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अवन्ती खण्ड · अध्याय 352

मूलस्थान तीर्थ की महिमा

अध्याय 351अध्याय-सूचीअध्याय 353

श्लोक 1 (skanda.5.352.1)

श्रीमार्कण्डेय उवाच। तस्यैवानन्तरं गच्छेत्सूर्यतीर्थमनुत्तमम्। मूलस्थानमिति ख्यातं पद्मजस्थापितं शुभम्

śrīmārkaṇḍeya uvāca| tasyaivānantaraṁ gacchetsūryatīrthamanuttamam| mūlasthānamiti khyātaṁ padmajasthāpitaṁ śubham

श्री मार्कण्डेय ने कहा — उसके ठीक बाद उस अनुपम सूर्यतीर्थ में जाना चाहिए, जो मूलस्थान नाम से विख्यात है, शुभ है, तथा कमलज ब्रह्मा द्वारा स्थापित किया गया है।

श्लोक 2 (skanda.5.352.2)

मूलश्रीपतिना देवी प्रोक्ता स्थापय भास्करम्। श्रुत्वा देवोदितं देवी स्थापयामास भास्करम्

mūlaśrīpatinā devī proktā sthāpaya bhāskaram| śrutvā devoditaṁ devī sthāpayāmāsa bhāskaram

मूलश्रीपति ने देवी से कहा — सूर्य को स्थापित करो। देव के वचन को सुनकर देवी ने सूर्य को स्थापित किया।

श्लोक 3 (skanda.5.352.3)

प्रोच्यते नर्मदातीरे मूलस्थानाख्यभास्करः

procyate narmadātīre mūlasthānākhyabhāskaraḥ

नर्मदा के तट पर वह सूर्य मूलस्थान नाम से कहा जाता है।

श्लोक 4 (skanda.5.352.4)

तत्र तीर्थे नरो यस्तु स्नात्वा नियतमानसः। संतर्प्य पितृदेवांश्च पिण्डेन सलिलेन च

tatra tīrthe naro yastu snātvā niyatamānasaḥ| saṁtarpya pitṛdevāṁśca piṇḍena salilena ca

उस तीर्थ में जो मनुष्य नियतचित्त होकर स्नान करके, पिण्ड और जल से पितरों तथा देवताओं का तर्पण करता है।

श्लोक 5 (skanda.5.352.5)

मूलस्थानं ततः पश्येत्स गच्छेत्परमां गतिम्। गुह्याद्गुह्यतरस्तत्र विशेषस्तु श्रुतो मया

mūlasthānaṁ tataḥ paśyetsa gacchetparamāṁ gatim| guhyādguhyatarastatra viśeṣastu śruto mayā

फिर मूलस्थान का दर्शन कर वह परम गति को प्राप्त होता है। वहाँ का जो गुह्य से भी गुह्यतर विशेष विधान है, वह मैंने सुना है।

श्लोक 6 (skanda.5.352.6)

समागमे मुनीनां तु शङ्कराच्छशिशेखरात्। सदा वै शुक्लसप्तम्यां मूलमादित्यवासरः

samāgame munīnāṁ tu śaṅkarācchaśiśekharāt| sadā vai śuklasaptamyāṁ mūlamādityavāsaraḥ

मुनियों की सभा में चन्द्रशेखर शंकर से यह सुना गया — मूल नक्षत्र और शुक्ल-सप्तमी का आदित्यवार के साथ योग सदा विशेष है।

श्लोक 7 (skanda.5.352.7)

तदा रेवाजलं गत्वा स्नात्वा संतर्प्य देवताः। पितॄंश्च भरतश्रेष्ठ दत्त्वा दानं स्वशक्तितः

tadā revājalaṁ gatvā snātvā saṁtarpya devatāḥ| pitṝṁśca bharataśreṣṭha dattvā dānaṁ svaśaktitaḥ

उस समय रेवा के जल में जाकर स्नान करके, देवताओं तथा पितरों का तर्पण करके, हे भरतश्रेष्ठ! अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान देकर —

श्लोक 8 (skanda.5.352.8)

करवीरैस्ततो गत्वा रक्तचन्दनवारिणा। संस्थाप्य भास्करं भक्त्या सम्पूज्य च यथाविधि

karavīraistato gatvā raktacandanavāriṇā| saṁsthāpya bhāskaraṁ bhaktyā sampūjya ca yathāvidhi

फिर करवीर के फूलों तथा लाल चन्दन-मिश्रित जल से, भक्तिपूर्वक सूर्य की स्थापना और विधिपूर्वक पूजा करके।

श्लोक 9 (skanda.5.352.9)

ततः सागुरुकैर्धूपैः कुन्दरैश्च विशेषतः। धूपयेद्देवदेवेशं दीपान् बोध्य दिशो दश

tataḥ sāgurukairdhūpaiḥ kundaraiśca viśeṣataḥ| dhūpayeddevadeveśaṁ dīpān bodhya diśo daśa

फिर अगुरु मिश्रित धूप से तथा विशेष रूप से कुन्दुरु धूप से देवदेवेश को धूप अर्पित करे, और दसों दिशाओं में दीप जलाए।

श्लोक 10 (skanda.5.352.10)

उपोष्य जागरं कुर्याद्गीतवाद्यं विशेषतः। एवं कृते महीपाल न भवेदुग्रदुःखभाक्

upoṣya jāgaraṁ kuryādgītavādyaṁ viśeṣataḥ| evaṁ kṛte mahīpāla na bhavedugraduḥkhabhāk

उपवास करके रात्रि-जागरण करे, विशेष रूप से गीत-वाद्य के साथ। हे महीपाल! ऐसा करने से मनुष्य घोर दुःख का भागी नहीं होता।

श्लोक 11 (skanda.5.352.11)

सूर्यलोके वसेत्तावद्यावत्कल्पशतत्रयम्। गन्धर्वैरप्सरोभिश्च सेव्यमानो नृपोत्तम

sūryaloke vasettāvadyāvatkalpaśatatrayam| gandharvairapsarobhiśca sevyamāno nṛpottama

हे नृपोत्तम! वह तीन सौ कल्पों तक सूर्यलोक में निवास करता है, गन्धर्वों तथा अप्सराओं द्वारा सेवित होते हुए।

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