नागर खण्ड · अध्याय 9
नागबिल-पूर्ति वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.9.1)
सूत उवाच। अथ शक्रः समाहूय प्रोचे संवर्तकानिलम्। हाटकेश्वरजेक्षेत्रे महान्नागबिलोऽस्ति वै
sūta uvāca| atha śakraḥ samāhūya proce saṁvartakānilam| hāṭakeśvarajekṣetre mahānnāgabilo'sti vai
सूत जी ने कहा — तब इंद्र ने संवर्तक वायु को बुलाकर कहा — हाटकेश्वर क्षेत्र में एक विशाल नागबिल है।
श्लोक 2 (skanda.6.9.2)
तं पूरय ममादेशाद्द्रुतं गत्वाऽभिपांसुभिः। येन न स्याद्गतिस्तत्र कस्यचिन्मृत्युधर्मिणः
taṁ pūraya mamādeśāddrutaṁ gatvā'bhipāṁsubhiḥ| yena na syādgatistatra kasyacinmṛtyudharmiṇaḥ
मेरे आदेश से शीघ्र वहाँ जाकर धूल से उसे भर दो, जिससे किसी भी मरणधर्मा प्राणी को वहाँ जाने का मार्ग न मिले।
श्लोक 3 (skanda.6.9.3)
वायुरुवाच। तवादेशान्मया पूर्वं पूरितो विवरो यदा। लिंगोद्भवस्तदा शापः प्रदत्तो मे पुरारिणा
vāyuruvāca| tavādeśānmayā pūrvaṁ pūrito vivaro yadā| liṁgodbhavastadā śāpaḥ pradatto me purāriṇā
वायु ने कहा — जब मैंने पहले आपके आदेश से लिंग की उत्पत्ति के समय वह बिल भरा था, तब त्रिपुरारि ने मुझे शाप दे दिया था।
श्लोक 4 (skanda.6.9.4)
यस्माल्लिंगं ममैतद्वै त्वया पांसुभिरावृतम्। तस्मात्समानधर्मा त्वं गन्धवाहो भविष्यसि
yasmālliṁgaṁ mamaitadvai tvayā pāṁsubhirāvṛtam| tasmātsamānadharmā tvaṁ gandhavāho bhaviṣyasi
उन्होंने कहा — चूँकि तूने मेरे इस लिंग को धूल से ढक दिया है, अतः हे गंधवाहक! तेरा स्वभाव भी उसी के अनुरूप होगा।
श्लोक 5 (skanda.6.9.5)
यद्वत्कर्पूरजं गन्धं समग्रं त्वं हि वक्ष्यसि। अमेध्यसंभवं तद्वन्मम वाक्यादसंशयम्
yadvatkarpūrajaṁ gandhaṁ samagraṁ tvaṁ hi vakṣyasi| amedhyasaṁbhavaṁ tadvanmama vākyādasaṁśayam
जैसे तू कपूर की सम्पूर्ण सुगंध ले जाएगा, वैसे ही मेरे वचन से अशुद्ध वस्तु से उत्पन्न दुर्गंध भी निःसंदेह ले जाएगा।
श्लोक 6 (skanda.6.9.6)
तस्मात्कुरु प्रसादं मे विदित्वैतत्सुरेश्वर। कृत्येऽस्मिन्स्म र्यतामन्यस्त्रिपुरारेर्बिभेम्यहम्
tasmātkuru prasādaṁ me viditvaitatsureśvara| kṛtye'sminsma ryatāmanyastripurārerbibhemyaham
अतः हे सुरेश्वर! यह जानकर मुझ पर कृपा कीजिए; इस कार्य के लिए किसी अन्य को याद कीजिए — मैं त्रिपुरारि से डरता हूँ।
श्लोक 7 (skanda.6.9.7)
ततः संचिंतयामास पूरणं त्रिदशाधिपः। तस्य नागबिलस्यैव नैव किंचिदवैक्षत
tataḥ saṁciṁtayāmāsa pūraṇaṁ tridaśādhipaḥ| tasya nāgabilasyaiva naiva kiṁcidavaikṣata
तब देवराज ने उस नागबिल को भरने का उपाय सोचा, किंतु कुछ भी उपाय न देखा।
श्लोक 8 (skanda.6.9.8)
ततस्तं प्राह देवेज्यःस्वय मेव शतक्रतुम्। कस्मात्त्वं व्याकुलीभूतः कृत्येऽस्मिंस्त्रिदशाधिप
tatastaṁ prāha devejyaḥsvaya meva śatakratum| kasmāttvaṁ vyākulībhūtaḥ kṛtye'smiṁstridaśādhipa
तब देवगुरु (बृहस्पति) ने स्वयं इंद्र से कहा — हे त्रिदशाधिप! आप इस कार्य में क्यों व्याकुल हो रहे हैं?
श्लोक 9 (skanda.6.9.9)
अस्ति पर्वतमुख्योऽत्र नाम्ना ख्यातो हिमालयः। तस्य पुत्रत्रयं जातं तच्च शक्र शृणुष्व मे
asti parvatamukhyo'tra nāmnā khyāto himālayaḥ| tasya putratrayaṁ jātaṁ tacca śakra śṛṇuṣva me
यहाँ हिमालय नाम से प्रसिद्ध श्रेष्ठ पर्वत है, जिसके तीन पुत्र हुए; हे इंद्र! उसे मुझसे सुनिए।
श्लोक 10 (skanda.6.9.10)
मैनाकः प्रथमः प्रोक्तो द्वितीयो नंदिवर्धनः। रक्तशृंगस्तृतीयस्तु पर्वतः परिकीर्तितः
mainākaḥ prathamaḥ prokto dvitīyo naṁdivardhanaḥ| raktaśṛṁgastṛtīyastu parvataḥ parikīrtitaḥ
प्रथम मैनाक कहा गया, द्वितीय नंदिवर्धन, तथा तीसरा रक्तशृंग नामक पर्वत प्रसिद्ध है।
श्लोक 11 (skanda.6.9.11)
स मैनाकः समुद्रांतः प्रविष्टः शक्र ते भयात्। पक्षाभ्यां सहितोऽद्यापि स तत्रैव व्यवस्थितः
sa mainākaḥ samudrāṁtaḥ praviṣṭaḥ śakra te bhayāt| pakṣābhyāṁ sahito'dyāpi sa tatraiva vyavasthitaḥ
हे इंद्र! वह मैनाक आपके भय से समुद्र के भीतर घुस गया और आज भी अपने दोनों पंखों सहित वहीं स्थित है।
श्लोक 12 (skanda.6.9.12)
नंदिवर्धन इत्येष द्वितीयः परिकीर्तितः। वसिष्ठाश्रमजो रन्ध्रस्ते न कृत्स्नः प्रपूरितः
naṁdivardhana ityeṣa dvitīyaḥ parikīrtitaḥ| vasiṣṭhāśramajo randhraste na kṛtsnaḥ prapūritaḥ
यह नंदिवर्धन नामक दूसरा पुत्र प्रसिद्ध है; वसिष्ठ के आश्रम में उत्पन्न हुए छिद्र को उसने पूर्णतः नहीं भरा।
श्लोक 13 (skanda.6.9.13)
हिमाचलसमादेशाद्वसिष्ठस्य च सन्मुनेः। देवभूमिं परित्यज्य स गतस्तत्र सत्वरम्
himācalasamādeśādvasiṣṭhasya ca sanmuneḥ| devabhūmiṁ parityajya sa gatastatra satvaram
हिमाचल और सन्मुनि वसिष्ठ के आदेश से वह देवभूमि छोड़कर शीघ्र ही वहाँ चला गया।
श्लोक 14 (skanda.6.9.14)
तृतीयस्तिष्ठतेऽद्यापि रक्तशृंगः स्मृतोऽत्र यः। तमानय सहस्राक्ष बिलं सार्पं प्रपूरय
tṛtīyastiṣṭhate'dyāpi raktaśṛṁgaḥ smṛto'tra yaḥ| tamānaya sahasrākṣa bilaṁ sārpaṁ prapūraya
तीसरा, जो रक्तशृंग नाम से स्मरण किया जाता है, आज भी यहाँ है; हे सहस्राक्ष! उसे लाकर सर्पों के इस बिल को भरवाइए।
श्लोक 15 (skanda.6.9.15)
नान्यथा पूरितुं शक्यो बिलोऽयं त्रिदशाधिप। तं मुक्त्वा पर्वत श्रेष्ठं सत्यमेतन्मयोदितम्
nānyathā pūrituṁ śakyo bilo'yaṁ tridaśādhipa| taṁ muktvā parvata śreṣṭhaṁ satyametanmayoditam
हे त्रिदशाधिप! उस श्रेष्ठ पर्वत के अतिरिक्त यह बिल किसी अन्य उपाय से नहीं भरा जा सकता — यह मैं सत्य कहता हूँ।
श्लोक 16 (skanda.6.9.16)
सूत उवाच। तच्छ्रुत्वा देवपूज्यस्य वचनं त्रिदशाधिपः। जगाम सत्वरं तत्र स यत्रास्ते हिमालयः
sūta uvāca| tacchrutvā devapūjyasya vacanaṁ tridaśādhipaḥ| jagāma satvaraṁ tatra sa yatrāste himālayaḥ
सूत जी ने कहा — देवगुरु का यह वचन सुनकर इंद्र शीघ्र ही वहाँ गए, जहाँ हिमालय थे।
श्लोक 17 (skanda.6.9.17)
ततः प्रोवाच तं गत्वा सामपूर्वमिदं वचः। हिमाचलं गिरिश्रेष्ठं सिद्धचारणसेवितम्
tataḥ provāca taṁ gatvā sāmapūrvamidaṁ vacaḥ| himācalaṁ giriśreṣṭhaṁ siddhacāraṇasevitam
फिर सिद्धों और चारणों से सेवित उस श्रेष्ठ गिरि हिमाचल के पास जाकर उन्होंने मीठे वचनों में यह कहा।
श्लोक 18 (skanda.6.9.18)
इन्द्र उवाच। हाटकेश्वरजे क्षेत्रे महान्नागबिलः स्थितः। तेन गत्वा नरा देवं पाताले हाटकेश्वरम्
indra uvāca| hāṭakeśvaraje kṣetre mahānnāgabilaḥ sthitaḥ| tena gatvā narā devaṁ pātāle hāṭakeśvaram
इंद्र ने कहा — हाटकेश्वर क्षेत्र में एक विशाल नागबिल है, जिससे होकर मनुष्य पाताल में देव हाटकेश्वर के पास जाते हैं।
श्लोक 19 (skanda.6.9.19)
पूजयिष्यंति ये केचिदपि पापपरायणाः। मया सार्धं करिष्यंति ततः स्पर्द्धां नगोत्तम
pūjayiṣyaṁti ye kecidapi pāpaparāyaṇāḥ| mayā sārdhaṁ kariṣyaṁti tataḥ sparddhāṁ nagottama
हे नगोत्तम! जो कोई भी पापपरायण मनुष्य वहाँ पूजा करेगा, वह मेरे साथ स्पर्धा करने लगेगा।
श्लोक 20 (skanda.6.9.20)
तस्मात्पुत्रमिमं तत्र रक्तशृंगं हिमालय। प्रेषयस्व बिलो येन पूर्यते सोऽहिसंभवः
tasmātputramimaṁ tatra raktaśṛṁgaṁ himālaya| preṣayasva bilo yena pūryate so'hisaṁbhavaḥ
हे हिमालय! अतः अपने इस पुत्र रक्तशृंग को वहाँ भेजिए, जिससे नागों का यह बिल भर जाए।
श्लोक 21 (skanda.6.9.21)
कुरुष्व त्वं ममातिथ्यं गृहप्राप्तस्य पर्वत। आत्मपुत्रप्रदानेन कीर्तिं प्राप्स्यस्यलौकिकीम्
kuruṣva tvaṁ mamātithyaṁ gṛhaprāptasya parvata| ātmaputrapradānena kīrtiṁ prāpsyasyalaukikīm
हे पर्वत! घर आए मेरा आतिथ्य कीजिए; अपने पुत्र को देने से आप अलौकिक कीर्ति प्राप्त करेंगे।
श्लोक 22 (skanda.6.9.22)
बाढमित्येव सोऽप्युक्त्वा पूजयित्वा च देवपम्। ततः प्रोवाच तं पुत्रं रक्तशृंगं हिमालयः
bāḍhamityeva so'pyuktvā pūjayitvā ca devapam| tataḥ provāca taṁ putraṁ raktaśṛṁgaṁ himālayaḥ
"अच्छा" कहकर तथा देवाधिप की पूजा कर हिमालय ने अपने पुत्र रक्तशृंग से कहा।
श्लोक 23 (skanda.6.9.23)
तवार्थाय सहस्राक्षः पुत्र प्राप्तो ममांतिकम्। तस्माद्गच्छ द्रुतं तत्र यत्र नागबिलः स्थितः
tavārthāya sahasrākṣaḥ putra prāpto mamāṁtikam| tasmādgaccha drutaṁ tatra yatra nāgabilaḥ sthitaḥ
हे पुत्र! सहस्राक्ष तुम्हारे लिए मेरे पास आए हैं; अतः शीघ्र वहाँ जाओ, जहाँ नागबिल स्थित है।
श्लोक 24 (skanda.6.9.24)
पूरयित्वा ममादेशात्तं त्वं शक्रस्य कृत्स्नशः। सुखी भव सहानेन तथान्यैः सुरसत्तमैः
pūrayitvā mamādeśāttaṁ tvaṁ śakrasya kṛtsnaśaḥ| sukhī bhava sahānena tathānyaiḥ surasattamaiḥ
मेरे आदेश से इंद्र के लिए उसे पूर्णतः भरकर, इनके तथा अन्य श्रेष्ठ देवताओं के साथ सुखी रहो।
श्लोक 25 (skanda.6.9.25)
रक्तशृंग उवाच। नाहं तत्र गमिष्यामि मर्त्य भूमौ कथंचन। यत्र कण्टकिनो वृक्षा रूक्षाः फलविवर्जिताः
raktaśṛṁga uvāca| nāhaṁ tatra gamiṣyāmi martya bhūmau kathaṁcana| yatra kaṇṭakino vṛkṣā rūkṣāḥ phalavivarjitāḥ
रक्तशृंग ने कहा — मैं उस मृत्युलोक में किसी भी प्रकार नहीं जाऊँगा, जहाँ काँटेदार, रूखे, फलरहित वृक्ष हैं —
श्लोक 26 (skanda.6.9.26)
न सिद्धा न च गंधर्वा न देवा न च किंनराः। न च तीर्थानि रम्याणि न नद्यो विमलोदकाः
na siddhā na ca gaṁdharvā na devā na ca kiṁnarāḥ| na ca tīrthāni ramyāṇi na nadyo vimalodakāḥ
— जहाँ न सिद्ध हैं, न गंधर्व, न देवता, न किन्नर; न रमणीय तीर्थ हैं, न निर्मल जल वाली नदियाँ।
श्लोक 27 (skanda.6.9.27)
तथा पापसमाचारा मनुष्याः शीलवर्जिताः। दुष्टचित्ताः सदा सर्वे तिर्यग्योनिगता अपि
tathā pāpasamācārā manuṣyāḥ śīlavarjitāḥ| duṣṭacittāḥ sadā sarve tiryagyonigatā api
तथा वहाँ के मनुष्य पापाचारी, शीलरहित हैं, और तिर्यग्योनि में जन्मे प्राणी भी सदा दुष्टचित्त होते हैं।
श्लोक 28 (skanda.6.9.28)
तथा मम नगश्रेष्ठ पक्षौ द्वावपि कर्तितौ। शक्रेण तेन नो शक्तिर्गंतुमस्ति कथंचन
tathā mama nagaśreṣṭha pakṣau dvāvapi kartitau| śakreṇa tena no śaktirgaṁtumasti kathaṁcana
हे नगश्रेष्ठ! उसी इंद्र ने मेरे दोनों पंख काट दिए थे; अतः मुझमें कहीं भी जाने की शक्ति नहीं है।
श्लोक 29 (skanda.6.9.29)
तस्मात्कंचित्सहस्राक्ष उपायं तत्कृते परम्। चिंतयत्वेव मां मुक्त्वा सत्यमेतन्मयोदितम्
tasmātkaṁcitsahasrākṣa upāyaṁ tatkṛte param| ciṁtayatveva māṁ muktvā satyametanmayoditam
अतः हे सहस्राक्ष! मुझे छोड़कर इस कार्य के लिए कोई अन्य उपाय ही सोचिए — यह मैं सत्य कहता हूँ।
श्लोक 30 (skanda.6.9.30)
शक्र उवाच। अह त्वां तत्र नेष्यामि स्वहस्तेन विदारितम्। तत्रापि सुशुभा वृक्षा भविष्यंति तवाश्रयाः
śakra uvāca| aha tvāṁ tatra neṣyāmi svahastena vidāritam| tatrāpi suśubhā vṛkṣā bhaviṣyaṁti tavāśrayāḥ
इंद्र ने कहा — मैं स्वयं अपने हाथों से तुम्हारे पंख जोड़कर तुम्हें वहाँ ले चलूँगा; वहाँ भी सुशोभित वृक्ष तुम्हारे आश्रय बनेंगे।
श्लोक 31 (skanda.6.9.31)
तथा पुण्यानि तीर्थानि देवतायतनानि च। समंतात्ते भविष्यंति मुनीनामाश्रमास्तथा
tathā puṇyāni tīrthāni devatāyatanāni ca| samaṁtātte bhaviṣyaṁti munīnāmāśramāstathā
पवित्र तीर्थ, देवमंदिर तथा मुनियों के आश्रम भी तुम्हारे चारों ओर होंगे।
श्लोक 32 (skanda.6.9.32)
अत्रस्थस्य प्रभावो यस्तव पर्वत नंदन। मद्वाक्यात्तत्र संस्थस्य कोटिसंख्यो भविष्यति
atrasthasya prabhāvo yastava parvata naṁdana| madvākyāttatra saṁsthasya koṭisaṁkhyo bhaviṣyati
हे पर्वतनंदन! यहाँ रहने से जो तुम्हारा प्रभाव है, मेरे वचन से वहाँ स्थित होने पर वह करोड़ों गुना हो जाएगा।
श्लोक 33 (skanda.6.9.33)
तथा ये मानवास्तत्र पापात्मानोऽपि भूतले। विपाप्मानो भविष्यंति सहसा तव दर्शनात्
tathā ye mānavāstatra pāpātmāno'pi bhūtale| vipāpmāno bhaviṣyaṁti sahasā tava darśanāt
उस पृथ्वी पर जो मनुष्य पापी भी होंगे, वे भी तुम्हारे दर्शन मात्र से तत्काल निष्पाप हो जाएँगे।
श्लोक 34 (skanda.6.9.34)
तस्माद्गच्छ द्रुतं तत्र मया सार्धं नगात्मज। न चेद्वज्रप्रहारेण करिष्यामि सहस्रधा
tasmādgaccha drutaṁ tatra mayā sārdhaṁ nagātmaja| na cedvajraprahāreṇa kariṣyāmi sahasradhā
हे नगात्मज! अतः मेरे साथ शीघ्र वहाँ चलो, अन्यथा वज्र के प्रहार से मैं तुम्हारे हजार टुकड़े कर दूँगा।
श्लोक 35 (skanda.6.9.35)
सूत उवाच। तस्य तद्वचनं श्रुत्वा रक्तशृंगो भयान्वितः। प्रविष्टः सहसागत्य तस्मिन्नागबिले गतः
sūta uvāca| tasya tadvacanaṁ śrutvā raktaśṛṁgo bhayānvitaḥ| praviṣṭaḥ sahasāgatya tasminnāgabile gataḥ
सूत जी ने कहा — उनका यह वचन सुनकर भयभीत रक्तशृंग तुरंत आकर उस नागबिल में प्रविष्ट हो गया।
श्लोक 36 (skanda.6.9.36)
निमग्नो ब्राह्मणश्रेष्ठा नासाग्रं यावदेव हि। शृंगैर्मनोरमैस्तुं गैः समग्रैः सहितस्तदा। वृक्षगुल्मलताकीर्णै रम्यपक्षिनिषेवितैः
nimagno brāhmaṇaśreṣṭhā nāsāgraṁ yāvadeva hi| śṛṁgairmanoramaistuṁ gaiḥ samagraiḥ sahitastadā| vṛkṣagulmalatākīrṇai ramyapakṣiniṣevitaiḥ
हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! वह अपने शिखर के अग्रभाग तक ही शेष रहते हुए धँस गया, अपने सभी मनोहर, ऊँचे तथा वृक्ष-गुल्म-लताओं से आच्छादित, रमणीय पक्षियों से सेवित शिखरों सहित।
श्लोक 37 (skanda.6.9.37)
एवं संस्थाप्य तं शक्रो हिमाचलसुतं नगम्। ततः प्रोवाच सहृष्टो वरो मत्तः प्रगृह्यताम्
evaṁ saṁsthāpya taṁ śakro himācalasutaṁ nagam| tataḥ provāca sahṛṣṭo varo mattaḥ pragṛhyatām
इस प्रकार हिमाचलपुत्र उस पर्वत को स्थापित कर, इंद्र ने हर्षपूर्वक कहा — मुझसे वर माँगो।
श्लोक 38 (skanda.6.9.38)
रक्तशृंग उवाच। एष एव वरोऽस्माकं यत्त्वं तुष्टः सुरेश्वर। किं वरेण करिष्यामि त्वत्प्रसादादहं सुखी
raktaśṛṁga uvāca| eṣa eva varo'smākaṁ yattvaṁ tuṣṭaḥ sureśvara| kiṁ vareṇa kariṣyāmi tvatprasādādahaṁ sukhī
रक्तशृंग ने कहा — हे सुरेश्वर! आपका प्रसन्न होना ही हमारे लिए वर है। वर से मुझे क्या करना है? आपकी कृपा से मैं सुखी हूँ।
श्लोक 39 (skanda.6.9.39)
इन्द्र उवाच। न वृथा दर्शनं मे स्यादपि स्वप्ने नगात्मज। किं पुनर्दर्शने जाते कृते कृत्ये विशेषतः
indra uvāca| na vṛthā darśanaṁ me syādapi svapne nagātmaja| kiṁ punardarśane jāte kṛte kṛtye viśeṣataḥ
इंद्र ने कहा — हे नगात्मज! स्वप्न में भी मेरा दर्शन व्यर्थ नहीं जाना चाहिए, फिर विशेष कार्य संपन्न होने पर साक्षात् दर्शन तो और भी व्यर्थ न जाए।
श्लोक 40 (skanda.6.9.40)
रक्तशृंग उवाच। अवश्यं यदि देयो मे वरः सर्वसुराधिप। विभवो मे द्विजार्थाय सर्वः स्यात्सर्वदा विभो
raktaśṛṁga uvāca| avaśyaṁ yadi deyo me varaḥ sarvasurādhipa| vibhavo me dvijārthāya sarvaḥ syātsarvadā vibho
रक्तशृंग ने कहा — हे सर्वसुराधिप! यदि मुझे अवश्य ही वर देना है, तो हे विभो! मेरा सम्पूर्ण वैभव सदा ब्राह्मणों के हितार्थ हो।
श्लोक 41 (skanda.6.9.41)
इन्द्र उवाच। भविष्यति महीपालश्चमत्कार इति स्मृतः। तव मूर्धनि विप्रार्थं स पुरं स्थापयिष्यति
indra uvāca| bhaviṣyati mahīpālaścamatkāra iti smṛtaḥ| tava mūrdhani viprārthaṁ sa puraṁ sthāpayiṣyati
इंद्र ने कहा — चमत्कार नामक एक राजा होगा, जो ब्राह्मणों के हित के लिए तुम्हारे शिखर पर एक नगर स्थापित करेगा।
श्लोक 42 (skanda.6.9.42)
तत्र ब्राह्मणशार्दूला वेदवेदांगपारगाः। विभवं तव निःशेषं भजिष्यंति प्रहर्षिताः
tatra brāhmaṇaśārdūlā vedavedāṁgapāragāḥ| vibhavaṁ tava niḥśeṣaṁ bhajiṣyaṁti praharṣitāḥ
वहाँ वेद-वेदांगपारंगत श्रेष्ठ ब्राह्मण हर्षपूर्वक तुम्हारे सम्पूर्ण वैभव का उपभोग करेंगे।
श्लोक 43 (skanda.6.9.43)
तथाहं चैत्रमासस्य चतुर्दश्यां नगात्मज। कृष्णायां स्वयमागत्य शृंगे मुख्यतमे तव
tathāhaṁ caitramāsasya caturdaśyāṁ nagātmaja| kṛṣṇāyāṁ svayamāgatya śṛṁge mukhyatame tava
हे नगात्मज! और मैं स्वयं चैत्र मास की कृष्ण चतुर्दशी को तुम्हारे मुख्य शिखर पर स्वयं आकर —
श्लोक 44 (skanda.6.9.44)
पूजयिष्यामि देवेशं हाटकेश्वरसंज्ञितम्। सर्वैर्देवगणैः सार्धं तथा किंनरगुह्यकैः
pūjayiṣyāmi deveśaṁ hāṭakeśvarasaṁjñitam| sarvairdevagaṇaiḥ sārdhaṁ tathā kiṁnaraguhyakaiḥ
— समस्त देवगणों तथा किन्नरों और गुह्यकों सहित हाटकेश्वर नामक देवेश की पूजा करूँगा।
श्लोक 45 (skanda.6.9.45)
तमेकं दिवसं चात्र शृंगे तव हरः स्वयम्। अस्माभिः सहितस्तुष्टो निवासं प्रकरिष्यति
tamekaṁ divasaṁ cātra śṛṁge tava haraḥ svayam| asmābhiḥ sahitastuṣṭo nivāsaṁ prakariṣyati
उस एक दिन तुम्हारे उसी शिखर पर स्वयं हर, हम सबके साथ प्रसन्न होकर निवास करेंगे।
श्लोक 46 (skanda.6.9.46)
प्रभावस्तेन ते मुख्य स्त्रैलोक्येऽपि भविष्यति। स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि सांप्रतं त्रिदिवालयम्
prabhāvastena te mukhya strailokye'pi bhaviṣyati| svasti te'stu gamiṣyāmi sāṁprataṁ tridivālayam
इससे हे मुख्य! तीनों लोकों में भी तुम्हारा प्रभाव फैलेगा। तुम्हारा कल्याण हो; अब मैं स्वर्गलोक जाता हूँ।
श्लोक 47 (skanda.6.9.47)
सूत उवाच। एवमुक्त्वा सहस्राक्षस्ततः प्राप्तस्त्रिविष्टपम्। रक्तशृंगोऽपि तस्थौ च व्याप्य नागबिलं तदा
sūta uvāca| evamuktvā sahasrākṣastataḥ prāptastriviṣṭapam| raktaśṛṁgo'pi tasthau ca vyāpya nāgabilaṁ tadā
सूत जी ने कहा — ऐसा कहकर सहस्राक्ष इंद्र स्वर्ग को चले गए, और रक्तशृंग भी उस नागबिल को पूरी तरह भरकर वहीं स्थित हो गया।
श्लोक 48 (skanda.6.9.48)
तस्योपरि सुमुख्यानि तीर्थान्यायतनानि च। संजातानि मुनीनां च संजाताश्च तथाऽऽश्रमाः
tasyopari sumukhyāni tīrthānyāyatanāni ca| saṁjātāni munīnāṁ ca saṁjātāśca tathā''śramāḥ
उसके ऊपर उत्तम तीर्थ और देवालय उत्पन्न हुए, तथा मुनियों के आश्रम भी वहीं बन गए।