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अवन्ती खण्ड · अध्याय 92

कुक्कुटेश्वर की महिमा

अध्याय 91अध्याय-सूचीअध्याय 93

श्लोक 1 (skanda.5.92.1)

ईश्वर उवाच। एकविंशतिकं विद्धि कुक्कुटेश्वरसंज्ञकम्। यस्य दर्शनमात्रेण तिर्यग्योनिर्न लभ्यते

īśvara uvāca| ekaviṁśatikaṁ viddhi kukkuṭeśvarasaṁjñakam| yasya darśanamātreṇa tiryagyonirna labhyate

ईश्वर ने कहा — इक्कीसवें देव को कुक्कुटेश्वर नाम से जानो, जिनके दर्शनमात्र से तिर्यक् योनि (पशु-पक्षी जन्म) प्राप्त नहीं होती।

श्लोक 2 (skanda.5.92.2)

कौशिकोनाम राजाभूत्कुक्कुटो जायते सदा। दृश्यते वासरे भागे सर्वाभरणभूषितः

kauśikonāma rājābhūtkukkuṭo jāyate sadā| dṛśyate vāsare bhāge sarvābharaṇabhūṣitaḥ

कौशिक नामक एक राजा था, जो सदैव मुर्गा (कुक्कुट) बनकर उत्पन्न होता है; दिन के समय वह सर्वाभूषणों से भूषित होकर दिखाई देता है।

श्लोक 3 (skanda.5.92.3)

व्याप्ता च पृथिवी तेन सशैलवनकानना। पूर्वकर्मप्रभावेन प्राप्तं राज्यमकण्टकम्

vyāptā ca pṛthivī tena saśailavanakānanā| pūrvakarmaprabhāvena prāptaṁ rājyamakaṇṭakam

उसके द्वारा पर्वतों, वनों और कांतारों सहित सम्पूर्ण पृथ्वी व्याप्त थी; पूर्वकर्मों के प्रभाव से उसे कंटकरहित राज्य प्राप्त हुआ था।

श्लोक 4 (skanda.5.92.4)

विशालानाम विख्याता भार्या तस्य महीपतेः। रूपलावण्यसंयुक्ता चतुःषष्टिकलान्विता

viśālānāma vikhyātā bhāryā tasya mahīpateḥ| rūpalāvaṇyasaṁyuktā catuḥṣaṣṭikalānvitā

उस राजा की विशाला नामक विख्यात पत्नी थी, जो रूप और लावण्य से युक्त तथा चौंसठ कलाओं में निपुण थी।

श्लोक 5 (skanda.5.92.5)

तया चकार सहितः स राज्यं राजसत्तमः। सा वल्लभापि नृपतेः प्राणेभ्योऽपि गरीयसी

tayā cakāra sahitaḥ sa rājyaṁ rājasattamaḥ| sā vallabhāpi nṛpateḥ prāṇebhyo'pi garīyasī

उस श्रेष्ठ राजा ने उसके साथ राज्य किया; वह पत्नी भी राजा को अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय थी।

श्लोक 6 (skanda.5.92.6)

तया सार्द्धं कदाचिच्च सुरतं नास्ति पार्वति। संतप्ता सर्वदा सा च रत्यभावाद्बभूव ह

tayā sārddhaṁ kadācicca surataṁ nāsti pārvati| saṁtaptā sarvadā sā ca ratyabhāvādbabhūva ha

किंतु, हे पार्वती! उसके साथ कभी भी सुरत-सुख नहीं हुआ; वह रति के अभाव से सदा संतप्त रहती थी।

श्लोक 7 (skanda.5.92.7)

एवं गच्छति काले तु सह राज्ञा स्मरातुरा। सर्वसत्त्वरुतज्ञा सा विशाला विपुलेक्षणा। ददर्श कीटमिथुनमनंगकलहातुरम्

evaṁ gacchati kāle tu saha rājñā smarāturā| sarvasattvarutajñā sā viśālā vipulekṣaṇā| dadarśa kīṭamithunamanaṁgakalahāturam

इस प्रकार समय बीतते हुए, कामातुर विशाला, जो सभी प्राणियों की बोली समझने वाली तथा विशाल नेत्रों वाली थी, राजा के साथ रहते हुए, कामकलह से पीड़ित एक कीट-युगल को देखा।

श्लोक 8 (skanda.5.92.8)

प्रसादयंस्तथा कीटः स्वां प्रियां च मुहुर्मुहुः। दासोऽस्मि तव कांतेऽहं रूपसौभाग्य सुन्दरि

prasādayaṁstathā kīṭaḥ svāṁ priyāṁ ca muhurmuhuḥ| dāso'smi tava kāṁte'haṁ rūpasaubhāgya sundari

वह नर कीट बार-बार अपनी प्रिया को मनाते हुए कहता था — 'हे सुंदरी! रूप-सौभाग्य से युक्त प्रिये, मैं तुम्हारा दास हूँ।'

श्लोक 9 (skanda.5.92.9)

भजस्व मां यथाकाममनंगशरपीडितम्। शिरसा प्रणतेनैव रचितस्ते मयांजलिः

bhajasva māṁ yathākāmamanaṁgaśarapīḍitam| śirasā praṇatenaiva racitaste mayāṁjaliḥ

'कामबाण से पीड़ित मुझे अपनी इच्छानुसार स्वीकार करो; सिर झुकाकर प्रणत हुए मैंने तुम्हें यह अंजलि अर्पित की है।'

श्लोक 10 (skanda.5.92.10)

न त्वया सदृशी लोके कामिनी विद्यते क्वचित्। सुवर्णवर्णसदृशी मद्भक्ता चारुहासिनी

na tvayā sadṛśī loke kāminī vidyate kvacit| suvarṇavarṇasadṛśī madbhaktā cāruhāsinī

'हे मधुर-हास्य वाली! तुम्हारे समान कामिनी संसार में कहीं नहीं है — तुम स्वर्ण के समान वर्णवाली और मेरी भक्त हो।'

श्लोक 11 (skanda.5.92.11)

कुतो वा मयि दीने त्वं क्रुद्धेव प्रियवादिनि। किमर्थं वद कल्याणि सरोषव दना स्थिता

kuto vā mayi dīne tvaṁ kruddheva priyavādini| kimarthaṁ vada kalyāṇi saroṣava danā sthitā

'हे प्रियवादिनी! फिर दीन मुझ पर तुम क्रुद्ध क्यों हो? हे कल्याणी! कहो, तुम रोषयुक्त मुख लेकर क्यों बैठी हो?'

श्लोक 12 (skanda.5.92.12)

सा तमाह प्रकोपाच्च किमालपसि मां वृथा। त्वया मोदकचूर्णं तु मां विहाय मनोरमाम्। प्रदत्तं कामलुब्धेन अन्यस्य कीटकाधम

sā tamāha prakopācca kimālapasi māṁ vṛthā| tvayā modakacūrṇaṁ tu māṁ vihāya manoramām| pradattaṁ kāmalubdhena anyasya kīṭakādhama

वह क्रोधपूर्वक उससे बोली — 'तू मुझसे व्यर्थ ही क्यों बात कर रहा है? हे नीच कीट! कामलुब्ध होकर तूने मोदक-चूर्ण मुझ मनोहरा को छोड़कर किसी और को दे दिया।'

श्लोक 13 (skanda.5.92.13)

नाहमेवं करिष्यामि कीटः प्राह पुनःपुनः। स्पृशामि पादौ सत्येन प्रणतस्य प्रसीद मे

nāhamevaṁ kariṣyāmi kīṭaḥ prāha punaḥpunaḥ| spṛśāmi pādau satyena praṇatasya prasīda me

'मैं ऐसा नहीं करूँगा' — कीट ने बार-बार कहा — 'मैं सत्य से तुम्हारे चरण स्पर्श करता हूँ; प्रणत हुए मुझ पर प्रसन्न हो जाओ।'

श्लोक 14 (skanda.5.92.14)

इति तद्वचनं श्रुत्वा सा प्रसन्नाभवत्तदा। आत्मानमर्पयामास कामनाय पिपीलिका

iti tadvacanaṁ śrutvā sā prasannābhavattadā| ātmānamarpayāmāsa kāmanāya pipīlikā

उसका यह वचन सुनकर वह तब प्रसन्न हो गई, और उस पिपीलिका (चींटी) ने काम-भावना से स्वयं को उसे अर्पित कर दिया।

श्लोक 15 (skanda.5.92.15)

दृष्ट्वा तन्महदाश्चर्यं सा राज्ञी विललाप ह। धिग्राज्यं धिक्च मे रूपं धिक्च यौवनमद्य मे। न कामिताहं कांतेन मरिष्यामि न संशयः

dṛṣṭvā tanmahadāścaryaṁ sā rājñī vilalāpa ha| dhigrājyaṁ dhikca me rūpaṁ dhikca yauvanamadya me| na kāmitāhaṁ kāṁtena mariṣyāmi na saṁśayaḥ

उस महान आश्चर्य को देखकर वह रानी विलाप करने लगी — 'धिक्कार है मेरे राज्य को! धिक्कार है मेरे रूप को! धिक्कार है आज मेरे यौवन को! मैं अपने पति से कामित नहीं हुई — निश्चय ही मैं मर जाऊँगी।'

श्लोक 16 (skanda.5.92.16)

एवं विलप्य बहुधा विनिःश्वस्य पुनःपुनः। उन्मत्तेव विशालाक्षी गालवस्याश्रमं गता

evaṁ vilapya bahudhā viniḥśvasya punaḥpunaḥ| unmatteva viśālākṣī gālavasyāśramaṁ gatā

इस प्रकार बहुधा विलाप करके, बार-बार दीर्घ श्वास लेकर, विशाल नेत्रों वाली वह रानी उन्मत्त की भाँति गालव मुनि के आश्रम में गई।

श्लोक 17 (skanda.5.92.17)

दृष्ट्वा तमृषिमासीनं तपोयोनिं दृढव्रतम्। उवाच प्रणतांगी सा शोकसंतप्तमानसा

dṛṣṭvā tamṛṣimāsīnaṁ tapoyoniṁ dṛḍhavratam| uvāca praṇatāṁgī sā śokasaṁtaptamānasā

तप से उत्पन्न, दृढ़व्रती उस ऋषि को बैठे देखकर, शोक से संतप्त-मन वाली वह प्रणत होकर बोली।

श्लोक 18 (skanda.5.92.18)

एकोऽयं संशयो ब्रह्मन्हृदये परिवर्त्तते। वश्योऽपि हि च मे भर्त्ता रूपलावण्यवानपि। न जाने कारणं किं तु संगमो नोपजायते

eko'yaṁ saṁśayo brahmanhṛdaye parivarttate| vaśyo'pi hi ca me bharttā rūpalāvaṇyavānapi| na jāne kāraṇaṁ kiṁ tu saṁgamo nopajāyate

'हे ब्रह्मन्! मेरे हृदय में एक ही संशय घूमता रहता है — मेरे पति मेरे वश में हैं, रूप-लावण्य से भी संपन्न हैं, फिर भी न जाने क्यों संगम नहीं होता।'

श्लोक 19 (skanda.5.92.19)

यो गत्वा प्रमदाराज्यं जित्वा सर्वाः पुरा रणे। आजहार शुभास्तासां मध्यादष्टौ वरांगनाः। नैव कामयते तासु किमेतदिति सुव्रत

yo gatvā pramadārājyaṁ jitvā sarvāḥ purā raṇe| ājahāra śubhāstāsāṁ madhyādaṣṭau varāṁganāḥ| naiva kāmayate tāsu kimetaditi suvrata

'जिसने कभी युद्ध में स्त्रियों के समस्त राज्य को जीतकर उनमें से आठ श्रेष्ठ सुंदरियों को हर लिया था, वह उन्हें भी नहीं चाहता — हे सुव्रत! यह क्या है?'

श्लोक 20 (skanda.5.92.20)

वाजिनो वारणाश्चैव धनधान्यमनंतकम्। वर्त्तते हि जनः सर्वो ममाज्ञां पालयन्क्षितौ

vājino vāraṇāścaiva dhanadhānyamanaṁtakam| varttate hi janaḥ sarvo mamājñāṁ pālayankṣitau

'घोड़े, हाथी, अनंत धन-धान्य — पृथ्वी पर समस्त प्रजा मेरी आज्ञा का पालन करती है।'

श्लोक 21 (skanda.5.92.21)

केन कर्मविपाकेन ममेदं यौवनं दृढम्। व्यर्थं जातं द्विजश्रेष्ठ रतिं न कुरुते नृपः

kena karmavipākena mamedaṁ yauvanaṁ dṛḍham| vyarthaṁ jātaṁ dvijaśreṣṭha ratiṁ na kurute nṛpaḥ

'हे द्विजश्रेष्ठ! किस कर्म-विपाक से मेरा यह दृढ़ यौवन व्यर्थ हो गया है? राजा मुझसे रति नहीं करते।'

श्लोक 22 (skanda.5.92.22)

दृश्यते वासरे भागे रात्रौ चैव न दृश्यते। इहजन्मकृतं चैतदाहोस्वित्पारलौकिकम्

dṛśyate vāsare bhāge rātrau caiva na dṛśyate| ihajanmakṛtaṁ caitadāhosvitpāralaukikam

'वे दिन के समय दिखाई देते हैं, रात्रि में कभी दिखाई नहीं देते — क्या यह इसी जन्म का किया हुआ है, या परलौकिक?'

श्लोक 23 (skanda.5.92.23)

दुष्कृतावर्जनं ब्रह्मन्ममेदं वक्तुमर्हसि। तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा गालवो वाक्यमब्रवीत्

duṣkṛtāvarjanaṁ brahmanmamedaṁ vaktumarhasi| tasyāstadvacanaṁ śrutvā gālavo vākyamabravīt

'हे ब्रह्मन्! आप मुझे यह बताने योग्य हैं कि मेरा यह दुष्कर्म-वर्जन (प्रायश्चित्त) क्या है।' उसके इस वचन को सुनकर गालव ने कहा।

श्लोक 24 (skanda.5.92.24)

शृणु पुत्रि पुरावृत्तं बालभावेन यत्कृतम्। अनेन राज्ञा धर्मज्ञे रात्रौ येन न दृश्यते

śṛṇu putri purāvṛttaṁ bālabhāvena yatkṛtam| anena rājñā dharmajñe rātrau yena na dṛśyate

'हे धर्मज्ञे पुत्री! सुनो, बचपन में इस राजा ने जो किया था वह पुरातन वृत्तांत, जिसके कारण यह रात्रि में दिखाई नहीं देता।'

श्लोक 25 (skanda.5.92.25)

विदूरथस्य तनयस्तव भर्ता स निश्चितम्। मांसाहारी दोषरतिर्विषयासक्तमानसः

vidūrathasya tanayastava bhartā sa niścitam| māṁsāhārī doṣaratirviṣayāsaktamānasaḥ

'तुम्हारा पति निश्चय ही विदूरथ का पुत्र है; वह मांसाहारी, दोषों में रत तथा विषयों में आसक्त-मन वाला था।'

श्लोक 26 (skanda.5.92.26)

बहवः कुक्कुटास्तेन भक्षिता राजसूनुना

bahavaḥ kukkuṭāstena bhakṣitā rājasūnunā

'उस राजपुत्र ने अनेक मुर्गों को खा लिया था।'

श्लोक 27 (skanda.5.92.27)

एवं भक्षयतस्तस्य बहुशो वत्सरा गताः। कालेन महता राज्ञा ताम्रचूडेन मंत्रिणः। पृष्टाः किं कारणं नात्र समायांति हि कुक्कुटाः

evaṁ bhakṣayatastasya bahuśo vatsarā gatāḥ| kālena mahatā rājñā tāmracūḍena maṁtriṇaḥ| pṛṣṭāḥ kiṁ kāraṇaṁ nātra samāyāṁti hi kukkuṭāḥ

इस प्रकार खाते हुए उसके कई वर्ष बीत गए; बहुत समय बाद ताम्रचूड नामक (कुक्कुट-)राजा ने अपने मंत्रियों से पूछा कि 'यहाँ मुर्गे क्यों नहीं आ रहे?'

श्लोक 28 (skanda.5.92.28)

अथ केनापि कथितं कुक्कुटानां च भक्षणम्। विदूरथस्य पुत्रेण कौशिकेन दुरात्मना। भक्षिताः कुक्कुटाः सर्वे विना कारणतो नृप

atha kenāpi kathitaṁ kukkuṭānāṁ ca bhakṣaṇam| vidūrathasya putreṇa kauśikena durātmanā| bhakṣitāḥ kukkuṭāḥ sarve vinā kāraṇato nṛpa

तब किसी ने बता दिया कि विदूरथ के दुरात्मा पुत्र कौशिक ने बिना किसी कारण के सभी मुर्गों को खा लिया है, हे राजन्।

श्लोक 29 (skanda.5.92.29)

ताम्रचूडोऽथ संक्रुद्धो ददौ शापं दुरात्मने। कौशिकाय क्षयो रोगो भविष्यति भयावहः

tāmracūḍo'tha saṁkruddho dadau śāpaṁ durātmane| kauśikāya kṣayo rogo bhaviṣyati bhayāvahaḥ

तब अत्यंत क्रुद्ध ताम्रचूड ने उस दुरात्मा को शाप दिया — 'कौशिक को भयंकर क्षय-रोग होगा।'

श्लोक 30 (skanda.5.92.30)

तदाप्रभृत्यभूत्क्षीणो राजपुत्रो दिनेदिने। औषधैरधिकोऽभ्येति व्याधिना पीडितो भृशम्

tadāprabhṛtyabhūtkṣīṇo rājaputro dinedine| auṣadhairadhiko'bhyeti vyādhinā pīḍito bhṛśam

तभी से राजपुत्र दिन-प्रतिदिन क्षीण होता गया; अनेक औषधियों के बावजूद वह उस व्याधि से अत्यंत पीड़ित रहता था।

श्लोक 31 (skanda.5.92.31)

अथ केनापि कामेन वामदेवाश्रमं गतः। क्षयरोगाभिभूतोऽसौ मरणोत्सुकमानसः। पप्रच्छ वामदेवं स नमस्कृत्य पुनःपुनः

atha kenāpi kāmena vāmadevāśramaṁ gataḥ| kṣayarogābhibhūto'sau maraṇotsukamānasaḥ| papraccha vāmadevaṁ sa namaskṛtya punaḥpunaḥ

फिर किसी इच्छावश वह क्षयरोग से ग्रस्त, मरणासन्न मन वाला वामदेव के आश्रम में गया, और बार-बार नमस्कार करके वामदेव से पूछा।

श्लोक 32 (skanda.5.92.32)

भगवन्केन पापेन क्षीयतेऽहर्निशं वपुः। मदीयं पोष्यमाणं हि मांसेन विविधेन च

bhagavankena pāpena kṣīyate'harniśaṁ vapuḥ| madīyaṁ poṣyamāṇaṁ hi māṁsena vividhena ca

'हे भगवन्! विविध प्रकार के मांस से पोषित होते हुए भी, किस पाप से मेरा शरीर दिन-रात क्षीण होता जा रहा है?'

श्लोक 33 (skanda.5.92.33)

वामदेवोऽथ तं प्राह कुक्कुटा भक्षितास्त्वया। ताम्रचूडेन शप्तोऽसि कुक्कुटानां नृपेण हि

vāmadevo'tha taṁ prāha kukkuṭā bhakṣitāstvayā| tāmracūḍena śapto'si kukkuṭānāṁ nṛpeṇa hi

तब वामदेव ने उससे कहा — 'तूने मुर्गे खाए हैं; मुर्गों के राजा ताम्रचूड ने तुझे शाप दिया है।'

श्लोक 34 (skanda.5.92.34)

तमेव शरणं गच्छ स उपायं वदिष्यति। ततः स ताम्रचूडस्याभ्यर्णमागानृपात्मजः

tameva śaraṇaṁ gaccha sa upāyaṁ vadiṣyati| tataḥ sa tāmracūḍasyābhyarṇamāgānṛpātmajaḥ

'उसी की शरण में जाओ, वही उपाय बताएगा।' तब राजकुमार ताम्रचूड के समीप गया।

श्लोक 35 (skanda.5.92.35)

दृष्ट्वा च ताम्रचूडं तं महाभक्त्या कृतांजलिः। प्रोवाच प्रणतो भूत्वा पाहि मां शरणागतम्

dṛṣṭvā ca tāmracūḍaṁ taṁ mahābhaktyā kṛtāṁjaliḥ| provāca praṇato bhūtvā pāhi māṁ śaraṇāgatam

ताम्रचूड को देखकर, महाभक्ति से हाथ जोड़कर, प्रणत होकर उसने कहा — 'शरणागत मेरी रक्षा कीजिए।'

श्लोक 36 (skanda.5.92.36)

अज्ञानाद्भक्षिता देव कुक्कुटाः पुष्टिकारणात्। क्षंतुमर्हसि देवेश ममागः कृपणस्य च

ajñānādbhakṣitā deva kukkuṭāḥ puṣṭikāraṇāt| kṣaṁtumarhasi deveśa mamāgaḥ kṛpaṇasya ca

'हे देव! मैंने अज्ञानवश, पोषण के हेतु मुर्गों को खाया; हे देवेश! मुझ दीन के इस अपराध को क्षमा करने योग्य हैं आप।'

श्लोक 37 (skanda.5.92.37)

प्रोवाच ताम्रचूडोऽथ यस्मात्प्रार्थयसे नृप। तस्मात्ते वासरे प्राप्ते पुरुषत्वं भविष्यति

provāca tāmracūḍo'tha yasmātprārthayase nṛpa| tasmātte vāsare prāpte puruṣatvaṁ bhaviṣyati

तब ताम्रचूड ने कहा — 'हे राजन्! चूँकि तुम इस प्रकार प्रार्थना करते हो, अतः दिन के समय तुम्हें पुरुषत्व प्राप्त होगा।'

श्लोक 38 (skanda.5.92.38)

शास्ता गोप्ता च लोकानां राजा दंडधरः प्रभुः। कुक्कुटो भविता रात्रौ सर्वभोगविवर्जितः

śāstā goptā ca lokānāṁ rājā daṁḍadharaḥ prabhuḥ| kukkuṭo bhavitā rātrau sarvabhogavivarjitaḥ

'प्रजा के शासक, रक्षक, दंडधर प्रभु राजा (रहोगे); किंतु रात्रि में तुम समस्त भोगों से रहित मुर्गा बन जाओगे।'

श्लोक 39 (skanda.5.92.39)

अतो न दृश्यते पुत्रि तिर्यग्भावं समाश्रितः

ato na dṛśyate putri tiryagbhāvaṁ samāśritaḥ

'इसीलिए, हे पुत्री! तिर्यक्-भाव को प्राप्त हुआ वह रात्रि में दिखाई नहीं देता।'

श्लोक 40 (skanda.5.92.40)

इति तस्य वचः श्रुत्वा गालवस्य महात्मनः। सा संपूज्य विशालाक्षी गालवं मुनिसत्तमम्। पप्रच्छ परया भक्त्या शापांतो हि कथं भवेत्

iti tasya vacaḥ śrutvā gālavasya mahātmanaḥ| sā saṁpūjya viśālākṣī gālavaṁ munisattamam| papraccha parayā bhaktyā śāpāṁto hi kathaṁ bhavet

महात्मा गालव के इस वचन को सुनकर, विशाल नेत्रों वाली वह रानी गालव मुनिश्रेष्ठ का सम्मान करके, परम भक्ति से पूछने लगी कि शाप का अंत किस प्रकार होगा।

श्लोक 41 (skanda.5.92.41)

गालवः कथयामास ध्यानेनालोक्य यत्नतः

gālavaḥ kathayāmāsa dhyānenālokya yatnataḥ

गालव ने ध्यानपूर्वक, यत्नपूर्वक विचार करके यह बताया।

श्लोक 42 (skanda.5.92.42)

महाकाल वने लिंगं पक्षियोनिविमोचनम्। ज्वालेश्वरस्य देवस्य पूर्वभागे व्यवस्थितम्। तस्य दर्शनमात्रेण शापस्यांतो भविष्यति

mahākāla vane liṁgaṁ pakṣiyonivimocanam| jvāleśvarasya devasya pūrvabhāge vyavasthitam| tasya darśanamātreṇa śāpasyāṁto bhaviṣyati

'महाकालवन में पक्षि-योनि से मुक्ति देने वाला एक लिंग है, जो ज्वालेश्वर देव के पूर्व भाग में स्थित है; उसके दर्शनमात्र से शाप का अंत हो जाएगा।'

श्लोक 43 (skanda.5.92.43)

सा प्रणम्य मुनिश्रेष्ठमाजगाम त्वरान्विता। यत्रास्ते नृपशार्दूलो विध्यन्बहुविधान्मृगान्

sā praṇamya muniśreṣṭhamājagāma tvarānvitā| yatrāste nṛpaśārdūlo vidhyanbahuvidhānmṛgān

उस मुनिश्रेष्ठ को प्रणाम करके वह शीघ्रतापूर्वक वहाँ गई, जहाँ नृपश्रेष्ठ अनेक प्रकार के मृगों को बींध रहा था।

श्लोक 44 (skanda.5.92.44)

प्रफुल्लनयनाभ्यां सा दृष्टा लोलेक्षणा प्रिया। आह्लादिता बहुविधैः कोमलैर्वचनामृतैः

praphullanayanābhyāṁ sā dṛṣṭā lolekṣaṇā priyā| āhlāditā bahuvidhaiḥ komalairvacanāmṛtaiḥ

चंचल नेत्रों वाली उस प्रिया को देखकर वह प्रफुल्ल नेत्रों से देखा गया, और अनेक प्रकार के कोमल अमृततुल्य वचनों से वह प्रसन्न हुई।

श्लोक 45 (skanda.5.92.45)

ततस्तेन तदा राज्ञा प्रोक्ता सा मृगलोचना। इदानीं कि मया कांते कार्यं भवति कथ्यताम्

tatastena tadā rājñā proktā sā mṛgalocanā| idānīṁ ki mayā kāṁte kāryaṁ bhavati kathyatām

तब उस राजा ने मृगनयनी उससे कहा — 'हे प्रिये! अब मुझे क्या करना है, बताओ।'

श्लोक 46 (skanda.5.92.46)

तया प्रोक्तं महाराज गम्यतेऽद्य मया सह। महाकालवने पुण्ये सर्वदुष्कृतनाशने

tayā proktaṁ mahārāja gamyate'dya mayā saha| mahākālavane puṇye sarvaduṣkṛtanāśane

उसने कहा — 'हे महाराज! आज हम दोनों सर्वदुष्कृत-नाशक पुण्य महाकालवन को चलें।'

श्लोक 47 (skanda.5.92.47)

तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा त्वरमाणो मुदान्वितः। तया नीतोऽथ नृपतिर्लिंगस्यास्य समीपतः

tasyāstadvacanaṁ śrutvā tvaramāṇo mudānvitaḥ| tayā nīto'tha nṛpatirliṁgasyāsya samīpataḥ

उसके इस वचन को सुनकर, हर्षपूर्वक शीघ्रता करता हुआ राजा उसके द्वारा इस लिंग के समीप लाया गया।

श्लोक 48 (skanda.5.92.48)

पूजयित्वाथ तल्लिंगं पक्षियोनिविमोचनम्। तत्रैव च स्थितो राजा प्रियया सह पार्वति

pūjayitvātha talliṁgaṁ pakṣiyonivimocanam| tatraiva ca sthito rājā priyayā saha pārvati

उस पक्षि-योनि से मुक्ति देने वाले लिंग की पूजा करके, हे पार्वती! राजा वहीं अपनी प्रिया के साथ ठहर गया।

श्लोक 49 (skanda.5.92.49)

तस्यां रात्रौ न संजातः कुक्कुटो यादृशः सदा। शिवप्रसादादभवद्दिव्यरूपी मनोहरः

tasyāṁ rātrau na saṁjātaḥ kukkuṭo yādṛśaḥ sadā| śivaprasādādabhavaddivyarūpī manoharaḥ

उस रात्रि में सदा की भाँति मुर्गा उत्पन्न नहीं हुआ; शिव के प्रसाद से वह मनोहर, दिव्य रूप वाला हो गया।

श्लोक 50 (skanda.5.92.50)

रूपेण निर्जितः कामस्तेनाप्रतिमतेजसा। ततो विस्मयमापन्नश्चिंतयामास पार्थिवः। कोऽयं प्रभावो येनाहं शापान्मुक्तः सुदुस्तरात्

rūpeṇa nirjitaḥ kāmastenāpratimatejasā| tato vismayamāpannaściṁtayāmāsa pārthivaḥ| ko'yaṁ prabhāvo yenāhaṁ śāpānmuktaḥ sudustarāt

उस अनुपम तेज वाले रूप से कामदेव भी पराजित हो गया। तब आश्चर्यचकित होकर राजा सोचने लगा — 'यह कौन-सा प्रभाव है जिससे मैं इस अत्यंत दुस्तर शाप से मुक्त हुआ?'

श्लोक 51 (skanda.5.92.51)

प्रियां पप्रच्छ नृपतिः पूर्णेन्दुवदनां भृशम्। कथं शापाद्विमुक्तोऽहं केन पुण्येन कर्मणा

priyāṁ papraccha nṛpatiḥ pūrṇenduvadanāṁ bhṛśam| kathaṁ śāpādvimukto'haṁ kena puṇyena karmaṇā

पूर्णचंद्र के समान मुख वाली अपनी प्रिया से राजा ने बार-बार पूछा — 'मैं किस पुण्यकर्म से शाप से मुक्त हुआ?'

श्लोक 52 (skanda.5.92.52)

अथ सा कथयामास वृत्तांतं विस्तरान्मुदा। गालवेन हि यत्प्रोक्तं यत्किंचिच्छापमोक्षणम्

atha sā kathayāmāsa vṛttāṁtaṁ vistarānmudā| gālavena hi yatproktaṁ yatkiṁcicchāpamokṣaṇam

तब उसने प्रसन्नतापूर्वक सारा वृत्तांत विस्तार से कह सुनाया — गालव ने जो कुछ कहा था, शाप-मोक्ष का जो भी उपाय था।

श्लोक 53 (skanda.5.92.53)

राजञ्छापाद्विमुक्तोऽसि लिंगस्यास्य प्रभावतः। पुनः प्रसाद्य तल्लिंगं भुक्त्वा भोगांश्चिरं भुवि

rājañchāpādvimukto'si liṁgasyāsya prabhāvataḥ| punaḥ prasādya talliṁgaṁ bhuktvā bhogāṁściraṁ bhuvi

'हे राजन्! इस लिंग के प्रभाव से ही तुम शाप से मुक्त हुए हो; पुनः इस लिंग को प्रसन्न करके पृथ्वी पर चिरकाल तक भोगों का उपभोग करो।'

श्लोक 54 (skanda.5.92.54)

तया सार्द्धं ययौ राजा स्वर्गं सुरगणैः स्तुतः। तदाप्रभृति तल्लिंगं कुक्कुटेश्वरसंज्ञकम्

tayā sārddhaṁ yayau rājā svargaṁ suragaṇaiḥ stutaḥ| tadāprabhṛti talliṁgaṁ kukkuṭeśvarasaṁjñakam

उसके साथ राजा देवगणों द्वारा स्तुत होकर स्वर्ग को गया; तभी से वह लिंग कुक्कुटेश्वर के नाम से जाना जाने लगा।

श्लोक 55 (skanda.5.92.55)

विख्यातं देवि लोकेऽस्मिन्सर्वकामफलप्रदम्। तच्च ये पूजयिष्यंति कुक्कुटेश्वरसंज्ञकम्। तिर्यग्योनिं न यास्यंति न वियोगो भविष्यति

vikhyātaṁ devi loke'sminsarvakāmaphalapradam| tacca ye pūjayiṣyaṁti kukkuṭeśvarasaṁjñakam| tiryagyoniṁ na yāsyaṁti na viyogo bhaviṣyati

हे देवी! यह इस लोक में विख्यात हुआ, समस्त कामनाओं का फल देने वाला; जो लोग इस कुक्कुटेश्वर नामक लिंग की पूजा करते हैं, वे तिर्यक्-योनि को प्राप्त नहीं होते, न ही उनका वियोग होता है।

श्लोक 56 (skanda.5.92.56)

न चापि नरकावाप्तिर्न दुःखं न जरा भयम्। नाकाले मरणं नॄणां न च कष्टं भवि ष्यति

na cāpi narakāvāptirna duḥkhaṁ na jarā bhayam| nākāle maraṇaṁ nṝṇāṁ na ca kaṣṭaṁ bhavi ṣyati

उन्हें नरक की प्राप्ति भी नहीं होती, न दुःख, न बुढ़ापे का भय; मनुष्यों की अकाल मृत्यु नहीं होती, न ही कोई कष्ट होता है।

श्लोक 57 (skanda.5.92.57)

रूपसौभाग्यसंपन्ना भविष्यंति युगेयुगे। चतुर्द्दश्यां प्रपश्यति लिंगं ये कुक्कुटेश्वरम्। तेषां कुले च ये केचित्पितरो निरयस्थिताः

rūpasaubhāgyasaṁpannā bhaviṣyaṁti yugeyuge| caturddaśyāṁ prapaśyati liṁgaṁ ye kukkuṭeśvaram| teṣāṁ kule ca ye kecitpitaro nirayasthitāḥ

वे युगे-युगे रूप और सौभाग्य से संपन्न होंगे। जो चतुर्दशी के दिन कुक्कुटेश्वर लिंग का दर्शन करते हैं, उनके कुल में जो भी पितर नरक में स्थित हैं...

श्लोक 58 (skanda.5.92.58)

तिर्यग्योनिगता ये च पशुयोनिं तु ये गताः। वृक्षत्वमथवा प्राप्तास्तेषां मोक्षो भविष्यति

tiryagyonigatā ye ca paśuyoniṁ tu ye gatāḥ| vṛkṣatvamathavā prāptāsteṣāṁ mokṣo bhaviṣyati

...अथवा तिर्यक्-योनि को, पशु-योनि को अथवा वृक्षत्व को प्राप्त हुए हैं, उन सबकी मुक्ति हो जाएगी।

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