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अवन्ती खण्ड · अध्याय 89

कलकलेश्वर की महिमा

अध्याय 88अध्याय-सूचीअध्याय 90

श्लोक 1 (skanda.5.89.1)

श्रीशिव उवाच। देवमष्टादशं विद्धि ख्यातं कलकलेश्वरम्। यस्य दर्शनमात्रेण कलहो नैव जायते

śrīśiva uvāca| devamaṣṭādaśaṁ viddhi khyātaṁ kalakaleśvaram| yasya darśanamātreṇa kalaho naiva jāyate

श्री शिव ने कहा — हे देवी! अठारहवें देव को जानो, जो कलकलेश्वर के नाम से विख्यात हैं, जिनके दर्शनमात्र से कलह कभी उत्पन्न नहीं होता।

श्लोक 2 (skanda.5.89.2)

सर्वदुःखोपशमनं सर्वपाप प्रमोचनम्। व्याधिसर्पाग्निचौराणां शमनं वांछितप्रदम्

sarvaduḥkhopaśamanaṁ sarvapāpa pramocanam| vyādhisarpāgnicaurāṇāṁ śamanaṁ vāṁchitapradam

वे सभी दुःखों को शांत करने वाले तथा सभी पापों से मुक्त करने वाले हैं; वे व्याधि, सर्प, अग्नि और चोरों के भय को शमन करने वाले तथा इच्छित वर देने वाले हैं।

श्लोक 3 (skanda.5.89.3)

मम देवि त्वया सार्द्धं कलहः समपद्यत। पुरा विस्तरतो वच्मि शृण्वेकाग्रमनाः शुभे

mama devi tvayā sārddhaṁ kalahaḥ samapadyata| purā vistarato vacmi śṛṇvekāgramanāḥ śubhe

हे देवी! मेरे और तुम्हारे बीच पूर्वकाल में एक कलह हुआ था; मैं वह विस्तार से कहता हूँ, हे शुभे! एकाग्रचित्त होकर सुनो।

श्लोक 4 (skanda.5.89.4)

यदा त्वं हिमशैलस्य दुहिता वरवर्णिनि। तदा विवाहितं कांते यथोक्तविधिना मया

yadā tvaṁ himaśailasya duhitā varavarṇini| tadā vivāhitaṁ kāṁte yathoktavidhinā mayā

हे वरवर्णिनि! जब तुम हिमालय की पुत्री थीं, तब हे कांते! विधिपूर्वक तुम्हारा विवाह मैंने किया।

श्लोक 5 (skanda.5.89.5)

विनिवृत्ते विवाहे च त्वया सार्द्धं वरानने। महाकालीति नाम्ना वै वर्णेनापि च तादृशी

vinivṛtte vivāhe ca tvayā sārddhaṁ varānane| mahākālīti nāmnā vai varṇenāpi ca tādṛśī

हे वरानने! विवाह संपन्न होने के पश्चात् तुम्हीं महाकाली नाम से तथा उसी वर्ण (श्याम रंग) से जानी गईं।

श्लोक 6 (skanda.5.89.6)

नीलोत्पलनिभप्रख्या नीलकुंचितमूर्द्धजा। अप्येकस्मिंस्तदा त्वं हि मातॄणां मंडपे शुभे। मध्ये समुपविष्टासि कृष्णांजनसमप्रभा

nīlotpalanibhaprakhyā nīlakuṁcitamūrddhajā| apyekasmiṁstadā tvaṁ hi mātṝṇāṁ maṁḍape śubhe| madhye samupaviṣṭāsi kṛṣṇāṁjanasamaprabhā

नीलकमल के समान श्यामवर्णा, नीले घुँघराले केशों वाली — एक बार मातृमंडप के मध्य में बैठी तुम काले अंजन के समान कांतिमयी दिखाई देती थीं।

श्लोक 7 (skanda.5.89.7)

कालि सुंदरि मत्पार्श्वे वल्लभे त्वमुपाविश। शरीरे मम तन्वंगि सिते भास्यसितद्युतिः

kāli suṁdari matpārśve vallabhe tvamupāviśa| śarīre mama tanvaṁgi site bhāsyasitadyutiḥ

मैंने कहा — हे कालि! हे सुंदरि! हे वल्लभे! मेरे पास आकर बैठो; हे तन्वंगि! मेरे श्वेत शरीर पर तुम्हारी श्याम कांति और भी शोभा पाएगी।

श्लोक 8 (skanda.5.89.8)

भुजंगीवासिता शुभ्रे संश्लिष्टा चंदने तरौ। रजनीवासिते पक्षे दृष्टिदोषहरासि मे

bhujaṁgīvāsitā śubhre saṁśliṣṭā caṁdane tarau| rajanīvāsite pakṣe dṛṣṭidoṣaharāsi me

जैसे सर्पिणी श्वेत चंदन वृक्ष से लिपटी हो, अथवा जैसे शुक्ल पक्ष में कृष्ण रात्रि हो — हे भास्वति! उसी प्रकार तुम मेरी दृष्टि के दोष (बुरी नज़र) को दूर करने वाली हो।

श्लोक 9 (skanda.5.89.9)

इत्युक्तासि मया देवि गिरिजे चारुहासिनि। तदा प्रोक्तं त्वया वाक्यं मामुद्दिश्य सगद्गदम्

ityuktāsi mayā devi girije cāruhāsini| tadā proktaṁ tvayā vākyaṁ māmuddiśya sagadgadam

हे गिरिजे! हे मधुरहासिनि! मैंने तुमसे ऐसा कहा; तब गद्गद होकर तुमने मुझसे यह वचन कहा।

श्लोक 10 (skanda.5.89.10)

यदा त्वया मदर्थे हि प्रेरिता वेदपारगाः। सप्तर्षयो महाभागाः किंकृते न तदात्थ माम्

yadā tvayā madarthe hi preritā vedapāragāḥ| saptarṣayo mahābhāgāḥ kiṁkṛte na tadāttha mām

'जब तुमने मेरे लिए वेदपारंगत महाभाग्यशाली सप्तर्षियों को भेजा था, तब हे काली (मुझे संबोधित करते हुए स्वयं को), तुमने ये (प्रशंसा के वचन) मुझसे क्यों नहीं कहे?'

श्लोक 11 (skanda.5.89.11)

तदा त्वया मदर्थेऽपि प्रार्थितो जनको मम। हिमाद्रिराजो यत्नेन किं काली न तदात्थ माम्

tadā tvayā madarthe'pi prārthito janako mama| himādrirājo yatnena kiṁ kālī na tadāttha mām

'तब भी मेरे लिए तुमने प्रयत्नपूर्वक मेरे पिता हिमाद्रिराज से प्रार्थना की थी — फिर उस समय तुमने मुझसे यह क्यों नहीं कहा?'

श्लोक 12 (skanda.5.89.12)

यदाप्युक्तं त्वया दैन्यान्मदर्थे गच्छ नारद। प्रार्थ्यतां पार्वती शीघ्रं किं काली न तदात्थ माम्

yadāpyuktaṁ tvayā dainyānmadarthe gaccha nārada| prārthyatāṁ pārvatī śīghraṁ kiṁ kālī na tadāttha mām

'जब दीनतापूर्वक तुमने कहा था — हे नारद! मेरे लिए जाओ, शीघ्र पार्वती से प्रार्थना करो — तब तुमने मुझसे यह क्यों नहीं कहा?'

श्लोक 13 (skanda.5.89.13)

सत्येयं लौकिकी गाथा न वृथा परिजायते। स्वकृतेन जनः सर्वो जाड्येन परि भूयते

satyeyaṁ laukikī gāthā na vṛthā parijāyate| svakṛtena janaḥ sarvo jāḍyena pari bhūyate

'यह लोकोक्ति सत्य है, व्यर्थ नहीं कही जाती — प्रत्येक व्यक्ति अपने ही किए से मूढ़ता को प्राप्त होता है।'

श्लोक 14 (skanda.5.89.14)

अवश्यमर्थी प्राप्नोति खंडनां तुंडमुंडनाम्। तपोतिदीर्घचारैर्तयत्त्वां प्रार्थितवत्यहम्

avaśyamarthī prāpnoti khaṁḍanāṁ tuṁḍamuṁḍanām| tapotidīrghacārairtayattvāṁ prārthitavatyaham

'याचक को अनिवार्यतः तिरस्कार ही प्राप्त होता है — फिर भी अत्यंत दीर्घ तप-चरणों (कठिन प्रयत्नों) से मैंने तुम्हें चाहा।'

श्लोक 15 (skanda.5.89.15)

तस्या मे नियतस्त्वेष ह्यवमानः पदेपदे। नैवास्मि कुटिला रौद्रा विषमा न च धूर्जटे

tasyā me niyatastveṣa hyavamānaḥ padepade| naivāsmi kuṭilā raudrā viṣamā na ca dhūrjaṭe

'हे धूर्जटे! मेरे प्रति यह अपमान पग-पग पर सदा से नियत है; तथापि मैं न तो कुटिल हूँ, न रौद्र, न विषम।'

श्लोक 16 (skanda.5.89.16)

नाकुलीना वृथाचारा न दुष्टा न समत्सरा। सविषस्त्वं यतः ख्यातो व्यक्तं दोषा कराश्रयः

nākulīnā vṛthācārā na duṣṭā na samatsarā| saviṣastvaṁ yataḥ khyāto vyaktaṁ doṣā karāśrayaḥ

'न मैं अकुलीन हूँ, न व्यर्थाचारिणी, न दुष्टा, न ईर्ष्यालु — किंतु तुम तो विष से युक्त कहलाते हो; स्पष्ट है कि दोष तुम्हारे ही हाथ (अधिकार) में हैं।'

श्लोक 17 (skanda.5.89.17)

अकुलीनो वृथाचारो मात्सर्येणाश्रितः सदा। नाहं मुष्णामि नयने तत्र हंता त्वमेव च

akulīno vṛthācāro mātsaryeṇāśritaḥ sadā| nāhaṁ muṣṇāmi nayane tatra haṁtā tvameva ca

'तुम्हीं अकुलीन हो, व्यर्थाचारी हो, सदा मात्सर्य के आश्रित हो — मैं किसी की आँखें नहीं छीनती, वहाँ तो विनाश करने वाले तुम्हीं हो।'

श्लोक 18 (skanda.5.89.18)

आदित्यस्त्वां विजानातु भगवान्द्वादशात्मकः। मया नोत्पाटिता दंताः कस्यापि निरपत्रप

ādityastvāṁ vijānātu bhagavāndvādaśātmakaḥ| mayā notpāṭitā daṁtāḥ kasyāpi nirapatrapa

'हे निर्लज्ज! द्वादश रूपधारी भगवान् आदित्य तुम्हें भली-भाँति जानते हैं — मैंने किसी के दाँत नहीं उखाड़े।'

श्लोक 19 (skanda.5.89.19)

पूषादेवो विजानाति द्वादशात्मा दिवाकरः। मूर्ध्नि शूलं तव यतः स्वैदोषैर्मामधिक्षिपः

pūṣādevo vijānāti dvādaśātmā divākaraḥ| mūrdhni śūlaṁ tava yataḥ svaidoṣairmāmadhikṣipaḥ

'द्वादशात्मा दिवाकर पूषादेव भली-भाँति जानते हैं — तुम्हारे ही सिर पर शूल है, क्योंकि अपने ही दोषों के कारण तुम मुझ पर आक्षेप करते हो।'

श्लोक 20 (skanda.5.89.20)

यत्तु मामाह कृष्णेति महाकालेति विश्रुतः। इत्यथापि प्रवादोऽयं प्रवरः ख्यामि ते हर

yattu māmāha kṛṣṇeti mahākāleti viśrutaḥ| ityathāpi pravādo'yaṁ pravaraḥ khyāmi te hara

'तुम जो मुझे कृष्णा और महाकाली के नाम से पुकारते हो — यह तो मात्र एक प्रवाद है; हे हर! मैं तुम्हें उसका श्रेष्ठ (वास्तविक) अर्थ बताती हूँ।'

श्लोक 21 (skanda.5.89.21)

निदर्शनार्थं न द्वेषाच्छ्रुत्वा तं क्षंतुमर्हसि। विरूपो यावदादर्शे नात्मनः पश्यते मुखम्

nidarśanārthaṁ na dveṣācchrutvā taṁ kṣaṁtumarhasi| virūpo yāvadādarśe nātmanaḥ paśyate mukham

'यह उदाहरण के लिए है, द्वेष से नहीं — इसे सुनकर तुम्हें क्षमा करनी चाहिए। जब तक कुरूप व्यक्ति दर्पण में अपना मुख नहीं देखता...'

श्लोक 22 (skanda.5.89.22)

मन्यते तावदात्मानमन्येभ्यो रूपवत्तमम्। यदा तु मुखमादर्शे विकृतं सोऽभिवीक्षते

manyate tāvadātmānamanyebhyo rūpavattamam| yadā tu mukhamādarśe vikṛtaṁ so'bhivīkṣate

'...तब तक वह स्वयं को दूसरों से अधिक सुंदर मानता रहता है; परंतु जब वह दर्पण में अपना विकृत मुख देख लेता है...'

श्लोक 23 (skanda.5.89.23)

तदेतरं विजानाति ह्यात्मानं नेतरं जनम्। सत्यधर्मच्युतात्पुंसः क्षुद्रादाशीविषादिव

tadetaraṁ vijānāti hyātmānaṁ netaraṁ janam| satyadharmacyutātpuṁsaḥ kṣudrādāśīviṣādiva

'...तब वह अपने को औरों से भिन्न जान लेता है। सत्य और धर्म से च्युत पुरुष से लोग वैसे ही दूर हटते हैं जैसे किसी क्षुद्र विषैले सर्प से।'

श्लोक 24 (skanda.5.89.24)

स नास्तिकोप्युद्विजते जनः किं पुनरास्तिकः। इत्युक्तोऽहं त्वया देवि मया कोलाहलः कृतः

sa nāstikopyudvijate janaḥ kiṁ punarāstikaḥ| ityukto'haṁ tvayā devi mayā kolāhalaḥ kṛtaḥ

'ऐसे पुरुष से नास्तिक भी घबराता है, फिर आस्तिक की तो बात ही क्या!' — हे देवी! तुमने मुझसे ऐसा कहा, और मैंने कोलाहल मचा दिया।

श्लोक 25 (skanda.5.89.25)

अनात्मज्ञासि गिरिजे मृडे पंडितमानिनि। सत्यं सर्वैरवयवैः स्तुतोऽपि सदृशः पितुः

anātmajñāsi girije mṛḍe paṁḍitamānini| satyaṁ sarvairavayavaiḥ stuto'pi sadṛśaḥ pituḥ

मैंने कहा — 'हे गिरिजे! हे मृडे! स्वयं को पंडित मानने वाली तुम अपने को नहीं जानतीं। सत्य तो यह है कि सब अंगों से प्रशंसित होकर भी संतान पिता के ही सदृश होती है...'

श्लोक 26 (skanda.5.89.26)

काठिन्यं कष्टमभ्येति धातुभ्यो बहुघातिता। कुटिलत्वं च सर्वेभ्योऽसेव्यत्वं च हिमादिव

kāṭhinyaṁ kaṣṭamabhyeti dhātubhyo bahughātitā| kuṭilatvaṁ ca sarvebhyo'sevyatvaṁ ca himādiva

'...कठोरता धातुओं (पत्थरों) से कष्टपूर्वक आती है, बार-बार आघात सहने से क्रूरता आती है; और कुटिलता तथा असेव्यता (दुर्गम्यता) हिम (हिमालय) से आती है — वैसे ही तुम भी अपने पिता के दोषों को धारण करती हो।'

श्लोक 27 (skanda.5.89.27)

इत्युक्ताऽसि मया देवि पुनः प्रोक्तं त्वया वचः। तथापि दुष्टसंसर्गात्संक्रांतं सर्वमेव हि

ityuktā'si mayā devi punaḥ proktaṁ tvayā vacaḥ| tathāpi duṣṭasaṁsargātsaṁkrāṁtaṁ sarvameva hi

हे देवी! मैंने तुमसे ऐसा कहा; तब तुमने पुनः यह वचन कहा — 'फिर भी, दुष्ट संसर्ग से ही तो सब दोष संक्रमित होते हैं।'

श्लोक 28 (skanda.5.89.28)

व्यालेभ्योऽनेकजिह्वत्वं भस्मतः स्नेहवर्जनम्। हृत्कालुष्यं शशांकाद्वै दुर्बोधत्वं वृषादपि

vyālebhyo'nekajihvatvaṁ bhasmataḥ snehavarjanam| hṛtkāluṣyaṁ śaśāṁkādvai durbodhatvaṁ vṛṣādapi

'सर्पों से बहुजिह्वता (कपट), भस्म से स्नेहहीनता, चंद्रमा से हृदय की मलिनता, और वृषभ से दुर्बोधता (जड़ता) — ये सब तुमने ही ग्रहण की हैं।'

श्लोक 29 (skanda.5.89.29)

श्मशानवासाद्भीरुत्वं नग्नत्वं च न लज्जया। निर्घृणत्वं कपालाच्च दया ते विगता चिरम्

śmaśānavāsādbhīrutvaṁ nagnatvaṁ ca na lajjayā| nirghṛṇatvaṁ kapālācca dayā te vigatā ciram

'श्मशान में वास से भयंकरता, निर्लज्जतापूर्वक नग्नता, और कपाल से निर्दयता — तुम्हारी करुणा तो बहुत पहले ही जाती रही है।'

श्लोक 30 (skanda.5.89.30)

एवं तदाभवद्रौद्रः कलहो भयकृच्छुभे। एवं प्रवृत्ते तु तदा कंपितं भुवनत्रयम्

evaṁ tadābhavadraudraḥ kalaho bhayakṛcchubhe| evaṁ pravṛtte tu tadā kaṁpitaṁ bhuvanatrayam

हे शुभे! इस प्रकार वह भयंकर तथा भयकारी कलह हुआ; और ऐसा होते ही तीनों लोक कंपित हो उठे।

श्लोक 31 (skanda.5.89.31)

भीताश्च देवगंधर्वा यक्षगंधर्वराक्षसाः। तस्मात्कोलाहलो भूमिं भित्त्वा लिंगमभूत्तदा

bhītāśca devagaṁdharvā yakṣagaṁdharvarākṣasāḥ| tasmātkolāhalo bhūmiṁ bhittvā liṁgamabhūttadā

देवगण, गंधर्व, यक्ष और राक्षस भयभीत हो उठे; और उसी कोलाहल से पृथ्वी को विदीर्ण कर एक लिंग प्रकट हुआ।

श्लोक 32 (skanda.5.89.32)

लिंगमध्यात्समुत्पन्ना वाणी सुखकरी शुभा। आश्वासयंती देवान्वै त्रैलोक्यं सचराचरम्

liṁgamadhyātsamutpannā vāṇī sukhakarī śubhā| āśvāsayaṁtī devānvai trailokyaṁ sacarācaram

उस लिंग के मध्य से एक सुखद और मंगलमयी वाणी प्रकट हुई, जो देवताओं को तथा चराचरयुक्त त्रैलोक्य को आश्वासन देने लगी।

श्लोक 33 (skanda.5.89.33)

नामास्य चक्रुर्देवेशास्तदा कलकलेश्वरम्। स्वरनामासौ ततोऽभूच्छङ्करो भुवि विश्रुतः

nāmāsya cakrurdeveśāstadā kalakaleśvaram| svaranāmāsau tato'bhūcchaṅkaro bhuvi viśrutaḥ

देवेशों ने तब इसका नाम कलकलेश्वर रखा; उसी ध्वनि-जनित नाम से यह शंकर पृथ्वी पर विख्यात हुए।

श्लोक 34 (skanda.5.89.34)

यस्तमर्चयते भक्त्या देवं कलकलेश्वरम्। न राक्षसाः पिशाचाश्च न भूता न विनायकाः। विप्रं कुर्युर्वरारोहे कलहो न भवेद्गृहे

yastamarcayate bhaktyā devaṁ kalakaleśvaram| na rākṣasāḥ piśācāśca na bhūtā na vināyakāḥ| vipraṁ kuryurvarārohe kalaho na bhavedgṛhe

हे वरारोहे! जो भी भक्तिपूर्वक इस कलकलेश्वर देव की पूजा करता है, उस ब्राह्मण को न राक्षस, न पिशाच, न भूत, न विनायक कष्ट पहुँचा सकते हैं; तथा उसके घर में कभी कलह नहीं होता।

श्लोक 35 (skanda.5.89.35)

सुशीला गृहिणी तस्य सुरूपा सुभगा प्रिये। बहुपुत्रा बहुधना जायते दर्शनात्तथा

suśīlā gṛhiṇī tasya surūpā subhagā priye| bahuputrā bahudhanā jāyate darśanāttathā

हे प्रिये! उस दर्शन के प्रभाव से उसकी गृहिणी सुशील, सुरूपा, सुभगा तथा बहुपुत्रा एवं बहुधना हो जाती है।

श्लोक 36 (skanda.5.89.36)

ये पश्यंति चतुर्द्दश्यां देवं कलकलेश्वरम्। न दुःखं न जराव्याधिर्नाकालमरणं तथा

ye paśyaṁti caturddaśyāṁ devaṁ kalakaleśvaram| na duḥkhaṁ na jarāvyādhirnākālamaraṇaṁ tathā

जो लोग चतुर्दशी को कलकलेश्वर देव का दर्शन करते हैं, उन्हें न दुःख होता है, न बुढ़ापा या रोग, न अकाल मृत्यु।

श्लोक 37 (skanda.5.89.37)

न च शत्रुभयं तेषां जायते गिरिपुत्रके। लोकोऽक्षयो भवेद्देवि यावदिंद्राश्चतुर्द्दश

na ca śatrubhayaṁ teṣāṁ jāyate giriputrake| loko'kṣayo bhaveddevi yāvadiṁdrāścaturddaśa

हे गिरिपुत्रि! उन्हें शत्रु का भय भी नहीं होता; हे देवी! उनका लोक चौदह इंद्रों (एक कल्प) पर्यंत अक्षय रहता है।

श्लोक 38 (skanda.5.89.38)

एष ते कथितो देवि प्रभावः पापनाशनः। यस्य श्रवणमात्रेण क्षेममत्र परत्र च

eṣa te kathito devi prabhāvaḥ pāpanāśanaḥ| yasya śravaṇamātreṇa kṣemamatra paratra ca

हे देवी! तुम्हें यह पापनाशक प्रभाव बताया गया; इसके श्रवणमात्र से इहलोक और परलोक दोनों में कल्याण प्राप्त होता है।

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