नागर खण्ड · अध्याय 12
पुत्रों को उपदेश
श्लोक 1 (skanda.6.12.1)
सूत उवाच । एवं स वसुधापालो ब्राह्मणेभ्यः स्वशक्तितः । ददौ तु नगरं कृत्वा पुरंदरपुरोपमम्
sūta uvāca evaṁ sa vasudhāpālo brāhmaṇebhyaḥ svaśaktitaḥ dadau tu nagaraṁ kṛtvā puraṁdarapuropamam
सूत जी ने कहा — इस प्रकार उस राजा ने अपनी शक्ति भर ब्राह्मणों को इंद्रपुरी के समान नगर बनाकर दान कर दिया।
श्लोक 2 (skanda.6.12.2)
मुक्ताप्रवालवैडूर्यरत्नहेमविचित्रितैः । भ्राजमानं गृहश्रेष्ठैर्द्यौर्नक्षत्रगणैरिव
muktāpravālavaiḍūryaratnahemavicitritaiḥ bhrājamānaṁ gṛhaśreṣṭhairdyaurnakṣatragaṇairiva
वह नगर मोती, मूंगे, वैडूर्य आदि रत्नों और स्वर्ण से सुसज्जित उत्तम भवनों से ऐसे सुशोभित था, जैसे आकाश नक्षत्रों के समूह से।
श्लोक 3 (skanda.6.12.3)
प्रासादैः स्फाटिकैश्चैव कैलासशिखरोपमैः । पताकाशोभितैर्दिव्यैः समंतात्परिवारितम्
prāsādaiḥ sphāṭikaiścaiva kailāsaśikharopamaiḥ patākāśobhitairdivyaiḥ samaṁtātparivāritam
वह चारों ओर स्फटिक के बने हुए, कैलास शिखर के समान ऊँचे, दिव्य ध्वजाओं से सुशोभित भवनों से घिरा हुआ था।
श्लोक 4 (skanda.6.12.4)
कांचनैः सुविचित्रैश्च प्रोन्नतैरमलैः शुभैः । तोरणानां सहस्रैश्च शोभितं सुमनोहरम्
kāṁcanaiḥ suvicitraiśca pronnatairamalaiḥ śubhaiḥ toraṇānāṁ sahasraiśca śobhitaṁ sumanoharam
वह अत्यंत मनोहर नगर स्वर्णमय, अद्भुत, ऊँचे और निर्मल शुभ तोरण-द्वारों की सहस्रों संख्या से सुशोभित था।
श्लोक 5 (skanda.6.12.5)
मणिसोपानशोभाभिर्दीर्घिकाभिः समंततः । आरामकूपयंत्राद्यैः सर्वोपकरणैर्युतम् । निवेद्य ब्राह्मणेंद्राणां कृतकृत्यो बभूव सः
maṇisopānaśobhābhirdīrghikābhiḥ samaṁtataḥ ārāmakūpayaṁtrādyaiḥ sarvopakaraṇairyutam nivedya brāhmaṇeṁdrāṇāṁ kṛtakṛtyo babhūva saḥ
वह चारों ओर मणिमय सीढ़ियों से सुशोभित बावड़ियों से युक्त था, तथा उद्यानों, कुओं, यंत्रों आदि सब उपकरणों से संपन्न था। इसे श्रेष्ठ ब्राह्मणों को अर्पित करके वह राजा कृतकृत्य हो गया।
श्लोक 6 (skanda.6.12.6)
शंखतीर्थे स्थितो नित्यं समाहूय ततः सुतान् । पुत्रान्पौत्रांस्तथा भृत्यान्वाक्यमेतदुवाच ह
śaṁkhatīrthe sthito nityaṁ samāhūya tataḥ sutān putrānpautrāṁstathā bhṛtyānvākyametaduvāca ha
तब सदा शंखतीर्थ में रहते हुए, उसने अपने पुत्रों, पौत्रों तथा सेवकों को बुलाकर यह वचन कहा।
श्लोक 7 (skanda.6.12.7)
एतत्पुरं मया कृत्वा ब्राह्मणेभ्यो निवेदितम् । भवद्भिर्मम वाक्येन रक्षणीयं प्रयत्नतः
etatpuraṁ mayā kṛtvā brāhmaṇebhyo niveditam bhavadbhirmama vākyena rakṣaṇīyaṁ prayatnataḥ
"मैंने इस नगर का निर्माण करके इसे ब्राह्मणों को अर्पित कर दिया है। तुम सबको मेरे वचन से इसकी रक्षा प्रयत्नपूर्वक करनी चाहिए।"
श्लोक 8 (skanda.6.12.8)
यथा स्युर्ब्राह्मणाः सर्वे सुखिनो हृष्टमानसाः । युष्माभिः पालनं कार्यं तथा सर्वैः समाहितैः । यश्चैतान्भक्तिसंयुक्तः पालयिष्यति भूमिपः । अन्योऽपि परमं तेजः स संप्राप्स्यति भूतले
yathā syurbrāhmaṇāḥ sarve sukhino hṛṣṭamānasāḥ yuṣmābhiḥ pālanaṁ kāryaṁ tathā sarvaiḥ samāhitaiḥ yaścaitānbhaktisaṁyuktaḥ pālayiṣyati bhūmipaḥ anyo'pi paramaṁ tejaḥ sa saṁprāpsyati bhūtale
तुम सबको एकाग्रचित्त होकर इस प्रकार इनका पालन करना चाहिए कि सभी ब्राह्मण सुखी और प्रसन्नचित्त रहें। जो भी राजा भक्तिपूर्वक इनका पालन करेगा, चाहे वह अन्य वंश का ही क्यों न हो, वह पृथ्वी पर परम तेज को प्राप्त करेगा।
श्लोक 9 (skanda.6.12.9)
अजेयः सर्वशत्रूणां प्रतापी स्फी तिसंयुतः । भविष्यति न सन्देहो ब्राह्मणानां स पालनात्
ajeyaḥ sarvaśatrūṇāṁ pratāpī sphī tisaṁyutaḥ bhaviṣyati na sandeho brāhmaṇānāṁ sa pālanāt
निःसंदेह वह सब शत्रुओं के लिए अजेय, प्रतापी और समृद्धि से युक्त होगा — यह सब ब्राह्मणों के पालन के फलस्वरूप होगा।
श्लोक 10 (skanda.6.12.10)
पुत्रपौत्रसुभृत्याढ्यो दीर्घायू रोगवर्जितः । ब्राह्मणानां प्रसादेन मम वाक्याद्भविष्यति
putrapautrasubhṛtyāḍhyo dīrghāyū rogavarjitaḥ brāhmaṇānāṁ prasādena mama vākyādbhaviṣyati
मेरे इस वचन और ब्राह्मणों की कृपा से वह पुत्रों, पौत्रों और उत्तम सेवकों से संपन्न, दीर्घायु और रोगरहित होगा।
श्लोक 11 (skanda.6.12.11)
यः पुनर्द्वेषसंयुक्तः संतापं चैव नेष्यति । एतान्ब्राह्मणशार्दूलान्नरकं स प्रयास्यति
yaḥ punardveṣasaṁyuktaḥ saṁtāpaṁ caiva neṣyati etānbrāhmaṇaśārdūlānnarakaṁ sa prayāsyati
किंतु जो द्वेष से युक्त होकर इन श्रेष्ठ ब्राह्मणों को संताप पहुँचाएगा, वह नरक को प्राप्त होगा।
श्लोक 12 (skanda.6.12.12)
तथा दुःखानि संप्राप्य दृष्ट्वा नैकान्पराभवान् । वियोगानिष्टबन्धूनां व्याधिग्रस्तो विगर्हितः
tathā duḥkhāni saṁprāpya dṛṣṭvā naikānparābhavān viyogāniṣṭabandhūnāṁ vyādhigrasto vigarhitaḥ
वह अनेक दुःखों और अपमानों को भोगेगा, अपने प्रिय बंधुजनों के वियोग को देखेगा, रोगग्रस्त और निंदित होगा।
श्लोक 13 (skanda.6.12.13)
वंशोच्छेदं समासाद्य गमिष्यति यमालयम् । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन रक्षणीयमिदं पुरम् । मम वाक्याद्विशेषेण हितमिच्छद्भिरात्मनः
vaṁśocchedaṁ samāsādya gamiṣyati yamālayam tasmātsarvaprayatnena rakṣaṇīyamidaṁ puram mama vākyādviśeṣeṇa hitamicchadbhirātmanaḥ
वह अपने वंश के उच्छेद को प्राप्त कर यमलोक को जाएगा। इसलिए, जो अपना कल्याण चाहते हों, उन्हें मेरे वचन का पालन करते हुए विशेष रूप से सब प्रयत्नों से इस नगर की रक्षा करनी चाहिए।
श्लोक 14 (skanda.6.12.14)
एवं स भूपतिः सर्वांस्ता नुक्त्वा तपसि स्थितः । तेऽपि सर्वे तथा चक्रुर्यथा तेन च शिक्षिताः
evaṁ sa bhūpatiḥ sarvāṁstā nuktvā tapasi sthitaḥ te'pi sarve tathā cakruryathā tena ca śikṣitāḥ
इस प्रकार उस राजा ने सबको यह आदेश देकर तप में स्थित हो गया, और वे सब भी वैसा ही करने लगे जैसा उसने उन्हें सिखाया था।