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अवन्ती खण्ड · अध्याय 59

गयातीर्थ में ऋषिपत्नियों का उद्धार

अध्याय 58अध्याय-सूचीअध्याय 60

श्लोक 1 (skanda.5.59.1)

सनत्कुमार उवाच। ततः सुरगणाः सर्वे धूतपापा समाहिताः। पुनर्योगबलं प्राप्य स्वाधिकारं ययुः पुरा

sanatkumāra uvāca| tataḥ suragaṇāḥ sarve dhūtapāpā samāhitāḥ| punaryogabalaṁ prāpya svādhikāraṁ yayuḥ purā

सनत्कुमार बोले — तब समस्त देवगण, पापरहित होकर, शांतचित्त हो, पुनः योगबल प्राप्त कर, प्राचीन काल में अपने-अपने अधिकार को प्राप्त हुए।

श्लोक 2 (skanda.5.59.2)

एवं व्यास गयातीर्थं कुमुद्वत्यां सुनिश्चितम्। गयायां यानि तीर्थानि पुण्यान्यायतनानि च

evaṁ vyāsa gayātīrthaṁ kumudvatyāṁ suniścitam| gayāyāṁ yāni tīrthāni puṇyānyāyatanāni ca

हे व्यास! इस प्रकार गयातीर्थ कुमुद्वती में सुनिश्चित रूप से स्थापित हुआ; गया में जो पुण्यमय तीर्थ और आयतन (देवस्थान) हैं...

श्लोक 3 (skanda.5.59.3)

तत्तीर्थेषु नरः स्नात्वा तत्तत्तीर्थफलं भवेत्। तथैव च गयाक्षेत्रं गयाश्राद्धफलप्रदम्

tattīrtheṣu naraḥ snātvā tattattīrthaphalaṁ bhavet| tathaiva ca gayākṣetraṁ gayāśrāddhaphalapradam

...उन-उन तीर्थों में स्नान कर मनुष्य को तत्-तत् तीर्थ का फल प्राप्त होता है; और इसी प्रकार यह गयाक्षेत्र गया-श्राद्ध का फल देने वाला है।

श्लोक 4 (skanda.5.59.4)

फल्गुश्च सरितां श्रेष्ठा तथैव फलदायिनी। आदिगया बुद्धगया तथा विष्णुपदी स्मृता

phalguśca saritāṁ śreṣṭhā tathaiva phaladāyinī| ādigayā buddhagayā tathā viṣṇupadī smṛtā

फल्गु नदियों में श्रेष्ठ है, वह भी वैसे ही फलदायिनी है; आदिगया, बुद्धगया तथा विष्णुपदी वहाँ स्मरण की जाती हैं।

श्लोक 5 (skanda.5.59.5)

गयाकोष्ठस्तथा प्रोक्तो गदाधरपदानि च। वेदिका षोडशी प्रोक्ता तथैव चाक्षयो वटः

gayākoṣṭhastathā prokto gadādharapadāni ca| vedikā ṣoḍaśī proktā tathaiva cākṣayo vaṭaḥ

गयाकोष्ठ भी वहाँ कहा गया है, तथा गदाधर के चरण-चिह्न; षोडशी वेदिका तथा वैसे ही अक्षय वट भी कहा गया है।

श्लोक 6 (skanda.5.59.6)

प्रेतमुक्तिकरी नित्यं शिला चोक्ता तथैव च। अच्छोदा निम्नगा प्रोक्ता पितॄणां चाश्रमोत्तमः

pretamuktikarī nityaṁ śilā coktā tathaiva ca| acchodā nimnagā proktā pitṝṇāṁ cāśramottamaḥ

प्रेतों को सदा मुक्ति देने वाली शिला भी वहाँ कही गई है; अच्छोदा नदी तथा पितरों का श्रेष्ठ आश्रम भी वहाँ कहा गया है।

श्लोक 7 (skanda.5.59.7)

देवानां दानवानां च यक्षकिन्नररक्षसाम्। पन्नगानां च सर्वेषां तथैवाश्रम उत्तमः

devānāṁ dānavānāṁ ca yakṣakinnararakṣasām| pannagānāṁ ca sarveṣāṁ tathaivāśrama uttamaḥ

देवताओं, दानवों, यक्षों, किन्नरों, राक्षसों तथा समस्त नागों का भी वैसे ही श्रेष्ठ आश्रम वहाँ है।

श्लोक 8 (skanda.5.59.8)

एतत्स्थानेषु सर्वेषु स्नानदानादिकाः क्रियाः। श्राद्धं च विधिवद्देयं तत्तत्तीर्थफलं लभेत्

etatsthāneṣu sarveṣu snānadānādikāḥ kriyāḥ| śrāddhaṁ ca vidhivaddeyaṁ tattattīrthaphalaṁ labhet

इन सभी स्थानों में स्नान, दान आदि क्रियाएँ तथा श्राद्ध विधिपूर्वक करना चाहिए; इससे उस-उस तीर्थ का फल प्राप्त होता है।

श्लोक 9 (skanda.5.59.9)

गयायां पितृरूपेण स्वयमेव जनार्दनः। तं ध्यात्वा पुंडरीकाक्षं मुच्यते च ऋणत्रयात्

gayāyāṁ pitṛrūpeṇa svayameva janārdanaḥ| taṁ dhyātvā puṁḍarīkākṣaṁ mucyate ca ṛṇatrayāt

गया में स्वयं जनार्दन पितृरूप में विराजमान हैं; उन पुण्डरीकाक्ष का ध्यान कर मनुष्य तीनों ऋणों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 10 (skanda.5.59.10)

एवं व्यास गयातीर्थं पुरावन्त्यां प्रतिष्ठितम्। पश्चात्तु कैकटे जातं यत्र संनिहितोऽसुरः

evaṁ vyāsa gayātīrthaṁ purāvantyāṁ pratiṣṭhitam| paścāttu kaikaṭe jātaṁ yatra saṁnihito'suraḥ

हे व्यास! इस प्रकार गयातीर्थ प्राचीन काल में अवंती में प्रतिष्ठित हुआ; बाद में यह कीकट में भी उत्पन्न हुआ, जहाँ असुर बंदी बना था।

श्लोक 11 (skanda.5.59.11)

तदारभ्य द्विजश्रेष्ठ गया तत्र प्रतिष्ठिता। गदाधरपदाघातैर्महासुरो निपातितः

tadārabhya dvijaśreṣṭha gayā tatra pratiṣṭhitā| gadādharapadāghātairmahāsuro nipātitaḥ

हे द्विजश्रेष्ठ! तभी से वहाँ गया प्रतिष्ठित हुई; गदाधर के चरणाघातों से वह महासुर मार गिराया गया।

श्लोक 12 (skanda.5.59.12)

तत्पदे च महिमानं जनार्दनसमर्पितम्

tatpade ca mahimānaṁ janārdanasamarpitam

और उस चरणचिह्न में जनार्दन द्वारा महिमा समर्पित की गई।

श्लोक 13 (skanda.5.59.13)

पंचक्रोशं गयाक्षेत्रं क्रोशमेकं गयाशिरः। यत्र तत्र करिष्यामि पितॄणां दत्तमक्षयम्। सर्वदा सर्वकालेषु गयाश्राद्धं विधीयते

paṁcakrośaṁ gayākṣetraṁ krośamekaṁ gayāśiraḥ| yatra tatra kariṣyāmi pitṝṇāṁ dattamakṣayam| sarvadā sarvakāleṣu gayāśrāddhaṁ vidhīyate

गयाक्षेत्र पाँच कोस का है, गयाशिर एक कोस का है; भगवान् ने कहा — 'जहाँ-जहाँ मैं जाऊँगा, वहाँ पितरों के लिए दिया गया दान अक्षय करूँगा; सदा सर्वकाल में गया-श्राद्ध विहित है।'

श्लोक 14 (skanda.5.59.14)

संवत्सरे परं व्यास दिनमेकं प्रतिष्ठितम्। कन्यास्थे च दिवानाथे हस्तनक्षत्रसंयुते। महालयेति तत्प्रोक्तं पितॄणां दत्तमक्षयम्

saṁvatsare paraṁ vyāsa dinamekaṁ pratiṣṭhitam| kanyāsthe ca divānāthe hastanakṣatrasaṁyute| mahālayeti tatproktaṁ pitṝṇāṁ dattamakṣayam

हे व्यास! वर्ष में एक विशेष दिन प्रतिष्ठित है — जब सूर्य कन्या राशि में दिन में स्थित हो और हस्त नक्षत्र से युक्त हो, उसे महालय कहा गया है, जब पितरों के लिए किया गया दान अक्षय हो जाता है।

श्लोक 15 (skanda.5.59.15)

सर्वदा सर्वकालेषु गयाश्राद्धं विधीयते

sarvadā sarvakāleṣu gayāśrāddhaṁ vidhīyate

सदा सर्वकाल में गया-श्राद्ध विहित है।

श्लोक 16 (skanda.5.59.16)

संवत्सरे परं व्यास दिनमेकं प्रतिष्ठितम्। अन्वष्टकायां कुर्वंति मातॄणां श्राद्धमुत्तमम्

saṁvatsare paraṁ vyāsa dinamekaṁ pratiṣṭhitam| anvaṣṭakāyāṁ kurvaṁti mātṝṇāṁ śrāddhamuttamam

हे व्यास! वर्ष में एक विशेष दिन प्रतिष्ठित है — अन्वष्टका के दिन माताओं का श्रेष्ठ श्राद्ध करते हैं।

श्लोक 17 (skanda.5.59.17)

अक्षय्या जायते तृप्तिः पितॄणां कल्पसंख्यया। एवं व्यास पुरी रम्या स्नानदानादिकर्मसु

akṣayyā jāyate tṛptiḥ pitṝṇāṁ kalpasaṁkhyayā| evaṁ vyāsa purī ramyā snānadānādikarmasu

पितरों को कल्पों की संख्या तक अक्षय तृप्ति प्राप्त होती है। हे व्यास! इस प्रकार यह रमणीय नगरी स्नान-दान आदि कर्मों में श्रेष्ठ है।

श्लोक 18 (skanda.5.59.18)

भूयस्तु संप्रवक्ष्यामि माहात्म्यं परमाद्भुतम्। तच्छृणुष्व मया ख्यातं पवित्रं पापनाशनम्

bhūyastu saṁpravakṣyāmi māhātmyaṁ paramādbhutam| tacchṛṇuṣva mayā khyātaṁ pavitraṁ pāpanāśanam

अब मैं पुनः एक अत्यंत अद्भुत महिमा का वर्णन करूँगा; मेरे द्वारा कही गई इस पवित्र, पापनाशक कथा को सुनो।

श्लोक 19 (skanda.5.59.19)

सप्तर्षीणां च या भार्या ऋषिपत्न्यः पतिव्रताः। स्वाहादोषपरिभ्रष्टा दूषिताः पावकेन च

saptarṣīṇāṁ ca yā bhāryā ṛṣipatnyaḥ pativratāḥ| svāhādoṣaparibhraṣṭā dūṣitāḥ pāvakena ca

सप्तर्षियों की पत्नियाँ, जो पतिव्रता ऋषिपत्नियाँ थीं, स्वाहा के छल के दोष से भ्रष्ट होकर अग्नि (पावक) द्वारा दूषित मानी गईं।

श्लोक 20 (skanda.5.59.20)

ऋषिभिश्च परित्यक्ता बभ्रमुश्च वनाद्वनम्। एवं बहुतिथे काले नारदो देवदर्शनः

ṛṣibhiśca parityaktā babhramuśca vanādvanam| evaṁ bahutithe kāle nārado devadarśanaḥ

ऋषियों द्वारा परित्यक्त होकर वे वन-वन भटकने लगीं। इसी प्रकार बहुत समय बीतने पर देवदर्शी नारद...

श्लोक 21 (skanda.5.59.21)

तासां च प्रियमन्विच्छन्समायातो वनांतरे। ताभिश्च सत्कृतो नित्यं समासीनो धृतव्रतः

tāsāṁ ca priyamanvicchansamāyāto vanāṁtare| tābhiśca satkṛto nityaṁ samāsīno dhṛtavrataḥ

...उनका हित चाहते हुए उस वन में आए; उनके द्वारा सदा सत्कृत होकर, व्रतधारी नारद वहाँ बैठ गए।

श्लोक 22 (skanda.5.59.22)

उवाच श्लक्ष्णया वाचा देशकालोचितं वचः। किमिदं विकृतं जातं भवतीनां पराभवः

uvāca ślakṣṇayā vācā deśakālocitaṁ vacaḥ| kimidaṁ vikṛtaṁ jātaṁ bhavatīnāṁ parābhavaḥ

उन्होंने कोमल वाणी में देश-काल के अनुकूल वचन कहे — 'यह क्या विकृति हुई है, तुम्हारा यह अपमान कैसा?'

श्लोक 23 (skanda.5.59.23)

कस्माच्च ऋषिभिस्त्यक्ता लोकमातरः पतिव्रताः

kasmācca ṛṣibhistyaktā lokamātaraḥ pativratāḥ

'किस कारण से लोकमाताएँ, पतिव्रताएँ, ऋषियों द्वारा त्याग दी गईं?'

श्लोक 24 (skanda.5.59.24)

ऋषिपत्न्य ऊचुः। न जानीमो वयं तात येन दोषेण तापसैः। विमुक्ताः साग्निकैः क्षिप्रं कार्तिकेयप्रसंगतः

ṛṣipatnya ūcuḥ| na jānīmo vayaṁ tāta yena doṣeṇa tāpasaiḥ| vimuktāḥ sāgnikaiḥ kṣipraṁ kārtikeyaprasaṁgataḥ

ऋषिपत्नियाँ बोलीं — 'हे तात! हम नहीं जानतीं कि किस दोष के कारण अग्निहोत्री तपस्वियों ने हमें कार्तिकेय के प्रसंग में शीघ्र त्याग दिया।

श्लोक 25 (skanda.5.59.25)

लोकापवादजं किंचिज्जातं दिष्टवशादधम्। किं कुर्मो वा क्व गच्छामः किं तपः का च देवता

lokāpavādajaṁ kiṁcijjātaṁ diṣṭavaśādadham| kiṁ kurmo vā kva gacchāmaḥ kiṁ tapaḥ kā ca devatā

लोकापवाद से उत्पन्न कोई नीच बात दैव के वशीभूत होकर उत्पन्न हुई है। हम क्या करें, कहाँ जाएँ, कौन-सा तप करें और किस देवता की आराधना करें...

श्लोक 26 (skanda.5.59.26)

यस्याराधनपुण्येन पतिसांनिध्यमाप्नुयुः। एतन्निश्चित्य भो ब्रह्मन्ब्रूहि त्वं वेदतत्त्वतः

yasyārādhanapuṇyena patisāṁnidhyamāpnuyuḥ| etanniścitya bho brahmanbrūhi tvaṁ vedatattvataḥ

...जिसकी आराधना के पुण्य से हमें पति का सान्निध्य पुनः प्राप्त हो सके? हे ब्रह्मन्! यह निश्चित कर, वेद के तत्त्व के अनुसार हमें बताइये।'

श्लोक 27 (skanda.5.59.27)

इति पृष्टस्तदा ताभिर्ऋषिपत्नीभिर्नारदः। उवाच सुचिरं ध्यात्वा तासां स शर्महेतवे

iti pṛṣṭastadā tābhirṛṣipatnībhirnāradaḥ| uvāca suciraṁ dhyātvā tāsāṁ sa śarmahetave

इस प्रकार उन ऋषिपत्नियों द्वारा पूछे जाने पर नारद ने दीर्घकाल ध्यान कर, उनके कल्याण हेतु कहा।

श्लोक 28 (skanda.5.59.28)

नारद उवाच। श्रूयतां भोस्तपःश्रेष्ठा भवतीनां च कारणम्। महाकालवने रम्ये गयातीर्थमनुत्तमम्

nārada uvāca| śrūyatāṁ bhostapaḥśreṣṭhā bhavatīnāṁ ca kāraṇam| mahākālavane ramye gayātīrthamanuttamam

नारद बोले — 'हे तपःश्रेष्ठाओ! सुनो अपना उपाय — रमणीय महाकालवन में अनुपम गयातीर्थ है।

श्लोक 29 (skanda.5.59.29)

तत्रैव चाक्षयो नाम न्यग्रोधः शाखिनां वरः। तत्रागमनमात्रेण धूतदोषा भविष्यथ

tatraiva cākṣayo nāma nyagrodhaḥ śākhināṁ varaḥ| tatrāgamanamātreṇa dhūtadoṣā bhaviṣyatha

वहीं शाखियों में श्रेष्ठ अक्षय नामक न्यग्रोध (वट वृक्ष) है; वहाँ जाने मात्र से तुम अपने दोष से मुक्त हो जाओगी।

श्लोक 30 (skanda.5.59.30)

सर्वदोषहरं तीर्थं सर्वकामवरप्रदम्। सर्वसौख्यकरं पुण्यं तत्र गच्छत मा चिरम्

sarvadoṣaharaṁ tīrthaṁ sarvakāmavarapradam| sarvasaukhyakaraṁ puṇyaṁ tatra gacchata mā ciram

वह तीर्थ समस्त दोषों को हरने वाला, समस्त इच्छित वर देने वाला है; समस्त सुख देने वाला पुण्यमय है, वहाँ बिना विलंब किए जाओ।'

श्लोक 31 (skanda.5.59.31)

नारदस्य वचः श्रुत्वा ऋषिपत्न्यः सुचोदिताः। महाकालवने व्यास इच्छंत्यः प्रियमात्मनः

nāradasya vacaḥ śrutvā ṛṣipatnyaḥ sucoditāḥ| mahākālavane vyāsa icchaṁtyaḥ priyamātmanaḥ

नारद के वचन सुनकर, भली-भाँति प्रेरित हुई ऋषिपत्नियाँ, हे व्यास! अपने कल्याण की इच्छा से महाकालवन की ओर चल पड़ीं।

श्लोक 32 (skanda.5.59.32)

आजग्मुस्तद्वनं तत्र यत्र तीर्थं गयाभिधम्। तत्र गत्वा शुचीभूय स्नानदानादिकाः क्रियाः

ājagmustadvanaṁ tatra yatra tīrthaṁ gayābhidham| tatra gatvā śucībhūya snānadānādikāḥ kriyāḥ

वे उस वन में पहुँचीं, जहाँ गया नामक तीर्थ है; वहाँ जाकर पवित्र होकर स्नान-दान आदि क्रियाएँ कीं।

श्लोक 33 (skanda.5.59.33)

कृतास्ताभिश्च पुण्याभिर्नभस्यस्यासितेतरे। पंचम्यामृषिसंज्ञायां ताभिः सुचरितं व्रतम्

kṛtāstābhiśca puṇyābhirnabhasyasyāsitetare| paṁcamyāmṛṣisaṁjñāyāṁ tābhiḥ sucaritaṁ vratam

ये पुण्यकर्म उन्होंने भाद्रपद (नभस्य) मास के शुक्ल पक्ष की, ऋषि-पंचमी नामक पंचमी को किए; उन्होंने यह उत्तम व्रत भलीभाँति किया।

श्लोक 34 (skanda.5.59.34)

उपोष्य चैकरात्रं तु जागरं चैव योगतः। कृतमात्रे व्रते व्यास धूतपापा बभुः क्षणात्

upoṣya caikarātraṁ tu jāgaraṁ caiva yogataḥ| kṛtamātre vrate vyāsa dhūtapāpā babhuḥ kṣaṇāt

एक रात्रि का उपवास कर, योगपूर्वक जागरण करते हुए — व्रत पूर्ण होते ही, हे व्यास! वे क्षणभर में पापरहित हो गईं।

श्लोक 35 (skanda.5.59.35)

भर्तृकोपपरिभ्रष्टाः सद्यः प्राप्ता गृहाश्रमम्। ऋषिभिः साग्निकं दत्तं पूर्ववदृषिसत्तम

bhartṛkopaparibhraṣṭāḥ sadyaḥ prāptā gṛhāśramam| ṛṣibhiḥ sāgnikaṁ dattaṁ pūrvavadṛṣisattama

पति के क्रोध से भ्रष्ट होने के बाद वे तत्काल पुनः गृहस्थाश्रम को प्राप्त हुईं; ऋषियों ने, हे ऋषिसत्तम! पूर्ववत् उन्हें अग्निहोत्र में भाग दिया।

श्लोक 36 (skanda.5.59.36)

तदाप्रभृति लोकेऽस्मिन्पंचमी ऋषिसंज्ञिता। ये नराश्चाथ नार्यो यास्तां कुर्वन्ति तु भक्तिः

tadāprabhṛti loke'sminpaṁcamī ṛṣisaṁjñitā| ye narāścātha nāryo yāstāṁ kurvanti tu bhaktiḥ

उसी समय से इस लोक में पंचमी 'ऋषि-पंचमी' के नाम से जानी गई; जो नर-नारी भक्तिपूर्वक उसका पालन करते हैं...

श्लोक 37 (skanda.5.59.37)

नीवाराहारकं कृत्वा शुचीभूय समाहिताः। न तेषां जायते किंचिदापद्दुःखं कदाचन। दुर्भगत्वं च नारीणां न वियोगश्च मातृभिः

nīvārāhārakaṁ kṛtvā śucībhūya samāhitāḥ| na teṣāṁ jāyate kiṁcidāpadduḥkhaṁ kadācana| durbhagatvaṁ ca nārīṇāṁ na viyogaśca mātṛbhiḥ

...नीवार (जंगली धान) का आहार कर, पवित्र और एकाग्रचित्त होकर — उन्हें कभी कोई विपत्ति या दुःख नहीं होता, न स्त्रियों को दुर्भाग्य प्राप्त होता है, न माताओं से वियोग होता है।

श्लोक 38 (skanda.5.59.38)

पुत्रतो धनतो वापि कदाचित्संभविष्यति। एवं व्यास समाख्यातं यत्त्वया परिपृच्छितम्

putrato dhanato vāpi kadācitsaṁbhaviṣyati| evaṁ vyāsa samākhyātaṁ yattvayā paripṛcchitam

पुत्र अथवा धन के द्वारा भी कभी [अशुभ] नहीं होता। हे व्यास! इस प्रकार जो तुमने पूछा था, वह सब बता दिया गया।

श्लोक 39 (skanda.5.59.39)

अवंत्यामीदृशं तीर्थं वर्तते भुवि सत्तम। तादृशं पुण्यदं किंचिन्नास्ति ब्रह्मांडगोलके

avaṁtyāmīdṛśaṁ tīrthaṁ vartate bhuvi sattama| tādṛśaṁ puṇyadaṁ kiṁcinnāsti brahmāṁḍagolake

हे सत्तम! अवंती में इस प्रकार का तीर्थ पृथ्वी पर विद्यमान है; इस ब्रह्मांड-गोलक में इसके समान पुण्यदायी कुछ भी नहीं है।

श्लोक 40 (skanda.5.59.40)

अस्मिंस्तीर्थे नरः कश्चिन्महादानानि चेच्चरेत्। अक्षयाणि भवंत्यस्य विष्णुलोके महीयते

asmiṁstīrthe naraḥ kaścinmahādānāni ceccaret| akṣayāṇi bhavaṁtyasya viṣṇuloke mahīyate

इस तीर्थ में जो मनुष्य महादान करता है, उसके पुण्य अक्षय हो जाते हैं; वह विष्णुलोक में महिमान्वित होता है।

श्लोक 41 (skanda.5.59.41)

यो वै नियमवान्भूत्वा कथामेतां शृणोति वा। पठेच्च सततं व्यास हयमेधफलं लभेत्

yo vai niyamavānbhūtvā kathāmetāṁ śṛṇoti vā| paṭhecca satataṁ vyāsa hayamedhaphalaṁ labhet

और हे व्यास! जो नियमपूर्वक इस कथा को सुनता है अथवा सदा पढ़ता है, उसे अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है।

अध्याय 58अध्याय-सूचीअध्याय 60