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अवन्ती खण्ड · अध्याय 368

आमलेश्वर तीर्थ की महिमा

अध्याय 367अध्याय-सूचीअध्याय 369

श्लोक 1 (skanda.5.368.1)

श्रीमार्कण्डेय उवाच। पुनरन्यत्प्रवक्ष्यामि देवस्य चरितं महत्। श्रुतमात्रेण येनैव सर्वपापैः प्रमुच्यते।

śrīmārkaṇḍeya uvāca| punaranyatpravakṣyāmi devasya caritaṁ mahat| śrutamātreṇa yenaiva sarvapāpaiḥ pramucyate|||

श्री मार्कण्डेय बोले - फिर मैं देव का एक और महान चरित्र कहता हूं, जिसे सुनने मात्र से ही मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 2 (skanda.5.368.2)

अबालो बालरूपेण ग्रामण्यैर्बालकैः सह। आमलैः क्रीडते शम्भुस्तत्ते वक्ष्यामि भारत।

abālo bālarūpeṇa grāmaṇyairbālakaiḥ saha| āmalaiḥ krīḍate śambhustatte vakṣyāmi bhārata|||

अवृद्ध शम्भु बालक न होते हुए भी बालक का रूप धारण करके ग्रामवासी बालकों के साथ आमले (आंवलों) से क्रीड़ा करते थे - हे भारत! वह मैं तुम्हें बताता हूं।

श्लोक 3 (skanda.5.368.3)

सर्वैस्तैरामलाः क्षिप्ता ये ते देवेन पाण्डव। आनीतास्तत्क्षणादेव ततः पश्चात्क्षिपेद्धरः।

sarvaistairāmalāḥ kṣiptā ye te devena pāṇḍava| ānītāstatkṣaṇādeva tataḥ paścātkṣipeddharaḥ|||

हे पाण्डव! उन सब बालकों ने जो आंवले फेंके, उन्हें देव ने उसी क्षण वापस ला दिया। इसके पश्चात हर स्वयं भी (आंवले) फेंकते थे।

श्लोक 4 (skanda.5.368.4)

यावद्गत्वा दिशो दिग्भ्य आगच्छन्ति पृथक्पृथक्। तावत्तमामलं भूतं पश्यन्ति परमेश्वरम्।

yāvadgatvā diśo digbhya āgacchanti pṛthakpṛthak| tāvattamāmalaṁ bhūtaṁ paśyanti parameśvaram|||

ज्यों ही वे बालक विभिन्न दिशाओं में जाकर अलग-अलग लौट आते, त्यों ही वे उस आंवले को ही परमेश्वर के रूप में परिणत हुआ देखते।

श्लोक 5 (skanda.5.368.5)

तृतीये चैव यत्कर्म देवदेवस्य धीमतः। स्थानानां परमं स्थानमामलेश्वरमुत्तमम्।

tṛtīye caiva yatkarma devadevasya dhīmataḥ| sthānānāṁ paramaṁ sthānamāmaleśvaramuttamam|||

तीसरी बार जो यह लीला-कर्म बुद्धिमान देवाधिदेव का हुआ, उसी से यह समस्त स्थानों में परम स्थान, उत्तम आमलेश्वर (तीर्थ बना)।

श्लोक 6 (skanda.5.368.6)

तेन पूजितमात्रेण प्राप्यते परमं पदम्।

tena pūjitamātreṇa prāpyate paramaṁ padam|||

उसकी पूजा करने मात्र से ही परम पद प्राप्त हो जाता है।

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