अवन्ती खण्ड · अध्याय 63
वामनकुण्ड की महिमा और विष्णुसहस्रनाम
श्लोक 1 (skanda.5.63.1)
सनत्कुमार उवाच। कंथडेश्वर इति ख्यातं तत्र तीर्थमनुत्तमम्। तत्र तीर्थे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा देवं महेश्वरम्
sanatkumāra uvāca| kaṁthaḍeśvara iti khyātaṁ tatra tīrthamanuttamam| tatra tīrthe naraḥ snātvā dṛṣṭvā devaṁ maheśvaram
सनत्कुमार बोले — वहाँ कंथडेश्वर नाम से विख्यात एक अनुपम तीर्थ है; उस तीर्थ में स्नान कर तथा महेश्वर देव का दर्शन कर मनुष्य...
श्लोक 2 (skanda.5.63.2)
मुच्यते सर्वपापेभ्यः शुचिः प्रयतमानसः। विमानशतसंयुक्तः शिवलोके महीयते
mucyate sarvapāpebhyaḥ śuciḥ prayatamānasaḥ| vimānaśatasaṁyuktaḥ śivaloke mahīyate
...शुद्ध, एकाग्रचित्त होकर समस्त पापों से मुक्त हो जाता है; सैकड़ों विमानों से युक्त होकर शिवलोक में महिमान्वित होता है।
श्लोक 3 (skanda.5.63.3)
भुवि पुण्यतमं तीर्थं सर्वपापहरं परम्। खगर्तासंगमो यत्र गंगेश्वरसमीपतः
bhuvi puṇyatamaṁ tīrthaṁ sarvapāpaharaṁ param| khagartāsaṁgamo yatra gaṁgeśvarasamīpataḥ
पृथ्वी पर एक अत्यंत पुण्यमय, समस्त पापों को हरने वाला श्रेष्ठ तीर्थ है, जहाँ गंगेश्वर के समीप खगर्ता का संगम है।
श्लोक 4 (skanda.5.63.4)
महापापहरं पुण्यं महापुण्यफलप्रदम्। आकाशात्पतिता यत्र गंगा त्रैलोक्य पावनी
mahāpāpaharaṁ puṇyaṁ mahāpuṇyaphalapradam| ākāśātpatitā yatra gaṁgā trailokya pāvanī
यह महापाप हरने वाला, पुण्यमय, महापुण्यफल देने वाला है — जहाँ त्रिलोकपावनी गंगा आकाश से गिरी थी...
श्लोक 5 (skanda.5.63.5)
विधृता शिरसि सद्यो महादेवेन शंभुना। तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा गंगेशमवलोकयेत्
vidhṛtā śirasi sadyo mahādevena śaṁbhunā| tasmiṁstīrthe naraḥ snātvā gaṁgeśamavalokayet
...और महादेव शंभु द्वारा तत्क्षण अपने शीश पर धारण की गई। उस तीर्थ में स्नान कर मनुष्य को गंगेश का दर्शन करना चाहिए।
श्लोक 6 (skanda.5.63.6)
गंगास्नानफलं प्राप्य विष्णु लोके महीयते। वीरेश्वरमनुप्राप्य तस्मिंस्तीर्थे नरो वसेत्
gaṁgāsnānaphalaṁ prāpya viṣṇu loke mahīyate| vīreśvaramanuprāpya tasmiṁstīrthe naro vaset
गंगा-स्नान का फल प्राप्त कर वह विष्णुलोक में महिमान्वित होता है। वीरेश्वर को प्राप्त कर मनुष्य को उस तीर्थ में निवास करना चाहिए...
श्लोक 7 (skanda.5.63.7)
सर्वपापविशुद्धात्मा वीरलोकमवाप्नुयात्। तीर्थमन्यन्महापुण्यं भुवि ख्यातं महर्षिभिः
sarvapāpaviśuddhātmā vīralokamavāpnuyāt| tīrthamanyanmahāpuṇyaṁ bhuvi khyātaṁ maharṣibhiḥ
...समस्त पापों से आत्मा शुद्ध होकर वह वीरलोक को प्राप्त होता है। महर्षियों द्वारा पृथ्वी पर विख्यात एक और महापुण्यमय तीर्थ है...
श्लोक 8 (skanda.5.63.8)
वामनकुण्डेति विख्यातं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्। यस्य दर्शनमात्रेण ब्रह्महत्यां व्यपोहति
vāmanakuṇḍeti vikhyātaṁ triṣu lokeṣu viśrutam| yasya darśanamātreṇa brahmahatyāṁ vyapohati
...जो वामनकुंड नाम से प्रसिद्ध, तीनों लोकों में विख्यात है; जिसके दर्शन मात्र से ब्रह्महत्या का दोष दूर हो जाता है।
श्लोक 9 (skanda.5.63.9)
मनोरथशतं प्राप्य पश्चाद्विष्णु पुरं व्रजेत्। व्यास उवाच। कदा काले समुत्पन्नं वामनाख्यं पुराऽनघ
manorathaśataṁ prāpya paścādviṣṇu puraṁ vrajet| vyāsa uvāca| kadā kāle samutpannaṁ vāmanākhyaṁ purā'nagha
सैकड़ों मनोरथ प्राप्त कर वह पश्चात् विष्णुपुर को जाता है। व्यास बोले — हे निष्पाप! यह वामन नामक वस्तु किस काल में उत्पन्न हुई?
श्लोक 10 (skanda.5.63.10)
तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि त्वत्तो ब्रह्मविदां वर। सनत्कुमार उवाच। शृणुष्व भो द्विजश्रेष्ठ कथां पापहरां पराम्
tatsarvaṁ śrotumicchāmi tvatto brahmavidāṁ vara| sanatkumāra uvāca| śṛṇuṣva bho dvijaśreṣṭha kathāṁ pāpaharāṁ parām
यह मैं आपसे विस्तार से सुनना चाहता हूँ, हे ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ! सनत्कुमार बोले — हे द्विजश्रेष्ठ! सुनो यह परम पापहारिणी कथा।
श्लोक 11 (skanda.5.63.11)
यस्य श्रवणमात्रेण सर्वपापात्प्रमुच्यते। दैत्येंद्रस्तु पुरा प्रोक्तो विष्णुभक्तिपरायणः
yasya śravaṇamātreṇa sarvapāpātpramucyate| daityeṁdrastu purā prokto viṣṇubhaktiparāyaṇaḥ
जिसके श्रवण मात्र से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। प्राचीन काल में विष्णुभक्ति में परायण एक दैत्येंद्र कहा गया...
श्लोक 12 (skanda.5.63.12)
प्रह्राद इति विख्यातः सर्वधर्मभृतां वरः। आचारविजितो धर्मः सत्येन विजिता रमा
prahrāda iti vikhyātaḥ sarvadharmabhṛtāṁ varaḥ| ācāravijito dharmaḥ satyena vijitā ramā
...प्रह्लाद नाम से विख्यात, समस्त धर्मधारियों में श्रेष्ठ। उसने आचार से धर्म को, सत्य से लक्ष्मी को जीत लिया था।
श्लोक 13 (skanda.5.63.13)
धैर्येण च धृता लोकाः क्षमया विधृता मही। गांभीर्येणाऽर्णवा दिव्याः शौर्येण शत्रुणा गणाः
dhairyeṇa ca dhṛtā lokāḥ kṣamayā vidhṛtā mahī| gāṁbhīryeṇā'rṇavā divyāḥ śauryeṇa śatruṇā gaṇāḥ
धैर्य से लोक धारण किये गये, क्षमा से पृथ्वी धारण की गई; गांभीर्य से दिव्य सागर, तथा शौर्य से शत्रु-समूह जीते गए।
श्लोक 14 (skanda.5.63.14)
प्रश्रयेणाभ्यागताश्च जितास्तेन महात्मना। दक्षिणाभिर्जितो यज्ञो हविषा हव्यवाहनः
praśrayeṇābhyāgatāśca jitāstena mahātmanā| dakṣiṇābhirjito yajño haviṣā havyavāhanaḥ
और उस महात्मा के पास आने वालों को उसकी विनम्रता ने जीत लिया; दक्षिणाओं से यज्ञ जीता गया, हविष्य से अग्नि जीती गई।
श्लोक 15 (skanda.5.63.15)
शौचाऽऽचारविशुद्धात्मा तपसा च हताऽशुभः। दानमानजिता विप्रा भोजनाच्छादना दिभिः
śaucā''cāraviśuddhātmā tapasā ca hatā'śubhaḥ| dānamānajitā viprā bhojanācchādanā dibhiḥ
शौच-आचार से शुद्धात्मा होकर, तप से अशुभ का नाश हुआ; दान-सम्मान से, भोजन-वस्त्रादि से ब्राह्मण जीते गए।
श्लोक 16 (skanda.5.63.16)
संस्कारेण जितं जन्म दमेनाऽऽत्मा सनातनः। प्राणायामजितो वायुर्योगध्यानजितो हरिः
saṁskāreṇa jitaṁ janma damenā''tmā sanātanaḥ| prāṇāyāmajito vāyuryogadhyānajito hariḥ
संस्कार से जन्म जीता गया, दम से सनातन आत्मा जीती गई; प्राणायाम से वायु, योग-ध्यान से हरि जीते गए।
श्लोक 17 (skanda.5.63.17)
ईदृशश्च महायोगी सत्यधर्म परायणः। प्रह्लादेन समो धीरो न भूतो न भविष्यति
īdṛśaśca mahāyogī satyadharma parāyaṇaḥ| prahlādena samo dhīro na bhūto na bhaviṣyati
ऐसा महायोगी, सत्यधर्म में परायण — प्रह्लाद के समान धीर न कोई हुआ है, न होगा।
श्लोक 18 (skanda.5.63.18)
तस्य पौत्रः सदाचारी बलिरित्यभिधीयते। तस्य पालयतः सम्यक्प्रजाः सम्यग्विवर्धिताः
tasya pautraḥ sadācārī balirityabhidhīyate| tasya pālayataḥ samyakprajāḥ samyagvivardhitāḥ
उसका पौत्र, सदाचारी, बलि नाम से कहा जाता है; उसके भलीभाँति शासन करने पर प्रजा सम्यक् रूप से समृद्ध हुई।
श्लोक 19 (skanda.5.63.19)
नाल्पायुर्न जडो मूर्खो न रोगी न च मत्सरी। अपुत्रो द्रव्यहीनश्च कोऽपि नाऽस्ति महीतले
nālpāyurna jaḍo mūrkho na rogī na ca matsarī| aputro dravyahīnaśca ko'pi nā'sti mahītale
पृथ्वी पर न कोई अल्पायु था, न जड़, न मूर्ख, न रोगी, न ईर्ष्यालु, न पुत्रहीन, न धनहीन।
श्लोक 20 (skanda.5.63.20)
महाराजो महीपालो यज्वा विपुलदक्षिणः। सप्तद्वीपवती तेन पालिता वसुधा सदा
mahārājo mahīpālo yajvā vipuladakṣiṇaḥ| saptadvīpavatī tena pālitā vasudhā sadā
वह महाराज, पृथ्वीपाल, प्रचुर दक्षिणा देने वाला यज्ञकर्ता, सप्तद्वीपवाली पृथ्वी को सदा पालता रहा।
श्लोक 21 (skanda.5.63.21)
एकदा च समासीने सभामध्ये वरासने। जय शब्दे वर्तमाने गंधर्वा ललितं जगुः
ekadā ca samāsīne sabhāmadhye varāsane| jaya śabde vartamāne gaṁdharvā lalitaṁ jaguḥ
एक बार सभा के मध्य श्रेष्ठ आसन पर बैठे हुए उसके पास, 'जय' शब्द होते हुए, गंधर्व मधुर गान गा रहे थे।
श्लोक 22 (skanda.5.63.22)
वाद्यमानेषु वाद्येषु ननृतुश्चाऽप्सरोगणाः। कथायां कथ्यमानायां शुभायां च विचक्षणैः
vādyamāneṣu vādyeṣu nanṛtuścā'psarogaṇāḥ| kathāyāṁ kathyamānāyāṁ śubhāyāṁ ca vicakṣaṇaiḥ
बजते हुए वाद्यों के साथ अप्सराओं के समूह नृत्य कर रहे थे; और विचक्षण जनों द्वारा शुभ कथा कही जा रही थी...
श्लोक 23 (skanda.5.63.23)
सूता वैतालिकाः सिद्धाश्चारणाश्च बहुश्रुताः। ऋषयश्च समायातास्तत्रैव द्विजसत्तम
sūtā vaitālikāḥ siddhāścāraṇāśca bahuśrutāḥ| ṛṣayaśca samāyātāstatraiva dvijasattama
...सूत, वैतालिक, सिद्ध, बहुश्रुत चारण तथा ऋषिगण वहीं एकत्र हुए थे, हे द्विजसत्तम!
श्लोक 24 (skanda.5.63.24)
सुन्दोपसुन्दतुहुंडाद्या महिषासुरकोल्बणाः। शुम्भनिशुम्भधूम्राक्षकालकेयाश्च दानवाः
sundopasundatuhuṁḍādyā mahiṣāsurakolbaṇāḥ| śumbhaniśumbhadhūmrākṣakālakeyāśca dānavāḥ
सुंद-उपसुंद, तुहंड आदि, भयंकर महिषासुर, शुंभ-निशुंभ, धूम्राक्ष, कालकेय आदि दानव...
श्लोक 25 (skanda.5.63.25)
कालनेमिश्च विक्रांतो दौर्हृदो मूषको यमः। निकुम्भः कुम्भविशठो ह्यन्धकश्च महाबलः
kālanemiśca vikrāṁto daurhṛdo mūṣako yamaḥ| nikumbhaḥ kumbhaviśaṭho hyandhakaśca mahābalaḥ
...पराक्रमी कालनेमि, दौर्हृद, मूषक, यम (नामक दानव), निकुंभ, कुंभ, विशठ, महाबली अंधक...
श्लोक 26 (skanda.5.63.26)
शंखो जलंधरो रौद्रो वातापी च बलाधिकः। सर्वजिद्विश्वहंता च कामचारी हलायुधः
śaṁkho jalaṁdharo raudro vātāpī ca balādhikaḥ| sarvajidviśvahaṁtā ca kāmacārī halāyudhaḥ
...शंख, रौद्र जलंधर, बलशाली वातापी, सर्वजयी विश्वहंता तथा स्वच्छंद विचरण करने वाला हलायुध...
श्लोक 27 (skanda.5.63.27)
एते चाऽन्ये च बहवो दनुवंशवि वर्धनाः। उपासांचक्रिरे तत्र बलिराजमकल्मषम्
ete cā'nye ca bahavo danuvaṁśavi vardhanāḥ| upāsāṁcakrire tatra balirājamakalmaṣam
...ये और अन्य अनेक दनुवंश को बढ़ाने वाले उस निष्कलंक राजा बलि की उपासना करते थे।
श्लोक 28 (skanda.5.63.28)
सिद्धा नागाश्च यक्षाश्च किन्नराः किंपुरुषास्तथा। खेचरा भूचरा बाला राक्षसाश्चैव दारुणाः
siddhā nāgāśca yakṣāśca kinnarāḥ kiṁpuruṣāstathā| khecarā bhūcarā bālā rākṣasāścaiva dāruṇāḥ
सिद्ध, नाग, यक्ष, किन्नर, किंपुरुष, आकाशचारी, भूचारी, बालक तथा भयंकर राक्षस...
श्लोक 29 (skanda.5.63.29)
एते चाऽन्ये च बहवो राजानं पर्युपासत। तत्र सभा महादिव्या शुशुभे च द्विजोत्तम
ete cā'nye ca bahavo rājānaṁ paryupāsata| tatra sabhā mahādivyā śuśubhe ca dvijottama
...ये और अन्य अनेक राजा की उपासना करते थे; हे द्विजोत्तम! वह सभा अत्यंत दिव्य शोभा से सुशोभित थी।
श्लोक 30 (skanda.5.63.30)
ग्रहैरुज्वलितैः कीर्णो शरदीव नभःस्थलम्। तत्सभायां समासीनो रराज बलिराट् तथा
grahairujvalitaiḥ kīrṇo śaradīva nabhaḥsthalam| tatsabhāyāṁ samāsīno rarāja balirāṭ tathā
तेजस्वी ग्रहों से भरे शरद् ऋतु के आकाश के समान; उस सभा में विराजमान होकर बलि राजा उसी प्रकार शोभित हो रहे थे...
श्लोक 31 (skanda.5.63.31)
मरुद्भिरिव संवीतो वासवो दिवि देवतैः। एकदा च सभामध्ये नारदो देवदर्शनः
marudbhiriva saṁvīto vāsavo divi devataiḥ| ekadā ca sabhāmadhye nārado devadarśanaḥ
...जैसे स्वर्ग में देवताओं सहित मरुद्गणों से घिरे वासव (इंद्र)। एक बार उस सभा के मध्य देवदर्शी नारद...
श्लोक 32 (skanda.5.63.32)
आगतस्तेषु सर्वेषु दानवेषु स्थितेषु च। दृष्ट्वा तमागतं सर्वे ह्युत्तस्थुर्दितिनंदनाः
āgatasteṣu sarveṣu dānaveṣu sthiteṣu ca| dṛṣṭvā tamāgataṁ sarve hyuttasthurditinaṁdanāḥ
...आये, जब वे सभी दानव वहाँ उपस्थित थे। उन्हें आया देखकर दिति के समस्त पुत्र उठ खड़े हुए।
श्लोक 33 (skanda.5.63.33)
ववन्दिरे सर्वशस्तु बलिना किंनरोत्त मम्। सकृत्य चासनं दत्त्वा पप्रच्छ कुशलं नृपः
vavandire sarvaśastu balinā kiṁnarotta mam| sakṛtya cāsanaṁ dattvā papraccha kuśalaṁ nṛpaḥ
बलि सहित सभी ने उस किन्नरश्रेष्ठ को वंदन किया; आदरपूर्वक आसन देकर राजा ने कुशल पूछा।
श्लोक 34 (skanda.5.63.34)
कृत्वाऽऽतिथ्यं समासीनो नारदः प्राह सत्तमः। मेघगंभीरया वाचा बलिं प्राहर्षिस त्तमः
kṛtvā''tithyaṁ samāsīno nāradaḥ prāha sattamaḥ| meghagaṁbhīrayā vācā baliṁ prāharṣisa ttamaḥ
आतिथ्य कर, बैठे हुए, नारद ने मेघ के समान गंभीर वाणी में उस श्रेष्ठ ऋषि ने बलि से कहा।
श्लोक 35 (skanda.5.63.35)
नारद उवाच। श्रूयतां दितिजश्रेष्ठ गतोऽहं वृषमंदिरे। तत्र देवसभा रम्या दिव्याऽभिप्रायसंयुता। तत्र देवाः सगंधर्वाः पुरंदरपुरोगमाः
nārada uvāca| śrūyatāṁ ditijaśreṣṭha gato'haṁ vṛṣamaṁdire| tatra devasabhā ramyā divyā'bhiprāyasaṁyutā| tatra devāḥ sagaṁdharvāḥ puraṁdarapurogamāḥ
नारद बोले — 'हे दितिजश्रेष्ठ! सुनो, मैं वृष (इंद्र) के भवन गया था; वहाँ दिव्य अभिप्राय से युक्त रमणीय देवसभा थी। वहाँ पुरंदर (इंद्र) के नेतृत्व में गंधर्वों सहित देवगण...
श्लोक 36 (skanda.5.63.36)
समासीनाः कथां पुण्यां कथयंति परस्परम्। तत्र दैत्यकथां शुभ्रां मया ख्यातां न सेहिरे
samāsīnāḥ kathāṁ puṇyāṁ kathayaṁti parasparam| tatra daityakathāṁ śubhrāṁ mayā khyātāṁ na sehire
...बैठे हुए, परस्पर पुण्यमयी कथाएँ कह रहे थे; वहाँ मेरे द्वारा कही गई दैत्यों की उज्ज्वल कथा को वे सह न सके।
श्लोक 37 (skanda.5.63.37)
हिरण्यकशिपुर्दैत्यः पुराऽऽसीच्च प्रजापतिः। त्रैलोक्यविजयी नेता येनेयं वसुधा जिता
hiraṇyakaśipurdaityaḥ purā''sīcca prajāpatiḥ| trailokyavijayī netā yeneyaṁ vasudhā jitā
'प्राचीन काल में हिरण्यकशिपु नामक दैत्य प्रजापति था, त्रैलोक्यविजयी नेता, जिसने यह पृथ्वी जीती थी।'
श्लोक 38 (skanda.5.63.38)
सर्वलोकं वशीकृत्य बुभुजे च वसुन्धराम्। अतीव तेजःसंपन्नो महाबलपराक्रमः
sarvalokaṁ vaśīkṛtya bubhuje ca vasundharām| atīva tejaḥsaṁpanno mahābalaparākramaḥ
'समस्त लोक को वश में कर उसने पृथ्वी का भोग किया, अत्यंत तेजस्वी, महान् बल-पराक्रम से युक्त।'
श्लोक 39 (skanda.5.63.39)
वशी सर्वत्रगः कामी नृसिंहेन निपातितः। बलिं कियद्बलं लोके नारद त्व प्रशंससि
vaśī sarvatragaḥ kāmī nṛsiṁhena nipātitaḥ| baliṁ kiyadbalaṁ loke nārada tva praśaṁsasi
'सर्वत्रगामी, संयमी, फिर भी कामी, वह नृसिंह द्वारा मार गिराया गया। हे नारद! बलि का क्या बल है, जिसकी तुम इतनी प्रशंसा करते हो?'
श्लोक 40 (skanda.5.63.40)
इति मां धर्षयित्वा च बिडौजा लोकसंग्रही। बहुधा वादयन्वादान्कटुकान्दानवोत्तम
iti māṁ dharṣayitvā ca biḍaujā lokasaṁgrahī| bahudhā vādayanvādānkaṭukāndānavottama
'इस प्रकार मुझे अपमानित कर, लोकसंग्रही इंद्र ने अनेक प्रकार के कटु वचन कहे, हे दानवश्रेष्ठ!'
श्लोक 41 (skanda.5.63.41)
तस्मात्त्वं दानवश्रेष्ठ पितृपर्यागतां महीम्। विजित्य सार्वभौमत्वं लभस्व वसुधाधिप
tasmāttvaṁ dānavaśreṣṭha pitṛparyāgatāṁ mahīm| vijitya sārvabhaumatvaṁ labhasva vasudhādhipa
'इसलिए, हे दानवश्रेष्ठ! पितरों से प्राप्त इस पृथ्वी को जीतकर सार्वभौमत्व प्राप्त करो, हे वसुधाधिप!'
श्लोक 42 (skanda.5.63.42)
कियद्बलधृता नूनं देवाश्च दनुजोत्तम। पलायनपरा दांता सदैव रणभीरवः
kiyadbaladhṛtā nūnaṁ devāśca danujottama| palāyanaparā dāṁtā sadaiva raṇabhīravaḥ
'देवताओं का बल ही कितना है, हे दनुजोत्तम? वे सदा पलायनशील, भय से संयमित तथा युद्ध से सदा भयभीत रहते हैं।'
श्लोक 43 (skanda.5.63.43)
मम वाक्यपरो भूत्वा त्रैलोक्याधिपतिर्भव। नारदस्य वचः श्रुत्वा वलिर्वैरोचनिस्तदा
mama vākyaparo bhūtvā trailokyādhipatirbhava| nāradasya vacaḥ śrutvā valirvairocanistadā
'मेरी बात मानकर तुम त्रैलोक्य के अधिपति बनो।' नारद के इन वचनों को सुनकर विरोचन-पुत्र बलि तब...
श्लोक 44 (skanda.5.63.44)
चकार कोपमतुलं त्रैलोक्यविजये द्विज। मंत्रयित्वाऽसुरान्सर्वान्सर्वदैत्यजनेश्वरः
cakāra kopamatulaṁ trailokyavijaye dvija| maṁtrayitvā'surānsarvānsarvadaityajaneśvaraḥ
...त्रैलोक्य विजय हेतु अतुल क्रोध करने लगा, हे द्विज! समस्त असुरों से मंत्रणा कर, वह समस्त दैत्यजनों का स्वामी...
श्लोक 45 (skanda.5.63.45)
संग्राममकरोत्तीव्रं वासवेन बलीयसा। जित्वा च सकलाल्देवान्वशीचक्रे सवासवान्
saṁgrāmamakarottīvraṁ vāsavena balīyasā| jitvā ca sakalāldevānvaśīcakre savāsavān
...बलशाली वासव (इंद्र) के साथ भीषण युद्ध किया; और समस्त देवताओं को जीतकर, वासव सहित उन्हें वश में कर लिया।
श्लोक 46 (skanda.5.63.46)
सर्वलोकेश्वरो जातो बलिर्वैरोचनोऽसुरः। हताधिकारास्त्रिदशा भ्रष्टराज्याः पराजिताः
sarvalokeśvaro jāto balirvairocano'suraḥ| hatādhikārāstridaśā bhraṣṭarājyāḥ parājitāḥ
विरोचन-पुत्र दानव बलि समस्त लोकों का स्वामी बन गया; तीसों देवगण अधिकार से रहित, राज्यभ्रष्ट, पराजित हुए...
श्लोक 47 (skanda.5.63.47)
विचरंति यथा मर्त्यास्तेन देवगणा भुवि। किंचित्कालं समासाद्य ब्रह्माणं शरणं ययुः
vicaraṁti yathā martyāstena devagaṇā bhuvi| kiṁcitkālaṁ samāsādya brahmāṇaṁ śaraṇaṁ yayuḥ
...उसके द्वारा मनुष्यों के समान पृथ्वी पर विचरण करने लगे। कुछ समय बीतने पर वे ब्रह्मा की शरण में गये।
श्लोक 48 (skanda.5.63.48)
भो ब्रह्मन्बलिना भ्रष्टा देवलोकात्परंतप। किं कुर्मः क्व च गच्छामः कमुपा यं चरामहे
bho brahmanbalinā bhraṣṭā devalokātparaṁtapa| kiṁ kurmaḥ kva ca gacchāmaḥ kamupā yaṁ carāmahe
'हे ब्रह्मन्! हे परंतप! हम बलि द्वारा देवलोक से भ्रष्ट कर दिये गये हैं; हम क्या करें, कहाँ जायें, कौन-सा उपाय अपनायें?'
श्लोक 49 (skanda.5.63.49)
ब्रह्मोवाच। श्रूयतां भोः सुरश्रेष्ठा युष्माकं साधनं परम्। यूयं यात पुरीं रम्यां पद्मावतीमम रोत्तमाः
brahmovāca| śrūyatāṁ bhoḥ suraśreṣṭhā yuṣmākaṁ sādhanaṁ param| yūyaṁ yāta purīṁ ramyāṁ padmāvatīmama rottamāḥ
ब्रह्मा बोले — 'हे सुरश्रेष्ठो! सुनो अपना परम उपाय — हे अमरोत्तमो! तुम रमणीय पद्मावती नगरी को जाओ।
श्लोक 50 (skanda.5.63.50)
तत्र तीर्थवरं श्रेष्ठं नाम्ना चोत्तरमानसम्। यत्राऽष्टसिद्धिदा ख्याता महासिद्धिप्रदा नृणाम्
tatra tīrthavaraṁ śreṣṭhaṁ nāmnā cottaramānasam| yatrā'ṣṭasiddhidā khyātā mahāsiddhipradā nṛṇām
वहाँ उत्तरमानस नामक श्रेष्ठ तीर्थ है, जहाँ अष्टसिद्धि देने वाली, मनुष्यों को महासिद्धि प्रदान करने वाली देवी विख्यात है।
श्लोक 51 (skanda.5.63.51)
निधयश्च नवैवापि तत्र तिष्ठंति सत्तम। तस्यैव दक्षिणे भागे विष्णुतीर्थमनुत्तमम्
nidhayaśca navaivāpi tatra tiṣṭhaṁti sattama| tasyaiva dakṣiṇe bhāge viṣṇutīrthamanuttamam
वहाँ नौ निधियाँ भी विराजमान हैं, हे सत्तम! उसी के दक्षिण भाग में अनुपम विष्णुतीर्थ है।
श्लोक 52 (skanda.5.63.52)
तत्र स्नात्वा नरः पश्येत्सिद्धेश्वरीं सुसिद्धिदाम्। ऋद्धिसिद्धिपरोभूत्वा विष्णु लोके महीयते
tatra snātvā naraḥ paśyetsiddheśvarīṁ susiddhidām| ṛddhisiddhiparobhūtvā viṣṇu loke mahīyate
वहाँ स्नान कर मनुष्य को सिद्धि देने वाली सिद्धेश्वरी का दर्शन करना चाहिए; ऋद्धि-सिद्धि से युक्त होकर वह विष्णुलोक में महिमान्वित होता है।
श्लोक 53 (skanda.5.63.53)
आश्विनस्य सिते पक्षे दशम्यां दिवसे तथा। अष्टसिद्धिशमीदेशे गणेश्वरं प्रपूजयेत्
āśvinasya site pakṣe daśamyāṁ divase tathā| aṣṭasiddhiśamīdeśe gaṇeśvaraṁ prapūjayet
आश्विन मास की शुक्ल दशमी को अष्टसिद्धि के शमी-प्रदेश में गणेश्वर का पूजन करना चाहिए।
श्लोक 54 (skanda.5.63.54)
विजयी सर्वलोकेषु जाय ते नात्र संशयः। शमीमूलस्थितं नित्यमृद्धिसिद्धिवरप्रदम्
vijayī sarvalokeṣu jāya te nātra saṁśayaḥ| śamīmūlasthitaṁ nityamṛddhisiddhivarapradam
वह समस्त लोकों में विजयी होता है, इसमें संशय नहीं। शमी के मूल में सदा विराजमान, ऋद्धि-सिद्धि का वरदान देने वाले गणेश की...
श्लोक 55 (skanda.5.63.55)
पूजयेद्वै नरो नित्यं गणेशं सर्वकामदम्। सर्वकामवरं लब्ध्वा पुत्रवान्धनवान्भवेत्
pūjayedvai naro nityaṁ gaṇeśaṁ sarvakāmadam| sarvakāmavaraṁ labdhvā putravāndhanavānbhavet
...नित्य पूजा करनी चाहिए, समस्त कामनाएँ देने वाले की; समस्त इच्छित वर प्राप्त कर मनुष्य पुत्रवान् और धनवान् बनता है।
श्लोक 56 (skanda.5.63.56)
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन महाकालवनं व्रजेत्। यत्र विष्णुसरस्तीर्थं तत्र गच्छत माचिरम्।
tasmātsarvaprayatnena mahākālavanaṁ vrajet| yatra viṣṇusarastīrthaṁ tatra gacchata māciram|
इसलिए सर्वप्रयत्न से महाकालवन जाना चाहिए; जहाँ विष्णुसरस्तीर्थ है, वहाँ बिना विलंब के जाओ।
श्लोक 57 (skanda.5.63.57)
उपासनां सुरश्रेष्ठा विष्णोरतु लेतेजसः। कुरुध्वं सर्वभीतिभ्यस्त्राता स स्यात्सुरोत्तमाः
upāsanāṁ suraśreṣṭhā viṣṇoratu letejasaḥ| kurudhvaṁ sarvabhītibhyastrātā sa syātsurottamāḥ
'हे सुरश्रेष्ठो! अतुल तेजस्वी विष्णु की उपासना करो; वे तुम्हें समस्त भयों से रक्षा करने वाले होंगे, हे श्रेष्ठ देवो!'
श्लोक 58 (skanda.5.63.58)
इति श्रुत्वा वचस्तस्य ब्रह्मणः शंसितात्मनः। महाकालवने प्राप्ता देवास्ते कार्यसाधकाः
iti śrutvā vacastasya brahmaṇaḥ śaṁsitātmanaḥ| mahākālavane prāptā devāste kāryasādhakāḥ
आत्मज्ञानी ब्रह्मा के इन वचनों को सुनकर, कार्यसिद्धि में तत्पर वे देवता महाकालवन में पहुँचे।
श्लोक 59 (skanda.5.63.59)
अत्राऽऽगात्य शुचीभूय स्नानदानादिकर्मभिः। उपासांचक्रिरे सिद्धा विष्णुभक्तिपरायणाः
atrā''gātya śucībhūya snānadānādikarmabhiḥ| upāsāṁcakrire siddhā viṣṇubhaktiparāyaṇāḥ
वहाँ आकर, पवित्र होकर, स्नान-दान आदि कर्मों से, वे सिद्ध देवता विष्णुभक्ति में परायण होकर उपासना करने लगे।
श्लोक 60 (skanda.5.63.60)
ब्रह्माणमथ ते सर्वे पप्रच्छुर्विधिमादरात्। उपासनाया देवस्य देवाः शक्रपुरोगमाः
brahmāṇamatha te sarve papracchurvidhimādarāt| upāsanāyā devasya devāḥ śakrapurogamāḥ
तब वे सभी, इंद्र के नेतृत्व में देवगण, आदरपूर्वक ब्रह्मा से उस देव की उपासना की विधि पूछने लगे।
श्लोक 61 (skanda.5.63.61)
देवा ऊचुः। ब्रह्मन्केन प्रकारेण विष्णुभक्तिः परा भवेत्। तत्सर्वं श्रोतु मिच्छामस्त्वत्तो ब्रह्मविदां वर
devā ūcuḥ| brahmankena prakāreṇa viṣṇubhaktiḥ parā bhavet| tatsarvaṁ śrotu micchāmastvatto brahmavidāṁ vara
देवगण बोले — 'हे ब्रह्मन्! किस प्रकार विष्णुभक्ति परम हो सकती है? यह सब हम आपसे सुनना चाहते हैं, हे ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ!'
श्लोक 62 (skanda.5.63.62)
ब्रह्मोवाच। श्रूयतां भोः सुरश्रेष्ठा विष्णुभक्तिमनुत्तमाम्। शुक्लांबरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजम्
brahmovāca| śrūyatāṁ bhoḥ suraśreṣṭhā viṣṇubhaktimanuttamām| śuklāṁbaradharaṁ devaṁ śaśivarṇaṁ caturbhujam
ब्रह्मा बोले — 'हे सुरश्रेष्ठो! सुनो विष्णु की अनुपम भक्ति — श्वेत वस्त्र धारण किये, चंद्रमा के समान वर्णवाले, चतुर्भुज देव का...
श्लोक 63 (skanda.5.63.63)
प्रसन्नवदनं ध्यायेत्सर्वविघ्नोपशांतये। लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराजयः
prasannavadanaṁ dhyāyetsarvavighnopaśāṁtaye| lābhasteṣāṁ jayasteṣāṁ kutasteṣāṁ parājayaḥ
...प्रसन्न मुखवाले का ध्यान समस्त विघ्नों की शांति के लिए करना चाहिए। उनका लाभ है, उनकी विजय है, उन्हें पराजय कहाँ से प्राप्त हो...
श्लोक 64 (skanda.5.63.64)
येषामिंदीवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः। अभीप्सितार्थसिद्ध्यर्थं पूज्यते यः सुरैरपि
yeṣāmiṁdīvaraśyāmo hṛdayastho janārdanaḥ| abhīpsitārthasiddhyarthaṁ pūjyate yaḥ surairapi
...जिनके हृदय में नीलकमल के समान श्याम जनार्दन विराजमान हैं, जो अभीष्ट सिद्धि के लिए देवताओं द्वारा भी पूजित हैं?
श्लोक 65 (skanda.5.63.65)
सर्वविघ्नहरस्तस्मै गणाधिपतये नमः। कल्पादौ सृष्टिकामेन प्रेरितोहं च शौरिणा
sarvavighnaharastasmai gaṇādhipataye namaḥ| kalpādau sṛṣṭikāmena preritohaṁ ca śauriṇā
उन समस्त विघ्नों को हरने वाले गणाधिपति को नमस्कार है — मैं सृष्टि की कामना से शौरि (विष्णु) द्वारा प्रेरित होकर भी...
श्लोक 66 (skanda.5.63.66)
न शक्तो वै प्रजाः कर्तुं विष्णुध्यानपरायणः। एतस्मिन्नंतरे सद्यो मार्कण्डेयो महाऋषिः
na śakto vai prajāḥ kartuṁ viṣṇudhyānaparāyaṇaḥ| etasminnaṁtare sadyo mārkaṇḍeyo mahāṛṣiḥ
...प्रजा उत्पन्न करने में असमर्थ था, विष्णु के ध्यान में परायण होने के कारण। उसी समय अचानक महर्षि मार्कण्डेय...
श्लोक 67 (skanda.5.63.67)
सर्वसिद्धेश्वरो दांतो दीर्घायुर्विजितेंद्रियः। मया दृष्टो ऽथ गत्वा तं तदाहं समुपस्थितः। ततः प्रफुल्लनयनौ सत्कृत्य चेतरेतरम्
sarvasiddheśvaro dāṁto dīrghāyurvijiteṁdriyaḥ| mayā dṛṣṭo 'tha gatvā taṁ tadāhaṁ samupasthitaḥ| tataḥ praphullanayanau satkṛtya cetaretaram
...समस्त सिद्धियों के स्वामी, संयमी, दीर्घायु, जितेंद्रिय, मुझे दिखाई दिये, और मैं जाकर उनके समीप उपस्थित हुआ। तब प्रफुल्लित नेत्रों से एक-दूसरे का सत्कार कर...
श्लोक 68 (skanda.5.63.68)
पृच्छमानौ परं स्वास्थ्यं सुखासीनौ सुरोत्तमाः। तदा मया स पृष्टो वै मार्कण्डेयो महामुनिः
pṛcchamānau paraṁ svāsthyaṁ sukhāsīnau surottamāḥ| tadā mayā sa pṛṣṭo vai mārkaṇḍeyo mahāmuniḥ
...परम कुशलक्षेम पूछते हुए, हे सुरोत्तमो! सुखपूर्वक बैठे हुए, तब मैंने उन महामुनि मार्कण्डेय से पूछा।
श्लोक 69 (skanda.5.63.69)
भगवन्केन प्रकारेण प्रजा मेऽनामया भवेत्। तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि भगवन्मुनिवंदित
bhagavankena prakāreṇa prajā me'nāmayā bhavet| tatsarvaṁ śrotumicchāmi bhagavanmunivaṁdita
'हे भगवन्! किस प्रकार मेरी प्रजा रोगरहित हो सके? यह सब मैं आपसे सुनना चाहता हूँ, हे मुनिवंदित भगवन्!'
श्लोक 70 (skanda.5.63.70)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। विष्णुभक्तिः परा नित्या सर्वार्तिदुःखनाशिनी। सर्वपापहरा पुण्या सर्वसुखप्रदायिनी
śrīmārkaṇḍeya uvāca| viṣṇubhaktiḥ parā nityā sarvārtiduḥkhanāśinī| sarvapāpaharā puṇyā sarvasukhapradāyinī
श्रीमार्कण्डेय बोले — 'विष्णुभक्ति ही परम, नित्य, समस्त पीड़ा-दुःख का नाश करने वाली है; समस्त पापों को हरने वाली, पुण्यमयी, समस्त सुख देने वाली है।
श्लोक 71 (skanda.5.63.71)
एषा ब्राह्मी महाविद्या न देया यस्य कस्यचित्। कृतघ्नाय ह्यशिष्याय नास्तिकायानृताय च
eṣā brāhmī mahāvidyā na deyā yasya kasyacit| kṛtaghnāya hyaśiṣyāya nāstikāyānṛtāya ca
यह ब्राह्मी महाविद्या किसी को भी नहीं देनी चाहिए — कृतघ्न को, अशिष्य को, नास्तिक को तथा असत्यवादी को कभी नहीं...
श्लोक 72 (skanda.5.63.72)
ईर्ष्यकाय च रूक्षाय कामिकाय कदाचन। तद्गतं सर्वं विघ्रंति यत्तद्धर्मं सनातनम्
īrṣyakāya ca rūkṣāya kāmikāya kadācana| tadgataṁ sarvaṁ vighraṁti yattaddharmaṁ sanātanam
...न ईर्ष्यालु को, न रूखे स्वभाव वाले को, न कामी को कभी दें। जो उसे इन्हें देते हैं, वे उस समस्त सनातन धर्म में विघ्न डालते हैं।
श्लोक 73 (skanda.5.63.73)
एतद्गुह्यतमं शास्त्रं सर्वपापप्रणाशनम्। पवित्रं च पवित्राणां पावनानां च पावनम्
etadguhyatamaṁ śāstraṁ sarvapāpapraṇāśanam| pavitraṁ ca pavitrāṇāṁ pāvanānāṁ ca pāvanam
यह अत्यंत गोपनीय शास्त्र समस्त पापों का नाश करने वाला है; पवित्रों का भी पवित्र, तथा पावनों का भी पावन है।
श्लोक 74 (skanda.5.63.74)
विष्णोर्नामसहस्रं च विष्णुभक्तिकरं शुभम्। सर्वसिद्धिकरं नृणां भुक्तिमुक्तिप्रदं शुभम्
viṣṇornāmasahasraṁ ca viṣṇubhaktikaraṁ śubham| sarvasiddhikaraṁ nṛṇāṁ bhuktimuktipradaṁ śubham
विष्णु के सहस्र नाम विष्णुभक्ति को उत्पन्न करने वाले, शुभ, मनुष्यों की समस्त सिद्धियाँ करने वाले, भुक्ति-मुक्ति देने वाले, शुभ हैं।
श्लोक 75 (skanda.5.63.75)
ॐ अस्य श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रमंत्रस्य मार्कंडेय ऋषिः विष्णुर्देवता अनुष्टुप्च्छंदः सर्वकामावात्यर्थे जपे विनियोगः। अथ ध्यानम्। सजलजलदनीलं दर्शितोदारशीलं करतलधृतशैलं वेणुवाद्ये रसालम्। व्रजजन कुलपालं कामिनीकेलिलोलं तरुणतुलसिमालं नौमि गोपालबालम्
ॐ asya śrīviṣṇusahasranāmastotramaṁtrasya mārkaṁḍeya ṛṣiḥ viṣṇurdevatā anuṣṭupcchaṁdaḥ sarvakāmāvātyarthe jape viniyogaḥ| atha dhyānam| sajalajaladanīlaṁ darśitodāraśīlaṁ karataladhṛtaśailaṁ veṇuvādye rasālam| vrajajana kulapālaṁ kāminīkelilolaṁ taruṇatulasimālaṁ naumi gopālabālam
ॐ। इस श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्र-मंत्र के मार्कण्डेय ऋषि हैं, विष्णु देवता हैं, अनुष्टुप् छंद है; समस्त कामनाओं की सिद्धि हेतु जप में इसका विनियोग है। अब ध्यान — जलयुक्त मेघ के समान श्याम, उदार शील को प्रकट करने वाले, हथेली पर पर्वत धारण किये, वंशी-वादन में मधुर; व्रजजन के कुल के पालक, प्रिया के साथ क्रीड़ा में विभोर, नवीन तुलसी की माला पहने — उस गोपालबालक को मैं नमन करता हूँ।
श्लोक 76 (skanda.5.63.76)
ॐविश्वं विष्णुर्हषीकेशः सर्वात्मा सर्वभावनः। सर्वगः शर्वरीनाथो भूतग्रामाऽऽशयाशयः
ॐviśvaṁ viṣṇurhaṣīkeśaḥ sarvātmā sarvabhāvanaḥ| sarvagaḥ śarvarīnātho bhūtagrāmā''śayāśayaḥ
विश्व (सम्पूर्ण जगत्स्वरूप), विष्णु (सर्वव्यापी), हृषीकेश (इंद्रियों के स्वामी), सर्वात्मा (सबकी आत्मा), सर्वभावन (सबके उत्पत्तिकारक), सर्वग (सर्वत्र विद्यमान), शर्वरीनाथ (रात्रि के स्वामी), भूतग्रामाशयाशय (प्राणिसमूह के आश्रय और आशय) — इन नामों से भगवान् की वंदना है।
श्लोक 77 (skanda.5.63.77)
अनादिनिधनो देवः सर्वज्ञः सर्वसंभवः। सर्वव्यापी जगद्धाता सर्वशक्तिधरोऽनघः। जगद्बीजं जगत्स्रष्टा जगदीशो जगत्पतिः। जगद्गुरुर्जगन्नाथो जगद्धाता जगन्मयः
anādinidhano devaḥ sarvajñaḥ sarvasaṁbhavaḥ| sarvavyāpī jagaddhātā sarvaśaktidharo'naghaḥ| jagadbījaṁ jagatsraṣṭā jagadīśo jagatpatiḥ| jagadgururjagannātho jagaddhātā jaganmayaḥ
अनादिनिधन (आदि-अंत रहित), देव (दिव्यस्वरूप), सर्वज्ञ (सर्वज्ञाता), सर्वसंभव (सबका उद्गम), सर्वव्यापी, जगद्धाता (जगत् के धारक), सर्वशक्तिधर, अनघ (निष्पाप), जगद्बीज (जगत् का बीज), जगत्स्रष्टा, जगदीश, जगत्पति, जगद्गुरु, जगन्नाथ, जगद्धाता, जगन्मय (जगत्स्वरूप)।
श्लोक 78 (skanda.5.63.78)
सर्वाऽऽकृतिधरः सर्वविश्वरूपी जनार्दनः। अजन्मा शाश्वतो नित्यो विश्वाधा रो विभुः प्रभुः
sarvā''kṛtidharaḥ sarvaviśvarūpī janārdanaḥ| ajanmā śāśvato nityo viśvādhā ro vibhuḥ prabhuḥ
सर्वाकृतिधर (सभी रूपों को धारण करने वाले), सर्वविश्वरूपी, जनार्दन, अजन्मा, शाश्वत, नित्य, विश्वाधार (जगत् के आधार), विभु, प्रभु।
श्लोक 79 (skanda.5.63.79)
बहुरूपैकरूपश्च सर्वरूपधरो हरः। कालाग्निप्रभवो वायुः प्रलयांतकरोऽक्षयः
bahurūpaikarūpaśca sarvarūpadharo haraḥ| kālāgniprabhavo vāyuḥ pralayāṁtakaro'kṣayaḥ
बहुरूपैकरूप (अनेक रूप होते हुए भी एक), सर्वरूपधर, हर (संहारक), कालाग्निप्रभव (कालाग्नि से उत्पन्न), वायु, प्रलयांतकर (प्रलय लाने वाले), अक्षय (अविनाशी)।
श्लोक 80 (skanda.5.63.80)
महार्णवो महामेघो जलबुद्बुदसं भवः। संस्कृतो विकृतो मत्स्यो महामत्स्यस्तिमिंगिलः
mahārṇavo mahāmegho jalabudbudasaṁ bhavaḥ| saṁskṛto vikṛto matsyo mahāmatsyastimiṁgilaḥ
महार्णव (महासागर), महामेघ, जलबुद्बुदसंभव (जल के बुलबुले से प्रकट होने वाले), संस्कृत, विकृत, मत्स्य (मत्स्यावतार), महामत्स्य, तिमिंगिल (महाजलचर को निगलने वाला)।
श्लोक 81 (skanda.5.63.81)
अनंतो वासुकिः शेषो वराहो धरणीधरः। पयःक्षीरविवेकाढ्यो हंसो हेम गिरिस्थितः
anaṁto vāsukiḥ śeṣo varāho dharaṇīdharaḥ| payaḥkṣīravivekāḍhyo haṁso hema giristhitaḥ
अनंत (शेषनाग), वासुकि, शेष, वराह (वराहावतार), धरणीधर (पृथ्वी के धारक), पयःक्षीरविवेकाढ्य (दूध और जल में भेद करने वाले हंस की विवेक-सम्पन्नता), हंस, हेमगिरिस्थित (मेरु पर्वत पर स्थित)।
श्लोक 82 (skanda.5.63.82)
हयग्रीवो विशालाक्षो हयकर्णो हयाकृतिः। मंथनो रत्नहारी च कूर्मो धरधराधरः
hayagrīvo viśālākṣo hayakarṇo hayākṛtiḥ| maṁthano ratnahārī ca kūrmo dharadharādharaḥ
हयग्रीव (अश्वग्रीव अवतार), विशालाक्ष, हयकर्ण, हयाकृति, मंथन (समुद्रमंथन करने वाले), रत्नहारी, कूर्म (कूर्मावतार), धरधराधर (पृथ्वी को धारण करने वाले पर्वत को धारण करने वाले)।
श्लोक 83 (skanda.5.63.83)
विनिद्रो निद्रितो नंदी सुनंदो नंदनप्रियः। नाभिनालमृणाली च स्वयंभूश्चतुराननः
vinidro nidrito naṁdī sunaṁdo naṁdanapriyaḥ| nābhinālamṛṇālī ca svayaṁbhūścaturānanaḥ
विनिद्र (अनिद्र), निद्रित, नंदी (आनंदस्वरूप), सुनंद, नंदनप्रिय (नंदनवन के प्रिय), नाभिनालमृणाली (नाभि-कमलनाल), स्वयंभू, चतुरानन (ब्रह्मा)।
श्लोक 84 (skanda.5.63.84)
प्रजापतिपरो दक्षः सृष्टिकर्ता प्रजाकरः। मरीचिः कश्यपो दक्षः सुरासुरा गुरुः कविः
prajāpatiparo dakṣaḥ sṛṣṭikartā prajākaraḥ| marīciḥ kaśyapo dakṣaḥ surāsurā guruḥ kaviḥ
प्रजापतिपर (प्रजापति से भी परे), दक्ष, सृष्टिकर्ता, प्रजाकर (प्रजा को उत्पन्न करने वाले), मरीचि, कश्यप, दक्ष, सुरासुरागुरु (देव-असुरों के गुरु), कवि (द्रष्टा)।
श्लोक 85 (skanda.5.63.85)
वामनो वाममार्गी च वामकर्मा बृहद्वपुः। त्रैलोक्यक्रमणो दीपो बलियज्ञविनाशनः
vāmano vāmamārgī ca vāmakarmā bṛhadvapuḥ| trailokyakramaṇo dīpo baliyajñavināśanaḥ
वामन (वामनावतार), वाममार्गी, वामकर्मा, बृहद्वपु (विराट् शरीर वाले), त्रैलोक्यक्रमण (तीनों लोकों को नापने वाले), दीप, बलियज्ञविनाशन (बलि के यज्ञ का नाश करने वाले)।
श्लोक 86 (skanda.5.63.86)
यज्ञहर्ता यज्ञकर्ता यज्ञेशो यज्ञभुग्विभुः। सहस्रांशुर्भगो भानुर्विवस्वान्रविरंशुमान्
yajñahartā yajñakartā yajñeśo yajñabhugvibhuḥ| sahasrāṁśurbhago bhānurvivasvānraviraṁśumān
यज्ञहर्ता, यज्ञकर्ता, यज्ञेश, यज्ञभुक् (यज्ञ का भोक्ता), विभु, सहस्रांशु (सहस्र किरणों वाले), भग, भानु, विवस्वान्, रवि, अंशुमान् — सूर्य के नाम।
श्लोक 87 (skanda.5.63.87)
तिग्मतेजाश्चाल्पतेजाः कर्मसाक्षी मनुर्यमः। देवराजः सुरपतिर्दानवारिः शची पतिः
tigmatejāścālpatejāḥ karmasākṣī manuryamaḥ| devarājaḥ surapatirdānavāriḥ śacī patiḥ
तिग्मतेजा (तीक्ष्ण तेज वाले), अल्पतेजा, कर्मसाक्षी, मनु, यम, देवराज, सुरपति, दानवारि (दानवों के शत्रु), शचीपति (इंद्र)।
श्लोक 88 (skanda.5.63.88)
अग्निर्वायुसखो वह्निर्वरुणो यादसां पतिः। नैर्ऋतो नादनोऽनादी रक्षयक्षोधनाधिपः
agnirvāyusakho vahnirvaruṇo yādasāṁ patiḥ| nairṛto nādano'nādī rakṣayakṣodhanādhipaḥ
अग्नि, वायुसख (वायु के सखा), वह्नि, वरुण, यादसांपति (जलजंतुओं के स्वामी), नैर्ऋत, नादन, अनादि, रक्षयक्षोधनाधिप (राक्षस-यक्षों के धन के स्वामी, कुबेर)।
श्लोक 89 (skanda.5.63.89)
कुबेरो वित्तवान्वेगो वसुपालो विलासकृत्। अमृतस्रवणः सोमः सोमपानकरः सुधीः
kubero vittavānvego vasupālo vilāsakṛt| amṛtasravaṇaḥ somaḥ somapānakaraḥ sudhīḥ
कुबेर, वित्तवान् (धनवान्), वेग, वसुपाल (कोष के रक्षक), विलासकृत्, अमृतस्रवण (अमृत झराने वाले), सोम, सोमपानकर, सुधी (बुद्धिमान्)।
श्लोक 90 (skanda.5.63.90)
सर्वौषधिकरः श्रीमान्निशाकरदिवाकरः। विषारिर्विषहर्ता च विषकंठधरो गिरिः
sarvauṣadhikaraḥ śrīmānniśākaradivākaraḥ| viṣārirviṣahartā ca viṣakaṁṭhadharo giriḥ
सर्वौषधिकर (समस्त औषधियों के रचयिता), श्रीमान्, निशाकर, दिवाकर (चंद्र और सूर्य), विषारि, विषहर्ता, विषकंठधर (नीलकंठ शिव), गिरि (पर्वत)।
श्लोक 91 (skanda.5.63.91)
नीलकंठो वृषी रुद्रो भालचंद्रो ह्युमापतिः। शिवः शांतो वशी वीरो ध्यानी मानी च मानदः
nīlakaṁṭho vṛṣī rudro bhālacaṁdro hyumāpatiḥ| śivaḥ śāṁto vaśī vīro dhyānī mānī ca mānadaḥ
नीलकंठ, वृषी (वृषभध्वज), रुद्र, भालचंद्र, उमापति, शिव, शांत, वशी, वीर, ध्यानी, मानी, मानद (सम्मान देने वाले) — शिव के नाम।
श्लोक 92 (skanda.5.63.92)
कृमिकीटो मृगव्याधो मृगहा मृगलाञ्छनः। बटुको भैरवो बालः कपाली दंडविग्रहः
kṛmikīṭo mṛgavyādho mṛgahā mṛgalāñchanaḥ| baṭuko bhairavo bālaḥ kapālī daṁḍavigrahaḥ
कृमिकीट (कीट-पतंगों में भी व्याप्त), मृगव्याध, मृगहा, मृगलांछन (मृगचिह्नित चंद्रमा), बटुक (बटुक भैरव), भैरव, बाल, कपाली, दंडविग्रह (दंड-रूप)।
श्लोक 93 (skanda.5.63.93)
स्मशानवासी मांसाशी दुष्टनाशी वरांतकृत्। योगिनीत्रासको योगी ध्या नस्थो ध्यानवासनः
smaśānavāsī māṁsāśī duṣṭanāśī varāṁtakṛt| yoginītrāsako yogī dhyā nastho dhyānavāsanaḥ
स्मशानवासी, मांसाशी, दुष्टनाशी, वरांतकृत् (वरदाता), योगिनीत्रासक, योगी, ध्यानस्थ, ध्यानवासन (ध्यान में रमण करने वाले)।
श्लोक 94 (skanda.5.63.94)
सेनानीः सेनदेः स्कंदो महाकालो गणाधिपः। आदिदेवो गणपतिर्विघ्नहा विघ्ननाशनः
senānīḥ senadeḥ skaṁdo mahākālo gaṇādhipaḥ| ādidevo gaṇapatirvighnahā vighnanāśanaḥ
सेनानी (सेना के नेता), स्कंद, महाकाल, गणाधिप, आदिदेव, गणपति, विघ्नहा, विघ्ननाशन — स्कंद और गणेश के नाम।
श्लोक 95 (skanda.5.63.95)
ऋद्धिसिद्धिप्रदो दंती भालचन्द्रो गजाननः। नृसिंह उग्रदंष्ट्रश्च नखी दानवनाशकृत्
ṛddhisiddhiprado daṁtī bhālacandro gajānanaḥ| nṛsiṁha ugradaṁṣṭraśca nakhī dānavanāśakṛt
ऋद्धिसिद्धिप्रद (ऋद्धि-सिद्धि देने वाले), दंती, भालचंद्र, गजानन, नृसिंह, उग्रदंष्ट्र, नखी, दानवनाशकृत् — गणेश और नृसिंह के नाम।
श्लोक 96 (skanda.5.63.96)
प्रह्रादपोषकर्ता च सर्वदैत्यजनेश्वरः। शलभः सागरः साक्षी कल्प कल्पकः
prahrādapoṣakartā ca sarvadaityajaneśvaraḥ| śalabhaḥ sāgaraḥ sākṣī kalpa kalpakaḥ
प्रह्लादपोषकर्ता (प्रह्लाद के पालक), सर्वदैत्यजनेश्वर, शलभ, सागर, साक्षी, कल्प, कल्पक (कल्पों के रचयिता)।
श्लोक 97 (skanda.5.63.97)
हेमदो हेमभागीच हिमकर्ता हिमाचलः। भूधरो भूमिदो मेरुः कैलासशिखरो गिरिः
hemado hemabhāgīca himakartā himācalaḥ| bhūdharo bhūmido meruḥ kailāsaśikharo giriḥ
हेमद (स्वर्णदाता), हेमभागी, हिमकर्ता, हिमाचल, भूधर, भूमिद, मेरु, कैलासशिखर, गिरि।
श्लोक 98 (skanda.5.63.98)
लोकालोकांतरो लोकी विलोकी भुवनेश्वरः। दिक्पालो दिक्पतिर्दिव्यो दिव्यकायो जितेंद्रियः
lokālokāṁtaro lokī vilokī bhuvaneśvaraḥ| dikpālo dikpatirdivyo divyakāyo jiteṁdriyaḥ
लोकालोकांतर (लोकालोक पर्वत के मध्य वास करने वाले), लोकी, विलोकी, भुवनेश्वर, दिक्पाल, दिक्पति, दिव्य, दिव्यकाय, जितेंद्रिय।
श्लोक 99 (skanda.5.63.99)
विरूपो रूपवान्रागी नृत्यगीतविशारदः। हाहा हूहूश्चित्ररथो देव र्षिर्नारदः सखा
virūpo rūpavānrāgī nṛtyagītaviśāradaḥ| hāhā hūhūścitraratho deva rṣirnāradaḥ sakhā
विरूप, रूपवान्, रागी (संगीतप्रिय), नृत्यगीतविशारद, हाहा, हूहू, चित्ररथ (गंधर्वों के नाम), देवर्षि नारद, सखा (मित्र)।
श्लोक 100 (skanda.5.63.100)
विश्वेदेवाः साध्यदेवा धृताशीश्च चलोऽचलः। कपिलो जल्पको वादी दत्तो हैहयसंघराट्
viśvedevāḥ sādhyadevā dhṛtāśīśca calo'calaḥ| kapilo jalpako vādī datto haihayasaṁgharāṭ
विश्वेदेवा, साध्यदेवा, धृताशी (आशीर्वाद धारण करने वाले), चल, अचल, कपिल (कपिल मुनि), जल्पक, वादी, दत्त (दत्तात्रेय), हैहयसंघराट् (हैहयवंश के अधिपति)।
श्लोक 101 (skanda.5.63.101)
वसिष्ठो वामदेवश्च सप्तर्षिप्रवरो भृगुः। जामदग्न्यो महावीरः क्षत्रियांऽतकरो ह्यृषिः
vasiṣṭho vāmadevaśca saptarṣipravaro bhṛguḥ| jāmadagnyo mahāvīraḥ kṣatriyāṁ'takaro hyṛṣiḥ
वसिष्ठ, वामदेव, सप्तर्षिप्रवर (सप्तर्षियों में श्रेष्ठ), भृगु, जामदग्न्य (परशुराम), महावीर, क्षत्रियांतकर (क्षत्रियों का अंत करने वाले), ऋषि।
श्लोक 102 (skanda.5.63.102)
हिरण्यकशिपुश्चैव हिरण्याक्षो हरप्रियः। अगस्तिः पुलहो दक्षः पौल स्त्यो रावणो घटः
hiraṇyakaśipuścaiva hiraṇyākṣo harapriyaḥ| agastiḥ pulaho dakṣaḥ paula styo rāvaṇo ghaṭaḥ
हिरण्यकशिपु, हिरण्याक्ष, हरप्रिय, अगस्ति, पुलह, दक्ष, पौलस्त्य (रावण, पुलस्त्य का वंशज), रावण, घट (कलशोद्भव अगस्त्य)।
श्लोक 103 (skanda.5.63.103)
देवारिस्तापसस्तापी विभीषणहरिप्रियः। तेजस्वी तेजदस्तेजी ईशो राजपतिः प्रभुः
devāristāpasastāpī vibhīṣaṇaharipriyaḥ| tejasvī tejadastejī īśo rājapatiḥ prabhuḥ
देवारि (देवताओं के शत्रु), तापस, तापी, विभीषण, हरिप्रिय, तेजस्वी, तेजद, तेजी, ईश, राजपति, प्रभु।
श्लोक 104 (skanda.5.63.104)
दाशरथी राघवो रामो रघुवंश विवर्धनः। सीतापतिः पतिः श्रीमान्ब्रह्मण्यो भक्तवत्सलः
dāśarathī rāghavo rāmo raghuvaṁśa vivardhanaḥ| sītāpatiḥ patiḥ śrīmānbrahmaṇyo bhaktavatsalaḥ
दाशरथी, राघव, राम, रघुवंशविवर्धन (रघुवंश को बढ़ाने वाले), सीतापति, पति, श्रीमान्, ब्रह्मण्य (ब्राह्मणों के हितैषी), भक्तवत्सल — राम के नाम।
श्लोक 105 (skanda.5.63.105)
सन्नद्धः कवची खड्गी चीरवासा दिगंबरः। किरीटी कुडली चापी शंखचक्री गदाधरः
sannaddhaḥ kavacī khaḍgī cīravāsā digaṁbaraḥ| kirīṭī kuḍalī cāpī śaṁkhacakrī gadādharaḥ
सन्नद्ध (कवच धारण किये), कवची, खड्गी, चीरवासा, दिगंबर, किरीटी, कुंडली, चापी, शंखचक्री, गदाधर।
श्लोक 106 (skanda.5.63.106)
कौसल्यानंदनोदारो भूमिशायी गुहप्रियः। सौमित्रो भरतो बालः शत्रुघ्नो भरताऽग्रजः
kausalyānaṁdanodāro bhūmiśāyī guhapriyaḥ| saumitro bharato bālaḥ śatrughno bharatā'grajaḥ
कौसल्यानंदन (कौसल्या के आनंद), उदार, भूमिशायी, गुहप्रिय (गुह के प्रिय), सौमित्रि (लक्ष्मण), भरत, बाल, शत्रुघ्न, भरताग्रज (भरत के अग्रज, राम)।
श्लोक 107 (skanda.5.63.107)
लक्ष्मणः परवीरघ्नः स्त्रीसहायः कपीश्वरः। हनुमानृक्षराजश्च सुग्रीवो वालिनाशनः
lakṣmaṇaḥ paravīraghnaḥ strīsahāyaḥ kapīśvaraḥ| hanumānṛkṣarājaśca sugrīvo vālināśanaḥ
लक्ष्मण, परवीरघ्न (शत्रुवीरों का नाश करने वाले), स्त्रीसहाय (सीता के सहायक), कपीश्वर, हनुमान्, ऋक्षराज (जांबवान्), सुग्रीव, वालिनाशन।
श्लोक 108 (skanda.5.63.108)
दूतप्रियो दूतकारी ह्यंगदो गदतां वरः। वनध्वंसी वनी वेगो वानरध्वज लांगुली
dūtapriyo dūtakārī hyaṁgado gadatāṁ varaḥ| vanadhvaṁsī vanī vego vānaradhvaja lāṁgulī
दूतप्रिय, दूतकारी, अंगद, गदतां वर (वक्ताओं में श्रेष्ठ), वनध्वंसी (अशोकवाटिका का ध्वंस करने वाले), वनी, वेग, वानरध्वजलांगुली (वानर-ध्वज और पूँछधारी)।
श्लोक 109 (skanda.5.63.109)
रविदंष्ट्री च लंकाहा हाहाकारो वरप्रदः। भवसेतुर्महासेतुर्बद्धसेतू रमेश्वरः
ravidaṁṣṭrī ca laṁkāhā hāhākāro varapradaḥ| bhavaseturmahāseturbaddhasetū rameśvaraḥ
रविदंष्ट्री, लंकाहा (लंका का नाशक), हाहाकार (विलाप उत्पन्न करने वाले), वरप्रद, भवसेतु, महासेतु, बद्धसेतु (बाँधा गया सेतु), रमेश्वर (रामेश्वर)।
श्लोक 110 (skanda.5.63.110)
जानकीवल्लभः कामी किरीटी कुण्डली खगी। पुण्डरीकविशालाक्षो महाबाहुर्घनाकृतिः
jānakīvallabhaḥ kāmī kirīṭī kuṇḍalī khagī| puṇḍarīkaviśālākṣo mahābāhurghanākṛtiḥ
जानकीवल्लभ, कामी, किरीटी, कुंडली, खगी, पुंडरीकविशालाक्ष (कमलनयन), महाबाहु, घनाकृति (मेघ के समान आकृतिवाले)।
श्लोक 111 (skanda.5.63.111)
चंचलश्चपलः कामी वामी वामांगवत्सलः। स्त्रीप्रियः स्त्रीपरः स्त्रैणः स्त्रियो वामांगवासकः
caṁcalaścapalaḥ kāmī vāmī vāmāṁgavatsalaḥ| strīpriyaḥ strīparaḥ straiṇaḥ striyo vāmāṁgavāsakaḥ
चंचल, चपल, कामी, वामी, वामांगवत्सल (अपने प्रिय के प्रति स्नेहशील), स्त्रीप्रिय, स्त्रीपर, स्त्रैण, स्त्रियों के वामांग-वासक — कृष्ण की लीला के नाम।
श्लोक 112 (skanda.5.63.112)
जितवैरी जितकामो जितक्रोधो जितेंद्रियः। शांतो दांतो दयारामो ह्येकस्त्रीव्रतधारकः
jitavairī jitakāmo jitakrodho jiteṁdriyaḥ| śāṁto dāṁto dayārāmo hyekastrīvratadhārakaḥ
जितवैरी (शत्रुओं को जीतने वाले), जितकाम, जितक्रोध, जितेंद्रिय, शांत, दांत, दयाराम (करुणा में रमण करने वाले), एकस्त्रीव्रतधारक (एकपत्नीव्रत के धारक, राम)।
श्लोक 113 (skanda.5.63.113)
सात्त्विकः सत्त्वसंस्थानो मदहा क्रोधहा खरः। बहुराक्षस संवीतः सर्वराक्षसनाशकृत्
sāttvikaḥ sattvasaṁsthāno madahā krodhahā kharaḥ| bahurākṣasa saṁvītaḥ sarvarākṣasanāśakṛt
सात्त्विक, सत्त्वसंस्थान (सत्त्वगुण में स्थित), मदहा (मद का नाश करने वाले), क्रोधहा, खर (दानव खर, अथवा तीक्ष्ण), बहुराक्षससंवीत (अनेक राक्षसों से घिरे), सर्वराक्षसनाशकृत्।
श्लोक 114 (skanda.5.63.114)
रावणारी रणक्षुद्र दशमस्तकच्छेदकः। राज्यकारी यज्ञकारी दाता भोक्ता तपोधनः
rāvaṇārī raṇakṣudra daśamastakacchedakaḥ| rājyakārī yajñakārī dātā bhoktā tapodhanaḥ
रावणारि (रावण का शत्रु), रणक्षुद्र, दशमस्तकच्छेदक (दस मस्तकों को काटने वाले), राज्यकारी, यज्ञकारी, दाता, भोक्ता, तपोधन।
श्लोक 115 (skanda.5.63.115)
अयोध्याधिपतिः कांतो वैकुंठोऽकुंठविग्रहः। सत्यव्रतो व्रती शूरस्तपी सत्यफलप्रदः
ayodhyādhipatiḥ kāṁto vaikuṁṭho'kuṁṭhavigrahaḥ| satyavrato vratī śūrastapī satyaphalapradaḥ
अयोध्याधिपति, कांत, वैकुंठ, अकुंठविग्रह (अस्खलित स्वरूप वाले), सत्यव्रत, व्रती, शूर, तपी, सत्यफलप्रद (सत्य का फल देने वाले)।
श्लोक 116 (skanda.5.63.116)
सर्वसाक्षीः सर्वगश्च सर्वप्राणहरोऽव्ययः। प्राणश्चाथाप्यपानश्च व्यानोदानः समानतः
sarvasākṣīḥ sarvagaśca sarvaprāṇaharo'vyayaḥ| prāṇaścāthāpyapānaśca vyānodānaḥ samānataḥ
सर्वसाक्षी, सर्वग, सर्वप्राणहर (अंत में सबके प्राण हरने वाले), अव्यय; तथा प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान — पंच प्राणवायु।
श्लोक 117 (skanda.5.63.117)
नागः कृकलः कूर्मश्च देवदत्तो धनंजयः। सर्वप्राणविदो व्यापी योगधारकधारकः
nāgaḥ kṛkalaḥ kūrmaśca devadatto dhanaṁjayaḥ| sarvaprāṇavido vyāpī yogadhārakadhārakaḥ
नाग, कृकल, कूर्म, देवदत्त, धनंजय — पंच उपप्राण; सर्वप्राणविद्, व्यापी, योगधारकधारक (योगधारकों के भी धारक)।
श्लोक 118 (skanda.5.63.118)
तत्त्ववित्तत्त्वदस्तत्त्वी सर्वतत्त्वविशारदः। ध्यानस्थो ध्यानशाली च मनस्वी योगवित्तमः
tattvavittattvadastattvī sarvatattvaviśāradaḥ| dhyānastho dhyānaśālī ca manasvī yogavittamaḥ
तत्त्ववित्, तत्त्वद, तत्त्वी, सर्वतत्त्वविशारद, ध्यानस्थ, ध्यानशाली, मनस्वी, योगवित्तम (योग के ज्ञाताओं में श्रेष्ठ)।
श्लोक 119 (skanda.5.63.119)
ब्रह्मज्ञो ब्रह्मदो बह्मज्ञाता च ब्रह्मसंभवः। अध्यात्मविद्विदो दीपो ज्योतीरूपो निरंजनः
brahmajño brahmado bahmajñātā ca brahmasaṁbhavaḥ| adhyātmavidvido dīpo jyotīrūpo niraṁjanaḥ
ब्रह्मज्ञ, ब्रह्मद, ब्रह्मज्ञाता, ब्रह्मसंभव, अध्यात्मविद्विद् (अध्यात्मज्ञानियों के भी ज्ञाता), दीप, ज्योतीरूप, निरंजन (निर्मल)।
श्लोक 120 (skanda.5.63.120)
ज्ञानदोऽज्ञानहा ज्ञानी गुरुः शिष्योपदेशकः। सुशिष्यः शिक्षितः शाली शिष्यशिक्षाविशारदः
jñānado'jñānahā jñānī guruḥ śiṣyopadeśakaḥ| suśiṣyaḥ śikṣitaḥ śālī śiṣyaśikṣāviśāradaḥ
ज्ञानद, अज्ञानहा, ज्ञानी, गुरु, शिष्योपदेशक, सुशिष्य, शिक्षित, शाली, शिष्यशिक्षाविशारद (शिष्यों को शिक्षा देने में कुशल)।
श्लोक 121 (skanda.5.63.121)
मंत्रदो मंत्रहा मंत्री तंत्री तन्त्रजनप्रियः। सन्मंत्रो मन्त्रविन्मन्त्री यन्त्रमन्त्रैकभंजनः
maṁtrado maṁtrahā maṁtrī taṁtrī tantrajanapriyaḥ| sanmaṁtro mantravinmantrī yantramantraikabhaṁjanaḥ
मंत्रद, मंत्रहा, मंत्री, तंत्री, तंत्रजनप्रिय, सन्मंत्र, मंत्रविद्मंत्री, यंत्रमंत्रैकभंजन (यंत्र-मंत्रों को तोड़ने वाले)।
श्लोक 122 (skanda.5.63.122)
मारणो मोहनो मोही स्तंभोच्चाटनकृत्खलः। बहुमायो विमायश्च महामायाविमोहकः
māraṇo mohano mohī staṁbhoccāṭanakṛtkhalaḥ| bahumāyo vimāyaśca mahāmāyāvimohakaḥ
मारण, मोहन, मोही, स्तंभोच्चाटनकृत् (स्तंभन-उच्चाटन आदि क्रियाएँ करने वाले), खल (दुष्टों के लिए छलिया), बहुमाय, विमाय, महामायाविमोहक (महामाया से मोहित करने वाले) — तांत्रिक शक्तियों के नाम।
श्लोक 123 (skanda.5.63.123)
मोक्षदो बंधको बंदी ह्याकर्षणविकर्षणः। ह्रींकारो बीजरूपी च क्लींकारः कीलकाधिपः
mokṣado baṁdhako baṁdī hyākarṣaṇavikarṣaṇaḥ| hrīṁkāro bījarūpī ca klīṁkāraḥ kīlakādhipaḥ
मोक्षद, बंधक, बंदी, आकर्षणविकर्षण (आकर्षण-विकर्षण की शक्ति वाले), ह्रींकार, बीजरूपी, क्लींकार, कीलकाधिप (कीलक-मंत्र के अधिपति)।
श्लोक 124 (skanda.5.63.124)
सौंकार शक्तिमाञ्च्छक्तिः सर्वशक्तिधरो धरः। अकारोकार ओंकारश्छंदोगायत्रसम्भवः
sauṁkāra śaktimāñcchaktiḥ sarvaśaktidharo dharaḥ| akārokāra oṁkāraśchaṁdogāyatrasambhavaḥ
सौंकार (बीजमंत्र सौं), शक्तिमान्, शक्ति, सर्वशक्तिधर, धर, अकार-उकार-ओंकार (तीन मात्राएँ), छंदोगायत्रसंभव (गायत्री छंद से उत्पन्न)।
श्लोक 125 (skanda.5.63.125)
वेदो वेदविदो वेदी वेदाऽध्यायी सदाशिवः। ऋग्यजुःसामाथर्वेशः सामगानकरोऽकरी
vedo vedavido vedī vedā'dhyāyī sadāśivaḥ| ṛgyajuḥsāmātharveśaḥ sāmagānakaro'karī
वेद, वेदविद्, वेदी, वेदाध्यायी, सदाशिव, ऋग्-यजुः-साम-अथर्ववेदों के स्वामी, सामगानकर, अकरी।
श्लोक 126 (skanda.5.63.126)
त्रिपदो बहुपादी च शतपथः सर्वतोमुखः। प्राकृतः संस्कृतो योगी गीतग्रंथप्रहेलिकः
tripado bahupādī ca śatapathaḥ sarvatomukhaḥ| prākṛtaḥ saṁskṛto yogī gītagraṁthaprahelikaḥ
त्रिपद (वामन/गायत्री के तीन पद), बहुपादी, शतपथ (शतपथ ब्राह्मण), सर्वतोमुख, प्राकृत, संस्कृत, योगी, गीतग्रंथप्रहेलिका (गीत-ग्रंथों की गूढ़ पहेली)।
श्लोक 127 (skanda.5.63.127)
सगुणो विगुणश्छंदो निःसंगो विगुणो गुणी। निर्गुणो गुणवान्संगी कर्मी धर्मी च कर्मदः
saguṇo viguṇaśchaṁdo niḥsaṁgo viguṇo guṇī| nirguṇo guṇavānsaṁgī karmī dharmī ca karmadaḥ
सगुण, विगुण, छंद, निःसंग, विगुण, गुणी, निर्गुण, गुणवान्, संगी, कर्मी, धर्मी, कर्मद।
श्लोक 128 (skanda.5.63.128)
निष्कर्मा कामकामी च निःसंगः संगवर्जितः। निर्लोभो निरहंकारी निष्किंचनजनप्रियः
niṣkarmā kāmakāmī ca niḥsaṁgaḥ saṁgavarjitaḥ| nirlobho nirahaṁkārī niṣkiṁcanajanapriyaḥ
निष्कर्मा (क्रियारहित), कामकामी (कामनाओं के पूरक), निःसंग, संगवर्जित, निर्लोभ, निरहंकारी, निष्किंचनजनप्रिय (अकिंचनों के प्रिय)।
श्लोक 129 (skanda.5.63.129)
सर्वसंगकरो रागी सर्वत्यागी बहिश्चरः। एकपादो द्विपादश्च बहु पादोऽल्पपादकः
sarvasaṁgakaro rāgī sarvatyāgī bahiścaraḥ| ekapādo dvipādaśca bahu pādo'lpapādakaḥ
सर्वसंगकर, रागी, सर्वत्यागी, बहिश्चर; तथा एकपाद, द्विपाद, बहुपाद, अल्पपादक — विराट् रूप के नाम।
श्लोक 130 (skanda.5.63.130)
द्विपदस्त्रिपदोऽपादी विपादी पदसंग्रहः। खेचरो भूचरो भ्रामी भृंगकीटमधुप्रियः
dvipadastripado'pādī vipādī padasaṁgrahaḥ| khecaro bhūcaro bhrāmī bhṛṁgakīṭamadhupriyaḥ
द्विपद, त्रिपद, अपादी, विपादी, पदसंग्रह; खेचर, भूचर, भ्रामी, भृंगकीटमधुप्रिय (मधुमक्खी के समान समस्त प्राणियों में रमण करने वाले)।
श्लोक 131 (skanda.5.63.131)
क्रतुः संवत्सरो मासो गणितार्को ह्यहर्निशः। कृतं त्रेता कलिश्चैव द्वापरश्चतुराकृतिः
kratuḥ saṁvatsaro māso gaṇitārko hyaharniśaḥ| kṛtaṁ tretā kaliścaiva dvāparaścaturākṛtiḥ
क्रतु (यज्ञ), संवत्सर, मास, गणितार्क (गणनाकर्ता सूर्य), अहर्निश (दिन-रात); कृत, त्रेता, कलि, द्वापर, चतुराकृति (चार युगों का रूप)।
श्लोक 132 (skanda.5.63.132)
दिवाकालकरः कालः कुलधर्मः सनातनः। कला काष्ठा कला नाड्यो यामः पक्षः सितासितः
divākālakaraḥ kālaḥ kuladharmaḥ sanātanaḥ| kalā kāṣṭhā kalā nāḍyo yāmaḥ pakṣaḥ sitāsitaḥ
दिवाकालकर (दिन का रचयिता), काल, कुलधर्म, सनातन; कला, काष्ठा, निमेष-कला, नाड़ी, याम, पक्ष, शुक्ल-कृष्ण (सित-असित) — कालविभाग के नाम।
श्लोक 133 (skanda.5.63.133)
युगो युगन्धरो योग्यो युगधर्मप्रवर्तकः। कुलाचारः कुलकरः कुलदैवकरः कुली
yugo yugandharo yogyo yugadharmapravartakaḥ| kulācāraḥ kulakaraḥ kuladaivakaraḥ kulī
युग, युगंधर (युग को धारण करने वाले), योग्य, युगधर्मप्रवर्तक (युगधर्म के प्रवर्तक); कुलाचार, कुलकर, कुलदैवकर, कुली।
श्लोक 134 (skanda.5.63.134)
चतुराऽऽश्रमचारी च गृहस्थो ह्यतिथिप्रियः। वनस्थो वनचारी च वानप्रस्थाऽऽश्रमोऽश्रमी
caturā''śramacārī ca gṛhastho hyatithipriyaḥ| vanastho vanacārī ca vānaprasthā''śramo'śramī
चतुराश्रमचारी, गृहस्थ, अतिथिप्रिय; वनस्थ, वनचारी, वानप्रस्थाश्रमी — चारों आश्रमों के रूप।
श्लोक 135 (skanda.5.63.135)
बटुको ब्रह्मचारी च शिखासूत्री कमण्डली। त्रिजटी ध्यानवान्ध्यानी बद्रिकाश्रमवासकृत्
baṭuko brahmacārī ca śikhāsūtrī kamaṇḍalī| trijaṭī dhyānavāndhyānī badrikāśramavāsakṛt
बटुक, ब्रह्मचारी, शिखासूत्री, कमंडली; त्रिजटी, ध्यानवान्, ध्यानी, बद्रिकाश्रमवासकृत् (बद्रिकाश्रम के निवासी)।
श्लोक 136 (skanda.5.63.136)
हेमाद्रिप्रभवो हैमो हेमराशिर्हि माकरः। महाप्रस्थानको विप्रो विरागी रागवान्गृही
hemādriprabhavo haimo hemarāśirhi mākaraḥ| mahāprasthānako vipro virāgī rāgavāngṛhī
हेमाद्रिप्रभव (मेरु से उत्पन्न), हैम, हेमराशि, हिमाकर; महाप्रस्थानक (महाप्रयाण करने वाले), विप्र, विरागी, रागवान्, गृही।
श्लोक 137 (skanda.5.63.137)
नरनारायणोऽनागो केदारोदारविग्रहः। गंगाद्वारतपःसारस्तपोवन तपोनिधिः
naranārāyaṇo'nāgo kedārodāravigrahaḥ| gaṁgādvāratapaḥsārastapovana taponidhiḥ
नरनारायण, अनाग (निष्पाप), केदार, उदारविग्रह (उदार स्वरूप वाले); गंगाद्वारतपःसार (गंगाद्वार की तपस्या का सार), तपोवन, तपोनिधि।
श्लोक 138 (skanda.5.63.138)
निधिरेष महापद्मः पद्माकरश्रियालयः। पद्मनाभः परीतात्मा परिव्राट्पुरुषोत्तमः
nidhireṣa mahāpadmaḥ padmākaraśriyālayaḥ| padmanābhaḥ parītātmā parivrāṭpuruṣottamaḥ
निधि, महापद्म (नवनिधियों में से एक), पद्माकर, श्रियालय (श्री का निवास); पद्मनाभ, परीतात्मा (सर्वव्यापी आत्मा), परिव्राट् (परिव्राजक), पुरुषोत्तम।
श्लोक 139 (skanda.5.63.139)
परानंदः पुराणश्च सम्राड्राज विराजकः। चक्रस्थश्चक्रपालस्थश्चक्रवर्ती नराधिपः
parānaṁdaḥ purāṇaśca samrāḍrāja virājakaḥ| cakrasthaścakrapālasthaścakravartī narādhipaḥ
परानंद, पुराण, सम्राट्, राज, विराजक; चक्रस्थ, चक्रपालस्थ, चक्रवर्ती, नराधिप।
श्लोक 140 (skanda.5.63.140)
आयुर्वेदविदो वैद्यो धन्वंतरिश्च रोगहा। औषधीबीजसंभूतो रोगी रोगविनाशकृत
āyurvedavido vaidyo dhanvaṁtariśca rogahā| auṣadhībījasaṁbhūto rogī rogavināśakṛta
आयुर्वेदविद्, वैद्य, धन्वंतरि, रोगहा; औषधीबीजसंभूत, रोगी, रोगविनाशकृत् — आरोग्य के देवता के नाम।
श्लोक 141 (skanda.5.63.141)
चेतनश्चेतकोऽचिंत्यश्चित्तचिंताविनाशकृत्। अतींद्रियः सुखस्पर्शश्चरचारी विहंगमः
cetanaścetako'ciṁtyaścittaciṁtāvināśakṛt| atīṁdriyaḥ sukhasparśaścaracārī vihaṁgamaḥ
चेतन, चेतक, अचिंत्य, चित्तचिंताविनाशकृत्; अतींद्रिय, सुखस्पर्श, चरचारी (गरुड़), विहंगम।
श्लोक 142 (skanda.5.63.142)
गरुडः पक्षिराजश्च चाक्षुषो विनता त्मजः। विष्णुयानविमानस्थो मनोमयतुरंगमः
garuḍaḥ pakṣirājaśca cākṣuṣo vinatā tmajaḥ| viṣṇuyānavimānastho manomayaturaṁgamaḥ
गरुड़, पक्षिराज, चाक्षुष, वैनतेय (विनता-पुत्र); विष्णुयानविमानस्थ, मनोमयतुरंगम (मन के समान वेगवान् अश्व) — गरुड़ के नाम।
श्लोक 143 (skanda.5.63.143)
बहुवृष्टिकरो वर्षो ऐरावणविरावणः। उच्चैःश्रवाऽरुणो गामी हरिदश्वो हरिप्रियः
bahuvṛṣṭikaro varṣo airāvaṇavirāvaṇaḥ| uccaiḥśravā'ruṇo gāmī haridaśvo haripriyaḥ
बहुवृष्टिकर, वर्ष (पर्जन्य), ऐरावणविरावण (ऐरावत का गर्जन); उच्चैःश्रवा, अरुण, गामी, हरिदश्व, हरिप्रिय।
श्लोक 144 (skanda.5.63.144)
प्रावृषो मेघमाली च गजरत्नपुरंदरः। वसुदो वसुधारश्च निद्रालुः पन्नगाशनः
prāvṛṣo meghamālī ca gajaratnapuraṁdaraḥ| vasudo vasudhāraśca nidrāluḥ pannagāśanaḥ
प्रावृष (वर्षाऋतु), मेघमाली, गजरत्नपुरंदर (गजरत्न ऐरावत सहित इंद्र); वसुद, वसुधार, निद्रालु, पन्नगाशन (गरुड़, सर्पभक्षी)।
श्लोक 145 (skanda.5.63.145)
शेषशायी जलेशायी व्यासः सत्यवतीसुतः। वेदव्यासकरो वाग्ग्मी बहुशाखाविकल्पकः
śeṣaśāyī jaleśāyī vyāsaḥ satyavatīsutaḥ| vedavyāsakaro vāggmī bahuśākhāvikalpakaḥ
शेषशायी, जलेशायी, व्यास, सत्यवतीसुत; वेदव्यासकर, वाग्मी, बहुशाखाविकल्पक (वेद की अनेक शाखाओं के रचयिता)।
श्लोक 146 (skanda.5.63.146)
स्मृतिः पुराणधर्मार्थी परावरविचक्षणः। सहस्रशीर्षा सहस्राक्षः सहस्रवदनोज्ज्वलः
smṛtiḥ purāṇadharmārthī parāvaravicakṣaṇaḥ| sahasraśīrṣā sahasrākṣaḥ sahasravadanojjvalaḥ
स्मृति, पुराणधर्मार्थी, परावरविचक्षण (उच्च-निम्न दोनों में निपुण); सहस्रशीर्षा, सहस्राक्ष, सहस्रवदनोज्ज्वल — विराट् पुरुष के नाम।
श्लोक 147 (skanda.5.63.147)
सहस्रबाहुः सहस्रांशुः सहस्रकिरणो नरः। बहुशीर्षैकशीर्षश्च त्रिशिरा विशिराः शिरी
sahasrabāhuḥ sahasrāṁśuḥ sahasrakiraṇo naraḥ| bahuśīrṣaikaśīrṣaśca triśirā viśirāḥ śirī
सहस्रबाहु, सहस्रांशु, सहस्रकिरण, नर; बहुशीर्षैकशीर्ष, त्रिशिरा, विशिरा, शिरी।
श्लोक 148 (skanda.5.63.148)
जटिलो भस्मरागी च दिव्यांबरधरः शुचिः। अणुरूपो बृहद्रूपो विरूपो विकराकृतिः
jaṭilo bhasmarāgī ca divyāṁbaradharaḥ śuciḥ| aṇurūpo bṛhadrūpo virūpo vikarākṛtiḥ
जटिल, भस्मरागी, दिव्यांबरधर, शुचि; अणुरूप, बृहद्रूप, विरूप, विकराकृति।
श्लोक 149 (skanda.5.63.149)
समुद्रमाथको माथी सर्वरत्नहरो हरिः। वज्रवैडूर्यको वज्री चिंतामणिमहामणिः
samudramāthako māthī sarvaratnaharo hariḥ| vajravaiḍūryako vajrī ciṁtāmaṇimahāmaṇiḥ
समुद्रमाथक (समुद्रमंथन करने वाले), माथी, सर्वरत्नहर, हरि; वज्रवैडूर्यक, वज्री, चिंतामणि, महामणि।
श्लोक 150 (skanda.5.63.150)
अनिर्मूल्यो महामूल्यो निर्मूल्यः सुरभिः सुखी। पिता माता शिशुर्बंधुर्धाता त्वष्टार्यमा यमः
anirmūlyo mahāmūlyo nirmūlyaḥ surabhiḥ sukhī| pitā mātā śiśurbaṁdhurdhātā tvaṣṭāryamā yamaḥ
अनिर्मूल्य (अमूल्य), महामूल्य, निर्मूल्य, सुरभि, सुखी; पिता, माता, शिशु, बंधु, धाता, त्वष्टा, अर्यमा, यम।
श्लोक 151 (skanda.5.63.151)
अंतःस्थो बाह्यकारी च बहिःस्थो वै बहिश्चरः। पावनः पावकः पाकी सर्वभक्षी हुताशनः
aṁtaḥstho bāhyakārī ca bahiḥstho vai bahiścaraḥ| pāvanaḥ pāvakaḥ pākī sarvabhakṣī hutāśanaḥ
अंतःस्थ, बाह्यकारी, बहिःस्थ, बहिश्चर; पावन, पावक, पाकी, सर्वभक्षी, हुताशन (अग्नि के नाम)।
श्लोक 152 (skanda.5.63.152)
भगवान्भगहा भागी भवभंजो भयंकरः। कायस्थः कार्यकारी च कार्यकर्ता करप्रदः
bhagavānbhagahā bhāgī bhavabhaṁjo bhayaṁkaraḥ| kāyasthaḥ kāryakārī ca kāryakartā karapradaḥ
भगवान्, भगहा, भागी, भवभंज (संसार-बंधन को तोड़ने वाले), भयंकर; कायस्थ, कार्यकारी, कार्यकर्ता, करप्रद।
श्लोक 153 (skanda.5.63.153)
एकधर्मा द्विधर्मा च सुखी दूत्योपजीवकः। बालकस्तारकस्त्राता कालो मूषकभक्षकः
ekadharmā dvidharmā ca sukhī dūtyopajīvakaḥ| bālakastārakastrātā kālo mūṣakabhakṣakaḥ
एकधर्मा, द्विधर्मा, सुखी, दूत्योपजीवक (दूतकर्म से जीवन-निर्वाह करने वाले); बालक, तारक, त्राता, काल, मूषकभक्षक (काल के रूप में सबको ग्रस लेने वाले)।
श्लोक 154 (skanda.5.63.154)
संजीवनो जीवकर्ता सजीवो जीवसंभवः। षड्विंशको महा विष्णुः सर्वव्यापी महेश्वरः
saṁjīvano jīvakartā sajīvo jīvasaṁbhavaḥ| ṣaḍviṁśako mahā viṣṇuḥ sarvavyāpī maheśvaraḥ
संजीवन, जीवकर्ता, सजीव, जीवसंभव; षड्विंशक (सांख्य के पचीस तत्त्वों से परे छब्बीसवाँ तत्त्व, पुरुष), महाविष्णु, सर्वव्यापी, महेश्वर।
श्लोक 155 (skanda.5.63.155)
दिव्यांगदो मुक्तमाली श्रीवत्सो मकरध्वजः। श्याममूर्तिर्घनश्यामः पीतवासाः शुभाननः
divyāṁgado muktamālī śrīvatso makaradhvajaḥ| śyāmamūrtirghanaśyāmaḥ pītavāsāḥ śubhānanaḥ
दिव्यांगद, मुक्तमाली, श्रीवत्स, मकरध्वज; श्याममूर्ति, घनश्याम, पीतवासा, शुभानन।
श्लोक 156 (skanda.5.63.156)
चीरवासा विवासाश्च भूतदानववल्लभः। अमृतोऽमृतभागी च मोहिनीरूपधारकः
cīravāsā vivāsāśca bhūtadānavavallabhaḥ| amṛto'mṛtabhāgī ca mohinīrūpadhārakaḥ
चीरवासा, विवासा, भूतदानववल्लभ; अमृत, अमृतभागी, मोहिनीरूपधारक (मोहिनी-रूप धारण करने वाले)।
श्लोक 157 (skanda.5.63.157)
दिव्यदृष्टिः समदृष्टिर्देवदानववंचकः। कबंधः केतुकारी च स्वर्भानुश्चंद्रतापनः
divyadṛṣṭiḥ samadṛṣṭirdevadānavavaṁcakaḥ| kabaṁdhaḥ ketukārī ca svarbhānuścaṁdratāpanaḥ
दिव्यदृष्टि, समदृष्टि, देवदानववंचक (मोहिनी रूप में देव-दानवों को छलने वाले); कबंध, केतुकारी, स्वर्भानु, चंद्रतापन — राहु-केतु के नाम।
श्लोक 158 (skanda.5.63.158)
ग्रहराजो ग्रही ग्राहः सर्वग्रहविमोचकः। दानमानजपो होमः सानुकूलः शुभग्रहः
graharājo grahī grāhaḥ sarvagrahavimocakaḥ| dānamānajapo homaḥ sānukūlaḥ śubhagrahaḥ
ग्रहराज, ग्रही, ग्राह, सर्वग्रहविमोचक (समस्त ग्रहबाधाओं से मुक्त करने वाले); दान-मान-जप-होम से सानुकूल शुभग्रह।
श्लोक 159 (skanda.5.63.159)
विघ्नकर्ताऽपहर्ता च विघ्ननाशो विनायकः। अपकारोपकारी च सर्वसिद्धिफलप्रदः
vighnakartā'pahartā ca vighnanāśo vināyakaḥ| apakāropakārī ca sarvasiddhiphalapradaḥ
विघ्नकर्ता, अपहर्ता, विघ्ननाश, विनायक; अपकारोपकारी (हानि व लाभ दोनों के कर्ता), सर्वसिद्धिफलप्रद।
श्लोक 160 (skanda.5.63.160)
सेवकः सामदानी च भेदी दंडी च मत्सरी। दयावान्दानशीलश्च दानी यज्वा प्रतिग्रही
sevakaḥ sāmadānī ca bhedī daṁḍī ca matsarī| dayāvāndānaśīlaśca dānī yajvā pratigrahī
सेवक, सामदानी (साम व दान से जीतने वाले), भेदी, दंडी, मत्सरी; दयावान्, दानशील, दानी, यज्वा, प्रतिग्रही।
श्लोक 161 (skanda.5.63.161)
हविरग्निश्चरुस्थाली समिधश्चानिलो यमः। होतोद्गाता शुचिः कुण्डः सामगो वैकृतिः सवः
haviragniścarusthālī samidhaścānilo yamaḥ| hotodgātā śuciḥ kuṇḍaḥ sāmago vaikṛtiḥ savaḥ
हवि, अग्नि, चरुस्थाली, समिध, अनिल, यम; होता, उद्गाता, शुचि, कुंड, सामग, वैकृति, सव — यज्ञ के अंगों में भगवान् का दर्शन।
श्लोक 162 (skanda.5.63.162)
द्रव्यं पात्राणि संकल्पो मुशलो ह्यरणिः कुशः। दीक्षितो मंडपो वेदिर्यजमानः पशुः क्रतुः
dravyaṁ pātrāṇi saṁkalpo muśalo hyaraṇiḥ kuśaḥ| dīkṣito maṁḍapo vediryajamānaḥ paśuḥ kratuḥ
द्रव्य, पात्र, संकल्प, मुशल, अरणि, कुश; दीक्षित, मंडप, वेदि, यजमान, पशु, क्रतु — यज्ञ-सामग्री में भी भगवान्।
श्लोक 163 (skanda.5.63.163)
दक्षिणा स्वस्तिमान्स्वस्ति ह्याशीर्वादः शुभप्रदः। आदिवृक्षो महावृक्षो देववृक्षो वनस्पतिः
dakṣiṇā svastimānsvasti hyāśīrvādaḥ śubhapradaḥ| ādivṛkṣo mahāvṛkṣo devavṛkṣo vanaspatiḥ
दक्षिणा, स्वस्तिमान्, स्वस्ति, आशीर्वाद, शुभप्रद; आदिवृक्ष, महावृक्ष, देववृक्ष, वनस्पति।
श्लोक 164 (skanda.5.63.164)
प्रयागो वेणुमान्वेणी न्यग्रोधश्चाऽक्षयो वटः। सुतीर्थस्तीर्थकारी च तीर्थराजो व्रती वतः
prayāgo veṇumānveṇī nyagrodhaścā'kṣayo vaṭaḥ| sutīrthastīrthakārī ca tīrtharājo vratī vataḥ
प्रयाग, वेणुमान्, वेणी (त्रिवेणी), न्यग्रोध, अक्षयवट; सुतीर्थ, तीर्थकारी, तीर्थराज, व्रती, व्रत।
श्लोक 165 (skanda.5.63.165)
वृत्तिदाता पृथुः पुत्रो दोग्धा गौर्वत्स एव च। क्षीरं क्षीरवहः क्षीरी क्षीरभागविभामवित्
vṛttidātā pṛthuḥ putro dogdhā gaurvatsa eva ca| kṣīraṁ kṣīravahaḥ kṣīrī kṣīrabhāgavibhāmavit
वृत्तिदाता, पृथु, पुत्र, दोग्धा, गौ, वत्स ही; क्षीर, क्षीरवह, क्षीरी, क्षीरभागविभावित् (दुग्ध के विभाग का ज्ञाता, राजा पृथु की कथा का स्मरण)।
श्लोक 166 (skanda.5.63.166)
राज्यभागविदो भागी सर्वभागविकल्पकः। वाहनो वाहको वेगी पादचारी तपश्चरः
rājyabhāgavido bhāgī sarvabhāgavikalpakaḥ| vāhano vāhako vegī pādacārī tapaścaraḥ
राज्यभागविद्, भागी, सर्वभागविकल्पक (समस्त भागों के विधाता); वाहन, वाहक, वेगी, पादचारी, तपश्चर।
श्लोक 167 (skanda.5.63.167)
गोपनो गोपको गोपी गोपकन्याविहारकृत्। वासुदेवो विशालाक्षः कृष्णोगोपीजनप्रियः
gopano gopako gopī gopakanyāvihārakṛt| vāsudevo viśālākṣaḥ kṛṣṇogopījanapriyaḥ
गोपन (रक्षक), गोपक, गोपी, गोपकन्याविहारकृत् (गोपकन्याओं के साथ लीला करने वाले); वासुदेव, विशालाक्ष, कृष्ण, गोपीजनप्रिय।
श्लोक 168 (skanda.5.63.168)
देवकीनंदनो नंदी नंदगोपगृहाऽऽश्रमी। यशोदानंदनो दामी दामोदर उलूखली
devakīnaṁdano naṁdī naṁdagopagṛhā''śramī| yaśodānaṁdano dāmī dāmodara ulūkhalī
देवकीनंदन, नंदी, नंदगोपगृहाश्रमी (नंदगोप के घर में पले); यशोदानंदन, दामी (रस्सी से बंधे), दामोदर, उलूखली (ऊखल से जुड़े)।
श्लोक 169 (skanda.5.63.169)
पूतनारिः पदाकारी लीलाशकटभंजकः। नवनीतप्रियो वाग्ग्मी वत्सपालकबालकः
pūtanāriḥ padākārī līlāśakaṭabhaṁjakaḥ| navanītapriyo vāggmī vatsapālakabālakaḥ
पूतनारि (पूतना का शत्रु), पदाकारी, लीलाशकटभंजक (लीला में शकट को तोड़ने वाले); नवनीतप्रिय, वाग्ग्मी, वत्सपालकबालक (गोपाल बालक)।
श्लोक 170 (skanda.5.63.170)
वत्सरूपधरो वत्सी वत्सहा धेनुकांतकृत्। बकारिर्वनवासी च वनक्रीडाविशारदः
vatsarūpadharo vatsī vatsahā dhenukāṁtakṛt| bakārirvanavāsī ca vanakrīḍāviśāradaḥ
वत्सरूपधर (वत्सासुर-वध हेतु बछड़े का रूप धारण करने वाले), वत्सी, वत्सहा, धेनुकांतकृत् (धेनुकासुर का अंत करने वाले); बकारि (बकासुर का शत्रु), वनवासी, वनक्रीडाविशारद।
श्लोक 171 (skanda.5.63.171)
कृष्णवर्णाऽऽकृतिः कांतो वेणुवेत्रविधारकः। गोपमोक्षकरो मोक्षो यमुनापुलिनेचरः
kṛṣṇavarṇā''kṛtiḥ kāṁto veṇuvetravidhārakaḥ| gopamokṣakaro mokṣo yamunāpulinecaraḥ
कृष्णवर्णाकृति, कांत, वेणुवेत्रविधारक (वंशी-लाठी धारण करने वाले); गोपमोक्षकर (गोपों को दावानल से मुक्त करने वाले), मोक्ष, यमुनापुलिनेचर।
श्लोक 172 (skanda.5.63.172)
मायावत्सकरो मायी ब्रह्ममायापमोहकः। आत्मसारविहारज्ञो गोपदारकदारकः
māyāvatsakaro māyī brahmamāyāpamohakaḥ| ātmasāravihārajño gopadārakadārakaḥ
मायावत्सकर (माया से बछड़े रचने वाले, ब्रह्मा की परीक्षा में), मायी, ब्रह्ममायापमोहक (ब्रह्मा की ही माया को मोहित करने वाले); आत्मसारविहारज्ञ, गोपदारकदारक (गोपबालकों में बालक-रूप)।
श्लोक 173 (skanda.5.63.173)
गोचारी गोपतिर्गोपो गोवर्धनधरो बली। इन्द्रद्यु्म्नो मखध्वंसी वृष्टिहा गोपरक्षकः
gocārī gopatirgopo govardhanadharo balī| indradyumno makhadhvaṁsī vṛṣṭihā goparakṣakaḥ
गोचारी, गोपति, गोप, गोवर्धनधर, बली; मखध्वंसी (इंद्रयज्ञ का ध्वंस करने वाले), वृष्टिहा (वर्षा को रोकने वाले), गोपरक्षक।
श्लोक 174 (skanda.5.63.174)
सुरभित्राणकर्ता च दावपानकरः कली। कालीयमर्दनः काली यमुनाह्रदविहारकः
surabhitrāṇakartā ca dāvapānakaraḥ kalī| kālīyamardanaḥ kālī yamunāhradavihārakaḥ
सुरभित्राणकर्ता (गौओं के रक्षक), दावपानकर (दावाग्नि को पी जाने वाले), कली; कालीयमर्दन, काली (कालिय-मर्दक), यमुनाह्रदविहारक।
श्लोक 175 (skanda.5.63.175)
संकर्षणो बलश्लाघ्यो बलदेवो हलायुधः। लांगली मुसली चक्री रामो रोहिणिनंदनः
saṁkarṣaṇo balaślāghyo baladevo halāyudhaḥ| lāṁgalī musalī cakrī rāmo rohiṇinaṁdanaḥ
संकर्षण, बलश्लाघ्य, बलदेव, हलायुध; लांगली, मुसली, चक्री, राम, रोहिणीनंदन — बलराम के नाम।
श्लोक 176 (skanda.5.63.176)
यमुनाकर्षणोद्धारो नीलवासा हलो हली। रेवती रमणो लोलो बहुमानकरः परः
yamunākarṣaṇoddhāro nīlavāsā halo halī| revatī ramaṇo lolo bahumānakaraḥ paraḥ
यमुनाकर्षणोद्धार (हल से यमुना को खींच लाने वाले), नीलवासा, हल, हली; रेवतीरमण, लोल, बहुमानकर, पर — बलराम की कथा जारी।
श्लोक 177 (skanda.5.63.177)
धेनुकारिर्महावीरो गोपकन्याविदूषकः। काममानहरः कामी गोपीवासोऽपतस्करः
dhenukārirmahāvīro gopakanyāvidūṣakaḥ| kāmamānaharaḥ kāmī gopīvāso'pataskaraḥ
धेनुकारि, महावीर, गोपकन्याविदूषक (गोपकन्याओं को छेड़ने वाले); काममानहर, कामी, गोपीवास, अपतस्कर (गोपियों के वस्त्र हरने वाले)।
श्लोक 178 (skanda.5.63.178)
वेणुवादी च नादी च नृत्यगीतविशारदः। गोपीमोहकरो गानी रासको रजनीचरः
veṇuvādī ca nādī ca nṛtyagītaviśāradaḥ| gopīmohakaro gānī rāsako rajanīcaraḥ
वेणुवादी, नादी, नृत्यगीतविशारद; गोपीमोहकर, गानी, रासक (रासलीला के कर्ता), रजनीचर।
श्लोक 179 (skanda.5.63.179)
दिव्यमाली विमाली च वनमालाविभूषितः। कैटभारिश्च कंसारिर्मधुहा मधुसूदनः
divyamālī vimālī ca vanamālāvibhūṣitaḥ| kaiṭabhāriśca kaṁsārirmadhuhā madhusūdanaḥ
दिव्यमाली, विमाली, वनमालाविभूषित; कैटभारि, कंसारि, मधुहा, मधुसूदन — दैत्यनाशक नाम।
श्लोक 180 (skanda.5.63.180)
चाणूरमर्दनो मल्लो मुष्टी मुष्टिकनाशकृत्। मुरहा मोदका मोदी मदघ्नो नरकांतकृत
cāṇūramardano mallo muṣṭī muṣṭikanāśakṛt| murahā modakā modī madaghno narakāṁtakṛta
चाणूरमर्दन, मल्ल, मुष्टी, मुष्टिकनाशकृत्; मुरहा, मोदक, मोदी, मदघ्न, नरकांतकृत्।
श्लोक 181 (skanda.5.63.181)
विद्याध्यायी भूमिशायी सुदामा सुसखा सुखी। सकलो विकलो वैद्यः कलितो वै कलानिधिः
vidyādhyāyī bhūmiśāyī sudāmā susakhā sukhī| sakalo vikalo vaidyaḥ kalito vai kalānidhiḥ
विद्याध्यायी, भूमिशायी, सुदामा, सुसखा, सुखी; सकल, विकल, वैद्य, कलित, कलानिधि।
श्लोक 182 (skanda.5.63.182)
विद्याशाली विशाली च पितृमातृविमोक्षकः। रुक्मिणी रमणो रम्यः कालिंदीपतिः शंखहा
vidyāśālī viśālī ca pitṛmātṛvimokṣakaḥ| rukmiṇī ramaṇo ramyaḥ kāliṁdīpatiḥ śaṁkhahā
विद्याशाली, विशाली, पितृमातृविमोक्षक (माता-पिता को कारागार से मुक्त करने वाले); रुक्मिणीरमण, रम्य, कालिंदीपति, शंखहा।
श्लोक 183 (skanda.5.63.183)
पांचजन्यो महापद्मो बहुनायकनायकः। धुंधुमारो निकुंभघ्नः शंबरांतो रतिप्रियः
pāṁcajanyo mahāpadmo bahunāyakanāyakaḥ| dhuṁdhumāro nikuṁbhaghnaḥ śaṁbarāṁto ratipriyaḥ
पांचजन्य, महापद्म, बहुनायकनायक (अनेक नायकों के भी नायक); धुंधुमार, निकुंभघ्न, शंबरांत, रतिप्रिय।
श्लोक 184 (skanda.5.63.184)
प्रद्युम्नश्चानिरुद्धश्च सात्वतां पतिरर्जुनः। फाल्गुनश्च गुडाकेशः सव्यसाची धनंजयः
pradyumnaścāniruddhaśca sātvatāṁ patirarjunaḥ| phālgunaśca guḍākeśaḥ savyasācī dhanaṁjayaḥ
प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, सात्वतां पति (सात्वतवंश के स्वामी), अर्जुन; फाल्गुन, गुडाकेश, सव्यसाची, धनंजय — अर्जुन के नाम।
श्लोक 185 (skanda.5.63.185)
किरीटी च धनुष्पाणिर्धनुर्वेदविशारदः। शिखंडी सात्यकिः शैब्यो भीमो भीमपराक्रमः
kirīṭī ca dhanuṣpāṇirdhanurvedaviśāradaḥ| śikhaṁḍī sātyakiḥ śaibyo bhīmo bhīmaparākramaḥ
किरीटी, धनुष्पाणि, धनुर्वेदविशारद; शिखंडी, सात्यकि, शैब्य, भीम, भीमपराक्रम।
श्लोक 186 (skanda.5.63.186)
पांचालश्चाभिमन्युश्च सौभद्रो द्रौपदीपति.। युधिष्ठिरो धर्मराजः सत्यवादी शुचिव्रतः
pāṁcālaścābhimanyuśca saubhadro draupadīpati.| yudhiṣṭhiro dharmarājaḥ satyavādī śucivrataḥ
पांचाल (द्रुपद-वंशी), अभिमन्यु, सौभद्र (सुभद्रा-पुत्र), द्रौपदीपति; युधिष्ठिर, धर्मराज, सत्यवादी, शुचिव्रत।
श्लोक 187 (skanda.5.63.187)
नकुलः सहदेव श्च कर्णो दुर्योधनो घृणी। गांगेयोऽथ गदापाणिर्भीष्मो भागीरथीसुतः
nakulaḥ sahadeva śca karṇo duryodhano ghṛṇī| gāṁgeyo'tha gadāpāṇirbhīṣmo bhāgīrathīsutaḥ
नकुल, सहदेव, कर्ण, दुर्योधन, घृणी; गांगेय (गंगापुत्र), गदापाणि, भीष्म, भागीरथीसुत।
श्लोक 188 (skanda.5.63.188)
प्रज्ञाचक्षुर्धृतराष्ट्रो भारद्वाजोथ गौतमः। अश्वत्थामा विकर्णश्च युद्धविशारदः
prajñācakṣurdhṛtarāṣṭro bhāradvājotha gautamaḥ| aśvatthāmā vikarṇaśca yuddhaviśāradaḥ
प्रज्ञाचक्षु (धृतराष्ट्र, ज्ञान के नेत्र वाले), धृतराष्ट्र, भारद्वाज (द्रोण), गौतम (कृपाचार्य); अश्वत्थामा, विकर्ण तथा युद्धकुशल [अन्य वीर] — स्रोत-पाठ में यहाँ एक नाम अस्पष्ट/अपठनीय है, जिसे मूल विकिस्रोत पाठ में ही प्रश्नचिह्न से चिह्नित किया गया है; अनुवाद में उसे छोड़ दिया गया है।
श्लोक 189 (skanda.5.63.189)
सीमंतिको गदी गाल्वो विश्वामित्रो दुरासदः। दुर्वासा दुर्विनीतश्च मार्कंडेयो महामुनिः
sīmaṁtiko gadī gālvo viśvāmitro durāsadaḥ| durvāsā durvinītaśca mārkaṁḍeyo mahāmuniḥ
सीमंतिक, गदी, गाल्व, विश्वामित्र, दुरासद; दुर्वासा, दुर्विनीत, मार्कण्डेय महामुनि।
श्लोक 190 (skanda.5.63.190)
लोमशो निर्मलोऽलोमी दीर्घायुश्च चिरोऽचिरी। पुनर्जीवी मृतो भावी भूतो भव्यो भविष्यकः
lomaśo nirmalo'lomī dīrghāyuśca ciro'cirī| punarjīvī mṛto bhāvī bhūto bhavyo bhaviṣyakaḥ
लोमश, निर्मल, अलोमी, दीर्घायु, चिर, अचिरी; पुनर्जीवी, मृत, भावी, भूत, भव्य, भविष्यक।
श्लोक 191 (skanda.5.63.191)
त्रिकालोऽथ त्रिलिंगश्च त्रिनेत्रस्त्रिपदीपतिः। यादवो याज्ञवल्क्यश्च यदुवंशविवर्धनः
trikālo'tha triliṁgaśca trinetrastripadīpatiḥ| yādavo yājñavalkyaśca yaduvaṁśavivardhanaḥ
त्रिकाल, त्रिलिंग, त्रिनेत्र, त्रिपदीपति (गायत्री के त्रिपाद के स्वामी); यादव, याज्ञवल्क्य, यदुवंशविवर्धन।
श्लोक 192 (skanda.5.63.192)
शल्यक्रीडी विक्रीडश्च यादवांतकरः कलिः। सदयो हृदयो दायो दायदो दायभाग्दयी
śalyakrīḍī vikrīḍaśca yādavāṁtakaraḥ kaliḥ| sadayo hṛdayo dāyo dāyado dāyabhāgdayī
शल्यक्रीडी, विक्रीड, यादवांतकर, कलि; सदय, हृदय, दाय, दायद, दायभाक्, दयी।
श्लोक 193 (skanda.5.63.193)
महोदधि र्महीपृष्ठो नीलपर्वतवासकृत। एकवर्णो विवर्णश्च सर्ववर्णबहिश्चरः
mahodadhi rmahīpṛṣṭho nīlaparvatavāsakṛta| ekavarṇo vivarṇaśca sarvavarṇabahiścaraḥ
महोदधि, महीपृष्ठ, नीलपर्वतवासकृत्; एकवर्ण, विवर्ण, सर्ववर्णबहिश्चर।
श्लोक 194 (skanda.5.63.194)
यज्ञनिंदी वेदनिंदी वेदबाह्यो बलो बलिः। बौद्धारिर्बाधको बाधो जगन्नाथो जगत्पतिः
yajñaniṁdī vedaniṁdī vedabāhyo balo baliḥ| bauddhārirbādhako bādho jagannātho jagatpatiḥ
यज्ञनिंदी, वेदनिंदी, वेदबाह्य, बल, बलि (वेद-यज्ञ की मर्यादा के परे जाने वाले रूप — बुद्धावतार का संकेत); बौद्धारि, बाधक, बाध, जगन्नाथ, जगत्पति।
श्लोक 195 (skanda.5.63.195)
भक्तिर्भागवतो भागी विभक्तो भगवत्प्रियः। त्रिग्रामोऽथ नवारण्यो गुह्योपनिषदासनः
bhaktirbhāgavato bhāgī vibhakto bhagavatpriyaḥ| trigrāmo'tha navāraṇyo guhyopaniṣadāsanaḥ
भक्ति, भागवत, भागी, विभक्त, भगवत्प्रिय; त्रिग्राम, नवारण्य, गुह्योपनिषदासन।
श्लोक 196 (skanda.5.63.196)
शालिग्रामः शिलायुक्तो विशालो गंडकाश्रयः। श्रुतदेवः श्रुतः श्रावी श्रुतबोधः श्रुतश्रवाः
śāligrāmaḥ śilāyukto viśālo gaṁḍakāśrayaḥ| śrutadevaḥ śrutaḥ śrāvī śrutabodhaḥ śrutaśravāḥ
शालिग्राम, शिलायुक्त, विशाल, गंडकाश्रय (गंडकी नदी के आश्रित); श्रुतदेव, श्रुत, श्रावी, श्रुतबोध, श्रुतश्रवा।
श्लोक 197 (skanda.5.63.197)
कल्किः कालकलः कल्को दुष्टम्लेच्छविनाश कृत्। कुंकुमी धवलो धीरः क्षमाकरो वृषाकपिः
kalkiḥ kālakalaḥ kalko duṣṭamlecchavināśa kṛt| kuṁkumī dhavalo dhīraḥ kṣamākaro vṛṣākapiḥ
कल्कि, कालकल, कल्क, दुष्टम्लेच्छविनाशकृत् (दुष्ट म्लेच्छों का नाश करने वाले); कुंकुमी, धवल, धीर, क्षमाकर, वृषाकपि।
श्लोक 198 (skanda.5.63.198)
किंकरः किन्नरः कण्वः केकी किंपुरुषाधिपः। एकरोमा विरोमा च बहुरोमा बृहत्कविः
kiṁkaraḥ kinnaraḥ kaṇvaḥ kekī kiṁpuruṣādhipaḥ| ekaromā viromā ca bahuromā bṛhatkaviḥ
किंकर, किन्नर, कण्व, केकी, किंपुरुषाधिप; एकरोमा, विरोमा, बहुरोमा, बृहत्कवि।
श्लोक 199 (skanda.5.63.199)
वज्रप्रहरणो वज्री वृत्रघ्नो वासवानुजः। बहुतीर्थकरस्तीर्थः सर्वतीर्थजनेश्वरः
vajrapraharaṇo vajrī vṛtraghno vāsavānujaḥ| bahutīrthakarastīrthaḥ sarvatīrthajaneśvaraḥ
वज्रप्रहरण, वज्री, वृत्रघ्न, वासवानुज (इंद्र के अनुज, वामन); बहुतीर्थकर, तीर्थ, सर्वतीर्थजनेश्वर।
श्लोक 200 (skanda.5.63.200)
व्यतीपातोपरागश्च दानवृद्धिकरः शुभः। असंख्येयोऽप्रमेयश्च संख्याकारो विसंख्यकः
vyatīpātoparāgaśca dānavṛddhikaraḥ śubhaḥ| asaṁkhyeyo'prameyaśca saṁkhyākāro visaṁkhyakaḥ
व्यतीपातोपराग, दानवृद्धिकर, शुभ; असंख्येय, अप्रमेय, संख्याकार, विसंख्यक।
श्लोक 201 (skanda.5.63.201)
मिहिकोत्तारकस्तारो बालचंद्रः सुधाकरः। किंवर्णः कीदृशः किञ्चित्किंस्वभावः किमाश्रयः
mihikottārakastāro bālacaṁdraḥ sudhākaraḥ| kiṁvarṇaḥ kīdṛśaḥ kiñcitkiṁsvabhāvaḥ kimāśrayaḥ
मिहिकोत्तारक (कुहासे को दूर करने वाले), तार, बालचंद्र, सुधाकर; किंवर्ण, कीदृश, किंचित्, किंस्वभाव, किमाश्रय — इन प्रश्नवाचक नामों से भगवान् की अवर्णनीयता व्यक्त होती है।
श्लोक 202 (skanda.5.63.202)
निर्लोकश्च निराकारी बह्वाकारैककारकः। दौहित्रः पुत्रिकः पौत्रो नप्ता वंशधरो धरः
nirlokaśca nirākārī bahvākāraikakārakaḥ| dauhitraḥ putrikaḥ pautro naptā vaṁśadharo dharaḥ
निर्लोक, निराकारी, बह्वाकारैककारक (अनेक रूपों के एकमात्र रचयिता); दौहित्र, पुत्रिक, पौत्र, नप्ता, वंशधर, धर — सभी पारिवारिक संबंधों के रूप में भगवान्।
श्लोक 203 (skanda.5.63.203)
द्रवीभूतो दयालुश्च सर्वसिद्धिप्रदो मणिः
dravībhūto dayāluśca sarvasiddhiprado maṇiḥ
द्रवीभूत (द्रवित हृदय वाले), दयालु, सर्वसिद्धिप्रद, मणि (चिन्तामणि)।
श्लोक 204 (skanda.5.63.204)
आधारोऽपि विधारश्च धरासूनुः सुमंगलः। मंगलो मंगलाकारो मांगल्यः सर्वमंगलः
ādhāro'pi vidhāraśca dharāsūnuḥ sumaṁgalaḥ| maṁgalo maṁgalākāro māṁgalyaḥ sarvamaṁgalaḥ
आधार, विधार, धरासूनु (पृथ्वीपुत्र), सुमंगल; मंगल, मंगलाकार, मांगल्य, सर्वमंगल।
श्लोक 205 (skanda.5.63.205)
नाम्नां सहस्रं नामेदं विष्णोरतुलतेजसः। सर्वसिद्धिकरं काम्यं पुण्यं हरिहरात्मकम्
nāmnāṁ sahasraṁ nāmedaṁ viṣṇoratulatejasaḥ| sarvasiddhikaraṁ kāmyaṁ puṇyaṁ hariharātmakam
यह विष्णु के अतुल तेजस्वी सहस्र नाम हैं; समस्त सिद्धियाँ देने वाले, वांछनीय, पुण्यमय, तथा हरि-हर दोनों स्वरूप वाले हैं।
श्लोक 206 (skanda.5.63.206)
यः पठेत्प्रातरुत्थाय शुचिर्भूत्वा समाहितः। यश्चेदं शृणुयान्नित्यं नरो निश्चलमानसः
yaḥ paṭhetprātarutthāya śucirbhūtvā samāhitaḥ| yaścedaṁ śṛṇuyānnityaṁ naro niścalamānasaḥ
जो प्रातःकाल उठकर, शुद्ध और एकाग्रचित्त होकर इसे पढ़ता है; तथा जो मनुष्य नित्य स्थिरमन से इसे सुनता है...
श्लोक 207 (skanda.5.63.207)
त्रिसंध्यं श्रद्धया युक्तः सर्वपापैः प्रमुच्यते। नंदते पुत्रपौत्रैश्च दारैर्भृत्यैश्च पूजितः
trisaṁdhyaṁ śraddhayā yuktaḥ sarvapāpaiḥ pramucyate| naṁdate putrapautraiśca dārairbhṛtyaiśca pūjitaḥ
...त्रिकाल श्रद्धापूर्वक करने से वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है; पुत्र-पौत्रों, पत्नी और सेवकों से सम्मानित होकर वह आनंदित रहता है।
श्लोक 208 (skanda.5.63.208)
प्राप्नुते विपुलां लक्ष्मीं मुच्यते सर्वसंकटात्। सर्वान्कामानवाप्नोति लभते विपुलं यशः
prāpnute vipulāṁ lakṣmīṁ mucyate sarvasaṁkaṭāt| sarvānkāmānavāpnoti labhate vipulaṁ yaśaḥ
वह प्रचुर लक्ष्मी प्राप्त करता है, समस्त संकटों से मुक्त होता है; वह समस्त कामनाएँ प्राप्त करता है और विपुल यश पाता है।
श्लोक 209 (skanda.5.63.209)
विद्यावाञ्जायते विप्रः क्षत्रियो विजयी भवेत्। वैश्यश्च धनलाभाढ्यः शूद्रः सुखमवाप्नुयात्
vidyāvāñjāyate vipraḥ kṣatriyo vijayī bhavet| vaiśyaśca dhanalābhāḍhyaḥ śūdraḥ sukhamavāpnuyāt
विप्र विद्यावान् होता है, क्षत्रिय विजयी होता है; वैश्य धनलाभ से समृद्ध होता है, शूद्र सुख प्राप्त करता है।
श्लोक 210 (skanda.5.63.210)
रणे घोरे विवादे च व्यापारे पारतंत्रके। विजयी जयमाप्नोति सर्वदा सर्वकर्मसु
raṇe ghore vivāde ca vyāpāre pārataṁtrake| vijayī jayamāpnoti sarvadā sarvakarmasu
भीषण युद्ध में, विवाद में, व्यापार में, पराधीनता में — वह सदा समस्त कार्यों में विजय प्राप्त करता है।
श्लोक 211 (skanda.5.63.211)
एकधा दशधा चैव शतधा च सहस्रधा। पठते हि नरो नित्यं तथैव फलमश्नुते
ekadhā daśadhā caiva śatadhā ca sahasradhā| paṭhate hi naro nityaṁ tathaiva phalamaśnute
एक बार, दस बार, सौ बार अथवा हजार बार जो मनुष्य नित्य इसे पढ़ता है, वह उसी अनुसार फल प्राप्त करता है।
श्लोक 212 (skanda.5.63.212)
पुत्रार्थी प्राप्नुते पुत्रान्धनार्थी धनमव्ययम्। मोक्षार्थी प्राप्नुते मोक्षं धर्मार्थी धर्मसंचयम्
putrārthī prāpnute putrāndhanārthī dhanamavyayam| mokṣārthī prāpnute mokṣaṁ dharmārthī dharmasaṁcayam
पुत्रार्थी पुत्रों को प्राप्त करता है, धनार्थी अक्षय धन को; मोक्षार्थी मोक्ष को, धर्मार्थी धर्म-संचय को प्राप्त करता है।
श्लोक 213 (skanda.5.63.213)
कन्यार्थी प्राप्नुते कन्यां दुर्लभां यत्सुरैरपि। ज्ञानार्थी जायते ज्ञानी योगी योगेषु युज्यते
kanyārthī prāpnute kanyāṁ durlabhāṁ yatsurairapi| jñānārthī jāyate jñānī yogī yogeṣu yujyate
कन्यार्थी वह कन्या प्राप्त करता है जो देवताओं को भी दुर्लभ है; ज्ञानार्थी ज्ञानी होता है, योगी योग में युक्त होता है।
श्लोक 214 (skanda.5.63.214)
महोत्पातेषु घोरेषु दुर्भिक्षे राजविग्रहे। महामारीसमुद्भूते दारिद्र्ये दुःखपीडिते
mahotpāteṣu ghoreṣu durbhikṣe rājavigrahe| mahāmārīsamudbhūte dāridrye duḥkhapīḍite
भीषण महोत्पातों में, दुर्भिक्ष में, राजयुद्ध में, महामारी के प्रकोप में, दरिद्रता तथा दुःख से पीड़ित होने पर...
श्लोक 215 (skanda.5.63.215)
अरण्ये प्रांतरे वाऽपि दावाग्निपरिवारिते। सिंहव्याघ्राभिभूतेऽपि वने हस्तिसमाकुले
araṇye prāṁtare vā'pi dāvāgniparivārite| siṁhavyāghrābhibhūte'pi vane hastisamākule
...अरण्य में या प्रान्तर में, दावाग्नि से घिरे होने पर, सिंह-व्याघ्रों से आक्रांत होने पर, हाथियों से भरे वन में...
श्लोक 216 (skanda.5.63.216)
राज्ञा क्रुद्धेन चाज्ञप्ते दस्युभिः सह संगमे। विद्युत्पातेषु घोरेषु स्मर्तव्यं हि सदा नरैः
rājñā kruddhena cājñapte dasyubhiḥ saha saṁgame| vidyutpāteṣu ghoreṣu smartavyaṁ hi sadā naraiḥ
...क्रोधित राजा की आज्ञा होने पर, डाकुओं से भेंट होने पर, भीषण वज्रपात होने पर — मनुष्यों को सदा इसका स्मरण करना चाहिए।
श्लोक 217 (skanda.5.63.217)
ग्रहपीडासु चोग्रासु वधबन्धगतावपि। महार्णवे महानद्यां पोतस्थेषु न चापदः
grahapīḍāsu cogrāsu vadhabandhagatāvapi| mahārṇave mahānadyāṁ potastheṣu na cāpadaḥ
भीषण ग्रहपीड़ाओं में, वध-बंधन को प्राप्त होने पर, महासागर या महानदी में नौका पर स्थित होने पर भी — कोई विपत्ति नहीं होती।
श्लोक 218 (skanda.5.63.218)
रोगग्रस्तो विवर्णश्च गतकेशनखत्वचः। पठनाच्छवणाद्वापि दिव्यकाया भवंति ते
rogagrasto vivarṇaśca gatakeśanakhatvacaḥ| paṭhanācchavaṇādvāpi divyakāyā bhavaṁti te
रोगग्रस्त, विवर्ण, केश-नख-त्वचा से रहित मनुष्य — पढ़ने अथवा सुनने मात्र से दिव्य शरीर वाले हो जाते हैं।
श्लोक 219 (skanda.5.63.219)
तुलसीवनसंस्थाने सरोद्वीपे सुरालये। बद्रिकाश्रमे शुभे देशे गंगाद्वारे तपोवने
tulasīvanasaṁsthāne sarodvīpe surālaye| badrikāśrame śubhe deśe gaṁgādvāre tapovane
तुलसीवन में, सरोवर-द्वीप में, देवालय में, शुभ बद्रिकाश्रम में, गंगाद्वार में, तपोवन में...
श्लोक 220 (skanda.5.63.220)
मधुवने प्रयागे च द्वारकायां समाहितः। महाकालवने सिद्धे नियताः सर्वकामिकाः
madhuvane prayāge ca dvārakāyāṁ samāhitaḥ| mahākālavane siddhe niyatāḥ sarvakāmikāḥ
...मधुवन में, प्रयाग में, द्वारका में, एकाग्रचित्त होकर, सिद्ध महाकालवन में — इसका पाठ करने वाले दृढ़ और समस्त कामनाओं से युक्त हो जाते हैं।
श्लोक 221 (skanda.5.63.221)
ये पठंति शतावर्तं भक्तिमंतो जितेंद्रियाः। ते सिद्धाः सिद्धिदा लोके विचरंति महीतले
ye paṭhaṁti śatāvartaṁ bhaktimaṁto jiteṁdriyāḥ| te siddhāḥ siddhidā loke vicaraṁti mahītale
जो भक्तिमान्, जितेंद्रिय जन इसे सौ बार पढ़ते हैं, वे सिद्ध होकर सिद्धिदाता बन पृथ्वी पर स्वच्छंद विचरण करते हैं।
श्लोक 222 (skanda.5.63.222)
अन्योन्यभेदभेदानां मैत्रीकरणमुत्तमम्। मोहनं मोहनानां च पवित्रं पापनाशनम्
anyonyabhedabhedānāṁ maitrīkaraṇamuttamam| mohanaṁ mohanānāṁ ca pavitraṁ pāpanāśanam
यह परस्पर भेद से विभाजित लोगों में उत्तम मैत्री उत्पन्न करने वाला, मोहितों के मोह को दूर करने वाला, पवित्र और पापनाशक है।
श्लोक 223 (skanda.5.63.223)
बालग्रहविनाशाय शांतीकरणमुत्तमम्। दुर्वृत्तानां च पापानां बुद्धिनाशकरं परम्
bālagrahavināśāya śāṁtīkaraṇamuttamam| durvṛttānāṁ ca pāpānāṁ buddhināśakaraṁ param
बालग्रहों के नाश के लिए यह उत्तम शांतिकारक है; दुर्वृत्त और पापियों की बुद्धि का नाश करने वाला परम है।
श्लोक 224 (skanda.5.63.224)
पतद्गर्भा च वंध्या च स्राविणी काकवन्ध्यका। अनायासेन सततं पुत्रमेव प्रसूयते
patadgarbhā ca vaṁdhyā ca srāviṇī kākavandhyakā| anāyāsena satataṁ putrameva prasūyate
गर्भपात करने वाली, बांझ, बार-बार गर्भ गिराने वाली अथवा जिसकी संतानें कौवे के समान अल्पायु में मर जाती हैं — ऐसी स्त्री भी सहज ही सदा पुत्र को जन्म देती है।
श्लोक 225 (skanda.5.63.225)
पयःपुष्कलदा गावो बहुधान्यफला। कृषिः। स्वामिधर्मपरा भृत्या नारी पतिव्रता भवेत्
payaḥpuṣkaladā gāvo bahudhānyaphalā| kṛṣiḥ| svāmidharmaparā bhṛtyā nārī pativratā bhavet
गौएँ प्रचुर दूध देने वाली, खेती अत्यधिक अन्न देने वाली होती है; सेवक स्वामिधर्म में तत्पर तथा स्त्री पतिव्रता होती है।
श्लोक 226 (skanda.5.63.226)
अकालमृत्युनाशाय तथा दुःस्वप्नदर्शने। शांतिकर्मणि सर्वत्र स्मर्तव्यं च सदा नरैः
akālamṛtyunāśāya tathā duḥsvapnadarśane| śāṁtikarmaṇi sarvatra smartavyaṁ ca sadā naraiḥ
अकाल मृत्यु के नाश के लिए, तथा दुःस्वप्न देखने पर, सभी शांतिकर्मों में मनुष्यों को सदा इसका स्मरण करना चाहिए।
श्लोक 227 (skanda.5.63.227)
यः पठत्यन्वहं मर्त्यः शुचिष्मान्विष्णुसन्निधौ। एकाकी च जिताहारो जितक्रोधो जितेंद्रियः
yaḥ paṭhatyanvahaṁ martyaḥ śuciṣmānviṣṇusannidhau| ekākī ca jitāhāro jitakrodho jiteṁdriyaḥ
जो मरणधर्मा मनुष्य प्रतिदिन शुद्ध होकर विष्णु के समीप, अकेला, आहार-क्रोध-इंद्रियों को जीतकर इसे पढ़ता है...
श्लोक 228 (skanda.5.63.228)
गरुडारोहसंपन्नः पीतवासाश्चतुर्भुजः। वाञ्छितं प्राप्य लोकेऽस्मिन्विष्णुलोके स गच्छति
garuḍārohasaṁpannaḥ pītavāsāścaturbhujaḥ| vāñchitaṁ prāpya loke'sminviṣṇuloke sa gacchati
...गरुड़ पर आरूढ़, पीतवस्त्रधारी, चतुर्भुज विष्णु के दर्शन को प्राप्त कर, इस लोक में अपनी वांछित वस्तु पाकर वह विष्णुलोक को जाता है।
श्लोक 229 (skanda.5.63.229)
एकतः सकला विद्या एकतः सकलं तपः। एकतः सकलो धर्मो नाम विष्णोस्तथैकतः
ekataḥ sakalā vidyā ekataḥ sakalaṁ tapaḥ| ekataḥ sakalo dharmo nāma viṣṇostathaikataḥ
एक ओर समस्त विद्या है, एक ओर समस्त तप है; एक ओर समस्त धर्म है, और उसी प्रकार दूसरी ओर अकेला विष्णु का नाम है।
श्लोक 230 (skanda.5.63.230)
यो हि नामसहस्रेण स्तोतुमिच्छति वै द्विजः। सोऽयमेकेन श्लोकेन स्तुत एव न संशयः
yo hi nāmasahasreṇa stotumicchati vai dvijaḥ| so'yamekena ślokena stuta eva na saṁśayaḥ
जो द्विज सहस्र नामों से स्तुति करना चाहता है, वह इस एक श्लोक से ही स्तुत हो जाता है, इसमें संशय नहीं —
श्लोक 231 (skanda.5.63.231)
सहस्राक्षः सहस्रपात्सहस्रवदनोज्ज्वलः। सहस्रनामानंताक्षः सहस्रबाहुर्नमोस्तु ते
sahasrākṣaḥ sahasrapātsahasravadanojjvalaḥ| sahasranāmānaṁtākṣaḥ sahasrabāhurnamostu te
'सहस्राक्ष, सहस्रपाद्, सहस्र मुखों से उज्ज्वल; सहस्रनामा, अनंत नेत्रों वाले, सहस्रबाहु — आपको नमस्कार है।'
श्लोक 232 (skanda.5.63.232)
विष्णोर्नामसहस्रं वै पुराणं वेदसम्मतम्। पठितव्यं सदा भक्तैः सर्वमंगलमंगलम्
viṣṇornāmasahasraṁ vai purāṇaṁ vedasammatam| paṭhitavyaṁ sadā bhaktaiḥ sarvamaṁgalamaṁgalam
विष्णु के सहस्रनाम वेदसम्मत पुराण ही हैं; भक्तों द्वारा सदा पढ़े जाने योग्य, समस्त मंगलों में मंगलतम हैं।
श्लोक 233 (skanda.5.63.233)
इति स्तवाभियुक्तानां देवानां तत्र वै द्विज। प्रत्यक्षं प्राह भगवान्वरदो वरदार्चितः
iti stavābhiyuktānāṁ devānāṁ tatra vai dvija| pratyakṣaṁ prāha bhagavānvarado varadārcitaḥ
हे द्विज! इस स्तुति में संलग्न उन देवताओं से वहाँ वरदायी, वरदाताओं द्वारा भी पूजित भगवान् ने प्रत्यक्ष होकर कहा।
श्लोक 234 (skanda.5.63.234)
श्रीभगवानुवाच। व्रियतां भोः सुराः सर्वैर्वरोऽस्मत्तोभिवांछितः। तत्सर्वं संप्रदास्यामि नाऽत्र कार्या विचारणा
śrībhagavānuvāca| vriyatāṁ bhoḥ surāḥ sarvairvaro'smattobhivāṁchitaḥ| tatsarvaṁ saṁpradāsyāmi nā'tra kāryā vicāraṇā
श्रीभगवान् बोले — हे देवगण! आप सभी मुझसे इच्छित वर माँग लें; वह सब मैं दूँगा, इसमें कोई विचार नहीं करना चाहिए।
श्लोक 235 (skanda.5.63.235)
देवा ऊचुः। वरदोऽसि यदा विष्णो वरमेतं ददस्व नः। अदितेर्गर्भसंभूतः शक्रस्याऽप्यनुजो भव
devā ūcuḥ| varado'si yadā viṣṇo varametaṁ dadasva naḥ| aditergarbhasaṁbhūtaḥ śakrasyā'pyanujo bhava
देवगण बोले — हे विष्णो! जब आप वरदायक हैं, तो हमें यह वर दें — आप अदिति के गर्भ से उत्पन्न होकर इंद्र के अनुज बनें।
श्लोक 236 (skanda.5.63.236)
इति संप्रार्थितो देवैर्ब्रह्मशक्रपुरोगमेः। तथेत्युक्ता च भगवांस्तत्रैवांऽतरधीयत
iti saṁprārthito devairbrahmaśakrapurogameḥ| tathetyuktā ca bhagavāṁstatraivāṁ'taradhīyata
इस प्रकार ब्रह्मा-इंद्र आदि के नेतृत्व में देवताओं द्वारा प्रार्थित होने पर, भगवान् ने 'तथास्तु' कहकर वहीं अंतर्धान हो गये।
श्लोक 237 (skanda.5.63.237)
ततः कतिपये काले भगवानदितिनंदनः। विष्णुरूपधरो ऽनंतो वामनत्वाच्च वामनः
tataḥ katipaye kāle bhagavānaditinaṁdanaḥ| viṣṇurūpadharo 'naṁto vāmanatvācca vāmanaḥ
तत्पश्चात् कुछ समय बीतने पर अदितिनंदन भगवान्, विष्णुरूपधारी अनंत, वामनत्व के कारण वामन कहलाये...
श्लोक 238 (skanda.5.63.238)
बलिर्वैरोचनो व्यास वाजिमेधशतेन च। ईजे द्विजवरश्रेष्ठ इंद्रराज्यजिहीर्षया
balirvairocano vyāsa vājimedhaśatena ca| īje dvijavaraśreṣṭha iṁdrarājyajihīrṣayā
हे व्यास! विरोचनपुत्र बलि ने इंद्र का राज्य छीनने की इच्छा से, हे द्विजवरश्रेष्ठ! सौ अश्वमेध यज्ञ किये।
श्लोक 239 (skanda.5.63.239)
ऋत्विजं कश्यपं कृत्वा होतारं भृगुसत्तमम्। ब्रह्मा तत्राभवच्चैव स्वयमेव पितामहः
ṛtvijaṁ kaśyapaṁ kṛtvā hotāraṁ bhṛgusattamam| brahmā tatrābhavaccaiva svayameva pitāmahaḥ
कश्यप को ऋत्विक् तथा भृगुश्रेष्ठ (शुक्राचार्य) को होता बनाकर, वहाँ स्वयं ब्रह्मा भी पितामह-रूप में उपस्थित हुए।
श्लोक 240 (skanda.5.63.240)
अध्वर्युर्भगवानत्रिर्बभूव मुनिसत्तमः। उद्गाता नारदश्चैव वसिष्ठश्च सभासदः
adhvaryurbhagavānatrirbabhūva munisattamaḥ| udgātā nāradaścaiva vasiṣṭhaśca sabhāsadaḥ
भगवान् अत्रि, वह मुनिश्रेष्ठ, अध्वर्यु बने; नारद उद्गाता हुए, और वसिष्ठ सभासद बने।
श्लोक 241 (skanda.5.63.241)
ये यत्र विहिताः सर्वे तत्र तत्र मुनीश्वराः। बलिस्तत्राऽभवद्व्यास दीक्षितो राजसत्तमः
ye yatra vihitāḥ sarve tatra tatra munīśvarāḥ| balistatrā'bhavadvyāsa dīkṣito rājasattamaḥ
जो जहाँ नियुक्त थे, वहाँ-वहाँ मुनीश्वरगण उपस्थित थे; हे व्यास! उस यज्ञ में राजश्रेष्ठ बलि दीक्षित हुए।
श्लोक 242 (skanda.5.63.242)
एवं प्रवर्तमानेषु यज्ञेषु मुनिसत्तम। हूयतां भुज्यतां चैव दीयतां धीयतां तथा
evaṁ pravartamāneṣu yajñeṣu munisattama| hūyatāṁ bhujyatāṁ caiva dīyatāṁ dhīyatāṁ tathā
हे मुनिसत्तम! इस प्रकार यज्ञ चलते हुए, 'हवन करो, भोजन कराओ, दान दो, भूमि भी दो' —
श्लोक 243 (skanda.5.63.243)
इति वाचः शुभास्तत्र श्रूयंते च द्विजोत्तम। तस्मिन्काले सुचित्रेषु वामनोऽगाच्छुचिस्मितः
iti vācaḥ śubhāstatra śrūyaṁte ca dvijottama| tasminkāle sucitreṣu vāmano'gācchucismitaḥ
ऐसे शुभ वचन वहाँ सुनाई देते थे, हे द्विजोत्तम! उस समय विचित्र दृश्यों के मध्य, मधुरहास्ययुक्त वामन वहाँ पहुँचे...
श्लोक 244 (skanda.5.63.244)
पठमानो मुखाग्रेण चातुर्वेदिकमंत्रकान्। द्वारे तिष्ठति राजेंद्र वामनो द्विजसत्तमः
paṭhamāno mukhāgreṇa cāturvedikamaṁtrakān| dvāre tiṣṭhati rājeṁdra vāmano dvijasattamaḥ
...अपने मुख से चारों वेदों के मंत्रों का पाठ करते हुए। हे राजेंद्र! द्विजश्रेष्ठ वामन द्वार पर खड़े हुए।
श्लोक 245 (skanda.5.63.245)
प्रतिहारेण वै व्यास सर्वं राज्ञे निवेदितम्। उत्थाय च महाराजो बलिर्वैरोचनिस्तदा
pratihāreṇa vai vyāsa sarvaṁ rājñe niveditam| utthāya ca mahārājo balirvairocanistadā
हे व्यास! द्वारपाल द्वारा यह सब राजा को निवेदित किया गया। तब महाराज विरोचनपुत्र बलि उठकर...
श्लोक 246 (skanda.5.63.246)
अर्घ्यमादाय तत्सर्वं जगाम स्वैः सभासदैः। पूजयित्वा यथान्यायं वामनं लोकभावनम्
arghyamādāya tatsarvaṁ jagāma svaiḥ sabhāsadaiḥ| pūjayitvā yathānyāyaṁ vāmanaṁ lokabhāvanam
...अर्घ्य लेकर, अपने सभासदों सहित वहाँ गये; लोकपालक वामन की यथोचित पूजा कर...
श्लोक 247 (skanda.5.63.247)
आनयित्वा सभामध्ये दत्त्वाऽऽसनपरिग्रहम्। कुतस्त्वागमनं ब्रह्मन्किं तेऽभीष्टं ददामि वै
ānayitvā sabhāmadhye dattvā''sanaparigraham| kutastvāgamanaṁ brahmankiṁ te'bhīṣṭaṁ dadāmi vai
...उन्हें सभा में लाकर, आसन देकर कहा — 'हे ब्रह्मन्! आपका आगमन कहाँ से हुआ? आपको क्या अभीष्ट है, जो मैं दूँ?'
श्लोक 248 (skanda.5.63.248)
वामन उवाच। राजराजाखिला सृष्टिर्ब्रह्मणः परमेष्ठिनः। ततोऽहमागतो भूमन्यज्ञं चैव दिदृक्षया
vāmana uvāca| rājarājākhilā sṛṣṭirbrahmaṇaḥ parameṣṭhinaḥ| tato'hamāgato bhūmanyajñaṁ caiva didṛkṣayā
वामन बोले — 'हे राजराज! समस्त सृष्टि परमेष्ठी ब्रह्मा की है; वहीं से मैं, हे पृथ्वीपते! यज्ञ देखने की इच्छा से आया हूँ।'
श्लोक 249 (skanda.5.63.249)
वरुणस्य च यज्ञो वै दृष्टो मे वै पुरानघ। यक्षाधिपतेर्नूनं च यज्ञं वै दृष्टवानहम्
varuṇasya ca yajño vai dṛṣṭo me vai purānagha| yakṣādhipaternūnaṁ ca yajñaṁ vai dṛṣṭavānaham
'वरुण का यज्ञ भी मैंने पूर्वकाल में देखा है, हे निष्पाप! और यक्षाधिपति (कुबेर) का यज्ञ भी निश्चय ही मैंने देखा है।'
श्लोक 250 (skanda.5.63.250)
धर्मस्याऽपि च यज्ञो मे प्रजापतेश्च सत्तम। वायोर्यज्ञो महाराज दृष्टो मे विधिपूर्वकः
dharmasyā'pi ca yajño me prajāpateśca sattama| vāyoryajño mahārāja dṛṣṭo me vidhipūrvakaḥ
'हे सत्तम! धर्म और प्रजापति का भी यज्ञ मैंने देखा; हे महाराज! वायु का यज्ञ भी मैंने विधिपूर्वक देखा है।'
श्लोक 251 (skanda.5.63.251)
राजर्षीणां च ये यज्ञा दृष्टास्तेऽपि महाव्रत। यादृशं वै महाराज यज्ञं ते दृष्टवानहम्
rājarṣīṇāṁ ca ye yajñā dṛṣṭāste'pi mahāvrata| yādṛśaṁ vai mahārāja yajñaṁ te dṛṣṭavānaham
'हे महाव्रत! राजर्षियों के भी जो यज्ञ हुए, वे सब मैंने देखे हैं; परंतु हे महाराज! जैसा यज्ञ मैंने तुम्हारा देखा है...'
श्लोक 252 (skanda.5.63.252)
ईदृशो राजराजेंद्र न भूतो न भविष्यति। तस्मादिहागतो राजन्याचनार्थं तवाऽनघ
īdṛśo rājarājeṁdra na bhūto na bhaviṣyati| tasmādihāgato rājanyācanārthaṁ tavā'nagha
'...ऐसा, हे राजराजेंद्र! न कभी हुआ है, न होगा। इसलिए, हे निष्पाप राजन्! मैं यहाँ याचना के लिए आया हूँ।'
श्लोक 253 (skanda.5.63.253)
बलिरुवाच। याचस्व त्वं द्विजश्रेष्ठ किं तेऽभीष्टं ददाम्य हम्
baliruvāca| yācasva tvaṁ dvijaśreṣṭha kiṁ te'bhīṣṭaṁ dadāmya ham
बलि बोले — 'हे द्विजश्रेष्ठ! माँगिए, आपको जो अभीष्ट हो, वह मैं दूँगा।'
श्लोक 254 (skanda.5.63.254)
वामन उवाच। देहि मे राजराजेंद्र पदानि त्रीणि मेदिनीम्। वासार्थं रोचते तेऽद्य यदि पार्थिवसत्तम
vāmana uvāca| dehi me rājarājeṁdra padāni trīṇi medinīm| vāsārthaṁ rocate te'dya yadi pārthivasattama
वामन बोले — 'हे राजराजेंद्र! मुझे तीन पग भूमि दीजिए, यदि आज आपको रुचे, हे पार्थिवसत्तम! निवास हेतु।'
श्लोक 255 (skanda.5.63.255)
बलिरुवाच। किमिदं याचितं विप्र स्वल्पं ते नहि ते परम्। गजवाजिरथाः क्षोणी रत्नानि विविधानि च
baliruvāca| kimidaṁ yācitaṁ vipra svalpaṁ te nahi te param| gajavājirathāḥ kṣoṇī ratnāni vividhāni ca
बलि बोले — 'हे विप्र! यह क्या माँगा है? यह आपके लिए अत्यंत अल्प है, आपके योग्य नहीं। हाथी, घोड़े, रथ, भूमि, विविध रत्न...'
श्लोक 256 (skanda.5.63.256)
दासदासीर्वरारोहाः स्त्रियो नाना वसूनि च। द्रव्याणि वाससी शुभ्रे याचस्व त्वं द्विजोत्तम
dāsadāsīrvarārohāḥ striyo nānā vasūni ca| dravyāṇi vāsasī śubhre yācasva tvaṁ dvijottama
'...श्रेष्ठ दास-दासियाँ, स्त्रियाँ, नाना प्रकार का धन, वस्तुएँ, शुभ्र वस्त्र — हे द्विजोत्तम! इनकी याचना कीजिए।'
श्लोक 257 (skanda.5.63.257)
पात्रोऽसि कृतकृत्योऽसि वेदवेदांगपारग
pātro'si kṛtakṛtyo'si vedavedāṁgapāraga
'आप पात्र हैं, कृतकृत्य हैं, वेद-वेदांगों में पारंगत हैं।'
श्लोक 258 (skanda.5.63.258)
वामन उवाच। न मे किंचित्स्पृहा राज न्विद्यते भुवि मानद। देहि त्वं त्रिपदां भूमिं यदि श्रद्धाऽस्ति तेऽधुना
vāmana uvāca| na me kiṁcitspṛhā rāja nvidyate bhuvi mānada| dehi tvaṁ tripadāṁ bhūmiṁ yadi śraddhā'sti te'dhunā
वामन बोले — 'हे मानद राजन्! मुझे संसार में किसी वस्तु की इच्छा नहीं है। यदि अभी आपकी श्रद्धा हो, तो केवल त्रिपद भूमि ही दीजिए।'
श्लोक 259 (skanda.5.63.259)
इत्युक्ते वामनेनाथ बलिर्वचनमब्रवीत्। गृहाण त्रिपदां भूमिं वासस्यार्थं हि मानद
ityukte vāmanenātha balirvacanamabravīt| gṛhāṇa tripadāṁ bhūmiṁ vāsasyārthaṁ hi mānada
वामन के ऐसा कहने पर बलि ने कहा — 'हे मानद! निवास हेतु त्रिपद भूमि ग्रहण कीजिए।'
श्लोक 260 (skanda.5.63.260)
इत्युक्त्वा स च राजर्षिर्ददौ भूमिं द्विजाय वै। वारितोऽपि तदा व्यास भृगुणा दैवनोदितः
ityuktvā sa ca rājarṣirdadau bhūmiṁ dvijāya vai| vārito'pi tadā vyāsa bhṛguṇā daivanoditaḥ
ऐसा कहकर उस राजर्षि ने द्विज को भूमि दान दी; हे व्यास! भृगु (शुक्राचार्य) द्वारा रोके जाने पर भी, दैव से प्रेरित होकर वे न रुके।
श्लोक 261 (skanda.5.63.261)
दत्तमात्रे जले सद्यो ब्रह्माण्डं चाक्रमद्धरिः। सार्धं पादद्वयं जाता सशैलवनकानना
dattamātre jale sadyo brahmāṇḍaṁ cākramaddhariḥ| sārdhaṁ pādadvayaṁ jātā saśailavanakānanā
जल का दान करते ही हरि ने तत्क्षण ब्रह्मांड को नाप लिया; अढ़ाई पगों में ही पर्वत-वन-कानन सहित समस्त पृथ्वी उनके पगतल में समा गई।
श्लोक 262 (skanda.5.63.262)
वसुधेयं तदा व्यास बलिना चार्पितं वसु। जित्वाऽसुरगणान्त्सर्वा न्राज्यं दत्त्वा शतक्रतोः
vasudheyaṁ tadā vyāsa balinā cārpitaṁ vasu| jitvā'suragaṇāntsarvā nrājyaṁ dattvā śatakratoḥ
हे व्यास! तब बलि द्वारा अर्पित यह पृथ्वी-रूपी धन, समस्त असुरगणों को जीतकर, शतक्रतु (इंद्र) को राज्य देकर...
श्लोक 263 (skanda.5.63.263)
पश्चात्कुमुद्वतीं प्राप्तो विष्णुर्वामनरूपधृक्
paścātkumudvatīṁ prāpto viṣṇurvāmanarūpadhṛk
...पश्चात् वामनरूपधारी विष्णु कुमुद्वती को प्राप्त हुए।
श्लोक 264 (skanda.5.63.264)
ऋद्धिसिद्ध्याश्रमे पुण्ये तीर्थं कृत्वाऽऽत्मसंभवम्। निवासमकरोद्व्यास तत्रैव स सुरोत्तमः
ṛddhisiddhyāśrame puṇye tīrthaṁ kṛtvā''tmasaṁbhavam| nivāsamakarodvyāsa tatraiva sa surottamaḥ
हे व्यास! ऋद्धि-सिद्धि के पुण्य आश्रम में अपने से उत्पन्न तीर्थ बनाकर, वे श्रेष्ठ देव वहीं निवास करने लगे।
श्लोक 265 (skanda.5.63.265)
वामनेन कृतं तीर्थं वामनं कुण्डमुच्यते। भाद्रे मासि सिते पक्षे द्वादशी श्रवणान्विता
vāmanena kṛtaṁ tīrthaṁ vāmanaṁ kuṇḍamucyate| bhādre māsi site pakṣe dvādaśī śravaṇānvitā
वामन द्वारा बनाया गया वह तीर्थ 'वामनकुंड' कहलाता है। भाद्रपद मास की शुक्ल द्वादशी, श्रवण नक्षत्र से युक्त होने पर...
श्लोक 266 (skanda.5.63.266)
वामन द्वादशी प्रोक्ता हत्याकोटिविनाशिनी। अस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा ह्युपोष्यैकादशीं यदा
vāmana dvādaśī proktā hatyākoṭivināśinī| asmiṁstīrthe naraḥ snātvā hyupoṣyaikādaśīṁ yadā
...उसे 'वामन-द्वादशी' कहा गया है, जो करोड़ों हत्याओं का नाश करने वाली है। इस तीर्थ में स्नान कर, जब मनुष्य एकादशी का उपवास करके...
श्लोक 267 (skanda.5.63.267)
रात्रौ जागरणं कुर्याद्ब्रह्मभूयाय कल्पते। द्वादश्यां वै विशेषेण महादानानि कुर्वते
rātrau jāgaraṇaṁ kuryādbrahmabhūyāya kalpate| dvādaśyāṁ vai viśeṣeṇa mahādānāni kurvate
...रात्रि में जागरण करता है, तो वह ब्रह्मभाव को प्राप्त होने योग्य बनता है। द्वादशी को विशेष रूप से महादान करते हैं।
श्लोक 268 (skanda.5.63.268)
न तेषां दुर्लभं किंचित्त्रिषु लोकेषु विद्यते। एवं वै वामनं तीर्थं पुरा प्रोक्तं महर्षिणा
na teṣāṁ durlabhaṁ kiṁcittriṣu lokeṣu vidyate| evaṁ vai vāmanaṁ tīrthaṁ purā proktaṁ maharṣiṇā
उनके लिए तीनों लोकों में कुछ भी दुर्लभ नहीं रहता। इस प्रकार यह वामन तीर्थ पूर्वकाल में महर्षि द्वारा कहा गया —
श्लोक 269 (skanda.5.63.269)
सर्वपापहरं पुण्यं सर्वकामवरप्रदम्। प्राप्यते तेन सर्वं हि नात्र कार्या विचारणा
sarvapāpaharaṁ puṇyaṁ sarvakāmavarapradam| prāpyate tena sarvaṁ hi nātra kāryā vicāraṇā
...समस्त पापों को हरने वाला, पुण्यमय, समस्त इच्छित वर देने वाला। इससे सब कुछ प्राप्त होता है, इसमें कोई संशय नहीं करना चाहिए।