अवन्ती खण्ड · अध्याय 46
अमरावती नाम कथन
श्लोक 1 (skanda.5.46.1)
सनत्कुमार उवाच। अमरावती यथा जाता पुरी ह्येषा कुशस्थली। शृणु व्यास महाभाग यथा ब्रह्माब्रवीत्सुरान्॥
sanatkumāra uvāca| amarāvatī yathā jātā purī hyeṣā kuśasthalī| śṛṇu vyāsa mahābhāga yathā brahmābravītsurān||
सनत्कुमार ने कहा—हे महाभाग व्यास, सुनो कि यह कुशस्थली नगरी किस प्रकार अमरावती बनी, जैसा ब्रह्मा ने देवताओं से कहा था।
श्लोक 2 (skanda.5.46.2)
तथाहं संप्रवक्ष्यामि विस्तरेण तपोधन। एकदा ब्रह्मणादिष्टः प्रजार्थमृषिसत्तमः॥
tathāhaṁ saṁpravakṣyāmi vistareṇa tapodhana| ekadā brahmaṇādiṣṭaḥ prajārthamṛṣisattamaḥ||
हे तपोधन, वही मैं विस्तार से बताता हूँ—एक बार ब्रह्मा द्वारा संतान की प्राप्ति हेतु आदिष्ट होकर उन ऋषिश्रेष्ठ ने,
श्लोक 3 (skanda.5.46.3)
मारीचः कश्यपस्तेपे तपः परमदुष्करम्। महाकालवने रम्ये दिव्ये स हि महानृषिः॥
mārīcaḥ kaśyapastepe tapaḥ paramaduṣkaram| mahākālavane ramye divye sa hi mahānṛṣiḥ||
मरीचि-पुत्र कश्यप ने रमणीय, दिव्य महाकालवन में अत्यंत दुष्कर तप किया, क्योंकि वे महर्षि थे।
श्लोक 4 (skanda.5.46.4)
शीर्णपत्रानिलाहारो वायुभक्षी जितेन्द्रियः। पूर्णे वर्षसहस्रे तु वागुवाचाशरीरिणी॥
śīrṇapatrānilāhāro vāyubhakṣī jitendriyaḥ| pūrṇe varṣasahasre tu vāguvācāśarīriṇī||
सूखे पत्तों और वायु का आहार करते हुए, इन्द्रियों को जीतकर वे तप करते रहे; सहस्र वर्ष पूर्ण होने पर एक आकाशवाणी हुई।
श्लोक 5 (skanda.5.46.5)
श्रूयतां भो द्विजश्रेष्ठ मम वाक्यमनुत्तमम्। यस्मात्तपसि तपस्तीव्रं फलमुद्दिश्य सुव्रत॥
śrūyatāṁ bho dvijaśreṣṭha mama vākyamanuttamam| yasmāttapasi tapastīvraṁ phalamuddiśya suvrata||
'हे द्विजश्रेष्ठ, मेरा यह उत्तम वचन सुनो—हे सुव्रत, चूँकि तुमने फल की इच्छा से तीव्र तप में तप किया है,'
श्लोक 6 (skanda.5.46.6)
तस्मात्ते संततिस्तात यावच्चंद्रदिवाकरौ। तावत्तिष्ठतु मेदिन्यां यशसा पुत्रपौत्रकैः॥
tasmātte saṁtatistāta yāvaccaṁdradivākarau| tāvattiṣṭhatu medinyāṁ yaśasā putrapautrakaiḥ||
'इसलिए हे तात, तुम्हारी संतान जब तक चंद्र और सूर्य रहेंगे, तब तक पुत्र-पौत्रों सहित यश के साथ इस पृथ्वी पर स्थित रहे।'
श्लोक 7 (skanda.5.46.7)
अदितिस्ते सती भार्या त्वया सहाचरत्तपः। तस्मात्सर्वेषु कालेषु छायाभूता यशस्विनी॥
aditiste satī bhāryā tvayā sahācarattapaḥ| tasmātsarveṣu kāleṣu chāyābhūtā yaśasvinī||
'तुम्हारी सती पत्नी अदिति ने तुम्हारे साथ तप किया है; इसलिए वह सभी कालों में यशस्विनी होकर तुम्हारी छाया बनी रहेगी।'
श्लोक 8 (skanda.5.46.8)
भविष्यंति सुताः सर्वे विष्णुश्चेंद्रपुरोगमाः। अमरा निर्जरा देवा दिवि ख्याताः सदैव हि॥
bhaviṣyaṁti sutāḥ sarve viṣṇuśceṁdrapurogamāḥ| amarā nirjarā devā divi khyātāḥ sadaiva hi||
'तुम्हारे सभी पुत्र विष्णु और इन्द्र के नेतृत्व में देवता बनेंगे—अमर, जरारहित, तथा स्वर्ग में सदा प्रसिद्ध।'
श्लोक 9 (skanda.5.46.9)
त्वं चापि च ऋषिश्रेष्ठः प्रजापतिरकल्मषः। भविष्यसि न संदेहो ममवाक्याद्द्विजोत्तम॥
tvaṁ cāpi ca ṛṣiśreṣṭhaḥ prajāpatirakalmaṣaḥ| bhaviṣyasi na saṁdeho mamavākyāddvijottama||
'हे द्विजोत्तम, तुम भी ऋषिश्रेष्ठ होकर निष्कलंक प्रजापति बनोगे; मेरे वचन से इसमें कोई संदेह नहीं।'
श्लोक 10 (skanda.5.46.10)
इत्युक्त्वा च पुनर्देवी तत्रैवांतरधीयत। तदारभ्य पुरीं व्यास कुशस्थलीमनुत्तमाम्॥
ityuktvā ca punardevī tatraivāṁtaradhīyata| tadārabhya purīṁ vyāsa kuśasthalīmanuttamām||
ऐसा कहकर वह देववाणी वहीं अंतर्धान हो गई। हे व्यास, तभी से उस अनुपम कुशस्थली नगरी में,
श्लोक 11 (skanda.5.46.11)
कश्यपः सह दाक्षिण्या साग्निकः समुपाश्रितः। प्रजापि ववृधे तस्मात्सदेवासुरमानुषा॥
kaśyapaḥ saha dākṣiṇyā sāgnikaḥ samupāśritaḥ| prajāpi vavṛdhe tasmātsadevāsuramānuṣā||
कश्यप अपनी पत्नी दाक्षायणी तथा अपने अग्निहोत्र सहित निवास करने लगे; उनसे देव, असुर और मनुष्यों सहित प्रजा बढ़ी।
श्लोक 12 (skanda.5.46.12)
मरीचेः कश्यपो जज्ञे ततः सर्वं प्रतिष्ठितम्। सुधापानकृतो देवाः शश्वत्तेनामराः कृताः॥
marīceḥ kaśyapo jajñe tataḥ sarvaṁ pratiṣṭhitam| sudhāpānakṛto devāḥ śaśvattenāmarāḥ kṛtāḥ||
मरीचि से कश्यप उत्पन्न हुए, और उन्हीं से सब कुछ प्रतिष्ठित हुआ; उन्हीं के द्वारा देवता अमृत-पान करके सदा के लिए अमर बनाए गए।
श्लोक 13 (skanda.5.46.13)
नंदनं चापि तत्रैव महाकालवनोत्तमे। कामधेनुः समाख्याता मनोरथवरप्रदा॥
naṁdanaṁ cāpi tatraiva mahākālavanottame| kāmadhenuḥ samākhyātā manorathavarapradā||
उस उत्तम महाकालवन में नंदनवन भी था; तथा मनोरथ-वर प्रदान करने वाली कामधेनु भी वहीं प्रसिद्ध थी,
श्लोक 14 (skanda.5.46.14)
सा सिषेवे सदा तत्र महाकालं महेश्वरम्। पारिजाततरुश्रेष्ठस्तथा चाम्लानपंकजम्॥
sā siṣeve sadā tatra mahākālaṁ maheśvaram| pārijātataruśreṣṭhastathā cāmlānapaṁkajam||
जो सदा वहाँ महेश्वर महाकाल की सेवा करती थी; वहाँ श्रेष्ठ पारिजात वृक्ष तथा कभी न कुम्हलाने वाला कमल भी था।
श्लोक 15 (skanda.5.46.15)
बिंदुसरः समाख्यातं मानसं सर उत्तमम्। हंससारससमाकीर्णं सुरसिद्धनिषेवितम्॥
biṁdusaraḥ samākhyātaṁ mānasaṁ sara uttamam| haṁsasārasasamākīrṇaṁ surasiddhaniṣevitam||
बिन्दुसर नाम से प्रसिद्ध उत्तम मानस सरोवर वहाँ था, जो हंसों और सारसों से भरा हुआ, देवताओं और सिद्धों से सेवित था।
श्लोक 16 (skanda.5.46.16)
मुक्तामणिगणाकीर्णं रत्नशोभनशोभितम्। निधिरेष महापद्मः कह्लारकुमुदोज्ज्वलः॥
muktāmaṇigaṇākīrṇaṁ ratnaśobhanaśobhitam| nidhireṣa mahāpadmaḥ kahlārakumudojjvalaḥ||
मोतियों और मणियों के समूहों से भरा, सुंदर रत्नों से सुशोभित; यह महापद्म निधि कमलिनी और कुमुद-पुष्पों से देदीप्यमान था।
श्लोक 17 (skanda.5.46.17)
यानि यानि च दिव्यानि संति ब्रह्माण्डगोलके। तानि सर्वाणि तिष्ठंति महाकालवने शुभे॥
yāni yāni ca divyāni saṁti brahmāṇḍagolake| tāni sarvāṇi tiṣṭhaṁti mahākālavane śubhe||
इस ब्रह्माण्ड में जो-जो भी दिव्य वस्तुएँ हैं, वे सभी उस मंगलमय महाकालवन में विद्यमान रहती हैं।
श्लोक 18 (skanda.5.46.18)
तेनतेनात्मयोगेन मानवाश्चात्र संस्थिताः। तदाहारास्तदाचारास्तद्रूपास्तत्पराक्रमाः॥
tenatenātmayogena mānavāścātra saṁsthitāḥ| tadāhārāstadācārāstadrūpāstatparākramāḥ||
उसी दिव्य संयोग से यहाँ बसे हुए मनुष्य भी वैसा ही आहार, वैसा ही आचार, वैसा ही रूप, तथा वैसा ही पराक्रम पाते हैं।
श्लोक 19 (skanda.5.46.19)
अन्योन्यं च समाकीर्णा सर्वे चामरसंनिभाः। विचरंति यथा देवाः पुरीमेतां जना भुवि॥
anyonyaṁ ca samākīrṇā sarve cāmarasaṁnibhāḥ| vicaraṁti yathā devāḥ purīmetāṁ janā bhuvi||
एक-दूसरे के साथ भरे हुए, सभी देवताओं के समान होकर, यहाँ के लोग इस नगरी में देवताओं के समान विचरण करते हैं।
श्लोक 20 (skanda.5.46.20)
अमरांगनासमा नार्यः सदैव स्थिरयौवनाः। ईदृशी च पुरी दृष्टा भुवि व्यास सनातनी॥
amarāṁganāsamā nāryaḥ sadaiva sthirayauvanāḥ| īdṛśī ca purī dṛṣṭā bhuvi vyāsa sanātanī||
यहाँ की स्त्रियाँ देवांगनाओं के समान, सदा स्थिर यौवन वाली होती हैं। हे व्यास, ऐसी ही यह सनातन नगरी पृथ्वी पर देखी गई।
श्लोक 21 (skanda.5.46.21)
देवदानवगन्धर्वैः किन्नरोरगराक्षसैः। भुक्तिमुक्तिप्रदा नित्या बहुकालफलप्रदा॥
devadānavagandharvaiḥ kinnaroragarākṣasaiḥ| bhuktimuktipradā nityā bahukālaphalapradā||
देव, दानव, गन्धर्व, किन्नर, नाग और राक्षसों द्वारा सेवित यह नित्य नगरी भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करने वाली, तथा दीर्घकाल तक फल देने वाली है।
श्लोक 22 (skanda.5.46.22)
अमराणां कटकं ह्यत्र तस्माजातामरावती। य एतस्यां महाभागाः प्रसंगेन समागताः॥
amarāṇāṁ kaṭakaṁ hyatra tasmājātāmarāvatī| ya etasyāṁ mahābhāgāḥ prasaṁgena samāgatāḥ||
यहाँ देवताओं का शिविर होने के कारण यह अमरावती बनी। हे महाभागो, जो लोग किसी प्रसंगवश भी यहाँ आ जाते हैं,
श्लोक 23 (skanda.5.46.23)
स्नानदानादिकं कृत्वा पश्यत्येव महेश्वरम्। न तेषां दुर्लभं किञ्चित्पुत्रतो धनतोऽपि वा॥
snānadānādikaṁ kṛtvā paśyatyeva maheśvaram| na teṣāṁ durlabhaṁ kiñcitputrato dhanato'pi vā||
स्नान-दान आदि करके महेश्वर का दर्शन करते हैं, उनके लिए पुत्र अथवा धन से कुछ भी दुर्लभ नहीं रहता।
श्लोक 24 (skanda.5.46.24)
सर्वभोगानवाप्नोति मृतः शिवपुरं व्रजेत्। पठनाच्छ्रवणाद्वापि शतरुद्रियफलं लभेत्॥
sarvabhogānavāpnoti mṛtaḥ śivapuraṁ vrajet| paṭhanācchravaṇādvāpi śatarudriyaphalaṁ labhet||
वे समस्त भोगों को प्राप्त करते हैं, और मृत्यु के पश्चात् शिवपुर को जाते हैं। इस कथा के पठन या श्रवण से मनुष्य सौ शतरुद्रिय पाठों का फल पाता है।