अवन्ती खण्ड · अध्याय 97
सोमेश्वर की महिमा
श्लोक 1 (skanda.5.97.1)
ईश्वर उवाच। विद्धि षड्विंशकं देवि देवं सोमेश्वरं परम्। यस्य दर्शनमात्रेण निष्कलंको नरो भवेत्
īśvara uvāca| viddhi ṣaḍviṁśakaṁ devi devaṁ someśvaraṁ param| yasya darśanamātreṇa niṣkalaṁko naro bhavet
ईश्वर ने कहा — हे देवी! छब्बीसवें परम देव को सोमेश्वर जानो, जिनके दर्शनमात्र से मनुष्य निष्कलंक (निर्दोष) हो जाता है।
श्लोक 2 (skanda.5.97.2)
अत्रिर्नाम महाभागो ब्रह्मणो मानसः सुतः। प्रजापतिरभूद्देवि कल्पे वाराहसंज्ञके
atrirnāma mahābhāgo brahmaṇo mānasaḥ sutaḥ| prajāpatirabhūddevi kalpe vārāhasaṁjñake
अत्रि नामक महाभाग्यशाली ऋषि, ब्रह्मा के मानस पुत्र, वाराह कल्प में प्रजापति हुए, हे देवी।
श्लोक 3 (skanda.5.97.3)
तस्य पुत्रोऽभवत्सोमो दक्षोथ मातृभागतः। सप्तविंशतिर्याः कन्या दाक्षायण्यः प्रकीर्तिताः
tasya putro'bhavatsomo dakṣotha mātṛbhāgataḥ| saptaviṁśatiryāḥ kanyā dākṣāyaṇyaḥ prakīrtitāḥ
उनके पुत्र सोम (चंद्रमा) हुए; और दक्ष ने विवाह-बंधन से उन्हें अपनी सत्ताईस कन्याएँ दीं, जो दाक्षायणी नाम से विख्यात हैं।
श्लोक 4 (skanda.5.97.4)
सोमपत्न्यो हि मंतव्यास्तासां श्रेष्ठा तु रोहिणी। तामेव भजते सोमो नेतरां इति शुश्रुम
somapatnyo hi maṁtavyāstāsāṁ śreṣṭhā tu rohiṇī| tāmeva bhajate somo netarāṁ iti śuśruma
वे सभी सोम की पत्नियाँ मानी जाती हैं, जिनमें रोहिणी श्रेष्ठ है। सोम केवल उसी को चाहते हैं, अन्य को नहीं — ऐसा हमने सुना है।
श्लोक 5 (skanda.5.97.5)
इतराः प्रोचुरागत्य दक्षस्याग्रे यथातथम्। दक्षोऽथ स तदागत्य तमुवाच स नाकरोत्
itarāḥ procurāgatya dakṣasyāgre yathātatham| dakṣo'tha sa tadāgatya tamuvāca sa nākarot
शेष पत्नियों ने आकर दक्ष के समक्ष यथावत् सब कह दिया; तब दक्ष स्वयं वहाँ जाकर सोम से बोले, पर सोम ने नहीं माना।
श्लोक 6 (skanda.5.97.6)
यदा न वारितस्तस्थौ दक्षः कुद्धस्तदा प्रिये। शशाप सोमं संक्रुद्धः शीघ्रमंतर्हितो भव
yadā na vāritastasthau dakṣaḥ kuddhastadā priye| śaśāpa somaṁ saṁkruddhaḥ śīghramaṁtarhito bhava
जब दक्ष के रोकने पर भी सोम अपनी बात पर स्थिर रहे, तब हे प्रिये! अत्यंत क्रुद्ध होकर दक्ष ने सोम को शाप दे दिया — 'तुम शीघ्र अंतर्धान हो जाओ।'
श्लोक 7 (skanda.5.97.7)
एवं शप्तस्तु सोमो वै तदा ह्यंतर्हितोऽभवत्। शशाप सोमो दक्षं तु भवानपि भविष्यति
evaṁ śaptastu somo vai tadā hyaṁtarhito'bhavat| śaśāpa somo dakṣaṁ tu bhavānapi bhaviṣyati
इस प्रकार शापित होकर सोम उसी क्षण अंतर्धान हो गए; और सोम ने भी दक्ष को प्रतिशाप दिया — 'तुम भी...'
श्लोक 8 (skanda.5.97.8)
अनेकत्वं विहायैतज्जलदेहं सनातनम्। अतः प्राचेतसो दक्षो ब्रह्मपुत्रोऽपि गीयते
anekatvaṁ vihāyaitajjaladehaṁ sanātanam| ataḥ prācetaso dakṣo brahmaputro'pi gīyate
'...अनेकत्व त्यागकर इस सनातन जल-देह को प्राप्त होगे।' इसीलिए प्राचेतस दक्ष, ब्रह्मा के पुत्र होते हुए भी, इसी रूप में गाए जाते हैं।
श्लोक 9 (skanda.5.97.9)
एवमंतर्हितः सोमो गतो वै दक्षशापतः। देवाश्च नागा यक्षाश्च गंधर्वाः पितृभिः सह। वैराजं ब्रह्मसदनं ब्रह्माणं समुपस्थिताः
evamaṁtarhitaḥ somo gato vai dakṣaśāpataḥ| devāśca nāgā yakṣāśca gaṁdharvāḥ pitṛbhiḥ saha| vairājaṁ brahmasadanaṁ brahmāṇaṁ samupasthitāḥ
इस प्रकार दक्ष के शाप से अंतर्धान होकर सोम चले गए। तब देवगण, नाग, यक्ष तथा गंधर्व, पितरों सहित, वैराज नामक ब्रह्मलोक में ब्रह्मा के समीप उपस्थित हुए।
श्लोक 10 (skanda.5.97.10)
तस्याग्रे कथयामासुर्नमस्कृत्य पुनःपुनः। भगवन्सर्वभूतानामादिकर्त्ता स्वयंभुवः
tasyāgre kathayāmāsurnamaskṛtya punaḥpunaḥ| bhagavansarvabhūtānāmādikarttā svayaṁbhuvaḥ
उन्होंने बार-बार प्रणाम करके ब्रह्मा के समक्ष कहा — 'हे भगवन्! आप सब भूतों के आदि कर्ता, स्वयंभू...'
श्लोक 11 (skanda.5.97.11)
स्रष्टा च हव्यकव्यानां पाहि नः शरणागतान्। देवानां वचनं श्रुत्वा ज्ञात्वा देवः प्रजापतिः
sraṣṭā ca havyakavyānāṁ pāhi naḥ śaraṇāgatān| devānāṁ vacanaṁ śrutvā jñātvā devaḥ prajāpatiḥ
'...हव्य-कव्य के स्रष्टा हैं; शरणागत हम सबकी रक्षा कीजिए।' देवताओं की यह वाणी सुनकर तथा उसका मर्म जानकर प्रजापति ब्रह्मा ने...
श्लोक 12 (skanda.5.97.12)
आश्वासयामास सुरान्सुश्लिष्टैर्वचनांबुभिः। अवश्यं त्रिदशास्तेन प्राप्तव्यं कर्मणः फलम्
āśvāsayāmāsa surānsuśliṣṭairvacanāṁbubhiḥ| avaśyaṁ tridaśāstena prāptavyaṁ karmaṇaḥ phalam
...मधुर वचनों से देवताओं को सांत्वना दी — 'हे त्रिदशगण! कर्म का फल तो अवश्य ही भोगना पड़ता है।'
श्लोक 13 (skanda.5.97.13)
शापांतं भगवान्देवो विष्णुरेव करिष्यति। एतच्छ्रुत्वा ततो देवा वाक्यं पंकजजन्मनः। शरण्यं शरणं विष्णुमुपतस्थुर्गतव्यथाः
śāpāṁtaṁ bhagavāndevo viṣṇureva kariṣyati| etacchrutvā tato devā vākyaṁ paṁkajajanmanaḥ| śaraṇyaṁ śaraṇaṁ viṣṇumupatasthurgatavyathāḥ
'भगवान् विष्णु ही इस शाप का अंत करेंगे।' ब्रह्मा के इस वचन को सुनकर देवगण, व्यथा-रहित होकर, शरण्य विष्णु की शरण में गए।
श्लोक 14 (skanda.5.97.14)
ब्रह्मणा सहिता देवि स्तुतिं चक्रुः समाहिताः। नमस्ते देवदेवेश नमस्ते विश्वभावन। नमस्तेऽस्तु हृषीकेश महापुरुषपूर्वज
brahmaṇā sahitā devi stutiṁ cakruḥ samāhitāḥ| namaste devadeveśa namaste viśvabhāvana| namaste'stu hṛṣīkeśa mahāpuruṣapūrvaja
ब्रह्मा सहित सब देवताओं ने एकाग्रचित्त होकर स्तुति की — 'हे देवाधिदेव! आपको नमस्कार, हे विश्वभावन! आपको नमस्कार, हे हृषीकेश! महापुरुष के पूर्वज, आपको नमस्कार।'
श्लोक 15 (skanda.5.97.15)
नारायण जगन्नाथ देवास्त्वां शरणं गताः। त्वं हि नः परमो ध्येय स्त्वं हि नः परमो गुरुः
nārāyaṇa jagannātha devāstvāṁ śaraṇaṁ gatāḥ| tvaṁ hi naḥ paramo dhyeya stvaṁ hi naḥ paramo guruḥ
'हे नारायण, हे जगन्नाथ! हम देवगण आपकी शरण में आए हैं; आप ही हमारे परम ध्येय हैं, आप ही हमारे परम गुरु हैं।'
श्लोक 16 (skanda.5.97.16)
त्वं हि नः परमो देवो ब्रह्मादीनां सुरोत्तम। अंतर्धानं गतः सोमो दक्षशापाज्जनार्द्दन
tvaṁ hi naḥ paramo devo brahmādīnāṁ surottama| aṁtardhānaṁ gataḥ somo dakṣaśāpājjanārddana
'आप ही ब्रह्मा आदि देवताओं में हमारे परम देव हैं, हे सुरोत्तम! दक्ष के शाप से सोम अंतर्धान हो गए हैं, हे जनार्दन!'
श्लोक 17 (skanda.5.97.17)
विना सोमेन चौषध्यो नष्टा देव महीतले। तेषां तद्वचनं श्रुत्वा विष्णुर्वचनमव्रवीत्
vinā somena cauṣadhyo naṣṭā deva mahītale| teṣāṁ tadvacanaṁ śrutvā viṣṇurvacanamavravīt
'सोम के बिना पृथ्वी पर सभी औषधियाँ नष्ट हो गई हैं, हे देव!' उनका यह वचन सुनकर विष्णु ने कहा।
श्लोक 18 (skanda.5.97.18)
भयं त्यजध्वममरा अभयं वो ददाम्यहम्। नष्टं चंद्रमसं शीघ्रं मानयिष्याम्यसंशयम्
bhayaṁ tyajadhvamamarā abhayaṁ vo dadāmyaham| naṣṭaṁ caṁdramasaṁ śīghraṁ mānayiṣyāmyasaṁśayam
'हे अमरगण! भय त्यागो, मैं तुम्हें अभय देता हूँ। मैं शीघ्र ही, निःसंशय, लुप्त चंद्रमा को पुनः प्रतिष्ठित करूँगा।'
श्लोक 19 (skanda.5.97.19)
एवमुक्त्वा तु भगवान्विसृज्य त्रिदशेश्वरान्। सोमं सस्मार सहसा शंखचक्रगदाधरः
evamuktvā tu bhagavānvisṛjya tridaśeśvarān| somaṁ sasmāra sahasā śaṁkhacakragadādharaḥ
ऐसा कहकर शंख-चक्र-गदाधारी भगवान् ने त्रिदशेश्वरों को विदा किया और तत्काल सोम का स्मरण किया।
श्लोक 20 (skanda.5.97.20)
यदा स्मृतो न चाभ्येति तदा क्रुद्धो जनार्दनः। पुराणपुरुषो देवो ब्रह्माणमिदमव्रवीत्
yadā smṛto na cābhyeti tadā kruddho janārdanaḥ| purāṇapuruṣo devo brahmāṇamidamavravīt
जब स्मरण करने पर भी सोम प्रकट नहीं हुए, तब पुराणपुरुष जनार्दन क्रुद्ध होकर ब्रह्मा से यह बोले।
श्लोक 21 (skanda.5.97.21)
देवैरसुरसंघैश्च मथ्यतां कलशोदधिः। भविष्यति पुनश्चंद्रो मथ्यमाने महोदधौ
devairasurasaṁghaiśca mathyatāṁ kalaśodadhiḥ| bhaviṣyati punaścaṁdro mathyamāne mahodadhau
'देवों और असुरगणों द्वारा क्षीरसागर का मंथन किया जाए; महासागर के मथे जाने पर चंद्रमा पुनः प्रकट होगा।'
श्लोक 22 (skanda.5.97.22)
अमृतं तत्र लप्स्यध्वं रत्नानि विविधानि च। तस्य तद्वचनं श्रुत्वा वासुदेवस्य पार्वति
amṛtaṁ tatra lapsyadhvaṁ ratnāni vividhāni ca| tasya tadvacanaṁ śrutvā vāsudevasya pārvati
'वहाँ तुम्हें अमृत तथा नाना प्रकार के रत्न प्राप्त होंगे।' वासुदेव का यह वचन सुनकर, हे पार्वती...
श्लोक 23 (skanda.5.97.23)
मंथानं मंदरं कृत्वा नेत्रं कृत्वा च वासुकिम्। देवा मथितुमारब्धाः समुद्रं निधिमंभसाम्
maṁthānaṁ maṁdaraṁ kṛtvā netraṁ kṛtvā ca vāsukim| devā mathitumārabdhāḥ samudraṁ nidhimaṁbhasām
...मंदराचल को मथानी तथा वासुकि को नेत्र (रस्सी) बनाकर देवगण जलनिधि समुद्र का मंथन करने लगे।
श्लोक 24 (skanda.5.97.24)
सोमार्थे च पुरा देवि तथैवासुरदानवाः। एतैर्मुखमुपाश्लिष्टौ नाग राजो महेर्ष्यया
somārthe ca purā devi tathaivāsuradānavāḥ| etairmukhamupāśliṣṭau nāga rājo maherṣyayā
सोम की प्राप्ति के लिए, हे देवी! उसी प्रकार असुर और दानव भी सम्मिलित हुए; ईर्ष्यावश उन्होंने नागराज के मुख भाग को थाम लिया।
श्लोक 25 (skanda.5.97.25)
विबुधाः सहिताः सर्वे यतः पुच्छं ततः स्थिताः। अतो वै भगवान्देवो यतो नारायणस्ततः
vibudhāḥ sahitāḥ sarve yataḥ pucchaṁ tataḥ sthitāḥ| ato vai bhagavāndevo yato nārāyaṇastataḥ
सभी देवगण सम्मिलित होकर पूँछ की ओर स्थित हुए; और जहाँ भगवान् नारायण थे, वहीं वे रहे।
श्लोक 26 (skanda.5.97.26)
शिरस्युद्यम्य नाग स्य पुनः पुनरवाक्षिपत्। उदधौ मथ्यमाने वै महाञ्छब्दो बभूव ह
śirasyudyamya nāga sya punaḥ punaravākṣipat| udadhau mathyamāne vai mahāñchabdo babhūva ha
नागराज के सिर को उठाकर वे बार-बार पटकते रहे; समुद्र के मथे जाने पर एक महान् शब्द उत्पन्न हुआ।
श्लोक 27 (skanda.5.97.27)
तत्र नानाजलचरा विनिष्पिष्टा महाद्रिणा। विलयं समुपाजग्मुः शतशोथ सहस्रशः
tatra nānājalacarā viniṣpiṣṭā mahādriṇā| vilayaṁ samupājagmuḥ śataśotha sahasraśaḥ
वहाँ महापर्वत से पिसकर नाना जलचर प्राणी सैकड़ों-सहस्रों की संख्या में विनष्ट हो गए।
श्लोक 28 (skanda.5.97.28)
तस्मिंस्तु मथिते देवि प्रयत्नात्केशवस्य च। प्रसन्नात्मा समुत्पन्नः सोमः शीतांशुरुज्वलः
tasmiṁstu mathite devi prayatnātkeśavasya ca| prasannātmā samutpannaḥ somaḥ śītāṁśurujvalaḥ
उस मंथन में, हे देवी! केशव के प्रयत्न से, प्रसन्नचित्त, शीतल किरणों वाला उज्ज्वल सोम प्रकट हुआ।
श्लोक 29 (skanda.5.97.29)
तमेव देवा मनुजाः पितरश्च यशस्विनि। उपजीवंति वृक्षाश्च तथैवौषधयो विधुम्
tameva devā manujāḥ pitaraśca yaśasvini| upajīvaṁti vṛkṣāśca tathaivauṣadhayo vidhum
हे यशस्विनि! उसी चंद्रमा पर देवता, मनुष्य, पितर, तथा वृक्ष और औषधियाँ भी जीवन के लिए आश्रित रहते हैं।
श्लोक 30 (skanda.5.97.30)
समुत्पन्नमथो दृष्ट्वा भगवान्प्राह केशवः। पालयेमाः प्रजाश्चंद्र त्वं ज्येष्ठो जगतो भव
samutpannamatho dṛṣṭvā bhagavānprāha keśavaḥ| pālayemāḥ prajāścaṁdra tvaṁ jyeṣṭho jagato bhava
उसे इस प्रकार प्रकट हुआ देखकर भगवान् केशव ने कहा — 'हे चंद्र! इन प्रजाओं का पालन करो, तुम जगत् में ज्येष्ठ बनो।'
श्लोक 31 (skanda.5.97.31)
इत्युक्तो वासुदेवेन प्रजाः पालयितुं शशी। पूर्वं सोमोपि यो नष्टः प्रविष्टो गहनं वनम्
ityukto vāsudevena prajāḥ pālayituṁ śaśī| pūrvaṁ somopi yo naṣṭaḥ praviṣṭo gahanaṁ vanam
वासुदेव द्वारा प्रजापालन हेतु ऐसा कहे जाने पर, जो सोम पहले अंतर्धान हो गया था, वह सघन वन में प्रविष्ट हुआ।
श्लोक 32 (skanda.5.97.32)
तस्याग्रे नारदः सर्वं कथयामास सत्वरम्। देवर्षेर्वचनं श्रुत्वा नारदस्य महात्मनः
tasyāgre nāradaḥ sarvaṁ kathayāmāsa satvaram| devarṣervacanaṁ śrutvā nāradasya mahātmanaḥ
उसके समक्ष नारद ने शीघ्र सब कुछ कह सुनाया। महात्मा देवर्षि नारद के इस वचन को सुनकर...
श्लोक 33 (skanda.5.97.33)
पीडितो दक्षशापेन सोमोऽप्यंतर्हितस्तदा। जगाम शरणं देवि ब्रह्माणं परमेष्ठिनम्
pīḍito dakṣaśāpena somo'pyaṁtarhitastadā| jagāma śaraṇaṁ devi brahmāṇaṁ parameṣṭhinam
...दक्ष के शाप से पीड़ित, अंतर्धान हुआ सोम, हे देवी! परमेष्ठी ब्रह्मा की शरण में गया।
श्लोक 34 (skanda.5.97.34)
तत्र गत्वा यथाशापं कथयामास गद्गदः। पूर्वचंद्रवचः श्रुत्वा ब्रह्मा वचनमब्रवीत्
tatra gatvā yathāśāpaṁ kathayāmāsa gadgadaḥ| pūrvacaṁdravacaḥ śrutvā brahmā vacanamabravīt
वहाँ जाकर उसने गद्गद स्वर में शाप का सारा वृत्तांत कह सुनाया। सोम के पूर्व वचन सुनकर ब्रह्मा ने कहा।
श्लोक 35 (skanda.5.97.35)
अयं मे प्रथमः पुत्रः पीडितः शशिना भृशम्। नवेनोदधिजातेन किं मया क्रियते पुनः
ayaṁ me prathamaḥ putraḥ pīḍitaḥ śaśinā bhṛśam| navenodadhijātena kiṁ mayā kriyate punaḥ
'यह मेरा प्रथम पुत्र, नए समुद्रजात शशांक (चंद्र) द्वारा अत्यंत पीड़ित हुआ है; अब मैं पुनः क्या करूँ?'
श्लोक 36 (skanda.5.97.36)
विष्णुना च बलं दत्तमस्मै चंद्रमसे दृढम्। तस्माद्यास्यामि तत्राहं यत्र देवो जनार्दनः
viṣṇunā ca balaṁ dattamasmai caṁdramase dṛḍham| tasmādyāsyāmi tatrāhaṁ yatra devo janārdanaḥ
'और विष्णु ने भी इस चंद्रमा को दृढ़ बल दे दिया है; अतः मैं वहीं जाऊँगा जहाँ भगवान् जनार्दन हैं।'
श्लोक 37 (skanda.5.97.37)
तं दृष्ट्वा मधुहंतारं ब्रह्मा विष्णुमुवाच ह। त्वदादेशाजगन्नाथ एष चंद्रः कृतो मया
taṁ dṛṣṭvā madhuhaṁtāraṁ brahmā viṣṇumuvāca ha| tvadādeśājagannātha eṣa caṁdraḥ kṛto mayā
मधुसूदन विष्णु को देखकर ब्रह्मा ने कहा — 'हे जगन्नाथ! आपके ही आदेश से मैंने यह चंद्रमा रचा था।'
श्लोक 38 (skanda.5.97.38)
स चायं पीडितो देव शशांकेन नवेन वै। इत्युक्तो ब्रह्मणा देवि वासुदेवो जगत्पतिः। वृत्तांतं कथयामास ब्रह्माग्रे च पुनःपुन.
sa cāyaṁ pīḍito deva śaśāṁkena navena vai| ityukto brahmaṇā devi vāsudevo jagatpatiḥ| vṛttāṁtaṁ kathayāmāsa brahmāgre ca punaḥpuna.
'वही यह नए शशांक से पीड़ित हुआ है, हे देव!' ब्रह्मा द्वारा ऐसा कहे जाने पर, हे देवी! जगत्पति वासुदेव ने ब्रह्मा के समक्ष पुनः-पुनः सारा वृत्तांत कह सुनाया।
श्लोक 39 (skanda.5.97.39)
ब्रह्मापि पूर्वचंद्रार्थे विष्णुं लोकनमस्कृतम्। तुष्टाव प्रणतो भूत्वा प्रांजलिः प्रणतः स्थितः
brahmāpi pūrvacaṁdrārthe viṣṇuṁ lokanamaskṛtam| tuṣṭāva praṇato bhūtvā prāṁjaliḥ praṇataḥ sthitaḥ
तब ब्रह्मा ने भी पूर्व चंद्रमा के हित में, लोकवंदित विष्णु की, प्रणत होकर, हाथ जोड़े हुए खड़े रहकर स्तुति की।
श्लोक 40 (skanda.5.97.40)
नमः कृष्ण नमो विष्णो नमो जिष्णो नमोनमः। नमो वामन गोविंद नमोऽनंत नमोऽच्युत
namaḥ kṛṣṇa namo viṣṇo namo jiṣṇo namonamaḥ| namo vāmana goviṁda namo'naṁta namo'cyuta
'हे कृष्ण, नमस्कार; हे विष्णु, नमस्कार; हे जिष्णु, बार-बार नमस्कार। हे वामन, हे गोविंद, नमस्कार; हे अनंत, हे अच्युत, नमस्कार।'
श्लोक 41 (skanda.5.97.41)
जयस्व गोविंद महानुभाव जयस्व विश्णो जय पद्मनाभ। जयस्व सर्वाद्य गदाधरेश जयस्व विश्वेश्वर विश्वमूर्त्ते
jayasva goviṁda mahānubhāva jayasva viśṇo jaya padmanābha| jayasva sarvādya gadādhareśa jayasva viśveśvara viśvamūrtte
'हे महानुभाव गोविंद, जय हो; हे विष्णु, जय हो, हे पद्मनाभ, जय हो। हे सबके आदि, हे गदाधरेश, जय हो; हे विश्वेश्वर, हे विश्वमूर्ति, जय हो।'
श्लोक 42 (skanda.5.97.42)
एवं स्तुतस्तदा देवि ब्रह्मणा लोककारिणा। समीपस्थं समालोक्य सोमं वचनम ब्रवीत्
evaṁ stutastadā devi brahmaṇā lokakāriṇā| samīpasthaṁ samālokya somaṁ vacanama bravīt
इस प्रकार लोककर्ता ब्रह्मा द्वारा स्तुत होकर, हे देवी! विष्णु ने समीप खड़े सोम की ओर देखकर यह वचन कहा।
श्लोक 43 (skanda.5.97.43)
गच्छ सोम ममादेशान्महाकालवनोत्तमे। उत्तरे मुक्तिलिंगस्य लिंगं कातिकरं परम्। तमाराधय यत्नेन स ते देहं प्रदास्यति
gaccha soma mamādeśānmahākālavanottame| uttare muktiliṁgasya liṁgaṁ kātikaraṁ param| tamārādhaya yatnena sa te dehaṁ pradāsyati
'हे सोम! मेरी आज्ञा से महाकालवन के उत्तम स्थान को जाओ। वहाँ मुक्तिलिंग के उत्तर में एक परम कल्याणकारी लिंग है; उसकी यत्नपूर्वक आराधना करो, वह तुम्हें पुनः देह प्रदान करेगा।'
श्लोक 44 (skanda.5.97.44)
इत्युक्तो वासुदेवेन ब्रह्मणा च पुनः पुनः। आजगाम महादेवि महाकालवनोत्तमे। लिंगं दृष्ट्वा च तुष्टाव स्तोत्रेणानेन सुव्रते
ityukto vāsudevena brahmaṇā ca punaḥ punaḥ| ājagāma mahādevi mahākālavanottame| liṁgaṁ dṛṣṭvā ca tuṣṭāva stotreṇānena suvrate
वासुदेव तथा ब्रह्मा द्वारा बार-बार ऐसा कहे जाने पर, हे महादेवी! वह महाकालवन के उत्तम स्थान में आया, और लिंग को देखकर, हे सुव्रते! उसने इस स्तोत्र से स्तुति की।
श्लोक 45 (skanda.5.97.45)
चंद्र उवाच। नमो देवाधिदेवाय त्रिनेत्राय महात्मने। रक्तपिंगलनेत्राय जटामुकुटधारिणे
caṁdra uvāca| namo devādhidevāya trinetrāya mahātmane| raktapiṁgalanetrāya jaṭāmukuṭadhāriṇe
चंद्र ने कहा — 'देवाधिदेव, त्रिनेत्र, महात्मा, रक्त-पिंगल नेत्रों वाले, जटामुकुटधारी को नमस्कार।'
श्लोक 46 (skanda.5.97.46)
भूतवेतालजुष्टाय महादेवाय शूलिने। भीमाट्टहासयुक्ताय कपर्दिस्थाणवे नमः
bhūtavetālajuṣṭāya mahādevāya śūline| bhīmāṭṭahāsayuktāya kapardisthāṇave namaḥ
'भूत-वेतालों से सेवित, शूलधारी महादेव को; भयंकर अट्टहास करने वाले, कपर्दी स्थाणु को नमस्कार।'
श्लोक 47 (skanda.5.97.47)
पूष्णो दंतविनाशाय तथांधकविनाशिने। कैलासवरवासाय सर्वदेवायते नमः
pūṣṇo daṁtavināśāya tathāṁdhakavināśine| kailāsavaravāsāya sarvadevāyate namaḥ
'पूषा के दाँत नष्ट करने वाले, अंधक के विनाशक, कैलास के श्रेष्ठ निवासी, सर्वदेव को नमस्कार।'
श्लोक 48 (skanda.5.97.48)
विकरालोर्द्ध्वकेशाय भैरवाय नमोनमः। अग्निज्वालाकरालाय कलिधर्मविवासिने
vikarālorddhvakeśāya bhairavāya namonamaḥ| agnijvālākarālāya kalidharmavivāsine
'विकराल ऊर्ध्वकेश वाले भैरव को बार-बार नमस्कार; अग्निज्वाला-सम भयंकर, कलियुग के अधर्म को दूर करने वाले को नमस्कार।'
श्लोक 49 (skanda.5.97.49)
तथा दारुवनध्वंसकारिणे तिग्मशूलिने। कृतकंकणभोगींद्रकंठसूत्राय शूलिने
tathā dāruvanadhvaṁsakāriṇe tigmaśūline| kṛtakaṁkaṇabhogīṁdrakaṁṭhasūtrāya śūline
'दारुवन का ध्वंस करने वाले, तीक्ष्ण शूलधारी को; भुजंगराज के कंकण तथा कंठसूत्र धारण करने वाले शूलपाणि को नमस्कार।'
श्लोक 50 (skanda.5.97.50)
प्रचंडदंडहस्ताय वडवाग्निमुखाय च। वेदांतवेद्याय नमो यज्ञमूर्ते नमोनमः
pracaṁḍadaṁḍahastāya vaḍavāgnimukhāya ca| vedāṁtavedyāya namo yajñamūrte namonamaḥ
'प्रचंड दंड हाथ में धारण करने वाले, बड़वाग्नि-मुख वाले को; वेदांत से जानने योग्य, यज्ञमूर्ति को बार-बार नमस्कार।'
श्लोक 51 (skanda.5.97.51)
दक्षयज्ञविनाशाय जगद्भयकराय च। विश्वेश्वराय देवाय स्थूलसूक्ष्माय शंभवे। कपर्दिने करालाय सर्वदेवाय ते नमः
dakṣayajñavināśāya jagadbhayakarāya ca| viśveśvarāya devāya sthūlasūkṣmāya śaṁbhave| kapardine karālāya sarvadevāya te namaḥ
'दक्ष के यज्ञ का विनाश करने वाले, जगत् को भयभीत करने वाले; स्थूल-सूक्ष्म विश्वेश्वर शंभु को; कपर्दी, करालरूप, सर्वदेव को नमस्कार।'
श्लोक 52 (skanda.5.97.52)
एवं स्तुतस्तदा देवि चंद्रेणांतर्हितेन च। लिंगरूपी महादेवस्तुष्टो वाक्यमथाब्रवीत्
evaṁ stutastadā devi caṁdreṇāṁtarhitena ca| liṁgarūpī mahādevastuṣṭo vākyamathābravīt
इस प्रकार अंतर्धान हुए चंद्रमा द्वारा स्तुत होकर, हे देवी! लिंगरूपी महादेव प्रसन्न होकर यह वचन बोले।
श्लोक 53 (skanda.5.97.53)
स्तोत्रेणानेन तुष्टोऽस्मि ब्रूहि सोम किमिच्छसि। यत्तेभिलषितं सर्वं तत्कर्त्तास्मि न संशयः
stotreṇānena tuṣṭo'smi brūhi soma kimicchasi| yattebhilaṣitaṁ sarvaṁ tatkarttāsmi na saṁśayaḥ
'इस स्तोत्र से मैं प्रसन्न हूँ; हे सोम! कहो, क्या चाहते हो। जो कुछ तुम्हें अभीष्ट है, वह सब मैं निःसंदेह करूँगा।'
श्लोक 54 (skanda.5.97.54)
सोम उवाच। यदि त्वहमनुग्राह्यो यदि तुष्टोऽसि मे प्रभो। कांत्या दीप्त्या तथा मूर्त्या तथा रूपेण च प्रभो
soma uvāca| yadi tvahamanugrāhyo yadi tuṣṭo'si me prabho| kāṁtyā dīptyā tathā mūrtyā tathā rūpeṇa ca prabho
सोम ने कहा — 'यदि मैं अनुग्रह के योग्य हूँ, यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं, हे प्रभो! तो कांति, दीप्ति, मूर्ति तथा रूप से...'
श्लोक 55 (skanda.5.97.55)
स्वपदं कर्त्तुमिच्छामि त्वत्प्रसादान्महेश्वर। एवमस्त्विति लिंगेन तत्क्षणाद्रजनीचर
svapadaṁ karttumicchāmi tvatprasādānmaheśvara| evamastviti liṁgena tatkṣaṇādrajanīcara
'...अपने पद (पूर्व स्वरूप) को पुनः प्राप्त करना चाहता हूँ, आपकी कृपा से, हे महेश्वर!' 'ऐसा ही हो,' लिंग ने उसी क्षण कहा।
श्लोक 56 (skanda.5.97.56)
द्विजराजेन तत्प्राप्तं लिंगस्यास्य प्रसादतः। सोमेनाराधितो यस्माद्देवदेवो महेश्वरि
dvijarājena tatprāptaṁ liṁgasyāsya prasādataḥ| somenārādhito yasmāddevadevo maheśvari
द्विजराज सोम को इस लिंग की कृपा से यह प्राप्त हुआ; और चूँकि देवदेव महेश्वर की सोम द्वारा आराधना की गई, हे महेश्वरी!
श्लोक 57 (skanda.5.97.57)
तेन सोमेश्वरोनाम विख्यातो भुवनत्रये। येऽर्चयंति महादेवि देवं सोमेश्वरंपरम्
tena someśvaronāma vikhyāto bhuvanatraye| ye'rcayaṁti mahādevi devaṁ someśvaraṁparam
इसीलिए वे तीनों लोकों में सोमेश्वर नाम से विख्यात हुए। हे महादेवी! जो लोग परम देव सोमेश्वर की अर्चना करते हैं...
श्लोक 58 (skanda.5.97.58)
कृत पुण्या नरा मर्त्यास्ते यांति परमं पदम्। यः पश्यति नरो भक्त्या लिंगं सोमेश्वरं प्रिये
kṛta puṇyā narā martyāste yāṁti paramaṁ padam| yaḥ paśyati naro bhaktyā liṁgaṁ someśvaraṁ priye
...वे पुण्यकर्मा मर्त्य परम पद को प्राप्त होते हैं। हे प्रिये! जो मनुष्य भक्तिपूर्वक सोमेश्वर लिंग का दर्शन करता है...
श्लोक 59 (skanda.5.97.59)
विमुक्तो जन्मदुःखाद्यैर्लीयते मयि मानवः। ते नराः पशवो लोके किं तेषां जीविते फलम्
vimukto janmaduḥkhādyairlīyate mayi mānavaḥ| te narāḥ paśavo loke kiṁ teṣāṁ jīvite phalam
...वह जन्म-दुःख आदि से मुक्त होकर मुझमें लीन हो जाता है। जो ऐसा नहीं करते, वे इस लोक में पशु ही हैं — उनके जीवन का क्या फल?
श्लोक 60 (skanda.5.97.60)
यैश्च सोमेश्वरो देवो न दृष्टो न च पूजितः। संसारेऽस्मिन्महाघोरे जन्मरोगभयाकुले
yaiśca someśvaro devo na dṛṣṭo na ca pūjitaḥ| saṁsāre'sminmahāghore janmarogabhayākule
जिन्होंने सोमेश्वर देव का न दर्शन किया, न पूजन — वे इस महाघोर संसार में, जो जन्म-रोग के भय से व्याप्त है...
श्लोक 61 (skanda.5.97.61)
एकः सोमेश्वरः पूज्यः कुष्ठरोगविनाशनः। स एव सुकृती लोके कुलं तेनाभ्यलंकृतम्
ekaḥ someśvaraḥ pūjyaḥ kuṣṭharogavināśanaḥ| sa eva sukṛtī loke kulaṁ tenābhyalaṁkṛtam
...एक सोमेश्वर ही पूज्य हैं, कुष्ठ रोग के विनाशक; वे ही लोक में सुकृती हैं, उन्हीं से कुल अलंकृत होता है।
श्लोक 62 (skanda.5.97.62)
आधारः सर्वलोकानां येन सोमेश्वरो ऽर्चितः। सकृदभ्यर्च्य सोमेशं बिल्वपत्रेण मानवः। मुक्तो भोगी निरातंको मम लोके वसेच्चिरम्
ādhāraḥ sarvalokānāṁ yena someśvaro 'rcitaḥ| sakṛdabhyarcya someśaṁ bilvapatreṇa mānavaḥ| mukto bhogī nirātaṁko mama loke vasecciram
सर्वलोकाधार सोमेश्वर की जिसने अर्चना की — वह मनुष्य एक बार भी बिल्वपत्र से सोमेश की पूजा करके मुक्त, भोगी, निरातंक होकर मेरे लोक में दीर्घकाल तक निवास करता है।
श्लोक 63 (skanda.5.97.63)
कांचनैः कुसुमैर्देवि लिंगं सोमेश्वरं प्रिये। पूजयंति नरा भक्त्या ते यांति परमां गतिम्
kāṁcanaiḥ kusumairdevi liṁgaṁ someśvaraṁ priye| pūjayaṁti narā bhaktyā te yāṁti paramāṁ gatim
हे देवी, हे प्रिये! जो मनुष्य स्वर्णिम पुष्पों से भक्तिपूर्वक सोमेश्वर लिंग की पूजा करते हैं, वे परम गति को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 64 (skanda.5.97.64)
एष ते कथितो देवि प्रभावः पापनाशनः। सोमेश्वरस्य देवस्य शृणुष्वानरकेश्वरम्
eṣa te kathito devi prabhāvaḥ pāpanāśanaḥ| someśvarasya devasya śṛṇuṣvānarakeśvaram
यह तुम्हें सोमेश्वर देव का पापनाशक प्रभाव बताया गया, हे देवी! अब अनरकेश्वर के विषय में सुनो।