अवन्ती खण्ड · अध्याय 42
अवन्ती अभिधान कथा वर्णन
श्लोक 1 (skanda.5.42.1)
सनत्कुमार उवाच। पुरा चैशानकल्पे तु स्मृतावंती यथा पुरी। तथा शृणु सुरैः पूर्वं दैत्यसैन्यपराजितैः॥
sanatkumāra uvāca| purā caiśānakalpe tu smṛtāvaṁtī yathā purī| tathā śṛṇu suraiḥ pūrvaṁ daityasainyaparājitaiḥ||
सनत्कुमार ने कहा—पूर्वकाल में ऐशान कल्प में यह नगरी अवन्ती नाम से किस प्रकार स्मरण की गई, वह सुनो—पूर्वकाल में दैत्यसेना से पराजित देवताओं द्वारा,
श्लोक 2 (skanda.5.42.2)
आश्रितं मेरुशिखरं वनकंदगुहावृतम्। तत्र गत्वा द्विजश्रेष्ठ मंत्रं च चक्रुरुद्यताः॥
āśritaṁ meruśikharaṁ vanakaṁdaguhāvṛtam| tatra gatvā dvijaśreṣṭha maṁtraṁ ca cakrurudyatāḥ||
वनों, कंदों और गुफाओं से घिरे मेरु के शिखर की शरण ली गई; हे द्विजश्रेष्ठ, वहाँ जाकर उन्होंने उद्यत होकर परस्पर मंत्रणा की।
श्लोक 3 (skanda.5.42.3)
अन्योन्यं च समासाद्य समभ्यर्च्य परस्परम्। जग्मुः सर्वे सुरगणा यत्र ब्रह्मा प्रजापतिः॥
anyonyaṁ ca samāsādya samabhyarcya parasparam| jagmuḥ sarve suragaṇā yatra brahmā prajāpatiḥ||
एक-दूसरे से मिलकर तथा परस्पर सम्मान करके, सभी देवगण वहाँ गए जहाँ प्रजापति ब्रह्मा थे।
श्लोक 4 (skanda.5.42.4)
निवेदयांचक्रिरे सर्वं तत्रागमनकारणम्। तेषां तद्वचनं श्रुत्वा देवानां स प्रजेश्वरः॥
nivedayāṁcakrire sarvaṁ tatrāgamanakāraṇam| teṣāṁ tadvacanaṁ śrutvā devānāṁ sa prajeśvaraḥ||
उन्होंने वहाँ अपने आगमन का सम्पूर्ण कारण निवेदित किया। देवताओं के उस वचन को सुनकर वह प्रजापति,
श्लोक 5 (skanda.5.42.5)
जगाम त्रिदशैः साकं देवदेवं महेश्वरम्। स चापि ह्यगमत्तत्र वैकुंठं धाम यत्र वै॥
jagāma tridaśaiḥ sākaṁ devadevaṁ maheśvaram| sa cāpi hyagamattatra vaikuṁṭhaṁ dhāma yatra vai||
देवताओं सहित देवदेव महेश्वर के पास गया; और वे भी वहीं वैकुण्ठ धाम को गए, जहाँ—
श्लोक 6 (skanda.5.42.6)
ऋद्धिसिद्धिप्रदं नित्यं मुनिचारणसेवितम्। किन्नरैर्गीयमानं च अप्सरोगणसेवितम्॥
ṛddhisiddhipradaṁ nityaṁ municāraṇasevitam| kinnarairgīyamānaṁ ca apsarogaṇasevitam||
—वह धाम सदा ऋद्धि-सिद्धि प्रदान करने वाला, मुनियों और चारणों से सेवित, किन्नरों द्वारा गाया जाने वाला तथा अप्सराओं के समूहों से सेवित था।
श्लोक 7 (skanda.5.42.7)
ऋषिभिर्भार्गवादिभिर्देवर्षिनारदोत्तमैः। सिद्धगंधर्वमुख्यैश्च कुमारैः सनकादिभिः॥
ṛṣibhirbhārgavādibhirdevarṣināradottamaiḥ| siddhagaṁdharvamukhyaiśca kumāraiḥ sanakādibhiḥ||
भृगु आदि ऋषियों से, श्रेष्ठ देवर्षि नारद से, प्रमुख सिद्धों और गन्धर्वों से, तथा सनक आदि कुमारों से युक्त था।
श्लोक 8 (skanda.5.42.8)
प्रजापतिगणाकीर्णं मानवैश्च चतुर्दशैः। वसुभिर्विश्वेदेवैश्च पितॄणामुत्तमैर्गणैः॥
prajāpatigaṇākīrṇaṁ mānavaiśca caturdaśaiḥ| vasubhirviśvedevaiśca pitṝṇāmuttamairgaṇaiḥ||
प्रजापतियों के समूहों, चौदह मनुओं, वसुओं, विश्वेदेवों तथा पितरों के श्रेष्ठ गणों से भरा हुआ था।
श्लोक 9 (skanda.5.42.9)
संसेव्यं च सदाचारैः पुण्यवद्भिर्जनैस्तथा। दिव्यं दिव्यैश्च प्रासादैर्दिव्यपादपशोभितम्॥
saṁsevyaṁ ca sadācāraiḥ puṇyavadbhirjanaistathā| divyaṁ divyaiśca prāsādairdivyapādapaśobhitam||
सदाचारी और पुण्यवान जनों द्वारा सेवित, दिव्य, दिव्य प्रासादों तथा दिव्य वृक्षों से सुशोभित था।
श्लोक 10 (skanda.5.42.10)
मणिरत्नैश्च सोपानैर्दिव्यं सरसशोभितम्। हंसकारंडवाकीर्णं मणिभाभिः सुभास्वरम्॥
maṇiratnaiśca sopānairdivyaṁ sarasaśobhitam| haṁsakāraṁḍavākīrṇaṁ maṇibhābhiḥ subhāsvaram||
मणि-रत्नों की सीढ़ियों वाले दिव्य सरोवरों से सुशोभित, हंस और कारंडवों से भरा, मणियों की कांति से देदीप्यमान था।
श्लोक 11 (skanda.5.42.11)
षडूर्मिरहितं स्थानं यत्र तिष्ठन्ति पक्षिणः। तत्र गत्वा सुराः सर्वे वासुदेवदिदृक्षया। स्तुतिमारेभिरे कर्तुं देवदेवजगत्पतेः॥
ṣaḍūrmirahitaṁ sthānaṁ yatra tiṣṭhanti pakṣiṇaḥ| tatra gatvā surāḥ sarve vāsudevadidṛkṣayā| stutimārebhire kartuṁ devadevajagatpateḥ||
षड्ऊर्मियों से रहित वह स्थान, जहाँ पक्षी निवास करते हैं; वहाँ जाकर सभी देवताओं ने वासुदेव के दर्शन की इच्छा से देवदेव जगत्पति की स्तुति करना आरम्भ किया।
श्लोक 12 (skanda.5.42.12)
देवा ऊचुः। नमोऽनंताय बृहते कूर्माय वै नमोनमः॥
devā ūcuḥ| namo'naṁtāya bṛhate kūrmāya vai namonamaḥ||
देवताओं ने कहा—अनंत, महान को नमस्कार है; कूर्म को बार-बार नमस्कार है।
श्लोक 13 (skanda.5.42.13)
नृसिंहरूपायोग्राय नमो वाराहरूपिणे। राघवाय च रामाय ब्रह्मणेऽनंतशक्तये॥
nṛsiṁharūpāyogrāya namo vārāharūpiṇe| rāghavāya ca rāmāya brahmaṇe'naṁtaśaktaye||
'उग्र नृसिंह रूप को नमस्कार है, वराह रूप को नमस्कार है; राघव को, राम को, अनंत शक्ति वाले ब्रह्म को नमस्कार है।'
श्लोक 14 (skanda.5.42.14)
वासुदेवाय शांताय यदूनां पतये नमः। नमो बुद्धाय शुद्धाय कल्कये म्लेच्छनाशिने॥
vāsudevāya śāṁtāya yadūnāṁ pataye namaḥ| namo buddhāya śuddhāya kalkaye mlecchanāśine||
'शांत वासुदेव को, यादवों के स्वामी को नमस्कार है; शुद्ध बुद्ध को तथा म्लेच्छों के नाशक कल्कि को नमस्कार है।'
श्लोक 15 (skanda.5.42.15)
इति स्तवाभियुक्तानां वागुवाचाशरीरिणी। शृणुध्वं भोः सुराः सर्वे भूत्वा चैकाग्रमानसाः॥
iti stavābhiyuktānāṁ vāguvācāśarīriṇī| śṛṇudhvaṁ bhoḥ surāḥ sarve bhūtvā caikāgramānasāḥ||
इस प्रकार स्तुति में लगे हुए उन देवताओं से एक आकाशवाणी बोली—'हे देवगण, सब लोग एकाग्रचित्त होकर सुनो।'
श्लोक 16 (skanda.5.42.16)
महाकालवने रम्ये ब्रह्मर्षिगणसेविते। तत्र पुण्या पुरी ह्येका सर्वकामफलप्रदा॥
mahākālavane ramye brahmarṣigaṇasevite| tatra puṇyā purī hyekā sarvakāmaphalapradā||
'ब्रह्मर्षिगणों से सेवित रमणीय महाकालवन में एक पुण्यमयी नगरी है, जो समस्त कामनाओं का फल देने वाली है।'
श्लोक 17 (skanda.5.42.17)
नाम्ना कुशस्थली रम्या सिद्धगंधर्वसेविता। कल्पादौ कल्पमध्ये वा यत्र संनिहितो हरः॥
nāmnā kuśasthalī ramyā siddhagaṁdharvasevitā| kalpādau kalpamadhye vā yatra saṁnihito haraḥ||
'नाम से रमणीय कुशस्थली, सिद्धों और गन्धर्वों से सेवित; कल्प के आरम्भ में या मध्य में जहाँ हर सदा निकट रहते हैं।'
श्लोक 18 (skanda.5.42.18)
कल्पक्षये क्षयं यांति स्थावराणि चराणि च। तीर्थानि चैव सर्वाणि पुण्यान्यायतनानि च॥
kalpakṣaye kṣayaṁ yāṁti sthāvarāṇi carāṇi ca| tīrthāni caiva sarvāṇi puṇyānyāyatanāni ca||
'कल्प के क्षय होने पर स्थावर और चर, समस्त तीर्थ तथा पुण्यमय स्थान—सब नष्ट हो जाते हैं।'
श्लोक 19 (skanda.5.42.19)
सरितः सागराः सर्वे सरांस्युपवनानि च। औषधीर्वृक्षवल्लीश्च यंत्रं मंत्रं शुभाशुभम्॥
saritaḥ sāgarāḥ sarve sarāṁsyupavanāni ca| auṣadhīrvṛkṣavallīśca yaṁtraṁ maṁtraṁ śubhāśubham||
'सभी नदियाँ, समुद्र, सरोवर, उपवन, औषधियाँ, वृक्ष-लताएँ, तथा शुभ-अशुभ यंत्र-मंत्र—',
श्लोक 20 (skanda.5.42.20)
ज्योतींषि चंद्रसूर्यौ च सर्वं विष्णुमयं जगत्। तेषां बीजं च पुण्यं च जीवकर्माशय तथा॥
jyotīṁṣi caṁdrasūryau ca sarvaṁ viṣṇumayaṁ jagat| teṣāṁ bījaṁ ca puṇyaṁ ca jīvakarmāśaya tathā||
'ज्योतिर्गण, चंद्र-सूर्य, तथा यह सम्पूर्ण विष्णुमय जगत्—इन सबका बीज, पुण्य तथा जीवों के कर्माशय को भी,'
श्लोक 21 (skanda.5.42.21)
सर्वमादाय भगवाञ्छंकरस्तत्र तिष्ठति। सर्वतीर्थमयी गंगा सर्वदेवमयो हरिः॥
sarvamādāya bhagavāñchaṁkarastatra tiṣṭhati| sarvatīrthamayī gaṁgā sarvadevamayo hariḥ||
'यह सब समेटकर भगवान शंकर वहीं स्थित रहते हैं। गंगा समस्त तीर्थों से युक्त है, हरि समस्त देवताओं से युक्त हैं,'
श्लोक 22 (skanda.5.42.22)
सर्वयज्ञमयो वेदः सर्वधर्ममयी दया। रेवा च सरितां श्रेष्ठा भुवि पुण्यकृताधिका॥
sarvayajñamayo vedaḥ sarvadharmamayī dayā| revā ca saritāṁ śreṣṭhā bhuvi puṇyakṛtādhikā||
'वेद समस्त यज्ञों से युक्त है, दया समस्त धर्मों से युक्त है; और रेवा (नर्मदा) पृथ्वी की नदियों में श्रेष्ठ, पुण्यकर्म में अधिक है।'
श्लोक 23 (skanda.5.42.23)
तस्माद्धितकरं क्षेत्रं कुरूणां वै सुरोत्तमाः। तस्माद्दशगुणं मन्ये प्रयागं तीर्थमुत्तमम्॥
tasmāddhitakaraṁ kṣetraṁ kurūṇāṁ vai surottamāḥ| tasmāddaśaguṇaṁ manye prayāgaṁ tīrthamuttamam||
'हे देवश्रेष्ठो, कुरुक्षेत्र उससे भी अधिक हितकारी है; और उससे भी दस गुना श्रेष्ठ तीर्थ मैं प्रयाग को मानता हूँ।'
श्लोक 24 (skanda.5.42.24)
तस्माद्दशगुणा काशी काश्या दशगुणा गया। ततो दशगुणा प्रोक्ता कुशस्थली च पुण्यदा॥
tasmāddaśaguṇā kāśī kāśyā daśaguṇā gayā| tato daśaguṇā proktā kuśasthalī ca puṇyadā||
'उससे दस गुना काशी है, काशी से दस गुना गया है, और उससे भी दस गुना पुण्यदायिनी कुशस्थली कही गई है।'
श्लोक 25 (skanda.5.42.25)
उपरागसहस्राणि व्यतिपातायुतानि च। अमालक्षं तु एतस्याः कलां नार्हंति षोडशीम्॥
uparāgasahasrāṇi vyatipātāyutāni ca| amālakṣaṁ tu etasyāḥ kalāṁ nārhaṁti ṣoḍaśīm||
'हजारों ग्रहणों का, दस हजार व्यतिपातों का तथा लाख अमावस्याओं का पुण्य भी इसकी सोलहवीं कला के बराबर नहीं है।'
श्लोक 26 (skanda.5.42.26)
लक्षमिंदुक्षये दानं सहस्रं चायनद्वये। व्यतीपाते च कोटिः स्याद्राकायां च ह्यनंतकम्॥
lakṣamiṁdukṣaye dānaṁ sahasraṁ cāyanadvaye| vyatīpāte ca koṭiḥ syādrākāyāṁ ca hyanaṁtakam||
'अमावस्या पर किया गया दान लाख गुना, दोनों अयनों पर सहस्र गुना, व्यतीपात पर करोड़ गुना, तथा पूर्णिमा पर अनंत गुना फल देता है।'
श्लोक 27 (skanda.5.42.27)
तस्माद्धितकरा देवा पुरी ह्येषा कुशस्थली। अनंताऽनंतसंख्यातं दानं किंचित्कृतं नरैः॥
tasmāddhitakarā devā purī hyeṣā kuśasthalī| anaṁtā'naṁtasaṁkhyātaṁ dānaṁ kiṁcitkṛtaṁ naraiḥ||
'इसलिए, हे देवगण, यह कुशस्थली नगरी परम हितकारी है; मनुष्यों द्वारा किया गया थोड़ा-सा भी दान यहाँ अनंत, असंख्य हो जाता है।'
श्लोक 28 (skanda.5.42.28)
तत्सर्वं भोः सुरश्रेष्ठाः सर्वं तच्चाक्षयं भवेत्। तस्मात्सर्वप्रयत्नेन यूयं यात हि मा चिरम्॥
tatsarvaṁ bhoḥ suraśreṣṭhāḥ sarvaṁ taccākṣayaṁ bhavet| tasmātsarvaprayatnena yūyaṁ yāta hi mā ciram||
'हे देवश्रेष्ठो, वह सब कुछ अक्षय हो जाता है; इसलिए पूरे प्रयत्न से तुम बिना विलम्ब किए वहाँ जाओ।'
श्लोक 29 (skanda.5.42.29)
क्षीणपुण्या भवंतो वै बाधंते तेन वः सुराः। महाकालवने रम्ये पुरी ह्येषा कुशस्थली॥
kṣīṇapuṇyā bhavaṁto vai bādhaṁte tena vaḥ surāḥ| mahākālavane ramye purī hyeṣā kuśasthalī||
'हे देवगण, तुम्हारा पुण्य क्षीण हो जाने से ही तुम पीड़ित हो रहे हो; रमणीय महाकालवन में यह कुशस्थली नगरी स्थित है।'
श्लोक 30 (skanda.5.42.30)
तत्र गत्वा भवंतो वै स्नानदानादिकं भुवि। आचरध्वं सुविधिना पुण्यात्स्वर्गमवाप्स्यथ॥
tatra gatvā bhavaṁto vai snānadānādikaṁ bhuvi| ācaradhvaṁ suvidhinā puṇyātsvargamavāpsyatha||
'वहाँ जाकर उस भूमि पर विधिपूर्वक स्नान, दान आदि का आचरण करो; उस पुण्य से तुम पुनः स्वर्ग प्राप्त करोगे।'
श्लोक 31 (skanda.5.42.31)
एतच्छुत्वा वचस्तस्या वाण्याश्चाकाशगं तदा। प्रणम्य शिरसा तस्यै ब्रह्मेशानपुरोगमाः॥
etacchutvā vacastasyā vāṇyāścākāśagaṁ tadā| praṇamya śirasā tasyai brahmeśānapurogamāḥ||
आकाश में गूँजती उस वाणी के इस वचन को सुनकर, ब्रह्मा और ईशान के नेतृत्व में सभी ने उसे सिर झुकाकर प्रणाम किया,
श्लोक 32 (skanda.5.42.32)
पुनर्जग्मुः सुराः सर्वे यत्र माहेश्वरं वनम्। पुरीं चैव द्विजश्रेष्ठ सर्वकामफलप्रदाम्॥
punarjagmuḥ surāḥ sarve yatra māheśvaraṁ vanam| purīṁ caiva dvijaśreṣṭha sarvakāmaphalapradām||
और सभी देवता पुनः वहाँ गए जहाँ महेश्वर का वन था, तथा उस नगरी में भी, हे द्विजश्रेष्ठ, जो समस्त कामनाओं का फल देने वाली थी—
श्लोक 33 (skanda.5.42.33)
चातुर्वर्ण्यसमाकीर्णामृषिगंधर्वसेविताम्। पुण्यवद्भिर्जनैः पूर्णां सिद्धचारणसेविताम्॥
cāturvarṇyasamākīrṇāmṛṣigaṁdharvasevitām| puṇyavadbhirjanaiḥ pūrṇāṁ siddhacāraṇasevitām||
जो चारों वर्णों से भरी हुई, ऋषियों और गन्धर्वों से सेवित, पुण्यवान जनों से परिपूर्ण, तथा सिद्धों और चारणों से सेवित थी।
श्लोक 34 (skanda.5.42.34)
दरिद्रो न जडो मूर्खो न रोगी न च मत्सरी। न व्याधितो नापकारी जनः क्वचित्प्रदृश्यते॥
daridro na jaḍo mūrkho na rogī na ca matsarī| na vyādhito nāpakārī janaḥ kvacitpradṛśyate||
वहाँ कोई दरिद्र, जड़, मूर्ख, रोगी अथवा ईर्ष्यालु व्यक्ति नहीं दिखाई देता; न कोई व्याधिग्रस्त और न ही अपकारी व्यक्ति ही कहीं दिखता है।
श्लोक 35 (skanda.5.42.35)
दाता शांताः सुशीलाश्च जरारोगविवर्जिंताः। स्वधर्मनिरता नित्यं सदाचारातिथिप्रियाः॥
dātā śāṁtāḥ suśīlāśca jarārogavivarjiṁtāḥ| svadharmaniratā nityaṁ sadācārātithipriyāḥ||
वहाँ के लोग दानी, शांत, सुशील, जरा-रोग से रहित, सदा अपने धर्म में निरत तथा सदाचार और अतिथि-सत्कार के प्रिय होते हैं।
श्लोक 36 (skanda.5.42.36)
नरा यत्र निवसंति नार्यश्चैव पतिव्रताः। महोत्सवाः सुगीतानि हव्यं कव्यं गृहेगृहे॥
narā yatra nivasaṁti nāryaścaiva pativratāḥ| mahotsavāḥ sugītāni havyaṁ kavyaṁ gṛhegṛhe||
जहाँ ऐसे पुरुष तथा पतिव्रता स्त्रियाँ निवास करती हैं; प्रत्येक घर में महोत्सव, सुंदर गीत, तथा देव-पितृ हवन होते रहते हैं।
श्लोक 37 (skanda.5.42.37)
ईदृशीं च पुरीं दृष्ट्वा देवा हर्षं परं गताः। तत्र तीर्थं समाख्यातं नाम्ना पैशाचमोचनम्॥
īdṛśīṁ ca purīṁ dṛṣṭvā devā harṣaṁ paraṁ gatāḥ| tatra tīrthaṁ samākhyātaṁ nāmnā paiśācamocanam||
ऐसी नगरी को देखकर देवता परम हर्ष को प्राप्त हुए; वहाँ पिशाचमोचन नाम से एक तीर्थ प्रसिद्ध है।
श्लोक 38 (skanda.5.42.38)
पुण्यवद्भिः सदा सेव्यं सर्वतीर्थनिषेवितम्। तस्मिन्स्नात्वा च जप्त्वा च हुत्वा दत्त्वा च देवताः॥
puṇyavadbhiḥ sadā sevyaṁ sarvatīrthaniṣevitam| tasminsnātvā ca japtvā ca hutvā dattvā ca devatāḥ||
जो सदा पुण्यात्माओं द्वारा सेवित तथा समस्त तीर्थों द्वारा भी सेवित है। उसमें स्नान करके, जप, हवन और दान करके देवता,
श्लोक 39 (skanda.5.42.39)
पुण्यं चाथाक्षयं लब्ध्वा पुनर्याताः सुरालयम्। जित्वाऽसुरान्महादुष्टान्स्थानं प्राप्ताः स्वकंस्वकम्॥
puṇyaṁ cāthākṣayaṁ labdhvā punaryātāḥ surālayam| jitvā'surānmahāduṣṭānsthānaṁ prāptāḥ svakaṁsvakam||
अक्षय पुण्य प्राप्त करके पुनः देवलोक को गए; महादुष्ट असुरों को जीतकर सबने अपना-अपना स्थान प्राप्त किया।
श्लोक 40 (skanda.5.42.40)
येऽस्यां कुर्युर्महाभागाः स्नानं दानं तथार्चनम्। हवनं तर्पणं पितॄंस्तत्सर्वं स्याद्ध्यनंतकम्॥
ye'syāṁ kuryurmahābhāgāḥ snānaṁ dānaṁ tathārcanam| havanaṁ tarpaṇaṁ pitṝṁstatsarvaṁ syāddhyanaṁtakam||
जो भाग्यशाली लोग यहाँ स्नान, दान, पूजा, हवन तथा पितरों का तर्पण करते हैं, वह सब कुछ अनंत फलदायी होता है।
श्लोक 41 (skanda.5.42.41)
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन एतत्कार्यं सदा बुधैः। देवतीर्थोषधीबीजभूतानां चैव पालनम्॥
tasmātsarvaprayatnena etatkāryaṁ sadā budhaiḥ| devatīrthoṣadhībījabhūtānāṁ caiva pālanam||
इसलिए बुद्धिमान पुरुषों को सदा पूरे प्रयत्न से देवताओं, तीर्थों, औषधियों, बीजों तथा समस्त प्राणियों की रक्षा करनी चाहिए।
श्लोक 42 (skanda.5.42.42)
कल्पेकल्पे च यस्यां वै तेनावंती पुरी स्मृता। अद्यप्रभृति पुरी ह्येषा नाम्नावंती कुशस्थली॥
kalpekalpe ca yasyāṁ vai tenāvaṁtī purī smṛtā| adyaprabhṛti purī hyeṣā nāmnāvaṁtī kuśasthalī||
प्रत्येक कल्प में जिसमें [भगवान की उपस्थिति] बनी रहती है, इसीलिए यह नगरी अवन्ती नाम से स्मरण की जाती है; आज से यह कुशस्थली नगरी अवन्ती नाम से जानी जाएगी।
श्लोक 43 (skanda.5.42.43)
इत्युक्त्वा वै तदा देवाः स्वधाम परमं गताः। तदारभ्य द्विजश्रेष्ठ ह्यवंती भुवि विश्रुता॥
ityuktvā vai tadā devāḥ svadhāma paramaṁ gatāḥ| tadārabhya dvijaśreṣṭha hyavaṁtī bhuvi viśrutā||
ऐसा कहकर देवता तब अपने परम धाम को चले गए; तभी से, हे द्विजश्रेष्ठ, अवन्ती पृथ्वी पर विख्यात हुई।
श्लोक 44 (skanda.5.42.44)
य एतां सुकथां दिव्यां पुण्यां च पापहारिणीम्। शृणुयाच्छ्रावयेद्यो वै सर्वपापैः स मुच्यते॥
ya etāṁ sukathāṁ divyāṁ puṇyāṁ ca pāpahāriṇīm| śṛṇuyācchrāvayedyo vai sarvapāpaiḥ sa mucyate||
जो इस दिव्य, पुण्यमयी और पापहारिणी कथा को सुनता या सुनाता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 45 (skanda.5.42.45)
अपुत्रो लभते पुत्रमधनो धनमाप्नुयात्। वाजपेयसहस्राणां राजसूयशताधिकम्॥
aputro labhate putramadhano dhanamāpnuyāt| vājapeyasahasrāṇāṁ rājasūyaśatādhikam||
पुत्रहीन पुत्र पाता है, निर्धन धन पाता है; उसे सहस्र वाजपेय यज्ञों और सौ राजसूय यज्ञों से भी अधिक फल मिलता है।
श्लोक 46 (skanda.5.42.46)
पुण्यं लब्ध्वा नरो नित्यं शिवलोके महीयते॥
puṇyaṁ labdhvā naro nityaṁ śivaloke mahīyate||
ऐसा पुण्य प्राप्त करके मनुष्य सदा के लिए शिवलोक में पूजित होता है।