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अवन्ती खण्ड · अध्याय 51

अमृतोद्भवा नाम कथा वर्णन

अध्याय 50अध्याय-सूचीअध्याय 52

श्लोक 1 (skanda.5.51.1)

सनत्कुमार उवाच। शृणु व्यास महाबुद्धे शिप्रामाहात्म्यमुत्तमम्। यथाऽमृतभवा ख्याता पाताले नागसंमते॥

sanatkumāra uvāca| śṛṇu vyāsa mahābuddhe śiprāmāhātmyamuttamam| yathā'mṛtabhavā khyātā pātāle nāgasaṁmate||

सनत्कुमार ने कहा—हे महाबुद्धिमान व्यास, शिप्रा के उत्तम माहात्म्य को सुनो—किस प्रकार वह नागों से सम्मानित पाताल में 'अमृतभवा' नाम से विख्यात हुई।

श्लोक 2 (skanda.5.51.2)

एकदा रुद्रो भिक्षार्थं नागलोके बुभुक्षितः। करे कपालमादाय भोगवत्यां समागतः॥

ekadā rudro bhikṣārthaṁ nāgaloke bubhukṣitaḥ| kare kapālamādāya bhogavatyāṁ samāgataḥ||

एक बार भूखे रुद्र भिक्षा के लिए नागलोक में हाथ में कपाल लेकर भोगवती नगरी में आए।

श्लोक 3 (skanda.5.51.3)

भिक्षां देहि वचो दीनं वाचयित्वा गृहेगृहे। भिक्षा केनापि नो दत्ता क्षुधितस्य च धूर्जटेः॥

bhikṣāṁ dehi vaco dīnaṁ vācayitvā gṛhegṛhe| bhikṣā kenāpi no dattā kṣudhitasya ca dhūrjaṭeḥ||

'भिक्षा दो' यह दीन वचन घर-घर कहते हुए भी, क्षुधित धूर्जटि को किसी ने भी भिक्षा नहीं दी।

श्लोक 4 (skanda.5.51.4)

तदा क्रोधाभिरक्ताक्षः शूलपाणिः क्षुधार्दितः। भ्रामयित्वा पुरीं सर्वां शनैर्बहिर्विनिर्ययौ॥

tadā krodhābhiraktākṣaḥ śūlapāṇiḥ kṣudhārditaḥ| bhrāmayitvā purīṁ sarvāṁ śanairbahirviniryayau||

तब क्रोध से लाल आँखों वाले, त्रिशूलधारी, भूख से पीड़ित उन्होंने सारी नगरी में घूमकर धीरे-धीरे बाहर प्रस्थान किया।

श्लोक 5 (skanda.5.51.5)

एकविंशतिकुण्डानि पीयूषस्य द्विजोत्तम। यत्र तिष्ठंति सर्वाणि नागलोकस्य रक्षणे॥

ekaviṁśatikuṇḍāni pīyūṣasya dvijottama| yatra tiṣṭhaṁti sarvāṇi nāgalokasya rakṣaṇe||

हे द्विजोत्तम, वहाँ नागलोक की रक्षा हेतु अमृत के इक्कीस कुंड स्थित थे।

श्लोक 6 (skanda.5.51.6)

तत्र गत्वा स भगवाञ्छंभुः सर्वात्मसंभवः। अपिबन्नेत्रमार्गेण तृतीयेन च शंकरः॥

tatra gatvā sa bhagavāñchaṁbhuḥ sarvātmasaṁbhavaḥ| apibannetramārgeṇa tṛtīyena ca śaṁkaraḥ||

वहाँ जाकर सम्पूर्ण आत्माओं के उद्गम भगवान शंभु ने अपने तृतीय नेत्र के मार्ग से उस अमृत को पी लिया।

श्लोक 7 (skanda.5.51.7)

रिक्तानि पीयूषकुण्डानि कृत्वा तत्रैव सोत्थितः। कंपितश्च तदा लोको नागानां सर्वतोमुखम्॥

riktāni pīyūṣakuṇḍāni kṛtvā tatraiva sotthitaḥ| kaṁpitaśca tadā loko nāgānāṁ sarvatomukham||

अमृत-कुंडों को रिक्त करके वे वहीं से उठ खड़े हुए; तब नागों का सारा लोक चारों ओर से कंपित हो गया।

श्लोक 8 (skanda.5.51.8)

कस्येदं कर्म किं जातं सुधा यस्मादितो गता। इत्युक्ता चैव ते सर्वे नागा वासुकिपुरोगमाः॥

kasyedaṁ karma kiṁ jātaṁ sudhā yasmādito gatā| ityuktā caiva te sarve nāgā vāsukipurogamāḥ||

'यह किसका कार्य है, क्या हुआ, जिससे अमृत यहाँ से चला गया?'—इस प्रकार वासुकि के नेतृत्व में सभी नागों ने कहा।

श्लोक 9 (skanda.5.51.9)

महदतिक्रमणे शंकाः पुरात्ते निर्ययुर्बहिः। किं कुर्वाम क्व गच्छाम कस्येदं हेलनं कृतम्॥

mahadatikramaṇe śaṁkāḥ purātte niryayurbahiḥ| kiṁ kurvāma kva gacchāma kasyedaṁ helanaṁ kṛtam||

एक बड़े अतिक्रमण की आशंका से वे नगरी से बाहर निकल आए—'हम क्या करें, कहाँ जाएँ, किसका यह अपमान हुआ है?'

श्लोक 10 (skanda.5.51.10)

येनास्माकं कोपितेन हृतं चामृतमुत्तमम्। अस्माकं जीवनं तस्मात्कथं जीवाम पन्नगाः॥

yenāsmākaṁ kopitena hṛtaṁ cāmṛtamuttamam| asmākaṁ jīvanaṁ tasmātkathaṁ jīvāma pannagāḥ||

'जिसे क्रोधित करके हमारा उत्तम अमृत हरा गया, वह तो हमारा जीवन ही है; हे नागो, अब हम कैसे जिएँगे?'

श्लोक 11 (skanda.5.51.11)

इत्युक्त्वा पन्नगाः सर्वे सस्त्रीबालपरिग्रहाः। हरिं च जग्मुः शरणं मनसा परिशंकिताः॥

ityuktvā pannagāḥ sarve sastrībālaparigrahāḥ| hariṁ ca jagmuḥ śaraṇaṁ manasā pariśaṁkitāḥ||

ऐसा कहकर स्त्री-बालकों सहित सभी नाग मन में भयभीत होकर हरि की शरण में गए।

श्लोक 12 (skanda.5.51.12)

तेषामनुग्रहार्थाय वागुवाचाशरीरिणी। श्रूयतामुरगाः सर्वे युष्माभिर्देवहेलनम्॥

teṣāmanugrahārthāya vāguvācāśarīriṇī| śrūyatāmuragāḥ sarve yuṣmābhirdevahelanam||

उन पर अनुग्रह करने के लिए एक आकाशवाणी हुई—'हे सर्पगण सुनो, तुमने ही एक देव का अपमान किया है।'

श्लोक 13 (skanda.5.51.13)

भिक्षार्थमागतः शम्भुः क्षुधार्तश्च गृहेगृहे। विदित्वातिथिवेलायां कपालकरभिक्षुकः॥

bhikṣārthamāgataḥ śambhuḥ kṣudhārtaśca gṛhegṛhe| viditvātithivelāyāṁ kapālakarabhikṣukaḥ||

'शंभु भिक्षा के लिए भूखे होकर घर-घर आए थे, आतिथ्य के समय को समझकर, हाथ में कपाल लिए भिखारी बनकर।'

श्लोक 14 (skanda.5.51.14)

दत्ता न भिक्षा केनापि भोगवत्यां पिनाकिनः। तदा बहिर्गतो नाथः क्षुधितो धर्मविग्रहः॥

dattā na bhikṣā kenāpi bhogavatyāṁ pinākinaḥ| tadā bahirgato nāthaḥ kṣudhito dharmavigrahaḥ||

'भोगवती में किसी ने भी पिनाकधारी को भिक्षा नहीं दी; तब वे भूखे धर्म-स्वरूप नाथ नगरी से बाहर चले गए।'

श्लोक 15 (skanda.5.51.15)

तेन नष्टा सुधा सर्वा कुंडांते पन्नगोत्तमाः। यूयं प्रयात पातालान्महाकालवनोत्तमे॥

tena naṣṭā sudhā sarvā kuṁḍāṁte pannagottamāḥ| yūyaṁ prayāta pātālānmahākālavanottame||

'हे नागश्रेष्ठो, उन्हीं के द्वारा कुंडों का सारा अमृत नष्ट किया गया; अब तुम पाताल से उत्तम महाकालवन को जाओ।'

श्लोक 16 (skanda.5.51.16)

तत्रैका वै सरिच्छ्रेष्ठा शिप्रानामेति विश्रुता। त्रैलोक्यपावनी ह्येषा सर्वकामफलप्रदा॥

tatraikā vai saricchreṣṭhā śiprānāmeti viśrutā| trailokyapāvanī hyeṣā sarvakāmaphalapradā||

'वहाँ सरिताओं में श्रेष्ठ एक नदी है, शिप्रा नाम से विख्यात, जो त्रिलोक को पवित्र करने वाली, समस्त कामनाओं का फल देने वाली है।'

श्लोक 17 (skanda.5.51.17)

यस्या दर्शनमात्रेण सर्वपापक्षयो भवेत्। तत्र गत्वा भवद्भिश्च स्नानं कार्यं यथाविधि॥

yasyā darśanamātreṇa sarvapāpakṣayo bhavet| tatra gatvā bhavadbhiśca snānaṁ kāryaṁ yathāvidhi||

'जिसके दर्शन मात्र से समस्त पापों का क्षय हो जाता है; वहाँ जाकर तुम्हें विधिपूर्वक स्नान करना चाहिए।'

श्लोक 18 (skanda.5.51.18)

भजनं देवदेवस्य ततः पूजां करिष्यथ। भजनाद्देवदेवस्य शिप्रासलिलमज्जनात्॥

bhajanaṁ devadevasya tataḥ pūjāṁ kariṣyatha| bhajanāddevadevasya śiprāsalilamajjanāt||

'फिर देवदेव का भजन और पूजन करना; देवदेव के भजन तथा शिप्रा के जल में स्नान करने से,'

श्लोक 19 (skanda.5.51.19)

भविष्यति ततः सद्यः सुधा लोके पुरेव वः। इति संभाष्य तान्नागांस्तत्रैवांतरधीयत॥

bhaviṣyati tataḥ sadyaḥ sudhā loke pureva vaḥ| iti saṁbhāṣya tānnāgāṁstatraivāṁtaradhīyata||

'—तुम्हारे लोक में पहले की भाँति तत्काल पुनः अमृत हो जाएगा।' ऐसा कहकर उन नागों को वह वाणी वहीं अंतर्धान हो गई।

श्लोक 20 (skanda.5.51.20)

वाणीं व्यास तदा दिव्यां सहसा लोकसाक्षिणीम्। श्रुत्वा देवेरितां वाणीं तथेत्युक्त्वा च पन्नगाः॥

vāṇīṁ vyāsa tadā divyāṁ sahasā lokasākṣiṇīm| śrutvā deveritāṁ vāṇīṁ tathetyuktvā ca pannagāḥ||

हे व्यास, उस अकस्मात् समस्त लोक की साक्षी बनी दिव्य वाणी को, जो देव द्वारा प्रेरित थी, सुनकर नागों ने 'तथास्तु' कहा,

श्लोक 21 (skanda.5.51.21)

स्त्रीबालवृद्धसहिता महाकालवनं ययुः। तत्र गत्वा ददृशुस्ते नदीं त्रैलोक्यवंदिताम्॥

strībālavṛddhasahitā mahākālavanaṁ yayuḥ| tatra gatvā dadṛśuste nadīṁ trailokyavaṁditām||

और स्त्री, बालक और वृद्धों सहित महाकालवन को गए; वहाँ पहुँचकर उन्होंने त्रिलोक-वंदित उस नदी को देखा,

श्लोक 22 (skanda.5.51.22)

सर्वत्र कुसुमाकीर्णां तरुच्छायाभिराश्रिताम्। हंसकारंडवाकीर्णां मणिमुक्ताप्रवालकाम्॥

sarvatra kusumākīrṇāṁ tarucchāyābhirāśritām| haṁsakāraṁḍavākīrṇāṁ maṇimuktāpravālakām||

जो सर्वत्र पुष्पों से भरी, वृक्षों की छाया से युक्त, हंस-कारंडवों से भरी, मणि-मोती-प्रवालों से युक्त थी।

श्लोक 23 (skanda.5.51.23)

मणिसोपानरचितां पद्मखंडैश्च मंडिताम्। सायं प्रातः स्थिता विप्राः संध्योपासनतत्पराः॥

maṇisopānaracitāṁ padmakhaṁḍaiśca maṁḍitām| sāyaṁ prātaḥ sthitā viprāḥ saṁdhyopāsanatatparāḥ||

मणियों की सीढ़ियों से रची हुई, कमल-खंडों से सुशोभित; प्रातः-सायं वहाँ विप्रगण संध्या-उपासना में तत्पर खड़े रहते थे,

श्लोक 24 (skanda.5.51.24)

ऋषयश्च महाभागा भृग्वंगिरसमुख्यकाः। गंधर्वाश्चैव तत्रैव देवर्षिनारदादयः॥

ṛṣayaśca mahābhāgā bhṛgvaṁgirasamukhyakāḥ| gaṁdharvāścaiva tatraiva devarṣināradādayaḥ||

भृगु और अंगिरा प्रमुख महाभाग ऋषिगण, तथा गंधर्व, देवर्षि नारद आदि भी वहीं थे,

श्लोक 25 (skanda.5.51.25)

वसवश्च तथादित्या ह्यश्विनौ मरुतस्तथा। रुद्राः साध्याश्च देवाश्च पितरो विमलाशयाः॥

vasavaśca tathādityā hyaśvinau marutastathā| rudrāḥ sādhyāśca devāśca pitaro vimalāśayāḥ||

वसु, आदित्य, दोनों अश्विनीकुमार, मरुद्गण, रुद्र, साध्य, देवगण तथा निर्मल हृदय पितर भी वहीं थे,

श्लोक 26 (skanda.5.51.26)

उपासते च शिप्रां वै संध्यावेलां समाहिताः। ऋषिपत्न्यो महाभागा देवकन्याप्सरोगणाः॥

upāsate ca śiprāṁ vai saṁdhyāvelāṁ samāhitāḥ| ṛṣipatnyo mahābhāgā devakanyāpsarogaṇāḥ||

—जो एकाग्रचित्त होकर संध्या-वेला में शिप्रा की उपासना करते थे; महाभाग ऋषिपत्नियाँ, देवकन्याएँ तथा अप्सरागण,

श्लोक 27 (skanda.5.51.27)

पतिव्रता महाभागास्तत्रैव पतिभिः सह। उपासंते सदाचारा वर्णाश्रमपुरोगमाः॥

pativratā mahābhāgāstatraiva patibhiḥ saha| upāsaṁte sadācārā varṇāśramapurogamāḥ||

पतिव्रता महाभाग स्त्रियाँ वहीं अपने पतियों सहित सदाचारपूर्वक उपासना करती थीं, तथा वर्णाश्रम के अग्रगण्य जन भी,

श्लोक 28 (skanda.5.51.28)

राजर्षयः समासीना निर्वाणपदवीं गताः। सिद्धा योगेश्वरा शांतास्तापसाः शंसितव्रताः॥

rājarṣayaḥ samāsīnā nirvāṇapadavīṁ gatāḥ| siddhā yogeśvarā śāṁtāstāpasāḥ śaṁsitavratāḥ||

निर्वाण-पद को प्राप्त राजर्षिगण वहाँ एकत्र बैठे थे, तथा योगेश्वर सिद्ध, शांत, दृढ़-व्रती तपस्वी भी,

श्लोक 29 (skanda.5.51.29)

नानादेशोद्भवा लोका यात्रिणः समुपागताः। शिप्राकूले समासीना नरनारीसमन्विताः॥

nānādeśodbhavā lokā yātriṇaḥ samupāgatāḥ| śiprākūle samāsīnā naranārīsamanvitāḥ||

तथा नाना देशों से आए हुए तीर्थयात्री, स्त्री-पुरुष सहित शिप्रा के तट पर एकत्र बैठे हुए,

श्लोक 30 (skanda.5.51.30)

कुर्वते तत्र धर्माणि महादानानि सर्वशः। एवंविधां समालोक्य व्यास त्रैलोक्यवंदिताम्॥

kurvate tatra dharmāṇi mahādānāni sarvaśaḥ| evaṁvidhāṁ samālokya vyāsa trailokyavaṁditām||

वहाँ सभी प्रकार के धर्म-कार्य तथा महादान करते थे। हे व्यास, त्रिलोक-वंदित इस नदी को इस प्रकार देखकर,

श्लोक 31 (skanda.5.51.31)

नदीं सुधामयीं सर्वां नागाः परमहर्षिताः। स्नानदानादिकं कृत्वा महादेवमुपासिरे॥

nadīṁ sudhāmayīṁ sarvāṁ nāgāḥ paramaharṣitāḥ| snānadānādikaṁ kṛtvā mahādevamupāsire||

मानो पूरी तरह अमृतमयी उस नदी को देखकर परम हर्षित नागों ने स्नान-दान आदि करके महादेव की उपासना की।

श्लोक 32 (skanda.5.51.32)

वेदोक्तविधिना सर्वे भक्त्या पन्नगसत्तमाः। पंचांगपूर्वकं स्नानं यक्षकर्दमलेपनम्॥

vedoktavidhinā sarve bhaktyā pannagasattamāḥ| paṁcāṁgapūrvakaṁ snānaṁ yakṣakardamalepanam||

वेदोक्त विधि से भक्तिपूर्वक, हे नागश्रेष्ठो, पंचांग-सहित स्नान, यक्ष-कर्दम का लेपन,

श्लोक 33 (skanda.5.51.33)

अम्लानपंकजां मालां नानापुष्पाक्षतैस्तथा। वासःस्रगनुलेपाद्यैश्चन्दनैर्गंधधूपकैः॥

amlānapaṁkajāṁ mālāṁ nānāpuṣpākṣataistathā| vāsaḥsraganulepādyaiścandanairgaṁdhadhūpakaiḥ||

कभी न कुम्हलाने वाले कमलों की माला, नाना पुष्पों और अक्षतों से, वस्त्र-माला-अनुलेपन आदि से, चंदन, सुगंध और धूप से,

श्लोक 34 (skanda.5.51.34)

दीपदानादिनैवेद्यैस्तांबूलमथ दक्षिणाः। कर्पूरार्तिकराः सर्वे महादेवमुपागताः। स्तुतिमारेभिरे कर्तुं सुधाकामास्तदोरगाः॥

dīpadānādinaivedyaistāṁbūlamatha dakṣiṇāḥ| karpūrārtikarāḥ sarve mahādevamupāgatāḥ| stutimārebhire kartuṁ sudhākāmāstadoragāḥ||

दीप-नैवेद्य आदि से, फिर ताम्बूल और दक्षिणा से, सभी कर्पूर-आरती लिए महादेव के समीप पहुँचे; अमृत की कामना करते हुए उन नागों ने स्तुति करना आरम्भ किया।

श्लोक 35 (skanda.5.51.35)

सर्पा उचुः। नमोऽनंताय बृहते सर्वदेव नमोनमः। चंद्रमौले नमस्तेऽस्तु कपर्दिन्परमात्मने। वृषध्वज नमस्तेऽस्तु त्रिशूलवरधारिणे॥

sarpā ucuḥ| namo'naṁtāya bṛhate sarvadeva namonamaḥ| caṁdramaule namaste'stu kapardinparamātmane| vṛṣadhvaja namaste'stu triśūlavaradhāriṇe||

सर्पों ने कहा—अनंत, महान, सर्वदेव को नमस्कार, बार-बार नमस्कार है! हे चंद्रमौलि, जटाधारी परमात्मा को नमस्कार है! हे वृषभध्वज, श्रेष्ठ त्रिशूलधारी को नमस्कार है!

श्लोक 36 (skanda.5.51.36)

त्र्यम्बकाय नमस्तेऽस्तु जटामुकुटधारिणे। शेषहार नमस्तेस्तु चिताभस्मांगधारिणे॥

tryambakāya namaste'stu jaṭāmukuṭadhāriṇe| śeṣahāra namastestu citābhasmāṁgadhāriṇe||

हे त्र्यंबक, जटा-मुकुटधारी को नमस्कार है! हे शेषनाग की माला धारण करने वाले, चिता-भस्म से अंगों को लेपित करने वाले को नमस्कार है!

श्लोक 37 (skanda.5.51.37)

कृत्तिवास नमस्तेऽस्तु गिरीशाय नमोनमः। त्रिपुरघ्न नमस्तेस्तु स्मरांतक नमोऽस्तु ते॥

kṛttivāsa namaste'stu girīśāya namonamaḥ| tripuraghna namastestu smarāṁtaka namo'stu te||

हे गजचर्मधारी को नमस्कार है, गिरीश को बार-बार नमस्कार है! हे त्रिपुर के नाशक को नमस्कार है, हे कामदेव के अंतक को नमस्कार है!

श्लोक 38 (skanda.5.51.38)

मृगव्याध नमस्तेऽस्तु घस्मराय नमोनमः। शंकरात्मन्नमस्तेस्तु सर्वकामफलप्रद॥

mṛgavyādha namaste'stu ghasmarāya namonamaḥ| śaṁkarātmannamastestu sarvakāmaphalaprada||

हे मृगों के शिकारी को नमस्कार है, सर्वभक्षक को बार-बार नमस्कार है! हे शंकर-स्वरूप, समस्त कामनाओं का फल देने वाले को नमस्कार है!

श्लोक 39 (skanda.5.51.39)

सर्वसाक्षिन्नमस्तेऽस्तु सर्वभूताशयाकृते। सर्वाधार नमस्तेऽस्तु सर्वशक्तिधराय च॥

sarvasākṣinnamaste'stu sarvabhūtāśayākṛte| sarvādhāra namaste'stu sarvaśaktidharāya ca||

हे सबके साक्षी को नमस्कार है, समस्त प्राणियों के अंतर्मन के आकार को नमस्कार है! हे सबके आधार, समस्त शक्तियों को धारण करने वाले को नमस्कार है!

श्लोक 40 (skanda.5.51.40)

सर्वभोग नमस्तेऽस्तु सर्वबीजसमुद्भव। दिव्यहास नमस्तेऽस्तु नमोऽमृतस्रवाय च॥

sarvabhoga namaste'stu sarvabījasamudbhava| divyahāsa namaste'stu namo'mṛtasravāya ca||

हे समस्त भोगों के स्वरूप, समस्त बीजों के उद्गम को नमस्कार है! हे दिव्य हास्य वाले को नमस्कार है, अमृत-स्रावी को भी नमस्कार है!

श्लोक 41 (skanda.5.51.41)

काम्यकाम नमस्तेस्तु सर्वकामवरप्रद। नमः शिवाय शांताय पशूनां पतये नमः॥

kāmyakāma namastestu sarvakāmavaraprada| namaḥ śivāya śāṁtāya paśūnāṁ pataye namaḥ||

हे अभीष्ट कामनाओं के पूरक, समस्त कामनाओं का वर देने वाले को नमस्कार है! शांत शिव को नमस्कार है, पशुओं के पति को नमस्कार है!

श्लोक 42 (skanda.5.51.42)

नमो मृडाय दांताय शांतरूपाय वै नमः॥

namo mṛḍāya dāṁtāya śāṁtarūpāya vai namaḥ||

संयमी मृड को नमस्कार है, शांत-रूप वाले को नमस्कार है।

श्लोक 43 (skanda.5.51.43)

एवं प्रसादितो नागैर्भगवान्वृषभध्वजः। प्रसन्नवदनो भूत्वा प्रत्यक्षः प्राह पन्नगान्॥

evaṁ prasādito nāgairbhagavānvṛṣabhadhvajaḥ| prasannavadano bhūtvā pratyakṣaḥ prāha pannagān||

इस प्रकार नागों द्वारा प्रसन्न किए गए भगवान वृषभध्वज प्रसन्न मुख होकर साक्षात् प्रकट हुए और नागों से बोले।

श्लोक 44 (skanda.5.51.44)

श्रीमहादेव उवाच। शृणुध्वमुरगाः सर्वे वचस्तथ्यं वदामि वः। नागलोके पुरा नित्यं भिक्षार्थं चागतोस्म्यहम्॥

śrīmahādeva uvāca| śṛṇudhvamuragāḥ sarve vacastathyaṁ vadāmi vaḥ| nāgaloke purā nityaṁ bhikṣārthaṁ cāgatosmyaham||

श्रीमहादेव ने कहा—हे सर्पगण सुनो, मैं तुम्हें सत्य वचन बताता हूँ; मैं सदा की भाँति नागलोक में भिक्षा के लिए आया था।

श्लोक 45 (skanda.5.51.45)

गृहेगृहे भोगवत्यां व्यचरत्क्षुधितो भृशम्। कपालं च करे कृत्वा धृत्वा कंथां सुचीरकाम्॥

gṛhegṛhe bhogavatyāṁ vyacaratkṣudhito bhṛśam| kapālaṁ ca kare kṛtvā dhṛtvā kaṁthāṁ sucīrakām||

भोगवती में घर-घर मैं अत्यंत भूखा होकर घूमता रहा, हाथ में कपाल लिए, सुंदर चीथड़ी-वस्त्र धारण किए हुए।

श्लोक 46 (skanda.5.51.46)

अप्राप्तभिक्षो भिक्षार्थी पुनरागां ततो गृहम्। तेन पापप्रसंगेन सुधा नष्टा च वः स्थलात्॥

aprāptabhikṣo bhikṣārthī punarāgāṁ tato gṛham| tena pāpaprasaṁgena sudhā naṣṭā ca vaḥ sthalāt||

भिक्षा न पाकर मैं वहाँ से पुनः अपने घर लौट आया; उसी पाप-प्रसंग के कारण तुम्हारा अमृत उसके स्थान से नष्ट हो गया।

श्लोक 47 (skanda.5.51.47)

किंचित्पुण्यप्रसंगेन महाकालवनोत्तमे। यूयं प्राप्ता महाभागा हित्वा नागालयोत्तमम्॥

kiṁcitpuṇyaprasaṁgena mahākālavanottame| yūyaṁ prāptā mahābhāgā hitvā nāgālayottamam||

किसी पुण्य-प्रसंग से ही, हे महाभागो, तुम अपने उत्तम नागालय को त्यागकर इस उत्तम महाकालवन में पहुँचे हो।

श्लोक 48 (skanda.5.51.48)

आबालवृद्धैः सस्त्रीभि दृष्टा शिप्रा सरिद्वरा। यस्या दर्शनमात्रेण सुनिष्पापोऽस्म्यहं पुरा॥

ābālavṛddhaiḥ sastrībhi dṛṣṭā śiprā saridvarā| yasyā darśanamātreṇa suniṣpāpo'smyahaṁ purā||

बालकों से लेकर वृद्धों तक और स्त्रियों सहित तुमने श्रेष्ठ नदी शिप्रा का दर्शन किया है; जिसके दर्शन मात्र से मैं भी पूर्वकाल में पूर्ण निष्पाप हुआ था।

श्लोक 49 (skanda.5.51.49)

शिप्रायां स्नानजं पुण्यं वक्तुं शक्तो न कीदृशम्। दर्शनाज्जायते शंभुस्तत्क्षणाद्भुवि पन्नगाः॥

śiprāyāṁ snānajaṁ puṇyaṁ vaktuṁ śakto na kīdṛśam| darśanājjāyate śaṁbhustatkṣaṇādbhuvi pannagāḥ||

शिप्रा में स्नान से उत्पन्न पुण्य कैसा है, यह कहने में मैं भी असमर्थ हूँ; हे नागो, उसके दर्शन मात्र से इस पृथ्वी पर तत्काल मनुष्य शंभु बन जाता है।

श्लोक 50 (skanda.5.51.50)

यस्मात्स्नानं कृतं सर्वैः शिप्रायां पन्नगोत्तमैः। तेन पुण्यप्रभावेन सुधास्तु वो गृहेगृहे॥

yasmātsnānaṁ kṛtaṁ sarvaiḥ śiprāyāṁ pannagottamaiḥ| tena puṇyaprabhāvena sudhāstu vo gṛhegṛhe||

चूँकि तुम सब नागश्रेष्ठों ने शिप्रा में स्नान किया है, उसी पुण्य के प्रभाव से तुम्हारे घर-घर में पुनः अमृत हो जाए।

श्लोक 51 (skanda.5.51.51)

नीत्वा शिप्रोदकं पुण्यं कुण्डेषु परिषिञ्चत। तेनैतानि च कुण्डानि अमृतान्येकविंशतिः॥

nītvā śiprodakaṁ puṇyaṁ kuṇḍeṣu pariṣiñcata| tenaitāni ca kuṇḍāni amṛtānyekaviṁśatiḥ||

शिप्रा के पवित्र जल को ले जाकर अपने कुंडों में सींच दो; उससे तुम्हारे वे इक्कीस अमृत-कुंड,

श्लोक 52 (skanda.5.51.52)

संपूर्णानि भविष्यंति स्थिराणि पन्नगोत्तमाः। तथेत्युक्त्वा च ते सर्वे धृत्वा शिप्रोदकं करैः॥

saṁpūrṇāni bhaviṣyaṁti sthirāṇi pannagottamāḥ| tathetyuktvā ca te sarve dhṛtvā śiprodakaṁ karaiḥ||

हे नागश्रेष्ठो, फिर से पूर्ण और स्थायी हो जाएँगे।' 'तथास्तु' कहकर वे सब हाथों में शिप्रा का जल लेकर,

श्लोक 53 (skanda.5.51.53)

गतास्ते वै स्वकं लोकं नमस्कृत्वा महेश्वरम्। ततः प्रभृति सा शिप्रा नागलोकेऽमृतोद्भवा॥

gatāste vai svakaṁ lokaṁ namaskṛtvā maheśvaram| tataḥ prabhṛti sā śiprā nāgaloke'mṛtodbhavā||

महेश्वर को नमस्कार करके अपने-अपने लोक को चले गए। तभी से वह शिप्रा नागलोक में 'अमृतोद्भवा' कहलाई।

श्लोक 54 (skanda.5.51.54)

सर्वलोकेषु विख्याता व्यास शिप्राऽमृतोद्भवा। ये तु तस्यां प्रकुर्वंति नराः स्नानादिकं भुवि॥

sarvalokeṣu vikhyātā vyāsa śiprā'mṛtodbhavā| ye tu tasyāṁ prakurvaṁti narāḥ snānādikaṁ bhuvi||

हे व्यास, शिप्रा समस्त लोकों में अमृतोद्भवा नाम से विख्यात हुई। जो मनुष्य इस पृथ्वी पर उसमें स्नान आदि करते हैं,

श्लोक 55 (skanda.5.51.55)

न तेषां दुष्कृतं किंचिन्नापदो न च दुर्गतिः। न वियोगो भवेत्तेषां पुत्रदारादिकैः कदा॥

na teṣāṁ duṣkṛtaṁ kiṁcinnāpado na ca durgatiḥ| na viyogo bhavetteṣāṁ putradārādikaiḥ kadā||

उन्हें कोई दुष्कृत्य, कोई विपत्ति और कोई दुर्गति नहीं होती; उनका पुत्र, पत्नी आदि से कभी वियोग नहीं होता।

श्लोक 56 (skanda.5.51.56)

न च मित्राणि दुष्यंति न रोगो न दरिद्रता। कथां पापहरां पुण्यां सर्वकामवरप्रदाम्। पठनाच्छ्रवणाद्वापि गोसहस्रफलं लभेत्॥

na ca mitrāṇi duṣyaṁti na rogo na daridratā| kathāṁ pāpaharāṁ puṇyāṁ sarvakāmavarapradām| paṭhanācchravaṇādvāpi gosahasraphalaṁ labhet||

उनके मित्र कभी दूषित नहीं होते, न रोग होता है, न दरिद्रता। इस पापहारिणी, पुण्यमयी, समस्त कामनाओं का वर देने वाली कथा को पढ़ने अथवा सुनने से भी मनुष्य सहस्र गोदान का फल प्राप्त करता है।

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