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नागर खण्ड · अध्याय 14

चमत्कारपुर-प्रदक्षिणा की महिमा

अध्याय 13अध्याय-सूचीअध्याय 15

श्लोक 1 (skanda.6.14.1)

सूत उवाच । यदन्यत्तत्र सञ्जातमाश्चर्यं द्विजसत्तमाः । तदहं कीर्तयिष्यामि रहस्यं हृदि संस्थितम्

sūta uvāca yadanyattatra sañjātamāścaryaṁ dvijasattamāḥ tadahaṁ kīrtayiṣyāmi rahasyaṁ hṛdi saṁsthitam

सूत जी ने कहा — हे श्रेष्ठ द्विजो! वहाँ जो अन्य आश्चर्यजनक घटना घटी, जो अभी तक हृदय में गुप्त रही, अब मैं उसे सुनाऊँगा।

श्लोक 2 (skanda.6.14.2)

चमत्कारपुरे कश्चिद्वैश्यजातिसमुद्भवः । बभूव पुरुषो मूको दरिद्रेण समन्वितः

camatkārapure kaścidvaiśyajātisamudbhavaḥ babhūva puruṣo mūko daridreṇa samanvitaḥ

चमत्कारपुर में वैश्य जाति में उत्पन्न एक पुरुष था, जो गूँगा और दरिद्रता से पीड़ित था।

श्लोक 3 (skanda.6.14.3)

यो दौःस्थ्यात्सर्वलोकानां करोति पशुरक्षणम् । कुटुम्बभरणार्थाय संतुष्टो येनकेनचित्

yo dauḥsthyātsarvalokānāṁ karoti paśurakṣaṇam kuṭumbabharaṇārthāya saṁtuṣṭo yenakenacit

दुर्दशा के कारण वह सब लोगों के पशुओं की रखवाली करता था, अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए जो कुछ भी मिले उसी से संतुष्ट रहता था।

श्लोक 4 (skanda.6.14.4)

कदाचिद्रक्षतस्तस्य पशूंस्तान्वनभूमिषु । पशुरेको विनिष्क्रांतः स्वयूथात्तृणलोभतः

kadācidrakṣatastasya paśūṁstānvanabhūmiṣu paśureko viniṣkrāṁtaḥ svayūthāttṛṇalobhataḥ

एक बार जब वह वन-भूमि में उन पशुओं की रखवाली कर रहा था, तब घास के लोभ से एक पशु अपने झुंड से अलग होकर निकल गया।

श्लोक 5 (skanda.6.14.5)

कृष्ण पक्षे चतुर्दश्यां चैत्रमासे द्विजोत्तमाः । न तदा लक्षितस्तेन गच्छमानो यदृच्छया

kṛṣṇa pakṣe caturdaśyāṁ caitramāse dvijottamāḥ na tadā lakṣitastena gacchamāno yadṛcchayā

हे श्रेष्ठ द्विजो! यह चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन हुआ, और वह पशु अपनी इच्छा से चलता हुआ उससे पहचाना न गया।

श्लोक 6 (skanda.6.14.6)

अथ यावद्गृहं प्राप्तः स मूकः पशुपालकः । तावत्तस्य च गोः स्वामी भर्त्सयन्समुपागतः

atha yāvadgṛhaṁ prāptaḥ sa mūkaḥ paśupālakaḥ tāvattasya ca goḥ svāmī bhartsayansamupāgataḥ

जैसे ही वह गूँगा गोपालक घर पहुँचा, वैसे ही उस गाय का स्वामी उसे डाँटते हुए आया।

श्लोक 7 (skanda.6.14.7)

किं पाप न समायातः पशुरेकोऽद्य नो यथा । नूनं त्वया हतः सोऽपि विक्रीतोऽपिहितोऽथवा । तस्मा दानय मे क्षिप्रं निराहारोऽपि गां त्वरात्

kiṁ pāpa na samāyātaḥ paśureko'dya no yathā nūnaṁ tvayā hataḥ so'pi vikrīto'pihito'thavā tasmā dānaya me kṣipraṁ nirāhāro'pi gāṁ tvarāt

"हे पापी! आज मेरा एक पशु क्यों नहीं आया? निश्चय ही तूने या तो उसे मार डाला, या बेच दिया, या कहीं छिपा दिया। इसलिए भूखा रहकर भी तू तुरंत ही मेरी वह गाय शीघ्र लौटा दे।"

श्लोक 8 (skanda.6.14.8)

तच्छ्रुत्वा भयसंत्रस्तः स मूकः पशुपालकः । निष्क्रांतो यष्टिमादाय निराहारोऽपि मन्दिरात्

tacchrutvā bhayasaṁtrastaḥ sa mūkaḥ paśupālakaḥ niṣkrāṁto yaṣṭimādāya nirāhāro'pi mandirāt

यह सुनकर भय से व्याकुल हुआ वह गूँगा गोपालक, बिना भोजन किए ही लाठी लेकर घर से निकल पड़ा।

श्लोक 9 (skanda.6.14.9)

ततोऽरण्यं समासाद्य वीक्षांचक्रे समंततः । सूक्ष्मदृष्ट्या स दुर्गाणि गहनानि वनानि च

tato'raṇyaṁ samāsādya vīkṣāṁcakre samaṁtataḥ sūkṣmadṛṣṭyā sa durgāṇi gahanāni vanāni ca

फिर वन में पहुँचकर उसने चारों ओर सूक्ष्म दृष्टि से दुर्गम और घने वनों को देखना शुरू किया।

श्लोक 10 (skanda.6.14.10)

अथ तेन क्वचिद्दृष्टं पदं तस्य पशोः स्फुटम् । अटव्यां भ्रममाणेन परिज्ञातं च कृत्स्नशः

atha tena kvaciddṛṣṭaṁ padaṁ tasya paśoḥ sphuṭam aṭavyāṁ bhramamāṇena parijñātaṁ ca kṛtsnaśaḥ

तब वन में भटकते हुए उसने कहीं उस पशु के स्पष्ट पदचिह्न देखे, और उन्हें पूर्ण रूप से पहचान लिया।

श्लोक 11 (skanda.6.14.11)

ततश्च तत्पदान्वेषी स जगाम वनाद्वनम् । चमत्कारपुरस्यास्य समंताद्द्विजसत्त माः

tataśca tatpadānveṣī sa jagāma vanādvanam camatkārapurasyāsya samaṁtāddvijasatta māḥ

हे श्रेष्ठ द्विजो! उन पदचिह्नों को खोजते हुए वह चमत्कारपुर के चारों ओर वन-वन में घूमता रहा।

श्लोक 12 (skanda.6.14.12)

एवं प्रदक्षिणा तस्य जाता पशुदिदृक्षया । स्थानस्य चैव निर्वेशे पशोश्चापिद्विजोत्तमाः

evaṁ pradakṣiṇā tasya jātā paśudidṛkṣayā sthānasya caiva nirveśe paśoścāpidvijottamāḥ

हे श्रेष्ठ द्विजो! इस प्रकार पशु को देखने की इच्छा से उस स्थान की परिक्रमा हो गई, और पशु का भी पता चल गया।

श्लोक 13 (skanda.6.14.13)

प्रदक्षिणावसाने च पशुर्लब्धो हि तेन सः । निशांतेऽथ गृहं नीत्वा स्वामिने विनिवेदितः

pradakṣiṇāvasāne ca paśurlabdho hi tena saḥ niśāṁte'tha gṛhaṁ nītvā svāmine viniveditaḥ

उसकी परिक्रमा के अंत में उसे वह पशु मिल गया। रात्रि के अंत में उसे घर ले जाकर उसने स्वामी को सौंप दिया।

श्लोक 14 (skanda.6.14.14)

चैत्रे पुण्यतमे मासि कृष्णपक्षे चतुर्दशीम् । क्षेत्रे पुण्यतमे देवास्तीर्थान्या यांति सर्वशः

caitre puṇyatame māsi kṛṣṇapakṣe caturdaśīm kṣetre puṇyatame devāstīrthānyā yāṁti sarvaśaḥ

चैत्र के परम पुण्यमय मास में, कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को, उस परम पुण्यमय क्षेत्र में देवता सब ओर से तीर्थों में आते हैं।

श्लोक 15 (skanda.6.14.15)

एवमज्ञानभावेन कृता ताभ्यां प्रदक्षिणा । पशुपालपशुभ्यां वै सुपुण्ये तत्र वासरे

evamajñānabhāvena kṛtā tābhyāṁ pradakṣiṇā paśupālapaśubhyāṁ vai supuṇye tatra vāsare

इस प्रकार अनजाने में ही उस गोपालक और उस पशु दोनों के द्वारा उस अत्यंत पुण्यमय दिन में परिक्रमा हो गई।

श्लोक 16 (skanda.6.14.16)

निराहारस्य मूकस्य साहारस्य पशोस्तथा

nirāhārasya mūkasya sāhārasya paśostathā

गूँगा भूखा ही रहा था, जबकि पशु ने मार्ग में घास खाकर आहार भी ग्रहण किया।

श्लोक 17 (skanda.6.14.17)

विना स्नानेन भक्षाच्च दैवाद्द्विजवरोत्तमाः । ततः काले व्यतिक्रांते कियन्मात्रे स्वकर्मतः । उभौ पंचत्वमापन्नौ पृथक्त्वेनायुषः क्षये

vinā snānena bhakṣācca daivāddvijavarottamāḥ tataḥ kāle vyatikrāṁte kiyanmātre svakarmataḥ ubhau paṁcatvamāpannau pṛthaktvenāyuṣaḥ kṣaye

हे द्विजवरों में श्रेष्ठ! दैवयोग से बिना स्नान और बिना भोजन के ही यह परिक्रमा हो गई। फिर कुछ ही काल बीतने पर, अपने-अपने कर्मों के अनुसार, आयु के क्षीण होने पर दोनों अलग-अलग मृत्यु को प्राप्त हुए।

श्लोक 18 (skanda.6.14.18)

ततश्च पशुपालस्तु दशार्णाधिपतेः सुतः । संजातस्तत्प्रभावेन पूर्वजातिमनुस्मरन्

tataśca paśupālastu daśārṇādhipateḥ sutaḥ saṁjātastatprabhāvena pūrvajātimanusmaran

तब वह गोपालक उस परिक्रमा के प्रभाव से दशार्ण देश के राजा का पुत्र बनकर जन्मा, और अपने पूर्वजन्म को स्मरण करता था।

श्लोक 19 (skanda.6.14.19)

सोऽपि जज्ञे पशुस्तस्य सचिवो द्विजसत्तमाः । जातिस्मरो यथा राजा सर्वदा नृपसंमतः

so'pi jajñe paśustasya sacivo dvijasattamāḥ jātismaro yathā rājā sarvadā nṛpasaṁmataḥ

हे श्रेष्ठ द्विजो! वह पशु भी उसका मंत्री बनकर जन्मा, और पूर्वजन्म को स्मरण रखते हुए, राजा के समान सदा सम्मानित रहता था।

श्लोक 20 (skanda.6.14.20)

अथागत्य स राजेंद्रस्तेनैव सह मंत्रिणा । कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां पुरस्तस्याः प्रदक्षिणाम्

athāgatya sa rājeṁdrastenaiva saha maṁtriṇā kṛṣṇapakṣe caturdaśyāṁ purastasyāḥ pradakṣiṇām

तब वह श्रेष्ठ राजा उसी मंत्री के साथ वहाँ आकर, कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को उस नगर की परिक्रमा —

श्लोक 21 (skanda.6.14.21)

चक्रे संवत्सरस्यांते श्रद्धया परया युतः । निराहारश्च मौनेन पदातिर्द्विजसत्तमाः

cakre saṁvatsarasyāṁte śraddhayā parayā yutaḥ nirāhāraśca maunena padātirdvijasattamāḥ

हे श्रेष्ठ द्विजो! — हर वर्ष के अंत में, अत्यंत श्रद्धा से युक्त होकर, बिना भोजन किए, मौन रहकर, पैदल ही किया करता था।

श्लोक 22 (skanda.6.14.22)

एकदा तत्र चाऽऽयाता मुनयः शंसितव्रताः । तीर्थे पापहरे पुण्ये विश्वामित्रसमुद्भवे

ekadā tatra cā''yātā munayaḥ śaṁsitavratāḥ tīrthe pāpahare puṇye viśvāmitrasamudbhave

एक बार वहाँ दृढ़-व्रत वाले मुनि आए, उस पापहर, पुण्यमय तीर्थ में, जो विश्वामित्र से संबंधित था।

श्लोक 23 (skanda.6.14.23)

याज्ञवल्क्यो भरद्वाजः शुनःशेपोऽथ गालवः । देवलो भागुरिर्धौम्यः कश्य पश्च्यवनो भृगुः

yājñavalkyo bharadvājaḥ śunaḥśepo'tha gālavaḥ devalo bhāgurirdhaumyaḥ kaśya paścyavano bhṛguḥ

याज्ञवल्क्य, भरद्वाज, शुनःशेप, गालव, देवल, भागुरि, धौम्य, कश्यप, च्यवन और भृगु —

श्लोक 24 (skanda.6.14.24)

तथान्ये शंसिताऽऽत्मानो ब्रह्मचर्यपरायणाः । तीर्थयात्राप्रसंगेन तस्मिन्क्षेत्रे समागताः

tathānye śaṁsitā''tmāno brahmacaryaparāyaṇāḥ tīrthayātrāprasaṁgena tasminkṣetre samāgatāḥ

— तथा अन्य भी शुद्धात्मा, ब्रह्मचर्य में निष्ठ मुनि, तीर्थयात्रा के प्रसंग से उस क्षेत्र में एकत्र हुए।

श्लोक 25 (skanda.6.14.25)

तान्दृष्ट्वा स महीपालः प्रणिपत्य कृतांजलिः । यथाज्येष्ठं यथाश्रेष्ठं पूजयामास भक्तितः

tāndṛṣṭvā sa mahīpālaḥ praṇipatya kṛtāṁjaliḥ yathājyeṣṭhaṁ yathāśreṣṭhaṁ pūjayāmāsa bhaktitaḥ

उन्हें देखकर उस राजा ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया, और ज्येष्ठता तथा श्रेष्ठता के क्रम से भक्तिपूर्वक उनकी पूजा की।

श्लोक 26 (skanda.6.14.26)

ततस्तेषां स मध्ये च संनिविष्टो महीपतिः । तथागतः स भूपालः सर्वै स्तैश्चाभिनंदितः

tatasteṣāṁ sa madhye ca saṁniviṣṭo mahīpatiḥ tathāgataḥ sa bhūpālaḥ sarvai staiścābhinaṁditaḥ

तब वह राजा उनके बीच में बैठ गया, और वहाँ आया हुआ वह राजा उन सबके द्वारा सम्मानित हुआ।

श्लोक 27 (skanda.6.14.27)

ततश्चक्रुः कथा दिव्या मुनयस्ते महीपतेः । पुरतो मुनिमुख्यानां चरितानि महात्मनाम्

tataścakruḥ kathā divyā munayaste mahīpateḥ purato munimukhyānāṁ caritāni mahātmanām

तब उन मुनियों ने राजा के समक्ष महान मुनियों के दिव्य चरितों की कथाएँ सुनाईं।

श्लोक 28 (skanda.6.14.28)

राजर्षीणां पुराणानां धर्मशास्त्रसमुद्भवाः । आनंदं तस्य राजर्षेर्जनयंतो द्विजोत्तमाः

rājarṣīṇāṁ purāṇānāṁ dharmaśāstrasamudbhavāḥ ānaṁdaṁ tasya rājarṣerjanayaṁto dvijottamāḥ

हे श्रेष्ठ द्विजो! प्राचीन राजर्षियों की तथा धर्मशास्त्रों से उत्पन्न कथाएँ सुनाकर, उन्होंने उस राजर्षि को आनंदित किया।

श्लोक 29 (skanda.6.14.29)

अथ क्वाऽपि कथांते स पार्थिवस्तैर्महर्षिभिः । पृष्टः कौतूहलाविष्टैर्दत्त्वा श्रौतीस्तदाशिषः

atha kvā'pi kathāṁte sa pārthivastairmaharṣibhiḥ pṛṣṭaḥ kautūhalāviṣṭairdattvā śrautīstadāśiṣaḥ

फिर किसी एक कथा के अंत में, कुतूहल से भरे उन महर्षियों ने वैदिक आशीर्वाद देते हुए उस राजा से प्रश्न किया।

श्लोक 30 (skanda.6.14.30)

ऋषय ऊचुः । वर्षेवर्षे महीपाल त्वमत्राऽऽगत्य यत्नतः । करोषि मंत्रिणा सार्धं पुरस्याऽस्य प्रदक्षिणाम्

ṛṣaya ūcuḥ varṣevarṣe mahīpāla tvamatrā''gatya yatnataḥ karoṣi maṁtriṇā sārdhaṁ purasyā'sya pradakṣiṇām

ऋषियों ने कहा — हे राजन्! तुम प्रतिवर्ष यहाँ आकर, अपने मंत्री के साथ, प्रयत्नपूर्वक इस नगर की परिक्रमा करते हो।

श्लोक 31 (skanda.6.14.31)

अस्मिन्क्षेत्रे सुतीर्थानि संति पार्थिवसत्तम । तथाऽन्यानि प्रसिद्धानि देवतायतनानि च

asminkṣetre sutīrthāni saṁti pārthivasattama tathā'nyāni prasiddhāni devatāyatanāni ca

हे राजश्रेष्ठ! इस क्षेत्र में अनेक उत्तम तीर्थ हैं, तथा अन्य भी प्रसिद्ध देवालय हैं।

श्लोक 32 (skanda.6.14.32)

आदरस्तेषु वै राजन्नास्ति स्वल्पो ऽपि कर्हिचित् । एतन्नः कौतुकं जातं न चेद्गुह्यं प्रकीर्तय

ādarasteṣu vai rājannāsti svalpo 'pi karhicit etannaḥ kautukaṁ jātaṁ na cedguhyaṁ prakīrtaya

हे राजन्! उनके प्रति तो तुम्हारा कभी भी थोड़ा भी आदर नहीं दिखता। हमें इस विषय में कुतूहल हुआ है — यदि यह कोई गुप्त बात नहीं है, तो हमें बताओ।

श्लोक 33 (skanda.6.14.33)

सूत उवाच । तेषां तद्वचनं श्रुत्वा विनयाऽवनतः स्थितः । स प्रोवाच वचो भूपः किंचिद्व्रीडासमन्वितः

sūta uvāca teṣāṁ tadvacanaṁ śrutvā vinayā'vanataḥ sthitaḥ sa provāca vaco bhūpaḥ kiṁcidvrīḍāsamanvitaḥ

सूत जी ने कहा — उनके वचन सुनकर विनम्रतापूर्वक झुककर खड़े उस राजा ने कुछ लज्जा से युक्त होकर यह वचन कहा।

श्लोक 34 (skanda.6.14.34)

यत्पृष्टोऽस्मि द्विजश्रेष्ठा युष्माभिः सांप्रतं मम । तद्गुह्यं न मयाऽऽख्यातं कस्यचिद्धरणीतले

yatpṛṣṭo'smi dvijaśreṣṭhā yuṣmābhiḥ sāṁprataṁ mama tadguhyaṁ na mayā''khyātaṁ kasyaciddharaṇītale

"हे श्रेष्ठ द्विजो! आपने अभी मुझसे जो प्रश्न पूछा है, वह मेरा गुप्त रहस्य है, जिसे मैंने पृथ्वी पर किसी को भी नहीं बताया।"

श्लोक 35 (skanda.6.14.35)

तथाऽपि हि प्रकर्तव्यं युष्माकं सत्यमेव हि । अपि गुह्यतमं चेत्स्याच्छृण्वंतु मुनिसत्तमाः

tathā'pi hi prakartavyaṁ yuṣmākaṁ satyameva hi api guhyatamaṁ cetsyācchṛṇvaṁtu munisattamāḥ

"फिर भी, आपको सत्य ही बताना उचित है, चाहे वह अत्यंत गोपनीय ही क्यों न हो। हे श्रेष्ठ मुनियो! सुनिए।"

श्लोक 36 (skanda.6.14.36)

सूत उवाच । ततः स कथयामास पूर्वजातिसमुद्भवम् । वृत्तांतं तन्मुनींद्राणां तेषां ब्राह्मणसत्तमाः

sūta uvāca tataḥ sa kathayāmāsa pūrvajātisamudbhavam vṛttāṁtaṁ tanmunīṁdrāṇāṁ teṣāṁ brāhmaṇasattamāḥ

सूत जी ने कहा — हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! तब उसने उन श्रेष्ठ मुनियों को अपने पूर्वजन्म से जुड़ा वह संपूर्ण वृत्तांत सुनाया।

श्लोक 37 (skanda.6.14.37)

यथा नष्टः पशुस्तस्य कृता यद्वदवेक्षणा । यथा प्रदक्षिणा जाता चमत्कारपुरस्य तु

yathā naṣṭaḥ paśustasya kṛtā yadvadavekṣaṇā yathā pradakṣiṇā jātā camatkārapurasya tu

जैसे उसका पशु खो गया था, जैसे उसकी खोज की गई थी, और जैसे चमत्कारपुर की वह परिक्रमा हुई थी —

श्लोक 38 (skanda.6.14.38)

जातिस्मृतिर्यथा जाता प्राक्तनी तत्प्रभावतः । राज्यप्राप्तिर्विभूतिश्च तथेष्टाप्तिः पदेपदे

jātismṛtiryathā jātā prāktanī tatprabhāvataḥ rājyaprāptirvibhūtiśca tatheṣṭāptiḥ padepade

— जैसे उसके प्रभाव से पूर्वजन्म का स्मरण हुआ, तथा राज्य की प्राप्ति, ऐश्वर्य, और हर कदम पर इच्छित वस्तुओं की प्राप्ति हुई।

श्लोक 39 (skanda.6.14.39)

तच्छ्रुत्वा मुनयः सर्वे प्रहृष्टाः पृथिवीपतेः । आशीर्वादान्बहून्दत्त्वा साधुसाध्विति चाऽब्रुवन्

tacchrutvā munayaḥ sarve prahṛṣṭāḥ pṛthivīpateḥ āśīrvādānbahūndattvā sādhusādhviti cā'bruvan

यह सुनकर वे सब मुनि उस राजा से अत्यंत प्रसन्न हुए, और अनेक आशीर्वाद देकर "साधु साधु" कहने लगे।

श्लोक 40 (skanda.6.14.40)

समुत्थाय ततश्चक्रुः पुरस्तस्याः प्रदक्षिणाम् । यथोक्तविधिना सर्वे श्रद्धया परया युताः

samutthāya tataścakruḥ purastasyāḥ pradakṣiṇām yathoktavidhinā sarve śraddhayā parayā yutāḥ

फिर उठकर वे सब, अत्यंत श्रद्धा से युक्त होकर, विधिपूर्वक उस नगर की परिक्रमा करने लगे।

श्लोक 41 (skanda.6.14.41)

गताश्च परमां सिद्धिं तत्प्रभावात्सुदुर्लभाम् । जपयज्ञप्रदानैर्या तीर्थसेवादिकैरपि

gatāśca paramāṁ siddhiṁ tatprabhāvātsudurlabhām japayajñapradānairyā tīrthasevādikairapi

और वे उसके प्रभाव से उस परम दुर्लभ सिद्धि को प्राप्त हुए, जो जप, यज्ञ, दान और तीर्थसेवा आदि से भी कठिनाई से मिलती है।

श्लोक 42 (skanda.6.14.42)

सोऽपि राजा स मन्त्री च जातौ वैमानिकौ सुरौ । अद्याऽपि तौ हि दृश्येते तारारूपौ नभस्तले

so'pi rājā sa mantrī ca jātau vaimānikau surau adyā'pi tau hi dṛśyete tārārūpau nabhastale

वह राजा और वह मंत्री दोनों विमान में विचरण करने वाले देवता बन गए। आज भी वे दोनों आकाश में तारों के रूप में दिखाई देते हैं।

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