अवन्ती खण्ड · अध्याय 66
नृसिंह तीर्थ की महिमा
श्लोक 1 (skanda.5.66.1)
सनत्कुमार उवाच। भूयः शृणु परं व्यास तीर्थानामुत्तमं वरम्। तत्तीर्थं सर्वपापघ्नं नृसिंहस्य महात्मनः
sanatkumāra uvāca| bhūyaḥ śṛṇu paraṁ vyāsa tīrthānāmuttamaṁ varam| tattīrthaṁ sarvapāpaghnaṁ nṛsiṁhasya mahātmanaḥ
सनत्कुमार बोले — हे व्यास! फिर सुनो, तीर्थों में सर्वश्रेष्ठ एक और परम तीर्थ; वह तीर्थ महात्मा नृसिंह का, समस्त पापों का नाशक है।
श्लोक 2 (skanda.5.66.2)
यस्य दर्शनमात्रेण सर्वपापं समुत्तरेत्। दैत्यराजः समाख्यातो हिरण्यकशिपुः पुरा
yasya darśanamātreṇa sarvapāpaṁ samuttaret| daityarājaḥ samākhyāto hiraṇyakaśipuḥ purā
जिसके दर्शन मात्र से मनुष्य समस्त पापों से पार हो जाता है। प्राचीन काल में हिरण्यकशिपु नामक दैत्यराज कहा गया।
श्लोक 3 (skanda.5.66.3)
तेनेयं वसुधा सर्वा संप्राप्ता च दुरात्मना। दुष्टदैत्यबलैर्व्याप्ता भाराक्रांता शुचार्दिता
teneyaṁ vasudhā sarvā saṁprāptā ca durātmanā| duṣṭadaityabalairvyāptā bhārākrāṁtā śucārditā
उस दुरात्मा द्वारा यह समस्त पृथ्वी अधिकृत कर ली गई; दुष्ट दैत्य-सेनाओं से व्याप्त, भार से पीड़ित, दुःख से संतप्त होकर...
श्लोक 4 (skanda.5.66.4)
गौर्भूत्वाऽश्रुमुखी देवैर्ब्रह्माणं शरणं ययौ। भाराक्रांतां धरां दृष्ट्वा ब्रह्मा लोकपितामहः
gaurbhūtvā'śrumukhī devairbrahmāṇaṁ śaraṇaṁ yayau| bhārākrāṁtāṁ dharāṁ dṛṣṭvā brahmā lokapitāmahaḥ
...वह गौ का रूप धारण कर, अश्रुमुखी होकर, देवताओं सहित ब्रह्मा की शरण में गई। भार से पीड़ित पृथ्वी को देखकर लोकपितामह ब्रह्मा ने...
श्लोक 5 (skanda.5.66.5)
उवाच श्लक्ष्णया वाचा तस्याः श्रमं व्यपोहितुम्। श्रूयतां भोऽवने पुण्ये भवत्या उपकारकम्
uvāca ślakṣṇayā vācā tasyāḥ śramaṁ vyapohitum| śrūyatāṁ bho'vane puṇye bhavatyā upakārakam
...उसकी थकान दूर करने के लिए कोमल वाणी में कहा — 'हे पुण्यवने! सुनो, तुम्हारे उपकार की बात कहता हूँ।
श्लोक 6 (skanda.5.66.6)
वचो वदामि ते तथ्यं देशकालोचितं तथा। पुराऽनेन तपश्चीर्णं दुष्करं सर्वदेहिनाम्
vaco vadāmi te tathyaṁ deśakālocitaṁ tathā| purā'nena tapaścīrṇaṁ duṣkaraṁ sarvadehinām
मैं तुम्हें सत्य, देश-काल के अनुकूल वचन कहता हूँ। प्राचीन काल में उसने ऐसी तपस्या की, जो समस्त देहधारियों के लिए दुष्कर थी।
श्लोक 7 (skanda.5.66.7)
गायत्र्युपासना तेन कृता सुनियतात्मना। मया चास्य वरो दत्तः प्रीतियुक्तेन चेतसा
gāyatryupāsanā tena kṛtā suniyatātmanā| mayā cāsya varo dattaḥ prītiyuktena cetasā
उसने संयमी आत्मा से गायत्री की उपासना की; और मैंने प्रीतियुक्त हृदय से उसे वर दिया।
श्लोक 8 (skanda.5.66.8)
न दिवा न तथा रात्रौ नांतरिक्षे न भूतले। नातिशुष्केण चार्द्रेण न चास्त्रशस्त्रघातनैः
na divā na tathā rātrau nāṁtarikṣe na bhūtale| nātiśuṣkeṇa cārdreṇa na cāstraśastraghātanaiḥ
न दिन में, न रात्रि में, न अंतरिक्ष में, न भूतल पर, न अत्यंत शुष्क वस्तु से, न आर्द्र वस्तु से, न किसी अस्त्र-शस्त्र के घात से...
श्लोक 9 (skanda.5.66.9)
न देवासुरगंधर्वैर्न यक्षोरगकिन्नरैः। पिशाचैर्गुह्यकाद्यैश्च राक्षसैर्न कदाचन
na devāsuragaṁdharvairna yakṣoragakinnaraiḥ| piśācairguhyakādyaiśca rākṣasairna kadācana
...न देव-असुर-गंधर्वों से, न यक्ष-नाग-किन्नरों से; न पिशाच-गुह्यक आदि से, न राक्षसों से कभी...
श्लोक 10 (skanda.5.66.10)
मानवैः पक्षिजातैश्च न मे मृत्युर्भवेदिति। एककरतलाघातैः सकुलबलवाहनम्
mānavaiḥ pakṣijātaiśca na me mṛtyurbhavediti| ekakaratalāghātaiḥ sakulabalavāhanam
...न मनुष्यों से, न किसी पक्षी-जाति से मेरी मृत्यु हो — ऐसा उसने कहा। [किंतु] एक हथेली के प्रहार से, कुल-बल-वाहन सहित...
श्लोक 11 (skanda.5.66.11)
मारयिष्यति मां वीरः स मे मृत्युर्भविष्यति। तथेत्युक्त्वाऽतिहृष्टात्मा तमहं च तदाऽवने
mārayiṣyati māṁ vīraḥ sa me mṛtyurbhaviṣyati| tathetyuktvā'tihṛṣṭātmā tamahaṁ ca tadā'vane
...कोई वीर मुझे मारेगा, वही मेरी मृत्यु होगी। 'तथास्तु' कहकर, अत्यंत प्रसन्न होकर मैंने तब उसे उस वन में...
श्लोक 12 (skanda.5.66.12)
आगमं चैव लोकं स्वं स दैत्यो घोरशासनः। बभूव सर्वलोकानां शास्ता चातुलविक्रमः
āgamaṁ caiva lokaṁ svaṁ sa daityo ghoraśāsanaḥ| babhūva sarvalokānāṁ śāstā cātulavikramaḥ
...अपना वर तथा अपना लोक प्रदान किया; और वह घोरशासन दैत्य समस्त लोकों का अतुल पराक्रमी शासक बन गया।
श्लोक 13 (skanda.5.66.13)
तस्यैवाऽधिकृता लोके बभूवुर्विगतज्वराः। त्रैलोक्यं बुभुजे नित्यं सर्वदैत्यजनेश्वरः
tasyaivā'dhikṛtā loke babhūvurvigatajvarāḥ| trailokyaṁ bubhuje nityaṁ sarvadaityajaneśvaraḥ
उसी के अधिकार में लोक ज्वररहित (शांत) हो गए; वह समस्त दैत्यजनों का स्वामी सदा तीनों लोकों का भोग करता रहा।
श्लोक 14 (skanda.5.66.14)
तस्माद्यूयं वनं यात महाकालं महेशितुः। तत्र तीर्थं महच्चासीत्सर्वतीर्थवरोत्तमम्
tasmādyūyaṁ vanaṁ yāta mahākālaṁ maheśituḥ| tatra tīrthaṁ mahaccāsītsarvatīrthavarottamam
इसलिए तुम सब महेश्वर के महाकालवन को जाओ; वहाँ एक महान् तीर्थ था, समस्त तीर्थों में श्रेष्ठतम।
श्लोक 15 (skanda.5.66.15)
संगमेश्वरस्य दक्षिणे कर्कराजोत्तरे तथा। शिप्रातीरे शुभे देशे पूर्वं वैकुण्ठसन्निभम्
saṁgameśvarasya dakṣiṇe karkarājottare tathā| śiprātīre śubhe deśe pūrvaṁ vaikuṇṭhasannibham
संगमेश्वर के दक्षिण में, कर्कराज के उत्तर में, शिप्रा के शुभ तट पर, प्राचीन काल से वैकुंठ के समान...
श्लोक 16 (skanda.5.66.16)
नृसिंहाख्यं परं धाम तस्य तीर्थं प्रतिष्ठितम्। तत्र गत्वा सुरश्रेष्ठाः स्नानदानादिकाः क्रियाः
nṛsiṁhākhyaṁ paraṁ dhāma tasya tīrthaṁ pratiṣṭhitam| tatra gatvā suraśreṣṭhāḥ snānadānādikāḥ kriyāḥ
...नृसिंह नामक परम धाम, उनका तीर्थ वहाँ प्रतिष्ठित है। हे सुरश्रेष्ठो! वहाँ जाकर स्नान-दान आदि क्रियाएँ...
श्लोक 17 (skanda.5.66.17)
कुरुत सत्वरं सर्वे पुनर्लोकानवाप्स्यथ। ते तस्य वचनं श्रुत्वा देवा इन्द्रपुरोगमाः
kuruta satvaraṁ sarve punarlokānavāpsyatha| te tasya vacanaṁ śrutvā devā indrapurogamāḥ
...तुम सब शीघ्र करो, तुम्हें पुनः अपने लोक प्राप्त होंगे।' उनके इस वचन को सुनकर, इंद्र के नेतृत्व में देवता...
श्लोक 18 (skanda.5.66.18)
महाकालवनं प्राप्ता यत्र शिप्रा पयस्विनी। नृसिंहतीर्थोपकूले उषित्वा शाश्वतीः समाः
mahākālavanaṁ prāptā yatra śiprā payasvinī| nṛsiṁhatīrthopakūle uṣitvā śāśvatīḥ samāḥ
...महाकालवन को प्राप्त हुए, जहाँ दूधिया शिप्रा बहती है; नृसिंहतीर्थ के तट पर चिरकाल तक निवास कर...
श्लोक 19 (skanda.5.66.19)
स्नानदानादिकं कृत्वा नृसिंहस्याऽर्चनं तथा। एवं कृत्वा विधानेन परां सिद्धिमितो गताः
snānadānādikaṁ kṛtvā nṛsiṁhasyā'rcanaṁ tathā| evaṁ kṛtvā vidhānena parāṁ siddhimito gatāḥ
...स्नान-दान आदि तथा नृसिंह की अर्चना कर, इस प्रकार विधिपूर्वक कर, वे वहाँ से परम सिद्धि को प्राप्त हुए।
श्लोक 20 (skanda.5.66.20)
नृसिंहस्य स्वरूपेण हतो दानवपुंगवः। सभामध्ये तदा व्यास हरिणाऽमित्रघातिना
nṛsiṁhasya svarūpeṇa hato dānavapuṁgavaḥ| sabhāmadhye tadā vyāsa hariṇā'mitraghātinā
हे व्यास! तब उस सभा के मध्य, अमित्रघातक हरि द्वारा, नृसिंह के स्वरूप से वह दानवश्रेष्ठ मारा गया...
श्लोक 21 (skanda.5.66.21)
करेणैकप्रहारेण हिरण्यकशिपुर्हतः। ततः सुरगणाः सर्वे स्वाधिकारान्ययुस्तदा
kareṇaikaprahāreṇa hiraṇyakaśipurhataḥ| tataḥ suragaṇāḥ sarve svādhikārānyayustadā
...एक ही हस्त-प्रहार से हिरण्यकशिपु मारा गया; तब समस्त देवगण अपने-अपने अधिकार को पुनः प्राप्त हुए।
श्लोक 22 (skanda.5.66.22)
तदारभ्य सुराः सर्वे मध्याह्नोपासनं सदा। प्रकुर्वंति च तत्रैव यत्र तीर्थे हरिः परम्
tadārabhya surāḥ sarve madhyāhnopāsanaṁ sadā| prakurvaṁti ca tatraiva yatra tīrthe hariḥ param
तभी से समस्त देवगण सदा उसी तीर्थ में, जहाँ हरि परमरूप में विराजमान हैं, मध्याह्न-उपासना करते हैं।
श्लोक 23 (skanda.5.66.23)
एवं तीर्थं परं व्यास अवंत्यां विद्यते भुवि। अस्मिंस्तीर्थे द्विजश्रेष्ठ स्नानदानादिकाः क्रियाः
evaṁ tīrthaṁ paraṁ vyāsa avaṁtyāṁ vidyate bhuvi| asmiṁstīrthe dvijaśreṣṭha snānadānādikāḥ kriyāḥ
हे व्यास! इस प्रकार यह परम तीर्थ अवंती में पृथ्वी पर विद्यमान है; हे द्विजश्रेष्ठ! इस तीर्थ में जो मनुष्य पुण्यमय स्नान-दान आदि क्रियाएँ करते हैं...
श्लोक 24 (skanda.5.66.24)
ये कुर्वंति नराः पुण्यास्ते यांति परमां गतिम्। सर्वदा सर्वकालेषु पुण्यदं तीर्थमुत्तमम्
ye kurvaṁti narāḥ puṇyāste yāṁti paramāṁ gatim| sarvadā sarvakāleṣu puṇyadaṁ tīrthamuttamam
...वे परम गति को प्राप्त होते हैं। सदा सर्वकाल में यह पुण्यदायी श्रेष्ठ तीर्थ है।
श्लोक 25 (skanda.5.66.25)
कदाचिन्नृसिंहतिथिं प्राप्य चैव चतुर्दशीम्। स्नानं कृत्वाऽर्चनं तस्य नृसिंहस्य च धीमतः
kadācinnṛsiṁhatithiṁ prāpya caiva caturdaśīm| snānaṁ kṛtvā'rcanaṁ tasya nṛsiṁhasya ca dhīmataḥ
कभी नृसिंह-तिथि, चतुर्दशी को प्राप्त कर, स्नान कर उस बुद्धिमान् नृसिंह की अर्चना करके...
श्लोक 26 (skanda.5.66.26)
नृसिंहेश्वरदेवेशं पूजयेद्यः समाहितः। तस्य हस्तगता लक्ष्मीर्भविष्यति न संशयः
nṛsiṁheśvaradeveśaṁ pūjayedyaḥ samāhitaḥ| tasya hastagatā lakṣmīrbhaviṣyati na saṁśayaḥ
...जो एकाग्रचित्त होकर नृसिंहेश्वर देवेश की पूजा करता है, उसके हाथ में लक्ष्मी अवश्य आती है, इसमें संशय नहीं।
श्लोक 27 (skanda.5.66.27)
ततोऽगस्त्येश्वरं देवं यः पश्येत्युसमाहितः। तस्य व्यास क्षितौ किंचिद्दुर्लभं नैव दृश्यते
tato'gastyeśvaraṁ devaṁ yaḥ paśyetyusamāhitaḥ| tasya vyāsa kṣitau kiṁciddurlabhaṁ naiva dṛśyate
तत्पश्चात् जो एकाग्रचित्त होकर अगस्त्येश्वर देव के दर्शन करता है — हे व्यास! उसके लिए पृथ्वी पर कुछ भी दुर्लभ नहीं रहता।
श्लोक 28 (skanda.5.66.28)
यत्र सिद्धिं परां प्राप्तो हनुमान्पवनात्मजः। ब्रह्मचारी सदाचारो यतिः सर्वार्थसाधकः
yatra siddhiṁ parāṁ prāpto hanumānpavanātmajaḥ| brahmacārī sadācāro yatiḥ sarvārthasādhakaḥ
जहाँ पवनपुत्र हनुमान् ने परम सिद्धि प्राप्त की, ब्रह्मचारी, सदाचारी, यति, समस्त अर्थों को सिद्ध करने वाले...
श्लोक 29 (skanda.5.66.29)
तिष्ठति परदैवज्ञः सर्वकामार्थसिद्धये। यस्मिन्वटे पुरा तप्तं तपः परमदुश्चरम्
tiṣṭhati paradaivajñaḥ sarvakāmārthasiddhaye| yasminvaṭe purā taptaṁ tapaḥ paramaduścaram
...समस्त कामनाओं की सिद्धि हेतु वहाँ परम दैवज्ञ होकर विराजमान हैं; जिस वट वृक्ष के नीचे प्राचीन काल में अत्यंत दुष्कर तपस्या की गई थी...
श्लोक 30 (skanda.5.66.30)
मित्रावरुणपुत्रेण सिद्धिहेतोस्तपस्विना। बोधीन्यग्रोध इत्याख्यो ह्यगस्तिवट एव च
mitrāvaruṇaputreṇa siddhihetostapasvinā| bodhīnyagrodha ityākhyo hyagastivaṭa eva ca
...मित्रावरुण-पुत्र (अगस्त्य) तपस्वी द्वारा सिद्धि के लिए — उस वृक्ष को बोधि-न्यग्रोध तथा अगस्ति-वट भी कहा जाता है।
श्लोक 31 (skanda.5.66.31)
नरो नारीसमायुक्तः सावित्रीव्रतमाचरेत्। सौभाग्यं लभते नित्यं सावित्र्याश्च परंतप
naro nārīsamāyuktaḥ sāvitrīvratamācaret| saubhāgyaṁ labhate nityaṁ sāvitryāśca paraṁtapa
पत्नी सहित मनुष्य को सावित्री-व्रत करना चाहिए; हे परंतप! सावित्री के प्रसाद से वह सदा सौभाग्य प्राप्त करता है।
श्लोक 32 (skanda.5.66.32)
यस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा दत्त्वा दानं च सौभगम्। अष्टसौभाग्यसंपूर्णं वंशपात्रं सवासकम्
yasmiṁstīrthe naraḥ snātvā dattvā dānaṁ ca saubhagam| aṣṭasaubhāgyasaṁpūrṇaṁ vaṁśapātraṁ savāsakam
जिस तीर्थ में स्नान कर मनुष्य सौभाग्यदायी दान करता है — आठ सौभाग्य-चिह्नों से पूर्ण, ढक्कनयुक्त बाँस का पात्र...
श्लोक 33 (skanda.5.66.33)
सप्तधान्यसमोपेतं पंचरत्नपरिष्कृतम्। सौगंध्यादीनि माल्यानि मौलिसूत्रसमायुतम्
saptadhānyasamopetaṁ paṁcaratnapariṣkṛtam| saugaṁdhyādīni mālyāni maulisūtrasamāyutam
...सात प्रकार के धान्य से युक्त, पाँच रत्नों से सुसज्जित, सुगंधित माला आदि सहित, मौलि-सूत्र से युक्त...
श्लोक 34 (skanda.5.66.34)
सावित्रीं हाटकीं कृत्वा यथाशक्ति परंतप। यो वै ददाति विप्राय वेदवेदांगधीमते
sāvitrīṁ hāṭakīṁ kṛtvā yathāśakti paraṁtapa| yo vai dadāti viprāya vedavedāṁgadhīmate
...यथाशक्ति स्वर्ण की सावित्री बनाकर, हे परंतप! जो वेद-वेदांगों में निपुण ब्राह्मण को देता है...
श्लोक 35 (skanda.5.66.35)
लभते विपुलां लक्ष्मीं बहुभोगकरीं शुभाम्। भुक्त्वा वै विविधान्भोगान्पुनः स्वर्गमवाप्नुयात्
labhate vipulāṁ lakṣmīṁ bahubhogakarīṁ śubhām| bhuktvā vai vividhānbhogānpunaḥ svargamavāpnuyāt
...वह विपुल, शुभ, बहुभोगकारी लक्ष्मी प्राप्त करता है; विविध भोगों को भोगकर वह पुनः स्वर्ग को प्राप्त होता है।
श्लोक 36 (skanda.5.66.36)
सावित्रीव्रतकृन्नारी जायते पतिवल्लभा। पतिव्रता महाभागा विधवा न कदाचन
sāvitrīvratakṛnnārī jāyate pativallabhā| pativratā mahābhāgā vidhavā na kadācana
सावित्री-व्रत करने वाली स्त्री अपने पति की प्रिय होती है; पतिव्रता, महाभाग्यशाली, वह कभी विधवा नहीं होती।