अवन्ती खण्ड · अध्याय 73
गुहेश्वर माहात्म्य
श्लोक 1 (skanda.5.73.1)
श्रीरुद्र उवाच। शृणु गुहेश्वरं लिंगं द्वितीयं पापनाशनम्। यस्य दर्शनमात्रेण जायते सिद्धिरुत्तमा
śrīrudra uvāca| śṛṇu guheśvaraṁ liṁgaṁ dvitīyaṁ pāpanāśanam| yasya darśanamātreṇa jāyate siddhiruttamā
श्रीरुद्र बोले — सुनो, गुहेश्वर नामक द्वितीय पापनाशक लिंग को, जिसके दर्शनमात्र से उत्तम सिद्धि प्राप्त होती है।
श्लोक 2 (skanda.5.73.2)
पुरा राथंतरे कल्पे देवदारुवने शुभे। ऋषिर्मंकणकोनाम वेदवेदांगपारगः। योगाभ्यासरतो नित्यं शांतिदांतिसमास्थितिः
purā rāthaṁtare kalpe devadāruvane śubhe| ṛṣirmaṁkaṇakonāma vedavedāṁgapāragaḥ| yogābhyāsarato nityaṁ śāṁtidāṁtisamāsthitiḥ
पूर्वकाल में राथंतर कल्प में, शुभ देवदारुवन में मंकणक नामक ऋषि थे, जो वेद-वेदांगों के पारगामी थे, सदा योगाभ्यास में रत रहते थे और शांति-दांति से युक्त थे।
श्लोक 3 (skanda.5.73.3)
सिद्धिकामस्तपस्तेपे कथं सिद्धो भवाम्यहम्। रक्तमयविकारोयं कथं यास्यति संक्षयम्
siddhikāmastapastepe kathaṁ siddho bhavāmyaham| raktamayavikāroyaṁ kathaṁ yāsyati saṁkṣayam
सिद्धि की कामना से उन्होंने तप किया — "मैं कैसे सिद्ध होऊँ? यह रक्तमय विकार कैसे नष्ट हो?"
श्लोक 4 (skanda.5.73.4)
इति संचिंत्य हृदये प्रारब्धं तप उत्तमम्। बहून्यब्दसहस्राणि तस्यातीतानि पार्वति
iti saṁciṁtya hṛdaye prārabdhaṁ tapa uttamam| bahūnyabdasahasrāṇi tasyātītāni pārvati
हृदय में ऐसा विचार कर उन्होंने उत्तम तप आरंभ किया; हे पार्वती, उनके कई हज़ार वर्ष बीत गए।
श्लोक 5 (skanda.5.73.5)
कस्मिंश्चिदथ काले तु विद्धस्य पर्वतात्मजे। कराच्छाकरसो जातः कुशाग्रेण तदैव हि
kasmiṁścidatha kāle tu viddhasya parvatātmaje| karācchākaraso jātaḥ kuśāgreṇa tadaiva hi
किसी समय, हे पर्वतात्मजे, कुश की नोक से हाथ बिंधने पर उसी क्षण हाथ से वनस्पति का रस निकल पड़ा।
श्लोक 6 (skanda.5.73.6)
स च दृष्ट्वा तदाश्चर्यं विस्मयं परमं गतः। मेने सिद्धिं परां प्राप्तां सगर्वो वाक्यमब्रवीत्
sa ca dṛṣṭvā tadāścaryaṁ vismayaṁ paramaṁ gataḥ| mene siddhiṁ parāṁ prāptāṁ sagarvo vākyamabravīt
यह देखकर वे अत्यंत आश्चर्यचकित हुए; परम सिद्धि पाई मानकर गर्व से भरकर बोले —
श्लोक 7 (skanda.5.73.7)
अहो तपःप्रभावोऽयं प्राप्ता सिद्धिर्मयाद्य वै। मत्तुल्यो नास्ति वै विप्रो येन सिद्धिः समागता
aho tapaḥprabhāvo'yaṁ prāptā siddhirmayādya vai| mattulyo nāsti vai vipro yena siddhiḥ samāgatā
"अहो! यह तप का प्रभाव है, आज मैंने सिद्धि प्राप्त कर ली; मेरे समान कोई विप्र नहीं जिसे ऐसी सिद्धि मिली हो।"
श्लोक 8 (skanda.5.73.8)
शरीरं कुत्सितं चेदं मलमूत्रेण संयुतम्। मेदस्नायुवसापृक्तमांसशोणितपूरितम्। हर्षेण महता युक्तः स ननर्त्त द्विजस्तथा
śarīraṁ kutsitaṁ cedaṁ malamūtreṇa saṁyutam| medasnāyuvasāpṛktamāṁsaśoṇitapūritam| harṣeṇa mahatā yuktaḥ sa nanartta dvijastathā
"यह शरीर तो मल-मूत्र से युक्त, स्नायु-वसा-मांस-रक्त से भरा घृणित वस्तु है" — ऐसा मानकर वह द्विज महान हर्ष से भरकर नाचने लगा।
श्लोक 9 (skanda.5.73.9)
एतस्मिन्नृत्यति विप्रे जगत्स्थावरजंगमम्। अनृत्यद्रागसंयुक्तं प्रभावात्तस्य वै मुनेः
etasminnṛtyati vipre jagatsthāvarajaṁgamam| anṛtyadrāgasaṁyuktaṁ prabhāvāttasya vai muneḥ
उस विप्र के नाचने पर उस मुनि के प्रभाव से चराचर सारा जगत राग से युक्त होकर नाचने लगा।
श्लोक 10 (skanda.5.73.10)
न स्वाध्यायो वषट्कारः कर्मकांडो न च क्वचित्
na svādhyāyo vaṣaṭkāraḥ karmakāṁḍo na ca kvacit
कहीं भी स्वाध्याय, वषट्कार अथवा कर्मकांड नहीं रह गया।
श्लोक 11 (skanda.5.73.11)
एतस्मिन्नंतरे देवा ब्रह्मविष्ण्वादिपुरःसराः। मामूचुर्विस्मिताः सर्वे नाथ नृत्यं तदा कुरु
etasminnaṁtare devā brahmaviṣṇvādipuraḥsarāḥ| māmūcurvismitāḥ sarve nātha nṛtyaṁ tadā kuru
इसी बीच ब्रह्मा-विष्णु आदि देवता विस्मित होकर मुझसे बोले — "हे नाथ, इस नृत्य के विषय में अब कुछ कीजिए —"
श्लोक 12 (skanda.5.73.12)
ऋषौ मंकणके देव नृत्यति नृत्यति सर्वतः। सदेवासुरमानुष्यं सर्वं लोकत्रयं विभो
ṛṣau maṁkaṇake deva nṛtyati nṛtyati sarvataḥ| sadevāsuramānuṣyaṁ sarvaṁ lokatrayaṁ vibho
"हे विभो, मंकणक ऋषि के नाचने पर देव, असुर और मनुष्यों सहित सारे तीनों लोक हर ओर नाच रहे हैं।"
श्लोक 13 (skanda.5.73.13)
चलिताः पर्वताः स्थानात्क्षुभिता मेघपंक्तयः। शिखराणि विशीर्यंते धरणी पीडिता भृशम्
calitāḥ parvatāḥ sthānātkṣubhitā meghapaṁktayaḥ| śikharāṇi viśīryaṁte dharaṇī pīḍitā bhṛśam
"पर्वत अपने स्थान से हिल गए हैं, मेघपंक्तियाँ क्षुब्ध हैं, शिखर बिखर रहे हैं, धरती अत्यंत पीड़ित है।"
श्लोक 14 (skanda.5.73.14)
स्रोतोमात्रा महानद्यो ग्रहा उन्मार्गतः स्थिताः
srotomātrā mahānadyo grahā unmārgataḥ sthitāḥ
"महानदियाँ अपने प्रवाह-मार्ग से विचलित हैं, ग्रह अपनी कक्षा से भटक गए हैं।"
श्लोक 15 (skanda.5.73.15)
त्रैलोक्यं व्याकुलीभूतं यावन्नायाति संक्षयम्। तावन्निवारयस्वैनं नान्यः शक्तो विना त्वया
trailokyaṁ vyākulībhūtaṁ yāvannāyāti saṁkṣayam| tāvannivārayasvainaṁ nānyaḥ śakto vinā tvayā
"त्रैलोक्य व्याकुल हो उठा है; इसके नाश को प्राप्त होने से पहले इसे रोकिए — आपके सिवा कोई समर्थ नहीं है।"
श्लोक 16 (skanda.5.73.16)
तेषां तद्वचनं श्रुत्वा त्रिदशानां यशस्विनि। प्रतिज्ञातं मयात्यर्थं गत्वा तस्य समीपतः
teṣāṁ tadvacanaṁ śrutvā tridaśānāṁ yaśasvini| pratijñātaṁ mayātyarthaṁ gatvā tasya samīpataḥ
हे यशस्विनी, उन तैंतीस देवताओं का वह वचन सुनकर मैंने दृढ़ प्रतिज्ञा की और उनके पास गया।
श्लोक 17 (skanda.5.73.17)
द्विजरूपं समास्थाय मया पृष्टो द्विजोत्तमः। किमर्थं नृत्यसि ब्रह्मन्कस्मात्ते हर्ष आगतः
dvijarūpaṁ samāsthāya mayā pṛṣṭo dvijottamaḥ| kimarthaṁ nṛtyasi brahmankasmātte harṣa āgataḥ
द्विज का रूप धारण कर मैंने उस श्रेष्ठ द्विज से पूछा — "हे ब्रह्मन्, तुम क्यों नाच रहे हो? तुम्हें यह हर्ष कहाँ से हुआ?"
श्लोक 18 (skanda.5.73.18)
विरुद्धमृषिधर्माणां कामरागेण नर्त्तनम्। गीतं च नर्त्तनं चैव युवतीजनवल्लभम्
viruddhamṛṣidharmāṇāṁ kāmarāgeṇa narttanam| gītaṁ ca narttanaṁ caiva yuvatījanavallabham
"काम-राग से युक्त नर्तन ऋषियों के धर्म के विरुद्ध है; गीत और नृत्य युवतियों को प्रिय होते हैं —"
श्लोक 19 (skanda.5.73.19)
ब्राह्मणस्य तपोभ्रंशः सदाचारस्य सत्तम। इति मत्वा द्विजश्रेष्ठ किमर्थं नृत्यसे भृशम्
brāhmaṇasya tapobhraṁśaḥ sadācārasya sattama| iti matvā dvijaśreṣṭha kimarthaṁ nṛtyase bhṛśam
"— वे ब्राह्मण के लिए तप और सदाचार के नाशक हैं, हे सत्तम। ऐसा मानकर, हे द्विजश्रेष्ठ, तुम इतना क्यों नाच रहे हो?"
श्लोक 20 (skanda.5.73.20)
ऋषिरुवाच। किं न पश्यसि भो ब्रह्मन्कराच्छाकरसं च्युतम्। अतएव हि मे नृत्यं सिद्धोऽहं नात्र संशयः
ṛṣiruvāca| kiṁ na paśyasi bho brahmankarācchākarasaṁ cyutam| ataeva hi me nṛtyaṁ siddho'haṁ nātra saṁśayaḥ
ऋषि बोले — "क्या तुम नहीं देखते, हे ब्रह्मन्, मेरे हाथ से गिरा वनस्पति-रस? इसी कारण मैं नाच रहा हूँ — मैं सिद्ध हूँ, इसमें संदेह नहीं।"
श्लोक 21 (skanda.5.73.21)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा हासोऽतीव मया कृतः। अंगुष्ठस्ताडितः स्वीयोंगुल्यग्रेण च पार्वति
tasya tadvacanaṁ śrutvā hāso'tīva mayā kṛtaḥ| aṁguṣṭhastāḍitaḥ svīyoṁgulyagreṇa ca pārvati
उसका यह वचन सुनकर मैंने बहुत हँसी की; और हे पार्वती, अपनी उँगली की नोक से अपने अँगूठे पर प्रहार किया।
श्लोक 22 (skanda.5.73.22)
ततो विनिर्गतं भस्म तत्क्षणाद्धिमपांडुरम्। हासेनोक्तो विशालाक्षि सगर्वो ब्राह्मणो मया
tato vinirgataṁ bhasma tatkṣaṇāddhimapāṁḍuram| hāsenokto viśālākṣi sagarvo brāhmaṇo mayā
तभी उसी क्षण उससे हिम के समान श्वेत भस्म निकल पड़ी। हे विशालाक्षी, हँसते हुए मैंने उस गर्वित ब्राह्मण से कहा —
श्लोक 23 (skanda.5.73.23)
पश्य मेंऽगुष्ठतो ब्रह्मन्भूरि भस्म विनिर्गतम्। न नृत्येहं न मे हर्षस्तथापि मुनिस्समः
paśya meṁ'guṣṭhato brahmanbhūri bhasma vinirgatam| na nṛtyehaṁ na me harṣastathāpi munissamaḥ
"देखो ब्रह्मन्, मेरे अँगूठे से भी अपार भस्म निकली; फिर भी न मैं नाचता हूँ, न मुझे कोई हर्ष है — तो भी मैं समभाव वाला मुनि हूँ।"
श्लोक 24 (skanda.5.73.24)
तद्दृष्ट्वा महदाश्चर्यं लज्जितो द्विजसत्तमः। धैर्यं च तादृशं दृष्ट्वा विस्मयं परमं गतः
taddṛṣṭvā mahadāścaryaṁ lajjito dvijasattamaḥ| dhairyaṁ ca tādṛśaṁ dṛṣṭvā vismayaṁ paramaṁ gataḥ
यह देखकर वह श्रेष्ठ द्विज महान आश्चर्य से लज्जित हो गया; और ऐसा धैर्य देखकर वह परम विस्मय को प्राप्त हुआ।
श्लोक 25 (skanda.5.73.25)
अब्रवीत्प्रांजलिर्भूत्वा विस्मितेनांतरात्मना। नान्यं देवमहं मन्ये त्वां मुक्त्वा वृषभध्वजम्
abravītprāṁjalirbhūtvā vismitenāṁtarātmanā| nānyaṁ devamahaṁ manye tvāṁ muktvā vṛṣabhadhvajam
अंजलि जोड़कर, अंतरात्मा में विस्मित होकर उसने कहा — "हे वृषभध्वज, आपको छोड़कर मैं किसी अन्य देवता को नहीं मानता।"
श्लोक 26 (skanda.5.73.26)
नान्यस्य विद्यते शक्तिरीदृशी भुवनत्रये। तस्मात्क्षमस्व देवेश मयाज्ञानादनुष्ठितम्
nānyasya vidyate śaktirīdṛśī bhuvanatraye| tasmātkṣamasva deveśa mayājñānādanuṣṭhitam
"त्रिभुवन में किसी और की ऐसी शक्ति नहीं है। अतः हे देवेश, मुझसे अज्ञानवश जो किया गया, उसे क्षमा कीजिए।"
श्लोक 27 (skanda.5.73.27)
तपःक्षयकरं कर्म विरुद्धं नर्त्तनं सताम्। बहुकालार्जितं पुण्यं तपसा दुष्करेण तु। तद्गतं सहसा देव मदीयं नर्त्तनेन तु
tapaḥkṣayakaraṁ karma viruddhaṁ narttanaṁ satām| bahukālārjitaṁ puṇyaṁ tapasā duṣkareṇa tu| tadgataṁ sahasā deva madīyaṁ narttanena tu
"सज्जनों के विरुद्ध यह नर्तन-कर्म तप का नाशक है; दुष्कर तप से दीर्घकाल में अर्जित पुण्य, हे देव, मेरे इस नृत्य से सहसा नष्ट हो गया।"
श्लोक 28 (skanda.5.73.28)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा मयोक्तो द्विजसत्तमः। वरं वरय भद्रं ते तुष्टोऽहं द्विजसत्तम
tasya tadvacanaṁ śrutvā mayokto dvijasattamaḥ| varaṁ varaya bhadraṁ te tuṣṭo'haṁ dvijasattama
उसका यह वचन सुनकर मैंने उस श्रेष्ठ द्विज से कहा — "वर माँगो, तुम्हारा कल्याण हो; हे द्विजसत्तम, मैं प्रसन्न हूँ।"
श्लोक 29 (skanda.5.73.29)
ज्ञानेनानेन विप्रेंद्र कं ते कामं करोम्यहम्
jñānenānena vipreṁdra kaṁ te kāmaṁ karomyaham
"इस ज्ञान से, हे विप्रेंद्र, तुम्हारी कौन सी कामना मैं पूर्ण करूँ?"
श्लोक 30 (skanda.5.73.30)
ऋषिरुवाच। यदि देव प्रसन्नस्त्वं शरणागतवत्सल। यथा न स्यात्तपोहानिस्तथा नीतिर्विधीयताम्
ṛṣiruvāca| yadi deva prasannastvaṁ śaraṇāgatavatsala| yathā na syāttapohānistathā nītirvidhīyatām
ऋषि बोले — "हे देव, यदि आप प्रसन्न हैं, शरणागतवत्सल हैं, तो ऐसी व्यवस्था कीजिए जिससे मेरे तप की हानि न हो।"
श्लोक 31 (skanda.5.73.31)
मया प्रोक्तं प्रसन्नेन तस्य विप्रस्य पार्वति। तपस्ते वर्द्धतां विप्र महाकालवनं व्रज
mayā proktaṁ prasannena tasya viprasya pārvati| tapaste varddhatāṁ vipra mahākālavanaṁ vraja
मैंने प्रसन्न होकर उस विप्र से कहा, हे पार्वती — "तुम्हारा तप बढ़े, हे विप्र; महाकालवन को जाओ।"
श्लोक 32 (skanda.5.73.32)
तत्रास्ते सर्वदा पुण्या सप्तकल्पोद्भवा गुहा। पिशाचेश्वरदेवस्य उत्तरेण व्यवस्थिता
tatrāste sarvadā puṇyā saptakalpodbhavā guhā| piśāceśvaradevasya uttareṇa vyavasthitā
"वहाँ सात कल्पों से विद्यमान वह सदा पवित्र गुफा है, जो पिशाचेश्वर देव के उत्तर में स्थित है।"
श्लोक 33 (skanda.5.73.33)
तत्र द्रक्ष्यसि यल्लिंगं सप्तकल्पोद्भवं शुभम्। तस्य दर्शनमात्रेण तपस्ते वृद्धिमेष्यति
tatra drakṣyasi yalliṁgaṁ saptakalpodbhavaṁ śubham| tasya darśanamātreṇa tapaste vṛddhimeṣyati
"वहाँ तुम सात कल्पों से उत्पन्न वह शुभ लिंग देखोगे; उसके दर्शनमात्र से तुम्हारा तप वृद्धि को प्राप्त होगा।"
श्लोक 34 (skanda.5.73.34)
कामक्रोधोद्भवं पापं लोभमोहसमन्वितम्। ईर्ष्यामत्सरजं चैव नाशं याति च किल्बिषम्
kāmakrodhodbhavaṁ pāpaṁ lobhamohasamanvitam| īrṣyāmatsarajaṁ caiva nāśaṁ yāti ca kilbiṣam
"काम और क्रोध से उत्पन्न पाप, लोभ-मोह से युक्त, तथा ईर्ष्या-द्वेष से जन्मा पाप — सब नष्ट हो जाएगा।"
श्लोक 35 (skanda.5.73.35)
मदीयं वचनं श्रुत्वा स विप्रो वेदपारगः। श्रुत्वा च नियमं देवि मदुक्तं स ततो द्विजः
madīyaṁ vacanaṁ śrutvā sa vipro vedapāragaḥ| śrutvā ca niyamaṁ devi maduktaṁ sa tato dvijaḥ
मेरा यह वचन सुनकर वेदपारगामी वह विप्र — हे देवी, मेरे कहे नियम को सुनकर वह द्विज —
श्लोक 36 (skanda.5.73.36)
निःसृतो नियतो भूत्वा नमस्कृत्य पुनःपुनः। आजगाम गुहां यत्र महाकालवनोत्तमे
niḥsṛto niyato bhūtvā namaskṛtya punaḥpunaḥ| ājagāma guhāṁ yatra mahākālavanottame
— नियमपूर्वक होकर, बार-बार प्रणाम कर वहाँ से निकल पड़ा, और उत्तम महाकालवन में जहाँ वह गुफा थी, वहाँ पहुँचा।
श्लोक 37 (skanda.5.73.37)
ददर्श तत्र तल्लिंगं तपसो वर्द्धनं परम्। द्वादशादित्यसंकाशो जातो वै लिंगदर्शनात्
dadarśa tatra talliṁgaṁ tapaso varddhanaṁ param| dvādaśādityasaṁkāśo jāto vai liṁgadarśanāt
वहाँ उसने उस लिंग को देखा, जो तप को परम रूप से बढ़ाने वाला है; लिंग-दर्शन से वह बारह सूर्यों के समान तेजस्वी हो गया।
श्लोक 38 (skanda.5.73.38)
एतस्मिन्नंतरे देवि देवैरुक्तं नभस्तले। गोप्यं लिंगं गुहोत्थं तु दृष्टं मंकणकेन तु
etasminnaṁtare devi devairuktaṁ nabhastale| gopyaṁ liṁgaṁ guhotthaṁ tu dṛṣṭaṁ maṁkaṇakena tu
इसी बीच, हे देवी, आकाश में देवताओं ने कहा — "गुफा से उत्पन्न वह गुप्त लिंग मंकणक द्वारा देखा गया है —"
श्लोक 39 (skanda.5.73.39)
सिद्धिः प्राप्ता द्विजेनैव दर्शनेन सुदुर्लभा। तस्माद्गुहेश्वरो देवि भविष्यति महीतले
siddhiḥ prāptā dvijenaiva darśanena sudurlabhā| tasmādguheśvaro devi bhaviṣyati mahītale
"— और उस द्विज ने केवल दर्शन से ही अत्यंत दुर्लभ सिद्धि प्राप्त कर ली है। अतः, हे देवी, यह पृथ्वी पर गुहेश्वर के नाम से विख्यात होगा।"
श्लोक 40 (skanda.5.73.40)
भक्त्या परमयोपेता ये द्रक्ष्यंति गुहेश्वरम्। न तेषां जायते विघ्नो धर्मस्य तपसस्तथा
bhaktyā paramayopetā ye drakṣyaṁti guheśvaram| na teṣāṁ jāyate vighno dharmasya tapasastathā
जो परम भक्ति से युक्त होकर गुहेश्वर का दर्शन करेंगे, उनके धर्म और तप में कोई विघ्न नहीं आता।
श्लोक 41 (skanda.5.73.41)
अष्टम्यां वा चतुर्दश्यां दर्शनं यः करिष्यति। ब्रह्मलोकं गमिष्यंति पितरस्तस्य देहिनः
aṣṭamyāṁ vā caturdaśyāṁ darśanaṁ yaḥ kariṣyati| brahmalokaṁ gamiṣyaṁti pitarastasya dehinaḥ
अष्टमी या चतुर्दशी को जो दर्शन करेगा, उसके पितर देहधारी होकर ब्रह्मलोक को जाएँगे।
श्लोक 42 (skanda.5.73.42)
अत्रागत्य प्रयत्नेन दर्शनं यः करिष्यति। उद्धरिष्यति चात्मानं पुरुषानेकविंशतिम्
atrāgatya prayatnena darśanaṁ yaḥ kariṣyati| uddhariṣyati cātmānaṁ puruṣānekaviṁśatim
यहाँ आकर प्रयत्नपूर्वक जो दर्शन करेगा, वह स्वयं को तथा इक्कीस पीढ़ियों के पुरुषों का उद्धार करेगा।
श्लोक 43 (skanda.5.73.43)
कृत्वा पापसहस्राणि दर्शनं यः करिष्यति। स याति परमं स्थानं यत्र देवो महेश्वरः
kṛtvā pāpasahasrāṇi darśanaṁ yaḥ kariṣyati| sa yāti paramaṁ sthānaṁ yatra devo maheśvaraḥ
हज़ारों पाप करने पर भी जो दर्शन करेगा, वह उस परम स्थान को जाता है जहाँ भगवान महेश्वर हैं।
श्लोक 44 (skanda.5.73.44)
ब्रह्महत्या सुरापानं स्तेयं गुर्वंगनागमः। दर्शनात्तस्य लिंगस्य सर्वं यास्यति संक्षयम्
brahmahatyā surāpānaṁ steyaṁ gurvaṁganāgamaḥ| darśanāttasya liṁgasya sarvaṁ yāsyati saṁkṣayam
ब्रह्महत्या, सुरापान, चोरी, गुरुपत्नीगमन — इस लिंग के दर्शन से ये सब नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 45 (skanda.5.73.45)
यत्किंचिदशुभं कर्म जन्मकोटिशतार्जितम्। क्षयं यास्यति तत्सर्वं स्पर्शमात्रेण नान्यथा
yatkiṁcidaśubhaṁ karma janmakoṭiśatārjitam| kṣayaṁ yāsyati tatsarvaṁ sparśamātreṇa nānyathā
सैकड़ों करोड़ जन्मों में अर्जित जो भी अशुभ कर्म हो, वह सब केवल स्पर्श मात्र से नष्ट हो जाता है, अन्यथा नहीं।
श्लोक 46 (skanda.5.73.46)
महापातकयुक्ता हि देहिनो ये महीतले। तेऽपि लिंगं समासाद्य मुच्यंते सर्वपातकैः
mahāpātakayuktā hi dehino ye mahītale| te'pi liṁgaṁ samāsādya mucyaṁte sarvapātakaiḥ
पृथ्वी पर जो प्राणी महापातकों से युक्त हैं, वे भी इस लिंग को पाकर सब पापों से मुक्त हो जाते हैं।
श्लोक 47 (skanda.5.73.47)
इत्युक्त्वा स द्विजो देवि दिव्यो मंकणको मुनिः। कृत्वाश्रमपदं पुण्यं तत्रैव तपसि स्थितः
ityuktvā sa dvijo devi divyo maṁkaṇako muniḥ| kṛtvāśramapadaṁ puṇyaṁ tatraiva tapasi sthitaḥ
हे देवी, ऐसा कहकर वह दिव्य द्विज मंकणक मुनि वहीं पवित्र आश्रम बनाकर तप में स्थित हो गए।
श्लोक 48 (skanda.5.73.48)
एष वै कथितो देवि प्रभावः पापनाशनः। श्रवणात्कीर्त्तनाद्वापि सर्वपापैः प्रमुच्यते
eṣa vai kathito devi prabhāvaḥ pāpanāśanaḥ| śravaṇātkīrttanādvāpi sarvapāpaiḥ pramucyate
हे देवी, यह पापनाशक प्रभाव मैंने कह दिया; इसे सुनने अथवा कीर्तन करने मात्र से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है।