अवन्ती खण्ड · अध्याय 40
कनकशृङ्ग अभिधान वृत्तान्त वर्णन
श्लोक 1 (skanda.5.40.1)
व्यास उवाच। भगवन्भवता सर्वं भवभीतिविनाशकम्। ईश्वरस्थानमाख्यातं समन्तात्साग्रयोजनम्॥
vyāsa uvāca| bhagavanbhavatā sarvaṁ bhavabhītivināśakam| īśvarasthānamākhyātaṁ samantātsāgrayojanam||
व्यास ने कहा—हे भगवन्, आपने संसार-भय का नाश करने वाले ईश्वर के इस स्थान का, जो चारों ओर एक योजन से कुछ अधिक फैला है, सम्पूर्ण वर्णन कर दिया।
श्लोक 2 (skanda.5.40.2)
यत्र क्षेत्रे मृता मर्त्याः सदाचारास्तथोत्तमाः। विमानस्था पुरे नूनमैश्वरे ते वसंति च॥
yatra kṣetre mṛtā martyāḥ sadācārāstathottamāḥ| vimānasthā pure nūnamaiśvare te vasaṁti ca||
जिस क्षेत्र में सदाचारी और उत्तम मनुष्य मरकर विमानों पर आरूढ़ होकर निश्चय ही ईश्वर की उस नगरी में निवास करते हैं,
श्लोक 3 (skanda.5.40.3)
यत्र कीटपतंगाद्या मृता यांति परां गतिम्। किं तीर्थं पुण्यमन्यच्च महाकालवनादृते॥
yatra kīṭapataṁgādyā mṛtā yāṁti parāṁ gatim| kiṁ tīrthaṁ puṇyamanyacca mahākālavanādṛte||
जहाँ कीट-पतंग जैसे प्राणी भी मरकर परम गति को प्राप्त करते हैं—महाकालवन के अतिरिक्त और कौन-सा तीर्थ इतना पुण्यकारी है?
श्लोक 4 (skanda.5.40.4)
तस्माद्ब्रूहि ममैकं तु प्रश्नं तथ्येन सांप्रतम्। कथं कनकशृंगेति ख्याता ह्येषा पुरा मुने॥
tasmādbrūhi mamaikaṁ tu praśnaṁ tathyena sāṁpratam| kathaṁ kanakaśṛṁgeti khyātā hyeṣā purā mune||
इसलिए हे मुने, अब मेरे एक प्रश्न का यथार्थ उत्तर दीजिए—यह नगरी प्राचीन काल में कनकशृंग नाम से कैसे विख्यात हुई?
श्लोक 5 (skanda.5.40.5)
कुशस्थली कथं नाम तथावंती कथं स्मृता। पद्मावती कथं साधो कथमुज्जयिनी तथा॥
kuśasthalī kathaṁ nāma tathāvaṁtī kathaṁ smṛtā| padmāvatī kathaṁ sādho kathamujjayinī tathā||
यह कुशस्थली नाम से कैसे कहलाई, अवंती नाम से कैसे स्मरण की गई, हे साधो, पद्मावती और उज्जयिनी नाम से कैसे प्रसिद्ध हुई?
श्लोक 6 (skanda.5.40.6)
नाम्नां हेतुमथो तेषां ब्रूहि त्वं मुनिसत्तम॥
nāmnāṁ hetumatho teṣāṁ brūhi tvaṁ munisattama||
हे मुनिश्रेष्ठ, इन सब नामों का कारण मुझे बताइए।
श्लोक 7 (skanda.5.40.7)
सनत्कुमार उवाच। शृणु व्यास प्रवक्ष्यामि यथा पूर्वं विरंचिना। कथितं वामदेवाय गौरकल्पे पुरातने॥
sanatkumāra uvāca| śṛṇu vyāsa pravakṣyāmi yathā pūrvaṁ viraṁcinā| kathitaṁ vāmadevāya gaurakalpe purātane||
सनत्कुमार ने कहा—हे व्यास सुनो, मैं वही बताता हूँ जो पूर्वकाल में प्राचीन गौरकल्प में ब्रह्मा ने वामदेव को कहा था।
श्लोक 8 (skanda.5.40.8)
महेशेन भगवता विधिश्चैवात्र हेतुतः। पृष्टस्तु स्वश्च्युतानां च कुतो निवसतां सुखम्॥
maheśena bhagavatā vidhiścaivātra hetutaḥ| pṛṣṭastu svaścyutānāṁ ca kuto nivasatāṁ sukham||
वहाँ भगवान महेश ने विधाता ब्रह्मा से इस कारण से पूछा—'स्वर्ग से च्युत होकर यहाँ निवास करने वालों को सुख कहाँ से मिलता है?
श्लोक 9 (skanda.5.40.9)
स्वर्गप्राप्तिश्च भवति स्वेच्छाचारविहारिणाम्। कोऽतिपुण्यतमः श्रेष्ठः प्रदेशः पापदारकः॥
svargaprāptiśca bhavati svecchācāravihāriṇām| ko'tipuṇyatamaḥ śreṣṭhaḥ pradeśaḥ pāpadārakaḥ||
स्वेच्छापूर्वक विचरण करने वालों को भी स्वर्ग की प्राप्ति कैसे होती है? कौन-सा वह अत्यंत पुण्यमय, श्रेष्ठ और पाप को विदीर्ण करने वाला प्रदेश है?
श्लोक 10 (skanda.5.40.10)
कुतो निवर्तितं चित्तं जायते वसतां क्वचित्। वसतामपि लोके शमैहिकं पारलौकिकम्। एतन्मे भगवन्ब्रूहि हितार्थं सर्वदेहिनाम्॥
kuto nivartitaṁ cittaṁ jāyate vasatāṁ kvacit| vasatāmapi loke śamaihikaṁ pāralaukikam| etanme bhagavanbrūhi hitārthaṁ sarvadehinām||
किसी स्थान में निवास करने वालों का चित्त कहाँ से विषयों से निवृत्त होता है? तथा संसार में रहते हुए भी इहलौकिक और पारलौकिक शांति कैसे मिलती है? हे भगवन्, यह सब समस्त प्राणियों के हित के लिए मुझे बताइए।'
श्लोक 11 (skanda.5.40.11)
सनत्कुमार उवाच। एवमादौ पुरा कल्पे प्रोक्तः श्रेष्ठः स शंभुना॥
sanatkumāra uvāca| evamādau purā kalpe proktaḥ śreṣṭhaḥ sa śaṁbhunā||
सनत्कुमार ने कहा—इस प्रकार पूर्वकाल में, प्राचीन कल्प में, शंभु ने उन श्रेष्ठ ब्रह्मा से यह पूछा था।
श्लोक 12 (skanda.5.40.12)
प्रोवाच पार्वतीकांतं प्रभुः प्रीतः पितामहः। भगवन्सर्वकर्ता त्वं सर्वदर्शी सदाशिवः॥
provāca pārvatīkāṁtaṁ prabhuḥ prītaḥ pitāmahaḥ| bhagavansarvakartā tvaṁ sarvadarśī sadāśivaḥ||
प्रसन्न होकर पितामह प्रभु ब्रह्मा ने पार्वती के प्रियतम से कहा—'हे भगवन्, आप सबके कर्ता, सर्वद्रष्टा, सदाशिव हैं।
श्लोक 13 (skanda.5.40.13)
अजानन्निव त्वं सर्वं मां पृच्छसि सनातन। यत्र कल्पांतको वह्निरधिज्वालः प्रतिष्ठितः॥
ajānanniva tvaṁ sarvaṁ māṁ pṛcchasi sanātana| yatra kalpāṁtako vahniradhijvālaḥ pratiṣṭhitaḥ||
हे सनातन, सब कुछ जानते हुए भी आप मुझसे मानो अनजान बनकर पूछ रहे हैं। जहाँ कल्पांत की अग्नि ऊर्ध्वज्वाला होकर प्रतिष्ठित है,
श्लोक 14 (skanda.5.40.14)
त्वमेव च महाकालः सर्वं वै ज्ञायते त्वया। नाथ ये मानवास्तत्र सदाचारास्तथा परे॥
tvameva ca mahākālaḥ sarvaṁ vai jñāyate tvayā| nātha ye mānavāstatra sadācārāstathā pare||
वहाँ आप ही महाकाल हैं; सब कुछ आपको ही ज्ञात है। हे नाथ, वहाँ जो सदाचारी मनुष्य और अन्य लोग निवास करते हैं,
श्लोक 15 (skanda.5.40.15)
निवसंति न ते मर्त्याः सुरास्ते वै न संशयः। लभंते च पुनः स्वर्गं मृता वै कालपर्यये॥
nivasaṁti na te martyāḥ surāste vai na saṁśayaḥ| labhaṁte ca punaḥ svargaṁ mṛtā vai kālaparyaye||
वे मर्त्य नहीं रहते, निःसंदेह वे देवता ही हो जाते हैं; और मृत्यु के पश्चात् काल आने पर वे पुनः स्वर्ग प्राप्त करते हैं।
श्लोक 16 (skanda.5.40.16)
वर्तते च पुरी तत्र रम्यहर्म्या सुशोभना। यस्यां भांति विचित्राणि हर्म्याणि विविधानि च॥
vartate ca purī tatra ramyaharmyā suśobhanā| yasyāṁ bhāṁti vicitrāṇi harmyāṇi vividhāni ca||
वहाँ एक रमणीय अट्टालिकाओं वाली सुशोभित नगरी है, जिसमें विविध और अद्भुत भवन सुशोभित होते हैं।
श्लोक 17 (skanda.5.40.17)
स्वर्णशृङ्गाश्च प्रासादा विहिता विश्वकर्मणा। देवाः संति सदा तत्र तीर्थानि विविधानि च॥
svarṇaśṛṅgāśca prāsādā vihitā viśvakarmaṇā| devāḥ saṁti sadā tatra tīrthāni vividhāni ca||
वे स्वर्ण-शिखर वाले प्रासाद विश्वकर्मा द्वारा निर्मित हैं; वहाँ सदैव देवगण तथा नाना प्रकार के तीर्थ विद्यमान रहते हैं।
श्लोक 18 (skanda.5.40.18)
पूर्वकल्पे स्थितोऽहं च यत्र त्वं केशवस्तथा। तामेव च पुरीं द्रष्टुं सर्वे लोका ह्यवंतिकाम्॥
pūrvakalpe sthito'haṁ ca yatra tvaṁ keśavastathā| tāmeva ca purīṁ draṣṭuṁ sarve lokā hyavaṁtikām||
पूर्वकल्प में मैं और आप, तथा केशव भी वहीं रहे थे। उसी अवंतिका नगरी को देखने के लिए समस्त लोक,
श्लोक 19 (skanda.5.40.19)
तथा देवर्षयः सिद्धा यक्षकिंनरदानवाः। आजग्मुः स्थाणुना सार्धं वेधसा ब्रह्मयोनिना॥
tathā devarṣayaḥ siddhā yakṣakiṁnaradānavāḥ| ājagmuḥ sthāṇunā sārdhaṁ vedhasā brahmayoninā||
देवर्षि, सिद्ध, यक्ष, किन्नर और दानव—सब स्थाणु (शिव) तथा सृष्टि के मूल स्रोत विधाता ब्रह्मा के साथ वहाँ आए।
श्लोक 20 (skanda.5.40.20)
तथैव च वरा नार्यो देवानामतिवल्लभाः। समापेतुः सहस्राणि द्रष्टुमत्यद्भुतां पुरीम्॥
tathaiva ca varā nāryo devānāmativallabhāḥ| samāpetuḥ sahasrāṇi draṣṭumatyadbhutāṁ purīm||
इसी प्रकार देवताओं की अत्यंत प्रिय हजारों श्रेष्ठ नारियाँ भी उस अत्यद्भुत नगरी को देखने के लिए एकत्र हुईं।
श्लोक 21 (skanda.5.40.21)
आगत्य च यदा देवः सह देवैर्महेश्वरः। वीक्षते नगरीं रम्यामपश्यदावृतां तथा॥
āgatya ca yadā devaḥ saha devairmaheśvaraḥ| vīkṣate nagarīṁ ramyāmapaśyadāvṛtāṁ tathā||
जब देवताओं सहित महेश्वर वहाँ आकर उस रमणीय नगरी को देखने लगे, तब उन्होंने उसे इस प्रकार घिरा हुआ पाया—
श्लोक 22 (skanda.5.40.22)
प्रासादैः स्वर्णशृंगाढ्यैर्मणिरत्नविभूषितैः। विश्वरूपो हि भगवान्राजा विश्वैकनायकः॥
prāsādaiḥ svarṇaśṛṁgāḍhyairmaṇiratnavibhūṣitaiḥ| viśvarūpo hi bhagavānrājā viśvaikanāyakaḥ||
स्वर्ण-शिखर तथा मणि-रत्नों से विभूषित प्रासादों से; वहाँ विश्वरूप भगवान, राजा तथा विश्व के एकमात्र नायक विराजमान थे।
श्लोक 23 (skanda.5.40.23)
तत्रास्ते शोभने दिव्ये प्रासादे मणिभूषिते। सेव्यमानः सुरैः सिद्धैर्मुनिविद्याधरोरगैः॥
tatrāste śobhane divye prāsāde maṇibhūṣite| sevyamānaḥ suraiḥ siddhairmunividyādharoragaiḥ||
वे उस शोभायमान, दिव्य, मणि-अलंकृत प्रासाद में विराजते थे, देवताओं, सिद्धों, मुनियों, विद्याधरों और नागों द्वारा सेवित।
श्लोक 24 (skanda.5.40.24)
ततो महेशश्च पितामहश्च समेत्य तं विश्वपतिं ननंदतुः। समर्चितौ तेन यथार्हमादरात्सहानुगावागमनं त्वपृच्छत्॥
tato maheśaśca pitāmahaśca sametya taṁ viśvapatiṁ nanaṁdatuḥ| samarcitau tena yathārhamādarātsahānugāvāgamanaṁ tvapṛcchat||
तब महेश और पितामह उस विश्वपति के पास पहुँचकर हर्षित हुए; उनके द्वारा यथोचित आदरपूर्वक पूजित होकर, अपने अनुचरों सहित, उनसे उनके आगमन का प्रयोजन पूछा गया।
श्लोक 25 (skanda.5.40.25)
किमागतौ वा त्रिदिवान्महीतलं सहानुगावाश यकश्च कथ्यताम्। ततस्तु तावूचतुरब्जजेश्वरौ भवान्तरे यत्र च तत्र नौ रतिः॥
kimāgatau vā tridivānmahītalaṁ sahānugāvāśa yakaśca kathyatām| tatastu tāvūcaturabjajeśvarau bhavāntare yatra ca tatra nau ratiḥ||
'आप दोनों अपने अनुचरों सहित स्वर्ग से पृथ्वी पर क्यों आए हैं—अपनी इच्छा कहिए।' तब ब्रह्मा और शिव दोनों ने कहा—'जिस किसी अन्य जन्म में भी हम रहें, हमारा प्रेम वहीं है जहाँ आप हैं।'
श्लोक 26 (skanda.5.40.26)
त्वया विना नैव सुरालये सुखं महीतले वाथ रसातलेऽस्ति नः। कदा त्वया कांचनशेखरा पुरी निवेशिता वेश्मवती विचित्रिता॥
tvayā vinā naiva surālaye sukhaṁ mahītale vātha rasātale'sti naḥ| kadā tvayā kāṁcanaśekharā purī niveśitā veśmavatī vicitritā||
'आपके बिना न स्वर्गलोक में, न पृथ्वी पर, न रसातल में हमें कोई सुख है। आपने यह स्वर्ण-शिखरों वाली, विचित्र भवनों से भरी नगरी कब बसाई?'
श्लोक 27 (skanda.5.40.27)
हरिरुवाच। त्वदर्थमेवेश विशेषशालिनी सृष्टा हि वै सर्वगुणाकरा मया। प्रयच्छ विश्वेश्वर चावयोरिह स्थानं च तीर्थं प्रलयेऽक्षयं च॥
hariruvāca| tvadarthameveśa viśeṣaśālinī sṛṣṭā hi vai sarvaguṇākarā mayā| prayaccha viśveśvara cāvayoriha sthānaṁ ca tīrthaṁ pralaye'kṣayaṁ ca||
हरि ने कहा—'हे ईश, आपके ही लिए मैंने इस विशिष्ट, समस्त गुणों की खान इस नगरी की सृष्टि की है। हे विश्वेश्वर, हम दोनों को यहाँ एक स्थान और प्रलय में भी अक्षय रहने वाला तीर्थ प्रदान कीजिए।'
श्लोक 28 (skanda.5.40.28)
ददाम्यभीष्टं युवयोरिहालयं प्रजापते ह्युत्तरतस्तव स्थितिः। महेश्वर त्वं व्रज दक्षिणालयं स्थानं सुदत्तं युवयोः सुशोभनम्॥
dadāmyabhīṣṭaṁ yuvayorihālayaṁ prajāpate hyuttaratastava sthitiḥ| maheśvara tvaṁ vraja dakṣiṇālayaṁ sthānaṁ sudattaṁ yuvayoḥ suśobhanam||
'मैं तुम दोनों को यहाँ अभीष्ट निवास देता हूँ—हे प्रजापति, तुम्हारा स्थान उत्तर दिशा में होगा; हे महेश्वर, तुम दक्षिण के निवास में जाओ। यह सुशोभन स्थान तुम दोनों को भलीभाँति प्रदत्त है।'
श्लोक 29 (skanda.5.40.29)
महाकालो ह्यधोज्वालो जगदात्मा प्रभुः स्थितः। गणैरनेकसाहस्रैरादृतः परमेश्वरः॥
mahākālo hyadhojvālo jagadātmā prabhuḥ sthitaḥ| gaṇairanekasāhasrairādṛtaḥ parameśvaraḥ||
नीचे की ओर ज्वाला वाले, जगत् की आत्मा, प्रभु महाकाल इस प्रकार वहाँ स्थित हुए—वे परमेश्वर अनेक सहस्र गणों द्वारा आदृत हैं।
श्लोक 30 (skanda.5.40.30)
क्रीडार्थं नगरी सृष्टा सर्वभूतहितैषिणा। मयाद्य युवयोर्दत्ता विहायाऽचलमात्मनः॥
krīḍārthaṁ nagarī sṛṣṭā sarvabhūtahitaiṣiṇā| mayādya yuvayordattā vihāyā'calamātmanaḥ||
समस्त प्राणियों का हित चाहने वाले मेरे द्वारा यह नगरी क्रीड़ा के लिए रची गई थी; आज मैं इसे अपनी अचल ममता त्यागकर तुम दोनों को दे रहा हूँ।
श्लोक 31 (skanda.5.40.31)
भवद्भ्यां हेमशृंगेति यस्माच्च समुदीरिता। पुरी कनकशृंगेति लोके ख्याता भविष्यति॥
bhavadbhyāṁ hemaśṛṁgeti yasmācca samudīritā| purī kanakaśṛṁgeti loke khyātā bhaviṣyati||
और क्योंकि आप दोनों ने इसे 'हेमशृंग' कहकर पुकारा, इसलिए यह नगरी लोक में कनकशृंग नाम से विख्यात होगी।
श्लोक 32 (skanda.5.40.32)
एवं कनकशृङ्गेति प्रथमं नाम कथ्यते॥
evaṁ kanakaśṛṅgeti prathamaṁ nāma kathyate||
इस प्रकार इसका पहला नाम कनकशृंग बताया गया है।
श्लोक 33 (skanda.5.40.33)
जपंतश्च स्थिता यत्र ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः। नित्यं रमंति भक्तानां सर्वाभीष्टफलप्रदाः॥
japaṁtaśca sthitā yatra brahmaviṣṇumaheśvarāḥ| nityaṁ ramaṁti bhaktānāṁ sarvābhīṣṭaphalapradāḥ||
जहाँ जप करते हुए ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर स्थित हैं, वे नित्य वहाँ रमण करते हुए भक्तों को उनके समस्त अभीष्ट फल प्रदान करते हैं।