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अवन्ती खण्ड · अध्याय 70

देवयात्रा सूची: अवंती के तीर्थ और शिवलिंग

अध्याय 69अध्याय-सूचीअध्याय 71

श्लोक 1 (skanda.5.70.1)

सनत्कुमार उवाच। मेरोश्च दक्षिणे भागे दुग्धकुण्डोत्तरे तथा। ऋषभः पर्वतश्रेष्ठो देवगन्धर्वसेवितः

sanatkumāra uvāca| merośca dakṣiṇe bhāge dugdhakuṇḍottare tathā| ṛṣabhaḥ parvataśreṣṭho devagandharvasevitaḥ

सनत्कुमार बोले — मेरु के दक्षिण भाग में तथा दुग्धकुंड के उत्तर में, देव-गंधर्वों से सेवित ऋषभ नामक श्रेष्ठ पर्वत है।

श्लोक 2 (skanda.5.70.2)

यत्र देवांगना रम्याः क्रीडन्ति सततं द्विज। तत्र रम्यसरो नाम तिष्ठते सर्वकामदम्

yatra devāṁganā ramyāḥ krīḍanti satataṁ dvija| tatra ramyasaro nāma tiṣṭhate sarvakāmadam

हे द्विज! जहाँ सुंदर देवांगनाएँ सदा क्रीड़ा करती हैं, वहाँ 'रम्यसर' नामक सरोवर है, जो समस्त कामनाएँ देने वाला है।

श्लोक 3 (skanda.5.70.3)

तत्र तीर्थे नरः स्नात्वा सुभगो जायते ध्रुवम्। देवैश्च क्रीडते नित्यं भुवि विख्यातकः परम्

tatra tīrthe naraḥ snātvā subhago jāyate dhruvam| devaiśca krīḍate nityaṁ bhuvi vikhyātakaḥ param

उस तीर्थ में स्नान कर मनुष्य निश्चय ही सौभाग्यशाली हो जाता है; वह सदा देवताओं के साथ क्रीड़ा करता हुआ पृथ्वी पर परम विख्यात होता है।

श्लोक 4 (skanda.5.70.4)

भाद्रपदसिताष्टमी मैत्रर्क्षेण समन्विता। तद्दिनेऽत्र समागम्य स्नानदानादिकाः क्रियाः

bhādrapadasitāṣṭamī maitrarkṣeṇa samanvitā| taddine'tra samāgamya snānadānādikāḥ kriyāḥ

भाद्रपद शुक्ल अष्टमी, मैत्र (अनुराधा) नक्षत्र से युक्त — उस दिन वहाँ एकत्र होकर स्नान-दान आदि क्रियाएँ...

श्लोक 5 (skanda.5.70.5)

करोति सततं व्यास तेषां लोकाः सनातनाः। मेरोश्चेशानके तीर्थं दिव्यं परमशोभनम्

karoti satataṁ vyāsa teṣāṁ lokāḥ sanātanāḥ| merośceśānake tīrthaṁ divyaṁ paramaśobhanam

...हे व्यास! जो सदा करते हैं, उन्हें सनातन लोक प्राप्त होते हैं। मेरु के ईशान भाग में एक दिव्य, परम शोभनीय तीर्थ है...

श्लोक 6 (skanda.5.70.6)

बिन्दुसरेति विख्यातं सर्वकामवरप्रदम्। गंगा सरस्वती पुण्या शरयूश्च पयस्विनी

bindusareti vikhyātaṁ sarvakāmavarapradam| gaṁgā sarasvatī puṇyā śarayūśca payasvinī

...जो बिंदुसर नाम से विख्यात, समस्त इच्छित वर देने वाला है; पुण्यमयी गंगा, सरस्वती तथा दूधिया सरयू...

श्लोक 7 (skanda.5.70.7)

एताः सरिद्वरा यातास्तत्र सत्यवतीसुत। ये सिद्धा ये च साध्याश्च तपस्विनो धृतव्रताः

etāḥ saridvarā yātāstatra satyavatīsuta| ye siddhā ye ca sādhyāśca tapasvino dhṛtavratāḥ

...हे सत्यवतीसुत! ये श्रेष्ठ नदियाँ वहाँ गईं; जो सिद्ध, जो साध्य तथा व्रतधारी तपस्वी थे...

श्लोक 8 (skanda.5.70.8)

उपासांचक्रिरे तत्र तस्य तीर्थस्य सर्वदा। तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा सर्वार्थान्प्राप्नुते ध्रुवम्

upāsāṁcakrire tatra tasya tīrthasya sarvadā| tasmiṁstīrthe naraḥ snātvā sarvārthānprāpnute dhruvam

...उन्होंने वहाँ सदा उस तीर्थ की उपासना की। उस तीर्थ में स्नान कर मनुष्य निश्चय ही समस्त अर्थों को प्राप्त करता है।

श्लोक 9 (skanda.5.70.9)

भाद्रपदे च शुक्ला वै चतुर्थी या प्रकीर्तिता। सिद्धा सा सर्वदा प्रोक्ता यत्र जातो गणाधिपः

bhādrapade ca śuklā vai caturthī yā prakīrtitā| siddhā sā sarvadā proktā yatra jāto gaṇādhipaḥ

भाद्रपद की शुक्ल चतुर्थी, जैसा कि कहा गया है, सदा सिद्ध कही गई है, जहाँ गणाधिप का जन्म हुआ था।

श्लोक 10 (skanda.5.70.10)

मनःकामेश्वरः ख्यातः सर्वकामवरप्रदः। तस्य तीर्थे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा देवं गणेश्वरम्। मनोरथशतं प्राप्य कामचारी भवेन्नरः

manaḥkāmeśvaraḥ khyātaḥ sarvakāmavarapradaḥ| tasya tīrthe naraḥ snātvā dṛṣṭvā devaṁ gaṇeśvaram| manorathaśataṁ prāpya kāmacārī bhavennaraḥ

वे मनःकामेश्वर नाम से विख्यात, समस्त इच्छित वर देने वाले हैं; उनके तीर्थ में स्नान कर, गणेश्वर देव के दर्शन कर, सैकड़ों मनोरथ प्राप्त कर मनुष्य स्वच्छंद विचरण करने वाला हो जाता है।

श्लोक 11 (skanda.5.70.11)

व्यास उवाच। अस्मिन्क्षेत्रे शुभे ब्रह्मन्महाकालवनोत्तमे

vyāsa uvāca| asminkṣetre śubhe brahmanmahākālavanottame

व्यास बोले — हे ब्रह्मन्! इस शुभ क्षेत्र में, इस श्रेष्ठतम महाकालवन में...

श्लोक 12 (skanda.5.70.12)

तीर्थानि कतिसंख्यानि देवतायतनानि च। यानि कानि च ख्यातानि तानि नो वद विस्तरात्

tīrthāni katisaṁkhyāni devatāyatanāni ca| yāni kāni ca khyātāni tāni no vada vistarāt

...कितने तीर्थ तथा देवस्थान हैं? जो भी विख्यात हैं, वे सब हमें विस्तार से बताइए।

श्लोक 13 (skanda.5.70.13)

सनत्कुमार उवाच। शृणु व्यास ऋषिश्रेष्ठ कथां पापहरां पराम्। अवन्त्यां यानि तीर्थानि लिंगानि च महामुने

sanatkumāra uvāca| śṛṇu vyāsa ṛṣiśreṣṭha kathāṁ pāpaharāṁ parām| avantyāṁ yāni tīrthāni liṁgāni ca mahāmune

सनत्कुमार बोले — हे व्यास, ऋषिश्रेष्ठ! सुनो यह परम पापहारिणी कथा; अवंती में जो तीर्थ और लिंग हैं, हे महामुने...

श्लोक 14 (skanda.5.70.14)

तानि वर्णयितुं शक्तः स्वयंभूश्चतुराननः। वर्षाणामयुतैः षड्भिर्न च वक्तुं कथंचन

tāni varṇayituṁ śaktaḥ svayaṁbhūścaturānanaḥ| varṣāṇāmayutaiḥ ṣaḍbhirna ca vaktuṁ kathaṁcana

...उन्हें वर्णन करने में स्वयं चतुर्मुख स्वयंभू (ब्रह्मा) भी साठ हजार वर्षों में भी किसी प्रकार समर्थ नहीं हैं।

श्लोक 15 (skanda.5.70.15)

यावंतो मेघमालानां बिंदवो हि स्रवंति च। धरित्र्यां तृणसंख्या वै पृथिव्यां सिकतास्तथा

yāvaṁto meghamālānāṁ biṁdavo hi sravaṁti ca| dharitryāṁ tṛṇasaṁkhyā vai pṛthivyāṁ sikatāstathā

जितनी मेघमालाओं की बूँदें गिरती हैं, जितनी पृथ्वी पर तृणों की तथा बालू के कणों की संख्या है...

श्लोक 16 (skanda.5.70.16)

नभसो ज्योतिषां संख्यां वक्तुं कोऽपि न शक्नुते। न हि तीर्थलिङ्गसंख्याः संत्यवंत्यां तपोधन

nabhaso jyotiṣāṁ saṁkhyāṁ vaktuṁ ko'pi na śaknute| na hi tīrthaliṅgasaṁkhyāḥ saṁtyavaṁtyāṁ tapodhana

...आकाश के ज्योतियों की संख्या भी कोई नहीं बता सकता; उसी प्रकार अवंती में तीर्थों और लिंगों की संख्या नहीं है, हे तपोधन!

श्लोक 17 (skanda.5.70.17)

अंतरिक्षे च मेदिन्यां तीर्थभूता पुरी त्वियम्। वापीकूपतडागादि प्रस्रवोद्गरणानि च

aṁtarikṣe ca medinyāṁ tīrthabhūtā purī tviyam| vāpīkūpataḍāgādi prasravodgaraṇāni ca

आकाश में तथा पृथ्वी पर, यह नगरी स्वयं तीर्थमयी है; बावली, कुआँ, तालाब आदि, झरने तथा जल-स्रोत...

श्लोक 18 (skanda.5.70.18)

नद्यः सरांसि खाताश्च तीर्थभूतं हि सर्वशः। तथापि देवयात्रायां प्रसंगेन निबोध मे

nadyaḥ sarāṁsi khātāśca tīrthabhūtaṁ hi sarvaśaḥ| tathāpi devayātrāyāṁ prasaṁgena nibodha me

...नदियाँ, सरोवर तथा खोदे गये जलाशय — सब कुछ ही तीर्थस्वरूप है। फिर भी देवयात्रा के प्रसंग में मुझसे जानो...

श्लोक 19 (skanda.5.70.19)

यानि कानि च मुख्यानि तानि तुभ्यं वदाम्यहम्। यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसे नित्यं पूर्वाऽऽचीर्णशुभाशुभैः

yāni kāni ca mukhyāni tāni tubhyaṁ vadāmyaham| yajjñātvā mokṣyase nityaṁ pūrvā''cīrṇaśubhāśubhaiḥ

...जो भी प्रमुख हैं, वे मैं तुम्हें बताता हूँ; जिन्हें जानकर तुम पूर्व में किये गये शुभ-अशुभ कर्मों से सदा मुक्त हो जाओगे।

श्लोक 20 (skanda.5.70.20)

प्रातरुत्थाय यो नित्यं शुचिः प्रयतमानसः। विष्णुस्मरणसंपन्नः सर्वकामक्रियादिकम्

prātarutthāya yo nityaṁ śuciḥ prayatamānasaḥ| viṣṇusmaraṇasaṁpannaḥ sarvakāmakriyādikam

जो प्रातःकाल नित्य उठकर, शुद्ध और एकाग्रचित्त होकर, विष्णु के स्मरण से युक्त होकर, समस्त कामनीय क्रियाएँ...

श्लोक 21 (skanda.5.70.21)

कृत्वा वै सर्वगंधादितिलाक्षतसमन्वितः। स्नात्वा रुद्रसरे तात तथैव च व्रतं चरेत्

kṛtvā vai sarvagaṁdhāditilākṣatasamanvitaḥ| snātvā rudrasare tāta tathaiva ca vrataṁ caret

...करके, समस्त गंध, तिल तथा अक्षतों से युक्त होकर, रुद्रसर में स्नान कर, हे तात! उसी प्रकार व्रत का पालन करे।

श्लोक 22 (skanda.5.70.22)

ऊर्जमाधवयोश्चैव वैशाखाऽऽषाढयोस्तथा। शिवरात्र्यां विशेषेण देवयात्रा प्रशस्यते

ūrjamādhavayoścaiva vaiśākhā''ṣāḍhayostathā| śivarātryāṁ viśeṣeṇa devayātrā praśasyate

ऊर्ज और माधव (कार्तिक और चैत्र) मास में, वैशाख-आषाढ़ में, तथा विशेषतः शिवरात्रि को देवयात्रा प्रशंसनीय है।

श्लोक 23 (skanda.5.70.23)

यस्य देवस्य यत्तीर्थं यस्य देवस्य संनिधौ। तत्राभिषेकः कार्यो वै देवतायाश्च पूजनम्

yasya devasya yattīrthaṁ yasya devasya saṁnidhau| tatrābhiṣekaḥ kāryo vai devatāyāśca pūjanam

जिस देव का जो तीर्थ है, जिस देव के जो समीप है, वहाँ अभिषेक करना चाहिए तथा उस देवता का पूजन करना चाहिए।

श्लोक 24 (skanda.5.70.24)

विधिवच्चाचरेद्यस्तु स सर्वं फलमश्नुते। तस्मात्सर्वप्रयत्नेन देवयात्रां समाचरेत्

vidhivaccācaredyastu sa sarvaṁ phalamaśnute| tasmātsarvaprayatnena devayātrāṁ samācaret

जो विधिपूर्वक इसका आचरण करता है, वह समस्त फल प्राप्त करता है; इसलिए सर्वप्रयत्न से देवयात्रा करनी चाहिए।

श्लोक 25 (skanda.5.70.25)

व्यास उवाच। ब्रह्मन्केन प्रकारेण देवयात्रां चरेन्नरः। तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि विस्तरेण तपोधन

vyāsa uvāca| brahmankena prakāreṇa devayātrāṁ carennaraḥ| tatsarvaṁ śrotumicchāmi vistareṇa tapodhana

व्यास बोले — हे ब्रह्मन्! किस प्रकार मनुष्य देवयात्रा करे? यह सब मैं विस्तार से सुनना चाहता हूँ, हे तपोधन!

श्लोक 26 (skanda.5.70.26)

सनत्कुमार उवाच। शृणु व्यास परं गुह्यं प्रवक्ष्यामि यथाश्रुतम्। उमामहेश्वरसंवादं देवयात्रादिकर्मसु

sanatkumāra uvāca| śṛṇu vyāsa paraṁ guhyaṁ pravakṣyāmi yathāśrutam| umāmaheśvarasaṁvādaṁ devayātrādikarmasu

सनत्कुमार बोले — हे व्यास! सुनो, मैं यथाश्रुत परम गुह्य कहूँगा — देवयात्रा आदि कर्मों पर उमा-महेश्वर का संवाद।

श्लोक 27 (skanda.5.70.27)

उमोवाच। प्रभावः कथ्यतां देव क्षेत्रस्याऽस्य महेश्वर। यानि तीर्थानि विद्यंते यानि लिंगानि संति वै। तान्यादितो मे भूमंस्त्वं वदस्व वदतां वर

umovāca| prabhāvaḥ kathyatāṁ deva kṣetrasyā'sya maheśvara| yāni tīrthāni vidyaṁte yāni liṁgāni saṁti vai| tānyādito me bhūmaṁstvaṁ vadasva vadatāṁ vara

उमा बोलीं — 'हे देव महेश्वर! इस क्षेत्र का प्रभाव कहिए; जो तीर्थ विद्यमान हैं, जो लिंग हैं — हे भूमन्, वदतां वर! मुझे आदि से वे सब बताइए।

श्लोक 28 (skanda.5.70.28)

ईश्वर उवाच। शृणु देवि प्रयत्नेन प्रभावं पापनाशनम्

īśvara uvāca| śṛṇu devi prayatnena prabhāvaṁ pāpanāśanam

ईश्वर बोले — 'हे देवि! सुनो यत्नपूर्वक इस पापनाशक प्रभाव को।

श्लोक 29 (skanda.5.70.29)

क्षेत्रमाद्यं महादेवि ममातीव प्रियं सदा। यत्र शिप्रा महापुण्या दिव्या नवनदी प्रिया

kṣetramādyaṁ mahādevi mamātīva priyaṁ sadā| yatra śiprā mahāpuṇyā divyā navanadī priyā

'यह प्रथम क्षेत्र है, हे महादेवि! मुझे सदा अत्यंत प्रिय; जहाँ महापुण्यमयी, दिव्य शिप्रा नौ नदियों में प्रिय है...

श्लोक 30 (skanda.5.70.30)

नीलगंगासंगमं च तथा गंधवती नदी। चतस्रो मे प्रिया नद्यः कुमुद्वत्यां हि सुव्रते

nīlagaṁgāsaṁgamaṁ ca tathā gaṁdhavatī nadī| catasro me priyā nadyaḥ kumudvatyāṁ hi suvrate

...तथा नीलगंगा का संगम, और गंधवती नदी — कुमुद्वती में मेरी ये चार नदियाँ प्रिय हैं, हे सुव्रते!

श्लोक 31 (skanda.5.70.31)

ईश्वराश्चतुराशीतिस्तथाऽष्टौ संति भैरवाः। एकादश तथा रुद्रा आदित्या द्वादश स्मृताः

īśvarāścaturāśītistathā'ṣṭau saṁti bhairavāḥ| ekādaśa tathā rudrā ādityā dvādaśa smṛtāḥ

'यहाँ चौरासी ईश्वर तथा आठ भैरव हैं; ग्यारह रुद्र तथा बारह आदित्य स्मरण किये जाते हैं...

श्लोक 32 (skanda.5.70.32)

षड्वै विनायकाश्चाऽत्र देव्यश्च चतुर्विंशतिः। यतोहमागतो भद्रे महाकालवनोत्तमे

ṣaḍvai vināyakāścā'tra devyaśca caturviṁśatiḥ| yatohamāgato bhadre mahākālavanottame

...छह विनायक भी यहाँ हैं, तथा चौबीस देवियाँ — हे भद्रे! क्योंकि मैं स्वयं इस श्रेष्ठतम महाकालवन में आया...

श्लोक 33 (skanda.5.70.33)

विष्णुब्रह्मादयः सर्वे ह्यत्रैव निहिताः शुभे। देवैर्व्याप्तमिदं क्षेत्रं देवि योजनमायतम्

viṣṇubrahmādayaḥ sarve hyatraiva nihitāḥ śubhe| devairvyāptamidaṁ kṣetraṁ devi yojanamāyatam

...विष्णु-ब्रह्मा आदि सभी यहीं स्थापित हैं, हे शुभे! देवताओं से व्याप्त यह क्षेत्र एक योजन तक विस्तृत है, हे देवि!

श्लोक 34 (skanda.5.70.34)

दश विष्णुः समाख्यातास्तेषां नामानि मे शृणु। वासुदेवो ह्यनंतश्च बलरामो जनार्दनः

daśa viṣṇuḥ samākhyātāsteṣāṁ nāmāni me śṛṇu| vāsudevo hyanaṁtaśca balarāmo janārdanaḥ

'विष्णु के दस रूप कहे गये हैं, उनके नाम मुझसे सुनो — वासुदेव, अनंत, बलराम, जनार्दन...

श्लोक 35 (skanda.5.70.35)

नारायणो हृषीकेशो वाराहो धरणीधरः। विष्णुर्वामनरूपेण शेषशायी श्रियालयः

nārāyaṇo hṛṣīkeśo vārāho dharaṇīdharaḥ| viṣṇurvāmanarūpeṇa śeṣaśāyī śriyālayaḥ

...नारायण, हृषीकेश, वराह, धरणीधर, वामनरूपी विष्णु, शेषशायी तथा श्रियालय (लक्ष्मी के निवास)।

श्लोक 36 (skanda.5.70.36)

दशैते वैष्णवाः प्रोक्ताः सर्वपापहराः पराः

daśaite vaiṣṇavāḥ proktāḥ sarvapāpaharāḥ parāḥ

ये दस वैष्णव रूप कहे गये हैं, समस्त पापों के परम हरणकर्ता।

श्लोक 37 (skanda.5.70.37)

उमोवाच। भगवञ्च्छ्रोतुमिच्छामि देवानामनुपूर्वतः। महाकालवने रम्ये ये वसंति सुरेश्वराः

umovāca| bhagavañcchrotumicchāmi devānāmanupūrvataḥ| mahākālavane ramye ye vasaṁti sureśvarāḥ

उमा बोलीं — 'हे भगवन्! मैं क्रमशः देवताओं के विषय में सुनना चाहती हूँ, जो श्रेष्ठ देव रमणीय महाकालवन में निवास करते हैं...

श्लोक 38 (skanda.5.70.38)

विनायका भैरवा देव्यो ये संति पवनात्मजाः। रुद्रादित्यास्तथा चाऽन्ये तेषां नामानि मे वद

vināyakā bhairavā devyo ye saṁti pavanātmajāḥ| rudrādityāstathā cā'nye teṣāṁ nāmāni me vada

...विनायक, भैरव, देवियाँ, जो पवनपुत्र हैं, रुद्र-आदित्य तथा अन्य — उनके नाम मुझे बताइए।'

श्लोक 39 (skanda.5.70.39)

ईश्वर उवाच। ऋद्धिदः सिद्धिदो नित्यं कामदो वै गणाधिपः। विघ्नहा च प्रमोदी च चतुर्थीव्रतकप्रियः

īśvara uvāca| ṛddhidaḥ siddhido nityaṁ kāmado vai gaṇādhipaḥ| vighnahā ca pramodī ca caturthīvratakapriyaḥ

ईश्वर बोले — 'ऋद्धिद, सिद्धिद, सदा कामद तथा गणाधिप; विघ्नहा तथा प्रमोदी, चतुर्थी-व्रत के प्रिय...

श्लोक 40 (skanda.5.70.40)

षडेते वै समाख्याता विघ्ननाशकराः पराः। उमा चंडीश्वरी गौरी ऋद्धिसिद्धिप्रदा नृणाम्

ṣaḍete vai samākhyātā vighnanāśakarāḥ parāḥ| umā caṁḍīśvarī gaurī ṛddhisiddhipradā nṛṇām

...ये छह कहे गये हैं, विघ्नों का परम नाश करने वाले; उमा, चंडीश्वरी, गौरी, मनुष्यों को ऋद्धि-सिद्धि देने वाली...

श्लोक 41 (skanda.5.70.41)

वटयक्षिणी वीरभद्रा इत्येताश्चाष्टमातरः। महामाया सती ख्याता कपालमातृका तथा। अंबिका शीतला चैव एकानंशा च सिद्धिदा

vaṭayakṣiṇī vīrabhadrā ityetāścāṣṭamātaraḥ| mahāmāyā satī khyātā kapālamātṛkā tathā| aṁbikā śītalā caiva ekānaṁśā ca siddhidā

...वटयक्षिणी, वीरभद्रा — ये आठ मातृकाएँ हैं; महामाया, सती नाम से विख्यात, तथा कपालमातृका भी, अंबिका, शीतला तथा सिद्धिदायिनी एकानंशा...

श्लोक 42 (skanda.5.70.42)

ब्रह्माणी पार्वती चैव योगिनी योगशालिनी। कौमारी भगवती चैव षट्कृत्तिकास्तथैव च

brahmāṇī pārvatī caiva yoginī yogaśālinī| kaumārī bhagavatī caiva ṣaṭkṛttikāstathaiva ca

...ब्रह्माणी, पार्वती, योगिनी, योगशालिनी, कौमारी, भगवती तथा छह कृत्तिकाएँ भी...

श्लोक 43 (skanda.5.70.43)

चर्पटामातृकाः ख्याता वटमातर एव च। सरस्वती तथा ख्याता महालक्ष्मीश्च वै स्मृता

carpaṭāmātṛkāḥ khyātā vaṭamātara eva ca| sarasvatī tathā khyātā mahālakṣmīśca vai smṛtā

...चर्पटामातृकाएँ विख्यात, तथा वटमातृकाएँ भी; सरस्वती भी विख्यात, तथा महालक्ष्मी स्मृत हैं...

श्लोक 44 (skanda.5.70.44)

योगिनीमातृका ख्याताश्चतुषष्टिस्ततः स्मृताः। कालिका च महाकाली चामुण्डा ब्रह्मचारिणी

yoginīmātṛkā khyātāścatuṣaṣṭistataḥ smṛtāḥ| kālikā ca mahākālī cāmuṇḍā brahmacāriṇī

...चौंसठ योगिनी-मातृकाएँ विख्यात, फिर स्मृत हैं; कालिका, महाकाली, चामुण्डा, ब्रह्मचारिणी...

श्लोक 45 (skanda.5.70.45)

वैष्णवी च समाख्याता वाराही विंध्यवासिनी। अंबा अंबालिका चैव चतुर्विंशतिकाः पराः

vaiṣṇavī ca samākhyātā vārāhī viṁdhyavāsinī| aṁbā aṁbālikā caiva caturviṁśatikāḥ parāḥ

...वैष्णवी, वाराही, विंध्यवासिनी भी कही गई; अंबा, अंबालिका — ये परम चौबीस देवियाँ हैं।

श्लोक 46 (skanda.5.70.46)

हनूमान्ब्रह्मचारी च कुमारश्च महाबली। चत्वारो वै समाख्याता मया ते पवनात्मजाः

hanūmānbrahmacārī ca kumāraśca mahābalī| catvāro vai samākhyātā mayā te pavanātmajāḥ

हनुमान्, ब्रह्मचारी तथा महाबली कुमार — ये चार, मेरे द्वारा तुम्हें पवनपुत्र कहे गये हैं।

श्लोक 47 (skanda.5.70.47)

दंडपाणिश्च विक्रांतो महाभैरवसिताऽसिताः। बटुको बालको नंदी षट्पञ्चाशतिकोऽपरः

daṁḍapāṇiśca vikrāṁto mahābhairavasitā'sitāḥ| baṭuko bālako naṁdī ṣaṭpañcāśatiko'paraḥ

दंडपाणि, विक्रांत, श्वेत-श्याम महाभैरव, बटुक, बालक, नंदी तथा एक अन्य, छप्पनवाँ...

श्लोक 48 (skanda.5.70.48)

कालभैरवश्च विख्यातः क्षेत्रपालस्तथाष्टमः। अष्टैव भैरवाः ख्याता महापापहराः पराः। कपर्दी च कपाली च कला नाथो वृषासनः

kālabhairavaśca vikhyātaḥ kṣetrapālastathāṣṭamaḥ| aṣṭaiva bhairavāḥ khyātā mahāpāpaharāḥ parāḥ| kapardī ca kapālī ca kalā nātho vṛṣāsanaḥ

...तथा विख्यात कालभैरव, क्षेत्रपाल आठवें — ये आठ भैरव ही कहे गये हैं, महापाप हरने वाले परम; कपर्दी, कपाली, कलानाथ, वृषासन...

श्लोक 49 (skanda.5.70.49)

त्र्यंबकः शूलपाणिश्च चीरवासा दिगम्बरः। गिरीशः कामचारी च सर्वः सर्वांगभूषणः

tryaṁbakaḥ śūlapāṇiśca cīravāsā digambaraḥ| girīśaḥ kāmacārī ca sarvaḥ sarvāṁgabhūṣaṇaḥ

...त्र्यंबक, शूलपाणि, चीरवासा, दिगंबर, गिरीश, कामचारी, सर्व, सर्वांगभूषण — [ये सब शिव के रूप हैं]।

श्लोक 50 (skanda.5.70.50)

रुद्राश्चैकादश प्रोक्ताः शत्रुपक्षविनाशनाः। अरुणः सूर्यो वेदांगो भानुरिन्द्रो रविरंशुमान्

rudrāścaikādaśa proktāḥ śatrupakṣavināśanāḥ| aruṇaḥ sūryo vedāṁgo bhānurindro raviraṁśumān

ग्यारह रुद्र कहे गये हैं, शत्रुपक्षों का नाश करने वाले; अरुण, सूर्य, वेदांग, भानु, इंद्र, रवि, अंशुमान्...

श्लोक 51 (skanda.5.70.51)

सुवर्णरेताऽहःकर्ता मित्रो विष्णुः सनातनः। इत्येते द्वादशाऽऽदित्याः सर्वरोगहराः पराः

suvarṇaretā'haḥkartā mitro viṣṇuḥ sanātanaḥ| ityete dvādaśā''dityāḥ sarvarogaharāḥ parāḥ

...सुवर्णरेता, अहःकर्ता, मित्र, विष्णु, सनातन — ये बारह आदित्य हैं, समस्त रोगों को हरने वाले परम।

श्लोक 52 (skanda.5.70.52)

अगस्त्येश्वरमुख्यानां लिंगानां चतुराशिनाम्। हिमाचलसुते नित्यं नामानि गदतः शृणु

agastyeśvaramukhyānāṁ liṁgānāṁ caturāśinām| himācalasute nityaṁ nāmāni gadataḥ śṛṇu

अगस्त्येश्वर आदि चौरासी लिंगों के नाम, हे हिमाचलसुते! मुझसे सुनो, जो मैं सदा कहता हूँ।

श्लोक 53 (skanda.5.70.53)

अगस्त्वेश्वर आख्यातो गुहेश्वरस्ततः परम्। ढुंढेश्वरस्ततः प्रोक्तो डमरुकेश्वरश्च भामिनि

agastveśvara ākhyāto guheśvarastataḥ param| ḍhuṁḍheśvarastataḥ prokto ḍamarukeśvaraśca bhāmini

'अगस्त्येश्वर कहा गया, फिर गुहेश्वर; फिर ढुंढेश्वर कहा गया, तथा डमरुकेश्वर, हे भामिनि!

श्लोक 54 (skanda.5.70.54)

अनादिकल्पेश्वरः शंभुः स्वर्णजालेश्वरः परः। त्रिविष्टपेश्वरो देवः कपालेश्वरसंज्ञकः

anādikalpeśvaraḥ śaṁbhuḥ svarṇajāleśvaraḥ paraḥ| triviṣṭapeśvaro devaḥ kapāleśvarasaṁjñakaḥ

अनादिकल्पेश्वर शंभु, स्वर्णजालेश्वर आगे; त्रिविष्टपेश्वर देव, तथा कपालेश्वर संज्ञक...

श्लोक 55 (skanda.5.70.55)

कर्कोटकेश्वरः शंभुः सिद्धेश्वरस्ततः परम्। स्वर्गद्वारेश्वरो रुद्रो लोकपालेश्वरोऽपरः

karkoṭakeśvaraḥ śaṁbhuḥ siddheśvarastataḥ param| svargadvāreśvaro rudro lokapāleśvaro'paraḥ

...कर्कोटकेश्वर शंभु, फिर सिद्धेश्वर आगे; स्वर्गद्वारेश्वर रुद्र, तथा अन्य लोकपालेश्वर...

श्लोक 56 (skanda.5.70.56)

कामेश्वर इति ख्यातः कुटुम्बेश्वरस्ततः परम्। इन्द्रद्युम्नेश्वरः ख्यात ईशानेशस्ततः परम्

kāmeśvara iti khyātaḥ kuṭumbeśvarastataḥ param| indradyumneśvaraḥ khyāta īśāneśastataḥ param

...कामेश्वर विख्यात, फिर कुटुम्बेश्वर आगे; इंद्रद्युम्नेश्वर विख्यात, फिर ईशानेश आगे...

श्लोक 57 (skanda.5.70.57)

अप्सरेश्वर इति ख्यातः कल्कलेश्वर एव च। नामचंडेश्वरो देवो दिवापापहरोऽपरः

apsareśvara iti khyātaḥ kalkaleśvara eva ca| nāmacaṁḍeśvaro devo divāpāpaharo'paraḥ

...अप्सरेश्वर विख्यात, तथा कल्कलेश्वर भी; देव नामचंडेश्वर, तथा अन्य दिवापापहर...

श्लोक 58 (skanda.5.70.58)

प्रतिहारेश्वरश्चैव कुक्कुटेशस्ततः परम्। मेघनादेश्वरः पुण्यो महाकालेश्वरः परः

pratihāreśvaraścaiva kukkuṭeśastataḥ param| meghanādeśvaraḥ puṇyo mahākāleśvaraḥ paraḥ

...प्रतिहारेश्वर भी, फिर कुक्कुटेश आगे; पुण्य मेघनादेश्वर, फिर महाकालेश्वर आगे...

श्लोक 59 (skanda.5.70.59)

मुक्तेश्वरः समाख्यातः सोमेश्वरस्ततः परम्। अनरकेश्वरो देवो जटेश्वरस्ततः परम्

mukteśvaraḥ samākhyātaḥ someśvarastataḥ param| anarakeśvaro devo jaṭeśvarastataḥ param

...मुक्तेश्वर कहा गया, फिर सोमेश्वर आगे; देव अनरकेश्वर, फिर जटेश्वर आगे...

श्लोक 60 (skanda.5.70.60)

रामेश्वरो महादेवश्च्यवनेशस्ततः परम्। अखंडेशः समाख्यातः पत्तनेशस्ततः स्मृतः

rāmeśvaro mahādevaścyavaneśastataḥ param| akhaṁḍeśaḥ samākhyātaḥ pattaneśastataḥ smṛtaḥ

...महादेव रामेश्वर, फिर च्यवनेश आगे; अखंडेश कहा गया, फिर पत्तनेश स्मृत...

श्लोक 61 (skanda.5.70.61)

आनंदेशस्ततः प्रोक्तः कंथडेशस्ततः परम्। इन्द्रेश्वर इति ख्यातो मार्कंडेशस्ततः परः

ānaṁdeśastataḥ proktaḥ kaṁthaḍeśastataḥ param| indreśvara iti khyāto mārkaṁḍeśastataḥ paraḥ

...आनंदेश फिर कहा गया, फिर कंथडेश आगे; इंद्रेश्वर विख्यात, फिर मार्कंडेश आगे...

श्लोक 62 (skanda.5.70.62)

शिवेश्वर इति प्रोक्तः कुसुमेशस्ततः परम्। अक्रूरेण इति ख्यातः कुण्डेश्वरस्ततः परम्

śiveśvara iti proktaḥ kusumeśastataḥ param| akrūreṇa iti khyātaḥ kuṇḍeśvarastataḥ param

...शिवेश्वर कहा गया, फिर कुसुमेश आगे; अक्रूरेण विख्यात, फिर कुंडेश्वर आगे...

श्लोक 63 (skanda.5.70.63)

लुम्पेश्वरः समाख्यातो गंगेश्वरस्ततः परम्। शूलेश्वरेति विख्यात ओंकारेशस्ततः स्मृतः

lumpeśvaraḥ samākhyāto gaṁgeśvarastataḥ param| śūleśvareti vikhyāta oṁkāreśastataḥ smṛtaḥ

...लुम्पेश्वर कहा गया, फिर गंगेश्वर आगे; शूलेश्वर विख्यात, फिर ओंकारेश स्मृत...

श्लोक 64 (skanda.5.70.64)

कंटकेशो महारुद्रः सिंहेश्वरस्ततः परम्। रेवंतेश्वरः परो देवो घंटेश्वरपुरःसरः

kaṁṭakeśo mahārudraḥ siṁheśvarastataḥ param| revaṁteśvaraḥ paro devo ghaṁṭeśvarapuraḥsaraḥ

...महारुद्र कंटकेश, फिर सिंहेश्वर आगे; देव रेवंतेश्वर आगे, घंटेश्वर के आगे रहने वाला...

श्लोक 65 (skanda.5.70.65)

प्रयागेश्वरो महादेवः सिद्धेश्वरस्ततः परम्। मातंगेश्वरः परो देवः सौभाग्येशस्ततो वरः

prayāgeśvaro mahādevaḥ siddheśvarastataḥ param| mātaṁgeśvaraḥ paro devaḥ saubhāgyeśastato varaḥ

...महादेव प्रयागेश्वर, फिर सिद्धेश्वर आगे; देव मातंगेश्वर आगे, फिर श्रेष्ठ सौभाग्येश...

श्लोक 66 (skanda.5.70.66)

रूपेश्वरेति विख्यातो ब्रह्मेश्वरस्ततः परम्। जल्पेश्वरस्ततो देवः केदारेश्वर एव च

rūpeśvareti vikhyāto brahmeśvarastataḥ param| jalpeśvarastato devaḥ kedāreśvara eva ca

...रूपेश्वर विख्यात, फिर ब्रह्मेश्वर आगे; फिर देव जल्पेश्वर, तथा केदारेश्वर भी...

श्लोक 67 (skanda.5.70.67)

पिशाचेश्वरशंभुश्च संगमेशस्ततः परः। दुर्धर्षेशश्च विख्यातश्चंडादित्येश्वरस्ततः

piśāceśvaraśaṁbhuśca saṁgameśastataḥ paraḥ| durdharṣeśaśca vikhyātaścaṁḍādityeśvarastataḥ

...पिशाचेश्वर शंभु, फिर संगमेश आगे; दुर्धर्षेश विख्यात, फिर चंडादित्येश्वर...

श्लोक 68 (skanda.5.70.68)

करभेश्वरः परः प्रोक्तो राजस्थलेश्वरः शिवः। वडलेश्वरस्ततः प्रोक्तो ह्यरुणेशस्ततः स्मृतः

karabheśvaraḥ paraḥ prokto rājasthaleśvaraḥ śivaḥ| vaḍaleśvarastataḥ prokto hyaruṇeśastataḥ smṛtaḥ

...करभेश्वर आगे कहा गया, राजस्थलेश्वर शिव; फिर वडलेश्वर कहा गया, फिर अरुणेश स्मृत...

श्लोक 69 (skanda.5.70.69)

पुष्पदंतेश्वरो देवो ह्यविमुक्तेश्वरस्ततः। हनुमतेश्वरो देवो विश्वेश्वर स्ततः कम्

puṣpadaṁteśvaro devo hyavimukteśvarastataḥ| hanumateśvaro devo viśveśvara stataḥ kam

...पुष्पदंतेश्वर देव, फिर अविमुक्तेश्वर आगे; हनुमतेश्वर देव, फिर विश्वेश्वर आगे [इस पंक्ति का अंतिम शब्द मूल पाठ में अस्पष्ट है]...

श्लोक 70 (skanda.5.70.70)

स्वप्नेश्वर इति ख्यातः सिद्धेश्वरस्ततः परः। नीलकंठेश्वरो देवः स्थावरेशस्ततः परम्

svapneśvara iti khyātaḥ siddheśvarastataḥ paraḥ| nīlakaṁṭheśvaro devaḥ sthāvareśastataḥ param

...स्वप्नेश्वर विख्यात, फिर सिद्धेश्वर आगे; देव नीलकंठेश्वर, फिर स्थावरेश आगे...

श्लोक 71 (skanda.5.70.71)

कामेश्वर इति प्रोक्तः प्रतिहारेश्वरस्ततः। पशुपतीश्वरः प्रोक्तो विश्वेश्वरस्ततः परः। स्वर्णजालेश्वरः प्रोक्तो मनःकामेश्वरस्ततः

kāmeśvara iti proktaḥ pratihāreśvarastataḥ| paśupatīśvaraḥ prokto viśveśvarastataḥ paraḥ| svarṇajāleśvaraḥ prokto manaḥkāmeśvarastataḥ

...कामेश्वर कहा गया, फिर प्रतिहारेश्वर आगे; पशुपतीश्वर कहा गया, फिर विश्वेश्वर आगे; स्वर्णजालेश्वर कहा गया, फिर मनःकामेश्वर आगे...

श्लोक 72 (skanda.5.70.72)

दुर्वासेश्वरनामासौ नागचंडेश्वरस्ततः। खर्परेशश्च विख्यातो ब्रह्मेश्वरस्ततः परम्

durvāseśvaranāmāsau nāgacaṁḍeśvarastataḥ| kharpareśaśca vikhyāto brahmeśvarastataḥ param

...दुर्वासेश्वर नाम से यह, फिर नागचंडेश्वर आगे; खर्परेश विख्यात, फिर ब्रह्मेश्वर आगे...

श्लोक 73 (skanda.5.70.73)

पातालेश्वर आख्यातो गुप्तेश्वरस्ततः परः। कपिलेश्वर इत्याख्यो योगयोगेश्वरः परः

pātāleśvara ākhyāto gupteśvarastataḥ paraḥ| kapileśvara ityākhyo yogayogeśvaraḥ paraḥ

...पातालेश्वर कहा गया, फिर गुप्तेश्वर आगे; कपिलेश्वर नामक, फिर योगयोगेश्वर आगे...

श्लोक 74 (skanda.5.70.74)

भीमेश्वरेति विख्यातो धनुःसहस्राभिधः परः। अग्नीश्वरः परः प्रोक्तो देवेश्वरस्ततः परः

bhīmeśvareti vikhyāto dhanuḥsahasrābhidhaḥ paraḥ| agnīśvaraḥ paraḥ prokto deveśvarastataḥ paraḥ

...भीमेश्वर विख्यात, फिर धनुःसहस्र नामक आगे; अग्नीश्वर आगे कहा गया, फिर देवेश्वर आगे...

श्लोक 75 (skanda.5.70.75)

द्वादशार्कः समाख्यातो दशाश्वमेधिकेश्वरः। गदाधरेश्वरः ख्यातो वैजनाथेति शंभुराट्

dvādaśārkaḥ samākhyāto daśāśvamedhikeśvaraḥ| gadādhareśvaraḥ khyāto vaijanātheti śaṁbhurāṭ

...द्वादशार्क कहा गया, तथा दशाश्वमेधिकेश्वर; गदाधरेश्वर विख्यात, तथा वैजनाथ नामक शंभुराज...

श्लोक 76 (skanda.5.70.76)

सोमनाथेश्वरः ख्यातो घुष्मेश्वरस्ततः परः। भीमशंकर इत्याख्यो घंटेश्वरस्ततः परः

somanātheśvaraḥ khyāto ghuṣmeśvarastataḥ paraḥ| bhīmaśaṁkara ityākhyo ghaṁṭeśvarastataḥ paraḥ

...सोमनाथेश्वर विख्यात, फिर घुष्मेश्वर आगे; भीमशंकर नामक, फिर घंटेश्वर आगे...

श्लोक 77 (skanda.5.70.77)

ऊषरेश्वरसंज्ञश्च चन्द्रादित्येश्वरः परः। केशवार्कः समाख्यातः शक्तिभेदेश्वरः परः

ūṣareśvarasaṁjñaśca candrādityeśvaraḥ paraḥ| keśavārkaḥ samākhyātaḥ śaktibhedeśvaraḥ paraḥ

...ऊषरेश्वर संज्ञक, तथा फिर चंद्रादित्येश्वर; केशवार्क कहा गया, तथा फिर शक्तिभेदेश्वर...

श्लोक 78 (skanda.5.70.78)

रामेश्वरः परो देवो वाल्मीकेश्वरशंकरः। ज्वालेश्वरः शिवः प्रोक्तो ह्यभयेशस्ततः परः

rāmeśvaraḥ paro devo vālmīkeśvaraśaṁkaraḥ| jvāleśvaraḥ śivaḥ prokto hyabhayeśastataḥ paraḥ

...देव रामेश्वर आगे, वाल्मीकेश्वर शंकर; ज्वालेश्वर शिव कहा गया, फिर अभयेश आगे...

श्लोक 79 (skanda.5.70.79)

विघ्नहस्तेश्वरः प्रोक्तश्चंचलेशस्ततः परः। पुरुषोत्तमेति विख्यातो वीरेश्वरस्ततः परः

vighnahasteśvaraḥ proktaścaṁcaleśastataḥ paraḥ| puruṣottameti vikhyāto vīreśvarastataḥ paraḥ

...विघ्नहस्तेश्वर कहा गया, फिर चंचलेश आगे; पुरुषोत्तम विख्यात, फिर वीरेश्वर आगे...

श्लोक 80 (skanda.5.70.80)

कर्णेश्वरश्च विख्यातः पृथुकेशस्ततः परम्। आनंदेशश्च विख्यातः कोटेश्वरस्ततः परः

karṇeśvaraśca vikhyātaḥ pṛthukeśastataḥ param| ānaṁdeśaśca vikhyātaḥ koṭeśvarastataḥ paraḥ

...कर्णेश्वर विख्यात, फिर पृथुकेश आगे; आनंदेश विख्यात, फिर कोटेश्वर आगे...

श्लोक 81 (skanda.5.70.81)

अविमुक्तेश्वरः प्रोक्तो हनुमत्केश्वरः परः। विमलेश्वरेति विख्यातश्चंद्रेश्वरस्ततः परः

avimukteśvaraḥ prokto hanumatkeśvaraḥ paraḥ| vimaleśvareti vikhyātaścaṁdreśvarastataḥ paraḥ

...अविमुक्तेश्वर कहा गया, फिर हनुमत्केश्वर आगे; विमलेश्वर विख्यात, फिर चंद्रेश्वर आगे...

श्लोक 82 (skanda.5.70.82)

बिंदुकेशश्च विख्यातो वालुकेश्वरसंज्ञकः। बृहस्पतीश्वरो देवो ह्यसंख्यातेश्वरस्ततः

biṁdukeśaśca vikhyāto vālukeśvarasaṁjñakaḥ| bṛhaspatīśvaro devo hyasaṁkhyāteśvarastataḥ

...बिंदुकेश विख्यात, तथा वालुकेश्वर नामक; देव बृहस्पतीश्वर, फिर असंख्यातेश्वर आगे।

श्लोक 83 (skanda.5.70.83)

यानि कानि च तीर्थानि तानि लिंगानि सत्तम। तिष्ठंति तत्र पूज्यानि तानि वंद्यानि सर्वशः

yāni kāni ca tīrthāni tāni liṁgāni sattama| tiṣṭhaṁti tatra pūjyāni tāni vaṁdyāni sarvaśaḥ

जो भी तीर्थ हैं, हे सत्तम! वे ही लिंग भी हैं, वहाँ पूजनीय होकर विराजमान हैं, सर्वथा वंदनीय।

श्लोक 84 (skanda.5.70.84)

चत्वारो विदिताः सर्वे द्वारपाला महात्मभिः। पिंगलेश्वरेति च ख्यातः पूर्वद्वारे द्विजोत्तम

catvāro viditāḥ sarve dvārapālā mahātmabhiḥ| piṁgaleśvareti ca khyātaḥ pūrvadvāre dvijottama

महात्माओं द्वारा चार द्वारपाल विदित हैं; हे द्विजोत्तम! पूर्व द्वार पर पिंगलेश्वर नाम से विख्यात हैं...

श्लोक 85 (skanda.5.70.85)

दक्षिणे च तथा द्वारे कायावरोहणेश्वरः। बिल्वकेश्वरेति विख्यातः पश्चिमद्वारमाश्रितः

dakṣiṇe ca tathā dvāre kāyāvarohaṇeśvaraḥ| bilvakeśvareti vikhyātaḥ paścimadvāramāśritaḥ

...तथा दक्षिण द्वार पर कायावरोहणेश्वर; पश्चिम द्वार पर बिल्वकेश्वर नाम से विख्यात विराजमान हैं...

श्लोक 86 (skanda.5.70.86)

दर्दुरेश्वरस्ततः प्रोक्तो द्वारे चोत्तरसंज्ञिके। एते चाऽन्ये च बहवो लिंगाख्यास्त्रिभुवनेश्वराः

dardureśvarastataḥ prokto dvāre cottarasaṁjñike| ete cā'nye ca bahavo liṁgākhyāstribhuvaneśvarāḥ

...उत्तर नामक द्वार पर फिर दर्दुरेश्वर कहे गये हैं; ये तथा अन्य अनेक लिंगनामधारी त्रिभुवनेश्वर...

श्लोक 87 (skanda.5.70.87)

महाकालवने रम्ये समाख्याता हि पावनाः। षष्टिकोटिसहस्राणि षष्टिकोटिशतानि च

mahākālavane ramye samākhyātā hi pāvanāḥ| ṣaṣṭikoṭisahasrāṇi ṣaṣṭikoṭiśatāni ca

...रमणीय महाकालवन में पवित्र रूप में कहे गये हैं — साठ करोड़ हजार, तथा साठ करोड़ सौ भी।

श्लोक 88 (skanda.5.70.88)

महाकालवने व्यास लिंगसंख्या न विद्यते। तथाऽपि च प्राधान्येन मयाऽत्र परिकीर्तिताः

mahākālavane vyāsa liṁgasaṁkhyā na vidyate| tathā'pi ca prādhānyena mayā'tra parikīrtitāḥ

हे व्यास! महाकालवन में लिंगों की संख्या ज्ञात नहीं है; फिर भी प्रधानता से मैंने यहाँ उन्हें कहा है।

श्लोक 89 (skanda.5.70.89)

यस्य देवस्य यत्तीर्थं तन्नाम्ना परिकीर्तितम्। स्नात्वा दत्त्वा च तद्दानं तत्तीर्थस्य फलं लभेत्

yasya devasya yattīrthaṁ tannāmnā parikīrtitam| snātvā dattvā ca taddānaṁ tattīrthasya phalaṁ labhet

जिस देव का जो तीर्थ है, वह उसी नाम से कहा गया है; वहाँ स्नान कर तथा वह दान देकर मनुष्य उस तीर्थ का फल प्राप्त करता है।

श्लोक 90 (skanda.5.70.90)

तथा नवग्रहाः पुण्याः समाख्याताः पुराऽनघ। तेषां नामानि पुण्यानि तीर्थानि च तथा शृणु

tathā navagrahāḥ puṇyāḥ samākhyātāḥ purā'nagha| teṣāṁ nāmāni puṇyāni tīrthāni ca tathā śṛṇu

इसी प्रकार नवग्रह भी प्राचीन काल में पुण्यमय कहे गये हैं, हे निष्पाप! उनके नाम तथा पुण्यमय तीर्थ भी सुनो।

श्लोक 91 (skanda.5.70.91)

नरादित्य इति ख्यातः सोमेश्वरस्ततः परः। मंगलेश्वरः समाख्यातो बुधेश्वरस्ततः परम्

narāditya iti khyātaḥ someśvarastataḥ paraḥ| maṁgaleśvaraḥ samākhyāto budheśvarastataḥ param

नरादित्य विख्यात, फिर सोमेश्वर आगे; मंगलेश्वर कहा गया, फिर बुधेश्वर आगे...

श्लोक 92 (skanda.5.70.92)

बृहस्पतीश्वरः प्रोक्तस्तथा शुक्रेश्वरः शिवः। स्थावरेश्वरो महादेवः समाख्यातो मुनीश्वरैः

bṛhaspatīśvaraḥ proktastathā śukreśvaraḥ śivaḥ| sthāvareśvaro mahādevaḥ samākhyāto munīśvaraiḥ

...बृहस्पतीश्वर कहा गया, तथा शुक्रेश्वर शिव; महादेव स्थावरेश्वर मुनीश्वरों द्वारा कहा गया है।

श्लोक 93 (skanda.5.70.93)

राहुकेतू समाख्यातौ तेषां तीर्थानि सत्तम। तत्तीर्थेषु नरः स्नात्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते

rāhuketū samākhyātau teṣāṁ tīrthāni sattama| tattīrtheṣu naraḥ snātvā sarvapāpaiḥ pramucyate

राहु-केतु भी कहे गये हैं, हे सत्तम! उनके तीर्थ भी हैं; उन तीर्थों में स्नान कर मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 94 (skanda.5.70.94)

ग्रहा राज्यं प्रयच्छंति ग्रहा राज्यं हरंति च। ग्रहैस्तु व्यापितं सर्वं त्रैलोक्त्यं सचराचरम्

grahā rājyaṁ prayacchaṁti grahā rājyaṁ haraṁti ca| grahaistu vyāpitaṁ sarvaṁ trailoktyaṁ sacarācaram

ग्रह राज्य प्रदान करते हैं, और ग्रह राज्य को हर भी लेते हैं; ग्रहों से ही यह समस्त चराचर त्रैलोक्य व्याप्त है।

श्लोक 95 (skanda.5.70.95)

ग्रहतीर्थे नरः स्नात्वा ग्रहाणामर्चनं चरेत्। न तस्य ग्रहपीडा वै बाधते हि कदाचन

grahatīrthe naraḥ snātvā grahāṇāmarcanaṁ caret| na tasya grahapīḍā vai bādhate hi kadācana

ग्रहतीर्थ में स्नान कर मनुष्य को ग्रहों का पूजन करना चाहिए; उसे ग्रहपीड़ा कभी बाधित नहीं करती।

श्लोक 96 (skanda.5.70.96)

एवं व्यास समाख्याता मया देवाश्च तीर्थकाः। यात्रा पुण्यतरा श्रेष्ठा पवित्रा पापनाशिनी

evaṁ vyāsa samākhyātā mayā devāśca tīrthakāḥ| yātrā puṇyatarā śreṣṭhā pavitrā pāpanāśinī

हे व्यास! इस प्रकार मेरे द्वारा देवता तथा उनके तीर्थ कहे गये; यह यात्रा अत्यंत पुण्यमयी, श्रेष्ठ, पवित्र तथा पापनाशिनी है।

श्लोक 97 (skanda.5.70.97)

ग्रहपीडासु चोग्रासु दारिद्र्ये घोरसंकटे। तेषामुद्धरणार्थाय देवयात्रा प्रकीर्तिता

grahapīḍāsu cogrāsu dāridrye ghorasaṁkaṭe| teṣāmuddharaṇārthāya devayātrā prakīrtitā

भीषण ग्रहपीड़ाओं में, दरिद्रता में, घोर संकट में — उनसे उद्धार के लिए देवयात्रा कही गई है।

श्लोक 98 (skanda.5.70.98)

क्षेत्रस्यांतर्गृहीं नित्यं ये कुर्वंति नरोत्तमाः। न तेषां दुर्लभं किंचित्त्रिषु लोकेषु विद्यते

kṣetrasyāṁtargṛhīṁ nityaṁ ye kurvaṁti narottamāḥ| na teṣāṁ durlabhaṁ kiṁcittriṣu lokeṣu vidyate

जो श्रेष्ठ मनुष्य इस क्षेत्र की अंतर्गृही (आंतरिक परिक्रमा) सदा करते हैं, उनके लिए तीनों लोकों में कुछ भी दुर्लभ नहीं रहता।

श्लोक 99 (skanda.5.70.99)

अपुत्रो लभते पुत्रं निर्धनो धनमाप्नुयात्। विद्यावाञ्जायते विप्रः क्षत्रियो विजयी भवेत्

aputro labhate putraṁ nirdhano dhanamāpnuyāt| vidyāvāñjāyate vipraḥ kṣatriyo vijayī bhavet

पुत्रहीन को पुत्र प्राप्त होता है, निर्धन को धन प्राप्त होता है; ब्राह्मण विद्यावान् होता है, क्षत्रिय विजयी होता है...

श्लोक 100 (skanda.5.70.100)

अक्षया संततिस्तस्य शिवलोके महीयते

akṣayā saṁtatistasya śivaloke mahīyate

...उसकी संतान अक्षय हो जाती है, और वह शिवलोक में महिमान्वित होता है।

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