नागर खण्ड · अध्याय 13
अचलेश्वर की महिमा
श्लोक 1 (skanda.6.13.1)
सूत उवाच । एवं निवेद्य पुत्राणां स राज्यं पृथिवीपतिः । पुरं च तद्द्विजातिभ्यः प्रदाय स्वयमेव हि
sūta uvāca evaṁ nivedya putrāṇāṁ sa rājyaṁ pṛthivīpatiḥ puraṁ ca taddvijātibhyaḥ pradāya svayameva hi
सूत जी ने कहा — इस प्रकार उस राजा ने पुत्रों को राज्य सौंपकर, तथा उस नगर को स्वयं द्विजों को अर्पित करके —
श्लोक 2 (skanda.6.13.2)
तत आराधयामास देवदेवं महेश्वरम् । कृत्वा तदाऽऽश्रमं तत्र श्रद्धया परया युतः
tata ārādhayāmāsa devadevaṁ maheśvaram kṛtvā tadā''śramaṁ tatra śraddhayā parayā yutaḥ
वहाँ आश्रम बनाकर, अत्यंत श्रद्धा से युक्त होकर, देवाधिदेव महेश्वर की आराधना करने लगा।
श्लोक 3 (skanda.6.13.3)
स बभूव फलाहारो यावद्वर्षशतं नृपः । शीर्णपर्णाशनः पश्चात्तावत्कालं समाहितः
sa babhūva phalāhāro yāvadvarṣaśataṁ nṛpaḥ śīrṇaparṇāśanaḥ paścāttāvatkālaṁ samāhitaḥ
वह राजा सौ वर्षों तक केवल फल खाकर रहा, फिर उतने ही समय तक एकाग्रचित्त होकर सूखे पत्तों को खाता रहा।
श्लोक 4 (skanda.6.13.4)
ततः परं जलाहारो जातो वर्षशतं हि सः । वायुभक्षस्ततोऽभूत्स यावद्वर्षशतं परम्
tataḥ paraṁ jalāhāro jāto varṣaśataṁ hi saḥ vāyubhakṣastato'bhūtsa yāvadvarṣaśataṁ param
उसके बाद वह सौ वर्षों तक केवल जल पीकर रहा, और फिर उसके भी बाद एक सौ वर्षों तक केवल वायु पीकर रहा।
श्लोक 5 (skanda.6.13.5)
ततस्तुष्टो महादेवस्तस्य वर्षशते गते । चतुर्थे वायुभक्षस्य दर्शने समुपस्थितः
tatastuṣṭo mahādevastasya varṣaśate gate caturthe vāyubhakṣasya darśane samupasthitaḥ
तब चौथे सौ वर्ष बीत जाने पर, उस वायु-भक्षी राजा से प्रसन्न होकर महादेव उसे दर्शन देने आए।
श्लोक 6 (skanda.6.13.6)
प्रोवाच परितुष्टोऽस्मि मत्तः प्रार्थय वांछितम् । अहं ते संप्रदास्यामि दुर्लभं त्रिदशैरपि
provāca parituṣṭo'smi mattaḥ prārthaya vāṁchitam ahaṁ te saṁpradāsyāmi durlabhaṁ tridaśairapi
उन्होंने कहा — मैं तुझसे अत्यंत संतुष्ट हूँ, मुझसे अपनी वांछित वस्तु माँग; मैं तुझे वह भी दूँगा जो देवताओं को भी दुर्लभ है।
श्लोक 7 (skanda.6.13.7)
राजोवाच । एतत्पुण्यतमं क्षेत्रं नानातीर्थसमाश्रयम् । हाटकेश्वरमाहात्म्यात्सर्वपापक्षयापहम्
rājovāca etatpuṇyatamaṁ kṣetraṁ nānātīrthasamāśrayam hāṭakeśvaramāhātmyātsarvapāpakṣayāpaham
राजा ने कहा — यह परम पुण्यमय क्षेत्र, जो अनेक तीर्थों का आश्रय है, हाटकेश्वर की महिमा से समस्त पापों का नाश करने वाला है।
श्लोक 8 (skanda.6.13.8)
तस्मात्तव निवासेन भूयान्मेध्यतमं पुनः । एतन्मे वांछितं देव देहि तुष्टिं गतो यदि
tasmāttava nivāsena bhūyānmedhyatamaṁ punaḥ etanme vāṁchitaṁ deva dehi tuṣṭiṁ gato yadi
अतः आपके निवास से यह और भी अधिक पवित्र हो जाए — हे देव, यदि आप प्रसन्न हैं तो मेरी यही अभिलाषा पूर्ण कीजिए।
श्लोक 9 (skanda.6.13.9)
मयैतदग्र्यं निर्माय ब्राह्मणेभ्यो निवेदितम् । पुरं शर्वाऽमराधीश श्रद्धापूतेन चेतसा
mayaitadagryaṁ nirmāya brāhmaṇebhyo niveditam puraṁ śarvā'marādhīśa śraddhāpūtena cetasā
हे शर्व, हे देवाधीश! मैंने श्रद्धा से पवित्र हृदय से इस श्रेष्ठ नगर का निर्माण करके ब्राह्मणों को अर्पित किया है।
श्लोक 10 (skanda.6.13.10)
तस्मिंस्त्वया सदा वासः कर्तव्यो मम वाक्यतः । निश्चलत्वेन येन स्याद्गणैः सर्वैः समन्वितम्
tasmiṁstvayā sadā vāsaḥ kartavyo mama vākyataḥ niścalatvena yena syādgaṇaiḥ sarvaiḥ samanvitam
मेरे कहने से आप सदा वहीं निवास करें, इस प्रकार अचल रहते हुए, समस्त गणों के साथ।
श्लोक 11 (skanda.6.13.11)
भगवानुवाच । अचलोऽहं भविष्यामि स्थानेऽत्र तव भूमिप । अचलेश्वर इत्येव नाम्ना ख्यातो जगत्त्रये
bhagavānuvāca acalo'haṁ bhaviṣyāmi sthāne'tra tava bhūmipa acaleśvara ityeva nāmnā khyāto jagattraye
भगवान ने कहा — हे राजन्! मैं इस स्थान पर अचल होकर रहूँगा, और तीनों लोकों में अचलेश्वर नाम से विख्यात होऊँगा।
श्लोक 12 (skanda.6.13.12)
यो मामत्र स्थितं मर्त्यो वीक्षयिष्यति भक्तितः । भविष्यंत्यचलास्तस्य सर्वदैव विभूतयः
yo māmatra sthitaṁ martyo vīkṣayiṣyati bhaktitaḥ bhaviṣyaṁtyacalāstasya sarvadaiva vibhūtayaḥ
जो भी नश्वर मनुष्य भक्तिपूर्वक मुझे यहाँ स्थित देखेगा, उसकी संपत्तियाँ सदा अचल रहेंगी।
श्लोक 13 (skanda.6.13.13)
माघशुक्लचतुर्दश्यां मम लिंगस्य यो नरः । श्रद्धया परया युक्तः कर्ता यो घृतकंबलम्
māghaśuklacaturdaśyāṁ mama liṁgasya yo naraḥ śraddhayā parayā yuktaḥ kartā yo ghṛtakaṁbalam
जो मनुष्य माघ शुक्ल चतुर्दशी को अत्यंत श्रद्धा से युक्त होकर मेरे लिंग पर घृत और कंबल का अर्पण करेगा —
श्लोक 14 (skanda.6.13.14)
बाल्ये वयसि यत्पापं वार्धके यौवनेऽपि वा । तद्यास्यति क्षयं तस्य तमः सूर्योदये यथा
bālye vayasi yatpāpaṁ vārdhake yauvane'pi vā tadyāsyati kṣayaṁ tasya tamaḥ sūryodaye yathā
— उसका बचपन, यौवन अथवा वृद्धावस्था में किया हुआ पाप वैसे ही नष्ट हो जाएगा, जैसे सूर्योदय होने पर अंधकार नष्ट हो जाता है।
श्लोक 15 (skanda.6.13.15)
तस्मात्स्थापय मे लिंगं त्वमत्रैव महीपते । अहं येन करोम्येव तत्र वासं सदाचलः
tasmātsthāpaya me liṁgaṁ tvamatraiva mahīpate ahaṁ yena karomyeva tatra vāsaṁ sadācalaḥ
अतः हे राजन्! तुम यहीं मेरा लिंग स्थापित करो, जिससे मैं वहाँ सदा अचल होकर निवास कर सकूँ।
श्लोक 16 (skanda.6.13.16)
सूत उवाच । एवमुक्त्वा स देवेशस्ततश्चादर्शनं गतः । सोऽपि राजा चकाराशु प्रासादं सुमनोहरम्
sūta uvāca evamuktvā sa deveśastataścādarśanaṁ gataḥ so'pi rājā cakārāśu prāsādaṁ sumanoharam
सूत जी ने कहा — यह कहकर वह देवेश अंतर्धान हो गए। उस राजा ने भी शीघ्र ही एक अत्यंत मनोहर मंदिर बनवाया।
श्लोक 17 (skanda.6.13.17)
तत्र संस्थापयामास लिंगं देवस्य शूलिनः । श्रद्धया परया युक्तः सर्वलक्षणलक्षितम्
tatra saṁsthāpayāmāsa liṁgaṁ devasya śūlinaḥ śraddhayā parayā yuktaḥ sarvalakṣaṇalakṣitam
वहाँ अत्यंत श्रद्धा से युक्त होकर उसने त्रिशूलधारी देव के उस लिंग की स्थापना की, जो सब शुभ लक्षणों से युक्त था।
श्लोक 18 (skanda.6.13.18)
यस्मिन्दृष्टेऽथवा स्पृष्टे ध्याते वा पूजितेऽपि वा । नरो विमुच्यते पापादाजन्ममरणांतिकात्
yasmindṛṣṭe'thavā spṛṣṭe dhyāte vā pūjite'pi vā naro vimucyate pāpādājanmamaraṇāṁtikāt
जिसे देखने, छूने, ध्यान करने अथवा पूजने मात्र से मनुष्य जन्म से लेकर मृत्यु तक के समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 19 (skanda.6.13.19)
ततः संचिंतयामास भूपालः किं महेश्वरः । सांनिध्यं निश्चलो भूत्वा लिंगेऽत्रैव करिष्यति
tataḥ saṁciṁtayāmāsa bhūpālaḥ kiṁ maheśvaraḥ sāṁnidhyaṁ niścalo bhūtvā liṁge'traiva kariṣyati
तब उस राजा ने मन में विचार किया कि क्या महेश्वर सचमुच अचल होकर इसी लिंग में अपनी सांनिध्यता स्थापित करेंगे।
श्लोक 20 (skanda.6.13.20)
एतस्मिन्नंतरे जाता वाणी गगनगोचरा । हर्षयन्ती महीपालं चमत्कारं सुनिस्वना
etasminnaṁtare jātā vāṇī gaganagocarā harṣayantī mahīpālaṁ camatkāraṁ sunisvanā
इसी बीच आकाशवाणी हुई, जो मधुर स्वर से राजा चमत्कार को हर्षित करने लगी।
श्लोक 21 (skanda.6.13.21)
मा त्वं भूमिपशार्दूल कार्यचिन्तां करिष्यसि । अस्मिन्वासं सदात्रैव लिंगे कर्तास्मि नित्यशः
mā tvaṁ bhūmipaśārdūla kāryacintāṁ kariṣyasi asminvāsaṁ sadātraiva liṁge kartāsmi nityaśaḥ
"हे राजाओं में सिंह! तुम इस विषय में चिंता मत करो। मैं सदा और नित्य ही इस लिंग में निवास करूँगा।"
श्लोक 22 (skanda.6.13.22)
तथान्यदपि ते वच्मि प्रत्ययार्थं वचो नृप । तच्छ्रुत्वा निर्वृतिं गच्छ वीक्षस्वैव च यत्नतः
tathānyadapi te vacmi pratyayārthaṁ vaco nṛpa tacchrutvā nirvṛtiṁ gaccha vīkṣasvaiva ca yatnataḥ
"हे राजन्! विश्वास दिलाने के लिए मैं तुम्हें एक और बात कहता हूँ। इसे सुनकर तुम शांत हो जाओ, और स्वयं ध्यानपूर्वक देखते रहो।"
श्लोक 23 (skanda.6.13.23)
सदा मे निश्चला छाया लिंगस्यास्य भविष्यति । एकैव पृष्ठदेशस्था न दिक्संस्था भविष्यति
sadā me niścalā chāyā liṁgasyāsya bhaviṣyati ekaiva pṛṣṭhadeśasthā na diksaṁsthā bhaviṣyati
"इस लिंग की छाया सदा अचल रहेगी — वह सदा एक ही पृष्ठ दिशा में स्थिर रहेगी, वह सूर्य की दिशा के अनुसार नहीं बदलेगी।"
श्लोक 24 (skanda.6.13.24)
सूत उवाच । ततः स वीक्षयामास तां छायां लिंगसंभवाम् । तद्रूपां निश्चलां नित्यं तद्दिक्संस्थे दिवाकरे
sūta uvāca tataḥ sa vīkṣayāmāsa tāṁ chāyāṁ liṁgasaṁbhavām tadrūpāṁ niścalāṁ nityaṁ taddiksaṁsthe divākare
सूत जी ने कहा — तब उस राजा ने उस लिंग से उत्पन्न होने वाली छाया को देखा, जो सूर्य के उस दिशा में रहते हुए भी सदा उसी रूप में अचल बनी रहती थी।
श्लोक 25 (skanda.6.13.25)
ततो हर्षं परं गत्वा प्रणिपत्य च तं भुवि । कृतकृत्यमिवात्मानं स मेने पार्थिवोत्तमः
tato harṣaṁ paraṁ gatvā praṇipatya ca taṁ bhuvi kṛtakṛtyamivātmānaṁ sa mene pārthivottamaḥ
तब अत्यंत हर्ष को प्राप्त होकर, भूमि पर प्रणाम करके, वह श्रेष्ठ राजा अपने को मानो कृतकृत्य मानने लगा।
श्लोक 26 (skanda.6.13.26)
अद्यापि दृश्यते छाया तादृग्रूपा सदा हि सा । तस्य लिंगस्य विप्रेन्द्रा जाता विस्मयकारिणी
adyāpi dṛśyate chāyā tādṛgrūpā sadā hi sā tasya liṁgasya viprendrā jātā vismayakāriṇī
हे श्रेष्ठ विप्रो! आज भी उस लिंग की वह अद्भुत छाया उसी रूप में सदा दिखाई देती है, जो सबको आश्चर्यचकित कर देती है।
श्लोक 27 (skanda.6.13.27)
षण्मासाभ्यंतरे मृत्युर्यस्य स्याद्भुवि भो द्विजाः । न स पश्यति तां छायामेषोऽन्यः प्रत्ययः परः
ṣaṇmāsābhyaṁtare mṛtyuryasya syādbhuvi bho dvijāḥ na sa paśyati tāṁ chāyāmeṣo'nyaḥ pratyayaḥ paraḥ
हे द्विजो! जिस व्यक्ति की मृत्यु छह महीनों के भीतर होने वाली हो, वह उस छाया को नहीं देख पाता — यह भी इसका एक और अद्भुत प्रमाण है।
श्लोक 28 (skanda.6.13.28)
सूत उवाच । एवं स भगवांस्तत्र सर्वदैव व्यवस्थितः । अचलेश्वररूपेण चमत्कारपुरांतिके
sūta uvāca evaṁ sa bhagavāṁstatra sarvadaiva vyavasthitaḥ acaleśvararūpeṇa camatkārapurāṁtike
सूत जी ने कहा — इस प्रकार वह भगवान अचलेश्वर के रूप में चमत्कारपुर के निकट सदा वहीं स्थित रहते हैं।
श्लोक 29 (skanda.6.13.29)
निश्चलत्वेन देवेशोह्यष्टषष्टिषु मध्यमः । क्षेत्राणां वसते तत्र तस्य वाक्यान्महेश्वरः
niścalatvena deveśohyaṣṭaṣaṣṭiṣu madhyamaḥ kṣetrāṇāṁ vasate tatra tasya vākyānmaheśvaraḥ
उस राजा के वचन से महेश्वर वहाँ अड़सठ क्षेत्रों में सबसे मध्यम स्थान पर अचल रूप से देवताओं के स्वामी होकर निवास करते हैं।
श्लोक 30 (skanda.6.13.30)
तेन तत्पावनं क्षेत्रं सर्वेषामिह कीर्तितम् । कामदं मुक्तिदं चैव जायते सर्वदेहिनाम्
tena tatpāvanaṁ kṣetraṁ sarveṣāmiha kīrtitam kāmadaṁ muktidaṁ caiva jāyate sarvadehinām
इसी कारण वह पवित्र क्षेत्र यहाँ सबके लिए विख्यात हुआ है, जो समस्त प्राणियों के लिए कामनाओं की पूर्ति और मुक्ति दोनों देने वाला है।
श्लोक 31 (skanda.6.13.31)
तथान्यदपि यद्वृत्तं वृत्तांतं तत्प्रभावजम् । तदहं संप्रवक्ष्यामि श्रूयतां द्विजसत्तमाः
tathānyadapi yadvṛttaṁ vṛttāṁtaṁ tatprabhāvajam tadahaṁ saṁpravakṣyāmi śrūyatāṁ dvijasattamāḥ
हे श्रेष्ठ द्विजो! अब मैं उस स्थान के प्रभाव से घटित एक और वृत्तांत सुनाता हूँ, सुनिए।
श्लोक 32 (skanda.6.13.32)
अचलेश्वरमाहात्म्यात्तस्मिन्क्षेत्रे नरा द्रुतम् । वांछितं मनसः सर्वे लभंते सकलं फलम्
acaleśvaramāhātmyāttasminkṣetre narā drutam vāṁchitaṁ manasaḥ sarve labhaṁte sakalaṁ phalam
अचलेश्वर की महिमा से उस क्षेत्र में सब मनुष्य शीघ्र ही अपने मन की इच्छित सारी फलों को प्राप्त कर लेते हैं।
श्लोक 33 (skanda.6.13.33)
स्वर्गमेके परे मोक्षं धनधान्यसुतांस्तथा । यो यं काममभिध्याय पूजयेदचलेश्वरम् । तंतं स लभते मर्त्यः स्वल्पायासेन च द्रुतम्
svargameke pare mokṣaṁ dhanadhānyasutāṁstathā yo yaṁ kāmamabhidhyāya pūjayedacaleśvaram taṁtaṁ sa labhate martyaḥ svalpāyāsena ca drutam
कोई स्वर्ग चाहता है, कोई मोक्ष, तथा कोई धन-धान्य और संतान। जो भी मनुष्य जिस कामना का ध्यान करते हुए अचलेश्वर की पूजा करता है, वह उसी फल को अल्प परिश्रम से और शीघ्र ही प्राप्त कर लेता है।
श्लोक 34 (skanda.6.13.34)
अथ दृष्ट्वा सहस्राक्षः सर्वे पापनरा भुवि । स्वर्गं यांति तथा मोक्षं प्राप्नुवन्ति च सम्मुखम्
atha dṛṣṭvā sahasrākṣaḥ sarve pāpanarā bhuvi svargaṁ yāṁti tathā mokṣaṁ prāpnuvanti ca sammukham
तब सहस्राक्ष (इंद्र) ने देखा कि पृथ्वी पर सभी पापी मनुष्य भी स्वर्ग को जा रहे हैं और साक्षात् मोक्ष को प्राप्त कर रहे हैं।
श्लोक 35 (skanda.6.13.35)
ततः क्रोधं च कामं च लोभं द्वेषं भयं रतिम् । मोहं च व्यसनं दुर्गं मत्सरं रागमेव च
tataḥ krodhaṁ ca kāmaṁ ca lobhaṁ dveṣaṁ bhayaṁ ratim mohaṁ ca vyasanaṁ durgaṁ matsaraṁ rāgameva ca
तब उसने क्रोध, काम, लोभ, द्वेष, भय, रति, मोह, व्यसन, संकट, ईर्ष्या और राग को —
श्लोक 36 (skanda.6.13.36)
सर्वान्मूर्तान्समाहूय ततः प्रोवाच सादरम् । स्वयमेव सहस्राक्षो रहस्ये द्विजसत्तमाः
sarvānmūrtānsamāhūya tataḥ provāca sādaram svayameva sahasrākṣo rahasye dvijasattamāḥ
— इन सबको मूर्तिमान रूप में बुलाकर, हे श्रेष्ठ द्विजो! सहस्राक्ष ने स्वयं ही एकांत में उनसे आदरपूर्वक कहा।
श्लोक 37 (skanda.6.13.37)
नरो वा यदि वा नारी चमत्कारपुरं प्रति । यो गच्छति धरापृष्ठे युष्माभिर्वार्य एव सः
naro vā yadi vā nārī camatkārapuraṁ prati yo gacchati dharāpṛṣṭhe yuṣmābhirvārya eva saḥ
"पृथ्वी पर जो भी पुरुष अथवा स्त्री चमत्कारपुर की ओर जाता है, उसे तुम सबको अवश्य रोकना चाहिए।"
श्लोक 38 (skanda.6.13.38)
तत्रैव वसमानोऽपि यो गच्छेदचलेश्वरम् । मद्वाक्यात्स विशेषेण सर्वैर्वार्यः प्रयत्नतः
tatraiva vasamāno'pi yo gacchedacaleśvaram madvākyātsa viśeṣeṇa sarvairvāryaḥ prayatnataḥ
"यहाँ तक कि वहीं रहने वाला जो भी व्यक्ति अचलेश्वर के दर्शन को जाए, मेरे कहने से उसे भी तुम सबको विशेष रूप से हर प्रकार से रोकना चाहिए।"
श्लोक 39 (skanda.6.13.39)
ते तथेति प्रतिज्ञाय गत्वा शक्रस्य शासनात् । चक्रुस्ततः समुच्छिन्नं तन्माहात्म्यं गतं भुवि
te tatheti pratijñāya gatvā śakrasya śāsanāt cakrustataḥ samucchinnaṁ tanmāhātmyaṁ gataṁ bhuvi
"ऐसा ही होगा" कहकर उन्होंने प्रतिज्ञा की, और इंद्र की आज्ञा से जाकर पृथ्वी पर उस स्थान की महिमा को क्षीण-सा कर दिया।
श्लोक 40 (skanda.6.13.40)
एतद्वः सर्वमाख्यातमाख्यानं पापनाशनम् । अचलेश्वरदेवस्य तस्मिन्क्षेत्रे निवासिनः
etadvaḥ sarvamākhyātamākhyānaṁ pāpanāśanam acaleśvaradevasya tasminkṣetre nivāsinaḥ
यह पापनाशक संपूर्ण आख्यान मैंने तुम्हें सुना दिया, जो उस क्षेत्र में निवास करने वाले देव अचलेश्वर का है।