अवन्ती खण्ड · अध्याय 45
कुमुद्वती प्रभाव कथन
श्लोक 1 (skanda.5.45.1)
सनत्कुमार उवाच। शृणुष्वावहितो व्यास कथां पापहरां पराम्। एषा कुमुद्वती जाता यथा पद्मावती पुरी। तथाहं संप्रवक्ष्यामि यथा मे लोमशोऽब्रवीत्॥
sanatkumāra uvāca| śṛṇuṣvāvahito vyāsa kathāṁ pāpaharāṁ parām| eṣā kumudvatī jātā yathā padmāvatī purī| tathāhaṁ saṁpravakṣyāmi yathā me lomaśo'bravīt||
सनत्कुमार ने कहा—हे व्यास, ध्यानपूर्वक इस परम पापहारिणी कथा को सुनो कि पद्मावती नगरी किस प्रकार कुमुद्वती बनी; मैं वही बताता हूँ जो मुझसे लोमश ने कहा था।
श्लोक 2 (skanda.5.45.2)
लोमश उवाच। शृणु वत्स मया दृष्टा बहुपुण्यतमा पुरी। एकदा तीर्थयात्रायां गतोऽहं वै कुशस्थलीम्। गुह्याद्गुह्यतरं स्थानं यत्र संनिहितो हरः॥
lomaśa uvāca| śṛṇu vatsa mayā dṛṣṭā bahupuṇyatamā purī| ekadā tīrthayātrāyāṁ gato'haṁ vai kuśasthalīm| guhyādguhyataraṁ sthānaṁ yatra saṁnihito haraḥ||
लोमश ने कहा—हे वत्स सुनो, मैंने अत्यंत पुण्यमयी उस नगरी को देखा है। एक बार तीर्थयात्रा में मैं कुशस्थली गया, जो गुह्य से भी अधिक गुह्य स्थान है, जहाँ हर सदा निकट रहते हैं।
श्लोक 3 (skanda.5.45.3)
यस्य दर्शनमात्रेण ब्रह्महत्यां व्यपोहति। यत्र तत्र स्थिता विप्रा ब्रह्मघोषमकुर्वत॥
yasya darśanamātreṇa brahmahatyāṁ vyapohati| yatra tatra sthitā viprā brahmaghoṣamakurvata||
जिनके दर्शन मात्र से ब्रह्महत्या का पाप भी दूर हो जाता है; वहाँ जहाँ-तहाँ स्थित विप्रगण वेद-घोष कर रहे थे।
श्लोक 4 (skanda.5.45.4)
यज्ञांश्चैव तथा चित्रानृत्विजोदारकर्मणः। ऋषयश्च महाभागाः प्रकुर्वंति समाहिताः॥
yajñāṁścaiva tathā citrānṛtvijodārakarmaṇaḥ| ṛṣayaśca mahābhāgāḥ prakurvaṁti samāhitāḥ||
महाभाग ऋषिगण एकाग्रचित्त होकर उदार कर्म वाले ऋत्विजों द्वारा विचित्र यज्ञ सम्पन्न करा रहे थे।
श्लोक 5 (skanda.5.45.5)
ऋषिपत्न्यस्तथा साध्व्यः परिचर्यां प्रकुर्वते। दश विष्णुसमाः ख्यातास्तत्रैव निवसंति ते॥
ṛṣipatnyastathā sādhvyaḥ paricaryāṁ prakurvate| daśa viṣṇusamāḥ khyātāstatraiva nivasaṁti te||
ऋषियों की साध्वी पत्नियाँ सेवा-कार्य कर रही थीं; और वहाँ विष्णु के समान प्रसिद्ध दस [महापुरुष] निवास करते थे।
श्लोक 6 (skanda.5.45.6)
रुद्रा ह्येकादश प्रोक्ता द्वादशार्कास्तथैव च। अष्टौ च वसवः ख्याता विश्वे देवास्त्रयोदश॥
rudrā hyekādaśa proktā dvādaśārkāstathaiva ca| aṣṭau ca vasavaḥ khyātā viśve devāstrayodaśa||
ग्यारह रुद्र वहाँ कहे गए, तथा बारह आदित्य भी; आठ प्रसिद्ध वसु, और तेरह विश्वेदेव भी वहाँ थे।
श्लोक 7 (skanda.5.45.7)
अष्टौ च दिग्गजाश्चैव मनवश्च चतुर्दश। मरुद्गणाश्च ते सर्वे तत्रैवेंद्रपुरोगमाः॥
aṣṭau ca diggajāścaiva manavaśca caturdaśa| marudgaṇāśca te sarve tatraiveṁdrapurogamāḥ||
आठों दिग्गज, चौदह मनु, तथा इन्द्र के नेतृत्व में समस्त मरुद्गण भी वहीं थे।
श्लोक 8 (skanda.5.45.8)
गंधर्वासरसश्चैव किंनरोरगराक्षसाः। सिद्धास्तपस्विनो वत्स तत्रैव समुपस्थिताः॥
gaṁdharvāsarasaścaiva kiṁnaroragarākṣasāḥ| siddhāstapasvino vatsa tatraiva samupasthitāḥ||
गन्धर्व, अप्सराएँ, किन्नर, नाग, राक्षस, सिद्ध तथा तपस्वी—हे वत्स, ये सब वहीं उपस्थित थे।
श्लोक 9 (skanda.5.45.9)
अष्टौ वै भैरवाः ख्याताश्चत्वारः पवनात्मजाः। विनायकाश्च षट् प्रोक्ता देव्यश्च चतुर्विंशतिः॥
aṣṭau vai bhairavāḥ khyātāścatvāraḥ pavanātmajāḥ| vināyakāśca ṣaṭ proktā devyaśca caturviṁśatiḥ||
आठ प्रसिद्ध भैरव, चार पवनपुत्र, छह विनायक तथा चौबीस देवियाँ वहाँ कही गईं।
श्लोक 10 (skanda.5.45.10)
एते देवगणाः प्रोक्ता रौद्राश्चैव तथा गणाः। ब्रह्मा वेदविदां श्रेष्ठो मरिचिकश्यपादयः॥
ete devagaṇāḥ proktā raudrāścaiva tathā gaṇāḥ| brahmā vedavidāṁ śreṣṭho maricikaśyapādayaḥ||
ये सब देवगण तथा रुद्र-गण कहे गए; वेद के ज्ञाताओं में श्रेष्ठ ब्रह्मा, तथा मरीचि-कश्यप आदि ऋषि भी वहीं थे।
श्लोक 11 (skanda.5.45.11)
दक्षः प्रजापतिश्रेष्ठो दितिर्वै देवमातरः। सुरभीप्रमुखा गावः स्थावराणि चराणि च॥
dakṣaḥ prajāpatiśreṣṭho ditirvai devamātaraḥ| surabhīpramukhā gāvaḥ sthāvarāṇi carāṇi ca||
प्रजापतियों में श्रेष्ठ दक्ष, तथा देवमाता दिति, सुरभि आदि गौएँ, और समस्त स्थावर-जंगम भी वहीं थे।
श्लोक 12 (skanda.5.45.12)
तीर्थानि यानि सर्वाणि नद्यः प्रस्रवणानि च। क्षेत्राणि चैव सर्वाणि भुवि पुण्यतमानि वै॥
tīrthāni yāni sarvāṇi nadyaḥ prasravaṇāni ca| kṣetrāṇi caiva sarvāṇi bhuvi puṇyatamāni vai||
जितने भी तीर्थ, नदियाँ और झरने हैं, तथा पृथ्वी पर जितने भी अत्यंत पुण्यमय क्षेत्र हैं, वे सब भी वहीं उपस्थित थे।
श्लोक 13 (skanda.5.45.13)
सप्त पुर्यस्त्रयो ग्रामा नवारण्या नवोषराः। चतुर्दशानि गुह्यानि मुक्तिद्वाराणि भूतले॥
sapta puryastrayo grāmā navāraṇyā navoṣarāḥ| caturdaśāni guhyāni muktidvārāṇi bhūtale||
सात पुरियाँ, तीन ग्राम, नौ वन, नौ ऊसर भूमियाँ, तथा पृथ्वी पर मुक्ति के चौदह गुह्य द्वार—ये सब भी वहीं थे।
श्लोक 14 (skanda.5.45.14)
समुद्राश्चैव चत्वारो रत्नानि विविधानि च। सती पतिव्रताः साध्व्यस्तथा ब्रह्मर्षयोऽमलाः। राजर्षयस्तथा शांता ब्राह्मणा वेदपारगाः॥
samudrāścaiva catvāro ratnāni vividhāni ca| satī pativratāḥ sādhvyastathā brahmarṣayo'malāḥ| rājarṣayastathā śāṁtā brāhmaṇā vedapāragāḥ||
चारों समुद्र, नाना प्रकार के रत्न, सती-साध्वी पतिव्रता स्त्रियाँ, निष्कलंक ब्रह्मर्षि, शांत राजर्षि, तथा वेदपारंगत ब्राह्मण भी वहीं उपस्थित थे।
श्लोक 15 (skanda.5.45.15)
वेदाः पुराणस्मृतयो गाथा गीतिप्रहेलिकाः। उपासांचक्रिरे तस्य देवदेवेडुमापतेः॥
vedāḥ purāṇasmṛtayo gāthā gītiprahelikāḥ| upāsāṁcakrire tasya devadeveḍumāpateḥ||
वेद, पुराण, स्मृतियाँ, गाथाएँ, गीत और प्रहेलिकाएँ—सबने उन देवदेव उमापति की उपासना की।
श्लोक 16 (skanda.5.45.16)
तस्य दर्शनमात्रेण जातोऽहं विज्वरोऽमलः। दीर्घायुर्दीर्घतपसा जरारोगविवर्जितः॥
tasya darśanamātreṇa jāto'haṁ vijvaro'malaḥ| dīrghāyurdīrghatapasā jarārogavivarjitaḥ||
उनके दर्शन मात्र से मैं ज्वर-रहित और निर्मल हो गया, दीर्घ तप से दीर्घायु तथा जरा-रोग से रहित हो गया।
श्लोक 17 (skanda.5.45.17)
स्नातोऽहं सर्वतीर्थेषु शुचिर्भूत्वा समाहितः। प्रसन्नमानसो जातः सर्वपापपराङ्मुखः॥
snāto'haṁ sarvatīrtheṣu śucirbhūtvā samāhitaḥ| prasannamānaso jātaḥ sarvapāpaparāṅmukhaḥ||
मैंने समस्त तीर्थों में स्नान किया, पवित्र और एकाग्रचित्त होकर; मेरा मन प्रसन्न हो गया और समस्त पापों से विमुख हो गया।
श्लोक 18 (skanda.5.45.18)
दृष्ट्वा पद्मावतीं शुद्धां सर्वकामवरप्रदाम्। न यत्र दृश्यते कश्चिच्छोकरोगपरो जनः॥
dṛṣṭvā padmāvatīṁ śuddhāṁ sarvakāmavarapradām| na yatra dṛśyate kaścicchokarogaparo janaḥ||
मैंने उस शुद्ध, सर्वकाम-वरप्रदा पद्मावती को देखा, जहाँ कोई भी शोक अथवा रोग से ग्रस्त व्यक्ति दिखाई नहीं देता।
श्लोक 19 (skanda.5.45.19)
न दुःखी न च दारिद्रो न मूर्खो नाजितेंद्रियः। परस्परविरोधी न नृतिर्य्यक्षु च दृश्यते॥
na duḥkhī na ca dāridro na mūrkho nājiteṁdriyaḥ| parasparavirodhī na nṛtiryyakṣu ca dṛśyate||
वहाँ न कोई दुःखी है, न दरिद्र, न मूर्ख और न अजितेन्द्रिय; मनुष्यों और पशुओं में भी परस्पर विरोध नहीं दिखता।
श्लोक 20 (skanda.5.45.20)
अन्योन्यं सर्वमित्राणि अन्योन्यं चोपकारिणः। सर्वे दांताश्च शांताश्च सर्वे विद्योपदेशिनः॥
anyonyaṁ sarvamitrāṇi anyonyaṁ copakāriṇaḥ| sarve dāṁtāśca śāṁtāśca sarve vidyopadeśinaḥ||
सब एक-दूसरे के मित्र हैं और एक-दूसरे के उपकारी हैं; सभी संयमी और शांत हैं, सभी विद्या का उपदेश देने वाले हैं।
श्लोक 21 (skanda.5.45.21)
उद्यानानि च रम्याणि वनान्युपवनानि च। हर्म्याणि च सुशुभ्राणि श्रेणीबद्धानि भांति वै॥
udyānāni ca ramyāṇi vanānyupavanāni ca| harmyāṇi ca suśubhrāṇi śreṇībaddhāni bhāṁti vai||
रमणीय उद्यान, वन-उपवन, तथा पंक्तिबद्ध, अत्यंत उज्ज्वल भवन सुशोभित होते हैं।
श्लोक 22 (skanda.5.45.22)
नानारत्नसमाकीर्णैर्हेमकुंभैः सुशोभनैः। विराजंते विचित्राणि गीतवाद्यमहोत्सवैः॥
nānāratnasamākīrṇairhemakuṁbhaiḥ suśobhanaiḥ| virājaṁte vicitrāṇi gītavādyamahotsavaiḥ||
नाना रत्नों से जड़े, सुशोभित स्वर्ण-कलशों से युक्त, गीत-वाद्य के महोत्सवों से भरे हुए विचित्र भवन सुशोभित होते हैं।
श्लोक 23 (skanda.5.45.23)
सदैव वसते यत्र उमया सह शंकरः। चंद्रचूडः कृत्तिवासाश्चिताभस्मांगलेपनः॥
sadaiva vasate yatra umayā saha śaṁkaraḥ| caṁdracūḍaḥ kṛttivāsāścitābhasmāṁgalepanaḥ||
जहाँ उमा सहित शंकर सदा निवास करते हैं—चंद्रमौलि, गजचर्मधारी, चिता-भस्म से अंग-लेपित।
श्लोक 24 (skanda.5.45.24)
चंद्रज्योत्स्नाकलापूर्णमरीचिभिः सदा बभौ। यत्र नो कृष्णपक्षोऽभून्नामावास्या न वै तमः॥
caṁdrajyotsnākalāpūrṇamarīcibhiḥ sadā babhau| yatra no kṛṣṇapakṣo'bhūnnāmāvāsyā na vai tamaḥ||
वह नगरी सदा चंद्रमा की पूर्ण चांदनी की किरणों से देदीप्यमान रहती थी, जहाँ न कभी कृष्णपक्ष होता, न अमावस्या, और न ही अंधकार।
श्लोक 25 (skanda.5.45.25)
सदैव पुष्पिता श्यामा बाल्यरूपवती यथा। हर्म्यपृष्ठे गवाक्षे च द्वाराजिरगृहांतरे॥
sadaiva puṣpitā śyāmā bālyarūpavatī yathā| harmyapṛṣṭhe gavākṣe ca dvārājiragṛhāṁtare||
सदा पुष्पित, श्यामवर्णा, मानो बाल्यावस्था के सौंदर्य में हो—भवनों की छतों पर, झरोखों में, द्वारों, आँगनों और घरों के भीतर,
श्लोक 26 (skanda.5.45.26)
गिरिगह्वरकुंजेषु गुहाध्वांतांतरेषु च। आश्रमेषु च रम्येषु वनेषूपवनेषु च॥
girigahvarakuṁjeṣu guhādhvāṁtāṁtareṣu ca| āśrameṣu ca ramyeṣu vaneṣūpavaneṣu ca||
पर्वतों की गुफाओं और कुंजों में, गुफाओं के अंधकार के भीतर, रमणीय आश्रमों में, वनों और उपवनों में,
श्लोक 27 (skanda.5.45.27)
गृहदीर्घिकासु रम्यासु शालामालासु सर्वतः। चंद्रज्योत्स्नासमापूर्णा दृश्यंते धवला दिशः॥
gṛhadīrghikāsu ramyāsu śālāmālāsu sarvataḥ| caṁdrajyotsnāsamāpūrṇā dṛśyaṁte dhavalā diśaḥ||
घरों के रमणीय जलाशयों में, तथा सर्वत्र भवनों की पंक्तियों में—चांदनी से परिपूर्ण होकर सभी दिशाएँ श्वेत दिखाई देती थीं।
श्लोक 28 (skanda.5.45.28)
कुमुद्वतीप्रफुल्लानि विराजंते सरांसि च। ज्योतिर्गणसमाकीर्णं शरदीव नभःस्थलम्॥
kumudvatīpraphullāni virājaṁte sarāṁsi ca| jyotirgaṇasamākīrṇaṁ śaradīva nabhaḥsthalam||
कुमुद-पुष्पों से खिले हुए सरोवर सुशोभित होते थे, मानो शरद ऋतु का तारों से भरा आकाश हो।
श्लोक 29 (skanda.5.45.29)
नद्यः सरांसि सर्वाणि वापीकूपसुपल्वलाः। कुमुद्वत्या समाकीर्णा आसीच्चांद्रमसी मही॥
nadyaḥ sarāṁsi sarvāṇi vāpīkūpasupalvalāḥ| kumudvatyā samākīrṇā āsīccāṁdramasī mahī||
नदियाँ, समस्त सरोवर, बावड़ियाँ, कुएँ और तालाब सब कुमुद-पुष्पों से भरे हुए थे; यह पृथ्वी मानो चंद्रमय हो गई थी।
श्लोक 30 (skanda.5.45.30)
यस्मात्सर्वेषु कालेषु प्रफुल्ला च कुमुद्वती। तस्मात्पद्मावती ह्येषा जाता कुमुद्वती पुरी॥
yasmātsarveṣu kāleṣu praphullā ca kumudvatī| tasmātpadmāvatī hyeṣā jātā kumudvatī purī||
चूँकि सभी कालों में यहाँ कुमुद-लता खिली रहती थी, इसलिए यह पद्मावती नगरी ही कुमुद्वती नगरी बन गई।
श्लोक 31 (skanda.5.45.31)
कुमुद्वत्यां नरा ये तु श्राद्धं कुर्युः समाहिताः। न तेषां पितरः स्वर्गाच्च्यवंते हि कदाचन॥
kumudvatyāṁ narā ye tu śrāddhaṁ kuryuḥ samāhitāḥ| na teṣāṁ pitaraḥ svargāccyavaṁte hi kadācana||
कुमुद्वती में जो मनुष्य एकाग्रचित्त होकर श्राद्ध करते हैं, उनके पितर कभी भी स्वर्ग से च्युत नहीं होते।
श्लोक 32 (skanda.5.45.32)
अक्षयं लभते श्राद्धं पितॄणां दत्तमक्षयम्। स्नानं दानं तथा होमो देवताराधनं तथा॥
akṣayaṁ labhate śrāddhaṁ pitṝṇāṁ dattamakṣayam| snānaṁ dānaṁ tathā homo devatārādhanaṁ tathā||
उनका श्राद्ध अक्षय फल देता है, पितरों को दिया गया दान अक्षय होता है; स्नान, दान, हवन तथा देव-आराधना भी—
श्लोक 33 (skanda.5.45.33)
यत्किंचित्क्रियते कर्म तत्सर्वं चाक्षयं भवेत्। एवं कुमुद्वती जाता पुरी व्यास सनातनी॥
yatkiṁcitkriyate karma tatsarvaṁ cākṣayaṁ bhavet| evaṁ kumudvatī jātā purī vyāsa sanātanī||
—जो भी कर्म यहाँ किया जाता है, वह सब अक्षय हो जाता है। इस प्रकार, हे व्यास, यह सनातन नगरी कुमुद्वती बनी।