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अवन्ती खण्ड · अध्याय 62

गोमतीकुण्ड तीर्थ की महिमा

अध्याय 61अध्याय-सूचीअध्याय 63

श्लोक 1 (skanda.5.62.1)

व्यास उवाच। गोमतीकुण्डं त्वया प्रोक्तं पुरा ब्रह्मन्सनातनम्। कस्मिन्काले कदा जातं तन्नो वद सुविस्तरात्

vyāsa uvāca| gomatīkuṇḍaṁ tvayā proktaṁ purā brahmansanātanam| kasminkāle kadā jātaṁ tanno vada suvistarāt

व्यास बोले — हे ब्रह्मन्! आपने पूर्वकाल में सनातन गोमतीकुंड का उल्लेख किया था; वह किस काल में, कब उत्पन्न हुआ, यह हमें विस्तार से बताइए।

श्लोक 2 (skanda.5.62.2)

सनत्कुमार उवाच। शृणुष्व भो महाप्राज्ञ कथां पापहरां पराम्। गोमतीकुण्डोद्भवां पुण्यां पुरा रुद्रेण भाषिताम्

sanatkumāra uvāca| śṛṇuṣva bho mahāprājña kathāṁ pāpaharāṁ parām| gomatīkuṇḍodbhavāṁ puṇyāṁ purā rudreṇa bhāṣitām

सनत्कुमार बोले — हे महाप्राज्ञ! सुनो यह पापहारिणी परम कथा, गोमतीकुंड से उत्पन्न, पुण्यमयी, जो प्राचीन काल में रुद्र द्वारा कही गई थी।

श्लोक 3 (skanda.5.62.3)

नैमिषे च समासीना ऋषयः शौनकादयः। कथयंति कथां पुण्यां सर्वतीर्थोद्भवां शुभाम्

naimiṣe ca samāsīnā ṛṣayaḥ śaunakādayaḥ| kathayaṁti kathāṁ puṇyāṁ sarvatīrthodbhavāṁ śubhām

नैमिष में बैठे शौनक आदि ऋषि समस्त तीर्थों की उत्पत्ति से संबंधित यह शुभ, पुण्यमयी कथा कह रहे थे।

श्लोक 4 (skanda.5.62.4)

तस्मिन्नवसरे पुण्ये काशीमाहात्म्यमुत्तमम्। कथितं नारदेनैव पवित्रं पापहारकम्

tasminnavasare puṇye kāśīmāhātmyamuttamam| kathitaṁ nāradenaiva pavitraṁ pāpahārakam

उस पुण्य अवसर पर काशी की उत्तम, पवित्र, पापहारक महिमा स्वयं नारद द्वारा कही गई।

श्लोक 5 (skanda.5.62.5)

ऊषरः पुण्यपापानां धन्या वाराणसी पुरी। ध्रुवं लभंते मोक्षं च समं चंडालपंडिताः

ūṣaraḥ puṇyapāpānāṁ dhanyā vārāṇasī purī| dhruvaṁ labhaṁte mokṣaṁ ca samaṁ caṁḍālapaṁḍitāḥ

वाराणसी नगरी पुण्य और पाप दोनों को हरने वाली ऊषर भूमि है, धन्य है; वहाँ चांडाल और पंडित समान रूप से निश्चय ही मोक्ष प्राप्त करते हैं।

श्लोक 6 (skanda.5.62.6)

असीवरुणयोर्मध्ये पंचक्रोशी महाफलम्। अमरा मरणमिच्छन्ति का कथा इतरे जनाः

asīvaruṇayormadhye paṁcakrośī mahāphalam| amarā maraṇamicchanti kā kathā itare janāḥ

असी और वरुणा के मध्य पंचक्रोशी क्षेत्र महाफलदायी है; वहाँ अमर देवता भी मरण की इच्छा करते हैं — अन्य साधारण जन की तो बात ही क्या!

श्लोक 7 (skanda.5.62.7)

इति स्मृत्वा तदा व्यास स्वयंभूः प्रत्यभाषत। शृण्वतां सर्वदेवानामृषीणां च परंतप

iti smṛtvā tadā vyāsa svayaṁbhūḥ pratyabhāṣata| śṛṇvatāṁ sarvadevānāmṛṣīṇāṁ ca paraṁtapa

ऐसा स्मरण कर, हे व्यास! स्वयंभू (ब्रह्मा) ने तब कहा, समस्त देवताओं तथा ऋषियों के सुनते हुए, हे परंतप!

श्लोक 8 (skanda.5.62.8)

नदी न गोमतीतुल्या कृष्णतुल्या न देवता। सर्वपातालभूमध्ये न द्वारकासमा पुरी

nadī na gomatītulyā kṛṣṇatulyā na devatā| sarvapātālabhūmadhye na dvārakāsamā purī

'न कोई नदी गोमती के समान है, न कोई देवता कृष्ण के समान है; समस्त पाताल-भूमि में द्वारका के समान कोई नगरी नहीं है।'

श्लोक 9 (skanda.5.62.9)

इति ते निश्चयं ज्ञात्वा ऋषयः शौनकादयः। यत्र तत्र स्थिताः सर्वे प्रातःसंध्यामुपासितुम्

iti te niścayaṁ jñātvā ṛṣayaḥ śaunakādayaḥ| yatra tatra sthitāḥ sarve prātaḥsaṁdhyāmupāsitum

यह निश्चय जानकर शौनक आदि ऋषि, जहाँ-जहाँ स्थित थे, वहीं प्रातःसंध्या की उपासना करने का संकल्प करने लगे।

श्लोक 10 (skanda.5.62.10)

तत्रैव गोमतीतीरे चक्रुस्ते लाधृतव्रताः। सांदीपनोऽपि तत्रैव प्रातःसंध्यां समाचरत्

tatraiva gomatītīre cakruste lādhṛtavratāḥ| sāṁdīpano'pi tatraiva prātaḥsaṁdhyāṁ samācarat

वहीं गोमती के तट पर उन व्रतधारियों ने वह किया; सांदीपनि भी वहीं प्रातःसंध्या का आचरण करते थे।

श्लोक 11 (skanda.5.62.11)

एवं बहुतिथे काले चरतस्तस्य वै व्रतम्। सांदीपनस्य वै व्यास ह्यवंतीपुरवासिनः

evaṁ bahutithe kāle caratastasya vai vratam| sāṁdīpanasya vai vyāsa hyavaṁtīpuravāsinaḥ

हे व्यास! इस प्रकार बहुत समय तक अवंतीपुरवासी सांदीपनि यह व्रत करते रहे।

श्लोक 12 (skanda.5.62.12)

तस्यैव कामपूर्त्यर्थं विद्यार्थिनौ रामजनार्दनौ। समायातौ सुकुमारांगौ सततं ब्रह्मचारिणौ

tasyaiva kāmapūrtyarthaṁ vidyārthinau rāmajanārdanau| samāyātau sukumārāṁgau satataṁ brahmacāriṇau

उनकी ही कामना पूर्ति हेतु, विद्यार्थी राम और जनार्दन, सुकुमार अंगों वाले, सदा ब्रह्मचारी, वहाँ आये।

श्लोक 13 (skanda.5.62.13)

निवासं चक्रतुस्तस्य गुरोर्गेहे परंतप। तस्य पाठयतः सम्यग्विद्यां सर्वश्रुतीः परम्

nivāsaṁ cakratustasya gurorgehe paraṁtapa| tasya pāṭhayataḥ samyagvidyāṁ sarvaśrutīḥ param

हे परंतप! उन्होंने उस गुरु के घर में निवास किया; गुरु उन्हें भलीभाँति समस्त श्रुतियों की परम विद्या पढ़ाते थे।

श्लोक 14 (skanda.5.62.14)

उषस्युषसि तत्रैव दृश्यते न तदा गुरुः। विद्योपदेशकालोऽयं क्व गतो नौ गुरुर्वरः

uṣasyuṣasi tatraiva dṛśyate na tadā guruḥ| vidyopadeśakālo'yaṁ kva gato nau gururvaraḥ

परंतु प्रत्येक प्रातःकाल गुरु वहाँ दिखाई नहीं देते थे। 'यह तो विद्या-उपदेश का समय है, हमारे श्रेष्ठ गुरु कहाँ चले गए?'

श्लोक 15 (skanda.5.62.15)

इति पृष्टे तयोरेवं गुरुपत्नी ह्युवाच ह। सदैव कुरुते वत्स प्रातःसंध्याद्युपासनम्

iti pṛṣṭe tayorevaṁ gurupatnī hyuvāca ha| sadaiva kurute vatsa prātaḥsaṁdhyādyupāsanam

इस प्रकार उन दोनों द्वारा पूछे जाने पर गुरुपत्नी ने कहा — 'हे वत्सो! वे सदा प्रातःसंध्या आदि उपासना करते हैं।

श्लोक 16 (skanda.5.62.16)

तत्रैव याति वै नित्यं गुरुस्ते स्नानकारणात्। गोमती वै सरिच्छ्रेष्ठा द्वारकायां च पावनी

tatraiva yāti vai nityaṁ guruste snānakāraṇāt| gomatī vai saricchreṣṭhā dvārakāyāṁ ca pāvanī

वे नित्य वहीं स्नान के लिए जाते हैं; श्रेष्ठ नदी गोमती द्वारका में पावन है।'

श्लोक 17 (skanda.5.62.17)

इति श्रुत्वा तदा कृष्णो रामेण सह संयुतः। किं कर्तव्यमिहास्माभिरात्मनो हितमुत्तमम्

iti śrutvā tadā kṛṣṇo rāmeṇa saha saṁyutaḥ| kiṁ kartavyamihāsmābhirātmano hitamuttamam

यह सुनकर तब कृष्ण, बलराम सहित, सोचने लगे — 'हमें यहाँ अपने कल्याण के लिए क्या करना चाहिए?

श्लोक 18 (skanda.5.62.18)

गुरोरागमनं कांक्षे अत्रैव स्थितिकांक्षया। एतस्मिन्नेव काले तु सांदीपनिरगाद्गृहम्

gurorāgamanaṁ kāṁkṣe atraiva sthitikāṁkṣayā| etasminneva kāle tu sāṁdīpaniragādgṛham

मैं यहीं रहते हुए गुरु के आगमन की प्रतीक्षा करता हूँ।' उसी समय सांदीपनि घर से बाहर आये।

श्लोक 19 (skanda.5.62.19)

तत उत्थाय तौ वीरौ गुरोरावंदनं ततः। प्रश्रयावनतौ कृत्वा ह्यब्रूतां वचनं गुरुम्

tata utthāya tau vīrau gurorāvaṁdanaṁ tataḥ| praśrayāvanatau kṛtvā hyabrūtāṁ vacanaṁ gurum

तब वे दोनों वीर उठकर गुरु को वंदन कर, विनयपूर्वक झुककर गुरु से यह वचन कहने लगे।

श्लोक 20 (skanda.5.62.20)

श्रूयतां भो महायोगिन्नस्माकं वासकारणम्। विद्यार्थिनाविह प्राप्तौ युष्माकं च गृहोत्तमे

śrūyatāṁ bho mahāyoginnasmākaṁ vāsakāraṇam| vidyārthināviha prāptau yuṣmākaṁ ca gṛhottame

'हे महायोगिन्! सुनिए हमारे यहाँ निवास का कारण — हम विद्यार्थी होकर आपके उत्तम गृह में यहाँ आये हैं।

श्लोक 21 (skanda.5.62.21)

प्रातःकाले च ते ब्रह्मन्समयो नास्ति नौ प्रभो। एतच्छुत्वा वचस्तस्य कृष्णस्य च बलस्य च

prātaḥkāle ca te brahmansamayo nāsti nau prabho| etacchutvā vacastasya kṛṣṇasya ca balasya ca

परंतु हे ब्रह्मन्! प्रातःकाल हमें आपका समय नहीं मिलता, हे प्रभो!' कृष्ण और बलराम के ये वचन सुनकर...

श्लोक 22 (skanda.5.62.22)

उवाच भगवान्व्यास आत्मनो व्रतकारणम्। अस्माकं परमं वत्स व्रतं वै शाश्वतं मतम्

uvāca bhagavānvyāsa ātmano vratakāraṇam| asmākaṁ paramaṁ vatsa vrataṁ vai śāśvataṁ matam

...भगवान् व्यास (सांदीपनि) ने अपने व्रत का कारण बताया — 'हे वत्स! हमारा यह सनातन व्रत सबसे श्रेष्ठ माना गया है।

श्लोक 23 (skanda.5.62.23)

गोमतीस्नानं कर्तव्यं प्रातःकाले सदा बुधैः। तत्रैवोपासनं पुण्यं संध्याया इति निश्चितम्

gomatīsnānaṁ kartavyaṁ prātaḥkāle sadā budhaiḥ| tatraivopāsanaṁ puṇyaṁ saṁdhyāyā iti niścitam

बुद्धिमानों को सदा प्रातःकाल गोमती में स्नान करना चाहिए; वहीं संध्या की उपासना पुण्यमय निश्चित की गई है।

श्लोक 24 (skanda.5.62.24)

इति निश्चित्य युष्माभिर्यद्योग्यं क्रियतां तथा। तच्छ्रुत्वा भगवान्विष्णुर्मायामानुषरूपवान्

iti niścitya yuṣmābhiryadyogyaṁ kriyatāṁ tathā| tacchrutvā bhagavānviṣṇurmāyāmānuṣarūpavān

यह जानकर, तुम्हें जो योग्य लगे वह करो।' यह सुनकर भगवान् विष्णु, जो माया से मनुष्य रूप धारण किये थे...

श्लोक 25 (skanda.5.62.25)

गोमत्याराधनं चक्रे कुशस्थल्यां द्विजोत्तम। यत्र शिवेश्वरो देवो यज्ञकुण्डमनुत्तमम्

gomatyārādhanaṁ cakre kuśasthalyāṁ dvijottama| yatra śiveśvaro devo yajñakuṇḍamanuttamam

...ने कुशस्थली में, हे द्विजोत्तम! गोमती की आराधना की, जहाँ शिवेश्वर देव तथा अनुपम यज्ञकुंड है।

श्लोक 26 (skanda.5.62.26)

कंथडेश्वरस्योत्तरे भागे गोमती सा समागता। पातालतलमाभेद्य सरस्वत्या सहागता

kaṁthaḍeśvarasyottare bhāge gomatī sā samāgatā| pātālatalamābhedya sarasvatyā sahāgatā

कंठडेश्वर के उत्तर भाग में वह गोमती वहाँ आयी, पाताल-तल को भेदकर, सरस्वती के साथ वहाँ आयी।

श्लोक 27 (skanda.5.62.27)

प्रातरुत्थाय ते सर्वे गोमतीं सरितां वराम्। ददृशुः सुचिरापांगीं व्यास स्वाश्रमगामिनीम्

prātarutthāya te sarve gomatīṁ saritāṁ varām| dadṛśuḥ sucirāpāṁgīṁ vyāsa svāśramagāminīm

प्रातःकाल उठकर वे सभी गोमती को, श्रेष्ठ नदियों में सुंदर, दीर्घ-नेत्रा, हे व्यास! अपने आश्रम की ओर जाती हुई देखने लगे।

श्लोक 28 (skanda.5.62.28)

श्रीकृष्ण उवाच। अत्रैव चागता ब्रह्मन्गोमती सरितां वरा। स्नानदानादिकं सर्वमत्रैव समुपासय

śrīkṛṣṇa uvāca| atraiva cāgatā brahmangomatī saritāṁ varā| snānadānādikaṁ sarvamatraiva samupāsaya

श्रीकृष्ण बोले — 'हे ब्रह्मन्! यहीं श्रेष्ठ नदी गोमती आ गई है; यहीं स्नान-दान आदि सब कुछ उपासित कीजिए।'

श्लोक 29 (skanda.5.62.29)

गोमत्यत्र समालीना यज्ञकुण्डे सरस्वती। तदाप्रभृति लोकेऽस्मिन्गोमतीकुण्डमुच्यते

gomatyatra samālīnā yajñakuṇḍe sarasvatī| tadāprabhṛti loke'smingomatīkuṇḍamucyate

यहाँ यज्ञकुंड में गोमती सरस्वती के साथ मिल गई; तभी से इस लोक में यह 'गोमतीकुंड' कहलाता है।

श्लोक 30 (skanda.5.62.30)

सर्वेषामपि लोकानां मार्गोऽत्रैव च विद्यते। तस्माद्व्यास महापुण्यं भुवि तीर्थमनुत्तमम्

sarveṣāmapi lokānāṁ mārgo'traiva ca vidyate| tasmādvyāsa mahāpuṇyaṁ bhuvi tīrthamanuttamam

समस्त लोकों का मार्ग भी यहीं विद्यमान है; इसलिए, हे व्यास! यह पृथ्वी पर अत्यंत पुण्यमय, अनुपम तीर्थ है।

श्लोक 31 (skanda.5.62.31)

गोमतीकुण्डमाख्यातं सर्वपापप्रणाशनम्। भाद्रे मास्यसितायाष्टम्यां कृष्णजन्मसमुद्भवम्

gomatīkuṇḍamākhyātaṁ sarvapāpapraṇāśanam| bhādre māsyasitāyāṣṭamyāṁ kṛṣṇajanmasamudbhavam

गोमतीकुंड को समस्त पापों का नाश करने वाला कहा गया है; भाद्रपद मास की कृष्ण अष्टमी को कृष्ण-जन्म हुआ था।

श्लोक 32 (skanda.5.62.32)

तत्र स्नात्वा नरो नित्यं रात्रौ जागरणं चरेत्। उपोष्य विधिवद्व्यास सशिष्यं व्यासमर्चयेत्

tatra snātvā naro nityaṁ rātrau jāgaraṇaṁ caret| upoṣya vidhivadvyāsa saśiṣyaṁ vyāsamarcayet

वहाँ स्नान कर मनुष्य को सदा रात्रि में जागरण करना चाहिए; हे व्यास! विधिपूर्वक उपवास कर शिष्यों सहित व्यास की पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 33 (skanda.5.62.33)

वैष्णवांश्च नरांश्चैव कृष्णजन्मोत्सुकान्वरान्। नानासुगंधपुष्पाद्यैर्वस्त्रालंकारसंयुतैः

vaiṣṇavāṁśca narāṁścaiva kṛṣṇajanmotsukānvarān| nānāsugaṁdhapuṣpādyairvastrālaṁkārasaṁyutaiḥ

विभिन्न सुगंधित पुष्पों आदि से, वस्त्र-आभूषणों सहित, कृष्ण-जन्मोत्सव के लिए उत्सुक श्रेष्ठ वैष्णवजनों तथा मनुष्यों को...

श्लोक 34 (skanda.5.62.34)

गोब्राह्मणानां पूजाश्च क्रियते यैः समाहितैः। न तेषां दुर्लभं किंचित्सर्वलोकेषु विद्यते

gobrāhmaṇānāṁ pūjāśca kriyate yaiḥ samāhitaiḥ| na teṣāṁ durlabhaṁ kiṁcitsarvalokeṣu vidyate

...जो एकाग्रचित्त होकर गौ और ब्राह्मणों की पूजा करते हैं, उनके लिए समस्त लोकों में कुछ भी दुर्लभ नहीं रहता।

श्लोक 35 (skanda.5.62.35)

गोमतीस्नानजात्पुण्याद्वासुदेवसमागमात्। मनोरथफलप्राप्तिर्जायते नात्र संशयः

gomatīsnānajātpuṇyādvāsudevasamāgamāt| manorathaphalaprāptirjāyate nātra saṁśayaḥ

गोमती-स्नान से उत्पन्न पुण्य से तथा वासुदेव के मिलन से मनोरथ-फल की प्राप्ति होती है, इसमें संशय नहीं।

श्लोक 36 (skanda.5.62.36)

तथा चैत्रसिते पक्षे यावच्चैकादशी भवेत्। तद्दिने च नरः स्नात्वा गोमत्यां च विशेषतः

tathā caitrasite pakṣe yāvaccaikādaśī bhavet| taddine ca naraḥ snātvā gomatyāṁ ca viśeṣataḥ

इसी प्रकार चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में जब एकादशी हो, उस दिन मनुष्य को विशेषतः गोमती में स्नान करना चाहिए...

श्लोक 37 (skanda.5.62.37)

रात्रौ जागरणं कृत्वा विष्णुपूजां तथैव च। आमलकीं ततो गत्वा प्रदक्षिणात्पदेपदे

rātrau jāgaraṇaṁ kṛtvā viṣṇupūjāṁ tathaiva ca| āmalakīṁ tato gatvā pradakṣiṇātpadepade

...रात्रि में जागरण कर तथा विष्णु-पूजा भी करके; फिर आमलकी वृक्ष के पास जाकर पद-पद पर प्रदक्षिणा करते हुए...

श्लोक 38 (skanda.5.62.38)

गोसहस्रफलं तेषां प्राप्यते नात्र संशयः। ये शृण्वंति कथां पुण्यां पवित्रां पापहारिणीम्

gosahasraphalaṁ teṣāṁ prāpyate nātra saṁśayaḥ| ye śṛṇvaṁti kathāṁ puṇyāṁ pavitrāṁ pāpahāriṇīm

...उन्हें एक हजार गौओं के दान का फल प्राप्त होता है, इसमें संशय नहीं — जो इस पुण्यमयी, पवित्र, पापहारिणी कथा को सुनते हैं...

श्लोक 39 (skanda.5.62.39)

सर्वपापविनिर्मुक्ता विष्णुलोकं प्रयांति ते

sarvapāpavinirmuktā viṣṇulokaṁ prayāṁti te

...वे समस्त पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक को प्राप्त होते हैं।

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