अवन्ती खण्ड · अध्याय 88
अप्सरेश्वर माहात्म्य
श्लोक 1 (skanda.5.88.1)
ईश्वर उवाच। देवं सप्तदशं विद्धि विख्यातमप्सरेश्वरम्। यस्य दर्शनमात्रेण लोकोऽभीष्टानवाप्नुयात्
īśvara uvāca| devaṁ saptadaśaṁ viddhi vikhyātamapsareśvaram| yasya darśanamātreṇa loko'bhīṣṭānavāpnuyāt
ईश्वर बोले — सत्रहवें देव को विख्यात अप्सरेश्वर जानो; जिसके दर्शनमात्र से लोक अभीष्ट वस्तुओं को प्राप्त करता है।
श्लोक 2 (skanda.5.88.2)
नंदनाख्ये वने देवि सर्वकामसमन्विते। सिद्धचारणगंधर्वकिंनरोद्गीतनादिते
naṁdanākhye vane devi sarvakāmasamanvite| siddhacāraṇagaṁdharvakiṁnarodgītanādite
हे देवी, सब कामनाओं से युक्त नंदन नामक वन में, जो सिद्ध, चारण, गंधर्व और किन्नरों के गीत-नाद से गूँजता था —
श्लोक 3 (skanda.5.88.3)
शुककोकिलचक्राह्वचकोरकुररावृते। दिव्यलोकोपमस्थाने त्रिविष्टपवि भूषणे
śukakokilacakrāhvacakorakurarāvṛte| divyalokopamasthāne triviṣṭapavi bhūṣaṇe
— शुक, कोकिल, चक्रवाक, चकोर और कुरर पक्षियों से व्याप्त, दिव्यलोक के समान उस स्थान में, जो त्रिविष्टप का आभूषण था —
श्लोक 4 (skanda.5.88.4)
तत्रोपविष्टो वृत्रारिः सुरज्येष्ठश्च सेवितः। ननर्त्त रंभा तस्याग्रे नृत्यभावान्विवृण्वती
tatropaviṣṭo vṛtrāriḥ surajyeṣṭhaśca sevitaḥ| nanartta raṁbhā tasyāgre nṛtyabhāvānvivṛṇvatī
— वहाँ बैठे हुए, देवश्रेष्ठों द्वारा सेवित वृत्रारि (इंद्र) के सम्मुख रंभा नृत्य-भावों को प्रकट करती हुई नृत्य कर रही थी।
श्लोक 5 (skanda.5.88.5)
ततोन्यचित्ता संजाता किंचित्स्मृत्वा प्रमादतः। लयतालविहीना च दृष्टा वै वासवेन सा
tatonyacittā saṁjātā kiṁcitsmṛtvā pramādataḥ| layatālavihīnā ca dṛṣṭā vai vāsavena sā
फिर, प्रमादवश किसी बात का स्मरण होने से उसका चित्त अन्यत्र चला गया, और वासव ने उसे लय-ताल से रहित देखा।
श्लोक 6 (skanda.5.88.6)
चुकोप च सुरश्रेष्ठस्तस्याः शापं ददौ किल। विस्मृतिर्मानुषं कर्म न दिव्यं क्वापि दृश्यते
cukopa ca suraśreṣṭhastasyāḥ śāpaṁ dadau kila| vismṛtirmānuṣaṁ karma na divyaṁ kvāpi dṛśyate
उस देवश्रेष्ठ ने क्रुद्ध होकर उसे शाप दे दिया — "विस्मृति मनुष्य का कर्म है, दिव्य लोक में कहीं भी नहीं देखी जाती।"
श्लोक 7 (skanda.5.88.7)
तस्मात्तु मानुषे लोके गच्छ त्वं निष्प्रभा सती। अथेंद्रकोपसंक्षोभात्पतिता भुवि साप्सराः
tasmāttu mānuṣe loke gaccha tvaṁ niṣprabhā satī| atheṁdrakopasaṁkṣobhātpatitā bhuvi sāpsarāḥ
"इसलिए निष्प्रभ होकर मनुष्यलोक में चली जाओ।" इंद्र के क्रोध से क्षुब्ध होकर वह अप्सरा पृथ्वी पर गिर पड़ी।
श्लोक 8 (skanda.5.88.8)
निश्चेष्टा विकलीभूता रुदती विस्वरं बहु। करुणं विलपंती च किं मया दुष्कृतं कृतम्
niśceṣṭā vikalībhūtā rudatī visvaraṁ bahu| karuṇaṁ vilapaṁtī ca kiṁ mayā duṣkṛtaṁ kṛtam
चेष्टाहीन, विकल, अत्यंत विस्वर रुदन करती और करुण विलाप करती हुई वह बोली — "मैंने ऐसा कौन-सा दुष्कर्म किया?"
श्लोक 9 (skanda.5.88.9)
निर्मलं न तपस्तप्तं कथं नाराधितः सुरः। अथाप्सरोगणः सर्वः सखीगण समन्वितः
nirmalaṁ na tapastaptaṁ kathaṁ nārādhitaḥ suraḥ| athāpsarogaṇaḥ sarvaḥ sakhīgaṇa samanvitaḥ
"मैंने निर्मल तप नहीं किया, देवता की आराधना क्यों नहीं की?" तब सखियों सहित समस्त अप्सरागण —
श्लोक 10 (skanda.5.88.10)
रंभा यत्रैव पतिता समायातो वरानने। तस्याः शोकाग्निदाहेन संतप्तोऽप्सरसां गणः
raṁbhā yatraiva patitā samāyāto varānane| tasyāḥ śokāgnidāhena saṁtapto'psarasāṁ gaṇaḥ
— हे वरानने, जहाँ रंभा गिरी थी, वहाँ आया; उसके शोक की अग्नि की दाह से समस्त अप्सराओं का समूह संतप्त हो गया।
श्लोक 11 (skanda.5.88.11)
सुसुप्ता पद्मिनी साभ्रे यथा नैव विराजते। तथा शापेन विध्वस्ता रंभा नो राजते सदा
susuptā padminī sābhre yathā naiva virājate| tathā śāpena vidhvastā raṁbhā no rājate sadā
जैसे बादलों से घिरी सोई हुई कमलिनी शोभा नहीं पाती, वैसे ही शाप से विध्वस्त रंभा सदा शोभाहीन हो गई।
श्लोक 12 (skanda.5.88.12)
सखीगणैः परिवृता रंभा दृष्टा वरानने। देवर्षिणा नारदेन विस्मितेनांतरात्मना
sakhīgaṇaiḥ parivṛtā raṁbhā dṛṣṭā varānane| devarṣiṇā nāradena vismitenāṁtarātmanā
हे वरानने, सखियों से घिरी रंभा को देवर्षि नारद ने देखा, और उनकी आत्मा विस्मय से भर गई।
श्लोक 13 (skanda.5.88.13)
कस्मादप्सरसः सद्यो दृश्यंते शोकविह्वलाः। कस्माच्च करुणं रंभा रोदित्येषा मुहुर्मुहुः
kasmādapsarasaḥ sadyo dṛśyaṁte śokavihvalāḥ| kasmācca karuṇaṁ raṁbhā rodityeṣā muhurmuhuḥ
"क्यों ये अप्सराएँ अचानक शोकविह्वल दिखाई दे रही हैं? और यह रंभा बार-बार क्यों करुण रुदन कर रही है?"
श्लोक 14 (skanda.5.88.14)
पप्रच्छ च समागत्य कस्मादप्सरसो वराः। विषण्णवदना दीनाः कथ्यतां मम सादरम्
papraccha ca samāgatya kasmādapsaraso varāḥ| viṣaṇṇavadanā dīnāḥ kathyatāṁ mama sādaram
उन्होंने पास आकर पूछा — "हे श्रेष्ठ अप्सराओ, तुम विषण्ण मुख और दीन क्यों हो? मुझे आदरपूर्वक बताओ।"
श्लोक 15 (skanda.5.88.15)
वृत्तांतं कथयामासुस्ताश्च तस्मै पुरातनम्। श्रुत्वा च नारदस्तत्र ध्यानासक्तोऽभवन्मुनिः
vṛttāṁtaṁ kathayāmāsustāśca tasmai purātanam| śrutvā ca nāradastatra dhyānāsakto'bhavanmuniḥ
उन्होंने उस पूर्ववृत्तांत को उनसे कह सुनाया; उसे सुनकर मुनि नारद वहाँ ध्यानमग्न हो गए।
श्लोक 16 (skanda.5.88.16)
उपायं कथयामास हितं तासां प्रयत्नतः। गच्छंत्वप्सरसः सर्वा महाकालवनोत्तमे
upāyaṁ kathayāmāsa hitaṁ tāsāṁ prayatnataḥ| gacchaṁtvapsarasaḥ sarvā mahākālavanottame
उन्होंने यत्नपूर्वक उनके हित का उपाय बताया — "सब अप्सराएँ उत्तम महाकालवन को जाएँ —"
श्लोक 17 (skanda.5.88.17)
आराधयध्वं देवेशं लिंगं सर्वार्थसाधकम्। पृच्छादेव्यास्तु पुरतः पुरा कल्पे प्रपूजितम्
ārādhayadhvaṁ deveśaṁ liṁgaṁ sarvārthasādhakam| pṛcchādevyāstu purataḥ purā kalpe prapūjitam
"— वहाँ देवेश की, सर्व-अर्थ-साधक लिंग की आराधना करो, जो पूर्वकल्प में देवी प्रश्न से पहले भी पूजित था।"
श्लोक 18 (skanda.5.88.18)
उर्वश्या मम वाक्येन भर्ता प्राप्तः पुरूरवाः। नारदस्य वचः श्रुत्वा समाजग्मुर्गणास्तथा
urvaśyā mama vākyena bhartā prāptaḥ purūravāḥ| nāradasya vacaḥ śrutvā samājagmurgaṇāstathā
"मेरे ही वचन से उर्वशी को पति पुरुरवा प्राप्त हुए थे।" नारद का यह वचन सुनकर वे सब अप्सरागण वहाँ एकत्र हुईं —
श्लोक 19 (skanda.5.88.19)
महाकालवने रम्ये लिंगाराधनकाम्यया। ततस्तुष्टः स्वयं रुद्रस्तासां भक्त्या वरं ददौ
mahākālavane ramye liṁgārādhanakāmyayā| tatastuṣṭaḥ svayaṁ rudrastāsāṁ bhaktyā varaṁ dadau
— रमणीय महाकालवन में लिंग की आराधना की कामना से; तब स्वयं रुद्र उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर वर दिया।
श्लोक 20 (skanda.5.88.20)
रंभे प्राप्स्यसि सौभाग्यं स्वर्गलोकं यशस्विनि। भविष्यसि महाभागे जिष्णोस्त्वं वल्लभा धुवम्
raṁbhe prāpsyasi saubhāgyaṁ svargalokaṁ yaśasvini| bhaviṣyasi mahābhāge jiṣṇostvaṁ vallabhā dhuvam
"हे रंभा, तुम सौभाग्य और स्वर्गलोक प्राप्त करोगी, हे यशस्विनी; हे महाभागे, तुम निश्चय ही जिष्णु (अर्जुन/इंद्र) की प्रिया बनोगी।"
श्लोक 21 (skanda.5.88.21)
तस्मात्त्रिविष्टपं गच्छ संघेनानेन पूजिता। आराधितोऽप्सरोभिश्च पुरा स्वर्गार्थकाम्यया। अतोप्सरेश्वरः ख्यातो ययौ ख्यातिं जगत्त्रये
tasmāttriviṣṭapaṁ gaccha saṁghenānena pūjitā| ārādhito'psarobhiśca purā svargārthakāmyayā| atopsareśvaraḥ khyāto yayau khyātiṁ jagattraye
"अतः इस समूह द्वारा पूजित होकर त्रिविष्टप को जाओ।" पूर्वकाल में अप्सराओं द्वारा स्वर्ग-प्राप्ति की कामना से आराधित होने के कारण यह लिंग अप्सरेश्वर नाम से विख्यात होकर त्रिभुवन में ख्याति को प्राप्त हुआ।
श्लोक 22 (skanda.5.88.22)
ये समाराधयिष्यंति भक्त्या चाप्सरसेश्वरम्। ते सर्वकामसंपूर्णा भविष्यंति युगेयुगे
ye samārādhayiṣyaṁti bhaktyā cāpsaraseśvaram| te sarvakāmasaṁpūrṇā bhaviṣyaṁti yugeyuge
जो भक्तिपूर्वक अप्सरेश्वर की आराधना करेंगे, वे युग-युग में सब कामनाओं से पूर्ण होंगे।
श्लोक 23 (skanda.5.88.23)
प्रेरयिष्यंति ये लोके दर्शनार्थं यशस्विनि। स्थानभ्रंशो वियोगश्च तेषां स्वप्ने न जायते
prerayiṣyaṁti ye loke darśanārthaṁ yaśasvini| sthānabhraṁśo viyogaśca teṣāṁ svapne na jāyate
हे यशस्विनी, जो लोक में दूसरों को भी दर्शन के लिए प्रेरित करेंगे, उनके लिए स्थानभ्रंश और वियोग स्वप्न में भी नहीं होता।
श्लोक 24 (skanda.5.88.24)
किं दानैः किं तपोभिश्च किं यज्ञैर्बहुदक्षिणैः। स्पर्शनाल्लभते राज्यं स्वर्गं मोक्षं क्रमेण तु
kiṁ dānaiḥ kiṁ tapobhiśca kiṁ yajñairbahudakṣiṇaiḥ| sparśanāllabhate rājyaṁ svargaṁ mokṣaṁ krameṇa tu
दानों से क्या, तप से क्या, बहुदक्षिणा वाले यज्ञों से क्या? इसके स्पर्श मात्र से मनुष्य क्रमशः राज्य, स्वर्ग और मोक्ष प्राप्त करता है।
श्लोक 25 (skanda.5.88.25)
एष ते कथितो देवि प्रभावः पापनाशनः। अप्सरेश्वरदेवस्य श्रूयतां कल्कलेश्वरः
eṣa te kathito devi prabhāvaḥ pāpanāśanaḥ| apsareśvaradevasya śrūyatāṁ kalkaleśvaraḥ
हे देवी, यह मैंने तुम्हें अप्सरेश्वर देव का पापनाशक प्रभाव बताया; अब कल्कलेश्वर के विषय में सुनो।