नागर खण्ड · अध्याय 10
राजा चमत्कार की कुष्ठ-निवृत्ति (शंखतीर्थ माहात्म्य)
श्लोक 1 (skanda.6.10.1)
सूत उवाच। आनर्त्ताधिपतिर्भूपश्चमत्कार इति स्मृतः। एतस्मिन्नंतरे प्राप्तस्तत्र हंतुं वने मृगान्
sūta uvāca| ānarttādhipatirbhūpaścamatkāra iti smṛtaḥ| etasminnaṁtare prāptastatra haṁtuṁ vane mṛgān
सूत जी ने कहा — इसी बीच आनर्त देश के राजा, जो चमत्कार नाम से स्मरण किए जाते थे, मृगों का शिकार करने के लिए वन में वहाँ आ पहुँचे।
श्लोक 2 (skanda.6.10.2)
स ददर्श मृगीं दूरान्निश्चलांगीं तरोरधः। स्तनं सुताय यच्छंतीं विश्वस्तामकुतोभयाम्
sa dadarśa mṛgīṁ dūrānniścalāṁgīṁ taroradhaḥ| stanaṁ sutāya yacchaṁtīṁ viśvastāmakutobhayām
उन्होंने दूर से एक वृक्ष के नीचे स्थिर खड़ी, अपने बच्चे को स्तनपान कराती हुई, निर्भय और विश्वस्त एक हिरणी देखी।
श्लोक 3 (skanda.6.10.3)
अथ तां पार्थिवस्तूर्णं शरेणानतपर्वणा। जघानाकर्णकृष्टेन मर्मस्थाने प्रहर्षितः
atha tāṁ pārthivastūrṇaṁ śareṇānataparvaṇā| jaghānākarṇakṛṣṭena marmasthāne praharṣitaḥ
तब राजा ने प्रसन्न होकर कान तक खींचे हुए धनुष से एक अनतपर्व बाण से शीघ्र उसके मर्मस्थान पर प्रहार किया।
श्लोक 4 (skanda.6.10.4)
सहसा सा हता तेन गार्द्ध्रपत्रेण पत्रिणा। दिशो विलोकयामास समंताद्व्यथयार्दिता
sahasā sā hatā tena gārddhrapatreṇa patriṇā| diśo vilokayāmāsa samaṁtādvyathayārditā
उस गिद्ध-पंखयुक्त बाण से आहत होकर वह पीड़ा से व्याकुल होकर चारों दिशाओं में देखने लगी।
श्लोक 5 (skanda.6.10.5)
अथ दृष्ट्वा महीपालं नातिदूरे धनुर्धरम्। प्रोवाचाश्रुपरिक्लिन्नवदना सुतवत्सला
atha dṛṣṭvā mahīpālaṁ nātidūre dhanurdharam| provācāśrupariklinnavadanā sutavatsalā
फिर पास ही धनुर्धारी राजा को देखकर, पुत्रस्नेह से भरी वह हिरणी अश्रुओं से भीगे मुख से बोली।
श्लोक 6 (skanda.6.10.6)
मृग्युवाच। अयुक्तं पृथिवीपाल यत्त्वयैतदनुष्ठितम्। हताऽहं बालवत्साऽद्य शरेणानतपर्वणा
mṛgyuvāca| ayuktaṁ pṛthivīpāla yattvayaitadanuṣṭhitam| hatā'haṁ bālavatsā'dya śareṇānataparvaṇā
हिरणी ने कहा — हे राजन्! जो आपने किया है, वह अनुचित है। मैं एक शिशु की माँ हूँ, और आज आपके अनतपर्व बाण से आहत हुई हूँ।
श्लोक 7 (skanda.6.10.7)
नाऽहं शोचामि भूपाल मरणं स्वशरीरगम्। यथेमं वालकं दीनं क्षीरास्वादनलंपटम्
nā'haṁ śocāmi bhūpāla maraṇaṁ svaśarīragam| yathemaṁ vālakaṁ dīnaṁ kṣīrāsvādanalaṁpaṭam
हे राजन्! मुझे अपने शरीर की मृत्यु का इतना शोक नहीं है, जितना दूध पीने के लोभी इस दीन बालक का शोक है।
श्लोक 8 (skanda.6.10.8)
यस्मात्त्वयेदृशं कर्म निर्दयं समनुष्ठितम्। कुष्ठव्याधिसमायुक्तस्तस्मात्सद्यो भविष्यसि
yasmāttvayedṛśaṁ karma nirdayaṁ samanuṣṭhitam| kuṣṭhavyādhisamāyuktastasmātsadyo bhaviṣyasi
चूँकि आपने ऐसा निर्दय कर्म किया है, इसलिए आप तत्काल कुष्ठ रोग से युक्त हो जाएँगे।
श्लोक 9 (skanda.6.10.9)
राजोवाच। स्वधर्म एष भूपानां कुर्वंति मृगसंक्षयम्। तस्मात्स्वधर्मसंयुक्तं न मां त्वं शप्तुमर्हसि
rājovāca| svadharma eṣa bhūpānāṁ kurvaṁti mṛgasaṁkṣayam| tasmātsvadharmasaṁyuktaṁ na māṁ tvaṁ śaptumarhasi
राजा ने कहा — मृगों का वध करना राजाओं का स्वधर्म है; अतः स्वधर्म के अनुसार आचरण करने वाले मुझे शाप देना उचित नहीं है।
श्लोक 10 (skanda.6.10.10)
मृग्युवाच। सत्यमेतन्महीपाल यत्त्वया परिकीर्तितम्। क्षत्त्रियाणां वधार्थाय मृगाः सृष्टाः स्वयंभुवा
mṛgyuvāca| satyametanmahīpāla yattvayā parikīrtitam| kṣattriyāṇāṁ vadhārthāya mṛgāḥ sṛṣṭāḥ svayaṁbhuvā
हिरणी ने कहा — हे राजन्! आपने जो कहा वह सत्य है; स्वयंभू ब्रह्मा ने क्षत्रियों के वध हेतु ही मृगों की सृष्टि की है।
श्लोक 11 (skanda.6.10.11)
परं तेन विधिस्तेषांकृतो यस्तं महीपते। शृणुष्वाऽवहितो भूत्वा वदंत्या मम सांप्रतम्
paraṁ tena vidhisteṣāṁkṛto yastaṁ mahīpate| śṛṇuṣvā'vahito bhūtvā vadaṁtyā mama sāṁpratam
किंतु हे राजन्! उन्होंने जो विधि उनके लिए बनाई है, अब मेरे कहने पर सावधान होकर उसे सुनिए।
श्लोक 12 (skanda.6.10.12)
सुप्तं मैथुनसंयुक्तं स्तनपानक्रियोद्यतम्। हत्वा मृगं जलासक्तं नरः पापेन लिप्यते
suptaṁ maithunasaṁyuktaṁ stanapānakriyodyatam| hatvā mṛgaṁ jalāsaktaṁ naraḥ pāpena lipyate
सोए हुए, मैथुनरत, स्तनपान कराते हुए अथवा जल पीने में लगे मृग को मारने वाला मनुष्य पाप से लिप्त होता है।
श्लोक 13 (skanda.6.10.13)
एतस्मात्कारणाच्छापस्तव दत्तो मया नृप। न कामतो न मृत्योर्वा सत्येनात्मानमालभे
etasmātkāraṇācchāpastava datto mayā nṛpa| na kāmato na mṛtyorvā satyenātmānamālabhe
हे राजन्! इसी कारण मैंने आपको शाप दिया है, न तो इच्छा से और न मृत्युभय से; अपनी सत्यता की शपथ से मैं यह कहती हूँ।
श्लोक 14 (skanda.6.10.14)
एवमुक्त्वा मृगी प्राणान्सा मुमोच व्यथान्विता। कुष्ठव्याधिसमायुक्तः सोऽपि राजा बभूव ह
evamuktvā mṛgī prāṇānsā mumoca vyathānvitā| kuṣṭhavyādhisamāyuktaḥ so'pi rājā babhūva ha
ऐसा कहकर पीड़ा से व्याकुल उस हिरणी ने प्राण त्याग दिए, और वह राजा भी कुष्ठ रोग से युक्त हो गया।
श्लोक 15 (skanda.6.10.15)
स दृष्ट्वा कुष्ठसंयुक्तं पार्थिवः स्वं कलेवरम्। ततः स्वान्सेवकानाह समाहूय सुदुःखितः
sa dṛṣṭvā kuṣṭhasaṁyuktaṁ pārthivaḥ svaṁ kalevaram| tataḥ svānsevakānāha samāhūya suduḥkhitaḥ
अपने कुष्ठग्रस्त शरीर को देखकर वह राजा अत्यंत दुःखी हुआ, और अपने सेवकों को बुलाकर उनसे कहा।
श्लोक 16 (skanda.6.10.16)
अहं तपश्चरिष्यामि पूजयिष्यामि शंकरम्। तावद्यावत्प्रणाशो मे कुष्ठव्याधेर्भविष्यति
ahaṁ tapaścariṣyāmi pūjayiṣyāmi śaṁkaram| tāvadyāvatpraṇāśo me kuṣṭhavyādherbhaviṣyati
मैं तब तक तपस्या करूँगा और शंकर की पूजा करूँगा, जब तक मेरा यह कुष्ठ रोग पूर्णतः नष्ट न हो जाए।
श्लोक 17 (skanda.6.10.17)
यत्किंचित्त्रिषु लोकेषु प्रार्थयंति नराः सुखम्। तत्सर्वं तपसा साध्यं तस्मात्कार्यं मया तपः
yatkiṁcittriṣu lokeṣu prārthayaṁti narāḥ sukham| tatsarvaṁ tapasā sādhyaṁ tasmātkāryaṁ mayā tapaḥ
मनुष्य तीनों लोकों में जो भी सुख चाहते हैं, वह सब तपस्या से ही साध्य है; अतः मुझे तप करना चाहिए।
श्लोक 18 (skanda.6.10.18)
अधुनैकोऽहमैकाहमेकैकस्मिन्वनस्पतौ। चरन्भैक्षं तु नियमैश्चरिष्यामि धरातले
adhunaiko'hamaikāhamekaikasminvanaspatau| caranbhaikṣaṁ tu niyamaiścariṣyāmi dharātale
अब मैं अकेला, प्रतिदिन एक-एक वृक्ष के नीचे रहते हुए, नियमों का पालन करते हुए इस पृथ्वी पर भिक्षाटन करूँगा।
श्लोक 19 (skanda.6.10.19)
पांसुना समवच्छन्ने शून्यागारे प्रतिश्रयः। वृक्षमूलनिकेते वा मुक्तसर्वप्रियाप्रियः
pāṁsunā samavacchanne śūnyāgāre pratiśrayaḥ| vṛkṣamūlanikete vā muktasarvapriyāpriyaḥ
धूल से आच्छादित शून्य घर में या वृक्ष की जड़ में निवास करते हुए, समस्त प्रिय-अप्रिय भावों से मुक्त होकर —
श्लोक 20 (skanda.6.10.20)
समः शत्रुषु मित्रेषु समलोष्टाश्मकांचनः। भूत्वा कालं नयिष्यामि यावत्कालस्य संस्थितिः
samaḥ śatruṣu mitreṣu samaloṣṭāśmakāṁcanaḥ| bhūtvā kālaṁ nayiṣyāmi yāvatkālasya saṁsthitiḥ
— शत्रु और मित्र में समभाव रखते हुए, मिट्टी के ढेले, पत्थर और स्वर्ण को समान मानते हुए, जब तक काल की स्थिति रहेगी, तब तक समय व्यतीत करूँगा।
श्लोक 21 (skanda.6.10.21)
एवं तान्सेवकान्भूपः सोऽभिधाय विसृज्य च। तीर्थयात्रा परो भूत्वा बभ्राम वसुधातले
evaṁ tānsevakānbhūpaḥ so'bhidhāya visṛjya ca| tīrthayātrā paro bhūtvā babhrāma vasudhātale
इस प्रकार उन सेवकों से कहकर तथा उन्हें विदा कर, वह राजा तीर्थयात्रा में तत्पर होकर पृथ्वी पर भ्रमण करने लगा।
श्लोक 22 (skanda.6.10.22)
ततः कालेन महता प्राप्य विप्रसमुद्भवम्। उपदेशं नृपः प्राप्तः शंखतीर्थं महोदयम्
tataḥ kālena mahatā prāpya viprasamudbhavam| upadeśaṁ nṛpaḥ prāptaḥ śaṁkhatīrthaṁ mahodayam
फिर बहुत काल बीतने पर एक ब्राह्मण से उपदेश पाकर राजा उस परम शुभ शंखतीर्थ में पहुँचा।
श्लोक 23 (skanda.6.10.23)
हाटकेश्वरजे क्षेत्रे सर्वव्याधिविनाशकम्। विख्यातं त्रिषु लोकेषु पूरितं स्वच्छवारिणा
hāṭakeśvaraje kṣetre sarvavyādhivināśakam| vikhyātaṁ triṣu lokeṣu pūritaṁ svacchavāriṇā
यह तीर्थ हाटकेश्वर क्षेत्र में स्थित, समस्त रोगों का नाश करने वाला, तीनों लोकों में विख्यात, तथा स्वच्छ जल से भरा हुआ है।
श्लोक 24 (skanda.6.10.24)
तत्राऽसौ स्नानमात्रेण तत्क्षणात्पार्थिवोतमः। कुष्ठव्याधिवि निर्मुक्तः संजातः सुमहाद्युतिः
tatrā'sau snānamātreṇa tatkṣaṇātpārthivotamaḥ| kuṣṭhavyādhivi nirmuktaḥ saṁjātaḥ sumahādyutiḥ
वहाँ स्नान करते ही वह श्रेष्ठ राजा तत्क्षण कुष्ठ रोग से मुक्त हो गया और अत्यंत तेजस्वी हो गया।