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अवन्ती खण्ड · अध्याय 68

देवप्रयाग और अखंडेश्वर तीर्थ की महिमा

अध्याय 67अध्याय-सूचीअध्याय 69

श्लोक 1 (skanda.5.68.1)

सनत्कुमार उवाच। शृणु व्यास महापुण्यं तीर्थं परमशोभनम्। देवप्रयागमाख्यातं सर्वपापप्रणाशनम्

sanatkumāra uvāca| śṛṇu vyāsa mahāpuṇyaṁ tīrthaṁ paramaśobhanam| devaprayāgamākhyātaṁ sarvapāpapraṇāśanam

सनत्कुमार बोले — हे व्यास! सुनो, एक अत्यंत पुण्यमय, परम शोभनीय तीर्थ; वह देवप्रयाग कहा गया है, समस्त पापों का नाशक।

श्लोक 2 (skanda.5.68.2)

देवानां च परं स्थानं यत्र तीर्थं परंतप। सोमतीर्थोत्तरे भागे प्रयागस्य च दक्षिणे

devānāṁ ca paraṁ sthānaṁ yatra tīrthaṁ paraṁtapa| somatīrthottare bhāge prayāgasya ca dakṣiṇe

हे परंतप! वह देवताओं का श्रेष्ठ स्थान है, जहाँ वह तीर्थ है — सोमतीर्थ के उत्तर भाग में तथा प्रयाग के दक्षिण में...

श्लोक 3 (skanda.5.68.3)

क्षिप्रायाः पूर्वभागे च तत्र तीर्थं प्रतिष्ठितम्। तत्र तीर्थे नरः स्नात्वा पश्येच्चैव सुरोत्तमम्

kṣiprāyāḥ pūrvabhāge ca tatra tīrthaṁ pratiṣṭhitam| tatra tīrthe naraḥ snātvā paśyeccaiva surottamam

...तथा क्षिप्रा के पूर्व भाग में वह तीर्थ प्रतिष्ठित है। उस तीर्थ में स्नान कर मनुष्य को श्रेष्ठ देव के दर्शन करने चाहिए...

श्लोक 4 (skanda.5.68.4)

देवं माधवमित्याख्यं भुवि सर्वफलप्रदम्। ददाति तस्य देवेंद्रो वांछितार्थं जगत्पतिः

devaṁ mādhavamityākhyaṁ bhuvi sarvaphalapradam| dadāti tasya deveṁdro vāṁchitārthaṁ jagatpatiḥ

...माधव नामक देव के, जो पृथ्वी पर समस्त फल देने वाले हैं। जगत्पति देवेंद्र उसे वांछित अर्थ प्रदान करते हैं।

श्लोक 5 (skanda.5.68.5)

आनंदभैरवस्तत्र सर्वदेवनमस्कृतः। यस्य दर्शनमात्रेण सर्वपापक्षयो भवेत्

ānaṁdabhairavastatra sarvadevanamaskṛtaḥ| yasya darśanamātreṇa sarvapāpakṣayo bhavet

वहाँ आनंदभैरव हैं, जो समस्त देवताओं द्वारा नमस्कृत हैं; जिनके दर्शन मात्र से समस्त पापों का क्षय हो जाता है।

श्लोक 6 (skanda.5.68.6)

न तस्य जायते व्यास यातना भैरवी कदा। स्वर्गद्वारे सदा व्यास जायते निर्भयः पुमान्

na tasya jāyate vyāsa yātanā bhairavī kadā| svargadvāre sadā vyāsa jāyate nirbhayaḥ pumān

हे व्यास! उसे कभी भैरवी यातना नहीं होती; हे व्यास! स्वर्गद्वार में वह मनुष्य सदा निर्भय हो जाता है।

श्लोक 7 (skanda.5.68.7)

ज्येष्ठे मासे सिते पक्षे दशम्यां बुधहस्तयोः। गरानन्दे व्यतीपाते कन्याचन्द्रे वृषे रवौ। दशाला जायते वत्स गंगाजन्म परं शुचि

jyeṣṭhe māse site pakṣe daśamyāṁ budhahastayoḥ| garānande vyatīpāte kanyācandre vṛṣe ravau| daśālā jāyate vatsa gaṁgājanma paraṁ śuci

ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी को, बुध और हस्त नक्षत्र से युक्त होने पर, गरानंद योग में, व्यतीपात में, चंद्रमा के कन्या राशि में तथा सूर्य के वृषभ राशि में होने पर — हे वत्स! तब परम पवित्र, दशगुणित फलदायी गंगा-जन्म होता है।

श्लोक 8 (skanda.5.68.8)

तद्दिने च नरः स्नात्वा सर्वतीर्थफलं लभेत्। अखण्डं च परं तीर्थं शृणु व्यास ह्यतः परम्

taddine ca naraḥ snātvā sarvatīrthaphalaṁ labhet| akhaṇḍaṁ ca paraṁ tīrthaṁ śṛṇu vyāsa hyataḥ param

उस दिन स्नान करने वाला मनुष्य समस्त तीर्थों का फल प्राप्त करता है। हे व्यास! अब इससे आगे एक और श्रेष्ठ अखंड तीर्थ के विषय में सुनो...

श्लोक 9 (skanda.5.68.9)

यस्य श्रवणमात्रेण व्रतभंगो न जायते। एक एव पुरा ब्रह्मन्ब्राह्मणो ब्रह्मवित्तमः

yasya śravaṇamātreṇa vratabhaṁgo na jāyate| eka eva purā brahmanbrāhmaṇo brahmavittamaḥ

...जिसके श्रवण मात्र से व्रत का भंग नहीं होता। हे ब्रह्मन्! प्राचीन काल में एक ब्राह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ ब्राह्मण था...

श्लोक 10 (skanda.5.68.10)

धर्मशर्मेति विख्यातः सदाचाररतः शुचिः। बहुव्रतधरो दांतो वेदवेदांगपारगः

dharmaśarmeti vikhyātaḥ sadācārarataḥ śuciḥ| bahuvratadharo dāṁto vedavedāṁgapāragaḥ

...धर्मशर्मा नाम से विख्यात, सदाचार में रत, पवित्र, अनेक व्रतों का धारक, जितेंद्रिय, वेद-वेदांगों में पारंगत।

श्लोक 11 (skanda.5.68.11)

किंचिद्दोषप्रसंगेन व्रतपूर्तिर्न चाभवत्। एवं बहुतिथे काले नारदो देवदर्शनः

kiṁciddoṣaprasaṁgena vratapūrtirna cābhavat| evaṁ bahutithe kāle nārado devadarśanaḥ

किसी छोटे से दोष के कारण उसका व्रत पूर्ण नहीं हो सका। इस प्रकार बहुत समय बीतने पर, देवदर्शी नारद...

श्लोक 12 (skanda.5.68.12)

तस्य गेहागतो ब्रह्मन्नातिथ्यार्थं महातपाः। तदोत्थाय द्विजो नित्यं बहुमानपुरःसरम्

tasya gehāgato brahmannātithyārthaṁ mahātapāḥ| tadotthāya dvijo nityaṁ bahumānapuraḥsaram

...उस महातपस्वी के घर, हे ब्रह्मन्! आतिथ्य हेतु आये। तब वह द्विज सदा की भाँति उठकर, बड़े आदर के साथ...

श्लोक 13 (skanda.5.68.13)

सत्कृत्य नारदं भूमन्विधिदृष्टेन कर्मणा। पूजयित्वा द्विजश्रेष्ठः पप्रच्छ मुनिसत्तम

satkṛtya nāradaṁ bhūmanvidhidṛṣṭena karmaṇā| pūjayitvā dvijaśreṣṭhaḥ papraccha munisattama

...हे भूमन्! विधिपूर्वक कर्म से नारद का सत्कार कर, उस द्विजश्रेष्ठ ने पूजा करके मुनिश्रेष्ठ से पूछा।

श्लोक 14 (skanda.5.68.14)

भगवन्भवता सर्वं विदितं ज्ञानचक्षुषा। अस्माकं च परं दोषः किंचिज्जातः पुराऽनघ

bhagavanbhavatā sarvaṁ viditaṁ jñānacakṣuṣā| asmākaṁ ca paraṁ doṣaḥ kiṁcijjātaḥ purā'nagha

'हे भगवन्! ज्ञानचक्षु से आपको सब कुछ ज्ञात है; हे निष्पाप! हमसे प्राचीन काल में कोई परम दोष हुआ है...

श्लोक 15 (skanda.5.68.15)

येन पापप्रसंगेन व्रतभंगोऽभवद्ध्रुवम्। कारणं ब्रूहि मे नाथ किं दोषोऽत्र तु गण्यते

yena pāpaprasaṁgena vratabhaṁgo'bhavaddhruvam| kāraṇaṁ brūhi me nātha kiṁ doṣo'tra tu gaṇyate

...जिस पापप्रसंग से हमारा व्रतभंग निश्चय ही हुआ। हे नाथ! मुझे उसका कारण बताइए — यहाँ किस दोष की गणना की जाती है?'

श्लोक 16 (skanda.5.68.16)

नारद उवाच। श्रूयतां भो द्विजश्रेष्ठ भवद्भिश्च पुराकृतम्। महाराष्ट्रे सुविख्यातो ब्राह्मणो धनसंचकः

nārada uvāca| śrūyatāṁ bho dvijaśreṣṭha bhavadbhiśca purākṛtam| mahārāṣṭre suvikhyāto brāhmaṇo dhanasaṁcakaḥ

नारद बोले — 'हे द्विजश्रेष्ठ! सुनो, आपके द्वारा प्राचीन काल में जो किया गया — महाराष्ट्र में एक सुविख्यात, धनसंचयी ब्राह्मण था।

श्लोक 17 (skanda.5.68.17)

ब्रह्मदत्तेत्यसौ विप्रो वेदब्राह्मणनिंदकः। धनलोभी पराक्रांतः सर्वधर्मबहिर्मुखः

brahmadattetyasau vipro vedabrāhmaṇaniṁdakaḥ| dhanalobhī parākrāṁtaḥ sarvadharmabahirmukhaḥ

'ब्रह्मदत्त नामक यह विप्र वेद और ब्राह्मणों का निंदक, धनलोभी, आक्रामक, समस्त धर्म से विमुख था...

श्लोक 18 (skanda.5.68.18)

नास्तिको देवतीर्थेषु परद्रव्यापहारकः। परस्त्रीषु रतो नित्यं द्यूतवादी च तस्करः

nāstiko devatīrtheṣu paradravyāpahārakaḥ| parastrīṣu rato nityaṁ dyūtavādī ca taskaraḥ

...देवतीर्थों में नास्तिक, दूसरों के धन का अपहरणकर्ता, सदा परस्त्रियों में रत, जुआरी तथा चोर था।

श्लोक 19 (skanda.5.68.19)

एवमायुःपरिक्षीणो धनहीनोऽभवत्तदा। इतस्ततोऽभ्रमद्भ्रष्टो नदीतीरे सुविह्वलः

evamāyuḥparikṣīṇo dhanahīno'bhavattadā| itastato'bhramadbhraṣṭo nadītīre suvihvalaḥ

इस प्रकार उसकी आयु क्षीण होने पर वह धनहीन हो गया; भ्रष्ट होकर, अत्यंत व्याकुल, इधर-उधर भटकते हुए नदी-तट पर...

श्लोक 20 (skanda.5.68.20)

गतश्चौर्यप्रसंगेन यात्रिकैः सह संगतः। किंचित्कालेषु दुःशीलो मृतिं प्राप्तो रुजार्दितः

gataścauryaprasaṁgena yātrikaiḥ saha saṁgataḥ| kiṁcitkāleṣu duḥśīlo mṛtiṁ prāpto rujārditaḥ

...वह चोरी के प्रसंग से यात्रियों के साथ जुड़कर गया; कुछ समय बाद, दुःशील वह रोग से पीड़ित होकर मृत्यु को प्राप्त हुआ।

श्लोक 21 (skanda.5.68.21)

नीतः संयमिनीं विप्रस्तत्कालं यमकिंकरैः। यमराजपुरं प्राप्तो बहुपापकरो द्विजः

nītaḥ saṁyaminīṁ viprastatkālaṁ yamakiṁkaraiḥ| yamarājapuraṁ prāpto bahupāpakaro dvijaḥ

बहुत पाप करने वाला वह द्विज उसी समय यमदूतों द्वारा संयमिनी (यमपुरी) को ले जाया गया, यमराज के नगर को प्राप्त हुआ।

श्लोक 22 (skanda.5.68.22)

दृष्टोऽसौ धर्मराजेन तदा पत्यपरायणः। निरीक्ष्य सहसोवाच धर्मपूर्वमिदं वचः

dṛṣṭo'sau dharmarājena tadā patyaparāyaṇaḥ| nirīkṣya sahasovāca dharmapūrvamidaṁ vacaḥ

तब धर्मपरायण धर्मराज ने उसे देखा; उसे देखकर उन्होंने तत्काल धर्मानुकूल यह वचन कहा।

श्लोक 23 (skanda.5.68.23)

शृणुध्वं किंकराः सर्वे यूयमेकाग्रमानसाः। अनेनाचरितं सर्वं दुष्कर्म सर्वकिल्बिषम्

śṛṇudhvaṁ kiṁkarāḥ sarve yūyamekāgramānasāḥ| anenācaritaṁ sarvaṁ duṣkarma sarvakilbiṣam

'हे किंकरो! सुनो, तुम सब एकाग्रचित्त होकर — इसने ये समस्त दुष्कर्म और सभी पाप किये हैं।

श्लोक 24 (skanda.5.68.24)

गोदातीरे मृतः पापी तत्र नः कारणं न हि। तिस्रःकोट्योऽर्धकोटिश्च यानि तीर्थान्यहर्निशम्

godātīre mṛtaḥ pāpī tatra naḥ kāraṇaṁ na hi| tisraḥkoṭyo'rdhakoṭiśca yāni tīrthānyaharniśam

'परंतु यह पापी गोदावरी के तट पर मृत हुआ, इसलिए यहाँ हमारे लिए कोई कारण नहीं है। साढ़े तीन करोड़ तीर्थ, दिन-रात...

श्लोक 25 (skanda.5.68.25)

आयांति गौतमीतीरे सिंहस्थेऽपि बृहस्पतौ। तेषां तु वायुसंस्पर्शो जातोऽस्यांते कलेवरे

āyāṁti gautamītīre siṁhasthe'pi bṛhaspatau| teṣāṁ tu vāyusaṁsparśo jāto'syāṁte kalevare

...सिंहस्थ में गौतमी-तट पर आते हैं; और अंत में इस शरीर को उन्हीं के वायु का स्पर्श प्राप्त हुआ था।

श्लोक 26 (skanda.5.68.26)

तेन पुण्यप्रभावेन नोऽस्माकं कारणं क्वचित्। ग्राह्यो भवद्भिर्नैवायं मुच्यतां भोः पुरःसराः

tena puṇyaprabhāvena no'smākaṁ kāraṇaṁ kvacit| grāhyo bhavadbhirnaivāyaṁ mucyatāṁ bhoḥ puraḥsarāḥ

'उसी पुण्य के प्रभाव से हमारा इस पर कोई अधिकार नहीं है। इसे तुम मत ग्रहण करो — हे अग्रगामियो! इसे छोड़ दो।'

श्लोक 27 (skanda.5.68.27)

एवं तैर्मोचितो विप्रः पुनर्ब्रह्मगतिं गतः। तेन पापप्रसंगेन व्रतभंगी गतो भुवि

evaṁ tairmocito vipraḥ punarbrahmagatiṁ gataḥ| tena pāpaprasaṁgena vratabhaṁgī gato bhuvi

इस प्रकार उनके द्वारा मुक्त किया गया वह विप्र पुनः ब्रह्मगति को प्राप्त हुआ। उसी पापप्रसंग के कारण [धर्मशर्मा] पृथ्वी पर व्रतभंगी हुआ।

श्लोक 28 (skanda.5.68.28)

ब्राह्मण उवाच। ब्रह्मन्केन प्रकारेण सर्वपापक्षयो भवेत्। किं तपः किं च दानं च किं तीर्थव्रतसेवनम्

brāhmaṇa uvāca| brahmankena prakāreṇa sarvapāpakṣayo bhavet| kiṁ tapaḥ kiṁ ca dānaṁ ca kiṁ tīrthavratasevanam

ब्राह्मण बोले — 'हे ब्रह्मन्! किस प्रकार समस्त पापों का नाश हो सकता है? कौन-सा तप, कौन-सा दान, कौन-सा तीर्थव्रत-सेवन...

श्लोक 29 (skanda.5.68.29)

येन पुण्यप्रभावेन व्रतभंगो न जायते

yena puṇyaprabhāvena vratabhaṁgo na jāyate

...जिसके पुण्यप्रभाव से व्रत का भंग न हो?'

श्लोक 30 (skanda.5.68.30)

नारद उवाच। शृणु द्विजवरश्रेष्ठ महाकालवनं स्मृतम्। यत्र रुद्रसरः प्रोक्तमृषिणा तत्त्वदर्शिना

nārada uvāca| śṛṇu dvijavaraśreṣṭha mahākālavanaṁ smṛtam| yatra rudrasaraḥ proktamṛṣiṇā tattvadarśinā

नारद बोले — 'हे द्विजवरश्रेष्ठ! सुनो, महाकालवन स्मरण किया जाता है, जहाँ तत्त्वदर्शी ऋषि द्वारा रुद्रसर कहा गया है।

श्लोक 31 (skanda.5.68.31)

कोटिकोटिसुतीर्थानि वर्तंते द्विजसत्तम। कोटितीर्थेति विख्यातं तस्माद्द्विज सनातनम्

koṭikoṭisutīrthāni vartaṁte dvijasattama| koṭitīrtheti vikhyātaṁ tasmāddvija sanātanam

'हे द्विजसत्तम! वहाँ करोड़ों-करोड़ों उपतीर्थ विद्यमान हैं; इसीलिए, हे द्विज! यह सनातन कोटितीर्थ नाम से विख्यात है।

श्लोक 32 (skanda.5.68.32)

तत्तीर्थस्योत्तरे भागे सुतीर्थं सर्वकामदम्। नाम्नाऽखंडसरः ख्यातमखंडेश्वरसन्निधौ

tattīrthasyottare bhāge sutīrthaṁ sarvakāmadam| nāmnā'khaṁḍasaraḥ khyātamakhaṁḍeśvarasannidhau

'उस तीर्थ के उत्तर भाग में समस्त कामनाएँ देने वाला एक श्रेष्ठ तीर्थ है, जो अखंडेश्वर के समीप अखंडसर नाम से जाना जाता है।

श्लोक 33 (skanda.5.68.33)

यस्य दर्शनमात्रेण सर्वयज्ञफलं लभेत्। तस्माद्धि सर्वथा वत्स गच्छ त्वं तत्र मा चिरम्

yasya darśanamātreṇa sarvayajñaphalaṁ labhet| tasmāddhi sarvathā vatsa gaccha tvaṁ tatra mā ciram

'जिसके दर्शन मात्र से समस्त यज्ञों का फल प्राप्त होता है। इसलिए, हे वत्स! सर्वथा वहाँ बिना विलंब किए जाओ।'

श्लोक 34 (skanda.5.68.34)

इति तस्य वचः श्रुत्वा स द्विजोऽगात्कुमुद्वतीम्। स्नात्वाऽखण्डसरे व्यास दृष्ट्वा देवं महेश्वरम्

iti tasya vacaḥ śrutvā sa dvijo'gātkumudvatīm| snātvā'khaṇḍasare vyāsa dṛṣṭvā devaṁ maheśvaram

उनके इस वचन को सुनकर वह द्विज कुमुद्वती को गया; हे व्यास! अखंडसर में स्नान कर, महेश्वर देव के दर्शन कर...

श्लोक 35 (skanda.5.68.35)

सद्यः पुण्यवतां लोकान्प्राप्तो वै द्विजसत्तमः। एवं व्यास महातीर्थमखंडेश्वरमुत्तमम्

sadyaḥ puṇyavatāṁ lokānprāpto vai dvijasattamaḥ| evaṁ vyāsa mahātīrthamakhaṁḍeśvaramuttamam

...वह द्विजश्रेष्ठ तत्काल पुण्यवानों के लोकों को प्राप्त हुआ। हे व्यास! इस प्रकार यह अखंडेश्वर नामक महातीर्थ श्रेष्ठ है।

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