अवन्ती खण्ड · अध्याय 47
विशाला अभिधान कथन
श्लोक 1 (skanda.5.47.1)
सनत्कुमार उवाच। शृणु व्यास महाभाग पुरी ह्येषामरावती। विशाला च समाख्याता सर्वलोकेषु गीयते॥
sanatkumāra uvāca| śṛṇu vyāsa mahābhāga purī hyeṣāmarāvatī| viśālā ca samākhyātā sarvalokeṣu gīyate||
सनत्कुमार ने कहा—हे महाभाग व्यास, सुनो—यह अमरावती नगरी विशाला नाम से भी जानी जाती है, और समस्त लोकों में गाई जाती है।
श्लोक 2 (skanda.5.47.2)
तथाहं संप्रवक्ष्यामि ब्रह्मणा कथितं पुरा। गुह्याद्गुह्यतरं क्षेत्रं सर्वपापप्रणाशनम्॥
tathāhaṁ saṁpravakṣyāmi brahmaṇā kathitaṁ purā| guhyādguhyataraṁ kṣetraṁ sarvapāpapraṇāśanam||
वही मैं बताता हूँ, जो पूर्वकाल में ब्रह्मा ने कहा था—गुह्य से भी अधिक गुह्य, समस्त पापों का नाश करने वाला यह क्षेत्र।
श्लोक 3 (skanda.5.47.3)
उमया सहितो देव एक एवाचरद्वने। ततो भूतगणाः सर्वे पश्चात्सर्वे सुरासुराः॥
umayā sahito deva eka evācaradvane| tato bhūtagaṇāḥ sarve paścātsarve surāsurāḥ||
उमा सहित देव पहले उस वन में अकेले ही विचरण करते थे; फिर समस्त भूतगण, और उसके पश्चात् सभी देव-असुर वहाँ आए।
श्लोक 4 (skanda.5.47.4)
विष्णुर्दशाकृतिर्यत्र देव्यो वै लोकमातरः। विनायकाश्च वैतालाः कूष्मांडा भैरवादयः॥
viṣṇurdaśākṛtiryatra devyo vai lokamātaraḥ| vināyakāśca vaitālāḥ kūṣmāṁḍā bhairavādayaḥ||
जहाँ दस अवतारों वाले विष्णु, लोकमाता देवियाँ, विनायक, वैताल, कूष्मांड तथा भैरव आदि—
श्लोक 5 (skanda.5.47.5)
कल्पोद्भेदाश्च लिंगाश्च चतुराशीतिसंख्यकाः। क्षेत्राणि क्षेत्रपालाश्च ऋद्धिः सिद्धिस्तथैव च॥
kalpodbhedāśca liṁgāśca caturāśītisaṁkhyakāḥ| kṣetrāṇi kṣetrapālāśca ṛddhiḥ siddhistathaiva ca||
चौरासी की संख्या में कल्पोद्भेद लिंग, क्षेत्र और क्षेत्रपाल, तथा ऋद्धि-सिद्धि भी,
श्लोक 6 (skanda.5.47.6)
पितरो लोकपालाश्च सिद्धाः सिद्धिप्रदाश्च ये। ऋषयश्च महाभागा ऋषिपत्न्योऽमलाशयाः॥
pitaro lokapālāśca siddhāḥ siddhipradāśca ye| ṛṣayaśca mahābhāgā ṛṣipatnyo'malāśayāḥ||
पितर, लोकपाल, सिद्ध तथा सिद्धिप्रद देवगण, महाभाग ऋषिगण और निर्मल हृदय वाली ऋषि-पत्नियाँ,
श्लोक 7 (skanda.5.47.7)
किंनरा देवगन्धर्वा ह्यप्सराश्च वरांगनाः। मरुद्गणाश्च ये सर्वे साधकानां गणाश्च ये॥
kiṁnarā devagandharvā hyapsarāśca varāṁganāḥ| marudgaṇāśca ye sarve sādhakānāṁ gaṇāśca ye||
किन्नर, देवगन्धर्व, तथा उत्तम अप्सराएँ, समस्त मरुद्गण, और साधकों के समूह भी—
श्लोक 8 (skanda.5.47.8)
यक्षा गुह्यकसंघाश्च पिशाचोरगराक्षसाः। स्थावरा जंगमाः सर्वे ध्यानं मानसमाश्रिताः॥
yakṣā guhyakasaṁghāśca piśācoragarākṣasāḥ| sthāvarā jaṁgamāḥ sarve dhyānaṁ mānasamāśritāḥ||
यक्ष, गुह्यक-समूह, पिशाच, नाग तथा राक्षस, तथा समस्त स्थावर-जंगम—सबने मानसिक ध्यान का आश्रय लेकर,
श्लोक 9 (skanda.5.47.9)
उपासांचक्रिरे तत्र देवदेवमुमापतिम्। तान्दृष्ट्वा सा तदा देवी पार्वती गिरिजा तदा। उवाच श्लक्ष्णया वाचा शंकरं जगदाश्रयम्॥
upāsāṁcakrire tatra devadevamumāpatim| tāndṛṣṭvā sā tadā devī pārvatī girijā tadā| uvāca ślakṣṇayā vācā śaṁkaraṁ jagadāśrayam||
और वहाँ देवदेव उमापति की उपासना की। उन्हें देखकर तब पर्वतपुत्री देवी पार्वती ने मृदु वाणी में जगदाश्रय शंकर से कहा।
श्लोक 10 (skanda.5.47.10)
पार्वत्युवाच। देवदेव जगन्नाथ जगदाधारतत्पर। पश्य एतान्महाभागान्ध्यायमानांस्तवाश्रितान्॥
pārvatyuvāca| devadeva jagannātha jagadādhāratatpara| paśya etānmahābhāgāndhyāyamānāṁstavāśritān||
पार्वती ने कहा—हे देवदेव, हे जगन्नाथ, जगत् के आधार में तत्पर रहने वाले, इन महाभाग जनों को देखिए, जो आपकी शरण में ध्यानरत हैं।
श्लोक 11 (skanda.5.47.11)
नानुपेक्ष्याश्च तान्सर्वान्वातवर्षातपार्दितान्। कल्पय त्वं महाभाग एतेषामात्मनो हितम्॥
nānupekṣyāśca tānsarvānvātavarṣātapārditān| kalpaya tvaṁ mahābhāga eteṣāmātmano hitam||
'वायु, वर्षा और धूप से पीड़ित इन सबकी उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए; हे महाभाग, आप स्वयं इनके हित का उपाय कीजिए।'
श्लोक 12 (skanda.5.47.12)
यथायोग्यं वासनार्थं स्थानं परमशोभनम्। पुरीं कल्पय मे नाथ वासार्थं सर्वकामदाम्॥
yathāyogyaṁ vāsanārthaṁ sthānaṁ paramaśobhanam| purīṁ kalpaya me nātha vāsārthaṁ sarvakāmadām||
'उनके निवास के लिए यथायोग्य, परम शोभन स्थान बनाइए। हे नाथ, मेरे लिए भी उनके निवासार्थ सर्वकामदा नगरी की रचना कीजिए।'
श्लोक 13 (skanda.5.47.13)
एषा मे वासना स्वामिन्भवतां यदि रोचते। इति श्रुत्वा वचस्तस्याः पार्वत्याः परमेश्वरः॥
eṣā me vāsanā svāminbhavatāṁ yadi rocate| iti śrutvā vacastasyāḥ pārvatyāḥ parameśvaraḥ||
'हे स्वामी, यही मेरी इच्छा है, यदि आपको रुचिकर हो।' पार्वती के इस वचन को सुनकर परमेश्वर ने,
श्लोक 14 (skanda.5.47.14)
कल्पयामास पुरीं रम्यां सर्वभूतमनोरमाम्। आत्मनोपि हितां पुण्यां शंभुः सर्वात्मना तदा। बहुयोजनविस्तीर्णां दिव्यां दिव्यजनप्रियाम्॥
kalpayāmāsa purīṁ ramyāṁ sarvabhūtamanoramām| ātmanopi hitāṁ puṇyāṁ śaṁbhuḥ sarvātmanā tadā| bahuyojanavistīrṇāṁ divyāṁ divyajanapriyām||
—अपने सम्पूर्ण अस्तित्व से, समस्त प्राणियों को मनभावन, स्वयं के लिए भी हितकारी और पुण्यमयी, अनेक योजनों में विस्तृत, दिव्य, तथा दिव्यजनों को प्रिय ऐसी रमणीय नगरी की रचना की।
श्लोक 15 (skanda.5.47.15)
दिव्याभिप्रायसंयुक्तां दिव्यस्थानमनोरमाम्। दिव्यसर्वगुणोपेता विशालां विरजां शुभाम्॥
divyābhiprāyasaṁyuktāṁ divyasthānamanoramām| divyasarvaguṇopetā viśālāṁ virajāṁ śubhām||
दिव्य उद्देश्य से युक्त, दिव्य स्थान के समान मनोहर, समस्त दिव्य गुणों से युक्त, विशाल, निर्मल और मंगलमय।
श्लोक 16 (skanda.5.47.16)
क्रयविक्रयसंपन्नहट्टाट्टालकचत्वराम्। बहुहर्म्यगृहाकीर्णां सौधपंक्तिविराजिताम्॥
krayavikrayasaṁpannahaṭṭāṭṭālakacatvarām| bahuharmyagṛhākīrṇāṁ saudhapaṁktivirājitām||
क्रय-विक्रय से सम्पन्न बाजारों, अट्टालिकाओं और चौकों वाली, अनेक भवनों-गृहों से भरी, राजमहलों की पंक्तियों से सुशोभित।
श्लोक 17 (skanda.5.47.17)
स्फाटिकाभित्तिरचितां वैडूर्यमणिभूमिकाम्। प्रवालस्तंभप्रवरां हेमाभरणसंभराम्॥
sphāṭikābhittiracitāṁ vaiḍūryamaṇibhūmikām| pravālastaṁbhapravarāṁ hemābharaṇasaṁbharām||
स्फटिक की दीवारों से बनी, वैडूर्यमणि की भूमि वाली, श्रेष्ठ मूँगे के स्तंभों वाली, स्वर्णाभूषणों से भरी हुई।
श्लोक 18 (skanda.5.47.18)
आरक्तमणिदेहल्यां द्वारशाखाभिमंडिताम्। जांबूनदकपाटाढ्यां वज्रार्गलसुसंस्कृताम्॥
āraktamaṇidehalyāṁ dvāraśākhābhimaṁḍitām| jāṁbūnadakapāṭāḍhyāṁ vajrārgalasusaṁskṛtām||
लाल मणियों की देहलियों वाली, द्वार-शाखाओं से अलंकृत, स्वर्ण के किवाड़ों से समृद्ध, वज्र की सांकलों से सुसज्जित।
श्लोक 19 (skanda.5.47.19)
मणिरत्नसमाभूमिद्वाराजिरगृहांतराम्। घोषजालातिरम्यां च मुक्तादामविलंबिनीम्॥
maṇiratnasamābhūmidvārājiragṛhāṁtarām| ghoṣajālātiramyāṁ ca muktādāmavilaṁbinīm||
द्वारों, आँगनों और घरों के भीतर मणि-रत्नों से समतल भूमि वाली, गूँजते हुए घंटा-जाल से अत्यंत रमणीय, मोतियों की लड़ियों से लटकी हुई।
श्लोक 20 (skanda.5.47.20)
हेमस्तंभध्वजोपेताः पताकाश्च गृहेगृहे। कलशाश्च विराजंते मणिहेमाचिता गृहे॥
hemastaṁbhadhvajopetāḥ patākāśca gṛhegṛhe| kalaśāśca virājaṁte maṇihemācitā gṛhe||
प्रत्येक घर में स्वर्ण-स्तंभों पर ध्वजाएँ और पताकाएँ फहराती थीं; प्रत्येक घर में मणि-स्वर्ण से जड़े कलश सुशोभित होते थे।
श्लोक 21 (skanda.5.47.21)
वापीकूपतडागानि सरांसि विमलानि च। पद्मकिंजल्कगंधीनि जलयंत्रोपशोभिताम्॥
vāpīkūpataḍāgāni sarāṁsi vimalāni ca| padmakiṁjalkagaṁdhīni jalayaṁtropaśobhitām||
बावड़ियाँ, कुएँ, तालाब तथा निर्मल सरोवर कमल-पराग की सुगंध से भरे, जलयंत्रों से सुशोभित थे।
श्लोक 22 (skanda.5.47.22)
हंसकारंडवाकीर्णां शिखंडिगणशोभिताम्। जलयंत्रकृताधारां गृहवापीवनाकराम्॥
haṁsakāraṁḍavākīrṇāṁ śikhaṁḍigaṇaśobhitām| jalayaṁtrakṛtādhārāṁ gṛhavāpīvanākarām||
हंसों और कारंडवों से भरी, मयूर-समूहों से सुशोभित, जलयंत्रों के आधार वाली, घरों के जलाशयों और वनों से समृद्ध।
श्लोक 23 (skanda.5.47.23)
क्वचिन्नृत्यंति मयूराः क्वचित्कूजंति कोकिलाः। भ्रमरावलीढपुष्पाढ्यस्तबका वनराजयः॥
kvacinnṛtyaṁti mayūrāḥ kvacitkūjaṁti kokilāḥ| bhramarāvalīḍhapuṣpāḍhyastabakā vanarājayaḥ||
कहीं मोर नृत्य करते थे, कहीं कोयलें कूजती थीं; वनों की पंक्तियाँ भ्रमरों द्वारा चखे गए पुष्पों के गुच्छों से समृद्ध थीं।
श्लोक 24 (skanda.5.47.24)
नरनारीगणाकीर्णां वर्णाश्रमनिषेविताम्। हर्म्यांतरागता नार्यो विलोकनपरा बभुः॥
naranārīgaṇākīrṇāṁ varṇāśramaniṣevitām| harmyāṁtarāgatā nāryo vilokanaparā babhuḥ||
स्त्री-पुरुषों के समूहों से भरी, वर्णाश्रम-धर्मियों से सेवित; भवनों में आई हुई स्त्रियाँ (बाहर) देखने में तत्पर दिखाई देती थीं।
श्लोक 25 (skanda.5.47.25)
चंद्रमालाकृतश्रेणीतोरणानीव च शोभते। एवं व्यास पुरी रम्या आत्मयोगेन वासिता॥
caṁdramālākṛtaśreṇītoraṇānīva ca śobhate| evaṁ vyāsa purī ramyā ātmayogena vāsitā||
यह ऐसी शोभित होती थी मानो उसके तोरणों की पंक्तियाँ चंद्र-मालाओं से गुंथी हों। हे व्यास, इस प्रकार यह रमणीय नगरी शिव के अपने योग-सामर्थ्य से बसाई गई।
श्लोक 26 (skanda.5.47.26)
यत्रालकापुरी रम्या कुबेरभवनांकिता। धवला पुण्यजनैः कीर्णा पक्षिभिश्चोपशोभिता॥
yatrālakāpurī ramyā kuberabhavanāṁkitā| dhavalā puṇyajanaiḥ kīrṇā pakṣibhiścopaśobhitā||
जिसमें कुबेर के भवन से चिह्नित रमणीय अलकापुरी, धवल वर्ण की, पुण्यजनों से भरी और पक्षियों से सुशोभित—
श्लोक 27 (skanda.5.47.27)
तत्र भोगवती दिव्या वरुणालय उत्तमः। नागकन्याभिरुग्राभिर्नागपत्नीभिः संकुला॥
tatra bhogavatī divyā varuṇālaya uttamaḥ| nāgakanyābhirugrābhirnāgapatnībhiḥ saṁkulā||
—तथा वहाँ दिव्य भोगवती, वरुण का उत्तम आवास, उग्र नाग-कन्याओं और नाग-पत्नियों से भरी हुई थी।
श्लोक 28 (skanda.5.47.28)
संयमनीपुरी श्रेष्ठा धर्मराजेन पालिता। सदाचारजनैः पूर्णा कृता कृतविचक्षणैः॥
saṁyamanīpurī śreṣṭhā dharmarājena pālitā| sadācārajanaiḥ pūrṇā kṛtā kṛtavicakṣaṇaiḥ||
धर्मराज द्वारा रक्षित श्रेष्ठ संयमनी नगरी, सदाचारी और कर्मकुशल जनों से परिपूर्ण—
श्लोक 29 (skanda.5.47.29)
देवतानां पुरी रम्या वासवेनाभिरक्षिता। पुण्यस्त्रीणां गणाकीर्णा किन्नरोद्गीतमंडिता॥
devatānāṁ purī ramyā vāsavenābhirakṣitā| puṇyastrīṇāṁ gaṇākīrṇā kinnarodgītamaṁḍitā||
तथा वासव द्वारा सुरक्षित देवताओं की रमणीय नगरी, पुण्यशील स्त्रियों से भरी, किन्नरों के गीतों से सुशोभित—
श्लोक 30 (skanda.5.47.30)
एवंविधानि रम्याणि पुरा बहुतराणि च। बहुविस्तीर्णमानानि शुभ्राण्यतितराणि च॥
evaṁvidhāni ramyāṇi purā bahutarāṇi ca| bahuvistīrṇamānāni śubhrāṇyatitarāṇi ca||
—इस प्रकार की अनेक रमणीय, विस्तृत, अत्यंत उज्ज्वल नगरियाँ थीं, जिन्हें यह नगरी अतिक्रम कर गई।
श्लोक 31 (skanda.5.47.31)
क्वचिद्रंभाकृतद्वारा यवांकुरघटाः शुभाः। क्वचिद्गायन्ति गन्धर्वाः क्वचिन्नृत्यंति नर्तकाः॥
kvacidraṁbhākṛtadvārā yavāṁkuraghaṭāḥ śubhāḥ| kvacidgāyanti gandharvāḥ kvacinnṛtyaṁti nartakāḥ||
कहीं केले के तनों से बने द्वार और जौ के अंकुरों से भरे मंगल-कलश थे; कहीं गन्धर्व गाते थे, कहीं नर्तक नृत्य करते थे।
श्लोक 32 (skanda.5.47.32)
क्वचिद्बालाः पठंति स्म वेदाध्ययनका द्विजाः। क्वचिद्यज्ञान्यजंति स्म यजमानाः सऋत्विजः॥
kvacidbālāḥ paṭhaṁti sma vedādhyayanakā dvijāḥ| kvacidyajñānyajaṁti sma yajamānāḥ saṛtvijaḥ||
कहीं द्विज बालक वेदाध्ययन में लगे थे; कहीं यजमान अपने ऋत्विजों सहित यज्ञ सम्पन्न कर रहे थे।
श्लोक 33 (skanda.5.47.33)
क्वचिच्चावभृथस्नाताः क्वचिद्दानान्यकुर्वत। क्वचित्क्वचित्तूपनयनं विवाहाग्निपरिग्रहम्॥
kvaciccāvabhṛthasnātāḥ kvaciddānānyakurvata| kvacitkvacittūpanayanaṁ vivāhāgniparigraham||
कहीं लोग अवभृथ-स्नान कर रहे थे, कहीं दान दे रहे थे; कहीं-कहीं उपनयन, विवाह और अग्नि-परिग्रह के संस्कार हो रहे थे।
श्लोक 34 (skanda.5.47.34)
क्वचिदारामपूर्तं वै क्वचिद्यात्रावधारणम्। वापीकूपतडागानां तथैव विधिपूर्वकम्॥
kvacidārāmapūrtaṁ vai kvacidyātrāvadhāraṇam| vāpīkūpataḍāgānāṁ tathaiva vidhipūrvakam||
कहीं उद्यान-निर्माण का पुण्यकर्म हो रहा था, कहीं यात्रा का निश्चय हो रहा था; वैसे ही विधिपूर्वक बावड़ियों, कुओं और तालाबों का निर्माण भी हो रहा था।
श्लोक 35 (skanda.5.47.35)
क्वचित्कथाप्रसंगांश्च परिशंसंति वाचकाः। क्वचिद्गाथाः प्रकुर्वंति कवयः पुर उत्तमे॥
kvacitkathāprasaṁgāṁśca pariśaṁsaṁti vācakāḥ| kvacidgāthāḥ prakurvaṁti kavayaḥ pura uttame||
उस उत्तम नगरी में कहीं कथावाचक कथा-प्रसंग सुनाते थे, कहीं कवि गाथाओं की रचना करते थे।
श्लोक 36 (skanda.5.47.36)
क्वचिन्मल्ला नियुध्यंते नटा नाट्यपराः क्वचित्। तडागानि विराजंते मणिसोपानपंक्तिभिः॥
kvacinmallā niyudhyaṁte naṭā nāṭyaparāḥ kvacit| taḍāgāni virājaṁte maṇisopānapaṁktibhiḥ||
कहीं मल्ल कुश्ती लड़ते थे, कहीं नट नाट्य में लीन रहते थे; तालाब मणियों की सीढ़ियों की पंक्तियों से सुशोभित थे।
श्लोक 37 (skanda.5.47.37)
चंचलाश्चपला बालाः श्यामाः षोडशवार्षिकाः। वारिहारपरास्तत्र मणिहेमघटोत्कटाः॥
caṁcalāścapalā bālāḥ śyāmāḥ ṣoḍaśavārṣikāḥ| vārihāraparāstatra maṇihemaghaṭotkaṭāḥ||
चंचल, चपल, श्यामवर्णा, सोलह वर्ष की युवतियाँ वहाँ मणि-स्वर्ण के भारी घड़ों से जल भरने में लगी रहती थीं।
श्लोक 38 (skanda.5.47.38)
एवं व्यास पुरी रम्या निर्मिता योगमायया। शंभुना सर्वपापघ्नी प्रियाप्रियचिकीर्षया॥
evaṁ vyāsa purī ramyā nirmitā yogamāyayā| śaṁbhunā sarvapāpaghnī priyāpriyacikīrṣayā||
हे व्यास, इस प्रकार यह समस्त पापों का नाश करने वाली रमणीय नगरी शंभु द्वारा अपनी प्रिया को प्रसन्न करने की इच्छा से योगमाया द्वारा रची गई।
श्लोक 39 (skanda.5.47.39)
विशाला बहुविस्तीर्णा पुण्या पुण्यजनाश्रया। तस्मात्सर्वेषु कालेषु सर्वलोकेषु गीयते॥
viśālā bahuvistīrṇā puṇyā puṇyajanāśrayā| tasmātsarveṣu kāleṣu sarvalokeṣu gīyate||
अत्यंत विस्तीर्ण, पुण्यमयी, पुण्यजनों के आश्रयस्वरूप यह विशाला नगरी, इसीलिए सभी कालों में समस्त लोकों में गाई जाती है।
श्लोक 40 (skanda.5.47.40)
विशालेति समाख्याता पुरी रम्या सनातनी। यत्रतत्र स्थितो वापि सर्वावस्थां गतोऽपि वा॥
viśāleti samākhyātā purī ramyā sanātanī| yatratatra sthito vāpi sarvāvasthāṁ gato'pi vā||
यह रमणीय, सनातन नगरी विशाला नाम से प्रसिद्ध है। कहीं भी स्थित होकर, अथवा किसी भी अवस्था में पहुँचकर भी,
श्लोक 41 (skanda.5.47.41)
विशालेति वदेन्नित्यं शिवलोके महीयते। ईदृशी न पुरीव्यास भुवि ब्रह्मांडगोलके॥
viśāleti vadennityaṁ śivaloke mahīyate| īdṛśī na purīvyāsa bhuvi brahmāṁḍagolake||
जो सदा 'विशाला' कहता है, वह शिवलोक में पूजित होता है। हे व्यास, इस ब्रह्माण्ड-गोलक में पृथ्वी पर ऐसी कोई नगरी नहीं है,
श्लोक 42 (skanda.5.47.42)
विशाला सदृशी चान्या भुक्तिमुक्तिप्रदा नृणाम्। पितॄनुद्दिश्य कुर्वंति श्राद्धं काले नरा यदि॥
viśālā sadṛśī cānyā bhuktimuktipradā nṛṇām| pitṝnuddiśya kurvaṁti śrāddhaṁ kāle narā yadi||
जो मनुष्यों को भोग और मोक्ष दोनों देने में विशाला के समान हो। यदि मनुष्य यहाँ उचित समय पर पितरों के लिए श्राद्ध करें,
श्लोक 43 (skanda.5.47.43)
तदक्षयं भवेत्तेषां पितृकल्पे च गीयते। स्नानदानादिकं यैस्तु विशालायां प्रसंगतः॥
tadakṣayaṁ bhavetteṣāṁ pitṛkalpe ca gīyate| snānadānādikaṁ yaistu viśālāyāṁ prasaṁgataḥ||
तो वह उनके लिए अक्षय होता है, जैसा पितृकल्प में कहा गया है। और जो लोग किसी भी प्रसंगवश विशाला में स्नान-दान आदि करते हैं,
श्लोक 44 (skanda.5.47.44)
यत्र कुत्र गतास्ते वै मृता यांति शिवालयम्। धन्याः पुण्यतमा लोके प्रीतिर्येषां सदाचला॥
yatra kutra gatāste vai mṛtā yāṁti śivālayam| dhanyāḥ puṇyatamā loke prītiryeṣāṁ sadācalā||
वे बाद में चाहे जहाँ भी जाएँ, मृत्यु के पश्चात् शिवलोक को जाते हैं। धन्य और परम पुण्यशाली हैं वे लोग, जिनका प्रेम सदा अचल रहता है।
श्लोक 45 (skanda.5.47.45)
विशालायां फलं शश्वच्छेषः शक्तो न वर्णितुम्। कथाश्रवणमात्रेण वाच्यमानेन तत्क्षणात्। महापापोद्भवात्पापान्मुच्यते नात्र संशयः॥
viśālāyāṁ phalaṁ śaśvaccheṣaḥ śakto na varṇitum| kathāśravaṇamātreṇa vācyamānena tatkṣaṇāt| mahāpāpodbhavātpāpānmucyate nātra saṁśayaḥ||
विशाला के शाश्वत फल का वर्णन करने में स्वयं शेषनाग भी समर्थ नहीं हैं। इस कथा को सुनाए जाते समय केवल उसके श्रवण मात्र से ही मनुष्य महापाप से उत्पन्न पापों से भी तत्काल मुक्त हो जाता है, इसमें कोई संदेह नहीं।
श्लोक 46 (skanda.5.47.46)
एवं व्यास पुरी जाता विशाला च कुशस्थली। प्रतिकल्पा यथा जाता तथा मे शृणु भाषतः॥
evaṁ vyāsa purī jātā viśālā ca kuśasthalī| pratikalpā yathā jātā tathā me śṛṇu bhāṣataḥ||
इस प्रकार, हे व्यास, कुशस्थली नगरी विशाला बनी। अब मुझसे सुनो कि यह प्रत्येक कल्प में किस प्रकार उत्पन्न होती है।