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अवन्ती खण्ड · अध्याय 74

ढुंढेश्वर माहात्म्य

अध्याय 73अध्याय-सूचीअध्याय 75

श्लोक 1 (skanda.5.74.1)

श्रीरुद्र उवाच। ढुंढेश्वरं तृतीयं तु सुखस्वर्गफलप्रदम्। सर्वपापहरं लिंगं नृणां दुष्कृतनाशनम्

śrīrudra uvāca| ḍhuṁḍheśvaraṁ tṛtīyaṁ tu sukhasvargaphalapradam| sarvapāpaharaṁ liṁgaṁ nṛṇāṁ duṣkṛtanāśanam

श्रीरुद्र बोले — तृतीय है ढुंढेश्वर, जो सुख और स्वर्ग का फल देने वाला है; यह लिंग सब पापों को हरने वाला और मनुष्यों के दुष्कर्मों का नाश करने वाला है।

श्लोक 2 (skanda.5.74.2)

ढुंढश्चासीत्पुरा देवि कैलासे गणनायकः। स च कामी दुराचारो व्यसनोपहतेन्द्रियः

ḍhuṁḍhaścāsītpurā devi kailāse gaṇanāyakaḥ| sa ca kāmī durācāro vyasanopahatendriyaḥ

पूर्वकाल में, हे देवी, कैलास पर ढुंढ नामक एक गणनायक थे; वे कामी, दुराचारी और व्यसनों से इंद्रियों के वश में थे।

श्लोक 3 (skanda.5.74.3)

गतोऽसौ शक्रलोकं तु कौतुकार्थं यदृच्छया। यत्र नृत्यति सा रंभा शक्रस्याग्रे विवृण्वती

gato'sau śakralokaṁ tu kautukārthaṁ yadṛcchayā| yatra nṛtyati sā raṁbhā śakrasyāgre vivṛṇvatī

वे कुतूहलवश कहीं इंद्रलोक चले गए, जहाँ रंभा इंद्र के सामने नृत्य कर अपनी कला दिखा रही थी।

श्लोक 4 (skanda.5.74.4)

भावान्बहुविधान्रम्यान्दृष्टिहस्तादिकाञ्छुभान्। सूचीविद्धादिकरणान्पताकादिकहस्तकान्। नृत्यं हस्तादिसंयुक्तं लयतालानुगं तथा

bhāvānbahuvidhānramyāndṛṣṭihastādikāñchubhān| sūcīviddhādikaraṇānpatākādikahastakān| nṛtyaṁ hastādisaṁyuktaṁ layatālānugaṁ tathā

वह अनेक प्रकार के रमणीय भाव, दृष्टि-हस्त आदि शुभ मुद्राएँ, सूचीविद्ध आदि करण, पताका आदि हस्तक दिखा रही थी — हाथों से युक्त नृत्य, लय-ताल का अनुसरण करता हुआ।

श्लोक 5 (skanda.5.74.5)

शक्रोऽपि त्रिदशैः सार्द्धं तन्मुखासक्तलोचनः। बभूव हृष्टचेता वै हृषितांगरुहाननः

śakro'pi tridaśaiḥ sārddhaṁ tanmukhāsaktalocanaḥ| babhūva hṛṣṭacetā vai hṛṣitāṁgaruhānanaḥ

इंद्र भी देवताओं सहित उसके मुख पर आसक्त दृष्टि किए हुए हर्षित चित्त हो गए, उनका मुख और रोंगटे रोमांचित हो उठे।

श्लोक 6 (skanda.5.74.6)

एतस्मिन्नंतरे देवि ढुंढस्तल्ललितेन तु। कामरागवशेनैव भाव्यर्थेन च मोहितः

etasminnaṁtare devi ḍhuṁḍhastallalitena tu| kāmarāgavaśenaiva bhāvyarthena ca mohitaḥ

इसी बीच, हे देवी, ढुंढ उसकी उस लालित्यपूर्ण मुद्रा से, काम-राग के वशीभूत होकर तथा भावपूर्ण अभिनय से मोहित हो गया।

श्लोक 7 (skanda.5.74.7)

तेन रंगरता रंभा पुष्पगुच्छेन ताडिता। स शप्तो वासवेनैव दृष्ट्वाऽन्यायं गणस्य तु

tena raṁgaratā raṁbhā puṣpagucchena tāḍitā| sa śapto vāsavenaiva dṛṣṭvā'nyāyaṁ gaṇasya tu

रंगमंच में लीन रंभा को उसने पुष्पगुच्छ से मार दिया। गण का यह अन्याय देखकर वासव ने उसे शाप दे दिया —

श्लोक 8 (skanda.5.74.8)

पत त्वं मानुषं लोकं रंगभंगस्त्वया कृतः। इति शप्तो गणो देवि शक्रेणामिततेजसा

pata tvaṁ mānuṣaṁ lokaṁ raṁgabhaṁgastvayā kṛtaḥ| iti śapto gaṇo devi śakreṇāmitatejasā

"गिर तू मनुष्यलोक में! तूने रंग-भंग किया है!" — हे देवी, अमित तेजस्वी शक्र द्वारा वह गण इस प्रकार शापित हुआ।

श्लोक 9 (skanda.5.74.9)

पतितो मानुषे लोके विसंज्ञो विह्वलेन्द्रियः। कादिग्भूतो हतोत्साहो विललाप पुनःपुनः

patito mānuṣe loke visaṁjño vihvalendriyaḥ| kādigbhūto hatotsāho vilalāpa punaḥpunaḥ

मनुष्यलोक में गिरकर वह संज्ञाहीन, इंद्रियों से विह्वल, दिग्भ्रमित और उत्साहहीन हो गया, और बार-बार विलाप करने लगा —

श्लोक 10 (skanda.5.74.10)

अहोऽन्यायफलं प्राप्तं मया मोहादनुष्ठितम्। तस्मान्नीतिर्विधातव्या पुरुषेण विजानता

aho'nyāyaphalaṁ prāptaṁ mayā mohādanuṣṭhitam| tasmānnītirvidhātavyā puruṣeṇa vijānatā

"हाय! मैंने जो मोहवश किया, उसका अन्याय-फल मुझे मिल गया। अतः विवेकी पुरुष को न्यायमार्ग का ही आचरण करना चाहिए —"

श्लोक 11 (skanda.5.74.11)

न्यायमार्गं समाश्रित्य येन सिद्धिर्भवेन्मम

nyāyamārgaṁ samāśritya yena siddhirbhavenmama

"— न्यायमार्ग का आश्रय लेकर, जिससे मुझे सिद्धि प्राप्त हो।"

श्लोक 12 (skanda.5.74.12)

इत्युक्त्वा स तपस्तेपे महेंद्रे पर्वतोत्तमे। श्रीशैले मलये विंध्ये पारियात्रे यमालये

ityuktvā sa tapastepe maheṁdre parvatottame| śrīśaile malaye viṁdhye pāriyātre yamālaye

ऐसा कहकर उसने महेंद्र आदि श्रेष्ठ पर्वतों पर, श्रीशैल, मलय, विंध्य, पारियात्र और यमालय पर तप किया।

श्लोक 13 (skanda.5.74.13)

नो सिद्धोऽसौ यदा देवि तदा गंगामहत्तटम्। यमुनां चंद्रभागां च वितस्तां नर्मदां नदीम्

no siddho'sau yadā devi tadā gaṁgāmahattaṭam| yamunāṁ caṁdrabhāgāṁ ca vitastāṁ narmadāṁ nadīm

जब वह इस प्रकार सिद्ध न हो सका, हे देवी, तब गंगा के महान तट पर, यमुना, चंद्रभागा, वितस्ता और नर्मदा नदी पर गया —

श्लोक 14 (skanda.5.74.14)

गोदावरीं भीमरथीं कौशिकीं शारदां शिवाम्। चर्मण्वतीं समासाद्य स्नात्वा त्यक्तक्रियोऽभवत्

godāvarīṁ bhīmarathīṁ kauśikīṁ śāradāṁ śivām| carmaṇvatīṁ samāsādya snātvā tyaktakriyo'bhavat

— गोदावरी, भीमरथी, कौशिकी, शुभ शारदा और चर्मण्वती को पाकर, स्नान कर, उसने कर्मकांड छोड़ दिया।

श्लोक 15 (skanda.5.74.15)

तीर्थं व्यर्थं तपो व्यर्थं तीर्थयात्राफलं यतः। न प्राप्तं च मयाभीष्टमटता कर्मभूमिषु

tīrthaṁ vyarthaṁ tapo vyarthaṁ tīrthayātrāphalaṁ yataḥ| na prāptaṁ ca mayābhīṣṭamaṭatā karmabhūmiṣu

"व्यर्थ है तीर्थ, व्यर्थ है तप, व्यर्थ है तीर्थयात्रा का फल — क्योंकि कर्मभूमियों में भटकते हुए भी मुझे अभीष्ट प्राप्त नहीं हुआ।"

श्लोक 16 (skanda.5.74.16)

एतस्मिन्नंतरे देवि वागुवाचाशरीरिणी। आश्वासयंती गणपं महाकालायने व्रज

etasminnaṁtare devi vāguvācāśarīriṇī| āśvāsayaṁtī gaṇapaṁ mahākālāyane vraja

इसी बीच, हे देवी, एक अशरीरी वाणी बोली, उस गणपति को आश्वासन देते हुए — "महाकाल के धाम को जाओ —"

श्लोक 17 (skanda.5.74.17)

प्रयागाद्यानि तीर्थानि पृथिव्यां यानि संति वै। सदा सिद्धिकरं तेषां महाकालं विशिष्यते

prayāgādyāni tīrthāni pṛthivyāṁ yāni saṁti vai| sadā siddhikaraṁ teṣāṁ mahākālaṁ viśiṣyate

"— पृथ्वी पर प्रयाग आदि जो भी तीर्थ हैं, उन सबमें महाकाल सदा सिद्धिदायक होने में विशिष्ट है।"

श्लोक 18 (skanda.5.74.18)

तत्रास्ते सुमहापुण्यं लिंगं सर्वार्थसाधकम्। पिशाचेश्वरसांनिध्ये तमाराधय सत्वरम्

tatrāste sumahāpuṇyaṁ liṁgaṁ sarvārthasādhakam| piśāceśvarasāṁnidhye tamārādhaya satvaram

"वहाँ सब अर्थों को सिद्ध करने वाला अत्यंत पुण्यमय लिंग है, पिशाचेश्वर के सांनिध्य में — शीघ्र उसकी आराधना करो।"

श्लोक 19 (skanda.5.74.19)

प्रसादात्तस्य लिंगस्य पुनर्यास्यसि शांकरम्। लोकं तेजस्विनां गम्यं दुर्लभं पापिनां सदा

prasādāttasya liṁgasya punaryāsyasi śāṁkaram| lokaṁ tejasvināṁ gamyaṁ durlabhaṁ pāpināṁ sadā

"उस लिंग की कृपा से तुम पुनः शंकर के लोक को जाओगे, जो तेजस्वियों के लिए सुगम है और पापियों के लिए सदा दुर्लभ है।"

श्लोक 20 (skanda.5.74.20)

इति श्रुत्वा ततो वाणीमाकाशस्थां गणस्तदा। आजगाम मुदा युक्तो महाकालवनोत्तमे

iti śrutvā tato vāṇīmākāśasthāṁ gaṇastadā| ājagāma mudā yukto mahākālavanottame

आकाश से आई यह वाणी सुनकर वह गण हर्षित होकर उत्तम महाकालवन में आ पहुँचा।

श्लोक 21 (skanda.5.74.21)

ददर्श तत्र तल्लिंगं सर्वसंपत्करं शुभम्। पूजयामास देवेशं भक्त्या परमया युतः

dadarśa tatra talliṁgaṁ sarvasaṁpatkaraṁ śubham| pūjayāmāsa deveśaṁ bhaktyā paramayā yutaḥ

वहाँ उसने वह सर्वसंपत्तिदायक शुभ लिंग देखा; परम भक्ति से युक्त होकर उसने देवेश की पूजा की।

श्लोक 22 (skanda.5.74.22)

लिंगमध्यात्ततो वाणी निःसृता पर्वतात्मजे। अहो तुष्टोस्मि ते वत्स किं कामं प्रददाम्यहम्

liṁgamadhyāttato vāṇī niḥsṛtā parvatātmaje| aho tuṣṭosmi te vatsa kiṁ kāmaṁ pradadāmyaham

हे पर्वतात्मजे, तब लिंग के मध्य से वाणी निकली — "अहो वत्स, मैं तुझसे प्रसन्न हूँ; तुझे क्या वर दूँ?"

श्लोक 23 (skanda.5.74.23)

ढुंढ उवाच। यदि तुष्टोऽसि देवेश शरणागतवत्सल। त्वत्पादपंकजे भूयाद्भक्तिर्मेऽविचला सदा

ḍhuṁḍha uvāca| yadi tuṣṭo'si deveśa śaraṇāgatavatsala| tvatpādapaṁkaje bhūyādbhaktirme'vicalā sadā

ढुंढ बोला — "हे देवेश, यदि आप शरणागतवत्सल प्रसन्न हैं, तो आपके चरणकमलों में मेरी भक्ति सदा अविचल बनी रहे —"

श्लोक 24 (skanda.5.74.24)

वरमेनं प्रयच्छाशु यदि तुष्टो महेश्वरः

varamenaṁ prayacchāśu yadi tuṣṭo maheśvaraḥ

"— यह वर शीघ्र मुझे दीजिए, यदि महेश्वर प्रसन्न हैं —"

श्लोक 25 (skanda.5.74.25)

ये च त्वां मानवा देव पश्यंति परमेश्वर। पापात्सद्यो विनिर्मुक्तास्ते भवंतु महीतले

ye ca tvāṁ mānavā deva paśyaṁti parameśvara| pāpātsadyo vinirmuktāste bhavaṁtu mahītale

"— और हे परमेश्वर, जो मनुष्य आपका दर्शन करें, वे पृथ्वी पर तत्काल पाप से मुक्त हो जाएँ।"

श्लोक 26 (skanda.5.74.26)

ढुंढस्य भाषितं श्रुत्वा लिंगेनोक्तं यशस्विनि। ये च मां पूजयिष्यंति श्रद्धया परया पुनः। ते भविष्यंति सततं सदा पातकवर्जिताः

ḍhuṁḍhasya bhāṣitaṁ śrutvā liṁgenoktaṁ yaśasvini| ye ca māṁ pūjayiṣyaṁti śraddhayā parayā punaḥ| te bhaviṣyaṁti satataṁ sadā pātakavarjitāḥ

ढुंढ का यह वचन सुनकर, हे यशस्विनी, लिंग ने कहा — "जो श्रद्धापूर्वक बार-बार मेरी पूजा करेंगे, वे सदा निरंतर पापरहित रहेंगे —"

श्लोक 27 (skanda.5.74.27)

लप्स्यंति ते परान्कामान्भविष्यंति गणोत्तमाः। पूज्याः सर्वेषु लोकेषु सर्वालंकारभूषिताः

lapsyaṁti te parānkāmānbhaviṣyaṁti gaṇottamāḥ| pūjyāḥ sarveṣu lokeṣu sarvālaṁkārabhūṣitāḥ

"— वे अपनी उत्तम कामनाएँ प्राप्त करेंगे, श्रेष्ठ गण बनेंगे, सब लोकों में पूज्य होंगे, सब आभूषणों से सुशोभित होंगे।"

श्लोक 28 (skanda.5.74.28)

एवं लब्धवरो ढुंढः प्रांजलिः पुनरब्रवीत्। मन्नाम्ना प्रथितं लिंगं संभूयाद्भुवने सदा

evaṁ labdhavaro ḍhuṁḍhaḥ prāṁjaliḥ punarabravīt| mannāmnā prathitaṁ liṁgaṁ saṁbhūyādbhuvane sadā

इस प्रकार वर पाकर ढुंढ ने अंजलि जोड़कर पुनः कहा — "मेरे नाम से यह लिंग सदा जगत में विख्यात हो।"

श्लोक 29 (skanda.5.74.29)

एवमस्त्विति लिंगेन प्रोक्तं तुष्टेन पार्वति। तदाप्रभृति विख्यातो देवो ढुंढेश्वरः परः

evamastviti liṁgena proktaṁ tuṣṭena pārvati| tadāprabhṛti vikhyāto devo ḍhuṁḍheśvaraḥ paraḥ

लिंग ने प्रसन्न होकर कहा, "ऐसा ही हो", हे पार्वती — तभी से वह परम देव ढुंढेश्वर के नाम से विख्यात हुआ।

श्लोक 30 (skanda.5.74.30)

यस्य दर्शनमात्रेण सदा सिद्धिर्भवेन्नृणाम्

yasya darśanamātreṇa sadā siddhirbhavennṛṇām

जिसके दर्शनमात्र से मनुष्यों को सदा सिद्धि प्राप्त होती है।

श्लोक 31 (skanda.5.74.31)

भक्त्या ये पूजयिष्यंति देवं ढुंढेश्वरं परम्। आजन्मप्रभवं पापं तेषां यास्यति तत्क्षणात्

bhaktyā ye pūjayiṣyaṁti devaṁ ḍhuṁḍheśvaraṁ param| ājanmaprabhavaṁ pāpaṁ teṣāṁ yāsyati tatkṣaṇāt

जो भक्तिपूर्वक परम देव ढुंढेश्वर की पूजा करेंगे, उनका जन्म से उत्पन्न पाप उसी क्षण नष्ट हो जाएगा।

श्लोक 32 (skanda.5.74.32)

स एव सुकृती लोके स एव मम वल्लभः। यः पश्यति नरो भक्त्या लिंगं ढुंढेश्वरं परम्

sa eva sukṛtī loke sa eva mama vallabhaḥ| yaḥ paśyati naro bhaktyā liṁgaṁ ḍhuṁḍheśvaraṁ param

वही संसार में सुकृती है, वही मुझे प्रिय है, जो मनुष्य भक्तिपूर्वक परम लिंग ढुंढेश्वर का दर्शन करता है।

श्लोक 33 (skanda.5.74.33)

राजसूयशतेनैव यत्पुण्यं च भविष्यति। ततो भविष्यत्यधिकं ढुंढेश्वरनिरीक्षणात्

rājasūyaśatenaiva yatpuṇyaṁ ca bhaviṣyati| tato bhaviṣyatyadhikaṁ ḍhuṁḍheśvaranirīkṣaṇāt

सौ राजसूय यज्ञों से जो पुण्य प्राप्त होगा, उससे भी अधिक ढुंढेश्वर के दर्शन से प्राप्त होगा।

श्लोक 34 (skanda.5.74.34)

मानसं वाचिकं वापि कायिकं गुह्यसंभवम्। प्रकाशं वाऽप्रकाशं च प्रसंगादपि यत्कृतम्। तत्सर्वं यास्यति क्षिप्रं ढुंढेश्वरस्य दर्शनात्

mānasaṁ vācikaṁ vāpi kāyikaṁ guhyasaṁbhavam| prakāśaṁ vā'prakāśaṁ ca prasaṁgādapi yatkṛtam| tatsarvaṁ yāsyati kṣipraṁ ḍhuṁḍheśvarasya darśanāt

मानसिक, वाचिक अथवा शारीरिक, गुप्त रूप से हुआ, प्रकट अथवा अप्रकट, प्रसंगवश भी किया गया जो भी पाप हो — वह सब ढुंढेश्वर के दर्शन से शीघ्र नष्ट हो जाता है।

श्लोक 35 (skanda.5.74.35)

इत्युक्तस्तु मया देवि स ढुंढो गणनायकः। कृतो लिंगस्य माहात्म्याद्गतो लोके मदीयके। रेजे च गणपैः सार्द्धं ममाभीष्टतरोऽभवत्

ityuktastu mayā devi sa ḍhuṁḍho gaṇanāyakaḥ| kṛto liṁgasya māhātmyādgato loke madīyake| reje ca gaṇapaiḥ sārddhaṁ mamābhīṣṭataro'bhavat

हे देवी, मेरे ऐसा कहने पर वह गणनायक ढुंढ, लिंग की महिमा से मेरे लोक को गया; गणपतियों के साथ शोभित हुआ और मुझे अत्यंत प्रिय हो गया।

श्लोक 36 (skanda.5.74.36)

एष ते कथितो देवि प्रभावः पापनाशनः। श्रवणात्कीर्त्तनाद्वापि मम लोके महीयते

eṣa te kathito devi prabhāvaḥ pāpanāśanaḥ| śravaṇātkīrttanādvāpi mama loke mahīyate

हे देवी, यह पापनाशक प्रभाव मैंने तुम्हें बताया; इसे सुनने अथवा कीर्तन करने मात्र से मनुष्य मेरे लोक में महिमामंडित होता है।

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