अवन्ती खण्ड · अध्याय 351
हंस तीर्थ की महिमा
श्लोक 1 (skanda.5.351.1)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। ततो गच्छेद्धराधीश हंसतीर्थमनुत्तमम्। यत्र हंसस्तपस्तप्त्वा ब्रह्मवाहनतां गतः
śrīmārkaṇḍeya uvāca| tato gacchedharādhīśa haṁsatīrthamanuttamam| yatra haṁsastapastaptvā brahmavāhanatāṁ gataḥ
श्री मार्कण्डेय ने कहा — हे धराधीश! फिर उस अनुपम हंसतीर्थ में जाना चाहिए, जहाँ हंस ने तपस्या करके ब्रह्मा के वाहन-पद को प्राप्त किया था।
श्लोक 2 (skanda.5.351.2)
हंसतीर्थे नरः स्नात्वा दानं दत्त्वा च काञ्चनम्। सर्वपापविनिर्मुक्तो ब्रह्मलोकं स गच्छति
haṁsatīrthe naraḥ snātvā dānaṁ dattvā ca kāñcanam| sarvapāpavinirmukto brahmalokaṁ sa gacchati
हंसतीर्थ में स्नान करके और स्वर्ण का दान देकर मनुष्य समस्त पापों से मुक्त होकर ब्रह्मलोक को जाता है।
श्लोक 3 (skanda.5.351.3)
हंसयुक्तेन यानेन तरुणादित्यवर्चसा। सर्वकामसमृद्धेन सेव्यमानोऽप्सरोगणैः
haṁsayuktena yānena taruṇādityavarcasā| sarvakāmasamṛddhena sevyamāno'psarogaṇaiḥ
हंसों से युक्त, उदीयमान सूर्य के समान कान्तिवाले, सम्पूर्ण कामनाओं से समृद्ध विमान द्वारा, अप्सराओं से सेवित होकर।
श्लोक 4 (skanda.5.351.4)
तत्र भुक्त्वा यथाकामं सर्वान् भोगान् यथेप्सितान्। जातिस्मरो हि जायेत पुनर्मानुष्यमागतः
tatra bhuktvā yathākāmaṁ sarvān bhogān yathepsitān| jātismaro hi jāyeta punarmānuṣyamāgataḥ
वहाँ इच्छानुसार समस्त वांछित भोगों को भोगकर, पुनः मनुष्य-योनि में आने पर वह पूर्वजन्म का स्मरण रखने वाला होता है।
श्लोक 5 (skanda.5.351.5)
संन्यासेन त्यजेद्देहं मोक्षमाप्नोति भारत
saṁnyāsena tyajeddehaṁ mokṣamāpnoti bhārata
हे भारत! संन्यास द्वारा शरीर त्यागकर वह मोक्ष प्राप्त करता है।
श्लोक 6 (skanda.5.351.6)
एतत्ते कथितं पार्थ हंसतीर्थस्य यत्फलम्। सर्वपापहरं पुण्यं सर्वदुःखविनाशनम्
etatte kathitaṁ pārtha haṁsatīrthasya yatphalam| sarvapāpaharaṁ puṇyaṁ sarvaduḥkhavināśanam
हे पार्थ! तुम्हें यह हंसतीर्थ का फल बताया गया, जो समस्त पापों को हरने वाला, पुण्यमय तथा समस्त दुःखों का नाश करने वाला है।