अवन्ती खण्ड · अध्याय 94
मेघनादेश्वर की महिमा
श्लोक 1 (skanda.5.94.1)
श्रीहर उवाच। मेघनादेश्वरं देवि त्रयोविंशतिमं शृणु। यस्य दर्शनमात्रेण प्राप्यते सर्वसिद्धयः
śrīhara uvāca| meghanādeśvaraṁ devi trayoviṁśatimaṁ śṛṇu| yasya darśanamātreṇa prāpyate sarvasiddhayaḥ
श्री हर ने कहा — हे देवी! तेईसवें देव मेघनादेश्वर को सुनो, जिनके दर्शनमात्र से सर्व सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।
श्लोक 2 (skanda.5.94.2)
राजमूला महादेवि योगक्षेमाः सुवृष्टयः। प्रजाश्च व्याधयश्चैव मरणं च भयानि च
rājamūlā mahādevi yogakṣemāḥ suvṛṣṭayaḥ| prajāśca vyādhayaścaiva maraṇaṁ ca bhayāni ca
हे महादेवी! राजा ही योग-क्षेम, अच्छी वर्षा, प्रजा, व्याधियों, मृत्यु और भयों का मूल कारण है।
श्लोक 3 (skanda.5.94.3)
राजा कृतं तथा त्रेता द्वापरश्च तथा कलिः। राजमूलानि सर्वाणि राजाधर्मस्य कारणम्
rājā kṛtaṁ tathā tretā dvāparaśca tathā kaliḥ| rājamūlāni sarvāṇi rājādharmasya kāraṇam
राजा ही कृत, त्रेता, द्वापर तथा कलि युगों का मूल है; राजा का धर्म ही इन सबका कारण है।
श्लोक 4 (skanda.5.94.4)
राजा बभूव लोकेऽस्मिन्मदांधोनाम पार्वति। अहंकारावृतो दुष्टो देवब्राह्मणकंटकः
rājā babhūva loke'sminmadāṁdhonāma pārvati| ahaṁkārāvṛto duṣṭo devabrāhmaṇakaṁṭakaḥ
हे पार्वती! इस लोक में मदान्ध नामक एक राजा हुआ, अहंकार से आवृत, दुष्ट, देवताओं और ब्राह्मणों के लिए कंटकस्वरूप।
श्लोक 5 (skanda.5.94.5)
कलि द्वापरयोः संधौ तस्य दोषाच्च भामिनि। अनावृष्टिरभूद्धोरा लोके द्वादशवार्षिकी
kali dvāparayoḥ saṁdhau tasya doṣācca bhāmini| anāvṛṣṭirabhūddhorā loke dvādaśavārṣikī
हे भामिनी! द्वापर और कलि के संधिकाल में, उसके ही दोष से लोक में बारह वर्षों तक भीषण अनावृष्टि हुई।
श्लोक 6 (skanda.5.94.6)
न ववर्ष सहस्राक्षः प्रतिलोमोऽभवत्प्रभुः। नादृश्यन्तापि रात्र्यंते कुत एवाभ्रजातयः
na vavarṣa sahasrākṣaḥ pratilomo'bhavatprabhuḥ| nādṛśyantāpi rātryaṁte kuta evābhrajātayaḥ
सहस्राक्ष (इंद्र) ने वर्षा नहीं की, वह प्रभु प्रतिकूल हो गया; रात्रि के अंत में भी बादल दिखाई नहीं देते थे, तो मेघों की उत्पत्ति कहाँ से होती?
श्लोक 7 (skanda.5.94.7)
नद्यः संक्षिप्ततोयौघाः क्वचिदंतर्हितास्तदा। निवृत्तयज्ञस्वाध्याया निर्वषट्कारमंगलाः
nadyaḥ saṁkṣiptatoyaughāḥ kvacidaṁtarhitāstadā| nivṛttayajñasvādhyāyā nirvaṣaṭkāramaṁgalāḥ
नदियाँ जल-राशि से क्षीण होकर कहीं-कहीं लुप्त हो गईं; यज्ञ और स्वाध्याय बंद हो गए, वषट्कार और मंगल-ध्वनियाँ समाप्त हो गईं।
श्लोक 8 (skanda.5.94.8)
उच्छिन्नकृषि गोरक्षा निवृत्तविपणास्तथा। अस्थिकंकालसंकीर्णा हाहाभूतनराकुलाः
ucchinnakṛṣi gorakṣā nivṛttavipaṇāstathā| asthikaṁkālasaṁkīrṇā hāhābhūtanarākulāḥ
कृषि और गोरक्षा नष्ट हो गई, बाज़ार बंद हो गए; भूमि अस्थियों और कंकालों से पट गई, 'हा-हा' करते व्याकुल लोगों से भर गई।
श्लोक 9 (skanda.5.94.9)
शून्यभूयिष्ठनगरा दग्धग्रामनिवेशिनः। गोजाश्वमहिषैर्हीना भक्ष्यमाणाः परस्परम्
śūnyabhūyiṣṭhanagarā dagdhagrāmaniveśinaḥ| gojāśvamahiṣairhīnā bhakṣyamāṇāḥ parasparam
नगर प्रायः शून्य हो गए, गाँव जल गए और उजड़ गए; गाय, घोड़े और भैंसों से रहित लोग परस्पर एक-दूसरे को खाने लगे।
श्लोक 10 (skanda.5.94.10)
आश्रमान्संपरित्यज्य पर्यधावन्नितस्ततः। ब्राह्मणा दुःखबहुला मृता नष्टाश्च पार्वति
āśramānsaṁparityajya paryadhāvannitastataḥ| brāhmaṇā duḥkhabahulā mṛtā naṣṭāśca pārvati
अपने आश्रम त्यागकर लोग इधर-उधर भागने लगे; हे पार्वती! ब्राह्मण अत्यंत दुःखी होकर मरे और नष्ट हो गए।
श्लोक 11 (skanda.5.94.11)
सूष्टिरुन्मूलिता सर्वा जंगमा स्थावराखिला। एतस्मिन्नंतरे देवाः शक्राद्या भयविह्वलाः
sūṣṭirunmūlitā sarvā jaṁgamā sthāvarākhilā| etasminnaṁtare devāḥ śakrādyā bhayavihvalāḥ
समस्त सृष्टि, चर और स्थावर, समूल उखड़ गई। इसी बीच शक्र आदि देवगण भय से विह्वल हो उठे।
श्लोक 12 (skanda.5.94.12)
शरण्यं शरणं जग्मुर्देवदेवं जनार्दनम्। क्षीरोदस्योत्तरे कूले श्वेतद्वीपं मनोरमम्
śaraṇyaṁ śaraṇaṁ jagmurdevadevaṁ janārdanam| kṣīrodasyottare kūle śvetadvīpaṁ manoramam
वे शरण देने योग्य देवाधिदेव जनार्दन की शरण में गए, क्षीरसागर के उत्तरी तट पर स्थित मनोहर श्वेतद्वीप में।
श्लोक 13 (skanda.5.94.13)
ब्रह्मलोकादिभिर्लोकैरनौपम्यगुणं शुभम्। सदानंदकरं शांतं सूर्यकोटिसमप्रभम्
brahmalokādibhirlokairanaupamyaguṇaṁ śubham| sadānaṁdakaraṁ śāṁtaṁ sūryakoṭisamaprabham
वह स्थान ब्रह्मलोक आदि लोकों से भी अनुपम गुणों वाला, शुभ, सदा आनंद देने वाला, शांत तथा करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी था।
श्लोक 14 (skanda.5.94.14)
स्वेच्छाकल्पितवि न्यासप्रासादशयनासनम्। वज्रेंद्रनीलवैडूर्यचंद्रकांतादिदीपितम्
svecchākalpitavi nyāsaprāsādaśayanāsanam| vajreṁdranīlavaiḍūryacaṁdrakāṁtādidīpitam
वहाँ इच्छानुसार रचे गए भवन, शय्याएँ और आसन थे, वज्र, इंद्रनील, वैडूर्य, चंद्रकांत आदि मणियों से देदीप्यमान।
श्लोक 15 (skanda.5.94.15)
जरामृत्युभयोपेतसर्वव्याधिविवर्जितम्। तस्मिन्द्वीपे ततो देवि सूर्य कोटिसमप्रभम्। साष्टांगां प्रणतिं कृत्वा ते देवाः स्तुतिमब्रुवन्
jarāmṛtyubhayopetasarvavyādhivivarjitam| tasmindvīpe tato devi sūrya koṭisamaprabham| sāṣṭāṁgāṁ praṇatiṁ kṛtvā te devāḥ stutimabruvan
वह स्थान जरा-मृत्यु के भय से और समस्त व्याधियों से रहित था। हे देवी! उस द्वीप में करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी देव को देखकर, देवगणों ने अष्टांग प्रणाम करके यह स्तुति की।
श्लोक 16 (skanda.5.94.16)
भवान्ब्रह्मा च रुद्रश्च महेंद्रो देवसत्तमः। भवान्कर्त्ता विकर्त्ता च लोकानां प्रभवोऽव्ययः
bhavānbrahmā ca rudraśca maheṁdro devasattamaḥ| bhavānkarttā vikarttā ca lokānāṁ prabhavo'vyayaḥ
'आप ही ब्रह्मा हैं, आप ही रुद्र और महेंद्र, देवश्रेष्ठ हैं; आप ही लोकों के कर्ता और विकर्ता, अव्यय उद्गम हैं।'
श्लोक 17 (skanda.5.94.17)
एवं च सत्यं परमं तपश्च परमं तथा। पवित्रं परममार्गं यज्ञस्त्वं परमः प्रभो
evaṁ ca satyaṁ paramaṁ tapaśca paramaṁ tathā| pavitraṁ paramamārgaṁ yajñastvaṁ paramaḥ prabho
'इसी प्रकार आप ही परम सत्य हैं, आप ही परम तप हैं; आप ही परम पवित्र मार्ग हैं, हे प्रभो! आप ही परम यज्ञ हैं।'
श्लोक 18 (skanda.5.94.18)
परं हौत्रं परं धाम त्वामाहुः पुरुषं परम्। एवं स्तुतस्तदा तैस्तु देवदेवो वरानने
paraṁ hautraṁ paraṁ dhāma tvāmāhuḥ puruṣaṁ param| evaṁ stutastadā taistu devadevo varānane
'आपको परम हवि, परम धाम, परम पुरुष कहा जाता है।' हे वरानने! इस प्रकार उनके द्वारा स्तुत हुए देवाधिदेव...
श्लोक 19 (skanda.5.94.19)
प्राह देवांस्ततः कृष्णः किं करोम्यद्य वः सुराः। विज्ञप्तस्तैर्हरिर्देवो ह्यनावृष्ट्या प्रपीडितैः
prāha devāṁstataḥ kṛṣṇaḥ kiṁ karomyadya vaḥ surāḥ| vijñaptastairharirdevo hyanāvṛṣṭyā prapīḍitaiḥ
...तब कृष्ण ने देवताओं से कहा — 'हे सुरगण! अब मैं तुम्हारे लिए क्या करूँ?' अनावृष्टि से पीड़ित उन देवताओं ने हरि देव से इस प्रकार निवेदन किया।
श्लोक 20 (skanda.5.94.20)
उपायः कथ्यतां देव तुष्टिः धुष्टिर्यथा भवेत्। ध्यानेन चिंतयित्वा च कथयामास केशवः
upāyaḥ kathyatāṁ deva tuṣṭiḥ dhuṣṭiryathā bhavet| dhyānena ciṁtayitvā ca kathayāmāsa keśavaḥ
'हे देव! वह उपाय बताइए जिससे तुष्टि और संतोष प्राप्त हो।' ध्यान से विचार करके केशव ने कहा।
श्लोक 21 (skanda.5.94.21)
गच्छध्वं त्रिदशाः सर्वे महाकालवने शुभे। लिंगं वृष्टिकरं तत्र पुरा मेघैः प्रतिष्ठितम्
gacchadhvaṁ tridaśāḥ sarve mahākālavane śubhe| liṁgaṁ vṛṣṭikaraṁ tatra purā meghaiḥ pratiṣṭhitam
'हे समस्त देवगण! तुम शुभ महाकालवन को जाओ; वहाँ वर्षा देने वाला एक लिंग है, जो पूर्वकाल में मेघों द्वारा प्रतिष्ठित किया गया था।'
श्लोक 22 (skanda.5.94.22)
मेघा वृष्टिकराः सर्वे तस्मिँल्लिंगे च संति वै। तस्य लिंगस्य माहात्म्याद्वृष्टिरेव भविष्यति
meghā vṛṣṭikarāḥ sarve tasmi~lliṁge ca saṁti vai| tasya liṁgasya māhātmyādvṛṣṭireva bhaviṣyati
'वर्षा करने वाले समस्त मेघ उसी लिंग में विद्यमान हैं; उस लिंग के माहात्म्य से वर्षा अवश्य होगी।'
श्लोक 23 (skanda.5.94.23)
प्रतीहारेश्वराद्देवादीशाने विद्यते सुराः। तस्य तद्वचनं श्रुत्वा वासुदेवस्य पार्वति
pratīhāreśvarāddevādīśāne vidyate surāḥ| tasya tadvacanaṁ śrutvā vāsudevasya pārvati
'प्रतीहारेश्वर देव से ईशान दिशा में देवगण विद्यमान हैं।' हे पार्वती! वासुदेव के उस वचन को सुनकर...
श्लोक 24 (skanda.5.94.24)
महाकालवने प्राप्ता यत्रास्ते लिंगमुत्तमम्। तुष्टुवुः परया भक्त्या दृष्ट्वा देवं मनोरमम्
mahākālavane prāptā yatrāste liṁgamuttamam| tuṣṭuvuḥ parayā bhaktyā dṛṣṭvā devaṁ manoramam
...वे महाकालवन में पहुँचे, जहाँ वह उत्तम लिंग स्थित है; उस मनोहर देव को देखकर उन्होंने परम भक्ति से स्तुति की।
श्लोक 25 (skanda.5.94.25)
नमस्तेऽस्तु महेशाय नमोऽनंताय मालिने। नमस्तैजसमूर्त्ताय नमः सौंदर्यशालिने
namaste'stu maheśāya namo'naṁtāya māline| namastaijasamūrttāya namaḥ sauṁdaryaśāline
'महेश को नमस्कार हो! मालाधारी अनंत को नमस्कार! तेजोमय स्वरूप को नमस्कार! सौंदर्यशाली को नमस्कार!'
श्लोक 26 (skanda.5.94.26)
नमो योगाय वेदाय नमः पिंगजटाय ते। अनंतज्ञानदेहाय नम ईश्वरमूर्त्तये
namo yogāya vedāya namaḥ piṁgajaṭāya te| anaṁtajñānadehāya nama īśvaramūrttaye
'योग को नमस्कार, वेद को नमस्कार! हे पिंगल जटाधारी! आपको नमस्कार! अनंत ज्ञान की देहवाले को, ईश्वर-स्वरूप को नमस्कार!'
श्लोक 27 (skanda.5.94.27)
नमः शुभ्राट्टहासाय नमस्तेऽस्तु शिखंडिने। शंकराय नमस्तेऽस्तु नमस्तेस्तु पिनाकिने
namaḥ śubhrāṭṭahāsāya namaste'stu śikhaṁḍine| śaṁkarāya namaste'stu namastestu pinākine
'उज्ज्वल भीषण अट्टहास को नमस्कार! हे शिखंडी! आपको नमस्कार! हे शंकर! आपको नमस्कार! हे पिनाकधारी! आपको नमस्कार!'
श्लोक 28 (skanda.5.94.28)
नमोंऽतकाय भव्याय त्र्यंबकायास्तु ते नमः। नमस्ते बहुरूपाय नमस्तेऽचिंत्यमूर्त्तये
namoṁ'takāya bhavyāya tryaṁbakāyāstu te namaḥ| namaste bahurūpāya namaste'ciṁtyamūrttaye
'अंतक (संहारक) और मंगलमय को नमस्कार, त्र्यंबक को आपको नमस्कार हो! बहुरूप को नमस्कार, अचिंत्य स्वरूप को आपको नमस्कार!'
श्लोक 29 (skanda.5.94.29)
नमो योगशरीराय नमस्ते सर्व सर्वदा। नष्टं देव जगत्सर्वमनावृष्ट्या प्रपीडितम्
namo yogaśarīrāya namaste sarva sarvadā| naṣṭaṁ deva jagatsarvamanāvṛṣṭyā prapīḍitam
'योग-शरीर को नमस्कार, सदा सर्वथा आपको नमस्कार! हे देव! अनावृष्टि से पीड़ित यह सम्पूर्ण जगत नष्ट हो रहा है।'
श्लोक 30 (skanda.5.94.30)
सुवृष्ट्या देवदेवेश पाहि नः शरणागतान्। एतस्मिन्नंतरे मेघा पार्वणांगारवर्चसः
suvṛṣṭyā devadeveśa pāhi naḥ śaraṇāgatān| etasminnaṁtare meghā pārvaṇāṁgāravarcasaḥ
'हे देवाधिदेव! शुभ वर्षा से शरणागत हम सबकी रक्षा कीजिए।' इसी बीच पूर्णिमा के अंगारों के समान तेजस्वी मेघ...
श्लोक 31 (skanda.5.94.31)
लिंगमध्यात्समुत्तस्थुर्वादयंतो नभस्तलम्। अन्योन्यवेगाभिहता ववृषुर्भूतले तदा
liṁgamadhyātsamuttasthurvādayaṁto nabhastalam| anyonyavegābhihatā vavṛṣurbhūtale tadā
...उस लिंग के मध्य से उठकर आकाश को गुँजाते हुए, परस्पर वेग से टकराकर, तब पृथ्वी पर वर्षा करने लगे।
श्लोक 32 (skanda.5.94.32)
जातं विनिष्प्रभं सर्वं न प्राज्ञायत किंचन। तिमिरौघपरिक्षिप्ता रेजुश्चाथ दिशो दश
jātaṁ viniṣprabhaṁ sarvaṁ na prājñāyata kiṁcana| timiraughaparikṣiptā rejuścātha diśo daśa
सब कुछ प्रकाशहीन हो गया, कुछ भी दिखाई नहीं देता था; अंधकार के समूह से घिरी दसों दिशाएँ छा गईं।
श्लोक 33 (skanda.5.94.33)
ते तस्य देवदेवस्य माहात्म्येन प्रतोषिताः। देवाः प्रीतिं परां जग्मुः सर्वेऽमृतमिवोत्तमाः
te tasya devadevasya māhātmyena pratoṣitāḥ| devāḥ prītiṁ parāṁ jagmuḥ sarve'mṛtamivottamāḥ
उस देवाधिदेव के माहात्म्य से संतुष्ट हुए वे सभी देवगण, अमृत के समान परम प्रसन्नता को प्राप्त हुए।
श्लोक 34 (skanda.5.94.34)
ततस्तमः संहरतो विनेशुश्च बलाहका। प्रववुः शीतला वाताः प्रशांताश्च दिशो दश
tatastamaḥ saṁharato vineśuśca balāhakā| pravavuḥ śītalā vātāḥ praśāṁtāśca diśo daśa
तब अंधकार दूर होते ही मेघ छँट गए, शीतल वायु बहने लगी और दसों दिशाएँ शांत हो गईं।
श्लोक 35 (skanda.5.94.35)
शुद्धप्रभाणि ज्योतींषि सोमं चक्रुः प्रदक्षिणाम्। अविग्रहं ग्रहाश्चक्रुः प्रशांताश्चापि सिन्धवः
śuddhaprabhāṇi jyotīṁṣi somaṁ cakruḥ pradakṣiṇām| avigrahaṁ grahāścakruḥ praśāṁtāścāpi sindhavaḥ
शुद्ध प्रभा वाले नक्षत्रों ने चंद्रमा की प्रदक्षिणा की, ग्रह बिना किसी बाधा के गतिमान हुए और समुद्र भी शांत हो गए।
श्लोक 36 (skanda.5.94.36)
महर्षयो विशोकाश्च गंधर्वाश्च कलं जगुः। अभूत्सृष्टिः पुनः सर्वा लिंगस्यास्य प्रभावतः
maharṣayo viśokāśca gaṁdharvāśca kalaṁ jaguḥ| abhūtsṛṣṭiḥ punaḥ sarvā liṁgasyāsya prabhāvataḥ
महर्षिगण शोकरहित हो गए, गंधर्व मधुर गीत गाने लगे; इस लिंग के प्रभाव से समस्त सृष्टि पुनः जीवंत हो उठी।
श्लोक 37 (skanda.5.94.37)
सुरैः संपूज्य भक्त्या ते चक्रुर्नाम यथार्थतः। अस्य लिंगस्य माहात्म्यं दृष्ट्वा प्रीताः सुरा बहु
suraiḥ saṁpūjya bhaktyā te cakrurnāma yathārthataḥ| asya liṁgasya māhātmyaṁ dṛṣṭvā prītāḥ surā bahu
देवताओं ने भक्तिपूर्वक पूजा करके इसका सार्थक नाम रखा। इस लिंग के माहात्म्य को देखकर देवगण अत्यंत प्रसन्न होकर बोले —
श्लोक 38 (skanda.5.94.38)
मेघनादेश्वरं नाम भविष्यत्यस्य सर्वतः। मेघनादेश्वराख्यानं मया ते कथितं प्रिये
meghanādeśvaraṁ nāma bhaviṣyatyasya sarvataḥ| meghanādeśvarākhyānaṁ mayā te kathitaṁ priye
'यह सर्वथा मेघनादेश्वर नाम से जाना जाएगा।' हे प्रिये! मैंने तुम्हें मेघनादेश्वर का यह आख्यान कह सुनाया।
श्लोक 39 (skanda.5.94.39)
भविष्यंति नरा भूमौ कृतार्थास्तत्प्रभावतः। दर्शनादस्य लिंगस्य कामवृष्टिर्भविष्यति
bhaviṣyaṁti narā bhūmau kṛtārthāstatprabhāvataḥ| darśanādasya liṁgasya kāmavṛṣṭirbhaviṣyati
इसके प्रभाव से पृथ्वी पर मनुष्य कृतार्थ होंगे; इस लिंग के दर्शन से इच्छानुसार वर्षा होगी।
श्लोक 40 (skanda.5.94.40)
कल्पकोटिसहस्राणि कल्पकोटिशतानि च। कुर्वंल्लिंगस्य स्नपनं रुद्रलोके महीयते
kalpakoṭisahasrāṇi kalpakoṭiśatāni ca| kurvaṁlliṁgasya snapanaṁ rudraloke mahīyate
जो हजारों-करोड़ों और सैकड़ों-करोड़ों कल्पों तक इस लिंग का स्नपन (अभिषेक) करता है, वह रुद्रलोक में पूजित होता है।
श्लोक 41 (skanda.5.94.41)
प्रभावः पठ्यते यत्र मेघनादस्य पार्वति। अतिवृष्टिश्चैव ततो भविष्यति च भूतले
prabhāvaḥ paṭhyate yatra meghanādasya pārvati| ativṛṣṭiścaiva tato bhaviṣyati ca bhūtale
हे पार्वती! जहाँ भी मेघनाद का यह माहात्म्य पढ़ा जाता है, वहाँ पृथ्वी पर अत्यंत भरपूर वर्षा होगी।