanda.5.36.24)

अंधासुरोऽपि दनुजः पुत्रं श्रुत्वा हतं युधि । क्रोधेन तमसाविष्टो रणतूर्याण्यवादयत

aṁdhāsuro'pi danujaḥ putraṁ śrutvā hataṁ yudhi krodhena tamasāviṣṭo raṇatūryāṇyavādayata

अंधकासुर दानव ने भी अपने पुत्र को युद्ध में मारा गया सुनकर, क्रोध और अन्धकार से भरकर युद्ध के नगाड़े बजवाए।

श्लोक 25 (skanda.5.36.25)

ससैन्यो निर्गतः प्राप्तो यत्र ते त्रिदशाः स्थिताः । महत्या सेनया सार्धं रथवारणयुक्तया

sasainyo nirgataḥ prāpto yatra te tridaśāḥ sthitāḥ mahatyā senayā sārdhaṁ rathavāraṇayuktayā

वह अपनी सेना सहित निकलकर वहाँ पहुँचा जहाँ देवगण स्थित थे, रथों और हाथियों से युक्त विशाल सेना के साथ।

श्लोक 26 (skanda.5.36.26)

तदैव दानवान्वीक्ष्य महाहवकृतोद्यमान् । वेपंतस्ते सुसंनद्धा शंभुं शरणमाययुः

tadaiva dānavānvīkṣya mahāhavakṛtodyamān vepaṁtaste susaṁnaddhā śaṁbhuṁ śaraṇamāyayuḥ

उस महायुद्ध हेतु तत्पर दानवों को देखकर, कवच पहने हुए भी काँपते हुए देवगण शम्भु की शरण में गए।

श्लोक 27 (skanda.5.36.27)

मा भैरिति महाकालो देवानुक्त्वा त्रिलोचनः । गृहीत्वा शूलमातिष्ठद्दष्टादंष्ट्राधरो रुषा

mā bhairiti mahākālo devānuktvā trilocanaḥ gṛhītvā śūlamātiṣṭhaddaṣṭādaṁṣṭrādharo ruṣā

'भय मत करो' -- ऐसा देवों से कहकर त्रिलोचन महाकाल शूल उठाकर, क्रोधवश दाँतों से होंठ काटते हुए खड़े हो गए।

श्लोक 28 (skanda.5.36.28)

कोपयुक्ते विरूपाक्षे ज्वालाभिः पूरितं नभः । अंधकेनाथ रुष्टेन शरकोटिस्तु दुःसहा

kopayukte virūpākṣe jvālābhiḥ pūritaṁ nabhaḥ aṁdhakenātha ruṣṭena śarakoṭistu duḥsahā

क्रोधित त्रिनेत्र से आकाश ज्वालाओं से भर गया। तब क्रुद्ध अंधक द्वारा छोड़े गए करोड़ों दुःसह बाण --

श्लोक 29 (skanda.5.36.29)

मुक्ता जगाम देवानां ननाश शलभाकृति । विस्फुलिंगार्चिषं वह्निं मुंचमानः पिनाकधृक्

muktā jagāma devānāṁ nanāśa śalabhākṛti visphuliṁgārciṣaṁ vahniṁ muṁcamānaḥ pinākadhṛk

-- देवताओं की ओर गए, किन्तु टिड्डियों की भाँति नष्ट हो गए। पिनाकधारी ने चिनगारियाँ बिखेरती अग्नि छोड़ते हुए --

श्लोक 30 (skanda.5.36.30)

शतशः शकलीचक्रे तं च बाणैरताडयत् । अंधकोऽपि हि युद्धस्थः शिथिलः शिथिला युधः

śataśaḥ śakalīcakre taṁ ca bāṇairatāḍayat aṁdhako'pi hi yuddhasthaḥ śithilaḥ śithilā yudhaḥ

-- उन्हें सैकड़ों टुकड़ों में तोड़ दिया और बाणों से उस पर प्रहार किया। युद्धरत अंधक भी शिथिल और शिथिल-शस्त्र हो गया।

श्लोक 31 (skanda.5.36.31)

निरुद्धः शंभुना बाणैरलिभिः पंकजं यथा । तस्य सैन्यं प्रविद्धं च तद्गणैर्युधि योधिभिः

niruddhaḥ śaṁbhunā bāṇairalibhiḥ paṁkajaṁ yathā tasya sainyaṁ praviddhaṁ ca tadgaṇairyudhi yodhibhiḥ

जैसे भ्रमरों से कमल घिर जाता है, वैसे ही वह शम्भु के बाणों से घिर गया। उसकी सेना युद्धरत गणों द्वारा छिन्न-भिन्न कर दी गई --

श्लोक 32 (skanda.5.36.32)

योधवरैर्हता दिव्यैः स्थाणु सान्निध्यमाश्रितैः । ततोंऽधकेन सैन्यं स्वं भिन्नं दृष्ट्वा तथासुरैः

yodhavarairhatā divyaiḥ sthāṇu sānnidhyamāśritaiḥ tatoṁ'dhakena sainyaṁ svaṁ bhinnaṁ dṛṣṭvā tathāsuraiḥ

-- स्थाणु की सन्निधि में स्थित श्रेष्ठ दिव्य योद्धाओं द्वारा मार डाली गई। तब अंधक ने अपनी सेना को असुरों सहित छिन्न-भिन्न देखकर --

श्लोक 33 (skanda.5.36.33)

आत्मानं च महेशेन विद्धं च बाणकोटिभिः । विदलीकृतदेहोऽसौ भय माश्रित्य वेगतः

ātmānaṁ ca maheśena viddhaṁ ca bāṇakoṭibhiḥ vidalīkṛtadeho'sau bhaya māśritya vegataḥ

-- और स्वयं को महेश द्वारा करोड़ों बाणों से बिंधा हुआ, शरीर विदीर्ण हुआ पाकर, वेगपूर्वक भय से ग्रस्त होकर --

श्लोक 34 (skanda.5.36.34)

चकार तामसीं मायां मायाशतविशारदः । तयांतर्हितदेवेशो जगाम दिशमुत्तराम्

cakāra tāmasīṁ māyāṁ māyāśataviśāradaḥ tayāṁtarhitadeveśo jagāma diśamuttarām

-- सैकड़ों माया में निपुण उसने एक तामसी माया रची। उससे देवेश अदृश्य होकर उत्तर दिशा को चले गए।

श्लोक 35 (skanda.5.36.35)

शंभुर्भीतिभरं बिभ्रद्बभ्राम भुवि भिन्नहृत् । यस्मिन्मार्गे गतो देवस्तेन दैत्यो जगाम ह

śaṁbhurbhītibharaṁ bibhradbabhrāma bhuvi bhinnahṛt yasminmārge gato devastena daityo jagāma ha

शम्भु मानो भय का भार वहन करते, मानो हृदय टूटा हो, पृथ्वी पर विचरण करने लगे; देव जिस मार्ग से गए, दैत्य भी उसी मार्ग से गया।

श्लोक 36 (skanda.5.36.36)

वदन्न दृश्यते क्वासौ गतो दुष्टः पुनःपुनः । उवाच चांधकः शब्दं तथोवा च महेश्वरः

vadanna dṛśyate kvāsau gato duṣṭaḥ punaḥpunaḥ uvāca cāṁdhakaḥ śabdaṁ tathovā ca maheśvaraḥ

'वह दुष्ट कहाँ गया, दिखाई नहीं देता' -- ऐसा बार-बार कहते हुए अंधक बोला, और महेश्वर ने भी वैसी ही वाणी कही।

श्लोक 37 (skanda.5.36.37)

तत्र तीर्थमथोत्पन्नं वागंधकमभिश्रुतम् । तत्र स्नात्वा शुचिर्भूत्वा यो वै दद्यात्सशर्करम्

tatra tīrthamathotpannaṁ vāgaṁdhakamabhiśrutam tatra snātvā śucirbhūtvā yo vai dadyātsaśarkaram

वहीं एक तीर्थ उत्पन्न हुआ, जो 'वागंधक' नाम से विख्यात हुआ। वहाँ स्नान कर, शुद्ध होकर जो शर्करा सहित दान देता है --

श्लोक 38 (skanda.5.36.38)

नवम्यां मार्गशीर्षस्य शुक्लायां श्रद्धयान्वितः । अक्षयं तद्भवेद्दत्तं दाता शिवपुरं व्रजेत्

navamyāṁ mārgaśīrṣasya śuklāyāṁ śraddhayānvitaḥ akṣayaṁ tadbhaveddattaṁ dātā śivapuraṁ vrajet

-- मार्गशीर्ष शुक्ल नवमी को श्रद्धापूर्वक -- वह दान अक्षय होता है, और दाता शिवपुर को जाता है।

श्लोक 39 (skanda.5.36.39)

पितृनुद्दिश्य यत्किंचिद्दीयते भक्तितः शिवे । तृप्तास्तिष्ठंति ते तावद्यावदाभूत संप्लवम्

pitṛnuddiśya yatkiṁciddīyate bhaktitaḥ śive tṛptāstiṣṭhaṁti te tāvadyāvadābhūta saṁplavam

पितरों के उद्देश्य से भक्तिपूर्वक शिव को जो कुछ भी दिया जाता है, उससे वे प्रलय होने तक तृप्त रहते हैं।

श्लोक 40 (skanda.5.36.40)

तमसा च्छादिता देवाः संबभूवुः समाकुलाः । संभ्रांतमनसः सर्वे न किंचिदपि मेनिरे

tamasā cchāditā devāḥ saṁbabhūvuḥ samākulāḥ saṁbhrāṁtamanasaḥ sarve na kiṁcidapi menire

उस अन्धकार से आच्छादित देवगण व्याकुल हो गए; भ्रमित मन वाले वे सब कुछ भी नहीं समझ पा रहे थे।

श्लोक 41 (skanda.5.36.41)

एतस्मिन्नंतरे व्यास नरादित्यः स्वतेजसा । उत्तस्थौ नररूपेण कुर्वन्वितिमिरा दिशः

etasminnaṁtare vyāsa narādityaḥ svatejasā uttasthau nararūpeṇa kurvanvitimirā diśaḥ

हे व्यास! इसी बीच नरादित्य अपने ही तेज से नर-रूप में प्रकट हुए, दिशाओं को अन्धकाररहित करते हुए।

श्लोक 42 (skanda.5.36.42)

नष्टे तमसि दैत्येपि प्रकाश प्रकटे सति । देवा मुदमवापुस्ते दृष्ट्वा नरं विलोचनैः

naṣṭe tamasi daityepi prakāśa prakaṭe sati devā mudamavāpuste dṛṣṭvā naraṁ vilocanaiḥ

दैत्य के होते हुए भी अन्धकार नष्ट होने और प्रकाश प्रकट होने पर, देवगण उस मनुष्य को अपनी आँखों से देखकर आनन्दित हो उठे।

श्लोक 43 (skanda.5.36.43)

स्तुवंतो विविधैः स्तोत्रैर्नररूपं दिवाकरम् । उत्तस्थौ नररूपेण दीप्तो यस्माद्दिवाकरः

stuvaṁto vividhaiḥ stotrairnararūpaṁ divākaram uttasthau nararūpeṇa dīpto yasmāddivākaraḥ

उन्होंने नर-रूपधारी दिवाकर की विविध स्तोत्रों से स्तुति की। नर-रूप में दीप्तिमान होकर उठे, इसीलिए वे दिवाकर --

श्लोक 44 (skanda.5.36.44)

तेनास्य नाम ते चकुर्नरदीप इतीश्वराः । यः पश्यति नरो भक्त्या नरदीपं दिवाकरम्

tenāsya nāma te cakurnaradīpa itīśvarāḥ yaḥ paśyati naro bhaktyā naradīpaṁ divākaram

-- उनका नाम देवताओं ने 'नरदीप' रखा। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक नरदीप दिवाकर का दर्शन करता है --

श्लोक 45 (skanda.5.36.45)

मुच्यते सर्वपापेभ्यो यद्यपि ब्रह्महा भवेत् । षष्ठ्यामर्कदिने विप्र सप्तम्यामुप वासयेत्

mucyate sarvapāpebhyo yadyapi brahmahā bhavet ṣaṣṭhyāmarkadine vipra saptamyāmupa vāsayet

-- वह ब्रह्महत्यारा होने पर भी सर्वपापों से मुक्त हो जाता है। हे विप्र! षष्ठी को, रविवार को और सप्तमी को उपवास करना चाहिए।

श्लोक 46 (skanda.5.36.46)

दिनच्छिद्रेथ संक्रांतौ ग्रहणे विषुवत्यथ । कुंडे स्नात्वा शुचिर्भूत्वा जपन्नियतमानसः

dinacchidretha saṁkrāṁtau grahaṇe viṣuvatyatha kuṁḍe snātvā śucirbhūtvā japanniyatamānasaḥ

दिन की सन्धि में, संक्रान्ति में, ग्रहण में अथवा विषुव में, कुण्ड में स्नान कर, शुद्ध होकर, संयतचित्त से जप करते हुए --

श्लोक 47 (skanda.5.36.47)

नरदीपं नरः पश्येत्स्तोत्रवा दित्रमंगलैः । गंधैर्धूपैस्तथा दीपैर्नैवेद्यैः पूजयेत्तथा

naradīpaṁ naraḥ paśyetstotravā ditramaṁgalaiḥ gaṁdhairdhūpaistathā dīpairnaivedyaiḥ pūjayettathā

-- मनुष्य को स्तोत्र, वाद्य और मंगल-कार्यों सहित नरदीप का दर्शन करना चाहिए; और गन्ध, धूप, दीप तथा नैवेद्यों से पूजन करना चाहिए।

श्लोक 48 (skanda.5.36.48)

गीतं वाद्यं पुरस्कृत्य प्रणम्याष्टांगमेव च । प्रातर्मध्यापराह्ने वा कृत्वार्कस्य प्रदक्षिणा म्

gītaṁ vādyaṁ puraskṛtya praṇamyāṣṭāṁgameva ca prātarmadhyāparāhne vā kṛtvārkasya pradakṣiṇā m

गीत-वाद्य को आगे रखकर, अष्टांग प्रणाम कर, प्रातः, मध्याह्न अथवा अपराह्न में सूर्य की प्रदक्षिणा कर --

श्लोक 49 (skanda.5.36.49)

स मुक्तः सर्वपापैस्तु सप्तजन्मकृतैरपि । सूर्यकोटिप्रतीकाशैर्विमानैः सार्वकामिकैः

sa muktaḥ sarvapāpaistu saptajanmakṛtairapi sūryakoṭipratīkāśairvimānaiḥ sārvakāmikaiḥ

-- वह सात जन्मों में किए गए पापों सहित सर्वपापों से मुक्त हो जाता है; करोड़ों सूर्यों के समान सर्वकामप्रद विमानों से --

श्लोक 50 (skanda.5.36.50)

सूर्यलोकं प्रयात्याशु यत्सुरैरपि दुर्लभम् । शक्रात्प्राप्य पुरा यस्माद्भानुरत्र प्रतिष्ठितः

sūryalokaṁ prayātyāśu yatsurairapi durlabham śakrātprāpya purā yasmādbhānuratra pratiṣṭhitaḥ

-- वह शीघ्र सूर्यलोक को जाता है, जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। चूँकि यहाँ पूर्वकाल शक्र से प्राप्त कर भानु प्रतिष्ठित हुए --

श्लोक 51 (skanda.5.36.51)

नरेणैव प्रसादेन नरदीपस्ततो ह्ययम् । तदैवास्य पुरा व्यास यात्रा शक्रेण निर्मिता

nareṇaiva prasādena naradīpastato hyayam tadaivāsya purā vyāsa yātrā śakreṇa nirmitā

-- और नर के ही प्रसाद से यह 'नरदीप' कहलाए। हे व्यास! उसी समय शक्र द्वारा इनकी यात्रा भी पूर्वकाल में स्थापित की गई थी।

श्लोक 52 (skanda.5.36.52)

आगमिष्याम्यहं पार्थ सार्धं देवैः समाहितः । ज्येष्ठे सिते द्वितीयायां नरदीपे तु सर्वदा

āgamiṣyāmyahaṁ pārtha sārdhaṁ devaiḥ samāhitaḥ jyeṣṭhe site dvitīyāyāṁ naradīpe tu sarvadā

(इन्द्र ने कहा) -- 'हे पार्थ! मैं देवताओं सहित समाहितचित्त होकर सदा ज्येष्ठ शुक्ल द्वितीया को नरदीप में आऊँगा।

श्लोक 53 (skanda.5.36.53)

तत्राहमागतो ज्ञेयो लोके देवस्य वर्षणात् । ततोऽनंतरमागत्य देवा ये त्रिदशालयात्

tatrāhamāgato jñeyo loke devasya varṣaṇāt tato'naṁtaramāgatya devā ye tridaśālayāt

वहाँ मेरे आगमन को लोक में देव की वर्षा से जाना जाए।' तत्पश्चात् जो देवगण त्रिदशालय से आते हैं --

श्लोक 54 (skanda.5.36.54)

दृष्ट्वा देवं तथारूढं नरदीपं सुदीपितम् । कृत्वा यात्रां च ते यांति देवयानैरितस्ततः

dṛṣṭvā devaṁ tathārūḍhaṁ naradīpaṁ sudīpitam kṛtvā yātrāṁ ca te yāṁti devayānairitastataḥ

-- वे उस प्रकार आरूढ़, देदीप्यमान नरदीप देव का दर्शन कर, यात्रा सम्पन्न कर अपने-अपने देव-विमानों से इधर-उधर चले जाते हैं।

श्लोक 55 (skanda.5.36.55)

यः पश्येन्मानवो भक्त्या नरदीपं रथस्थितम् । सर्वपापविनिर्मुक्तः सूर्यलोके महीयते

yaḥ paśyenmānavo bhaktyā naradīpaṁ rathasthitam sarvapāpavinirmuktaḥ sūryaloke mahīyate

जो मनुष्य भक्तिपूर्वक रथ पर स्थित नरदीप का दर्शन करता है, वह सर्वपापों से मुक्त होकर सूर्यलोक में महिमामण्डित होता है।

श्लोक 56 (skanda.5.36.56)

रथयात्रामथो वक्ष्ये नरदीपस्य या मुने । तां कृत्वा चैव यत्पुण्यं मुनिभिः परिकीर्तितम्

rathayātrāmatho vakṣye naradīpasya yā mune tāṁ kṛtvā caiva yatpuṇyaṁ munibhiḥ parikīrtitam

हे मुने! अब मैं नरदीप की रथयात्रा का वर्णन करता हूँ, और उसे सम्पन्न करने का जो पुण्य मुनियों ने कहा है, वह भी बताता हूँ।

श्लोक 57 (skanda.5.36.57)

ज्येष्ठे सिते द्वितीयायां रथस्थो हि दिवाकरः । कुशस्थल्यां द्विजैः श्रेष्ठैर्बाहुक्षेपैः प्रणीयते

jyeṣṭhe site dvitīyāyāṁ rathastho hi divākaraḥ kuśasthalyāṁ dvijaiḥ śreṣṭhairbāhukṣepaiḥ praṇīyate

ज्येष्ठ शुक्ल द्वितीया को रथस्थ दिवाकर को श्रेष्ठ द्विजों द्वारा भुजाओं के प्रहार (रस्सी खींचकर) से कुशस्थली में आगे ले जाया जाता है।

श्लोक 58 (skanda.5.36.58)

उत्तरां दिशमायांतं यः पश्यति दिवस्पतिम् । अग्निष्टोमस्य यज्ञस्य लभते सोऽखिलं फलम्

uttarāṁ diśamāyāṁtaṁ yaḥ paśyati divaspatim agniṣṭomasya yajñasya labhate so'khilaṁ phalam

जो उत्तर दिशा की ओर आते हुए दिवस्पति का दर्शन करता है, वह अग्निष्टोम यज्ञ का सम्पूर्ण फल प्राप्त करता है।

श्लोक 59 (skanda.5.36.59)

निवृत्य केशवार्काद्यो रथं पश्यति मानवः । शुंडीरस्वामिनो यात्रा कृता तेन न संशयः

nivṛtya keśavārkādyo rathaṁ paśyati mānavaḥ śuṁḍīrasvāmino yātrā kṛtā tena na saṁśayaḥ

केशवार्क से लौटकर जो मनुष्य रथ का दर्शन करता है, उसके द्वारा शुण्डीरस्वामी की यात्रा सम्पन्न हो गई, इसमें संशय नहीं।

श्लोक 60 (skanda.5.36.60)

रथमाकर्षते यस्तु रज्ज्वाकर्षेण वै मुने । कुलमुद्धरते सोऽपि पूर्वान्पितृपितामहान्

rathamākarṣate yastu rajjvākarṣeṇa vai mune kulamuddharate so'pi pūrvānpitṛpitāmahān

हे मुने! जो रस्सी खींचकर रथ को खींचता है, वह भी अपने पूर्वज पितरों और पितामहों के कुल का उद्धार करता है।

श्लोक 61 (skanda.5.36.61)

दक्षिणाभिमुखं यांतं नरदीपं द्विजोत्तम । ये संयताः प्रपश्यंति ते यांति च त्रिविष्टपम्

dakṣiṇābhimukhaṁ yāṁtaṁ naradīpaṁ dvijottama ye saṁyatāḥ prapaśyaṁti te yāṁti ca triviṣṭapam

हे द्विजश्रेष्ठ! जो संयतचित्त होकर दक्षिण दिशा की ओर जाते हुए नरदीप का दर्शन करते हैं, वे स्वर्ग को जाते हैं।

श्लोक 62 (skanda.5.36.62)

सूत्रेण वेष्टयेत्क्षेत्रं रथं देवमथापि वा । सर्वान्कामानवाप्नोति कृतपुण्यश्च जायते

sūtreṇa veṣṭayetkṣetraṁ rathaṁ devamathāpi vā sarvānkāmānavāpnoti kṛtapuṇyaśca jāyate

जो सूत्र से क्षेत्र, रथ अथवा देव को लपेटता है, वह सभी कामनाएँ प्राप्त करता है और पुण्यवान बनता है।

श्लोक 63 (skanda.5.36.63)

प्रदक्षिणां तु सूर्यस्य भक्त्या कुर्वंति ये नराः । प्रदक्षिणीकृता तैस्तु सप्तद्वीपा वसुंधरा

pradakṣiṇāṁ tu sūryasya bhaktyā kurvaṁti ye narāḥ pradakṣiṇīkṛtā taistu saptadvīpā vasuṁdharā

जो मनुष्य भक्तिपूर्वक सूर्य की प्रदक्षिणा करते हैं, उनके द्वारा सप्तद्वीपवती सम्पूर्ण पृथ्वी की प्रदक्षिणा हो जाती है।

श्लोक 64 (skanda.5.36.64)

प्रातरुत्थाय यो भक्त्या मौनी याति दिवाकरम् । दृष्ट्वा तु पूर्वद्वारेण नमस्कृत्य द्विजोत्तम

prātarutthāya yo bhaktyā maunī yāti divākaram dṛṣṭvā tu pūrvadvāreṇa namaskṛtya dvijottama

हे द्विजश्रेष्ठ! जो प्रातःकाल उठकर मौन रहकर भक्तिपूर्वक दिवाकर के पास जाता है, दर्शन कर पूर्व द्वार से प्रणाम करके --

श्लोक 65 (skanda.5.36.65)

प्रविश्य दक्षिणेनैव रथचक्रं प्रपूजयेत् । तेन द्वारेण निष्क्रम्य प्रणिपत्य व्रजेत्ततः

praviśya dakṣiṇenaiva rathacakraṁ prapūjayet tena dvāreṇa niṣkramya praṇipatya vrajettataḥ

-- प्रविष्ट होकर दक्षिण द्वार से रथ-चक्र का पूजन करे; उसी द्वार से निकलकर, प्रणाम कर आगे जाए।

श्लोक 66 (skanda.5.36.66)

पश्चिमं द्वारमाश्रित्य रथस्थं सूर्यमर्चयेत् । चामरं च वितानं च घंटादीनि निवेदयेत्

paścimaṁ dvāramāśritya rathasthaṁ sūryamarcayet cāmaraṁ ca vitānaṁ ca ghaṁṭādīni nivedayet

पश्चिम द्वार से जाकर रथस्थ सूर्य का पूजन करे; चामर, वितान और घंटा आदि अर्पित करे।

श्लोक 67 (skanda.5.36.67)

पूर्वद्वारे तु गौर्दे या तथाश्वश्चैव दक्षिणे । पश्चिमे च गजः प्रोक्त उत्तरे रथ एव च

pūrvadvāre tu gaurde yā tathāśvaścaiva dakṣiṇe paścime ca gajaḥ prokta uttare ratha eva ca

पूर्व द्वार में गौ देनी चाहिए, दक्षिण में अश्व; पश्चिम में हाथी कहा गया है, और उत्तर में स्वयं रथ।

श्लोक 68 (skanda.5.36.68)

कुर्यादेव तु यो यात्रां नरदीपस्य मानवः । सर्वान्कामानवाप्नोति कृतपुण्यश्च जायते

kuryādeva tu yo yātrāṁ naradīpasya mānavaḥ sarvānkāmānavāpnoti kṛtapuṇyaśca jāyate

जो मनुष्य इस विधि से नरदीप की यात्रा सम्पन्न करता है, वह सभी कामनाएँ प्राप्त करता है और पुण्यवान बनता है।

श्लोक 69 (skanda.5.36.69)

गोसूर्यशिवशक्राणां स्वर्लोकं लभते शुभम् । प्रदक्षिणा महामेरोः कृता तेन भवेन्मुने

gosūryaśivaśakrāṇāṁ svarlokaṁ labhate śubham pradakṣiṇā mahāmeroḥ kṛtā tena bhavenmune

वह गौ, सूर्य, शिव और शक्र के शुभ स्वर्गलोक को प्राप्त करता है; हे मुने! उसके द्वारा महामेरु की प्रदक्षिणा भी सम्पन्न मानी जाती है।

श्लोक 70 (skanda.5.36.70)

दद्याद्गवां सहस्रं यो व्यतीपातशते नरः । अश्वानां च सहस्रेण यद्यायात्तत्फलं लभेत्

dadyādgavāṁ sahasraṁ yo vyatīpātaśate naraḥ aśvānāṁ ca sahasreṇa yadyāyāttatphalaṁ labhet

जो मनुष्य सौ व्यतीपातों में सहस्र गौओं का दान करता है, वही फल यहाँ आने मात्र से, जैसे सहस्र अश्वों के दान का, प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 71 (skanda.5.36.71)

नरदीपे रथारूढे वपनं कारयेत्तु यः । श्रिया न विच्युतिस्तस्य सूर्यलोके महीयते

naradīpe rathārūḍhe vapanaṁ kārayettu yaḥ śriyā na vicyutistasya sūryaloke mahīyate

जो नरदीप के रथारूढ़ होने पर मुण्डन कराता है, उसकी श्री का कभी नाश नहीं होता, वह सूर्यलोक में महिमामण्डित होता है।

श्लोक 72 (skanda.5.36.72)

सूर्यस्य पुरतो वाप्यां मासं नित्यं सरस्वती । यस्तामालोकते मर्त्यो दुःस्वप्नं तस्य नश्यति

sūryasya purato vāpyāṁ māsaṁ nityaṁ sarasvatī yastāmālokate martyo duḥsvapnaṁ tasya naśyati

सूर्य के सामने बावड़ी में एक मास तक सदा सरस्वती विराजती हैं; जो मर्त्य उनका दर्शन करता है, उसका दुःस्वप्न नष्ट हो जाता है।

श्लोक 73 (skanda.5.36.73)

भक्त्या योऽनुदिनं व्यास नरदीपं प्रपश्यति । उत्तमं स्थान मासाद्य पुत्रपौत्रसमन्वितः

bhaktyā yo'nudinaṁ vyāsa naradīpaṁ prapaśyati uttamaṁ sthāna māsādya putrapautrasamanvitaḥ

हे व्यास! जो भक्तिपूर्वक प्रतिदिन नरदीप का दर्शन करता है, वह उत्तम स्थान पाकर, पुत्र-पौत्रों सहित --

श्लोक 74 (skanda.5.36.74)

प्रक्रीड्य बंधुभिः सार्धं मृतः सूर्यपुरं व्रजेत् । प्रनष्टे तिमिरे विप्र जाते सर्वत्र सुप्रभे

prakrīḍya baṁdhubhiḥ sārdhaṁ mṛtaḥ sūryapuraṁ vrajet pranaṣṭe timire vipra jāte sarvatra suprabhe

-- बन्धुओं के साथ क्रीड़ा कर, मरणोपरान्त सूर्यपुर को जाता है। हे विप्र! जब अन्धकार नष्ट होकर सर्वत्र प्रकाश फैल गया --

श्लोक 75 (skanda.5.36.75)

हतेंऽधके महेशेन शूलेन त्रिशिखेन वै । प्रहृष्टाश्च सुराः सर्वे ब्रह्मेंद्रप्रमुखास्तदा

hateṁ'dhake maheśena śūlena triśikhena vai prahṛṣṭāśca surāḥ sarve brahmeṁdrapramukhāstadā

-- और महेश ने त्रिशूल से अंधक का वध कर दिया, तब ब्रह्मा-इन्द्र आदि सभी देवगण अत्यन्त प्रसन्न हुए।

श्लोक 76 (skanda.5.36.76)

शंखं दध्मौ तदा विष्णुः सुराणां हितकाम्यया । तत्र तीर्थमथोत्पन्नं शंखोद्धारणसंज्ञ कम्

śaṁkhaṁ dadhmau tadā viṣṇuḥ surāṇāṁ hitakāmyayā tatra tīrthamathotpannaṁ śaṁkhoddhāraṇasaṁjña kam

तब विष्णु ने देवताओं के कल्याण की कामना से शंख बजाया। वहीं एक तीर्थ उत्पन्न हुआ, जो 'शंखोद्धारण' नाम से कहलाया।

श्लोक 77 (skanda.5.36.77)

तत्र संनिहितो विष्णुर्लिंगं चैव चतुर्मुखम् । अनाद्यं चैव विप्रेंद्र लिंगस्यैव समीपतः

tatra saṁnihito viṣṇurliṁgaṁ caiva caturmukham anādyaṁ caiva vipreṁdra liṁgasyaiva samīpataḥ

वहाँ विष्णु विराजमान हैं, और एक अनादि चतुर्मुख लिंग भी है। हे द्विजेन्द्र! उसी लिंग के समीप --

श्लोक 78 (skanda.5.36.78)

देवस्य दक्षिणे भागे शूलेनाधिष्ठितः स्थितः । चतुर्दश्यां तथाष्टम्यां ये पश्यंति जितेंद्रियाः

devasya dakṣiṇe bhāge śūlenādhiṣṭhitaḥ sthitaḥ caturdaśyāṁ tathāṣṭamyāṁ ye paśyaṁti jiteṁdriyāḥ

-- देव के दक्षिण भाग में शूल सहित (कार्तिकेय) स्थित हैं। जो इन्द्रियसंयमी चतुर्दशी और अष्टमी को इनका दर्शन करते हैं --

श्लोक 79 (skanda.5.36.79)

ते क्षीणाशेषपापौघाः प्राप्स्यंति परमां गतिम् । योगिनीनां बलिं यस्तु यथावत्संप्रदा स्यति

te kṣīṇāśeṣapāpaughāḥ prāpsyaṁti paramāṁ gatim yoginīnāṁ baliṁ yastu yathāvatsaṁpradā syati

-- वे समस्त पापराशि से मुक्त होकर परम गति को प्राप्त करते हैं। जो योगिनियों की बलि विधिवत अर्पित करता है --

श्लोक 80 (skanda.5.36.80)

भूतप्रेतपिशाचाद्यैर्नासौ केनापि बाध्यते । द्वादशीं समुपोष्यैव स्नात्वा देवं जनार्दनम्

bhūtapretapiśācādyairnāsau kenāpi bādhyate dvādaśīṁ samupoṣyaiva snātvā devaṁ janārdanam

-- वह भूत, प्रेत, पिशाच आदि किसी से भी बाधित नहीं होता। द्वादशी को उपवास कर, स्नान कर देव जनार्दन का --

श्लोक 81 (skanda.5.36.81)

यः पश्येच्छंखिनं देवं सोऽच्युतं स्थानमाप्नुयात्

yaḥ paśyecchaṁkhinaṁ devaṁ so'cyutaṁ sthānamāpnuyāt

-- जो दर्शन करता है और देव शंखी का दर्शन करता है, वह अच्युत के अविनाशी पद को प्राप्त करता है।

श्लोक 82 (skanda.5.36.82)

यः स्थूलसूक्ष्मप्रकटप्रकाशो यः सर्वभूतो न च सर्वभूतः । विश्व यतश्चैव हि विश्वहेतुर्नमोस्तु तस्मै पुरुषोत्तमाय

yaḥ sthūlasūkṣmaprakaṭaprakāśo yaḥ sarvabhūto na ca sarvabhūtaḥ viśva yataścaiva hi viśvaheturnamostu tasmai puruṣottamāya

जो स्थूल और सूक्ष्म दोनों रूप में प्रकट प्रकाशस्वरूप हैं, जो सर्वभूतस्वरूप होकर भी सर्वभूतों से परे हैं, जिनसे यह सम्पूर्ण विश्व उत्पन्न है, जो विश्व के कारण हैं -- उन पुरुषोत्तम को नमस्कार है।

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