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अवन्ती खण्ड · अध्याय 96

मुक्तीश्वर की महिमा

अध्याय 95अध्याय-सूचीअध्याय 97

श्लोक 1 (skanda.5.96.1)

श्रीहर उवाच। पंचविंशतिकं देवं विद्धि मुक्तीश्वरं प्रिये। यस्य दर्शनमात्रेण मुक्तिर्भवति पार्वति

śrīhara uvāca| paṁcaviṁśatikaṁ devaṁ viddhi muktīśvaraṁ priye| yasya darśanamātreṇa muktirbhavati pārvati

श्री हर ने कहा — हे प्रिये! पच्चीसवें देव को मुक्तीश्वर जानो, जिनके दर्शनमात्र से, हे पार्वती! मुक्ति प्राप्त होती है।

श्लोक 2 (skanda.5.96.2)

पुरा राथंतरे कल्पे बभूव द्विजसत्तमः। मुक्तिर्नाम महाभागे संशितात्मा जितेंद्रियः

purā rāthaṁtare kalpe babhūva dvijasattamaḥ| muktirnāma mahābhāge saṁśitātmā jiteṁdriyaḥ

हे महाभागे! पूर्वकाल में राथंतर कल्प में मुक्ति नामक एक श्रेष्ठ द्विज हुआ, संयतात्मा और जितेन्द्रिय।

श्लोक 3 (skanda.5.96.3)

महाकालसमीपे तु मुक्तिलिंगमनुत्तमम्। महाकालवने रम्ये तत्रास्ते योगत त्परः

mahākālasamīpe tu muktiliṁgamanuttamam| mahākālavane ramye tatrāste yogata tparaḥ

महाकाल के समीप एक अनुपम मुक्ति-लिंग है; रमणीय महाकालवन में वह योगपरायण होकर वहीं रहता था।

श्लोक 4 (skanda.5.96.4)

ततस्तेपे जिताहारो वत्सराणि त्रयोदश। कदाचित्सोऽभिषेकाय आजगाम महानदीम्

tatastepe jitāhāro vatsarāṇi trayodaśa| kadācitso'bhiṣekāya ājagāma mahānadīm

तब आहार को वश में रखते हुए उसने तेरह वर्षों तक तप किया; एक बार वह स्नान के लिए उस महानदी पर गया।

श्लोक 5 (skanda.5.96.5)

शिप्रां विप्रप्रियां पुण्यां महापातकना शिनीम्। तत्र स्नात्वा जपन्विप्रो ददर्शायांतमग्रतः

śiprāṁ viprapriyāṁ puṇyāṁ mahāpātakanā śinīm| tatra snātvā japanvipro dadarśāyāṁtamagrataḥ

ब्राह्मणों को प्रिय, पवित्र, महापातकों का नाश करने वाली शिप्रा नदी — वहाँ स्नान करके जप करते हुए उस विप्र ने अपने सामने किसी को आते देखा।

श्लोक 6 (skanda.5.96.6)

व्याधं महाधनुष्पाणिं रक्तनेत्रं सुभीषणम्। वदंतं हन्तुकामं वै वल्कलानां जिघृक्षया

vyādhaṁ mahādhanuṣpāṇiṁ raktanetraṁ subhīṣaṇam| vadaṁtaṁ hantukāmaṁ vai valkalānāṁ jighṛkṣayā

बड़े धनुष को हाथ में लिए, रक्त-नेत्र, अत्यंत भयंकर, वल्कल-वस्त्र छीनने की इच्छा से मारने को उद्यत बोलता हुआ एक व्याध (शिकारी) को।

श्लोक 7 (skanda.5.96.7)

तं दृष्ट्वा क्षुभितो विप्रो ब्रह्मघ्नस्य भयादिति। ध्यायन्नारायणं देवं तस्थौ तत्रैव स द्विजः

taṁ dṛṣṭvā kṣubhito vipro brahmaghnasya bhayāditi| dhyāyannārāyaṇaṁ devaṁ tasthau tatraiva sa dvijaḥ

उसे देखकर वह विप्र, ब्रह्महत्या के भय से क्षुभित हो उठा; नारायण देव का ध्यान करते हुए वह द्विज वहीं ठहर गया।

श्लोक 8 (skanda.5.96.8)

तं दृष्ट्वांतर्गतहरिर्व्याधो भीत इवाग्रतः। विहाय सशरं चापं ततो वचनमब्रवीत्

taṁ dṛṣṭvāṁtargataharirvyādho bhīta ivāgrataḥ| vihāya saśaraṁ cāpaṁ tato vacanamabravīt

उसे देखकर, अंतर में हरि को धारण किए हुए उस विप्र के समक्ष, मानो भयभीत हो, व्याध ने बाण सहित धनुष त्यागकर यह वचन कहा।

श्लोक 9 (skanda.5.96.9)

व्याध उवाच। हंतुमिच्छुरहं ब्रह्मन्भगवन्तमिहागतः। इदानीं स्वगता बुद्धिस्त्वां दृष्ट्वैव महाप्रभम्

vyādha uvāca| haṁtumicchurahaṁ brahmanbhagavantamihāgataḥ| idānīṁ svagatā buddhistvāṁ dṛṣṭvaiva mahāprabham

व्याध ने कहा — 'हे ब्रह्मन्! मैं भगवन्त को मारने की इच्छा से यहाँ आया था; परंतु अब आपको इस महातेजस्वी रूप में देखकर मेरी बुद्धि बदल गई है।'

श्लोक 10 (skanda.5.96.10)

ब्राह्मणानां सहस्राणि स्त्रीणामयुतशस्तथा। निहतानि मया ब्रह्मन्वृत्तिहेतोः कुटुंबिना

brāhmaṇānāṁ sahasrāṇi strīṇāmayutaśastathā| nihatāni mayā brahmanvṛttihetoḥ kuṭuṁbinā

'हे ब्रह्मन्! आजीविका के हेतु, कुटुंब-पालन के लिए मैंने हज़ारों ब्राह्मणों और दस हज़ार स्त्रियों का वध किया है।'

श्लोक 11 (skanda.5.96.11)

न च मे व्यथितं चित्तं कदाचिदपि जायते। इदानीं तप्तुमिच्छामि तपोऽहं त्वत्समीपतः

na ca me vyathitaṁ cittaṁ kadācidapi jāyate| idānīṁ taptumicchāmi tapo'haṁ tvatsamīpataḥ

'फिर भी मेरा चित्त कभी व्यथित नहीं होता। अब मैं आपके समीप तप करना चाहता हूँ।'

श्लोक 12 (skanda.5.96.12)

उपदेशप्रदानेन प्रसादं कर्तुमर्हसि। एवमुक्तो ह्यसौ विप्रो नोत्तरं प्रत्यप द्यत

upadeśapradānena prasādaṁ kartumarhasi| evamukto hyasau vipro nottaraṁ pratyapa dyata

'उपदेश देकर मुझ पर प्रसन्न होने योग्य हैं आप।' इस प्रकार कहे जाने पर भी उस विप्र ने कोई उत्तर नहीं दिया।

श्लोक 13 (skanda.5.96.13)

ब्रह्महा पापकर्मेति मत्वा ब्राह्मणपुंगवः। अनुक्तोऽपि स धर्मस्तु व्याधस्तत्रैव तस्थिवान्

brahmahā pāpakarmeti matvā brāhmaṇapuṁgavaḥ| anukto'pi sa dharmastu vyādhastatraiva tasthivān

उसे 'ब्रह्महत्यारा, पापकर्मा' मानकर वह श्रेष्ठ ब्राह्मण चुप रहा; बिना उपदेश पाए भी वह व्याध उसी संयम-धर्म में वहीं ठहरा रहा।

श्लोक 14 (skanda.5.96.14)

स्नात्वा सद्यः समायातो मुक्ति लिंगसमीपतः। द्विजेन सहितो देवि दृष्ट्वा देवं सनातनम्

snātvā sadyaḥ samāyāto mukti liṁgasamīpataḥ| dvijena sahito devi dṛṣṭvā devaṁ sanātanam

स्नान करके वह तुरंत मुक्ति-लिंग के समीप आया; हे देवी! उस द्विज (व्याध) के साथ सनातन देव का दर्शन करते हुए —

श्लोक 15 (skanda.5.96.15)

तत्क्षणाद्दिव्यदेहस्तु तस्मिँल्लिंगे लयं गतः। दृष्ट्वा तन्महदाश्चर्यं मुक्तिर्विप्रो निजांतरे। चिंतयामास सहसा मुक्तिः प्राप्ता वरानने

tatkṣaṇāddivyadehastu tasmi~lliṁge layaṁ gataḥ| dṛṣṭvā tanmahadāścaryaṁ muktirvipro nijāṁtare| ciṁtayāmāsa sahasā muktiḥ prāptā varānane

—उसी क्षण दिव्य देह प्राप्त करके वह उस लिंग में लीन हो गया। उस महान आश्चर्य को देखकर मुक्ति नामक विप्र ने अपने मन में सोचा — 'हे वरानने! इसे मुक्ति प्राप्त हो गई।'

श्लोक 16 (skanda.5.96.16)

व्याधेन पापयुक्तेन समाधिरहितेन च। मया पुनः समाचीर्णं तपः परम दुष्करम्

vyādhena pāpayuktena samādhirahitena ca| mayā punaḥ samācīrṇaṁ tapaḥ parama duṣkaram

'इस पापयुक्त, समाधिरहित व्याध ने भी और मैंने भी बार-बार यह परम दुष्कर तप किया।'

श्लोक 17 (skanda.5.96.17)

न प्राप्ता परमा मूर्त्तिर्मुक्तिर्नैव च लभ्यते। एवं सचिंतयित्वाथ वैराग्याद्ब्राह्मणर्षभः। अन्तर्जलगतो भूत्वा चचार विपुलं तपः

na prāptā paramā mūrttirmuktirnaiva ca labhyate| evaṁ saciṁtayitvātha vairāgyādbrāhmaṇarṣabhaḥ| antarjalagato bhūtvā cacāra vipulaṁ tapaḥ

'फिर भी मुझे परम स्वरूप की प्राप्ति नहीं हुई, मुक्ति भी नहीं मिली।' ऐसा विचार करके वैराग्यवश वह श्रेष्ठ ब्राह्मण जल के भीतर जाकर विपुल तप करने लगा।

श्लोक 18 (skanda.5.96.18)

कस्यचित्त्वथ कालस्य तां नदीमगमत्किल। व्याघ्रो बुभुक्षितः साध्वि तं विहंतुं समुद्यतः

kasyacittvatha kālasya tāṁ nadīmagamatkila| vyāghro bubhukṣitaḥ sādhvi taṁ vihaṁtuṁ samudyataḥ

हे साध्वी! कुछ समय बाद उस नदी पर एक भूखा बाघ आया, जो उसे मार डालने को उद्यत हुआ।

श्लोक 19 (skanda.5.96.19)

अंतर्जलचरं विप्रं यावद्व्याघ्रो जिघृक्षति। नमो नारायणायेति तावद्वाक्यं द्विजोऽब्रवीत्

aṁtarjalacaraṁ vipraṁ yāvadvyāghro jighṛkṣati| namo nārāyaṇāyeti tāvadvākyaṁ dvijo'bravīt

जब वह बाघ जल के भीतर विचरण करते उस विप्र को पकड़ने ही वाला था, तभी उस द्विज ने कहा — 'नमो नारायणाय।'

श्लोक 20 (skanda.5.96.20)

व्याघ्रेणापि श्रुतो मंत्रोऽजहात्प्राणांश्च तत्क्षणात्। दिव्यांबरधरो देवि दिव्याभरणभूषितः। दिव्यालंकारशोभाढ्यः पुरुषश्चाभवच्छुभः

vyāghreṇāpi śruto maṁtro'jahātprāṇāṁśca tatkṣaṇāt| divyāṁbaradharo devi divyābharaṇabhūṣitaḥ| divyālaṁkāraśobhāḍhyaḥ puruṣaścābhavacchubhaḥ

उस मंत्र को सुनकर बाघ ने भी उसी क्षण अपने प्राण त्याग दिए; और, हे देवी! दिव्य वस्त्र धारण किए, दिव्य आभूषणों से भूषित तथा दिव्य अलंकारों की शोभा से युक्त एक शुभ पुरुष उत्पन्न हुआ।

श्लोक 21 (skanda.5.96.21)

सोऽब्रवीद्यामि तं देशं यत्र विष्णुः सनातनः। त्वत्प्रसादाद्द्विजश्रेष्ठ मुक्त्वा शापान्निरामयः

so'bravīdyāmi taṁ deśaṁ yatra viṣṇuḥ sanātanaḥ| tvatprasādāddvijaśreṣṭha muktvā śāpānnirāmayaḥ

उसने कहा — 'हे द्विजश्रेष्ठ! आपकी कृपा से शाप से मुक्त, निरामय होकर मैं उस स्थान को जाता हूँ जहाँ सनातन विष्णु विराजते हैं।'

श्लोक 22 (skanda.5.96.22)

इत्युक्ते ब्राह्मणः प्राह कोऽसि त्वं पुरुषर्षभ। सोऽब्रवीदस्मि राजेंद्र प्रतापी पूर्वजन्मनि

ityukte brāhmaṇaḥ prāha ko'si tvaṁ puruṣarṣabha| so'bravīdasmi rājeṁdra pratāpī pūrvajanmani

यह कहे जाने पर ब्राह्मण ने पूछा — 'हे पुरुषश्रेष्ठ! तुम कौन हो?' उसने कहा — 'हे राजेंद्र! पूर्वजन्म में मैं एक प्रतापी राजा था।'

श्लोक 23 (skanda.5.96.23)

दीर्घबाहुरिति ख्यातः सर्वधर्मविशारदः। अहं जानामि वेदांश्च शास्त्राणि विविधानि च

dīrghabāhuriti khyātaḥ sarvadharmaviśāradaḥ| ahaṁ jānāmi vedāṁśca śāstrāṇi vividhāni ca

'दीर्घबाहु नाम से विख्यात, सर्वधर्मविशारद; मैं वेदों तथा नाना शास्त्रों को जानता था।'

श्लोक 24 (skanda.5.96.24)

शुभाशुभमहं वेद्मि सर्वज्ञोऽहं महीतले। ब्राह्मणैर्नैव मे कार्यं किं वस्तु ब्राह्मणा इति

śubhāśubhamahaṁ vedmi sarvajño'haṁ mahītale| brāhmaṇairnaiva me kāryaṁ kiṁ vastu brāhmaṇā iti

'मैं शुभ-अशुभ जानता था, मैं पृथ्वी पर सर्वज्ञ था। मुझे ब्राह्मणों से कोई प्रयोजन नहीं था — ब्राह्मण भला क्या वस्तु हैं?'

श्लोक 25 (skanda.5.96.25)

तस्यैकस्मिन्दिने विप्राः सर्वे क्रोधसमन्विताः। ददुः शापं दुराधर्षं क्रूरो व्याघ्रो भविष्यति

tasyaikasmindine viprāḥ sarve krodhasamanvitāḥ| daduḥ śāpaṁ durādharṣaṁ krūro vyāghro bhaviṣyati

'एक दिन क्रोध से भरे सभी ब्राह्मणों ने मुझे यह दुर्धर्ष शाप दिया — तुम क्रूर बाघ बन जाओगे।'

श्लोक 26 (skanda.5.96.26)

अपमानेन विप्राणां मांसाहारी भयावहः। संजातोऽस्मि द्विजश्रेष्ठ पश्य कालविपर्यये

apamānena viprāṇāṁ māṁsāhārī bhayāvahaḥ| saṁjāto'smi dvijaśreṣṭha paśya kālaviparyaye

'हे द्विजश्रेष्ठ! ब्राह्मणों के अपमान से मैं भयंकर मांसाहारी बन गया — देखो, काल का यह विपर्यय!'

श्लोक 27 (skanda.5.96.27)

इत्युक्तोऽहं पुरा तैस्तु ब्राह्म णैर्वेदपारगैः। दुर्धर्षोऽयं मया प्राप्तो ब्रह्मशापो द्विजर्षभ

ityukto'haṁ purā taistu brāhma ṇairvedapāragaiḥ| durdharṣo'yaṁ mayā prāpto brahmaśāpo dvijarṣabha

'हे द्विजर्षभ! वेदपारंगत उन ब्राह्मणों द्वारा मुझे यह कहा गया था; मैंने यह दुर्धर्ष ब्रह्मशाप प्राप्त किया।'

श्लोक 28 (skanda.5.96.28)

ततस्ते ब्राह्मणाः सर्वे प्रणिपत्य मया मुने। प्रसादिता भृशं विप्र तदा गद्गद या गिरा

tataste brāhmaṇāḥ sarve praṇipatya mayā mune| prasāditā bhṛśaṁ vipra tadā gadgada yā girā

'हे मुने! तब मेरे द्वारा प्रणिपात करने पर वे सभी ब्राह्मण अत्यंत प्रसन्न हो गए, गद्गद वाणी से।'

श्लोक 29 (skanda.5.96.29)

जानामि तेजो विप्राणां महाभाग्यं च धीमताम्। अपेयः सागरः क्रोधात्कृतो यैर्लवणोदकः

jānāmi tejo viprāṇāṁ mahābhāgyaṁ ca dhīmatām| apeyaḥ sāgaraḥ krodhātkṛto yairlavaṇodakaḥ

'मैं ब्राह्मणों के तेज और बुद्धिमानों के महाभाग्य को जानता हूँ — जिन्होंने क्रोध से समुद्र को भी खारे जल का, अपेय बना दिया।'

श्लोक 30 (skanda.5.96.30)

तथैव दीप्ततपसां मुनीनां भावितात्मनाम्। येषां क्रोधाग्निरद्यापि कण्डके नोपशाम्यति

tathaiva dīptatapasāṁ munīnāṁ bhāvitātmanām| yeṣāṁ krodhāgniradyāpi kaṇḍake nopaśāmyati

'इसी प्रकार उन तपःसंपन्न, भावितात्मा मुनियों का क्रोधाग्नि भी है, जिनका क्रोध-अग्नि आज तक भी अपने मूल में शांत नहीं हुआ।'

श्लोक 31 (skanda.5.96.31)

ब्राह्मणानां परीभावाद्वातापिश्च दुरात्मवान्। अगस्तिमृषिमासाद्य जीर्णः क्रूरो महासुरः

brāhmaṇānāṁ parībhāvādvātāpiśca durātmavān| agastimṛṣimāsādya jīrṇaḥ krūro mahāsuraḥ

'ब्राह्मणों के तिरस्कार से दुरात्मा वातापि भी, अगस्ति ऋषि के पास जाकर, वह क्रूर महासुर पचा दिया गया।'

श्लोक 32 (skanda.5.96.32)

सर्वभक्षः कृतो वह्निर्भृगुणा कारणांतरे। गौतमेन पुरा शक्रः स सहस्रभगः कृतः

sarvabhakṣaḥ kṛto vahnirbhṛguṇā kāraṇāṁtare| gautamena purā śakraḥ sa sahasrabhagaḥ kṛtaḥ

'भृगु ने किसी अन्य कारण से अग्नि को सर्वभक्षी बना दिया; और पूर्वकाल में गौतम ने शक्र को सहस्र चिह्नों वाला बना दिया।'

श्लोक 33 (skanda.5.96.33)

दशधा केशवो जज्ञे ब्रह्मशा पात्सुदुस्तरात्। प्रसन्नैर्वालखिल्यैश्च पक्षींद्रो गरुडः कृतः

daśadhā keśavo jajñe brahmaśā pātsudustarāt| prasannairvālakhilyaiśca pakṣīṁdro garuḍaḥ kṛtaḥ

'दुस्तर ब्रह्मशाप से केशव को दस बार जन्म लेना पड़ा; और प्रसन्न वालखिल्यों द्वारा गरुड़ पक्षियों का राजा बनाया गया।'

श्लोक 34 (skanda.5.96.34)

अश्विनौ देवभिषजौ च्यवनेन महात्मना। विष्टंभयित्वा कुलिशं कृतौ तौ सोमपायिनौ

aśvinau devabhiṣajau cyavanena mahātmanā| viṣṭaṁbhayitvā kuliśaṁ kṛtau tau somapāyinau

'महात्मा च्यवन ने देवताओं के दोनों वैद्य अश्विनीकुमारों को, वज्र को स्तंभित करके, सोमपान करने योग्य बना दिया।'

श्लोक 35 (skanda.5.96.35)

कार्त्तवीर्यार्जुनेनैव बाहूनां च सहस्रकम्। दत्तात्रेयप्रसादेन प्राप्तं परमदुर्लभम्

kārttavīryārjunenaiva bāhūnāṁ ca sahasrakam| dattātreyaprasādena prāptaṁ paramadurlabham

'कार्तवीर्य अर्जुन को ही दत्तात्रेय के प्रसाद से सहस्र भुजाएँ प्राप्त हुईं, जो अत्यंत दुर्लभ थीं।'

श्लोक 36 (skanda.5.96.36)

पुरा सेंद्रा वशिष्ठेन रक्षितास्त्रि दिवौकसः। ब्राह्मणप्रभवं सौख्यं कीर्तिरायुर्यशो वलम्

purā seṁdrā vaśiṣṭhena rakṣitāstri divaukasaḥ| brāhmaṇaprabhavaṁ saukhyaṁ kīrtirāyuryaśo valam

'पूर्वकाल में इंद्र सहित तीनों लोकों के वासियों की वशिष्ठ ने रक्षा की; सुख, कीर्ति, आयु, यश और बल — ये सब ब्राह्मणों से ही उत्पन्न होते हैं।'

श्लोक 37 (skanda.5.96.37)

लोकालोकेश्वराश्चैव सर्वे ब्राह्मणपूर्वकाः। एते हि सोमराजान ईश्वराः सुखदुःखयोः

lokālokeśvarāścaiva sarve brāhmaṇapūrvakāḥ| ete hi somarājāna īśvarāḥ sukhaduḥkhayoḥ

'लोक और परलोक के समस्त ईश्वर भी ब्राह्मणों को आगे रखने वाले ही होते हैं — ये चंद्रवंशी राजा भी सुख-दुःख के ईश्वर हैं।'

श्लोक 38 (skanda.5.96.38)

भस्मीकुर्युर्जगदिदं कुद्धाः प्रत्यक्षदर्शनाः। प्रभावा बहवश्चापि श्रूयते ब्रह्मवदिनाम्

bhasmīkuryurjagadidaṁ kuddhāḥ pratyakṣadarśanāḥ| prabhāvā bahavaścāpi śrūyate brahmavadinām

'क्रुद्ध होने पर वे प्रत्यक्ष दर्शन-मात्र से इस जगत को भस्म कर सकते हैं; ब्रह्मवेत्ताओं के ऐसे अनेक प्रभाव सुने जाते हैं।'

श्लोक 39 (skanda.5.96.39)

क्रोधश्च विपुलः सद्यः सद्यः प्रत्य यकारकः। अहं कोपाद्द्विजेंद्राणां गतो निरययातनाम्

krodhaśca vipulaḥ sadyaḥ sadyaḥ pratya yakārakaḥ| ahaṁ kopāddvijeṁdrāṇāṁ gato nirayayātanām

'क्रोध अत्यंत विशाल है और तुरंत ही फल देने वाला है; मैं द्विजेंद्रों के कोप से नरक की यातना को प्राप्त हुआ।'

श्लोक 40 (skanda.5.96.40)

नित्यं क्रोधाच्छ्रियं रक्षेद्धनं रक्षेत्समत्सरात्। विद्यां मानापमानाभ्यामात्मानं तु प्रमादतः

nityaṁ krodhācchriyaṁ rakṣeddhanaṁ rakṣetsamatsarāt| vidyāṁ mānāpamānābhyāmātmānaṁ tu pramādataḥ

'मनुष्य को सदा क्रोध से लक्ष्मी की, ईर्ष्या से धन की, मान-अपमान से विद्या की, तथा प्रमाद से स्वयं की रक्षा करनी चाहिए।'

श्लोक 41 (skanda.5.96.41)

मयाऽज्ञानात्कृतं पापं राजगर्वेण दैवतः। क्षंतुमर्हथ विप्रेंद्रा भवतः शरणागतम्

mayā'jñānātkṛtaṁ pāpaṁ rājagarveṇa daivataḥ| kṣaṁtumarhatha vipreṁdrā bhavataḥ śaraṇāgatam

'हे विप्रेंद्रो! मैंने अज्ञानवश, राजोचित अभिमान से देवताओं के प्रति पाप किया है; शरणागत मुझे क्षमा करने योग्य हैं आप।'

श्लोक 42 (skanda.5.96.42)

अथ तुष्टा द्विजाः सर्वे त ऊचुर्मामिदं मुदा। षष्ठान्नकालिकस्तेऽग्रे यदा स्थास्यति कश्चन

atha tuṣṭā dvijāḥ sarve ta ūcurmāmidaṁ mudā| ṣaṣṭhānnakālikaste'gre yadā sthāsyati kaścana

तब सभी ब्राह्मण प्रसन्न होकर हर्षपूर्वक मुझसे यह बोले — 'जब तुम्हारे सामने कभी छठे भोजन-काल में कोई...'

श्लोक 43 (skanda.5.96.43)

मांसभोक्ता च भविता कञ्चित्कालं नराधिप। यदा शिप्रांतरे पुण्ये स्नातस्तु द्विजसत्तमः

māṁsabhoktā ca bhavitā kañcitkālaṁ narādhipa| yadā śiprāṁtare puṇye snātastu dvijasattamaḥ

'...कुछ काल के लिए मांसभक्षी बनोगे, हे नराधिप। जब पवित्र शिप्रा नदी में स्नान किया हुआ कोई श्रेष्ठ द्विज...'

श्लोक 44 (skanda.5.96.44)

अंतर्जलगतेनोक्तो नमो नारायणेति च। जिघृक्षुर्व्याघ्ररूपेण तदा मुक्तो भविष्यसि

aṁtarjalagatenokto namo nārāyaṇeti ca| jighṛkṣurvyāghrarūpeṇa tadā mukto bhaviṣyasi

'...जल के भीतर रहते हुए तुम्हें, बाघ-रूप में उसे पकड़ने का इच्छुक जानकर, "नमो नारायणाय" कहेगा, तब तुम शाप से मुक्त हो जाओगे।'

श्लोक 45 (skanda.5.96.45)

एवं स भवता प्रोक्तो नमो नारायणेति च। मंत्रः श्रुतो मया त्वत्तस्तस्येयं व्युष्टिरागता

evaṁ sa bhavatā prokto namo nārāyaṇeti ca| maṁtraḥ śruto mayā tvattastasyeyaṁ vyuṣṭirāgatā

'इस प्रकार आपके द्वारा "नमो नारायणाय" कहा गया वह मंत्र मैंने आपसे सुना, और उसी से यह शुभ फल मुझे प्राप्त हुआ है।'

श्लोक 46 (skanda.5.96.46)

जातोऽहं दिव्यदेहस्तु प्रसादात्तव सुव्रत। स कृतार्थोऽस्मि संजातो भगवन्दर्शना त्तव

jāto'haṁ divyadehastu prasādāttava suvrata| sa kṛtārtho'smi saṁjāto bhagavandarśanā ttava

'हे सुव्रत! आपकी कृपा से मुझे दिव्य देह प्राप्त हुई है; हे भगवन्! आपके दर्शन से मैं कृतार्थ हो गया हूँ।'

श्लोक 47 (skanda.5.96.47)

वरं च गृह्यतां मत्तो यश्च ते संशयो हृदि। तं च ब्रूहि द्विजश्रेष्ठ सर्वं संपादयामि ते

varaṁ ca gṛhyatāṁ matto yaśca te saṁśayo hṛdi| taṁ ca brūhi dvijaśreṣṭha sarvaṁ saṁpādayāmi te

'मुझसे वर माँगिए, और आपके हृदय में जो भी संशय हो, वह कहिए, हे द्विजश्रेष्ठ! मैं आपकी सब कामनाएँ पूर्ण करूँगा।'

श्लोक 48 (skanda.5.96.48)

तवोपदेशदानेन आनृण्यं गंतु मुत्सहे

tavopadeśadānena ānṛṇyaṁ gaṁtu mutsahe

'आपके उपदेश के दान से मैं ऋणमुक्त होने का प्रयास करना चाहता हूँ।'

श्लोक 49 (skanda.5.96.49)

इति तस्य वचः श्रुत्वा दिव्यदेहस्य स द्विजः। प्रोवाच परया तुष्ट्या प्रफुल्लमुखपंकजः

iti tasya vacaḥ śrutvā divyadehasya sa dvijaḥ| provāca parayā tuṣṭyā praphullamukhapaṁkajaḥ

उस दिव्य-देह वाले के इस वचन को सुनकर, वह द्विज परम संतोष से, खिले हुए मुखकमल के साथ बोला।

श्लोक 50 (skanda.5.96.50)

अद्य मे सफलं ज्ञानमद्य मे सफलं तपः। अद्य मे सफला जिह्वा सफलं चक्षुरद्य मे

adya me saphalaṁ jñānamadya me saphalaṁ tapaḥ| adya me saphalā jihvā saphalaṁ cakṣuradya me

'आज मेरा ज्ञान सफल हुआ, आज मेरा तप सफल हुआ; आज मेरी जिह्वा सफल हुई, और आज मेरे नेत्र भी सफल हुए।'

श्लोक 51 (skanda.5.96.51)

श्रुतं देवेन संप्रोक्तं स्नात्वा पश्यंति देहिनः। प्राक्छरीरगतं तेऽद्य व्याघ्ररूपं तपोत्तम

śrutaṁ devena saṁproktaṁ snātvā paśyaṁti dehinaḥ| prākcharīragataṁ te'dya vyāghrarūpaṁ tapottama

'यह देवोक्त वचन सुना गया है कि स्नान करके प्राणी दर्शन करते हैं — हे तपःश्रेष्ठ! जो पहले आपके शरीर में बाघ-रूप था...'

श्लोक 52 (skanda.5.96.52)

तेजोमयं शरीरं तु ब्रह्मरूपं सनातनम्। यदि त्वहमनुग्राह्यो यद्येवं कर्तुमर्हसि

tejomayaṁ śarīraṁ tu brahmarūpaṁ sanātanam| yadi tvahamanugrāhyo yadyevaṁ kartumarhasi

'...वह तेजोमय, सनातन ब्रह्मरूप शरीर है। यदि मैं अनुग्रह के योग्य हूँ, यदि आप ऐसा करने में समर्थ हैं...'

श्लोक 53 (skanda.5.96.53)

कारणं श्रोतुमिच्छामि हृदि मे वर्त्तते चिरम्। कथं मुक्तिर्महाभाग मुक्तिकामेन यत्नतः

kāraṇaṁ śrotumicchāmi hṛdi me varttate ciram| kathaṁ muktirmahābhāga muktikāmena yatnataḥ

'...तो मैं वह कारण सुनना चाहता हूँ, जो चिरकाल से मेरे हृदय में बना हुआ है — हे महाभाग! मुक्तिकामी के लिए यत्नपूर्वक मुक्ति कैसे प्राप्त होती है?'

श्लोक 54 (skanda.5.96.54)

योगाभ्यासरतेनापि वत्सरांश्च त्रयोदश। न लब्धा परमाश्चर्यं तपसा दुष्करेण तु

yogābhyāsaratenāpi vatsarāṁśca trayodaśa| na labdhā paramāścaryaṁ tapasā duṣkareṇa tu

'योगाभ्यास में रत रहते हुए भी तेरह वर्षों तक मुझे वह परम आश्चर्य (मुक्ति) दुष्कर तप से भी प्राप्त नहीं हुई।'

श्लोक 55 (skanda.5.96.55)

व्याधेनापि भृशं तेन प्राप्ता मुक्तिः क्षणेन तु। अत्र मे संशयो जातः को हेतुः कथ्यतां भृशम्

vyādhenāpi bhṛśaṁ tena prāptā muktiḥ kṣaṇena tu| atra me saṁśayo jātaḥ ko hetuḥ kathyatāṁ bhṛśam

'फिर भी उस व्याध को क्षणभर में ही अत्यंत सहज मुक्ति प्राप्त हो गई। मुझे इसमें संशय हुआ है — कृपया इसका कारण स्पष्ट रूप से बताइए।'

श्लोक 56 (skanda.5.96.56)

तस्य तद्वचन श्रुत्वा ततो वचनमब्रवीत्। कथयामि परं गुह्यं रहस्यं मुक्तिलक्षणम्

tasya tadvacana śrutvā tato vacanamabravīt| kathayāmi paraṁ guhyaṁ rahasyaṁ muktilakṣaṇam

उसका यह वचन सुनकर उसने (दिव्य पुरुष ने) यह वचन कहा — 'मैं तुम्हें वह परम गुह्य रहस्य, मुक्ति का लक्षण, बताता हूँ।'

श्लोक 57 (skanda.5.96.57)

महादेवमुपास्याशु मुने मुक्तिः सुदुर्लभा। पुरातनैस्तु विद्वद्भिरिदमुक्तं महात्मभिः

mahādevamupāsyāśu mune muktiḥ sudurlabhā| purātanaistu vidvadbhiridamuktaṁ mahātmabhiḥ

'हे मुने! महादेव की तुरंत उपासना करने से ही अन्यथा अत्यंत दुर्लभ मुक्ति प्राप्त होती है — यह पुरातन विद्वान महात्माओं द्वारा कहा गया है।'

श्लोक 58 (skanda.5.96.58)

शृणुष्वैकमना विप्र कुरु यत्नं यथार्थतः। मन्नियोगाद्द्विजश्रेष्ठ ततो मुक्तिमवाप्स्यसि

śṛṇuṣvaikamanā vipra kuru yatnaṁ yathārthataḥ| manniyogāddvijaśreṣṭha tato muktimavāpsyasi

'हे विप्र! एकाग्रचित्त होकर सुनो, यथार्थ रूप से यत्न करो; हे द्विजश्रेष्ठ! मेरे कहे अनुसार तब तुम मुक्ति प्राप्त करोगे।'

श्लोक 59 (skanda.5.96.59)

शप्तोऽहं तैर्यदा विप्रैस्तदा मे तोषिता भृशम्। ममानुकंपया प्रोक्तं मुक्तिस्ते भविता नृप

śapto'haṁ tairyadā vipraistadā me toṣitā bhṛśam| mamānukaṁpayā proktaṁ muktiste bhavitā nṛpa

'जब उन ब्राह्मणों द्वारा मुझे शाप दिया गया, तब वे मेरे द्वारा अत्यंत संतुष्ट किए गए थे; उनकी करुणा से यह कहा गया — हे राजन्! तुम्हें मुक्ति प्राप्त होगी।'

श्लोक 60 (skanda.5.96.60)

मुक्तिकामो महाकाले मुक्तिर्ब्राह्मणसत्तमः। विद्यते तपसा युक्तः स ते प्रश्नं करिष्यति

muktikāmo mahākāle muktirbrāhmaṇasattamaḥ| vidyate tapasā yuktaḥ sa te praśnaṁ kariṣyati

'महाकाल में मुक्तिकामी, तपःसंपन्न मुक्ति नामक एक श्रेष्ठ ब्राह्मण विद्यमान है — वह तुमसे प्रश्न करेगा।'

श्लोक 61 (skanda.5.96.61)

मुक्तीश्वरं तदा लिंगं तस्याग्रे कथयिष्यसि। तवापि तस्य मुक्तेश्च मुक्तिरेवं भविष्यति

muktīśvaraṁ tadā liṁgaṁ tasyāgre kathayiṣyasi| tavāpi tasya mukteśca muktirevaṁ bhaviṣyati

'तब तुम उसके समक्ष मुक्तीश्वर लिंग के विषय में बताओगे; इस प्रकार तुम्हारी और उस मुक्ति की — दोनों की मुक्ति हो जाएगी।'

श्लोक 62 (skanda.5.96.62)

पूर्वं हि चिह्नितं कर्म देहिनो न विमुंचति। धात्रा विधिरयं दृष्टो बहुधा कर्मभिश्च यः

pūrvaṁ hi cihnitaṁ karma dehino na vimuṁcati| dhātrā vidhirayaṁ dṛṣṭo bahudhā karmabhiśca yaḥ

'पूर्व-निर्धारित कर्म देहधारी को नहीं छोड़ता; विधाता की यह व्यवस्था अनेक प्रकार के कर्मों द्वारा देखी गई है।'

श्लोक 63 (skanda.5.96.63)

इति तस्य वचः श्रुत्वा स विप्रो ब्रह्मवित्तमः। अंतर्जलात्समुत्थाय ततो वचनमब्र वीत्

iti tasya vacaḥ śrutvā sa vipro brahmavittamaḥ| aṁtarjalātsamutthāya tato vacanamabra vīt

उसके इस वचन को सुनकर ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ वह विप्र जल के भीतर से उठकर तब यह वचन बोला —

श्लोक 64 (skanda.5.96.64)

दिष्ट्या त्वमागतो भूप दिष्ट्या ते संगतं मया। ईदृशा दुर्लभा लोके नरा मुक्तिप्रदर्शकाः

diṣṭyā tvamāgato bhūpa diṣṭyā te saṁgataṁ mayā| īdṛśā durlabhā loke narā muktipradarśakāḥ

'हे राजन्! सौभाग्य से तुम आए, सौभाग्य से मुझसे तुम्हारा मिलन हुआ; इस लोक में मुक्ति दिखाने वाले ऐसे मनुष्य दुर्लभ ही हैं।'

श्लोक 65 (skanda.5.96.65)

इत्युक्त्वा नृपविप्रौ तौ मुक्तिलिंगं समा गतौ। दर्शनार्थं विशालाक्षि दृष्ट्वा देवं सनातनम्

ityuktvā nṛpaviprau tau muktiliṁgaṁ samā gatau| darśanārthaṁ viśālākṣi dṛṣṭvā devaṁ sanātanam

यह कहकर वे दोनों, राजा और ब्राह्मण, दर्शन के लिए मुक्ति-लिंग के समीप गए; हे विशालाक्षी! उस सनातन देव का दर्शन करके —

श्लोक 66 (skanda.5.96.66)

तत्क्षणात्सशरीरौ तौ तस्मिँल्लिंगे लयं गतौ। ईदृशोऽयं मया देवि महिमा कथितस्तव

tatkṣaṇātsaśarīrau tau tasmi~lliṁge layaṁ gatau| īdṛśo'yaṁ mayā devi mahimā kathitastava

—वे दोनों उसी क्षण अपने शरीर सहित उस लिंग में लीन हो गए। हे देवी! इस प्रकार मैंने तुम्हें यह महिमा बताई है।

श्लोक 67 (skanda.5.96.67)

अस्य लिंगस्य संस्पर्शान्मुक्तिर्भवति नान्यथा। येऽर्चयंति सदा भक्त्या मुक्तिलिंगं सनातनम्। अपि पापसमायुक्तः स याति परमां गतिम्

asya liṁgasya saṁsparśānmuktirbhavati nānyathā| ye'rcayaṁti sadā bhaktyā muktiliṁgaṁ sanātanam| api pāpasamāyuktaḥ sa yāti paramāṁ gatim

इस लिंग के स्पर्शमात्र से ही मुक्ति होती है, अन्यथा नहीं। जो सदा भक्तिपूर्वक इस सनातन मुक्ति-लिंग की पूजा करते हैं, वे पापयुक्त होने पर भी परम गति को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 68 (skanda.5.96.68)

रे मूढाः किं तपोभिश्च किं दानैर्नियमैश्च किम्। कुरुध्वं मुक्तिलिंगस्य दर्शनं मुक्तिदायकम्

re mūḍhāḥ kiṁ tapobhiśca kiṁ dānairniyamaiśca kim| kurudhvaṁ muktiliṁgasya darśanaṁ muktidāyakam

'अरे मूढ़ो! तपों से क्या, दानों और नियमों से भी क्या? मुक्ति-लिंग का, मुक्ति देने वाला यह दर्शन ही करो।'

श्लोक 69 (skanda.5.96.69)

न मां विदुर्देवगणा नासुरा न महर्षयः। परं रूपं विशालाक्षि यदश्मद्युति निर्मलम्

na māṁ vidurdevagaṇā nāsurā na maharṣayaḥ| paraṁ rūpaṁ viśālākṣi yadaśmadyuti nirmalam

'हे विशालाक्षी! मेरे उस परम रूप को न देवगण जानते हैं, न असुर, न महर्षि — जो पाषाण-सी निर्मल कांति वाला है।'

श्लोक 70 (skanda.5.96.70)

न मे वेत्ति परं रूपं स्वयं साक्षात्प्रजापतिः। न विष्णुस्त्रिदशश्रेष्ठाः कुतोन्ये मुनयः प्रिये

na me vetti paraṁ rūpaṁ svayaṁ sākṣātprajāpatiḥ| na viṣṇustridaśaśreṣṭhāḥ kutonye munayaḥ priye

'स्वयं साक्षात प्रजापति भी मेरे परम रूप को नहीं जानते, न विष्णु, न त्रिदशश्रेष्ठ — हे प्रिये! अन्य मुनियों की तो बात ही क्या!'

श्लोक 71 (skanda.5.96.71)

यदेतद्दृश्यते तेजो लिंगरूपं यशस्विनि। एतदेव शुकाद्या हि ध्यायंति त्रिदशा अमी

yadetaddṛśyate tejo liṁgarūpaṁ yaśasvini| etadeva śukādyā hi dhyāyaṁti tridaśā amī

'हे यशस्विनि! जो यह तेज लिंग-रूप में दिखाई देता है, इसी का ही शुक आदि ये देवगण ध्यान करते हैं।'

श्लोक 72 (skanda.5.96.72)

अनेकजन्मसंशुद्धा योगिनोऽनुग्रहान्मम। प्रविशंतु तनुं देवि मदीयां मुक्तिदायिकाम्

anekajanmasaṁśuddhā yogino'nugrahānmama| praviśaṁtu tanuṁ devi madīyāṁ muktidāyikām

'हे देवी! अनेक जन्मों से शुद्ध हुए योगीजन, मेरे अनुग्रह से, मेरी इस मुक्तिदायिनी देह में प्रवेश करें।'

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