अवन्ती खण्ड · अध्याय 91
प्रतीहारेश्वर की महिमा
श्लोक 1 (skanda.5.91.1)
ईश्वर उवाच। प्रतीहारेश्वरं देवि विद्धि विंशतिमं प्रिये। यस्य दर्शनमात्रेण धनवानिह जायते
īśvara uvāca| pratīhāreśvaraṁ devi viddhi viṁśatimaṁ priye| yasya darśanamātreṇa dhanavāniha jāyate
ईश्वर ने कहा — हे प्रिये! बीसवें देव प्रतीहारेश्वर को जानो, जिनके दर्शनमात्र से मनुष्य यहाँ धनवान हो जाता है।
श्लोक 2 (skanda.5.91.2)
दक्षकोपात्त्वं च देवि पुरा प्राणैर्विसर्जितैः। हिमाचले तथा जाता मया प्राप्ता पुनः प्रिये
dakṣakopāttvaṁ ca devi purā prāṇairvisarjitaiḥ| himācale tathā jātā mayā prāptā punaḥ priye
हे देवी! पूर्वकाल में दक्ष के कोप से तुमने प्राणों का त्याग किया था; फिर हिमाचल में उत्पन्न हुई तुम्हें, हे प्रिये! मैंने पुनः प्राप्त किया।
श्लोक 3 (skanda.5.91.3)
प्रारब्धा च मया देवि त्वया सार्द्धं रतिस्तदा। दिव्यं वर्षशतं जातं साग्रं देवि प्रमोदतः। अनुरागवशाच्चैव मन्मथेन प्रपीडिता
prārabdhā ca mayā devi tvayā sārddhaṁ ratistadā| divyaṁ varṣaśataṁ jātaṁ sāgraṁ devi pramodataḥ| anurāgavaśāccaiva manmathena prapīḍitā
हे देवी! तब मैंने तुम्हारे साथ रति-क्रीड़ा आरम्भ की; हर्षपूर्वक सौ से भी अधिक दिव्य वर्ष व्यतीत हो गए, और अनुराग के वशीभूत होकर मैं मन्मथ (काम) से अत्यंत पीड़ित हुआ।
श्लोक 4 (skanda.5.91.4)
महारतिं समीक्ष्याथ देवाः संक्षुब्धमानसाः। चक्रुर्मंत्रं यथाकालं वासवाद्या यथोचितम्
mahāratiṁ samīkṣyātha devāḥ saṁkṣubdhamānasāḥ| cakrurmaṁtraṁ yathākālaṁ vāsavādyā yathocitam
उस महान रति-प्रसंग को देखकर देवगणों का मन क्षुब्ध हो उठा; वासव (इंद्र) आदि ने उचित समय पर उचित मंत्रणा की।
श्लोक 5 (skanda.5.91.5)
दिव्यं वर्षशतं रुद्रो गौर्या सह सदा रतिम्। कुर्वंस्तिष्ठति देवोऽसौ मंदरे चारुकंदरे
divyaṁ varṣaśataṁ rudro gauryā saha sadā ratim| kurvaṁstiṣṭhati devo'sau maṁdare cārukaṁdare
रुद्र देव मंदराचल की सुंदर गुफा में गौरी के साथ सौ दिव्य वर्षों तक निरंतर रति करते हुए स्थित रहे।
श्लोक 6 (skanda.5.91.6)
अनयोर्बीजसंपत्योः पुत्रो यो हि भवेत्तदा। विनश्येत्तेन त्रैलोक्यमखिलं च न संशयः
anayorbījasaṁpatyoḥ putro yo hi bhavettadā| vinaśyettena trailokyamakhilaṁ ca na saṁśayaḥ
यदि इन दोनों के तेज (बीज) के संयोग से कोई पुत्र उत्पन्न हो जाए, तो निश्चय ही उससे सम्पूर्ण त्रिलोक नष्ट हो जाएगा, इसमें संशय नहीं।
श्लोक 7 (skanda.5.91.7)
तस्य तेजोपि नो वोढुं समर्था निश्चितं वयम्। तस्मात्तत्क्रियतां कर्म रतिर्येनो पशाम्यति
tasya tejopi no voḍhuṁ samarthā niścitaṁ vayam| tasmāttatkriyatāṁ karma ratiryeno paśāmyati
'हम निश्चय ही उसके तेज को सहन करने में समर्थ नहीं हैं; अतः वह उपाय किया जाए जिससे यह रति-क्रीड़ा शांत हो जाए।'
श्लोक 8 (skanda.5.91.8)
उपायं दृष्टवांस्तत्र देवानां गुरुरग्रणीः। बृहस्पतिर्महातेजा वेदशास्त्रार्थपारगः
upāyaṁ dṛṣṭavāṁstatra devānāṁ gururagraṇīḥ| bṛhaspatirmahātejā vedaśāstrārthapāragaḥ
वहाँ देवताओं के अग्रणी गुरु, वेदशास्त्रों के अर्थ में पारंगत, महातेजस्वी बृहस्पति ने एक उपाय सोचा।
श्लोक 9 (skanda.5.91.9)
गच्छंतु त्रिदशाः सर्वे शिवस्य तु समीपतः। स्वयं विज्ञाप्यतां देवस्तत्कर्म न करिष्यति
gacchaṁtu tridaśāḥ sarve śivasya tu samīpataḥ| svayaṁ vijñāpyatāṁ devastatkarma na kariṣyati
'सभी देवगण शिव के समीप जाएँ; स्वयं देव को सूचित किया जाए — तब वे उस कार्य को नहीं करेंगे।'
श्लोक 10 (skanda.5.91.10)
इति निश्चित्य ते देवि जग्मुः शीघ्रं सुरास्तदा। मंदराद्रेः शुभे द्वारि स्थितास्ते विस्मयान्विताः
iti niścitya te devi jagmuḥ śīghraṁ surāstadā| maṁdarādreḥ śubhe dvāri sthitāste vismayānvitāḥ
हे देवी! ऐसा निश्चय करके देवगण तुरंत गए, और आश्चर्यचकित होकर वे मंदराचल के शुभ द्वार पर जा खड़े हुए।
श्लोक 11 (skanda.5.91.11)
गणानामधिपो नंदी द्वारि तिष्ठति यत्नतः। त्वया सार्द्धमहं देवि कुर्वंस्तिष्ठामि तां रतिम्
gaṇānāmadhipo naṁdī dvāri tiṣṭhati yatnataḥ| tvayā sārddhamahaṁ devi kurvaṁstiṣṭhāmi tāṁ ratim
गणों के अधिपति नंदी यत्नपूर्वक द्वार पर खड़े रहते हैं — 'हे देवी! तुम्हारे साथ रति करते हुए मैं यहाँ खड़ा हूँ।'
श्लोक 12 (skanda.5.91.12)
अथ प्रवेशो देवानां दुष्करो मम पार्श्वतः। तदा चिंतयमानाश्च तत्र तिष्ठंति ते सुराः
atha praveśo devānāṁ duṣkaro mama pārśvataḥ| tadā ciṁtayamānāśca tatra tiṣṭhaṁti te surāḥ
'तब मेरे रहते देवताओं का प्रवेश दुष्कर है' — ऐसा विचार करते हुए वे देवगण वहीं ठहर गए।
श्लोक 13 (skanda.5.91.13)
अग्निना तद्धितं वाक्यमुक्तं तेषां पुरः शुभम्। हंसरूपं समास्थाय यास्यामि शिवसन्निधौ
agninā taddhitaṁ vākyamuktaṁ teṣāṁ puraḥ śubham| haṁsarūpaṁ samāsthāya yāsyāmi śivasannidhau
उनके समक्ष अग्नि ने यह हितकर और शुभ वचन कहा — 'मैं हंस का रूप धारण करके शिव के समीप जाऊँगा।'
श्लोक 14 (skanda.5.91.14)
वंचयित्वा प्रतीहारं कृतं तेन तथैव च। हंसरूपेण कथितं कर्णे मम शुचिस्मिते
vaṁcayitvā pratīhāraṁ kṛtaṁ tena tathaiva ca| haṁsarūpeṇa kathitaṁ karṇe mama śucismite
प्रतीहार (द्वारपाल नंदी) को छलकर, हे शुचिस्मिते! उसने वैसा ही किया, और हंस का रूप धारण करके मेरे कान में यह बात कही।
श्लोक 15 (skanda.5.91.15)
इन्द्राद्या अमरा देवा द्वारि तिष्ठंति संयताः। श्रुत्वा तस्य च तद्वाक्यं ततोहं द्वारमागतः
indrādyā amarā devā dvāri tiṣṭhaṁti saṁyatāḥ| śrutvā tasya ca tadvākyaṁ tatohaṁ dvāramāgataḥ
'इंद्र आदि अमर देवगण संयमपूर्वक द्वार पर खड़े हैं' — उसका यह वचन सुनकर मैं तब द्वार पर आया।
श्लोक 16 (skanda.5.91.16)
ततश्च तै- कुतो मह्यं प्रणामश्च यथाक्रमम्। मया दृष्टाश्च ते देवा युष्माकं किं करोम्यहम्
tataśca tai- kuto mahyaṁ praṇāmaśca yathākramam| mayā dṛṣṭāśca te devā yuṣmākaṁ kiṁ karomyaham
तत्पश्चात उनके द्वारा यथाक्रम प्रणाम किया गया [मूल संस्कृत पाठ यहाँ खंडित है] — 'मुझे यह प्रणाम किसलिए?' मैंने उन देवताओं को देखा — 'तुम्हारे लिए मैं क्या करूँ?'
श्लोक 17 (skanda.5.91.17)
तैरुक्तं त्यज्यतां चैव संभोगस्तु सुदारुणः। तथा मया कृतं देवि गतास्ते त्रिदिवं पुनः
tairuktaṁ tyajyatāṁ caiva saṁbhogastu sudāruṇaḥ| tathā mayā kṛtaṁ devi gatāste tridivaṁ punaḥ
उन्होंने कहा, 'यह अत्यंत भयंकर संभोग त्याग दिया जाए।' हे देवी! मैंने वैसा ही किया, और वे देवगण पुनः स्वर्गलोक चले गए।
श्लोक 18 (skanda.5.91.18)
ततः शप्तो मया नंदी भूलोकं गच्छ सत्वरम्। ततः शापपरिभ्रष्टः पृथिव्यां पतितस्तदा
tataḥ śapto mayā naṁdī bhūlokaṁ gaccha satvaram| tataḥ śāpaparibhraṣṭaḥ pṛthivyāṁ patitastadā
तब मैंने नंदी को शाप दिया — 'शीघ्र भूलोक को जाओ।' तब शाप से भ्रष्ट होकर वह उसी क्षण पृथ्वी पर गिर पड़ा।
श्लोक 19 (skanda.5.91.19)
सोच्छ्वासहृदयो दीनो दुःखव्याकुललोचनः। विलपंश्च तथा नंदी विलुठञ्छोकतो भुवि
socchvāsahṛdayo dīno duḥkhavyākulalocanaḥ| vilapaṁśca tathā naṁdī viluṭhañchokato bhuvi
हृदय में उसाँस भरता हुआ, दीन, दुःख से व्याकुल नेत्रों वाला नंदी विलाप करता हुआ पृथ्वी पर शोक से लोटने लगा।
श्लोक 20 (skanda.5.91.20)
वंचितश्चाग्निना बाढं वासवेन विशेषतः। किं मया दुष्कृतं कर्म कृतं किं चित्पुरातनम्
vaṁcitaścāgninā bāḍhaṁ vāsavena viśeṣataḥ| kiṁ mayā duṣkṛtaṁ karma kṛtaṁ kiṁ citpurātanam
'अग्नि के द्वारा और विशेषकर वासव (इंद्र) के द्वारा मैं बुरी तरह छला गया — मैंने ऐसा कौन-सा दुष्कर्म किया, कौन-सा पुरातन पाप किया?'
श्लोक 21 (skanda.5.91.21)
स दृष्टो लोकपालैस्तु तामवस्थां गतो गणः। पृष्टश्च तैः कुतो नदिन्विलापं कुरुषे महत्
sa dṛṣṭo lokapālaistu tāmavasthāṁ gato gaṇaḥ| pṛṣṭaśca taiḥ kuto nadinvilāpaṁ kuruṣe mahat
उस दशा को प्राप्त उस गण को लोकपालों ने देखा; उन्होंने पूछा, 'हे नंदी! तुम इतना बड़ा विलाप क्यों कर रहे हो?'
श्लोक 22 (skanda.5.91.22)
सर्वं निवेदितं तेन तेषामग्रे च नंदिना। उपायः कथितस्तैश्च महाकालवनं ततः
sarvaṁ niveditaṁ tena teṣāmagre ca naṁdinā| upāyaḥ kathitastaiśca mahākālavanaṁ tataḥ
नंदी ने उनके समक्ष सब कुछ बता दिया, और उन्होंने महाकालवन का उपाय बताया।
श्लोक 23 (skanda.5.91.23)
ततश्च वचनं श्रुत्वा नंदी रोमांचकंचुकः। महाकालवने देवि जगाम स तदा गणः। पूजयामास विधिवद्धृत्वा कपालिकीं तनुम्
tataśca vacanaṁ śrutvā naṁdī romāṁcakaṁcukaḥ| mahākālavane devi jagāma sa tadā gaṇaḥ| pūjayāmāsa vidhivaddhṛtvā kapālikīṁ tanum
हे देवी! उनका वचन सुनकर, रोमांच से पुलकित शरीर वाला वह गण नंदी तब महाकालवन में गया, और कापालिक रूप धारण करके उसने विधिपूर्वक पूजा की।
श्लोक 24 (skanda.5.91.24)
अशरीरसमुत्पन्ना वाणी लिंगात्तदा प्रिये। संजाता शापमोक्षस्ते प्रतीहार सुभक्तितः। पूजितोऽसौ महाभक्त्या प्रतीहारेण नंदिना
aśarīrasamutpannā vāṇī liṁgāttadā priye| saṁjātā śāpamokṣaste pratīhāra subhaktitaḥ| pūjito'sau mahābhaktyā pratīhāreṇa naṁdinā
हे प्रिये! तब लिंग से एक अशरीरी वाणी उत्पन्न हुई — 'हे प्रतीहार! तुम्हारे शुभ भक्तिभाव से तुम्हारा शाप-मोचन हो गया है।' प्रतीहार नंदी ने महाभक्ति से उस लिंग की पूजा की।
श्लोक 25 (skanda.5.91.25)
तदाप्रभृति लोकेस्मिन्प्रतीहारेश्वरेश्वरः। मया ते कथितो देवि प्रतीहारेश्वरस्य च। प्रभावः सर्वलोकानामत्यभीष्टफलप्रदः
tadāprabhṛti lokesminpratīhāreśvareśvaraḥ| mayā te kathito devi pratīhāreśvarasya ca| prabhāvaḥ sarvalokānāmatyabhīṣṭaphalapradaḥ
तभी से इस लोक में यह प्रतीहारेश्वर के नाम से जाना जाता है; हे देवी! मैंने तुम्हें प्रतीहारेश्वर की महिमा बताई, जो समस्त लोकों को अत्यंत अभीष्ट फल प्रदान करने वाली है।
श्लोक 26 (skanda.5.91.26)
पूजयिष्यंति ये भक्त्या प्रतीहारेश्वरं शिवम्। स्थानभ्रंशो वियोगश्च तेषां स्वप्नेऽपि नो भवेत्
pūjayiṣyaṁti ye bhaktyā pratīhāreśvaraṁ śivam| sthānabhraṁśo viyogaśca teṣāṁ svapne'pi no bhavet
जो लोग भक्तिपूर्वक प्रतीहारेश्वर शिव की पूजा करेंगे, उन्हें स्वप्न में भी कभी अपने स्थान से च्युति अथवा वियोग नहीं होगा।
श्लोक 27 (skanda.5.91.27)
सप्तजन्मकृतं पापं स्वल्पं वा यदि वा बहु। तत्सर्वं नाशमायाति प्रतीहारेश्वरार्चनात्
saptajanmakṛtaṁ pāpaṁ svalpaṁ vā yadi vā bahu| tatsarvaṁ nāśamāyāti pratīhāreśvarārcanāt
सात जन्मों में किया गया पाप, चाहे थोड़ा हो या अधिक, वह सब प्रतीहारेश्वर की अर्चना से नष्ट हो जाता है।
श्लोक 28 (skanda.5.91.28)
मनसा ये स्मरिष्यति प्रतीहारेश्वरं शिवम्। एवं तस्य कुलं सर्वं याति स्वर्गं न संशयः
manasā ye smariṣyati pratīhāreśvaraṁ śivam| evaṁ tasya kulaṁ sarvaṁ yāti svargaṁ na saṁśayaḥ
जो मन से भी प्रतीहारेश्वर शिव का स्मरण करते हैं, उनका सम्पूर्ण कुल इसी प्रकार निःसंदेह स्वर्ग को प्राप्त होता है।