Skip to main content

नागर खण्ड · अध्याय 1

हाटकेश्वर क्षेत्र में लिङ्गोत्पत्ति

अध्याय-सूचीअध्याय 2

श्लोक 1 (skanda.6.1.1)

ॐ नमः पुरुषोत्तमाय॥ अथ स्कान्दे महापुराणे षष्ठं नागरखण्डप्रारम्भः॥ व्यास उवाच॥ स धूर्जटिजटाजूटो जायतां विजयाय वः। यत्रैकपलितभ्रांतिं करोत्यद्यापि जाह्नवी

oṁ namaḥ puruṣottamāya|| atha skānde mahāpurāṇe ṣaṣṭhaṁ nāgarakhaṇḍaprārambhaḥ|| vyāsa uvāca|| sa dhūrjaṭijaṭājūṭo jāyatāṁ vijayāya vaḥ| yatraikapalitabhrāṁtiṁ karotyadyāpi jāhnavī

ॐ पुरुषोत्तम को नमस्कार। अथ स्कन्द महापुराण में षष्ठ नागरखण्ड का प्रारम्भ। व्यास जी ने कहा — धूर्जटि (शिव) के जटाजूट आपके विजय के लिए हों, जिनमें आज भी गंगा एक श्वेत केश-सी भ्रांति उत्पन्न करती है।

श्लोक 2 (skanda.6.1.2)

ऋषय ऊचुः। हरस्य पूज्यते लिंगं कस्मादतन्महामते विशेषात्संपरित्यज्य शेषांगानि सुरासुरैः

ṛṣaya ūcuḥ| harasya pūjyate liṁgaṁ kasmādatanmahāmate viśeṣātsaṁparityajya śeṣāṁgāni surāsuraiḥ

ऋषियों ने कहा — हे महामते! देवों और असुरों द्वारा हर के अन्य समस्त अंगों को छोड़कर विशेष रूप से केवल लिंग की ही पूजा क्यों की जाती है?

श्लोक 3 (skanda.6.1.3)

तस्मादेतन्महाबाहो यथावद्वक्तुमर्हसि। सांप्रतं सूत कार्त्स्न्येन परं कौतूहलं हि नः

tasmādetanmahābāho yathāvadvaktumarhasi| sāṁprataṁ sūta kārtsnyena paraṁ kautūhalaṁ hi naḥ

अतः हे महाबाहो सूत! अब आप इसे यथावत् एवं सम्पूर्ण रूप से हमें बताइए, क्योंकि हमें इस विषय में अत्यंत कौतूहल है।

श्लोक 4 (skanda.6.1.4)

सूत उवाच। प्रश्नभारो महानेष यो भवद्भिरुदाहृतः। कीर्तयिष्ये तथाप्येनं नमस्कृत्य स्वयंभुवे

sūta uvāca| praśnabhāro mahāneṣa yo bhavadbhirudāhṛtaḥ| kīrtayiṣye tathāpyenaṁ namaskṛtya svayaṁbhuve

सूत जी ने कहा — आपने जो यह प्रश्न पूछा है, वह अत्यंत गुरुतर है; फिर भी स्वयंभू ब्रह्मा को नमस्कार करके मैं इसका वर्णन करूँगा।

श्लोक 5 (skanda.6.1.5)

आनर्तविषये चास्ति वनं मुनिजनाश्रयम्। मनोज्ञं सर्वसत्त्वानां सर्वर्तुफलितद्रुमम्

ānartaviṣaye cāsti vanaṁ munijanāśrayam| manojñaṁ sarvasattvānāṁ sarvartuphalitadrumam

आनर्त देश में एक वन है, जो मुनिजनों का आश्रयस्थल है, समस्त प्राणियों के लिए मनोहर है, और जिसके वृक्ष सभी ऋतुओं में फलते हैं।

श्लोक 6 (skanda.6.1.6)

तत्राश्रमपदं रम्यं सौम्यसत्त्वनिषेवितम्। अस्ति तापससंकीर्णं वेदध्वनिविराजितम्

tatrāśramapadaṁ ramyaṁ saumyasattvaniṣevitam| asti tāpasasaṁkīrṇaṁ vedadhvanivirājitam

वहाँ एक रमणीय आश्रम है, जो सौम्य प्राणियों द्वारा सेवित है, तपस्वियों से भरा हुआ है और वेदध्वनि से सुशोभित है।

श्लोक 7 (skanda.6.1.7)

अब्भक्षैर्वायुभक्षैश्च शीर्णपर्णाशिभिस्तथा। दन्तोलूखलिभिर्विप्रैः सेवितं चाश्मकुट्टकैः

abbhakṣairvāyubhakṣaiśca śīrṇaparṇāśibhistathā| dantolūkhalibhirvipraiḥ sevitaṁ cāśmakuṭṭakaiḥ

वह आश्रम केवल जल पीने वालों, केवल वायु पर जीवित रहने वालों, झरे हुए पत्तों को खाने वालों, तथा दाँतों को ही ऊखल बनाने वाले और पत्थर से अन्न कूटने वाले ब्राह्मणों से सेवित था।

श्लोक 8 (skanda.6.1.8)

स्नानहोमपरैश्चैव जपस्वाध्यायतत्परैः। वानप्रस्थैस्त्रिदण्डैश्च हंसैश्चापि कुटीचरैः

snānahomaparaiścaiva japasvādhyāyatatparaiḥ| vānaprasthaistridaṇḍaiśca haṁsaiścāpi kuṭīcaraiḥ

यह स्नान और हवन में तत्पर, जप-स्वाध्याय में लीन, वानप्रस्थियों, त्रिदंडधारी संन्यासियों, तथा हंस और कुटीचर नामक परिव्राजकों से सेवित था।

श्लोक 9 (skanda.6.1.9)

स्नातकैर्यतिभिर्दान्तैस्तथा पंचाग्निसाधकैः। कस्यचित्त्वथ कालस्य भगवांस्त्रिपुरांतकः

snātakairyatibhirdāntaistathā paṁcāgnisādhakaiḥ| kasyacittvatha kālasya bhagavāṁstripurāṁtakaḥ

स्नातकों, संयमी यतियों तथा पंचाग्नि-साधकों से भी वह सेवित था। एक समय भगवान त्रिपुरांतक

श्लोक 10 (skanda.6.1.10)

सतीवियोगसंतप्तो भ्रममाण इतस्ततः। तस्मिन्वने समायातः सौम्यसत्त्वनिषेविते

satīviyogasaṁtapto bhramamāṇa itastataḥ| tasminvane samāyātaḥ saumyasattvaniṣevite

सती के वियोग से संतप्त होकर इधर-उधर भ्रमण करते हुए, उसी सौम्य प्राणियों से सेवित वन में आ पहुँचे।

श्लोक 11 (skanda.6.1.11)

क्रीडंति नकुला यत्र सार्धं सर्पैः प्रहर्षिताः। पञ्चाननाश्च मातंगैर्वृषदंशास्तथाखुभिः। काकाः कौशिकसंघैश्च वैरभावविवर्जिताः

krīḍaṁti nakulā yatra sārdhaṁ sarpaiḥ praharṣitāḥ| pañcānanāśca mātaṁgairvṛṣadaṁśāstathākhubhiḥ| kākāḥ kauśikasaṁghaiśca vairabhāvavivarjitāḥ

वहाँ नेवले सर्पों के साथ हर्षपूर्वक क्रीड़ा करते हैं, सिंह हाथियों के साथ, बिल्लियाँ चूहों के साथ, और कौवे उलूकों के झुंडों के साथ — सभी अपना परस्पर वैरभाव त्यागकर।

श्लोक 12 (skanda.6.1.12)

ततश्च भगवान्रुद्रो दृष्ट्वाश्रमपदं तदा। नग्नः कपालमादाय भिक्षार्थं प्रविवेश सः

tataśca bhagavānrudro dṛṣṭvāśramapadaṁ tadā| nagnaḥ kapālamādāya bhikṣārthaṁ praviveśa saḥ

तब भगवान रुद्र ने उस आश्रम को देखकर, नग्न होकर तथा कपाल हाथ में लेकर, भिक्षा के लिए उसमें प्रवेश किया।

श्लोक 13 (skanda.6.1.13)

अथ तस्य समालोक्य रूपं गात्रसमुद्भवम्। अदृष्टपूर्वं तापस्यः सर्वाः कामवशं गताः

atha tasya samālokya rūpaṁ gātrasamudbhavam| adṛṣṭapūrvaṁ tāpasyaḥ sarvāḥ kāmavaśaṁ gatāḥ

तब उनके शरीर से उत्पन्न, अपूर्व रूप को देखकर सभी तपस्विनियाँ कामवश हो गईं।

श्लोक 14 (skanda.6.1.14)

गृहकर्म परित्यज्य गुरुशुश्रूषणानि च। मिथः संभाषणं चक्रुः स्थानेस्थाने च ताः स्थिताः

gṛhakarma parityajya guruśuśrūṣaṇāni ca| mithaḥ saṁbhāṣaṇaṁ cakruḥ sthānesthāne ca tāḥ sthitāḥ

वे अपने गृहकार्य और गुरु-सेवा को त्यागकर परस्पर बातचीत करने लगीं और जगह-जगह खड़ी हो गईं।

श्लोक 15 (skanda.6.1.15)

एका सा कापि धन्या या चक्रे तस्यावगूहनम्। विश्रब्धा सर्वगात्रेषु तापसस्य महात्मनः

ekā sā kāpi dhanyā yā cakre tasyāvagūhanam| viśrabdhā sarvagātreṣu tāpasasya mahātmanaḥ

उनमें से कोई एक भाग्यशाली स्त्री ने तो उस महात्मा तपस्वी के समस्त अंगों में निःशंक होकर उसका आलिंगन ही कर लिया।

श्लोक 16 (skanda.6.1.16)

तथान्याः कौतुकाविष्टा धावंत्यः सर्वतोदिशम्। दृश्यंते तं समुद्दिश्य विस्तारितविलोचनाः

tathānyāḥ kautukāviṣṭā dhāvaṁtyaḥ sarvatodiśam| dṛśyaṁte taṁ samuddiśya vistāritavilocanāḥ

कुछ अन्य स्त्रियाँ कौतूहल से भरकर सब दिशाओं में दौड़ती हुई, अपनी आँखें फैलाए हुए उसकी ओर देखती दिखाई दीं।

श्लोक 17 (skanda.6.1.17)

काश्चिदर्द्धानुलिप्तांग्यः काश्चिदेकांजितेक्षणाः। अर्धसंयमितैः कैशैस्तथान्यास्त्यक्तबालकाः

kāścidarddhānuliptāṁgyaḥ kāścidekāṁjitekṣaṇāḥ| ardhasaṁyamitaiḥ kaiśaistathānyāstyaktabālakāḥ

कुछ स्त्रियाँ शरीर का आधा भाग ही अनुलेपन किए हुए थीं, कुछ की केवल एक ही आँख में अंजन लगा था, कुछ के केश आधे ही बँधे थे, और कुछ ने तो अपने बालकों तक को छोड़ दिया।

श्लोक 18 (skanda.6.1.18)

एवमालोक्यमानः स कामिनीभिर्महेश्वरः। बभ्राम राजमार्गेण भिक्षां देहीति कीर्तयन्

evamālokyamānaḥ sa kāminībhirmaheśvaraḥ| babhrāma rājamārgeṇa bhikṣāṁ dehīti kīrtayan

इस प्रकार उन कामातुर स्त्रियों द्वारा देखे जाते हुए महेश्वर राजमार्ग पर घूमते हुए "भिक्षां देहि" पुकारते रहे।

श्लोक 19 (skanda.6.1.19)

अथ ते मुनयो दृष्ट्वा तं तथा विगतांबरम्। कामोद्भवकरंस्त्रीणां प्रोचुः कोपारुणेक्षणाः

atha te munayo dṛṣṭvā taṁ tathā vigatāṁbaram| kāmodbhavakaraṁstrīṇāṁ procuḥ kopāruṇekṣaṇāḥ

तब वे मुनि उसे उस प्रकार वस्त्रहीन तथा स्त्रियों में काम जगाने वाला देखकर, क्रोध से लाल आँखें किए हुए बोले।

श्लोक 20 (skanda.6.1.20)

यस्मात्पाप त्वयास्माकमाश्रमोऽयं विडंबितः। तस्माल्लिंगं पतत्वाशु तवैव वसुधातले

yasmātpāpa tvayāsmākamāśramo'yaṁ viḍaṁbitaḥ| tasmālliṁgaṁ patatvāśu tavaiva vasudhātale

हे पापी! चूँकि तूने हमारे इस आश्रम को इस प्रकार कलंकित किया है, अतः तेरा यह लिंग शीघ्र ही पृथ्वी पर गिर पड़े!

श्लोक 21 (skanda.6.1.21)

एतस्मिन्नंतरे भूमौ लिंगं तस्य पपात तत्। भित्त्वाथ धरणीपृष्ठं पातालं प्रविवेश ह

etasminnaṁtare bhūmau liṁgaṁ tasya papāta tat| bhittvātha dharaṇīpṛṣṭhaṁ pātālaṁ praviveśa ha

उसी क्षण उनका लिंग भूमि पर गिर पड़ा और पृथ्वी की सतह को भेदते हुए पाताल में प्रवेश कर गया।

श्लोक 22 (skanda.6.1.22)

सोऽपि लिंगपरित्यक्तो लज्जायुक्तो महेश्वरः। गर्तां गुर्वीं समाश्रित्य भ्रूणरूपः समाविशत्

so'pi liṁgaparityakto lajjāyukto maheśvaraḥ| gartāṁ gurvīṁ samāśritya bhrūṇarūpaḥ samāviśat

लिंग से रहित हुए महेश्वर भी लज्जायुक्त होकर एक गहरे गड्ढे का आश्रय लेकर भ्रूण के रूप में उसमें प्रविष्ट हो गए।

श्लोक 23 (skanda.6.1.23)

अथ लिंगस्य पातेन त्रैलोक्यभयशंसिनः। उत्पाता दारुणास्तस्थुः सर्वत्र द्विजसत्तमाः

atha liṁgasya pātena trailokyabhayaśaṁsinaḥ| utpātā dāruṇāstasthuḥ sarvatra dvijasattamāḥ

हे श्रेष्ठ द्विजो! तब उस लिंग के गिरने से त्रिभुवन में भय उत्पन्न करने वाले भयंकर उत्पात सब ओर होने लगे।

श्लोक 24 (skanda.6.1.24)

शीर्यते गिरिशृङ्गाणि पतंत्युल्का दिवापि च। त्यजंति सागराः सर्वे मर्यादां च शनैः शनैः

śīryate giriśṛṅgāṇi pataṁtyulkā divāpi ca| tyajaṁti sāgarāḥ sarve maryādāṁ ca śanaiḥ śanaiḥ

पर्वत-शिखर टूटने लगे, दिन में भी उल्काएँ गिरने लगीं, और समस्त समुद्र धीरे-धीरे अपनी मर्यादा छोड़ने लगे।

श्लोक 25 (skanda.6.1.25)

अथ देवगणाः सर्वे भयसंत्रस्तमानसाः। शक्रविष्णुमुखा जग्मुर्यत्र देवः पितामहः

atha devagaṇāḥ sarve bhayasaṁtrastamānasāḥ| śakraviṣṇumukhā jagmuryatra devaḥ pitāmahaḥ

तब समस्त देवगण, भयभीत मन से, इंद्र और विष्णु को आगे करके, वहाँ गए जहाँ पितामह ब्रह्मा विराजमान थे।

श्लोक 26 (skanda.6.1.26)

प्रोचुश्च प्रणताः स्तुत्वा स्तोत्रैः सुश्रुतिसंभवैः। त्रैलोक्ये सृष्टिरूपं यत्कमलासनसंस्थितम्

procuśca praṇatāḥ stutvā stotraiḥ suśrutisaṁbhavaiḥ| trailokye sṛṣṭirūpaṁ yatkamalāsanasaṁsthitam

उन्होंने प्रणाम करके, वेदोक्त स्तोत्रों से स्तुति करके, कमलासन पर विराजमान, त्रिभुवन में सृष्टि-स्वरूप उन ब्रह्मा से कहा।

श्लोक 27 (skanda.6.1.27)

किमिदं किमिदं देव वर्तते ह्यधरोत्तरम्। त्रैलोक्यं सकलं येन व्याकुलत्वमुपागतम्

kimidaṁ kimidaṁ deva vartate hyadharottaram| trailokyaṁ sakalaṁ yena vyākulatvamupāgatam

हे देव! यह क्या है, यह क्या हो रहा है, जिससे सब कुछ उलट-पुलट हो गया है और समस्त त्रिभुवन व्याकुल हो उठा है?

श्लोक 28 (skanda.6.1.28)

प्रलयस्येव चिह्नानि दृश्यंते पद्मसंभव। किं सांप्रतमकालेऽपि भविष्यति परिक्षयः

pralayasyeva cihnāni dṛśyaṁte padmasaṁbhava| kiṁ sāṁpratamakāle'pi bhaviṣyati parikṣayaḥ

हे पद्मसंभव! प्रलय के समान लक्षण दिखाई दे रहे हैं। क्या अभी, असमय में ही, संपूर्ण विनाश होने वाला है?

श्लोक 29 (skanda.6.1.29)

सर्वेषां सुरमर्त्यानां दैत्यानां मन्त्रकोविदः। गतिर्भयार्तदेहानां सर्वलोकपितामहः

sarveṣāṁ suramartyānāṁ daityānāṁ mantrakovidaḥ| gatirbhayārtadehānāṁ sarvalokapitāmahaḥ

हे मंत्रकोविद! आप ही देवों, मनुष्यों और दैत्यों के, तथा भय से पीड़ित समस्त प्राणियों के आश्रय हैं — आप ही सम्पूर्ण लोकों के पितामह हैं।

श्लोक 30 (skanda.6.1.30)

तेषां तद्वचनं श्रुत्वा देवानां चतुराननः। उवाच सुचिरं ध्यात्वा ज्ञात्वा दिव्येन चक्षुषा

teṣāṁ tadvacanaṁ śrutvā devānāṁ caturānanaḥ| uvāca suciraṁ dhyātvā jñātvā divyena cakṣuṣā

देवताओं के इन वचनों को सुनकर चतुरानन ब्रह्मा ने दीर्घकाल तक ध्यान करके, दिव्य नेत्र से सत्य को जानकर कहा।

श्लोक 31 (skanda.6.1.31)

प्रलयस्य न कालोऽयं सांप्रतं सुरसत्तमाः। शृणुध्वं यन्निमित्तोत्था महोत्पाता भवन्त्यमी

pralayasya na kālo'yaṁ sāṁprataṁ surasattamāḥ| śṛṇudhvaṁ yannimittotthā mahotpātā bhavantyamī

हे श्रेष्ठ देवो! अभी प्रलय का समय नहीं है। सुनो, जिस कारण से ये महान उत्पात उत्पन्न हुए हैं।

श्लोक 32 (skanda.6.1.32)

ऋषिभिः पातितं लिंगं देवदेवस्य शूलिनः। शापेनानर्तके देशे कलत्रार्थे महात्मभिः

ṛṣibhiḥ pātitaṁ liṁgaṁ devadevasya śūlinaḥ| śāpenānartake deśe kalatrārthe mahātmabhiḥ

अनर्त देश में महात्मा ऋषियों ने अपनी पत्नियों के कारण शाप देकर शूलधारी देवदेव के लिंग को गिरा दिया है।

श्लोक 33 (skanda.6.1.33)

तेनैतद्व्याकुलीभूतं त्रैलोक्यं सचराचरम्। तस्माद्गच्छामहे तत्र यत्र देवो महेश्वरः

tenaitadvyākulībhūtaṁ trailokyaṁ sacarācaram| tasmādgacchāmahe tatra yatra devo maheśvaraḥ

इसी कारण चराचरसहित समस्त त्रिभुवन व्याकुल हो उठा है। अतः हम वहाँ चलें जहाँ भगवान महेश्वर हैं।

श्लोक 34 (skanda.6.1.34)

येनास्मद्वचनाच्छीघ्रं तल्लिंगं निदधाति सः। नो चेद्भविष्यति व्यक्तमकाले चापि संक्षयः। त्रैलोक्यस्यापि कृत्स्नस्य सत्यमेतन्मयोदितम्

yenāsmadvacanācchīghraṁ talliṁgaṁ nidadhāti saḥ| no cedbhaviṣyati vyaktamakāle cāpi saṁkṣayaḥ| trailokyasyāpi kṛtsnasya satyametanmayoditam

जिससे वे हमारे कहने पर शीघ्र ही उस लिंग को पुनः धारण कर लें। अन्यथा असमय में ही समस्त त्रिभुवन का स्पष्ट विनाश हो जाएगा — यह मैं सत्य कहता हूँ।

श्लोक 35 (skanda.6.1.35)

अथ देवगणाः सर्वे ब्रह्मविष्णुपुरःसराः। आदित्या वसवो रुद्रा विश्वेदेवास्तथाश्विनौ

atha devagaṇāḥ sarve brahmaviṣṇupuraḥsarāḥ| ādityā vasavo rudrā viśvedevāstathāśvinau

तब ब्रह्मा और विष्णु के नेतृत्व में आदित्य, वसु, रुद्र, विश्वेदेव तथा दोनों अश्विनीकुमारों सहित समस्त देवगण —

श्लोक 36 (skanda.6.1.36)

प्रजग्मुस्त्वरितास्तत्र यत्र देवो महेश्वरः। गर्तामध्यगतः सुप्तो लज्जया परया वृतः

prajagmustvaritāstatra yatra devo maheśvaraḥ| gartāmadhyagataḥ supto lajjayā parayā vṛtaḥ

— शीघ्रता से वहाँ पहुँचे जहाँ भगवान महेश्वर गड्ढे के भीतर, अत्यंत लज्जा से युक्त होकर, सोए हुए के समान पड़े थे।

श्लोक 37 (skanda.6.1.37)

देवा ऊचुः। नमस्ते देवदेवेश भक्तानामभयप्रद। नमस्ते जगदाधार शशिराजितशेखर

devā ūcuḥ| namaste devadeveśa bhaktānāmabhayaprada| namaste jagadādhāra śaśirājitaśekhara

देवताओं ने कहा — हे देवदेवेश! भक्तों को अभय देने वाले, आपको नमस्कार है। हे जगदाधार! चंद्रमा से सुशोभित मुकुट वाले, आपको नमस्कार है।

श्लोक 38 (skanda.6.1.38)

त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कारस्त्वमापस्त्वं मही विभो। त्वया सृष्टमिदं सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम्

tvaṁ yajñastvaṁ vaṣaṭkārastvamāpastvaṁ mahī vibho| tvayā sṛṣṭamidaṁ sarvaṁ trailokyaṁ sacarācaram

हे विभो! आप ही यज्ञ हैं, आप ही वषट्कार हैं, आप ही जल हैं, आप ही पृथ्वी हैं। आपके द्वारा ही चराचरसहित यह समस्त त्रिभुवन सृजित हुआ है।

श्लोक 39 (skanda.6.1.39)

त्वं पासि च सुरश्रेष्ठ तथा नाशं नयिष्यसि। त्वं विष्णुस्त्वं चतुर्वक्त्रस्त्वं चंद्रस्त्वं दिवाकरः

tvaṁ pāsi ca suraśreṣṭha tathā nāśaṁ nayiṣyasi| tvaṁ viṣṇustvaṁ caturvaktrastvaṁ caṁdrastvaṁ divākaraḥ

हे सुरश्रेष्ठ! आप ही इसकी रक्षा करते हैं और आप ही इसे नाश की ओर ले जाएँगे। आप विष्णु हैं, आप चतुर्मुख ब्रह्मा हैं, आप चंद्रमा हैं, आप सूर्य हैं।

श्लोक 40 (skanda.6.1.40)

त्वया विना महादेव न किंचिदिह विद्यते। अपि कृत्वा महत्पापं नरो देव धरातले

tvayā vinā mahādeva na kiṁcidiha vidyate| api kṛtvā mahatpāpaṁ naro deva dharātale

हे महादेव! आपके बिना यहाँ कुछ भी विद्यमान नहीं है। हे देव! पृथ्वी पर चाहे मनुष्य ने कितना ही बड़ा पाप क्यों न किया हो —

श्लोक 41 (skanda.6.1.41)

तव नामापि संकीर्त्य प्रयाति त्रिदिवालयम्। महादेव महादेव महादेवेति कीर्तनात्

tava nāmāpi saṁkīrtya prayāti tridivālayam| mahādeva mahādeva mahādeveti kīrtanāt

— फिर भी केवल आपका नाम उच्चारण करके ही वह स्वर्गलोक को प्राप्त हो जाता है — "महादेव, महादेव, महादेव" ऐसा कीर्तन करने मात्र से —

श्लोक 42 (skanda.6.1.42)

कोटयो ब्रह्महत्यानामगम्यागमकोटयः। सद्यः प्रलयमायांति महादेवेति कीर्तनात्

koṭayo brahmahatyānāmagamyāgamakoṭayaḥ| sadyaḥ pralayamāyāṁti mahādeveti kīrtanāt

— करोड़ों ब्रह्महत्याएँ तथा करोड़ों अगम्यागमन के पाप, "महादेव" के कीर्तन मात्र से तत्क्षण नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 43 (skanda.6.1.43)

विप्रो यथा मनुष्याणां नदीनां वा महार्णवः। तथा त्वं सर्वदेवानामाधिपत्ये व्यवस्थितः

vipro yathā manuṣyāṇāṁ nadīnāṁ vā mahārṇavaḥ| tathā tvaṁ sarvadevānāmādhipatye vyavasthitaḥ

जैसे मनुष्यों में ब्राह्मण श्रेष्ठ है, अथवा नदियों में महासागर श्रेष्ठ है, वैसे ही आप समस्त देवताओं के आधिपत्य में प्रतिष्ठित हैं।

श्लोक 44 (skanda.6.1.44)

नक्षत्राणां यथा चंद्रः प्रदीप्तानां दिवाकरः। तथा त्वं सर्वदेवानामाधिपत्ये व्यवस्थितः

nakṣatrāṇāṁ yathā caṁdraḥ pradīptānāṁ divākaraḥ| tathā tvaṁ sarvadevānāmādhipatye vyavasthitaḥ

जैसे नक्षत्रों में चंद्रमा तथा तेजस्वी वस्तुओं में सूर्य श्रेष्ठ है, वैसे ही आप समस्त देवताओं के आधिपत्य में प्रतिष्ठित हैं।

श्लोक 45 (skanda.6.1.45)

धातूनां कांचनं यद्वद्गंधर्वाणां च नारदः। तथा त्वं सर्वदेवानामाधिपत्ये व्यवस्थितः

dhātūnāṁ kāṁcanaṁ yadvadgaṁdharvāṇāṁ ca nāradaḥ| tathā tvaṁ sarvadevānāmādhipatye vyavasthitaḥ

जैसे धातुओं में स्वर्ण तथा गंधर्वों में नारद श्रेष्ठ हैं, वैसे ही आप समस्त देवताओं के आधिपत्य में प्रतिष्ठित हैं।

श्लोक 46 (skanda.6.1.46)

ओषधीनां यथा सस्यं नगानां हेमपर्वतः। तथा त्वं सर्वदेवानामाधिपत्ये व्यवस्थितः

oṣadhīnāṁ yathā sasyaṁ nagānāṁ hemaparvataḥ| tathā tvaṁ sarvadevānāmādhipatye vyavasthitaḥ

जैसे ओषधियों में धान्य तथा पर्वतों में स्वर्णपर्वत मेरु श्रेष्ठ है, वैसे ही आप समस्त देवताओं के आधिपत्य में प्रतिष्ठित हैं।

श्लोक 47 (skanda.6.1.47)

तस्मात्कुरु प्रसादं नः सर्वेषां च नृणां विभो। संधारय पुनर्लिंगं स्वकीयं सुरसत्तम

tasmātkuru prasādaṁ naḥ sarveṣāṁ ca nṛṇāṁ vibho| saṁdhāraya punarliṁgaṁ svakīyaṁ surasattama

अतः हे विभो! हम पर तथा समस्त मनुष्यों पर कृपा कीजिए। हे सुरसत्तम! अपने लिंग को पुनः धारण कीजिए।

श्लोक 48 (skanda.6.1.48)

नोचेज्जगत्त्रयं देव नूनं नाशममुपेष्यति। यद्येतद्भूतले लिङ्गं पतति स्थास्यति प्रभो

nocejjagattrayaṁ deva nūnaṁ nāśamamupeṣyati| yadyetadbhūtale liṅgaṁ patati sthāsyati prabho

हे देव! अन्यथा त्रिभुवन निश्चय ही नष्ट हो जाएगा। हे प्रभो! यदि यह लिंग पृथ्वी पर गिरा ही रह गया —

श्लोक 49 (skanda.6.1.49)

सूत उवाच। तेषां तद्वचनं श्रुत्वा भगवान्बृषभध्वजः। प्रोवाच प्रणतान्सर्वांस्तान्देवान्व्रीडयान्वितः

sūta uvāca| teṣāṁ tadvacanaṁ śrutvā bhagavānbṛṣabhadhvajaḥ| provāca praṇatānsarvāṁstāndevānvrīḍayānvitaḥ

सूत जी ने कहा — उनके इन वचनों को सुनकर वृषभध्वज भगवान ने लज्जायुक्त होकर, अपने सामने प्रणत उन सभी देवताओं से कहा।

श्लोक 50 (skanda.6.1.50)

मया सतीवियोगार्तियुक्तेन सुरसत्तम। लिंगमेतत्परित्यक्तं शापव्याजाद्द्विजन्मनाम्

mayā satīviyogārtiyuktena surasattama| liṁgametatparityaktaṁ śāpavyājāddvijanmanām

हे सुरसत्तम! सती के वियोग से पीड़ित होकर, मैंने द्विजों के शाप के बहाने इस लिंग को त्याग दिया।

श्लोक 51 (skanda.6.1.51)

कोऽलं पातयितुं लिंगं ममैतद्भुवनत्रये। देवो वा ब्राह्मणो वापि वेत्थ यूयमपि स्फुटम्

ko'laṁ pātayituṁ liṁgaṁ mamaitadbhuvanatraye| devo vā brāhmaṇo vāpi vettha yūyamapi sphuṭam

तीनों लोकों में देवता हो या ब्राह्मण, कौन मेरे इस लिंग को गिरा सकने में समर्थ है? यह तुम भी भली-भाँति जानते हो।

श्लोक 52 (skanda.6.1.52)

तस्मान्नैव धरिष्यामि लिंगमेतद्धरातलात्। किमनेन करिष्यामि भार्यया परिवर्जितः

tasmānnaiva dhariṣyāmi liṁgametaddharātalāt| kimanena kariṣyāmi bhāryayā parivarjitaḥ

अतः मैं इस लिंग को पृथ्वी की सतह से पुनः धारण नहीं करूँगा। भार्या से रहित होकर मैं इससे क्या करूँगा?

श्लोक 53 (skanda.6.1.53)

देवा ऊचुः। तव कांता सती नाम या मृता प्राक्सुरोत्तम। सा जाता मेनकागर्भे गौरी नाम हिमाचलात्

devā ūcuḥ| tava kāṁtā satī nāma yā mṛtā prāksurottama| sā jātā menakāgarbhe gaurī nāma himācalāt

देवताओं ने कहा — हे सुरोत्तम! आपकी जो प्रिया सती पूर्व में मृत्यु को प्राप्त हुई थीं, वे ही अब हिमाचल से मेनका के गर्भ में गौरी नाम से उत्पन्न हुई हैं।

श्लोक 54 (skanda.6.1.54)

भविष्यति पुनर्भार्या तवैव त्रिपुरांतक। तस्माल्लिंगं समादाय कुरु क्षेमं दिवौकसाम्

bhaviṣyati punarbhāryā tavaiva tripurāṁtaka| tasmālliṁgaṁ samādāya kuru kṣemaṁ divaukasām

हे त्रिपुरांतक! वे ही पुनः आपकी भार्या बनेंगी। अतः लिंग को धारण कर देवताओं का कल्याण कीजिए।

श्लोक 55 (skanda.6.1.55)

देवदेव उवाच। अद्यप्रभृति मे लिंगं यदि देवा द्विजातयः। पूजयंति प्रयत्नेन तर्हीदं धारयाम्यहम्

devadeva uvāca| adyaprabhṛti me liṁgaṁ yadi devā dvijātayaḥ| pūjayaṁti prayatnena tarhīdaṁ dhārayāmyaham

देवदेव ने कहा — यदि आज से देवता और द्विजगण प्रयत्नपूर्वक मेरे इस लिंग की पूजा करें, तो ही मैं इसे धारण करूँगा।

श्लोक 56 (skanda.6.1.56)

ब्रह्मोवाच। अहं तव स्वयं लिंगं पूजयिष्यामि शंकर। तथान्ये विबुधाः सर्वे किं पुनर्भुवि मानवाः

brahmovāca| ahaṁ tava svayaṁ liṁgaṁ pūjayiṣyāmi śaṁkara| tathānye vibudhāḥ sarve kiṁ punarbhuvi mānavāḥ

ब्रह्मा जी ने कहा — हे शंकर! मैं स्वयं आपके लिंग की पूजा करूँगा, तथा अन्य समस्त देवगण भी करेंगे — फिर पृथ्वी के मनुष्यों की तो बात ही क्या!

श्लोक 57 (skanda.6.1.57)

ततः प्रविश्य पातालं देवैः सार्धं पितामहः। स्वयमेवाकरोत्पूजां तस्य लिंगस्य भक्तितः

tataḥ praviśya pātālaṁ devaiḥ sārdhaṁ pitāmahaḥ| svayamevākarotpūjāṁ tasya liṁgasya bhaktitaḥ

तब पितामह ब्रह्मा देवताओं के साथ पाताल में प्रवेश करके स्वयं ही भक्तिपूर्वक उस लिंग की पूजा करने लगे।

श्लोक 58 (skanda.6.1.58)

तस्मादनंतरं विष्णुः श्रद्धापूतेन चेतसा। तथान्ये विबुधाः सर्वे शक्राद्याः श्रद्धयान्विताः

tasmādanaṁtaraṁ viṣṇuḥ śraddhāpūtena cetasā| tathānye vibudhāḥ sarve śakrādyāḥ śraddhayānvitāḥ

उसके पश्चात् विष्णु ने भी श्रद्धापूत चित्त से, तथा इंद्र आदि अन्य समस्त देवताओं ने भी श्रद्धायुक्त होकर उसकी पूजा की।

श्लोक 59 (skanda.6.1.59)

ततस्तुष्टो महादेवः पितामहमिदं वचः। प्रोवाच वासुदेवं च विनयावनतं स्थितम्

tatastuṣṭo mahādevaḥ pitāmahamidaṁ vacaḥ| provāca vāsudevaṁ ca vinayāvanataṁ sthitam

तब प्रसन्न होकर महादेव ने विनयपूर्वक झुके हुए खड़े पितामह और वासुदेव से यह वचन कहा।

श्लोक 60 (skanda.6.1.60)

भवद्भ्यां परितुष्टोऽस्मि तस्मान्मत्तः प्रगृह्यताम्। वरमिष्टं महाभागौ यद्यपि स्यात्सुदुर्लभम्

bhavadbhyāṁ parituṣṭo'smi tasmānmattaḥ pragṛhyatām| varamiṣṭaṁ mahābhāgau yadyapi syātsudurlabham

मैं तुम दोनों से अत्यंत प्रसन्न हूँ; अतः हे महाभागो! मुझसे अपनी इच्छानुसार वर माँगो, चाहे वह अत्यंत दुर्लभ ही क्यों न हो।

श्लोक 61 (skanda.6.1.61)

तावूचतुः। यदि तुष्टोसि देवेश त्रिभागेन समाश्रयम्। आवाभ्यां देहि लिंगेन येनैकत्राश्रयो भवेत्

tāvūcatuḥ| yadi tuṣṭosi deveśa tribhāgena samāśrayam| āvābhyāṁ dehi liṁgena yenaikatrāśrayo bhavet

उन दोनों ने कहा — हे देवेश! यदि आप प्रसन्न हैं, तो हम दोनों को लिंग में तीसरे भाग का आश्रय प्रदान कीजिए, जिससे हम एक ही स्थान पर निवास कर सकें।

श्लोक 62 (skanda.6.1.62)

सूत उवाच। स तथेति प्रतिज्ञाय लिंगमादाय च प्रभुः। स्थाने नियोजयामास सर्वदेवाधिपूजितम्

sūta uvāca| sa tatheti pratijñāya liṁgamādāya ca prabhuḥ| sthāne niyojayāmāsa sarvadevādhipūjitam

सूत जी ने कहा — प्रभु ने "एवमस्तु" कहकर लिंग को धारण किया और उसे उसी स्थान पर, समस्त देवताओं द्वारा पूजित होकर, स्थापित कर दिया।

श्लोक 63 (skanda.6.1.63)

ततो हाटकमादाय तदाकारं पितामहः। कृत्वा लिंगं स्वयं तत्र स्थापयामास हर्षितः

tato hāṭakamādāya tadākāraṁ pitāmahaḥ| kṛtvā liṁgaṁ svayaṁ tatra sthāpayāmāsa harṣitaḥ

तब पितामह ने स्वर्ण लेकर उसी आकार में स्वयं एक लिंग बनाया और हर्षपूर्वक वहाँ उसकी स्थापना की।

श्लोक 64 (skanda.6.1.64)

प्रोवाच चाथ भो विप्राः साधुनादेन नादयन्। लोकत्रयं समस्तानां शृण्वतां त्रिदिवौकसाम्

provāca cātha bho viprāḥ sādhunādena nādayan| lokatrayaṁ samastānāṁ śṛṇvatāṁ tridivaukasām

तब उन्होंने साधुवाद के घोष से त्रिलोक को गुंजाते हुए, समस्त उपस्थित देवताओं के सुनते हुए कहा — "हे विप्रो!"

श्लोक 65 (skanda.6.1.65)

मया ह्याद्यं त्विदं लिंगं हाटकेन विनिर्मितम्। ख्यातिं यास्यति सर्वत्र पाताले हाटकेश्वरम्

mayā hyādyaṁ tvidaṁ liṁgaṁ hāṭakena vinirmitam| khyātiṁ yāsyati sarvatra pātāle hāṭakeśvaram

"मेरे द्वारा स्वर्ण से बनाया गया यह प्रथम लिंग सर्वत्र पाताल में हाटकेश्वर के नाम से प्रसिद्ध होगा।"

श्लोक 66 (skanda.6.1.66)

तथान्ये मनुजा ये च हाटकादीनि भक्तितः। मणिमुक्तासुरत्नैश्च कृत्वा लिंगानि कृत्स्नशः

tathānye manujā ye ca hāṭakādīni bhaktitaḥ| maṇimuktāsuratnaiśca kṛtvā liṁgāni kṛtsnaśaḥ

"और जो अन्य मनुष्य भी भक्तिपूर्वक स्वर्ण आदि से, अथवा मणि, मोती और उत्तम रत्नों से समग्र रूप से लिंग बनाएँगे —"

श्लोक 67 (skanda.6.1.67)

त्रिकालं पूजयिष्यंति ते यास्यंति परां गतिम्। मृन्मयं संपरित्यज्य नीचधातुमयं तथा

trikālaṁ pūjayiṣyaṁti te yāsyaṁti parāṁ gatim| mṛnmayaṁ saṁparityajya nīcadhātumayaṁ tathā

"— और उनकी त्रिकाल पूजा करेंगे, वे परमगति को प्राप्त होंगे — किंतु मिट्टी तथा निम्न धातु के लिंग का त्याग करके।"

श्लोक 68 (skanda.6.1.68)

एवमुक्त्वा चतुर्वक्त्रः सह सर्वैर्दिवालयैः। जगाम त्रिदिवं सोऽपि कैलासं शशिशेखरः

evamuktvā caturvaktraḥ saha sarvairdivālayaiḥ| jagāma tridivaṁ so'pi kailāsaṁ śaśiśekharaḥ

ऐसा कहकर चतुर्मुख ब्रह्मा समस्त देवताओं के साथ स्वर्गलोक को चले गए, और चंद्रशेखर भी कैलास को चले गए।

श्लोक 69 (skanda.6.1.69)

एतस्मात्कारणाल्लिंगं पूज्यतेऽत्र सुरासुरैः। हरस्य चोत्तमांगानि परित्यज्य विशेषतः

etasmātkāraṇālliṁgaṁ pūjyate'tra surāsuraiḥ| harasya cottamāṁgāni parityajya viśeṣataḥ

इसी कारण यहाँ देवताओं और असुरों दोनों द्वारा हर के अन्य उत्तमांगों को विशेष रूप से छोड़कर केवल लिंग की ही पूजा की जाती है।

श्लोक 70 (skanda.6.1.70)

ततः प्रभृति तल्लिंगं स्वयं ब्रह्मा व्यवस्थितः। भगवान्वासुदेवश्च तेन पूज्यं शिवं हि तत्

tataḥ prabhṛti talliṁgaṁ svayaṁ brahmā vyavasthitaḥ| bhagavānvāsudevaśca tena pūjyaṁ śivaṁ hi tat

तभी से उस लिंग में स्वयं ब्रह्मा तथा भगवान वासुदेव प्रतिष्ठित हैं; अतः वह लिंग साक्षात् शिव के समान ही पूज्य है।

श्लोक 71 (skanda.6.1.71)

यस्तु पूजयते नित्यं श्रद्धायुक्तेन चेतसा। त्र्यंबकाच्युतब्रह्माद्यास्तेन स्युः पूजितास्त्रयः

yastu pūjayate nityaṁ śraddhāyuktena cetasā| tryaṁbakācyutabrahmādyāstena syuḥ pūjitāstrayaḥ

जो कोई भी नित्य श्रद्धायुक्त चित्त से इसकी पूजा करता है, उसके द्वारा त्र्यंबक, अच्युत और ब्रह्मा — ये तीनों ही पूजित हो जाते हैं।

श्लोक 72 (skanda.6.1.72)

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन शिवलिंगं प्रपूजयेत्। स्पर्शयेदीक्षयेन्नित्यं कीर्तयेच्च द्विजोत्तमाः

tasmātsarvaprayatnena śivaliṁgaṁ prapūjayet| sparśayedīkṣayennityaṁ kīrtayecca dvijottamāḥ

अतः हे द्विजोत्तमो! सम्पूर्ण प्रयत्न से शिवलिंग की पूजा करनी चाहिए, उसका स्पर्श करना चाहिए, उसे नित्य देखना चाहिए और उसका कीर्तन करना चाहिए।

अध्याय-सूचीअध्याय 2