Skip to main content

अवन्ती खण्ड · अध्याय 38

अन्धक वृत्तान्त वर्णन

अध्याय 37अध्याय-सूचीअध्याय 39

श्लोक 1 (skanda.5.38.1)

सनत्कुमार उवाच। नास्ति शेषं यदा रक्तं पीयमानं च रक्षसः। चामुण्डायास्ततो रक्तमभूदास्यं च भासुरम्॥

sanatkumāra uvāca| nāsti śeṣaṁ yadā raktaṁ pīyamānaṁ ca rakṣasaḥ| cāmuṇḍāyāstato raktamabhūdāsyaṁ ca bhāsuram||

सनत्कुमार ने कहा—जब राक्षस का पीने योग्य रक्त शेष न रहा, तब चामुण्डा का मुख रक्त की चाह में और भी दहकने लगा।

श्लोक 2 (skanda.5.38.2)

कृष्णं कृतांतकल्पांतं करालदशनाधरम्। प्रज्वलत्यंधके शांतं ज्वलत्केसरलोचनम्॥

kṛṣṇaṁ kṛtāṁtakalpāṁtaṁ karāladaśanādharam| prajvalatyaṁdhake śāṁtaṁ jvalatkesaralocanam||

वह मुख काला था, मानो कालरूपी प्रलय का ही रूप हो, विकराल दाँतों और होठों वाला; अन्धकासुर के दहकते रहने पर भी वह शांत, अग्नि-सी ज्वलंत आँखों वाला था।

श्लोक 3 (skanda.5.38.3)

घोरघर्घरनिर्घोषस्फीतफेत्कारविस्वरम्। तार्क्ष्यपक्षकृतापीडं तीक्ष्णदंष्ट्राकुरोज्ज्वलम्॥

ghoraghargharanirghoṣasphītaphetkāravisvaram| tārkṣyapakṣakṛtāpīḍaṁ tīkṣṇadaṁṣṭrākurojjvalam||

वह भयंकर घर्घर ध्वनि तथा तीव्र चीत्कार करता हुआ, गरुड़ के पंखों से मानो मुकुटित, तीक्ष्ण दाढ़ों के अंकुरों से देदीप्यमान था।

श्लोक 4 (skanda.5.38.4)

तस्मिन्मुखे कपालाग्रं निधाय रुषितानना। अपिबद्रुधिरं चंडी चण्डदोर्दंडमंडिता॥

tasminmukhe kapālāgraṁ nidhāya ruṣitānanā| apibadrudhiraṁ caṁḍī caṇḍadordaṁḍamaṁḍitā||

उस मुख के आगे कपाल रखकर, क्रोध से भरे मुख वाली चण्डी, जो प्रचण्ड भुजदण्डों से सुशोभित थी, रक्त पीने लगी।

श्लोक 5 (skanda.5.38.5)

तया पिबंत्या दैत्येंद्रः शरीरे कृशतां गतः। क्षयं निन्येऽथ संक्षीणक्षुद्रक्षुभितवीक्षणः॥

tayā pibaṁtyā daityeṁdraḥ śarīre kṛśatāṁ gataḥ| kṣayaṁ ninye'tha saṁkṣīṇakṣudrakṣubhitavīkṣaṇaḥ||

उसके इस प्रकार पीते रहने से दैत्यराज का शरीर कृश होने लगा; वह क्षीण होकर क्षय को प्राप्त हुआ, उसकी दृष्टि दुर्बल और व्याकुल हो गई।

श्लोक 6 (skanda.5.38.6)

इत्थं निर्वीर्यदेहोऽसौ बभूवांधकदानवः। सर्वां संहृत्य मायां यो बलं क्षीणमथाकरोत्॥

itthaṁ nirvīryadeho'sau babhūvāṁdhakadānavaḥ| sarvāṁ saṁhṛtya māyāṁ yo balaṁ kṣīṇamathākarot||

इस प्रकार अन्धक दानव का शरीर बलहीन हो गया; उसने अपनी सारी माया समेट ली, फिर भी उसका बल पूर्णतः क्षीण हो गया।

श्लोक 7 (skanda.5.38.7)

तीव्रं भयं समासाद्य प्राणत्राणपरायणः। दृष्ट्वा नान्यां गतिं लोके दैत्यस्तुष्टाव शंकरम्॥

tīvraṁ bhayaṁ samāsādya prāṇatrāṇaparāyaṇaḥ| dṛṣṭvā nānyāṁ gatiṁ loke daityastuṣṭāva śaṁkaram||

तीव्र भय से ग्रस्त होकर, प्राण-रक्षा में तत्पर, संसार में कोई अन्य गति न देखकर उस दैत्य ने शंकर की स्तुति की।

श्लोक 8 (skanda.5.38.8)

कृतांजलिपुटो भूत्वा रोमांचितशरीरकः। सात्त्विकं भावमापन्नस्त्यक्त्वा चैव रजस्तमः॥

kṛtāṁjalipuṭo bhūtvā romāṁcitaśarīrakaḥ| sāttvikaṁ bhāvamāpannastyaktvā caiva rajastamaḥ||

हाथ जोड़कर, रोमांचित शरीर से, रजस् और तमस् को त्यागकर सात्त्विक भाव को प्राप्त होकर,

श्लोक 9 (skanda.5.38.9)

लोकानां कारणं देवं विबुधाधिपतिं प्रभुम्। शश्वद्बुद्ध्यान्वितो भक्त्या निर्मलेनांतरात्मना॥

lokānāṁ kāraṇaṁ devaṁ vibudhādhipatiṁ prabhum| śaśvadbuddhyānvito bhaktyā nirmalenāṁtarātmanā||

निर्मल अन्तरात्मा और स्थिर बुद्धि से भक्तिपूर्वक, समस्त लोकों के कारणस्वरूप देव, विद्वानों के स्वामी प्रभु की—

श्लोक 10 (skanda.5.38.10)

श्लाघ्यं शिवं च तुष्टाव देवं चंद्रार्धशेखरम्॥

ślāghyaṁ śivaṁ ca tuṣṭāva devaṁ caṁdrārdhaśekharam||

प्रशंसनीय, चंद्रमा को शिरोभूषण धारण करने वाले शिव देव की उसने स्तुति की।

श्लोक 11 (skanda.5.38.11)

अंधक उवाच। कृत्स्नस्य योऽस्य जगतः सचराचरस्य कर्ता कृतस्य च तथा सुखदुःखदाता। संसारहेतुरपि यः पुनरंतकाले तं शंकरं शरणदं शरणं व्रजामि॥

aṁdhaka uvāca| kṛtsnasya yo'sya jagataḥ sacarācarasya kartā kṛtasya ca tathā sukhaduḥkhadātā| saṁsāraheturapi yaḥ punaraṁtakāle taṁ śaṁkaraṁ śaraṇadaṁ śaraṇaṁ vrajāmi||

अन्धक ने कहा—जो इस सम्पूर्ण चराचर जगत् के तथा उसमें निर्मित सबके कर्ता हैं, जो सुख-दुःख के दाता हैं, तथा जो संसार के कारण होकर अंत में उसके संहारकर्ता भी हैं, उन शरणदाता शंकर की मैं शरण लेता हूँ।

श्लोक 12 (skanda.5.38.12)

यं योगिनो विगतमोहतमोरजस्का भक्त्यैकतानमनसो विनिवृत्तकामाः। ध्यायंति येऽखिलधियोऽमितदिव्यभूतिं तं शंकरं शरणदं शरणं व्रजामि॥

yaṁ yogino vigatamohatamorajaskā bhaktyaikatānamanaso vinivṛttakāmāḥ| dhyāyaṁti ye'khiladhiyo'mitadivyabhūtiṁ taṁ śaṁkaraṁ śaraṇadaṁ śaraṇaṁ vrajāmi||

मोह, तम और रज से रहित, भक्ति में एकाग्रचित्त, कामनाओं से निवृत्त, समग्र बुद्धि वाले योगीजन जिनका उस अपार दिव्य विभूति वाले देव का ध्यान करते हैं, उन शरणदाता शंकर की मैं शरण लेता हूँ।

श्लोक 13 (skanda.5.38.13)

यश्चंद्रखंडममलं विलसन्मयूखं बद्ध्वा सदा सुरसरिच्छिरसा बिभर्ति। यस्यार्धदेहमभजद्गिरिराजपुत्री तं शंकरं शरणदं शरणं व्रजामि॥

yaścaṁdrakhaṁḍamamalaṁ vilasanmayūkhaṁ baddhvā sadā surasaricchirasā bibharti| yasyārdhadehamabhajadgirirājaputrī taṁ śaṁkaraṁ śaraṇadaṁ śaraṇaṁ vrajāmi||

जो निर्मल, दीप्तिमान चंद्रकला को देवनदी गंगा के साथ सदा अपने मस्तक पर धारण करते हैं, तथा जिनके शरीर के आधे भाग को गिरिराज-पुत्री पार्वती ने अपनाया, उन शरणदाता शंकर की मैं शरण लेता हूँ।

श्लोक 14 (skanda.5.38.14)

यः सिद्धचारणनिषेवितपादपद्मो गंगां महोर्मिविषमां गगनात्पतंतीम्। मूर्ध्ना दधे स्रजमिव त्रिजगत्पुनंतीं तं शंकरं शरणदं शरणं व्रजामि॥

yaḥ siddhacāraṇaniṣevitapādapadmo gaṁgāṁ mahormiviṣamāṁ gaganātpataṁtīm| mūrdhnā dadhe srajamiva trijagatpunaṁtīṁ taṁ śaṁkaraṁ śaraṇadaṁ śaraṇaṁ vrajāmi||

जिनके चरणकमल सिद्ध और चारण सेवन करते हैं, तथा जिन्होंने आकाश से गिरती हुई, महान तरंगों वाली, त्रिभुवन को पवित्र करने वाली गंगा को मानो माला के समान अपने मस्तक पर धारण किया, उन शरणदाता शंकर की मैं शरण लेता हूँ।

श्लोक 15 (skanda.5.38.15)

कैलासशैलशिखरं प्रविकंप्यमानं कैलासशृंगसदृशेन दशाननेन। यः पादपद्मपरिपीडनसेव्यमानस्तं शंकरं शरणदं शरणं व्रजामि॥

kailāsaśailaśikharaṁ pravikaṁpyamānaṁ kailāsaśṛṁgasadṛśena daśānanena| yaḥ pādapadmaparipīḍanasevyamānastaṁ śaṁkaraṁ śaraṇadaṁ śaraṇaṁ vrajāmi||

कैलास के शिखर के समान विशाल दशानन (रावण) द्वारा हिलाए जाते हुए कैलास-शिखर को जिन्होंने केवल अपने चरणकमल के दबाव मात्र से वश में कर लिया, उन शरणदाता शंकर की मैं शरण लेता हूँ।

श्लोक 16 (skanda.5.38.16)

दक्षाध्वरे च नयने च तथा भगस्य पूष्णस्तथा दशनपंक्तिमशातयद्यः। व्यष्टंभयत्कुलिशहस्तमथेंद्रमीशं तं शंकरं शरणदं शरणं व्रजामि॥

dakṣādhvare ca nayane ca tathā bhagasya pūṣṇastathā daśanapaṁktimaśātayadyaḥ| vyaṣṭaṁbhayatkuliśahastamatheṁdramīśaṁ taṁ śaṁkaraṁ śaraṇadaṁ śaraṇaṁ vrajāmi||

दक्ष के यज्ञ में भग के नेत्र और पूषा की दंत-पंक्ति को जिन्होंने नष्ट किया, तथा वज्रधारी इन्द्र को भी जिन्होंने रोक दिया, उन शरणदाता शंकर की मैं शरण लेता हूँ।

श्लोक 17 (skanda.5.38.17)

येनासकृद्दितिसुताश्च दनोः सुताश्च विद्याधरोरगगणाश्च वरैः समग्रैः। संयोजिता मुनिवराः फलमूलभक्षास्तं शंकरं शरणदं शरणं व्रजामि॥

yenāsakṛdditisutāśca danoḥ sutāśca vidyādharoragagaṇāśca varaiḥ samagraiḥ| saṁyojitā munivarāḥ phalamūlabhakṣāstaṁ śaṁkaraṁ śaraṇadaṁ śaraṇaṁ vrajāmi||

जिन्होंने बार-बार दिति के पुत्रों, दनु के पुत्रों, विद्याधरों, नागगणों तथा फल-मूल खाने वाले श्रेष्ठ मुनियों को भी नाना वरों से युक्त किया, उन शरणदाता शंकर की मैं शरण लेता हूँ।

श्लोक 18 (skanda.5.38.18)

एवं कृतेपि विषयेष्वपि सक्तभावा ज्ञानेन च श्रुतगुणैरपि तेन युक्ताः। यं संश्रिताः सुखभुजः पुरुषा भवंति तं शंकरं शरणदं शरणं व्रजामि॥

evaṁ kṛtepi viṣayeṣvapi saktabhāvā jñānena ca śrutaguṇairapi tena yuktāḥ| yaṁ saṁśritāḥ sukhabhujaḥ puruṣā bhavaṁti taṁ śaṁkaraṁ śaraṇadaṁ śaraṇaṁ vrajāmi||

इस प्रकार होते हुए भी, विषयों में आसक्त भाव वाले, किन्तु ज्ञान और श्रुत गुणों से भी उनसे युक्त पुरुष जिनकी शरण लेकर सुख भोगने वाले हो जाते हैं, उन शरणदाता शंकर की मैं शरण लेता हूँ।

श्लोक 19 (skanda.5.38.19)

ब्रह्मेंद्रविष्णुमरुतां च सषण्मुखानां योऽदाद्वरान्सुबहुशो भगवान्महेशः। सूतं च मृत्युवदनात्पुनरुज्जहार तं शंकरं शरणदं शरणं व्रजामि॥

brahmeṁdraviṣṇumarutāṁ ca saṣaṇmukhānāṁ yo'dādvarānsubahuśo bhagavānmaheśaḥ| sūtaṁ ca mṛtyuvadanātpunarujjahāra taṁ śaṁkaraṁ śaraṇadaṁ śaraṇaṁ vrajāmi||

भगवान महेश ने ब्रह्मा, इन्द्र, विष्णु, मरुद्गणों तथा षडानन कार्तिकेय को भी अनेक वर दिए, तथा सूत को भी मृत्यु के मुख से पुनः खींच निकाला—उन शरणदाता शंकर की मैं शरण लेता हूँ।

श्लोक 20 (skanda.5.38.20)

आराधितस्तु तपसा हिमवन्निकुंजे धूम्रव्रतेन तपसा च परैरगम्यः। संजीवनीं समददाद्भृगवे महात्मा तं शंकरं शरणदं शरणं व्रजामि॥

ārādhitastu tapasā himavannikuṁje dhūmravratena tapasā ca parairagamyaḥ| saṁjīvanīṁ samadadādbhṛgave mahātmā taṁ śaṁkaraṁ śaraṇadaṁ śaraṇaṁ vrajāmi||

जो हिमालय के कुंज में धूम्र-व्रत की तपस्या से आराधित हुए, जो दूसरों के लिए अगम्य तप से भी युक्त हैं, उन महात्मा ने भृगुनंदन को संजीवनी विद्या प्रदान की—उन शरणदाता शंकर की मैं शरण लेता हूँ।

श्लोक 21 (skanda.5.38.21)

क्रीडार्थमेव भगवान्भुवनानि सप्त नानानदीविहगपादपमंडितानि। सब्रह्मकानि ससृजे सुकृताभिधानि तं शंकरं शरणदं शरणं व्रजामि॥

krīḍārthameva bhagavānbhuvanāni sapta nānānadīvihagapādapamaṁḍitāni| sabrahmakāni sasṛje sukṛtābhidhāni taṁ śaṁkaraṁ śaraṇadaṁ śaraṇaṁ vrajāmi||

जिन भगवान ने केवल क्रीड़ा के लिए ही नाना नदियों, पक्षियों और वृक्षों से सुशोभित, ब्रह्मलोक सहित, पुण्य नामों वाले सातों भुवनों की रचना की, उन शरणदाता शंकर की मैं शरण लेता हूँ।

श्लोक 22 (skanda.5.38.22)

यः सव्यपाणिकमलाग्रनखेन देवस्तत्पंचमं प्रसभमेव करालरंध्रम्। ब्राह्म्यं शिरस्तरणिपद्मनिभं चकर्त तं शंकरं शरणदं शरणं व्रजामि॥

yaḥ savyapāṇikamalāgranakhena devastatpaṁcamaṁ prasabhameva karālaraṁdhram| brāhmyaṁ śirastaraṇipadmanibhaṁ cakarta taṁ śaṁkaraṁ śaraṇadaṁ śaraṇaṁ vrajāmi||

जिस देव ने अपने बाएँ हाथरूपी कमल के नखाग्र मात्र से ब्रह्मा के सूर्य-कमल के समान पाँचवें, विकराल-रंध्र वाले सिर को बलपूर्वक काट डाला, उन शरणदाता शंकर की मैं शरण लेता हूँ।

श्लोक 23 (skanda.5.38.23)

ये त्वां सुरोत्तमगुरुं पुरुषा विमूढा जानंति नास्य जगतः सचराचरस्य। ऐश्वर्यमानविगमेऽनुशयेन पश्चात्ते यातनामनुभवंति यथाहमेव॥

ye tvāṁ surottamaguruṁ puruṣā vimūḍhā jānaṁti nāsya jagataḥ sacarācarasya| aiśvaryamānavigame'nuśayena paścātte yātanāmanubhavaṁti yathāhameva||

जो मूढ़ पुरुष आपको इस चराचर जगत् के देवताओं के परम गुरु के रूप में नहीं जानते, उनका ऐश्वर्य और मान नष्ट होने पर वे पश्चात्ताप से वैसी ही यातना भोगते हैं जैसी मैंने स्वयं भोगी है।

श्लोक 24 (skanda.5.38.24)

यः पठेत्स्तुतिमिमां शुचिकर्मा यः शृणोति सततं शिवभक्तः। विप्रसंसदि सदा शुभकर्मा स प्रयाति शिवलोकमखंडम्॥

yaḥ paṭhetstutimimāṁ śucikarmā yaḥ śṛṇoti satataṁ śivabhaktaḥ| viprasaṁsadi sadā śubhakarmā sa prayāti śivalokamakhaṁḍam||

जो पवित्र कर्म वाला पुरुष इस स्तुति का पाठ करता है, अथवा जो शिवभक्त इसे सदा सुनता है, ब्राह्मणों की सभा में सदा शुभकर्म करने वाला वह अखण्ड शिवलोक को प्राप्त होता है।

श्लोक 25 (skanda.5.38.25)

सनत्कुमार उवाच। तस्यैवं स्तुवतो देवः शूलपाणिर्वृषध्वजः। पूर्णे वर्षशतस्यांते प्रीतः प्रोवाच शंकरः॥

sanatkumāra uvāca| tasyaivaṁ stuvato devaḥ śūlapāṇirvṛṣadhvajaḥ| pūrṇe varṣaśatasyāṁte prītaḥ provāca śaṁkaraḥ||

सनत्कुमार ने कहा—इस प्रकार स्तुति करते हुए उसके सौ वर्ष पूर्ण होने पर, त्रिशूलधारी वृषभध्वज देव शंकर प्रसन्न होकर बोले।

श्लोक 26 (skanda.5.38.26)

पुत्र तुष्टोऽस्मि भद्रं ते जातस्त्वं निर्मलोऽधुना। दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मां विगतज्वरः॥

putra tuṣṭo'smi bhadraṁ te jātastvaṁ nirmalo'dhunā| divyaṁ dadāmi te cakṣuḥ paśya māṁ vigatajvaraḥ||

'हे पुत्र, मैं प्रसन्न हूँ, तुम्हारा कल्याण हो; अब तुम निर्मल हो गए हो। मैं तुम्हें दिव्य दृष्टि देता हूँ—अब निश्चिंत होकर मुझे देखो।'

श्लोक 27 (skanda.5.38.27)

यच्च ते मनसा वापि किंचिच्च कांक्षितं फलम्। तत्तत्सर्वं प्रदास्यामि ब्रूहि दानवसत्तम॥

yacca te manasā vāpi kiṁcicca kāṁkṣitaṁ phalam| tattatsarvaṁ pradāsyāmi brūhi dānavasattama||

'तुम्हारे मन में जो भी फल अभीष्ट हो, वह सब मैं तुम्हें दूँगा; हे दानवश्रेष्ठ, कहो।'

श्लोक 28 (skanda.5.38.28)

दानव उवाच। ब्राह्म्यं वैष्णवमेंद्रं वा पदमावृत्तिलक्षणम्। विदितं मम तत्सर्वं मनागपि न कांक्षये॥

dānava uvāca| brāhmyaṁ vaiṣṇavameṁdraṁ vā padamāvṛttilakṣaṇam| viditaṁ mama tatsarvaṁ manāgapi na kāṁkṣaye||

दानव ने कहा—ब्रह्मा, विष्णु अथवा इन्द्र का पद, जो पुनरावृत्ति के लक्षण वाला है, वह सब मुझे ज्ञात है; मैं उसे किंचित् भी नहीं चाहता।

श्लोक 29 (skanda.5.38.29)

यदि तुष्टोऽसि देवेश गाणपत्यं ददस्व मे। सविशेषं विशुद्धं च तदक्षय्यं च सर्वदा॥

yadi tuṣṭo'si deveśa gāṇapatyaṁ dadasva me| saviśeṣaṁ viśuddhaṁ ca tadakṣayyaṁ ca sarvadā||

'हे देवेश, यदि आप प्रसन्न हैं तो मुझे विशिष्ट, विशुद्ध तथा सदा अक्षय गणपति-पद प्रदान करें।'

श्लोक 30 (skanda.5.38.30)

महादेव उवाच। अमरो जरया त्यक्तः सर्वदुःखविवर्जितः। भविष्यसि गणाध्यक्षः सर्वलोकनमस्कृतः॥

mahādeva uvāca| amaro jarayā tyaktaḥ sarvaduḥkhavivarjitaḥ| bhaviṣyasi gaṇādhyakṣaḥ sarvalokanamaskṛtaḥ||

महादेव ने कहा—अमर, जरा से रहित, समस्त दुःखों से मुक्त होकर तुम गणाध्यक्ष बनोगे, जिसे समस्त लोक नमस्कार करेंगे।

श्लोक 31 (skanda.5.38.31)

कामरूपो महायोगी महासत्त्वो महाबलः। अणिमादिगुणैर्युक्तः प्रियश्च मम सर्वदा॥

kāmarūpo mahāyogī mahāsattvo mahābalaḥ| aṇimādiguṇairyuktaḥ priyaśca mama sarvadā||

'तुम इच्छानुसार रूप धारण करने वाले, महायोगी, महासत्त्व, महाबली तथा अणिमा आदि सिद्धियों से युक्त होकर सदा मुझे प्रिय रहोगे।'

श्लोक 32 (skanda.5.38.32)

सनत्कुमार उवाच। ततश्च सोंऽधकः श्रीमान्वराँल्लब्ध्वा सुदुर्लभान्। महादेवगणो भूत्वा तत्रैवांतरधीयत॥

sanatkumāra uvāca| tataśca soṁ'dhakaḥ śrīmānvarā~llabdhvā sudurlabhān| mahādevagaṇo bhūtvā tatraivāṁtaradhīyata||

सनत्कुमार ने कहा—इसके पश्चात् वह श्रीमान् अन्धक अत्यंत दुर्लभ वर पाकर, महादेव के गणों में से एक होकर वहीं अंतर्धान हो गया।

श्लोक 33 (skanda.5.38.33)

गतेंऽधके ततो देव्यो ब्रह्माण्याद्याः समागताः। स देवो यत्र भगवानंधकस्य वरप्रदः॥

gateṁ'dhake tato devyo brahmāṇyādyāḥ samāgatāḥ| sa devo yatra bhagavānaṁdhakasya varapradaḥ||

अन्धक के चले जाने पर, ब्रह्माणी आदि देवियाँ वहाँ आ गईं, जहाँ अन्धक को वर देने वाले वे भगवान देव विराजमान थे।

श्लोक 34 (skanda.5.38.34)

तास्तुष्टुवुर्महादेवमथ तुष्टो महेश्वरः। चामुंडा च महेशेन समाश्वस्ता शिवाऽभवत्॥

tāstuṣṭuvurmahādevamatha tuṣṭo maheśvaraḥ| cāmuṁḍā ca maheśena samāśvastā śivā'bhavat||

उन्होंने महादेव की स्तुति की, और महेश्वर उनसे प्रसन्न हुए; महेश द्वारा सांत्वना पाकर चामुण्डा भी शांत/मंगलमयी हो गई।

श्लोक 35 (skanda.5.38.35)

शंकरं प्रणतं दृष्ट्वा तासामग्रे व्यवस्थितम्। ब्रह्मादयोऽपि ते हृष्टास्तुष्टुबुर्विविधैः स्तवैः॥

śaṁkaraṁ praṇataṁ dṛṣṭvā tāsāmagre vyavasthitam| brahmādayo'pi te hṛṣṭāstuṣṭuburvividhaiḥ stavaiḥ||

उनके समक्ष खड़े शंकर को प्रणाम करते देखकर ब्रह्मा आदि देवता भी हर्षित होकर विविध स्तुतियों से उनकी स्तुति करने लगे।

श्लोक 36 (skanda.5.38.36)

प्रशांतास्ता यदा हृष्टाः शंभुना रुधिराशनाः। तदा वोचदिदं वाक्यं तासां स्थित्यर्थमुत्तमम्॥

praśāṁtāstā yadā hṛṣṭāḥ śaṁbhunā rudhirāśanāḥ| tadā vocadidaṁ vākyaṁ tāsāṁ sthityarthamuttamam||

जब रक्तपान करने वाली वे देवियाँ शंभु द्वारा शांत और प्रसन्न कर दी गईं, तब उन्हें स्थायी रूप से बसाने हेतु उन्होंने यह उत्तम वचन कहा।

श्लोक 37 (skanda.5.38.37)

आवंत्ये विषये सर्वा यस्माजाता महाबलाः। आवंत्यमातरस्तस्मात्ख्याता लोके भविष्यथ॥

āvaṁtye viṣaye sarvā yasmājātā mahābalāḥ| āvaṁtyamātarastasmātkhyātā loke bhaviṣyatha||

'चूँकि तुम सब, हे महाबलशालिनी देवियो, अवन्ती देश में उत्पन्न हुई हो, इसलिए लोक में तुम आवन्त्य-माताओं के नाम से विख्यात होगी।'

श्लोक 38 (skanda.5.38.38)

अवंत्यां प्रीतिसंपन्नाः सर्वपापप्रणाशिनीः। स्थिरा वसंत्यो लोकानां वरदाश्च भविष्यथ॥

avaṁtyāṁ prītisaṁpannāḥ sarvapāpapraṇāśinīḥ| sthirā vasaṁtyo lokānāṁ varadāśca bhaviṣyatha||

'अवन्ती में प्रेमपूर्वक, समस्त पापों का नाश करने वाली, स्थिर रूप से निवास करती हुई तुम लोगों की वरदायिनी बनोगी।'

श्लोक 39 (skanda.5.38.39)

श्रावणस्य तु मासस्य अमावास्यां समाहिताः। ये द्रक्ष्यंति सदा भक्त्या तेषां लोका महोदयाः॥

śrāvaṇasya tu māsasya amāvāsyāṁ samāhitāḥ| ye drakṣyaṁti sadā bhaktyā teṣāṁ lokā mahodayāḥ||

'श्रावण मास की अमावास्या को जो लोग एकाग्रचित्त होकर भक्तिपूर्वक तुम्हारा सदा दर्शन करेंगे, उनके लिए महान उदय वाले लोक होंगे।'

श्लोक 40 (skanda.5.38.40)

अपुत्रो लभते पुत्रान्धनार्थी लभते धनम्। रूपवान्सुभगो भोगी सर्वशास्त्रविशारदः॥

aputro labhate putrāndhanārthī labhate dhanam| rūpavānsubhago bhogī sarvaśāstraviśāradaḥ||

'पुत्रहीन पुत्र पाता है, धन चाहने वाला धन पाता है; वह रूपवान, सौभाग्यशाली, भोगयुक्त तथा समस्त शास्त्रों में निपुण बनता है।'

श्लोक 41 (skanda.5.38.41)

हंसयुक्तेन यानेन पितृलोके महीयते। पुरीमिमां च रक्षध्वं कल्पेकल्पे क्रमेण तु॥

haṁsayuktena yānena pitṛloke mahīyate| purīmimāṁ ca rakṣadhvaṁ kalpekalpe krameṇa tu||

'वह हंस से युक्त विमान द्वारा पितृलोक में पूजित होता है। और तुम सब प्रत्येक कल्प में क्रमशः इस नगरी की रक्षा करना।'

श्लोक 42 (skanda.5.38.42)

एवमुक्त्वा तु देवेशो गतः कैलासपर्वतम्। स्तूयमानो गणैरौद्रैर्दैत्यामरगणेश्वरैः॥

evamuktvā tu deveśo gataḥ kailāsaparvatam| stūyamāno gaṇairaudrairdaityāmaragaṇeśvaraiḥ||

ऐसा कहकर देवेश कैलास पर्वत की ओर चले गए, अपने रौद्र गणों तथा दैत्य और देवगणों के स्वामियों द्वारा स्तुति किए जाते हुए।

श्लोक 43 (skanda.5.38.43)

असुरसुरगणानां नायकस्यानुकीर्तिं कथयति कथनीयां श्रद्धया यः शृणोति। सकलसुखनिधानं रुद्रलोकं स कांतं सुरगणदनुनाथैरर्चितं यात्यनंतम्॥

asurasuragaṇānāṁ nāyakasyānukīrtiṁ kathayati kathanīyāṁ śraddhayā yaḥ śṛṇoti| sakalasukhanidhānaṁ rudralokaṁ sa kāṁtaṁ suragaṇadanunāthairarcitaṁ yātyanaṁtam||

जो कोई असुरों और सुरों के इस नायक की सुकथनीय गाथा को कहता या श्रद्धापूर्वक सुनता है, वह समस्त सुखों के भंडार, सुंदर, देवगणों और दानवनाथों द्वारा पूजित, अनंत रुद्रलोक को प्राप्त होता है।

अध्याय 37अध्याय-सूचीअध्याय 39