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अवन्ती खण्ड · अध्याय 93

कर्कटेश्वर की महिमा

अध्याय 92अध्याय-सूचीअध्याय 94

श्लोक 1 (skanda.5.93.1)

श्रीविश्वनाथ उवाच। द्वाविंशतितमं विद्धि कर्कटेश्वरसंज्ञकम्। यस्य दर्शनमात्रेण तिर्यग्योनिर्न दृश्यते

śrīviśvanātha uvāca| dvāviṁśatitamaṁ viddhi karkaṭeśvarasaṁjñakam| yasya darśanamātreṇa tiryagyonirna dṛśyate

श्री विश्वनाथ ने कहा — बाईसवें देव को कर्कटेश्वर नाम से जानो, जिनके दर्शनमात्र से तिर्यक्-योनि दिखाई नहीं देती।

श्लोक 2 (skanda.5.93.2)

आसीत्पुरा बृहत्कल्पे धर्म मूर्तिर्जनाधिपः। सुहृच्छक्रस्य निहता येन दैत्याः सहस्रशः

āsītpurā bṛhatkalpe dharma mūrtirjanādhipaḥ| suhṛcchakrasya nihatā yena daityāḥ sahasraśaḥ

पूर्वकाल में, किसी महाकल्प में, धर्म की साक्षात मूर्ति के समान एक राजा था, इंद्र का सुहृद, जिसने हजारों दैत्यों का वध किया था।

श्लोक 3 (skanda.5.93.3)

सोमसूर्यादयो यस्य तेजसा निष्प्रभाः कृताः। प्रजाश्च पालिता येन निहत्य समरे द्विषः

somasūryādayo yasya tejasā niṣprabhāḥ kṛtāḥ| prajāśca pālitā yena nihatya samare dviṣaḥ

जिसके तेज से सूर्य-चंद्र आदि भी निष्प्रभ हो जाते थे, और जिसने युद्ध में शत्रुओं का वध करके प्रजा का पालन किया।

श्लोक 4 (skanda.5.93.4)

यथेच्छारूपधारी च संग्रामेष्वपराजितः। तस्य भानुमतीनाम भार्या त्रैलोक्यसुंदरी

yathecchārūpadhārī ca saṁgrāmeṣvaparājitaḥ| tasya bhānumatīnāma bhāryā trailokyasuṁdarī

इच्छानुसार रूप धारण करने वाला, संग्रामों में अपराजित वह राजा — उसकी भानुमती नामक पत्नी त्रैलोक्य-सुंदरी थी।

श्लोक 5 (skanda.5.93.5)

राज्ञस्तस्याग्रमहिषी प्राणेभ्योऽपि गरीयसी। दशनारीसहस्राणां मध्ये श्रीरिव राजिता

rājñastasyāgramahiṣī prāṇebhyo'pi garīyasī| daśanārīsahasrāṇāṁ madhye śrīriva rājitā

वह राजा की पटरानी थी, अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय, दस हज़ार स्त्रियों के मध्य श्री (लक्ष्मी) के समान सुशोभित।

श्लोक 6 (skanda.5.93.6)

नृपो नृपसहस्रेण न कदाचित्प्रमुच्यते। कदाचिदेकांतगतः पप्रच्छ स्वपुरोहितम्। विस्मयेनावृतमना वशिष्ठमृषिसत्तमम्

nṛpo nṛpasahasreṇa na kadācitpramucyate| kadācidekāṁtagataḥ papraccha svapurohitam| vismayenāvṛtamanā vaśiṣṭhamṛṣisattamam

वह राजा सदा सहस्रों राजाओं से घिरा रहता था। एक बार एकांत में जाकर, आश्चर्य से भरे मन से उसने अपने पुरोहित, ऋषिश्रेष्ठ वशिष्ठ से पूछा।

श्लोक 7 (skanda.5.93.7)

भगवन्केन धर्मेण मम लक्ष्मीरनुत्तमा। कस्माच्च विपुलं तेजो दुःसहं मम दृश्यते

bhagavankena dharmeṇa mama lakṣmīranuttamā| kasmācca vipulaṁ tejo duḥsahaṁ mama dṛśyate

'हे भगवन्! किस धर्म से मेरी लक्ष्मी अनुपम है, और किस कारण मेरा यह विपुल, दुःसह तेज दिखाई देता है?'

श्लोक 8 (skanda.5.93.8)

वशिष्ठ उवाच। पुरा त्वमवनीपाऽऽसीः शूद्रजातिसमुद्भवः। बहुदोषसमाविष्टो दुष्टया भार्ययाऽनया

vaśiṣṭha uvāca| purā tvamavanīpā''sīḥ śūdrajātisamudbhavaḥ| bahudoṣasamāviṣṭo duṣṭayā bhāryayā'nayā

वशिष्ठ ने कहा — 'पूर्वकाल में तुम पृथ्वी पर शूद्र-कुल में उत्पन्न हुए थे, अनेक दोषों से युक्त, इसी दुष्ट पत्नी के साथ रहते हुए।'

श्लोक 9 (skanda.5.93.9)

निवसन्दुष्टहृदयो वर्षाणि सुबहून्यपि। महाक्रोधाभिभूतात्मा सदा निष्ठुरजल्पकः

nivasanduṣṭahṛdayo varṣāṇi subahūnyapi| mahākrodhābhibhūtātmā sadā niṣṭhurajalpakaḥ

'दुष्ट हृदय से बहुत वर्षों तक रहते हुए, महाक्रोध से अभिभूत मन वाले, सदा निष्ठुर बोलने वाले तुम थे।'

श्लोक 10 (skanda.5.93.10)

सदा ब्रह्मस्वहारी त्वं सदा वेदविनिंदकः। सदा चासूयको राजन्सदा विश्वासघातकः

sadā brahmasvahārī tvaṁ sadā vedaviniṁdakaḥ| sadā cāsūyako rājansadā viśvāsaghātakaḥ

'हे राजन्! तुम सदा ब्राह्मण के धन का हरण करने वाले थे, सदा वेदों की निंदा करने वाले, सदा ईर्ष्यालु और सदा विश्वासघाती थे।'

श्लोक 11 (skanda.5.93.11)

अथ पंचत्वमापन्नः काले नरकमाप्तवान्। ताम्रभ्राष्ट्रे परं दग्धो दशवर्षाणि पंच च

atha paṁcatvamāpannaḥ kāle narakamāptavān| tāmrabhrāṣṭre paraṁ dagdho daśavarṣāṇi paṁca ca

'फिर मृत्यु को प्राप्त होकर समय पर तुमने नरक पाया; पंद्रह वर्षों तक ताम्रभ्राष्ट्र (ताँबे की भट्टी) में जलाए गए।'

श्लोक 12 (skanda.5.93.12)

रौरवे कुम्भिपाके च महारौरवसंज्ञके। सूक्ष्माणि तिलमात्राणि कृत्वा खंडान्यनेकशः

raurave kumbhipāke ca mahārauravasaṁjñake| sūkṣmāṇi tilamātrāṇi kṛtvā khaṁḍānyanekaśaḥ

'रौरव में, कुम्भीपाक में और महारौरव नामक नरक में तुम्हें तिल के दानों के समान अनगिनत सूक्ष्म टुकड़ों में काटा गया।'

श्लोक 13 (skanda.5.93.13)

मूषायां धीमतो राजन्नसिपत्रे च दारितः। शेषपातकशुद्ध्यर्थं धराया मवतारितः

mūṣāyāṁ dhīmato rājannasipatre ca dāritaḥ| śeṣapātakaśuddhyarthaṁ dharāyā mavatāritaḥ

'हे बुद्धिमान राजन्! मूषा (ओखली-नरक) में और असिपत्र (तलवार के पत्तों वाले वन) में तुम विदीर्ण किए गए; फिर शेष पाप की शुद्धि के लिए तुम्हें पृथ्वी पर उतारा गया।'

श्लोक 14 (skanda.5.93.14)

विधाय कार्कटं रूपं यमेन त्वयि पार्थिव। शिवस्य सरो विख्यातं महाकालवनोत्तमे

vidhāya kārkaṭaṁ rūpaṁ yamena tvayi pārthiva| śivasya saro vikhyātaṁ mahākālavanottame

'हे पार्थिव! यम के द्वारा तुम्हें कर्कट (केकड़े) का रूप देकर, महाकालवन के उत्तम स्थल में विख्यात शिव के सरोवर में डाला गया।'

श्लोक 15 (skanda.5.93.15)

दत्तं जप्तं कृतं यच्च हुतं देवार्चनादि यत्। सर्वं तदक्षयं कर्म तस्मिन्सरसि विश्रुतम्

dattaṁ japtaṁ kṛtaṁ yacca hutaṁ devārcanādi yat| sarvaṁ tadakṣayaṁ karma tasminsarasi viśrutam

'वहाँ जो कुछ दान किया गया, जपा गया, किया गया, हवन किया गया अथवा देव-पूजा आदि की गई — वह सब अक्षय कर्म उस सरोवर में विश्रुत है।'

श्लोक 16 (skanda.5.93.16)

निक्षिप्तस्त्वं तदा तेन भाविपुण्येन कर्मणा। तत्र स्थितस्त्वं भूपाल वर्षाणां पंचकं तथा

nikṣiptastvaṁ tadā tena bhāvipuṇyena karmaṇā| tatra sthitastvaṁ bhūpāla varṣāṇāṁ paṁcakaṁ tathā

'तभी उस भावी पुण्यकर्म के प्रभाव से तुम वहाँ डाले गए थे; हे भूपाल! तुम वहाँ पाँच वर्षों तक रहे।'

श्लोक 17 (skanda.5.93.17)

कदाचित्तीरभूम्यां त्वं गतः संक्रीडितुं शनैः। समीक्ष्य तत्र काकेन धृत्वा चंचुपुटेन च

kadācittīrabhūmyāṁ tvaṁ gataḥ saṁkrīḍituṁ śanaiḥ| samīkṣya tatra kākena dhṛtvā caṁcupuṭena ca

'एक बार तुम धीरे-धीरे तट पर क्रीड़ा करने गए, तब वहाँ किसी काक ने तुम्हें देखकर अपनी चोंच में पकड़ लिया।'

श्लोक 18 (skanda.5.93.18)

आकाशमार्गं चोड्डीनः स त्वया ताडितो भृशम्। त्वत्तीक्ष्णपातैश्चरणैस्ताडितो व्यथितस्तदा

ākāśamārgaṁ coḍḍīnaḥ sa tvayā tāḍito bhṛśam| tvattīkṣṇapātaiścaraṇaistāḍito vyathitastadā

'आकाश-मार्ग में उड़ते हुए उसे तुमने बलपूर्वक चोट पहुँचाई; तुम्हारे तीक्ष्ण पंजों की चोट से पीड़ित होकर वह व्यथित हुआ।'

श्लोक 19 (skanda.5.93.19)

मुक्तस्त्वं चंचुपुटतो वायसेनाकुलेन तु। स्वर्गद्वारस्य पूर्वे तु देव्यगारे सुपुण्यदे

muktastvaṁ caṁcupuṭato vāyasenākulena tu| svargadvārasya pūrve tu devyagāre supuṇyade

'व्याकुल हुए उस काक की चोंच से मुक्त होकर तुम स्वर्ग के द्वार के पूर्व में स्थित देवी के परम पुण्यदायक मंदिर के पास गिरे।'

श्लोक 20 (skanda.5.93.20)

शिवस्य क्षिप्तस्त्वं शीघ्रं चञ्च्वाक्षेपप्रपीडितः। मृतोऽसि संनिधौ तत्र देवस्य परमेष्ठिनः

śivasya kṣiptastvaṁ śīghraṁ cañcvākṣepaprapīḍitaḥ| mṛto'si saṁnidhau tatra devasya parameṣṭhinaḥ

'चोंच के आघात से पीड़ित होकर तुम शीघ्र ही वहाँ गिरे, और परमेष्ठी देव शिव की संनिधि में ही तुम्हारी मृत्यु हुई।'

श्लोक 21 (skanda.5.93.21)

विमुच्य देहं तज्जीर्णं यावत्तं कार्कटं पुरा। तत्क्षणाद्दिव्य देहश्च दिव्याभरणभूषितः

vimucya dehaṁ tajjīrṇaṁ yāvattaṁ kārkaṭaṁ purā| tatkṣaṇāddivya dehaśca divyābharaṇabhūṣitaḥ

'उस पुराने जीर्ण कर्कट-शरीर को त्यागते ही, उसी क्षण तुम्हें दिव्य आभूषणों से भूषित दिव्य देह प्राप्त हो गई।'

श्लोक 22 (skanda.5.93.22)

तस्य लिंगस्य माहात्म्याद्भूत्वा विद्याधरेश्वरः। कामगेन विमानेन पूज्यमानो गणेश्वरैः

tasya liṁgasya māhātmyādbhūtvā vidyādhareśvaraḥ| kāmagena vimānena pūjyamāno gaṇeśvaraiḥ

'उस लिंग के माहात्म्य से विद्याधरों के अधिपति बनकर, गणेश्वरों द्वारा पूजित होकर, इच्छानुसार चलने वाले विमान पर सवार हुए।'

श्लोक 23 (skanda.5.93.23)

स्वर्गे व्रजंस्त्वं संपृष्टः सुरसंघैश्च सादरम्। कोयं महात्मा मुदितो याति दिव्यपथोंऽबरात्

svarge vrajaṁstvaṁ saṁpṛṣṭaḥ surasaṁghaiśca sādaram| koyaṁ mahātmā mudito yāti divyapathoṁ'barāt

'स्वर्ग की ओर जाते हुए तुमसे देवसंघों ने आदरपूर्वक पूछा — यह कौन प्रसन्नचित्त महात्मा आकाश से दिव्य मार्ग पर जा रहा है?'

श्लोक 24 (skanda.5.93.24)

ततो रुद्रगणैः सर्वं सुराणां कथितं पुरा। वृत्तांतं विस्तरात्सर्वं कार्कटत्वविमोचनूम्

tato rudragaṇaiḥ sarvaṁ surāṇāṁ kathitaṁ purā| vṛttāṁtaṁ vistarātsarvaṁ kārkaṭatvavimocanūm

तब रुद्रगणों ने देवताओं को कर्कटत्व से मुक्ति का सम्पूर्ण पुरातन वृत्तांत विस्तार से बताया।

श्लोक 25 (skanda.5.93.25)

तस्य लिंगस्य देवेशाः प्रभावोऽयमुपस्थितः। देवैः प्रोक्तं च सहसा लिंगस्यास्य प्रभावतः

tasya liṁgasya deveśāḥ prabhāvo'yamupasthitaḥ| devaiḥ proktaṁ ca sahasā liṁgasyāsya prabhāvataḥ

'हे देवेशो! यह उस लिंग का प्रभाव है' — देवताओं ने उसी क्षण इस लिंग के प्रभाव से यह कहा।

श्लोक 26 (skanda.5.93.26)

कार्कटीयोनि मुक्तस्य प्राप्तं स्वर्गसुखं यतः। कर्कटेश्वरनामायमतो लोके भविष्यति

kārkaṭīyoni muktasya prāptaṁ svargasukhaṁ yataḥ| karkaṭeśvaranāmāyamato loke bhaviṣyati

'चूँकि कर्कट-योनि से मुक्त होकर उसने स्वर्ग-सुख प्राप्त किया, इसलिए अब से इसका नाम लोक में कर्कटेश्वर होगा।'

श्लोक 27 (skanda.5.93.27)

तदाप्रभृति देवोऽयं कर्कटेश्वरसंज्ञकः। त्वया स्वर्गे महाभोगा भुक्ता राजन्यथेच्छया

tadāprabhṛti devo'yaṁ karkaṭeśvarasaṁjñakaḥ| tvayā svarge mahābhogā bhuktā rājanyathecchayā

तभी से यह देव कर्कटेश्वर के नाम से जाना जाता है। हे राजन्! तुमने स्वर्ग में यथेच्छा महान भोगों का उपभोग किया।

श्लोक 28 (skanda.5.93.28)

आगतोऽसि पुनर्भूमौ लब्धं राज्यमकंटकम्। तस्य लिंगस्य माहात्म्याज्जातं सर्वं तवाधुना

āgato'si punarbhūmau labdhaṁ rājyamakaṁṭakam| tasya liṁgasya māhātmyājjātaṁ sarvaṁ tavādhunā

तुम पुनः पृथ्वी पर आए, और तुम्हें कंटकरहित राज्य प्राप्त हुआ; तुम्हारा यह सब कुछ अब उस लिंग के माहात्म्य से ही हुआ है।

श्लोक 29 (skanda.5.93.29)

तस्मात्पार्थिव भूयस्त्वं लिंगमाराधय द्रुतम्। जातिस्मरत्वमापन्नो वशिष्ठवचनात्तदा

tasmātpārthiva bhūyastvaṁ liṁgamārādhaya drutam| jātismaratvamāpanno vaśiṣṭhavacanāttadā

'अतः हे पार्थिव! तुम पुनः शीघ्र उस लिंग की आराधना करो।' तब वशिष्ठ के इस वचन से राजा को जातिस्मरत्व (पूर्वजन्म-स्मृति) प्राप्त हुआ।

श्लोक 30 (skanda.5.93.30)

पूर्वं कर्म स्मृतं तेन स्वकीयं पार्थिवेन तु। पुनर्गत्वा च तल्लिंगं पूजयामास यत्नतः

pūrvaṁ karma smṛtaṁ tena svakīyaṁ pārthivena tu| punargatvā ca talliṁgaṁ pūjayāmāsa yatnataḥ

उस राजा को अपना पूर्वकर्म स्मरण हो आया, और वह पुनः जाकर यत्नपूर्वक उस लिंग की पूजा करने लगा।

श्लोक 31 (skanda.5.93.31)

तस्मिँल्लिंगे लयं प्राप्तः स्वशरीरेण पार्वति। येऽर्चयंति सदा भक्त्या कर्कटेश्वरसंज्ञकम्। भुक्त्वा भोगांश्चिरं भूमौ ते यांति परमां गतिम्

tasmi~lliṁge layaṁ prāptaḥ svaśarīreṇa pārvati| ye'rcayaṁti sadā bhaktyā karkaṭeśvarasaṁjñakam| bhuktvā bhogāṁściraṁ bhūmau te yāṁti paramāṁ gatim

हे पार्वती! वह उस लिंग में अपने ही शरीर सहित लीन हो गया। जो लोग सदा भक्ति से कर्कटेश्वर की अर्चना करते हैं, वे पृथ्वी पर चिरकाल तक भोगों का उपभोग करके परम गति को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 32 (skanda.5.93.32)

नियमेन प्रपश्यंति ये देवं कर्कटेश्वरम्। अष्टम्यां वा चतुर्दश्यां तेषां पुण्यफलं शृणु

niyamena prapaśyaṁti ye devaṁ karkaṭeśvaram| aṣṭamyāṁ vā caturdaśyāṁ teṣāṁ puṇyaphalaṁ śṛṇu

जो लोग नियमपूर्वक अष्टमी अथवा चतुर्दशी को कर्कटेश्वर देव का दर्शन करते हैं, उनके पुण्य-फल को सुनो।

श्लोक 33 (skanda.5.93.33)

सूर्यदीप्तिप्रतीकाशैर्विमानैः सार्वकामिकैः। मृता मम पुरं यांति त्रिसप्तकुलसंयुताः

sūryadīptipratīkāśairvimānaiḥ sārvakāmikaiḥ| mṛtā mama puraṁ yāṁti trisaptakulasaṁyutāḥ

सूर्य के समान देदीप्यमान, सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाले विमानों पर, वे मरणोपरांत अपने इक्कीस कुलों (तीन गुणा सात पीढ़ियों) सहित मेरे नगर (शिवलोक) को जाते हैं।

श्लोक 34 (skanda.5.93.34)

तत्र दिव्यैर्महाभोगैः स्त्रीसहस्रैर्मनोरमैः। कल्पकोटिशतैर्देवि सेव्यमाना वसंति हि

tatra divyairmahābhogaiḥ strīsahasrairmanoramaiḥ| kalpakoṭiśatairdevi sevyamānā vasaṁti hi

हे देवी! वहाँ वे दिव्य महाभोगों तथा सहस्रों मनोरम स्त्रियों द्वारा सेवित होकर सैकड़ों करोड़ कल्पों तक निवास करते हैं।

श्लोक 35 (skanda.5.93.35)

तदंते विष्णुभवने तावत्कालं च संति हि। वैष्णवैर्विविधैर्भोगैः स्त्रीसहस्रैस्तु सेविताः

tadaṁte viṣṇubhavane tāvatkālaṁ ca saṁti hi| vaiṣṇavairvividhairbhogaiḥ strīsahasraistu sevitāḥ

उसके अंत में वे उतने ही समय तक विष्णु के भवन में, वैष्णव विविध भोगों से तथा सहस्रों स्त्रियों से सेवित होकर रहते हैं।

श्लोक 36 (skanda.5.93.36)

विष्णुलोकाद्ब्रह्मलोकं संप्राप्य मुदिताः पुनः। भोगान्नानाविधान्भुक्त्वा ततो यांति परं पदम्

viṣṇulokādbrahmalokaṁ saṁprāpya muditāḥ punaḥ| bhogānnānāvidhānbhuktvā tato yāṁti paraṁ padam

विष्णुलोक से पुनः हर्षपूर्वक ब्रह्मलोक को प्राप्त करके, अनेक प्रकार के भोगों का उपभोग करके, वे तत्पश्चात परम पद को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 37 (skanda.5.93.37)

दशाश्वमैधैर्यत्पुण्यं तत्फलं तीर्थयात्रया। कर्कटेश्वरदेवस्य मेघनादेश्वरं शृणु

daśāśvamaidhairyatpuṇyaṁ tatphalaṁ tīrthayātrayā| karkaṭeśvaradevasya meghanādeśvaraṁ śṛṇu

दस अश्वमेध यज्ञों से जो पुण्य प्राप्त होता है, वही फल कर्कटेश्वर देव की तीर्थयात्रा से प्राप्त होता है। अब मेघनादेश्वर की कथा सुनो।

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