अवन्ती खण्ड · अध्याय 61
अधिमास में पुरुषोत्तमेश्वर स्नान-दान माहात्म्य
श्लोक 1 (skanda.5.61.1)
सनत्कुमार उवाच। अधिमासं समासाद्य योऽन्यत्र स्थितिमात्मनः। करोति स नरो मूर्खो महाकालवनादृते
sanatkumāra uvāca| adhimāsaṁ samāsādya yo'nyatra sthitimātmanaḥ| karoti sa naro mūrkho mahākālavanādṛte
सनत्कुमार बोले — जो कोई अधिमास आने पर महाकालवन को छोड़कर अन्यत्र अपना निवास करता है, वह मनुष्य मूर्ख है।
श्लोक 2 (skanda.5.61.2)
अधिमासे नरो व्यास तीर्थे पुरुषोत्तमाभिधे। स्नात्वा दत्त्वा च दानानि तेषां लोकाः सनातनाः
adhimāse naro vyāsa tīrthe puruṣottamābhidhe| snātvā dattvā ca dānāni teṣāṁ lokāḥ sanātanāḥ
हे व्यास! अधिमास में पुरुषोत्तम नामक तीर्थ में स्नान कर और दान देकर मनुष्य को सनातन लोकों की प्राप्ति होती है।
श्लोक 3 (skanda.5.61.3)
पुरुषोत्तमं समभ्यर्च्य रमालालितपादकम्। तथैव च उमां देवीं शंकरेण च पूजयेत्
puruṣottamaṁ samabhyarcya ramālālitapādakam| tathaiva ca umāṁ devīṁ śaṁkareṇa ca pūjayet
पुरुषोत्तम की, जिनके चरण रमा (लक्ष्मी) द्वारा दुलारे जाते हैं, भलीभाँति पूजा कर, तथा उसी प्रकार उमा देवी की शंकर सहित पूजा करे...
श्लोक 4 (skanda.5.61.4)
वांछितार्थशतं प्राप्य विष्णुलोके महीयते। भाद्रपदे सिते पक्षे एकादश्यां समाहितः। उपोष्य विधिवद्व्यास रात्रौ जागरणं चरेत्
vāṁchitārthaśataṁ prāpya viṣṇuloke mahīyate| bhādrapade site pakṣe ekādaśyāṁ samāhitaḥ| upoṣya vidhivadvyāsa rātrau jāgaraṇaṁ caret
...तो वह सैकड़ों इच्छित पदार्थ प्राप्त कर विष्णुलोक में महिमान्वित होता है। भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की एकादशी को एकाग्रचित्त होकर...
श्लोक 5 (skanda.5.61.5)
विष्णोश्च पूजनं कार्यं जलयात्रा तथैव च। पुरुषोत्तमसरे नित्यं तस्य पुण्यफलं शृणु
viṣṇośca pūjanaṁ kāryaṁ jalayātrā tathaiva ca| puruṣottamasare nityaṁ tasya puṇyaphalaṁ śṛṇu
...विधिपूर्वक उपवास कर, हे व्यास! रात्रि में जागरण करे। विष्णु का पूजन तथा जलयात्रा भी करनी चाहिए; पुरुषोत्तम सरोवर के सदा पुण्यफल को सुनो।
श्लोक 6 (skanda.5.61.6)
पुत्रदारधनं सम्यगायुरारोग्यसंपदः। न तेषां दुर्लभं किंचित्त्रिषु लोकेषु विद्यते
putradāradhanaṁ samyagāyurārogyasaṁpadaḥ| na teṣāṁ durlabhaṁ kiṁcittriṣu lokeṣu vidyate
पुत्र, पत्नी, धन भलीभाँति, आयु और आरोग्य की संपत्ति — इनमें से कुछ भी उनके लिए तीनों लोकों में दुर्लभ नहीं रहता।
श्लोक 7 (skanda.5.61.7)
तस्य पूर्वतरे भागे जटेश्वरमहेश्वरः। तिष्ठति तापसस्तीरे यत्र राजा भगीरथः
tasya pūrvatare bhāge jaṭeśvaramaheśvaraḥ| tiṣṭhati tāpasastīre yatra rājā bhagīrathaḥ
उसके पूर्व भाग में जटेश्वर महेश्वर विराजमान हैं, उस तट पर जहाँ राजा भगीरथ ने...
श्लोक 8 (skanda.5.61.8)
तपस्तप्त्वा परं लेभे पुण्यं पुण्यवतां वरः। गंगां भूतलमानीय सर्वलोकसुखाय वै
tapastaptvā paraṁ lebhe puṇyaṁ puṇyavatāṁ varaḥ| gaṁgāṁ bhūtalamānīya sarvalokasukhāya vai
...तपस्या कर परम पुण्य प्राप्त किया, पुण्यवानों में श्रेष्ठ होकर, समस्त लोकों के सुख के लिए गंगा को पृथ्वी पर लाया।
श्लोक 9 (skanda.5.61.9)
तस्य तीर्थे नरः स्नात्वा तिलधेनुं प्रदापयेत्। सर्वयज्ञफलं प्राप्य पुत्रवाञ्जायते नरः
tasya tīrthe naraḥ snātvā tiladhenuṁ pradāpayet| sarvayajñaphalaṁ prāpya putravāñjāyate naraḥ
उस तीर्थ में स्नान कर मनुष्य को तिलधेनु का दान करना चाहिए; इससे समस्त यज्ञों का फल प्राप्त कर मनुष्य पुत्रवान् होता है।
श्लोक 10 (skanda.5.61.10)
तस्येशानतरे भागे रामो भार्गवसत्तमः। तपस्तेपे सुधर्मात्मा आत्मकायविशुद्धये
tasyeśānatare bhāge rāmo bhārgavasattamaḥ| tapastepe sudharmātmā ātmakāyaviśuddhaye
उसके ईशान भाग में सुधर्मात्मा भार्गवश्रेष्ठ परशुराम ने अपने शरीर की शुद्धि हेतु तपस्या की।
श्लोक 11 (skanda.5.61.11)
कौशिकी च सरिच्छ्रेष्ठा सर्वतीर्थवरप्रदा। तत्र स्नात्वा नरो जातिहत्यादोषविवर्जितः
kauśikī ca saricchreṣṭhā sarvatīrthavarapradā| tatra snātvā naro jātihatyādoṣavivarjitaḥ
तथा वहाँ श्रेष्ठ नदी कौशिकी है, जो समस्त तीर्थों का श्रेष्ठ फल देने वाली है; वहाँ स्नान कर मनुष्य जातिहत्या के दोष से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 12 (skanda.5.61.12)
रामेश्वरं समालोक्य धूतपापो भवेन्नरः
rāmeśvaraṁ samālokya dhūtapāpo bhavennaraḥ
रामेश्वर का दर्शन कर मनुष्य पापरहित हो जाता है।