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नागर खण्ड · अध्याय 11

शंखतीर्थ एवं ब्राह्मणों को नगरदान

अध्याय 10अध्याय-सूचीअध्याय 12

श्लोक 1 (skanda.6.11.1)

ऋषय ऊचुः । चमत्कारः कथं राजा मुक्तः कुष्ठेन सूतज । कथं तेन तपस्तप्तं कियत्कालं च भूभुजा

ṛṣaya ūcuḥ camatkāraḥ kathaṁ rājā muktaḥ kuṣṭhena sūtaja kathaṁ tena tapastaptaṁ kiyatkālaṁ ca bhūbhujā

ऋषियों ने कहा — हे सूतपुत्र! राजा चमत्कार कुष्ठ रोग से कैसे मुक्त हुए? उस भूपति ने कैसा और कितने काल तक तप किया?

श्लोक 2 (skanda.6.11.2)

कतमे ब्राह्मणास्ते वै शंखतीर्थं प्रदर्शितम् । यैस्तस्य रोगमुक्त्यर्थं दुःखितस्य महात्मनः

katame brāhmaṇāste vai śaṁkhatīrthaṁ pradarśitam yaistasya rogamuktyarthaṁ duḥkhitasya mahātmanaḥ

वे कौन-से ब्राह्मण थे जिन्होंने उस दुःखी महात्मा को रोगमुक्ति के लिए शंखतीर्थ दिखलाया?

श्लोक 3 (skanda.6.11.3)

कतमं शंखतीर्थं तत्कस्मिन्स्थाने व्यवस्थितम् । किंप्रभावं च निःशेषं सर्वं विस्तरतो वद

katamaṁ śaṁkhatīrthaṁ tatkasminsthāne vyavasthitam kiṁprabhāvaṁ ca niḥśeṣaṁ sarvaṁ vistarato vada

वह शंखतीर्थ कौन-सा है, किस स्थान पर स्थित है, और उसका प्रभाव क्या है — यह सब कुछ विस्तार से हमें बताइए।

श्लोक 4 (skanda.6.11.4)

सूत उवाच । अहं वः कीर्तयिष्यामि कथामेतां मनोहराम् । सर्वपापहरां विप्राश्चमत्कारनृपोद्भवाम्

sūta uvāca ahaṁ vaḥ kīrtayiṣyāmi kathāmetāṁ manoharām sarvapāpaharāṁ viprāścamatkāranṛpodbhavām

सूत जी ने कहा — हे विप्रो! मैं तुम्हें यह मनोहर कथा सुनाऊँगा, जो सब पापों को हरने वाली है और राजा चमत्कार से जुड़ी है।

श्लोक 5 (skanda.6.11.5)

स भ्रांतः सर्वतीर्थानि प्रभासाद्यानि कृत्स्नशः । तपस्वी नियताहारो भिक्षान्नकृतभोजनः

sa bhrāṁtaḥ sarvatīrthāni prabhāsādyāni kṛtsnaśaḥ tapasvī niyatāhāro bhikṣānnakṛtabhojanaḥ

वह राजा तपस्वी बनकर, नियमित आहार लेकर, भिक्षा का अन्न खाकर, प्रभास आदि समस्त तीर्थों में पूर्णतः भटकता रहा।

श्लोक 6 (skanda.6.11.6)

पृच्छमानो भिषग्मुख्यानौषधानि मुहुर्मुहुः । मंत्रान्मंत्रविदश्चैव रोगनाशाय नित्यतः

pṛcchamāno bhiṣagmukhyānauṣadhāni muhurmuhuḥ maṁtrānmaṁtravidaścaiva roganāśāya nityataḥ

वह रोगनाश के लिए बार-बार श्रेष्ठ वैद्यों से औषधियाँ और मंत्रवेत्ताओं से मंत्र पूछता रहा।

श्लोक 7 (skanda.6.11.7)

न लेभे किंचिदिष्टं वा स मंत्रं भेषजं च वा । तीर्थं वा नृपशार्दूलो येन स्याद्व्याधिसंक्षयः

na lebhe kiṁcidiṣṭaṁ vā sa maṁtraṁ bheṣajaṁ ca vā tīrthaṁ vā nṛpaśārdūlo yena syādvyādhisaṁkṣayaḥ

किंतु उस श्रेष्ठ राजा को न तो कोई मनचाहा मंत्र मिला, न औषधि, न ही ऐसा कोई तीर्थ जिससे उसका रोग नष्ट हो सके।

श्लोक 8 (skanda.6.11.8)

ततश्च पार्थिवश्रेष्ठो वैराग्यं परमं गतः । एकाकी यतचित्तात्मा सर्वसत्त्वविराजिते

tataśca pārthivaśreṣṭho vairāgyaṁ paramaṁ gataḥ ekākī yatacittātmā sarvasattvavirājite

तब वह श्रेष्ठ राजा परम वैराग्य को प्राप्त हुआ; अकेला, संयत चित्त और आत्मा वाला होकर वह समस्त प्राणियों से सुशोभित उस स्थान में रहने लगा।

श्लोक 9 (skanda.6.11.9)

निवासमकरोत्तस्मिन्क्षेत्रे पुण्यतमे चिरम् । शीर्णपर्णफलाहारो भूमौ शेते सदा निशि । अन्य स्याऽन्यस्य वृक्षस्य मदाहंकारवर्जितः

nivāsamakarottasminkṣetre puṇyatame ciram śīrṇaparṇaphalāhāro bhūmau śete sadā niśi anya syā'nyasya vṛkṣasya madāhaṁkāravarjitaḥ

वह उस परम पुण्यमय क्षेत्र में दीर्घकाल तक निवास करने लगा; सूखे पत्तों और गिरे फलों को खाकर, सदा रात्रि में भूमि पर सोकर, मद और अहंकार से रहित होकर, कभी एक वृक्ष के नीचे तो कभी दूसरे के नीचे।

श्लोक 10 (skanda.6.11.10)

ततः कतिपयाहस्य भ्रममाणो महीपतिः । सोऽपश्यद्ब्राह्मणश्रेष्ठांस्तीर्थयात्राश्रयान्बहून्

tataḥ katipayāhasya bhramamāṇo mahīpatiḥ so'paśyadbrāhmaṇaśreṣṭhāṁstīrthayātrāśrayānbahūn

कुछ दिनों बाद भटकते हुए उस राजा ने तीर्थयात्रा के लिए आए हुए अनेक श्रेष्ठ ब्राह्मणों को देखा।

श्लोक 11 (skanda.6.11.11)

ततः प्रणम्य तान्विप्रानुपविष्टान्धरातले । विश्वामित्राश्रमस्यांते प्रोवाच विनयान्वितः

tataḥ praṇamya tānviprānupaviṣṭāndharātale viśvāmitrāśramasyāṁte provāca vinayānvitaḥ

तब भूमि पर बैठे उन विप्रों को विश्वामित्र के आश्रम की सीमा पर प्रणाम करके, विनयपूर्वक वह बोला।

श्लोक 12 (skanda.6.11.12)

राजोवाच । अहं नाम्ना चमत्कारः पार्थिवः सूर्यवंशजः । आनर्त्ताधिपतिर्व्याप्तः कुष्ठेन द्विजसत्तमाः

rājovāca ahaṁ nāmnā camatkāraḥ pārthivaḥ sūryavaṁśajaḥ ānarttādhipatirvyāptaḥ kuṣṭhena dvijasattamāḥ

राजा ने कहा — हे श्रेष्ठ द्विजो! मेरा नाम चमत्कार है, मैं सूर्यवंश में उत्पन्न आनर्त देश का राजा हूँ, और कुष्ठ रोग से व्याप्त हूँ।

श्लोक 13 (skanda.6.11.13)

अस्ति कश्चिदुपायोऽत्र दैवो वा मानुषोऽपि वा । भेषजं वाऽथ मंत्रो वा येन कुष्ठं प्रशाम्यति

asti kaścidupāyo'tra daivo vā mānuṣo'pi vā bheṣajaṁ vā'tha maṁtro vā yena kuṣṭhaṁ praśāmyati

क्या यहाँ कोई दैवी या मानवी उपाय है — कोई औषधि या मंत्र — जिससे यह कुष्ठ रोग शांत हो सके?

श्लोक 14 (skanda.6.11.14)

ममोपरि दयां कृत्वा वदध्वं द्विजसत्तमाः । कुष्ठग्रस्तशरीरं च परं कृच्छ्रमुपागतम्

mamopari dayāṁ kṛtvā vadadhvaṁ dvijasattamāḥ kuṣṭhagrastaśarīraṁ ca paraṁ kṛcchramupāgatam

हे श्रेष्ठ द्विजो! मुझ पर दया करके बताइए, क्योंकि कुष्ठ से ग्रस्त मेरा शरीर अत्यंत कष्ट को प्राप्त हो चुका है।

श्लोक 15 (skanda.6.11.15)

अथवा वित्थ नो यूयं त्यक्ष्यामीह कलेवरम् । प्रविश्याग्निं जलं वाऽपि भक्षयित्वाऽथ वा विषम्

athavā vittha no yūyaṁ tyakṣyāmīha kalevaram praviśyāgniṁ jalaṁ vā'pi bhakṣayitvā'tha vā viṣam

यदि आप लोग कोई उपाय नहीं जानते, तो मैं यहीं अपने शरीर का त्याग कर दूँगा — अग्नि या जल में प्रवेश करके, अथवा विष खाकर।

श्लोक 16 (skanda.6.11.16)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा सर्वे ते द्विजसत्तमाः । प्रोचुः कृपासमाविष्टास्ततस्तं पृथिवीश्वरम्

tasya tadvacanaṁ śrutvā sarve te dvijasattamāḥ procuḥ kṛpāsamāviṣṭāstatastaṁ pṛthivīśvaram

उसके ये वचन सुनकर वे सभी श्रेष्ठ द्विज करुणा से भर गए और उस राजा से कहने लगे।

श्लोक 17 (skanda.6.11.17)

अस्ति पार्थिवशार्दूल स्थानादस्माददूरतः । शंखतीर्थमिति ख्यातं सर्वरोगक्षयावहम्

asti pārthivaśārdūla sthānādasmādadūrataḥ śaṁkhatīrthamiti khyātaṁ sarvarogakṣayāvaham

हे राजाओं में सिंह! इस स्थान से दूर नहीं, शंखतीर्थ नामक एक तीर्थ है, जो समस्त रोगों का नाश करने वाला है।

श्लोक 18 (skanda.6.11.18)

ये नरा व्याधिना ग्रस्ताः काणाश्चांधास्तथा जडाः । हीनांगाश्चाऽधिकांगाश्च कुरूपा विकृताननाः

ye narā vyādhinā grastāḥ kāṇāścāṁdhāstathā jaḍāḥ hīnāṁgāścā'dhikāṁgāśca kurūpā vikṛtānanāḥ

जो मनुष्य रोगों से ग्रस्त हैं — काने, अंधे, गूँगे-बहरे, अंगहीन, अधिक अंगों वाले, कुरूप अथवा विकृत मुख वाले —

श्लोक 19 (skanda.6.11.19)

तेऽपि चैत्रस्य कृष्णादौ स्नातास्तत्राकृताशनाः । भवंति नीरुजः सद्यश्चित्रासंस्थे निशाकरे

te'pi caitrasya kṛṣṇādau snātāstatrākṛtāśanāḥ bhavaṁti nīrujaḥ sadyaścitrāsaṁsthe niśākare

वे भी चैत्र मास के कृष्ण पक्ष के आरंभ में वहाँ बिना भोजन किए स्नान करके, चित्रा नक्षत्र में चंद्रमा के स्थित होने पर तत्काल रोगरहित हो जाते हैं।

श्लोक 20 (skanda.6.11.20)

अस्माभिः शतशो दृष्टा द्वादशार्कसमप्रभाः । कामदेवसमाकारास्तेजोवीर्यसमायुताः

asmābhiḥ śataśo dṛṣṭā dvādaśārkasamaprabhāḥ kāmadevasamākārāstejovīryasamāyutāḥ

हमने ऐसे सैकड़ों लोगों को देखा है, जो बारह सूर्यों के समान तेजस्वी, कामदेव के समान सुंदर, तेज और बल से युक्त हो गए।

श्लोक 21 (skanda.6.11.21)

राजोवाच । शंखतीर्थं कथं ज्ञेयं मया ब्राह्मणसत्तमाः । कथं चैव समुत्पन्नं वदध्वं मम विस्तरात्

rājovāca śaṁkhatīrthaṁ kathaṁ jñeyaṁ mayā brāhmaṇasattamāḥ kathaṁ caiva samutpannaṁ vadadhvaṁ mama vistarāt

राजा ने कहा — हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! मैं शंखतीर्थ को कैसे पहचानूँ, और वह कैसे उत्पन्न हुआ — यह मुझे विस्तार से बताइए।

श्लोक 22 (skanda.6.11.22)

ब्राह्मणा ऊत्रुः । आसीत्पूर्वं मुनिश्रेष्ठो लिखिताख्यो महीतले । शांडिल्यस्य मुनेः पुत्रस्तपोवीर्यसमन्वितः

brāhmaṇā ūtruḥ āsītpūrvaṁ muniśreṣṭho likhitākhyo mahītale śāṁḍilyasya muneḥ putrastapovīryasamanvitaḥ

ब्राह्मणों ने कहा — पूर्वकाल में इस पृथ्वी पर लिखित नामक एक श्रेष्ठ मुनि थे, जो शांडिल्य मुनि के पुत्र और तपोबल से संपन्न थे।

श्लोक 23 (skanda.6.11.23)

अथ तस्यानुजो जज्ञे शंखाख्यो धर्मशास्त्रवित् । कन्दमूलफलाहारः सदैव तपसि स्थितः

atha tasyānujo jajñe śaṁkhākhyo dharmaśāstravit kandamūlaphalāhāraḥ sadaiva tapasi sthitaḥ

फिर उनका छोटा भाई शंख नामक धर्मशास्त्र का ज्ञाता उत्पन्न हुआ, जो कंद-मूल-फल खाकर सदा तप में स्थित रहता था।

श्लोक 24 (skanda.6.11.24)

कस्यचित्त्वथ कालस्य लिखितस्याऽऽश्रमं ययौ । शंखः स्वादुफलार्थाय पीडितोतिबुभुक्षया

kasyacittvatha kālasya likhitasyā''śramaṁ yayau śaṁkhaḥ svāduphalārthāya pīḍitotibubhukṣayā

एक बार अत्यंत भूख से पीड़ित होकर शंख मीठे फलों के लिए लिखित के आश्रम में गया।

श्लोक 25 (skanda.6.11.25)

स शून्यमाश्रमं प्राप्य लिखितस्य महात्मनः । आत्मीयानीति मन्वानः फलानि जगृहे ततः

sa śūnyamāśramaṁ prāpya likhitasya mahātmanaḥ ātmīyānīti manvānaḥ phalāni jagṛhe tataḥ

महात्मा लिखित के उस सूने आश्रम में पहुँचकर, उन फलों को अपना ही समझकर, उसने उन्हें ले लिया।

श्लोक 26 (skanda.6.11.26)

भक्षयामास भूरीणि पक्वानि मधुराणि च । एतस्मिन्नन्तरे प्राप्तो लिखितः शिष्यसंयुतः

bhakṣayāmāsa bhūrīṇi pakvāni madhurāṇi ca etasminnantare prāpto likhitaḥ śiṣyasaṁyutaḥ

उसने बहुत-से पके और मीठे फल खा लिए। इसी बीच अपने शिष्यों के साथ लिखित वहाँ आ पहुँचे।

श्लोक 27 (skanda.6.11.27)

स गृहीतफलं दृष्ट्वा शंखं प्रोवाच कोपतः

sa gṛhītaphalaṁ dṛṣṭvā śaṁkhaṁ provāca kopataḥ

फल लिए हुए शंख को देखकर उन्होंने क्रोधपूर्वक उससे कहा।

श्लोक 28 (skanda.6.11.28)

अदत्तानि मया पाप फलानि हृतवानसि । कस्मात्त्वं चौर्यरूपेण नानुबन्धमवेक्षसे

adattāni mayā pāpa phalāni hṛtavānasi kasmāttvaṁ cauryarūpeṇa nānubandhamavekṣase

"हे पापी! तूने बिना दिए हुए फलों को चुरा लिया है। तू चोरी के रूप में इस कर्म के परिणाम पर विचार क्यों नहीं करता?"

श्लोक 29 (skanda.6.11.29)

शंख उवाच । सत्यमेतद्द्विजश्रेष्ठ यत्त्वया परिकीर्तितम् । फलानि प्रगृहीतानि विजनेऽत्र तवाश्रमे

śaṁkha uvāca satyametaddvijaśreṣṭha yattvayā parikīrtitam phalāni pragṛhītāni vijane'tra tavāśrame

शंख ने कहा — हे श्रेष्ठ द्विज! आपने जो कहा वह सत्य है; मैंने आपके इस सूने आश्रम में फल ले लिए हैं।

श्लोक 30 (skanda.6.11.30)

तस्मात्कुरु यथार्हं मे निग्रहं चौर्यसंभवम् । इह लोकः परश्चैव येन मे स्यात्सुखावहः

tasmātkuru yathārhaṁ me nigrahaṁ cauryasaṁbhavam iha lokaḥ paraścaiva yena me syātsukhāvahaḥ

अतः चोरी के लिए मुझे उचित दंड दीजिए, जिससे मुझे इस लोक और परलोक दोनों में सुख प्राप्त हो।

श्लोक 31 (skanda.6.11.31)

ततः स हस्तमादाय हस्ते शंखस्य तत्क्षणात् । चकर्त कोपमाविष्टो वार्यमाणोऽपि तापसैः

tataḥ sa hastamādāya haste śaṁkhasya tatkṣaṇāt cakarta kopamāviṣṭo vāryamāṇo'pi tāpasaiḥ

तब क्रोध से भरे हुए लिखित ने शंख का हाथ पकड़कर तत्काल उसे काट दिया, यद्यपि अन्य तपस्वियों ने उन्हें रोकने का प्रयत्न किया।

श्लोक 32 (skanda.6.11.32)

छिन्नहस्तोऽपि शंखस्तु तपश्चक्रे सुदारुणम् । विशेषेण समासाद्य स्वाश्रमे भूय एव तु

chinnahasto'pi śaṁkhastu tapaścakre sudāruṇam viśeṣeṇa samāsādya svāśrame bhūya eva tu

हाथ कट जाने पर भी शंख अपने ही आश्रम में लौटकर विशेष रूप से अत्यंत कठोर तप करने लगा।

श्लोक 33 (skanda.6.11.33)

ततस्तुष्टो महादेवस्तस्य कालेन केन चित् । प्रोवाच दर्शनं गत्वा तं च शंखमुनीश्वरम्

tatastuṣṭo mahādevastasya kālena kena cit provāca darśanaṁ gatvā taṁ ca śaṁkhamunīśvaram

कुछ काल पश्चात् उससे प्रसन्न होकर महादेव ने उस मुनिश्रेष्ठ शंख को दर्शन देकर कहा।

श्लोक 34 (skanda.6.11.34)

महेश्वर उवाच । भोभो मुने महासत्त्व दुष्करं कृतवानसि । वरं गृहाण मत्तस्त्वं मनसा समभीप्सितम्

maheśvara uvāca bhobho mune mahāsattva duṣkaraṁ kṛtavānasi varaṁ gṛhāṇa mattastvaṁ manasā samabhīpsitam

महेश्वर ने कहा — हे मुने, हे महासत्त्व! तुमने अत्यंत दुष्कर तप किया है। अतः मुझसे अपने मन-वांछित वर माँगो।

श्लोक 35 (skanda.6.11.35)

शंख उवाच । यदि तुष्टोसि मे देव वरं चेद्यच्छसि प्रभो । स्यातां मे तादृशौ हस्तौ भूयोऽपि सुरसत्तम

śaṁkha uvāca yadi tuṣṭosi me deva varaṁ cedyacchasi prabho syātāṁ me tādṛśau hastau bhūyo'pi surasattama

शंख ने कहा — हे देव, यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं और हे प्रभु, यदि वर देना चाहते हैं, तो हे देवश्रेष्ठ, मेरे दोनों हाथ पहले जैसे ही पुनः हो जाएँ।

श्लोक 36 (skanda.6.11.36)

तथेदं मम नामांकं तीर्थं स्यात्सुरसत्तम । विख्यातं सर्वलोकेषु सर्वपापहरं नृणाम्

tathedaṁ mama nāmāṁkaṁ tīrthaṁ syātsurasattama vikhyātaṁ sarvalokeṣu sarvapāpaharaṁ nṛṇām

और हे देवश्रेष्ठ, यह तीर्थ मेरे ही नाम से चिह्नित होकर, सब लोकों में विख्यात हो और मनुष्यों के समस्त पापों को हरने वाला बने।

श्लोक 37 (skanda.6.11.37)

हीनांगो वाधिकांगो वा व्याधिना ग्रस्त एव च । अत्र स्नानं करोत्याशु स भूयः स्यात्पुनर्नवः

hīnāṁgo vādhikāṁgo vā vyādhinā grasta eva ca atra snānaṁ karotyāśu sa bhūyaḥ syātpunarnavaḥ

जो कोई अंगहीन, अधिक अंगों वाला, अथवा रोग से ग्रस्त हो, यदि वह यहाँ स्नान करे, तो वह शीघ्र ही पुनः नया (स्वस्थ) हो जाए।

श्लोक 38 (skanda.6.11.38)

भगवानुवाच । एतत्तीर्थं तु विख्यातं तव नाम्ना भविष्यति । अद्यप्रभृति विप्रेन्द्र देहिनां पापनाशनम्

bhagavānuvāca etattīrthaṁ tu vikhyātaṁ tava nāmnā bhaviṣyati adyaprabhṛti viprendra dehināṁ pāpanāśanam

भगवान ने कहा — हे श्रेष्ठ विप्र! आज से यह तीर्थ तुम्हारे ही नाम से विख्यात होकर सब प्राणियों के पापों का नाश करने वाला होगा।

श्लोक 39 (skanda.6.11.39)

हीनांगो वाधिकांगो वा योऽत्र स्नानं करिष्यति । चैत्रे शुक्ले निराहारश्चित्रासंस्थे निशाकरे । सुवर्णांगः स तेजस्वी भविष्यति न संशयः

hīnāṁgo vādhikāṁgo vā yo'tra snānaṁ kariṣyati caitre śukle nirāhāraścitrāsaṁsthe niśākare suvarṇāṁgaḥ sa tejasvī bhaviṣyati na saṁśayaḥ

जो अंगहीन अथवा अधिक अंगों वाला व्यक्ति चैत्र के शुक्ल पक्ष में, बिना भोजन किए, चित्रा नक्षत्र में चंद्रमा के स्थित रहते यहाँ स्नान करेगा, वह निःसंदेह स्वर्ण के समान अंगों वाला और तेजस्वी हो जाएगा।

श्लोक 40 (skanda.6.11.40)

सकामो यदि विप्रेंद्र ध्यायमानः सुरूपताम् । निष्कामो वा परं स्थानं गमि ष्यति शिवात्मकम्

sakāmo yadi vipreṁdra dhyāyamānaḥ surūpatām niṣkāmo vā paraṁ sthānaṁ gami ṣyati śivātmakam

हे श्रेष्ठ विप्र! यदि वह सकाम होकर सुंदर रूप की कामना करते हुए ध्यान करे तो वह वैसा ही रूप पाएगा, और यदि निष्काम हो तो शिवमय परम स्थान को प्राप्त होगा।

श्लोक 41 (skanda.6.11.41)

अत्र श्राद्धे कृते ब्रह्मंश्चतुर्दश्यां निशाकरे । चित्रास्थिते प्रयास्यंति पितरस्तृप्तिमुत्तमाम्

atra śrāddhe kṛte brahmaṁścaturdaśyāṁ niśākare citrāsthite prayāsyaṁti pitarastṛptimuttamām

हे ब्रह्मन्! चतुर्दशी को, चंद्रमा के चित्रा नक्षत्र में स्थित रहते यहाँ श्राद्ध करने पर, पितर परम तृप्ति को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 42 (skanda.6.11.42)

अद्यैव विप्रशार्दूल चैत्रशुक्लांत उत्तमः । अपराह्णे निशानाथश्चित्रायोगं प्रयास्यति

adyaiva vipraśārdūla caitraśuklāṁta uttamaḥ aparāhṇe niśānāthaścitrāyogaṁ prayāsyati

हे विप्रश्रेष्ठ! आज ही चैत्र शुक्ल पक्ष का यह उत्तम अंतिम दिन है, और अपराह्न में चंद्रमा चित्रा नक्षत्र के योग को प्राप्त होगा।

श्लोक 43 (skanda.6.11.43)

तत्रोपवासयुक्तस्य सम्यक्स्नातस्य तत्क्षणात् । स्यातां हस्तौ सुरूपाढ्यौ यथा पूर्वं तथा हि तौ

tatropavāsayuktasya samyaksnātasya tatkṣaṇāt syātāṁ hastau surūpāḍhyau yathā pūrvaṁ tathā hi tau

वहाँ उपवास करके भलीभाँति स्नान करते ही उसके दोनों हाथ पहले के समान सुंदर रूप में हो जाएँगे।

श्लोक 44 (skanda.6.11.44)

एवमुक्त्वा स भगवांस्ततश्चादर्शनं गतः । शंखोऽपि कुतपे काले तत्र स्नानमथाकरोत्

evamuktvā sa bhagavāṁstataścādarśanaṁ gataḥ śaṁkho'pi kutape kāle tatra snānamathākarot

यह कहकर वे भगवान अंतर्धान हो गए। शंख ने भी कुतप काल में वहाँ स्नान किया।

श्लोक 45 (skanda.6.11.45)

ततश्च तत्क्षणाज्जातौ हस्तौ तस्य यथा पुरा । रक्तोत्पलनिभौ कांतौ मत्स्यचिह्नेन चिह्नितौ

tataśca tatkṣaṇājjātau hastau tasya yathā purā raktotpalanibhau kāṁtau matsyacihnena cihnitau

उसी क्षण उसके दोनों हाथ पहले जैसे ही प्रकट हो गए — लाल कमल के समान सुंदर और मत्स्य के चिह्न से चिह्नित।

श्लोक 46 (skanda.6.11.46)

ब्राह्मणा ऊचुः । एवं तद्धरणीपृष्ठे तीर्थं जातं नृपोत्तम । प्रभावाद्देवदेवस्य चंद्रांकस्य शुभावहम्

brāhmaṇā ūcuḥ evaṁ taddharaṇīpṛṣṭhe tīrthaṁ jātaṁ nṛpottama prabhāvāddevadevasya caṁdrāṁkasya śubhāvaham

ब्राह्मणों ने कहा — हे राजश्रेष्ठ! इस प्रकार देवाधिदेव चंद्रशेखर के प्रभाव से यह मंगलकारी तीर्थ पृथ्वी पर उत्पन्न हुआ।

श्लोक 47 (skanda.6.11.47)

तस्मात्त्वमपि राजेंद्र तत्र स्नानं समाचर । चैत्रे शुक्लचतुर्दश्यां चित्रासंस्थे निशाकरे

tasmāttvamapi rājeṁdra tatra snānaṁ samācara caitre śuklacaturdaśyāṁ citrāsaṁsthe niśākare

अतः हे राजेंद्र! आप भी चैत्र शुक्ल चतुर्दशी को, चंद्रमा के चित्रा नक्षत्र में स्थित रहते, वहाँ स्नान कीजिए।

श्लोक 48 (skanda.6.11.48)

भविष्यसि न संदेहः सर्वरोगविवर्जितः । वयं ते दर्शयिष्यामः प्राप्ते काले यथोदिते

bhaviṣyasi na saṁdehaḥ sarvarogavivarjitaḥ vayaṁ te darśayiṣyāmaḥ prāpte kāle yathodite

निःसंदेह आप सब रोगों से मुक्त हो जाएँगे। जब उपयुक्त समय आएगा, हम उसे आपको दिखा देंगे।

श्लोक 49 (skanda.6.11.49)

सूत उवाच । ततः कतिपयाहेन चैत्रकृष्णादिरागतः । चित्रासंस्थे निशानाथे संप्राप्ता च चतुर्दशी

sūta uvāca tataḥ katipayāhena caitrakṛṣṇādirāgataḥ citrāsaṁsthe niśānāthe saṁprāptā ca caturdaśī

सूत जी ने कहा — फिर कुछ ही दिनों में चैत्र मास का कृष्ण पक्ष आ गया, और चंद्रमा के चित्रा नक्षत्र में स्थित रहते चतुर्दशी तिथि आ पहुँची।

श्लोक 50 (skanda.6.11.50)

ततस्ते ब्राह्मणा भूपं समादाय च तत्क्षणात् । शंखतीर्थं समुद्दिश्य गतास्तस्य हितैषिणः

tataste brāhmaṇā bhūpaṁ samādāya ca tatkṣaṇāt śaṁkhatīrthaṁ samuddiśya gatāstasya hitaiṣiṇaḥ

तब उसके हितैषी उन ब्राह्मणों ने तत्काल राजा को साथ लेकर शंखतीर्थ की ओर प्रस्थान किया।

श्लोक 51 (skanda.6.11.51)

ततः स मनसि ध्यात्वा कुष्ठव्याधिपरिक्षयम् । स्नानं चक्रे यथान्यायं श्रद्धया परया युतः

tataḥ sa manasi dhyātvā kuṣṭhavyādhiparikṣayam snānaṁ cakre yathānyāyaṁ śraddhayā parayā yutaḥ

तब मन में कुष्ठ रोग के पूर्ण नाश का ध्यान करते हुए, अत्यंत श्रद्धा से युक्त होकर, उसने विधिपूर्वक स्नान किया।

श्लोक 52 (skanda.6.11.52)

ततः कुष्ठविनिर्मुक्तो द्वादशार्कसमप्रभः । निष्क्रांतः सलिलात्तस्माद्धर्षेण महतान्वितः

tataḥ kuṣṭhavinirmukto dvādaśārkasamaprabhaḥ niṣkrāṁtaḥ salilāttasmāddharṣeṇa mahatānvitaḥ

तब कुष्ठ रोग से मुक्त होकर, बारह सूर्यों के समान तेजस्वी होकर, वह अत्यंत हर्ष के साथ उस जल से बाहर निकला।

श्लोक 53 (skanda.6.11.53)

ततः प्रणम्य तान्सर्वान्ब्राह्मणान्वेदपारगान् । कृतांजलिपुटो भूत्वा वाक्यमेतदुवाच ह

tataḥ praṇamya tānsarvānbrāhmaṇānvedapāragān kṛtāṁjalipuṭo bhūtvā vākyametaduvāca ha

तब वेदपारंगत उन सब ब्राह्मणों को प्रणाम करके, हाथ जोड़कर, उसने यह वचन कहा।

श्लोक 54 (skanda.6.11.54)

प्रसादेन हि युष्माकं मुक्तोऽहं ब्राह्मणोत्तमाः । कुष्ठव्याधेर्महाकालं गर्हितोस्म्येव देहिनाम्

prasādena hi yuṣmākaṁ mukto'haṁ brāhmaṇottamāḥ kuṣṭhavyādhermahākālaṁ garhitosmyeva dehinām

हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! आपकी कृपा से ही मैं इस भयंकर कुष्ठ रोग से मुक्त हुआ हूँ, जिसके कारण मैं दीर्घकाल तक प्राणियों द्वारा घृणित रहा।

श्लोक 55 (skanda.6.11.55)

तस्मान्नाहं करिष्यामि राज्यं ब्राह्मणसत्तमाः । तीर्थेऽत्रैवाधुना नित्यं चरिष्यामि महत्तपः

tasmānnāhaṁ kariṣyāmi rājyaṁ brāhmaṇasattamāḥ tīrthe'traivādhunā nityaṁ cariṣyāmi mahattapaḥ

अतः हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! अब मैं राज्य नहीं करूँगा; इसी तीर्थ में सदा रहकर महान तप करूँगा।

श्लोक 56 (skanda.6.11.56)

एतद्राज्यं च देशं च हस्त्यश्वादि तथापरम् । यत्किंचिद्विद्यते मह्यं तद्गृह्णंतु द्विजोत्तमाः

etadrājyaṁ ca deśaṁ ca hastyaśvādi tathāparam yatkiṁcidvidyate mahyaṁ tadgṛhṇaṁtu dvijottamāḥ

यह राज्य, यह देश, हाथी-घोड़े आदि तथा जो कुछ भी मेरे पास है, वह सब हे श्रेष्ठ द्विजो, आप ग्रहण करें।

श्लोक 57 (skanda.6.11.57)

ममैवानुग्रहार्थाय दयां कृत्वा बृहत्तराम् । दीनस्य भक्तियुक्तस्य विरक्तस्य विशेषतः

mamaivānugrahārthāya dayāṁ kṛtvā bṛhattarām dīnasya bhaktiyuktasya viraktasya viśeṣataḥ

यह इस दीन, भक्तियुक्त और विशेष रूप से विरक्त व्यक्ति पर बड़ी दया करते हुए, मेरे ही अनुग्रह के लिए ग्रहण करें।

श्लोक 58 (skanda.6.11.58)

ब्राह्मणा ऊचुः । न वयं रक्षितुं शक्ता राज्यं पार्थिवसत्तम । तत्किं तेन गृहीतेन येन स्याद्राज्यविप्लवः

brāhmaṇā ūcuḥ na vayaṁ rakṣituṁ śaktā rājyaṁ pārthivasattama tatkiṁ tena gṛhītena yena syādrājyaviplavaḥ

ब्राह्मणों ने कहा — हे राजश्रेष्ठ! हम राज्य की रक्षा करने में समर्थ नहीं हैं। जिस वस्तु को ग्रहण करने से राज्य का विप्लव हो, उसे लेने से क्या लाभ?

श्लोक 59 (skanda.6.11.59)

जामदग्न्येन रामेण पुरा दत्ता वसुन्धरा । त्रिःसप्त क्षत्रियैर्हीनां कृत्वास्माकं नृपोत्तम

jāmadagnyena rāmeṇa purā dattā vasundharā triḥsapta kṣatriyairhīnāṁ kṛtvāsmākaṁ nṛpottama

हे नृपश्रेष्ठ! पूर्वकाल में जमदग्नि-पुत्र परशुराम ने इक्कीस बार क्षत्रियों से रहित करके यह पृथ्वी हमें दान की थी।

श्लोक 60 (skanda.6.11.60)

सा भूयोपि हृताऽस्माकं क्षत्रियैर्बलवत्तरैः । तिरस्कृत्य द्विजान्सर्वाँल्लीलयापि मुहुर्मुहुः

sā bhūyopi hṛtā'smākaṁ kṣatriyairbalavattaraiḥ tiraskṛtya dvijānsarvā~llīlayāpi muhurmuhuḥ

फिर भी अधिक बलशाली क्षत्रियों ने बार-बार लीलामात्र से ही सब द्विजों का तिरस्कार करके वह पृथ्वी हमसे छीन ली।

श्लोक 61 (skanda.6.11.61)

राजोवाच । अहं वः प्रकरिष्यामि रक्षां ब्राह्मणसत्तमाः । तपस्थितोऽपि कार्येऽत्र न भीः कार्या कथंचन

rājovāca ahaṁ vaḥ prakariṣyāmi rakṣāṁ brāhmaṇasattamāḥ tapasthito'pi kārye'tra na bhīḥ kāryā kathaṁcana

राजा ने कहा — हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! मैं ही तुम्हारी रक्षा करूँगा। तप में स्थित रहते हुए भी इस विषय में तुम्हें किसी प्रकार का भय नहीं करना चाहिए।

श्लोक 62 (skanda.6.11.62)

ब्राह्मणा ऊचुः । अवश्यं यदि ते श्रद्धा विद्यते दानसंभवा । क्षेत्रेऽत्रापि महापुण्ये कृत्वा देहि पुरोत्तमम्

brāhmaṇā ūcuḥ avaśyaṁ yadi te śraddhā vidyate dānasaṁbhavā kṣetre'trāpi mahāpuṇye kṛtvā dehi purottamam

ब्राह्मणों ने कहा — यदि आपमें दान की श्रद्धा अवश्य विद्यमान है, तो इस महापुण्य क्षेत्र में ही एक उत्तम नगर बनाकर हमें दीजिए।

श्लोक 63 (skanda.6.11.63)

सर्वेषां ब्राह्मणेंद्राणां प्राकारपरिखान्वितम् । सुखेन येन तिष्ठामः स्नात्वा तीर्थैः पृथग्विधैः । गृहस्थधर्मिणः सर्वे स्वाध्यायनिरता सदा

sarveṣāṁ brāhmaṇeṁdrāṇāṁ prākāraparikhānvitam sukhena yena tiṣṭhāmaḥ snātvā tīrthaiḥ pṛthagvidhaiḥ gṛhasthadharmiṇaḥ sarve svādhyāyaniratā sadā

सब श्रेष्ठ ब्राह्मणों के लिए परकोटे और खाई से युक्त ऐसा नगर, जिसमें हम विभिन्न तीर्थों में स्नान करके सुखपूर्वक रह सकें, गृहस्थ धर्म का पालन करते हुए सदा स्वाध्याय में लगे रहें।

श्लोक 64 (skanda.6.11.64)

सूत उवाच । तच्छ्रुत्वा स महीपालस्तथेत्युक्त्वा प्रहर्षितः । नगरं कल्पयामास स्थाने तत्र महत्तमम्

sūta uvāca tacchrutvā sa mahīpālastathetyuktvā praharṣitaḥ nagaraṁ kalpayāmāsa sthāne tatra mahattamam

सूत जी ने कहा — यह सुनकर वह राजा अत्यंत हर्षित होकर "तथास्तु" कहकर उस स्थान पर एक विशाल नगर का निर्माण करने लगा।

श्लोक 65 (skanda.6.11.65)

प्राकारेण सुतुंगेन परिखाद्येन सर्वतः । आयामव्यासतश्चैव क्रोशमात्रं मनोहरम्

prākāreṇa sutuṁgena parikhādyena sarvataḥ āyāmavyāsataścaiva krośamātraṁ manoharam

वह मनोहर नगर ऊँची प्राचीर और चारों ओर खाई से घिरा हुआ, लंबाई और चौड़ाई में एक-एक क्रोश के बराबर था।

श्लोक 66 (skanda.6.11.66)

त्रिकचत्वरसंशुद्धं शोभितं सर्वतो ध्वजैः । प्रासादैः प्रोन्नतैः कान्तैः समंतात्सुधया वृतैः

trikacatvarasaṁśuddhaṁ śobhitaṁ sarvato dhvajaiḥ prāsādaiḥ pronnataiḥ kāntaiḥ samaṁtātsudhayā vṛtaiḥ

वह तिराहों और चौराहों से सुशोभित, चारों ओर ध्वजाओं से अलंकृत था, तथा चारों ओर चूने से पुते हुए ऊँचे और सुंदर भवनों से घिरा था।

श्लोक 67 (skanda.6.11.67)

मत्तवारणकोपेतैर्बहुभिर्भूभिरेव च । संपूर्णं सत्यकामाद्यैः साधुलोकप्रशंसितैः

mattavāraṇakopetairbahubhirbhūbhireva ca saṁpūrṇaṁ satyakāmādyaiḥ sādhulokapraśaṁsitaiḥ

वह मस्त हाथियों तथा सत्यकाम आदि सज्जन लोगों से युक्त अनेक भूमियों से परिपूर्ण था, जिनकी सज्जन लोग सराहना करते थे।

श्लोक 68 (skanda.6.11.68)

ततो गृहाणि सर्वाणि पूरयित्वा स भूमिपः । सुवर्णमणिमुक्तादिपदार्थैरपरैरपि

tato gṛhāṇi sarvāṇi pūrayitvā sa bhūmipaḥ suvarṇamaṇimuktādipadārthairaparairapi

तब उस राजा ने सब घरों को सोना, मणि, मोती आदि तथा अन्य वस्तुओं से भर दिया।

श्लोक 69 (skanda.6.11.69)

ब्राह्मणेभ्यः कुलीनेभ्यो वेदविद्भ्यो विशेषतः । श्रोत्रियेभ्यश्च दांतेभ्यः स तु श्रद्धासमन्वितः

brāhmaṇebhyaḥ kulīnebhyo vedavidbhyo viśeṣataḥ śrotriyebhyaśca dāṁtebhyaḥ sa tu śraddhāsamanvitaḥ

फिर श्रद्धा से युक्त होकर उसने वह नगर विशेष रूप से कुलीन, वेदज्ञ, श्रोत्रिय और संयमी ब्राह्मणों को दिया।

श्लोक 70 (skanda.6.11.70)

यथाज्येष्ठं यथाश्रेष्ठं प्रक्षाल्य चरणौ ततः । शास्त्रोक्तेन विधानेन प्रददौ द्विजसत्तमाः

yathājyeṣṭhaṁ yathāśreṣṭhaṁ prakṣālya caraṇau tataḥ śāstroktena vidhānena pradadau dvijasattamāḥ

फिर ज्येष्ठता और श्रेष्ठता के क्रम से उनके चरण धोकर, शास्त्रोक्त विधि के अनुसार, उसने वह नगर उन श्रेष्ठ द्विजों को अर्पित किया।

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