अवन्ती खण्ड · अध्याय 365
पुंखिल तीर्थ की महिमा
श्लोक 1 (skanda.5.365.1)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। तस्यैवानन्तरं तात पुङ्खिलं तीर्थमुत्तमम्। तत्र तीर्थे पुरा पुङ्खः पार्थ सिद्धिमुपागतः।
śrīmārkaṇḍeya uvāca| tasyaivānantaraṁ tāta puṅkhilaṁ tīrthamuttamam| tatra tīrthe purā puṅkhaḥ pārtha siddhimupāgataḥ|||
श्री मार्कण्डेय बोले - हे तात! उसके ठीक पश्चात पुंखिल नामक उत्तम तीर्थ है। हे पार्थ! उस तीर्थ में पूर्वकाल में पुंख ने सिद्धि प्राप्त की थी।
श्लोक 2 (skanda.5.365.2)
जामदग्न्यो महातेजाः क्षत्रियान्तकरः प्रभुः। तपः कृत्वा सुविपुलं नर्मदोत्तरतीरभाक्।
jāmadagnyo mahātejāḥ kṣatriyāntakaraḥ prabhuḥ| tapaḥ kṛtvā suvipulaṁ narmadottaratīrabhāk|||
महातेजस्वी, क्षत्रियों का अंत करने वाले प्रभु जामदग्न्य (परशुराम) ने, नर्मदा के उत्तरी तट पर स्थित होकर अत्यंत व्यापक तप किया।
श्लोक 3 (skanda.5.365.3)
ततः प्रभृति विख्यातं पुङ्खतीर्थं नरेश्वर। तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा ह्याराध्य परमेश्वरम्।
tataḥ prabhṛti vikhyātaṁ puṅkhatīrthaṁ nareśvara| tatra tīrthe tu yaḥ snātvā hyārādhya parameśvaram|||
हे नरेश्वर! तभी से वह तीर्थ पुंख-तीर्थ नाम से विख्यात हुआ। उस तीर्थ में जो स्नान करके परमेश्वर की आराधना करता है,
श्लोक 4 (skanda.5.365.4)
इहलोके बलैर्युक्तः परे मोक्षमवाप्नुयात्। देवान् पितॄन् समभ्यर्च्य पितॄणामनृणी भवेत्।
ihaloke balairyuktaḥ pare mokṣamavāpnuyāt| devān pitṝn samabhyarcya pitṝṇāmanṛṇī bhavet|||
वह इस लोक में बल से युक्त होता है और परलोक में मोक्ष को प्राप्त करता है। देवताओं और पितरों का पूजन करके वह पितरों के ऋण से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 5 (skanda.5.365.5)
तत्र तीर्थे नरो यस्तु प्राणत्यागं करोति वै। अनिवर्तिका गतिस्तस्य रुद्रलोकादसंशयम्।
tatra tīrthe naro yastu prāṇatyāgaṁ karoti vai| anivartikā gatistasya rudralokādasaṁśayam|||
उस तीर्थ में जो मनुष्य प्राणत्याग करता है, उसकी गति निश्चय ही रुद्रलोक से अनिवर्तिनी होती है।
श्लोक 6 (skanda.5.365.6)
तत्र तीर्थे नरः स्नात्वा हयमेधफलं लभेत्।
tatra tīrthe naraḥ snātvā hayamedhaphalaṁ labhet|||
उस तीर्थ में स्नान करके मनुष्य अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है।
श्लोक 7 (skanda.5.365.7)
तत्र तीर्थे नरो यस्तु ब्राह्मणान् भोजयेन्नृप। एकस्मिन् भोजिते विप्रे कोटिर्भवति भोजिता।
tatra tīrthe naro yastu brāhmaṇān bhojayennṛpa| ekasmin bhojite vipre koṭirbhavati bhojitā|||
हे नृप! उस तीर्थ में जो मनुष्य ब्राह्मणों को भोजन कराता है, एक ब्राह्मण को भोजन कराने पर करोड़ों (ब्राह्मणों को) भोजन कराने का फल प्राप्त होता है।
श्लोक 8 (skanda.5.365.8)
तत्र तीर्थे तु यः कश्चित्पूजयेद्वृषभध्वजम्। वाजपेयस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोत्यसंशयम्।
tatra tīrthe tu yaḥ kaścitpūjayedvṛṣabhadhvajam| vājapeyasya yajñasya phalaṁ prāpnotyasaṁśayam|||
उस तीर्थ में जो कोई भी वृषभ-ध्वज (शिव) की पूजा करता है, वह निःसंदेह वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त करता है।