अवन्ती खण्ड · अध्याय 380
रेवासागर संगम पर अलिकेश्वर तीर्थ की महिमा
श्लोक 1 (skanda.5.380.1)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। ततः क्रोशान्तरे गच्छेदलिकातीर्थमुत्तमम्। अलिका नाम गान्धर्वी कुशीला कुटिलाशया।
śrīmārkaṇḍeya uvāca| tataḥ krośāntare gacchedalikātīrthamuttamam| alikā nāma gāndharvī kuśīlā kuṭilāśayā||
श्री मार्कण्डेय बोले - इसके पश्चात एक कोस की दूरी पर उत्तम अलिका तीर्थ में जाना चाहिए। अलिका नामक एक गन्धर्व-कन्या थी, जो दुराचारिणी और कुटिल हृदय वाली थी।
श्लोक 2 (skanda.5.380.2)
चित्रसेनस्य दौहित्री विद्यानन्दमृषिं गता। वव्रे ते स्वीकृता तेन दशवर्षाणि तं श्रिता।
citrasenasya dauhitrī vidyānandamṛṣiṁ gatā| vavre te svīkṛtā tena daśavarṣāṇi taṁ śritā||
चित्रसेन की दौहित्री वह विद्यानन्द नामक ऋषि के पास गई; उसने उसे वरण किया और ऋषि ने भी उसे स्वीकार कर लिया, और वह दस वर्षों तक उसी के आश्रय में रही।
श्लोक 3 (skanda.5.380.3)
पतिं जघान तं सुप्तं कस्मिंश्चित्कारणान्तरे। गत्वा निवेदयामास पितरं रत्नवल्लभम्।
patiṁ jaghāna taṁ suptaṁ kasmiṁścitkāraṇāntare| gatvā nivedayāmāsa pitaraṁ ratnavallabham||
किसी कारणवश उसने सोए हुए अपने पति का वध कर दिया। फिर जाकर उसने यह बात अपने पिता रत्नवल्लभ को सुनाई।
श्लोक 4 (skanda.5.380.4)
पित्रा मात्रा च संत्यक्ता बहुभिर्भर्त्सिता नृप। गर्भघ्नी त्वं पतिघ्नी त्वमिति दर्शय मा मुखम्।
pitrā mātrā ca saṁtyaktā bahubhirbhartsitā nṛpa| garbhaghnī tvaṁ patighnī tvamiti darśaya mā mukham||
हे राजन्! माता-पिता दोनों ने उसे त्याग दिया और अनेकों ने उसे धिक्कारा - 'तू गर्भघातिनी है, तू पतिघातिनी है, अपना मुख मुझे मत दिखा!'
श्लोक 5 (skanda.5.380.5)
ब्रह्मघ्नी याहि पापिष्ठे परित्यक्ता गृहाद्व्रज।
brahmaghnī yāhi pāpiṣṭhe parityaktā gṛhādvraja||
'तू ब्रह्महत्यारिणी है, हे पापिष्ठे! जा, घर से निकल जा, तू परित्यक्ता है!'
श्लोक 6 (skanda.5.380.6)
मार्कण्डेय उवाच। इति दुःखान्विता मूढा ताभ्यां निर्भर्त्सिता सती। तनुं त्यक्तुं मनश्चक्रे प्राप्य तीर्थान्तरं क्वचित्।
mārkaṇḍeya uvāca| iti duḥkhānvitā mūḍhā tābhyāṁ nirbhartsitā satī| tanuṁ tyaktuṁ manaścakre prāpya tīrthāntaraṁ kvacit||
मार्कण्डेय बोले - इस प्रकार दुःख से भरी हुई वह मोहग्रस्त सती दोनों के द्वारा धिक्कारी जाकर, कहीं अन्य तीर्थ को प्राप्त कर, शरीर त्यागने का विचार करने लगी।
श्लोक 7 (skanda.5.380.7)
संपृच्छ्यमाना तीर्थानि ब्राह्मणेभ्यो युधिष्ठिर। श्रुत्वा पापहरं तीर्थं रेवासागरसङ्गमे।
saṁpṛcchyamānā tīrthāni brāhmaṇebhyo yudhiṣṭhira| śrutvā pāpaharaṁ tīrthaṁ revāsāgarasaṅgame||
हे युधिष्ठिर! ब्राह्मणों से तीर्थों के विषय में पूछते हुए, उसने रेवासागर के संगम पर स्थित पाप हरने वाले तीर्थ के विषय में सुना।
श्लोक 8 (skanda.5.380.8)
तत्र पार्थ तपश्चक्रे निराहारा जितव्रता। कृच्छ्रातिकृच्छ्रपाराकमहासांतपनादिभिः।
tatra pārtha tapaścakre nirāhārā jitavratā| kṛcchrātikṛcchrapārākamahāsāṁtapanādibhiḥ||
हे पार्थ! वहाँ निराहार रहकर, व्रत का पालन करते हुए, उसने कृच्छ्र, अतिकृच्छ्र, पाराक, महासांतपन आदि व्रतों से तपस्या की।
श्लोक 9 (skanda.5.380.9)
चान्द्रायणैर्ब्रह्मकूर्चैः कर्शयामास वै तनुम्। एवं वर्षशतं सार्द्धं व्यतीतं तपसा नृप।
cāndrāyaṇairbrahmakūrcaiḥ karśayāmāsa vai tanum| evaṁ varṣaśataṁ sārddhaṁ vyatītaṁ tapasā nṛpa||
चान्द्रायण और ब्रह्मकूर्च व्रतों से उसने अपने शरीर को कृश कर लिया। हे राजन्! इस प्रकार तपस्या में डेढ़ सौ वर्ष बीत गए।
श्लोक 10 (skanda.5.380.10)
तस्या विशुद्धिमिच्छन्त्याः शिवध्यानार्चनादिभिः। ततः कतिपयाहोभिस्तस्या ज्ञात्वा हठं परम्। परितुष्टः शिवः प्राह पार्वत्या परिचोदितः।
tasyā viśuddhimicchantyāḥ śivadhyānārcanādibhiḥ| tataḥ katipayāhobhistasyā jñātvā haṭhaṁ param| parituṣṭaḥ śivaḥ prāha pārvatyā paricoditaḥ||
शुद्धि चाहने वाली उस स्त्री के शिवध्यान-अर्चन आदि से, कुछ दिनों बाद उसके परम हठ को जानकर, पार्वती द्वारा प्रेरित परम संतुष्ट शिव ने कहा -
श्लोक 11 (skanda.5.380.11)
ईश्वर उवाच। पुत्रि मा साहसं कार्षीः शुद्धदेहासि साम्प्रतम्। तुष्टोऽहं तपसा तेऽद्य वरं वरय वाञ्छितम्।
īśvara uvāca| putri mā sāhasaṁ kārṣīḥ śuddhadehāsi sāmpratam| tuṣṭo'haṁ tapasā te'dya varaṁ varaya vāñchitam||
ईश्वर बोले - हे पुत्री! ऐसा दुःसाहस मत कर, अब तू शुद्ध शरीर वाली है। मैं तेरी तपस्या से प्रसन्न हूँ, आज इच्छित वर माँग ले।
श्लोक 12 (skanda.5.380.12)
अलिकोवाच। यदि तुष्टोऽसि देवेश वरार्हा यद्यहं मता। नानापापाग्नितप्ताया देहि शुद्धिं परां मम।
alikovāca| yadi tuṣṭo'si deveśa varārhā yadyahaṁ matā| nānāpāpāgnitaptāyā dehi śuddhiṁ parāṁ mama||
अलिका बोली - हे देवेश! यदि आप प्रसन्न हैं और यदि मुझे वर के योग्य मानते हैं, तो नाना पापों की अग्नि से जली हुई मुझे परम शुद्धि प्रदान कीजिए।
श्लोक 13 (skanda.5.380.13)
त्वं मे नाथो ह्यनाथायास्त्वमेव जगतां गुरुः। दीनानाथसमुद्धर्ता शरण्यः सर्वदेहिनाम्।
tvaṁ me nātho hyanāthāyāstvameva jagatāṁ guruḥ| dīnānāthasamuddhartā śaraṇyaḥ sarvadehinām||
अनाथ ऐसी मेरे लिए आप ही स्वामी हैं, आप ही समस्त जगत के गुरु हैं, दीन-अनाथों के उद्धारकर्ता, समस्त प्राणियों के शरण्य हैं।
श्लोक 14 (skanda.5.380.14)
ईश्वर उवाच। त्वं भद्रे शुद्धदेहासि मा किंचिदनुशोचिथाः। स्वनाम्ना स्थापयित्वेह मां ततः स्वर्गमेष्यसि।
īśvara uvāca| tvaṁ bhadre śuddhadehāsi mā kiṁcidanuśocithāḥ| svanāmnā sthāpayitveha māṁ tataḥ svargameṣyasi||
ईश्वर बोले - हे भद्रे! तू शुद्ध शरीर वाली है, किंचित भी शोक मत कर। यहाँ मुझे अपने ही नाम से स्थापित करके, तब तू स्वर्ग को प्राप्त होगी।
श्लोक 15 (skanda.5.380.15)
इत्युक्त्वा देवदेवेशस्तत्रैवान्तरधीयत। अलिकापि ततो भक्त्या स्नात्वा संस्थाप्य शङ्करम्।
ityuktvā devadeveśastatraivāntaradhīyata| alikāpi tato bhaktyā snātvā saṁsthāpya śaṅkaram||
ऐसा कहकर देवाधिदेव वहीं अन्तर्धान हो गए। तब अलिका ने भी भक्तिपूर्वक स्नान कर शंकर को स्थापित किया,
श्लोक 16 (skanda.5.380.16)
दत्त्वा दानं च विप्रेभ्यो लोकमाप महोत्कटम्। पितरं च समासाद्य मातरं च युधिष्ठिर।
dattvā dānaṁ ca viprebhyo lokamāpa mahotkaṭam| pitaraṁ ca samāsādya mātaraṁ ca yudhiṣṭhira||
और ब्राह्मणों को दान देकर परम उत्कृष्ट लोक को प्राप्त किया। हे युधिष्ठिर! फिर अपने पिता और माता को प्राप्त करके,
श्लोक 17 (skanda.5.380.17)
तैश्च संमानिता प्रीत्या बन्धुभिः सालिका ततः। विमानवरमारूढा दिव्यमालान्विता नृप।
taiśca saṁmānitā prītyā bandhubhiḥ sālikā tataḥ| vimānavaramārūḍhā divyamālānvitā nṛpa||
उनके तथा बन्धुजनों के द्वारा प्रेमपूर्वक सम्मानित होकर, हे राजन्! वह अलिका उत्तम विमान पर आरूढ़ होकर दिव्य मालाओं से युक्त हुई,
श्लोक 18 (skanda.5.380.18)
गौरीलोकमनुप्राप्तसखित्वेऽद्यापि मोदते। ततः प्रभृति तत्पार्थ विख्यातमलिकेश्वरम्।
gaurīlokamanuprāptasakhitve'dyāpi modate| tataḥ prabhṛti tatpārtha vikhyātamalikeśvaram||
गौरीलोक में सखीत्व प्राप्त कर आज भी आनन्दित हो रही है। हे पार्थ! तभी से वह तीर्थ अलिकेश्वर नाम से विख्यात हुआ।
श्लोक 19 (skanda.5.380.19)
तत्र तीर्थे तु या नारी पुरुषो वा युधिष्ठिर। स्नात्वा सम्पूजयेद्भक्त्या महादेवमुमायुतम्।
tatra tīrthe tu yā nārī puruṣo vā yudhiṣṭhira| snātvā sampūjayedbhaktyā mahādevamumāyutam||
हे युधिष्ठिर! उस तीर्थ में जो भी स्त्री अथवा पुरुष स्नान करके भक्तिपूर्वक उमा सहित महादेव की पूजा करता है,
श्लोक 20 (skanda.5.380.20)
स पापैर्विविधैर्मुक्तो लोकमाप्नोति शांकरम्। मानसं वाचिकं पापं कायिकं यत्पुरा कृतम्।
sa pāpairvividhairmukto lokamāpnoti śāṁkaram| mānasaṁ vācikaṁ pāpaṁ kāyikaṁ yatpurā kṛtam||
वह नाना पापों से मुक्त होकर शांकर लोक को प्राप्त करता है। पूर्वकाल में किए गए मानसिक, वाचिक और कायिक जो भी पाप हैं,
श्लोक 21 (skanda.5.380.21)
सर्वं तद्विलयं याति भोजयित्वा द्विजान्सदा। दीपं दत्त्वा च देवाग्रे न रोगैः परिभूयते।
sarvaṁ tadvilayaṁ yāti bhojayitvā dvijānsadā| dīpaṁ dattvā ca devāgre na rogaiḥ paribhūyate||
वे सब सदा द्विजों को भोजन कराने से नष्ट हो जाते हैं। और देवता के आगे दीप देने से मनुष्य रोगों से पराभूत नहीं होता।
श्लोक 22 (skanda.5.380.22)
धूपपात्रं विमानं च घण्टां कलशमेव च। दत्त्वा देवाय राजेन्द्र शाक्रं लोकमवाप्नुयात्।
dhūpapātraṁ vimānaṁ ca ghaṇṭāṁ kalaśameva ca| dattvā devāya rājendra śākraṁ lokamavāpnuyāt||
हे राजेन्द्र! धूपपात्र, विमान, घंटा तथा कलश देवता को अर्पित करके मनुष्य शक्र (इन्द्र) के लोक को प्राप्त करता है।