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नागर खण्ड · अध्याय 8

वृत्रवध वर्णन

अध्याय 7अध्याय-सूचीअध्याय 9

श्लोक 1 (skanda.6.8.1)

सूत उवाच। एवं स्वर्गमनुप्राप्ते त्रिशंकौ नृपसत्तमे। सशरीरे द्विजश्रेष्ठा विश्वामित्रसमुद्यमात्

sūta uvāca| evaṁ svargamanuprāpte triśaṁkau nṛpasattame| saśarīre dvijaśreṣṭhā viśvāmitrasamudyamāt

सूत जी ने कहा — हे श्रेष्ठ द्विजो! इस प्रकार विश्वामित्र के प्रयत्न से जब राजाओं में श्रेष्ठ त्रिशंकु सशरीर स्वर्ग को प्राप्त हो गए —

श्लोक 2 (skanda.6.8.2)

तत्तीर्थं ख्यातिमायातं समस्ते भुवनत्रये। ततःप्रसूति लोकानां धर्मकामार्थमोक्षदम्

tattīrthaṁ khyātimāyātaṁ samaste bhuvanatraye| tataḥprasūti lokānāṁ dharmakāmārthamokṣadam

— तब वह तीर्थ तीनों लोकों में प्रसिद्ध हो गया, और तब से लोगों को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देने वाला हो गया।

श्लोक 3 (skanda.6.8.3)

अस्पृष्टं कलिदोषेण तथान्यैरुपपातकैः। ब्रह्महत्यादिकैश्चैवत्रिपुरारेः प्रभावतः

aspṛṣṭaṁ kalidoṣeṇa tathānyairupapātakaiḥ| brahmahatyādikaiścaivatripurāreḥ prabhāvataḥ

त्रिपुरारि के प्रभाव से वह कलियुग के दोष से, अन्य उपपातकों से, तथा ब्रह्महत्या आदि पापों से भी अस्पृष्ट रहा।

श्लोक 4 (skanda.6.8.4)

यस्तत्र त्यजति प्राणाञ्छ्रद्धा युक्तेन चेतसा। स मोक्षमाप्नुयान्मर्त्यो यद्यपि स्यात्सुपापकृत्

yastatra tyajati prāṇāñchraddhā yuktena cetasā| sa mokṣamāpnuyānmartyo yadyapi syātsupāpakṛt

जो वहाँ श्रद्धायुक्त चित्त से प्राण त्यागता है, वह मनुष्य मोक्ष प्राप्त करता है, भले ही वह महापापी क्यों न हो।

श्लोक 5 (skanda.6.8.5)

कृमिपक्षिपतंगा ये पशवः पक्षिणो मृगाः। तेऽपि तत्र मृता यांति शिवलोकमसंशयम्

kṛmipakṣipataṁgā ye paśavaḥ pakṣiṇo mṛgāḥ| te'pi tatra mṛtā yāṁti śivalokamasaṁśayam

कीड़े, पक्षी, पतंगे, पशु और मृग भी वहाँ मरकर निःसंदेह शिवलोक को जाते हैं।

श्लोक 6 (skanda.6.8.6)

स्नानं ये तत्र कुर्वंति श्रद्धापूतेन चेतसा। त्रिशंकुरिव ते स्वर्गे प्रयांत्यपि विधर्मिणः

snānaṁ ye tatra kurvaṁti śraddhāpūtena cetasā| triśaṁkuriva te svarge prayāṁtyapi vidharmiṇaḥ

जो वहाँ श्रद्धापूत चित्त से स्नान करते हैं, वे धर्मभ्रष्ट होकर भी त्रिशंकु के समान स्वर्ग को जाते हैं।

श्लोक 7 (skanda.6.8.7)

घर्मार्त्ता वा तृषार्ता वा येऽवगाहंति तज्जलम्। तेऽपि यांति परं स्थानं यत्र देवो महेश्वरः

gharmārttā vā tṛṣārtā vā ye'vagāhaṁti tajjalam| te'pi yāṁti paraṁ sthānaṁ yatra devo maheśvaraḥ

गर्मी से पीड़ित हों या प्यास से, जो उस जल में अवगाहन करते हैं, वे भी उस परम स्थान को जाते हैं, जहाँ देव महेश्वर हैं।

श्लोक 8 (skanda.6.8.8)

विश्वामित्रोऽपि तद्दृष्ट्वा तीर्थमाहात्म्यमुत्तमम्। कुरुक्षेत्रं परित्यज्य तत्र वासमथाकरोत्

viśvāmitro'pi taddṛṣṭvā tīrthamāhātmyamuttamam| kurukṣetraṁ parityajya tatra vāsamathākarot

विश्वामित्र भी उस तीर्थ का उत्तम माहात्म्य देखकर कुरुक्षेत्र को छोड़कर वहीं निवास करने लगे।

श्लोक 9 (skanda.6.8.9)

तथान्ये मुनयः शांतास्त्यक्त्वा तीर्थानि दूरतः। तत्राश्रमपदं कृत्वा प्रयाताः परमं पदम्

tathānye munayaḥ śāṁtāstyaktvā tīrthāni dūrataḥ| tatrāśramapadaṁ kṛtvā prayātāḥ paramaṁ padam

अन्य शांत मुनि भी दूर के तीर्थों को छोड़कर वहीं आश्रम बनाकर परम पद को प्राप्त हुए।

श्लोक 10 (skanda.6.8.10)

तथैव मनुजाः सर्वे दूरादागत्य सत्वराः। तत्र स्नात्वा दिवं यांति कृत्वा पापशतान्यपि

tathaiva manujāḥ sarve dūrādāgatya satvarāḥ| tatra snātvā divaṁ yāṁti kṛtvā pāpaśatānyapi

इसी प्रकार सभी मनुष्य दूर से शीघ्रता से आकर वहाँ स्नान कर, सैकड़ों पाप किए होने पर भी स्वर्ग को जाते थे।

श्लोक 11 (skanda.6.8.11)

एवं तस्य प्रभावेण तीर्थस्य द्विजसत्तमाः। गच्छमानेषु लोकेषु सुखेन त्रिदिवालयम्

evaṁ tasya prabhāveṇa tīrthasya dvijasattamāḥ| gacchamāneṣu lokeṣu sukhena tridivālayam

हे श्रेष्ठ द्विजो! इस प्रकार उस तीर्थ के प्रभाव से लोग सुखपूर्वक स्वर्गलोक को जाने लगे।

श्लोक 12 (skanda.6.8.12)

अग्निष्टोमादिका सर्वाः समुच्छेदं गताः क्रियाः। न कश्चिद्यजते मर्त्यो न व्रतं कुरुते नरः

agniṣṭomādikā sarvāḥ samucchedaṁ gatāḥ kriyāḥ| na kaścidyajate martyo na vrataṁ kurute naraḥ

अग्निष्टोम आदि समस्त क्रियाएँ लुप्त हो गईं; न कोई मनुष्य यज्ञ करता था, न कोई व्रत करता था।

श्लोक 13 (skanda.6.8.13)

न यच्छति तथा दानं न च तीर्थं निषेवते। केवलं कुरुते स्नानं लिंगभेदे समाहितः

na yacchati tathā dānaṁ na ca tīrthaṁ niṣevate| kevalaṁ kurute snānaṁ liṁgabhede samāhitaḥ

न कोई दान देता था, न अन्य तीर्थों का सेवन करता था; केवल उसी लिंग के प्रति एकाग्र होकर स्नान करता था।

श्लोक 14 (skanda.6.8.14)

ततः प्रगच्छति स्वर्गं विमानवरमाश्रितः

tataḥ pragacchati svargaṁ vimānavaramāśritaḥ

— फिर वहाँ से उत्तम विमान पर बैठकर सीधे स्वर्ग को चला जाता था।

श्लोक 15 (skanda.6.8.15)

ततः प्रपूरिताः सर्वे स्वर्गलोका नरैर्द्विजाः। ब्रह्मविष्णुशिवेन्द्रादीन्स्पर्धमानैः सुरोत्तमान्

tataḥ prapūritāḥ sarve svargalokā narairdvijāḥ| brahmaviṣṇuśivendrādīnspardhamānaiḥ surottamān

हे द्विजो! इस प्रकार समस्त स्वर्गलोक ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इंद्र आदि श्रेष्ठ देवों से स्पर्धा करने वाले मनुष्यों से भर गए।

श्लोक 16 (skanda.6.8.16)

ततो देवगणाः सर्वे यज्ञभागविवर्जिताः। कृच्छ्रं परमनुप्राप्ता मन्त्रं चक्रुः परस्परम्

tato devagaṇāḥ sarve yajñabhāgavivarjitāḥ| kṛcchraṁ paramanuprāptā mantraṁ cakruḥ parasparam

तब यज्ञभाग से वंचित समस्त देवगण अत्यंत संकट में पड़कर परस्पर मंत्रणा करने लगे।

श्लोक 17 (skanda.6.8.17)

हाटकेश्वरमाहात्म्यात्स्वर्गलोकः प्रपूरितः। ऊर्ध्वबाहुभिराकीर्णः स्पर्धमानैः समंततः

hāṭakeśvaramāhātmyātsvargalokaḥ prapūritaḥ| ūrdhvabāhubhirākīrṇaḥ spardhamānaiḥ samaṁtataḥ

हाटकेश्वर के माहात्म्य से स्वर्गलोक भर गया है, चारों ओर भुजाएँ उठाए स्पर्धा करने वाले लोगों से पूर्ण हो गया है।

श्लोक 18 (skanda.6.8.18)

तस्मात्तत्क्रियतां कर्म येनोच्छेदं प्रगच्छति। तीर्थमेद्धरापृष्ठे हाटकेश्वरसंज्ञितम्

tasmāttatkriyatāṁ karma yenocchedaṁ pragacchati| tīrthameddharāpṛṣṭhe hāṭakeśvarasaṁjñitam

अतः वह कर्म किया जाए, जिससे पृथ्वी पर स्थित हाटकेश्वर नामक यह तीर्थ नष्ट हो जाए।

श्लोक 19 (skanda.6.8.19)

ततः संवर्तको वायुः शक्रादेशात्समंततः। तत्क्षेत्रं पूरयामास पांसुभिर्द्विजसत्तमाः

tataḥ saṁvartako vāyuḥ śakrādeśātsamaṁtataḥ| tatkṣetraṁ pūrayāmāsa pāṁsubhirdvijasattamāḥ

हे श्रेष्ठ द्विजो! तब इंद्र के आदेश से संवर्तक वायु ने उस क्षेत्र को चारों ओर से धूल से भर दिया।

श्लोक 20 (skanda.6.8.20)

एवं नाशमनुप्राप्ते तस्मिंस्तीर्थे स्थलोच्चये। जाते जाताः क्रियाः सर्वा भूयोऽपि क्रतुसंभवाः

evaṁ nāśamanuprāpte tasmiṁstīrthe sthaloccaye| jāte jātāḥ kriyāḥ sarvā bhūyo'pi kratusaṁbhavāḥ

इस प्रकार वह तीर्थ धूल के टीले में परिणत होकर नष्ट हो गया, और तब यज्ञ से उत्पन्न होने वाली समस्त क्रियाएँ पुनः प्रचलित हो गईं।

श्लोक 21 (skanda.6.8.21)

ततः कालेन महता वल्मीकः समपद्यत। तस्मिन्क्षेत्रे स पाताले संप्रयातः शनैःशनैः

tataḥ kālena mahatā valmīkaḥ samapadyata| tasminkṣetre sa pātāle saṁprayātaḥ śanaiḥśanaiḥ

फिर बहुत काल बीतने पर उस क्षेत्र में एक बाँबी बन गई, और वह धीरे-धीरे पाताल में उतरती गई।

श्लोक 22 (skanda.6.8.22)

अथ पातालतो नागास्तेन मार्गेण कौतुकात्। मर्त्यलोकं समायांति भ्रमंति च धरातले

atha pātālato nāgāstena mārgeṇa kautukāt| martyalokaṁ samāyāṁti bhramaṁti ca dharātale

तब पाताल से नाग उस मार्ग से कौतूहलवश मृत्युलोक में आते और पृथ्वी पर विचरण करते।

श्लोक 23 (skanda.6.8.23)

तत्र ते मानवान्भोगान्भुक्त्वा चैव यथेच्छया। पुनर्निर्यांति तेनैव मार्गेण निजमंदिरम्

tatra te mānavānbhogānbhuktvā caiva yathecchayā| punarniryāṁti tenaiva mārgeṇa nijamaṁdiram

वहाँ वे इच्छानुसार मानवीय भोगों को भोगकर, उसी मार्ग से पुनः अपने घर लौट जाते।

श्लोक 24 (skanda.6.8.24)

ततो नागबिलः ख्यातः स सर्वस्मिन्धरातले। गतागतेन नागानां स वल्मीको द्विजोत्तमाः

tato nāgabilaḥ khyātaḥ sa sarvasmindharātale| gatāgatena nāgānāṁ sa valmīko dvijottamāḥ

हे द्विजोत्तमो! तब नागों के आवागमन से वह बाँबी समस्त पृथ्वी पर "नागबिल" के नाम से प्रसिद्ध हो गई।

श्लोक 25 (skanda.6.8.25)

कस्यचित्त्वथ कालस्य भगवान्पाकशासनः। ब्रह्महत्यासमोपेतो निस्तेजाः समपद्यत

kasyacittvatha kālasya bhagavānpākaśāsanaḥ| brahmahatyāsamopeto nistejāḥ samapadyata

किसी समय भगवान पाकशासन (इंद्र) ब्रह्महत्या से युक्त होकर तेजोहीन हो गए।

श्लोक 26 (skanda.6.8.26)

ततः पितामहादेशं लब्ध्वा मार्गेण तेन सः। प्रविश्य चेक्षयामास पाताले हाट केश्वरम्

tataḥ pitāmahādeśaṁ labdhvā mārgeṇa tena saḥ| praviśya cekṣayāmāsa pātāle hāṭa keśvaram

तब पितामह का आदेश पाकर उन्होंने उसी मार्ग से प्रवेश कर पाताल में हाटकेश्वर का दर्शन किया।

श्लोक 27 (skanda.6.8.27)

अथाऽभूत्पापनिर्मुक्तस्तत्क्षणात्तस्य दर्शनात्। तेजसा च समायुक्तः पुनः प्राप त्रिविष्टपम्

athā'bhūtpāpanirmuktastatkṣaṇāttasya darśanāt| tejasā ca samāyuktaḥ punaḥ prāpa triviṣṭapam

उस दर्शन मात्र से वे तत्क्षण पापमुक्त हो गए, तथा पुनः तेजस्वी होकर स्वर्ग को प्राप्त हुए।

श्लोक 28 (skanda.6.8.28)

स दृष्ट्वा तत्प्रभावं तल्लिंगं देवस्य शूलिनः। हाटकेश्वरसंज्ञस्य भयं चक्रे नरोद्भवम्

sa dṛṣṭvā tatprabhāvaṁ talliṁgaṁ devasya śūlinaḥ| hāṭakeśvarasaṁjñasya bhayaṁ cakre narodbhavam

शूलधारी देव के उस हाटकेश्वर नामक लिंग का प्रभाव देखकर उन्हें मनुष्यों से भय उत्पन्न हो गया।

श्लोक 29 (skanda.6.8.29)

यदि कश्चित्पुमानत्र त्रिशंकुरिव भूपतिः। पूजयिष्यति तल्लिंगं विपाप्मा श्रद्धया सह

yadi kaścitpumānatra triśaṁkuriva bhūpatiḥ| pūjayiṣyati talliṁgaṁ vipāpmā śraddhayā saha

यदि यहाँ त्रिशंकु के समान कोई राजा निष्पाप होकर श्रद्धासहित उस लिंग की पूजा करे —

श्लोक 30 (skanda.6.8.30)

यापयिष्यति तन्नूनं मामस्मात्त्रिदशालयात्। तस्मात्संपूरयाम्येनं मार्गं पाता लसंभवम्

yāpayiṣyati tannūnaṁ māmasmāttridaśālayāt| tasmātsaṁpūrayāmyenaṁ mārgaṁ pātā lasaṁbhavam

— तो वह निश्चय ही मुझे इस देवलोक से बाहर निकाल देगा; अतः पाताल से आने वाले इस मार्ग को मैं भर देता हूँ।

श्लोक 31 (skanda.6.8.31)

ततश्च त्वरया युक्तो रक्तशृंगं नगोत्तमम्। प्रचिक्षेप बिले तस्मिन्स्वयमेव शतक्रतुः

tataśca tvarayā yukto raktaśṛṁgaṁ nagottamam| pracikṣepa bile tasminsvayameva śatakratuḥ

फिर शीघ्रता से इंद्र ने स्वयं ही श्रेष्ठ पर्वत रक्तशृंग को उस बिल में फेंक दिया।

श्लोक 32 (skanda.6.8.32)

ऋषय ऊचुः। ब्रह्महत्या कथं जाता देवेन्द्रस्य महात्मनः। कस्मिन्काले च सर्वं नो विस्तरात्सूत कीर्तय

ṛṣaya ūcuḥ| brahmahatyā kathaṁ jātā devendrasya mahātmanaḥ| kasminkāle ca sarvaṁ no vistarātsūta kīrtaya

ऋषियों ने कहा — महात्मा देवेंद्र को ब्रह्महत्या कैसे हुई और किस काल में हुई? हे सूत! यह सब हमें विस्तार से बताइए।

श्लोक 33 (skanda.6.8.33)

रक्तशृंगो गिरिः कोऽयं संक्षिप्तस्तत्र तेन यः। मानुषाणां भयं तस्य कतमस्य शचीपतेः

raktaśṛṁgo giriḥ ko'yaṁ saṁkṣiptastatra tena yaḥ| mānuṣāṇāṁ bhayaṁ tasya katamasya śacīpateḥ

यह रक्तशृंग पर्वत क्या है, जिसे उन्होंने वहाँ फेंका है, और शचीपति को मनुष्यों से यह भय किस कारण उत्पन्न हुआ?

श्लोक 34 (skanda.6.8.34)

सूत उवाच। पुरा त्वष्ट्रा द्विजश्रेष्ठा हिरण्यकशिपोः सुता। विवाहिता रमानाम श्रेष्ठरूपगुणान्विता

sūta uvāca| purā tvaṣṭrā dvijaśreṣṭhā hiraṇyakaśipoḥ sutā| vivāhitā ramānāma śreṣṭharūpaguṇānvitā

सूत जी ने कहा — हे श्रेष्ठ द्विजो! प्राचीन काल में त्वष्टा ने हिरण्यकशिपु की, उत्तम रूप-गुणों से युक्त रमा नामक कन्या का विवाह किया था।

श्लोक 35 (skanda.6.8.35)

अथ तस्या ययौ कालः सुप्रभूतः सुतं विना। ततो वैराग्यसंपन्ना सुतार्थं तपसि स्थिता

atha tasyā yayau kālaḥ suprabhūtaḥ sutaṁ vinā| tato vairāgyasaṁpannā sutārthaṁ tapasi sthitā

उसका बहुत समय पुत्र के बिना बीत गया; तब वैराग्ययुक्त होकर वह पुत्र के लिए तपस्या में स्थित हुई।

श्लोक 36 (skanda.6.8.36)

ध्यायमाना सुराधीशं देवदेवं महेश्वरम्। बलिपूजोपहारेण सम्यक्छ्रद्धासमन्विता

dhyāyamānā surādhīśaṁ devadevaṁ maheśvaram| balipūjopahāreṇa samyakchraddhāsamanvitā

वह सम्यक् श्रद्धायुक्त होकर, बलि-पूजा और उपहार से देवाधीश देवदेव महेश्वर का ध्यान करने लगी।

श्लोक 37 (skanda.6.8.37)

नियता नियताहारा स्नानजप्यपरायणा। यच्छमाना द्विजाग्र्येभ्यो दानानि विविधानि च

niyatā niyatāhārā snānajapyaparāyaṇā| yacchamānā dvijāgryebhyo dānāni vividhāni ca

संयमित होकर, नियमित आहार लेकर, स्नान-जप में तत्पर रहकर वह श्रेष्ठ ब्राह्मणों को विविध दान देती रही।

श्लोक 38 (skanda.6.8.38)

ततो वर्षसहस्रांते तस्यास्तुष्टो महेश्वरः। उवाच वरदोऽस्मीति वृणुष्व यदभीप्सितम्

tato varṣasahasrāṁte tasyāstuṣṭo maheśvaraḥ| uvāca varado'smīti vṛṇuṣva yadabhīpsitam

तब एक सहस्र वर्ष बीतने पर उससे प्रसन्न होकर महेश्वर ने कहा — मैं वरदाता हूँ, जो चाहो सो माँगो।

श्लोक 39 (skanda.6.8.39)

सा वव्रे मम पुत्रोऽस्तु भगवंस्त्वत्प्रसादतः। शूरः शस्त्रैरवध्यश्च विप्रदानवरूपधृक्

sā vavre mama putro'stu bhagavaṁstvatprasādataḥ| śūraḥ śastrairavadhyaśca vipradānavarūpadhṛk

उसने वरदान माँगा — हे भगवन्! आपकी कृपा से मेरा पुत्र हो, जो शूरवीर हो, शस्त्रों से अवध्य हो, तथा ब्राह्मण और दानव दोनों का रूप धारण करने वाला हो।

श्लोक 40 (skanda.6.8.40)

वेदाध्ययन संपन्नो यज्ञकर्मसमुद्यतः। तेजसा यशसा ख्यातः सर्वेषामपि देहिनाम्

vedādhyayana saṁpanno yajñakarmasamudyataḥ| tejasā yaśasā khyātaḥ sarveṣāmapi dehinām

वह वेदाध्ययन-संपन्न, यज्ञकर्म में तत्पर, तथा तेज और यश से सभी प्राणियों में प्रसिद्ध हो।

श्लोक 41 (skanda.6.8.41)

भगवानुवाच। भविष्यति न संदेहः पुत्रस्ते बलवान्सुधीः। अवध्यः सर्वशस्त्राणां महातेजोभिरन्वितः

bhagavānuvāca| bhaviṣyati na saṁdehaḥ putraste balavānsudhīḥ| avadhyaḥ sarvaśastrāṇāṁ mahātejobhiranvitaḥ

भगवान ने कहा — निःसंदेह तुम्हारा पुत्र बलवान और सुधी होगा, समस्त शस्त्रों से अवध्य तथा महातेजस्वी होगा।

श्लोक 42 (skanda.6.8.42)

यज्वा दानपतिः शूरो वेदवेदांगपारगः। ब्राह्मणोक्ताः क्रियाः सर्वाः करिष्यति स कृत्स्नशः। अजेयः संगरे चैव कृत्स्नैरपि सुरासुरैः

yajvā dānapatiḥ śūro vedavedāṁgapāragaḥ| brāhmaṇoktāḥ kriyāḥ sarvāḥ kariṣyati sa kṛtsnaśaḥ| ajeyaḥ saṁgare caiva kṛtsnairapi surāsuraiḥ

वह यज्ञकर्ता, दानपति, शूरवीर, वेद-वेदांगपारंगत होगा; ब्राह्मणोक्त समस्त क्रियाएँ करेगा तथा समस्त सुरों और असुरों द्वारा भी युद्ध में अजेय होगा।

श्लोक 43 (skanda.6.8.43)

एवमुक्त्वा स देवेशस्ततश्चादर्शनं गतः। ऋतौ सापि दधे गर्भं सकाशाद्विश्वकर्मणः

evamuktvā sa deveśastataścādarśanaṁ gataḥ| ṛtau sāpi dadhe garbhaṁ sakāśādviśvakarmaṇaḥ

ऐसा कहकर वे देवेश अदृश्य हो गए; और वह भी ऋतुकाल में विश्वकर्मा से गर्भ धारण करने लगी।

श्लोक 44 (skanda.6.8.44)

ततश्च सुषुवे पुत्रं दशमे मासि शोभनम्। द्वादशार्कप्रतीकाशं सर्वलक्षणलक्षितम्

tataśca suṣuve putraṁ daśame māsi śobhanam| dvādaśārkapratīkāśaṁ sarvalakṣaṇalakṣitam

तब दसवें महीने में उसने बारह सूर्यों के समान तेजस्वी, सभी शुभ लक्षणों से युक्त एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया।

श्लोक 45 (skanda.6.8.45)

तस्य चक्रे पिता नाम प्राप्ते द्वादशमे दिने। प्रसिद्धं वृत्र इत्येव पूजयित्वा द्विजोत्तमान्

tasya cakre pitā nāma prāpte dvādaśame dine| prasiddhaṁ vṛtra ityeva pūjayitvā dvijottamān

बारहवें दिन उसके पिता ने श्रेष्ठ ब्राह्मणों की पूजा कर उसका नामकरण किया, जो "वृत्र" नाम से प्रसिद्ध हुआ।

श्लोक 46 (skanda.6.8.46)

अथासौ ववृधे बालः शुक्लपक्षे यथोडुराट्। पितृमातृकृतानंदो बन्धुवर्गेण लालितः

athāsau vavṛdhe bālaḥ śuklapakṣe yathoḍurāṭ| pitṛmātṛkṛtānaṁdo bandhuvargeṇa lālitaḥ

फिर वह बालक शुक्लपक्ष के चंद्रमा की भाँति बढ़ता गया, माता-पिता को आनंदित करता, बंधुजनों द्वारा लालित होता रहा।

श्लोक 47 (skanda.6.8.47)

ततोऽस्य प्रददौ काले व्रतं विप्रजनोचितम्। समभ्येत्य स्वयं शुक्रो दानवस्यापि संद्विजः

tato'sya pradadau kāle vrataṁ viprajanocitam| samabhyetya svayaṁ śukro dānavasyāpi saṁdvijaḥ

फिर उचित काल में शुक्राचार्य, जो दानवों के आचार्य होते हुए भी सच्चे ब्राह्मण थे, स्वयं आकर उसे ब्राह्मणोचित व्रत प्रदान किया।

श्लोक 48 (skanda.6.8.48)

स चापि चतुरो वेदान्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः। वेदांगैः सहितान्वृत्रः पपाठ गुरुवत्सलः

sa cāpi caturo vedānbrahmacārivrate sthitaḥ| vedāṁgaiḥ sahitānvṛtraḥ papāṭha guruvatsalaḥ

वृत्र भी ब्रह्मचर्य-व्रत में स्थित होकर, गुरु के प्रति स्नेहशील रहते हुए, वेदांगों सहित चारों वेदों का अध्ययन किया।

श्लोक 49 (skanda.6.8.49)

ततो यौवनमासाद्य भूमिपालानशेषतः। जित्वा धरां वशे चक्रे पातालं तदनंत रम्

tato yauvanamāsādya bhūmipālānaśeṣataḥ| jitvā dharāṁ vaśe cakre pātālaṁ tadanaṁta ram

फिर युवावस्था प्राप्त कर उसने समस्त भूपतियों को जीतकर पृथ्वी को तथा उसके बाद पाताल को भी अपने वश में कर लिया।

श्लोक 50 (skanda.6.8.50)

ततश्चेंद्रजयाकांक्षी समासाय सुरालयम्। सहस्राक्षमुखान्देवान्युद्धे चक्रे पराङ्मुखान्

tataśceṁdrajayākāṁkṣī samāsāya surālayam| sahasrākṣamukhāndevānyuddhe cakre parāṅmukhān

फिर इंद्र को जीतने की इच्छा से उसने देवलोक पर आक्रमण किया और युद्ध में इंद्र आदि देवताओं को पराङ्मुख कर दिया।

श्लोक 51 (skanda.6.8.51)

अथ तेन समं वज्री चक्रेऽष्टादश संयुगान्। एकस्मिन्नपि नो लेभे विजयं द्विजसत्तमाः

atha tena samaṁ vajrī cakre'ṣṭādaśa saṁyugān| ekasminnapi no lebhe vijayaṁ dvijasattamāḥ

हे श्रेष्ठ द्विजो! तब वज्रधारी इंद्र ने उससे अठारह युद्ध किए, किंतु एक में भी विजय नहीं पाई।

श्लोक 52 (skanda.6.8.52)

हतशेषैः सुरैः सार्धं सर्वांगक्षतविक्षतैः। ततो जगाम वित्रस्तो ब्रह्मलोकं दिवा लयात्

hataśeṣaiḥ suraiḥ sārdhaṁ sarvāṁgakṣatavikṣataiḥ| tato jagāma vitrasto brahmalokaṁ divā layāt

तब सर्वांग घायल शेष देवताओं के साथ भयभीत होकर वह स्वर्गलोक से ब्रह्मलोक को भाग गया।

श्लोक 53 (skanda.6.8.53)

वृत्रोऽपि बुभुजे कृत्स्नं त्रैलोक्यं सचराचरम्। शाक्रं पदं समास्थाय निहताशेषकंटकम्

vṛtro'pi bubhuje kṛtsnaṁ trailokyaṁ sacarācaram| śākraṁ padaṁ samāsthāya nihatāśeṣakaṁṭakam

वृत्र भी इंद्रपद पर आसीन होकर, समस्त कंटकों को नष्ट कर, चराचरसहित संपूर्ण त्रिभुवन का भोग करने लगा।

श्लोक 54 (skanda.6.8.54)

यज्ञभागभुजश्चक्रे दानवान्बल गर्वितान्। देवस्थानेषु सर्वेषु यथोक्तेषु महाबलः

yajñabhāgabhujaścakre dānavānbala garvitān| devasthāneṣu sarveṣu yathokteṣu mahābalaḥ

उस महाबली ने बल से गर्वित दानवों को समस्त देवस्थानों में यथावत् नियुक्त कर यज्ञभाग का भोक्ता बना दिया।

श्लोक 55 (skanda.6.8.55)

एवं त्रैलोक्यराज्येऽपि लब्धे तस्य द्विजोत्तमाः। न संतोषश्च संजज्ञे ब्रह्मलोकाभि कांक्षया

evaṁ trailokyarājye'pi labdhe tasya dvijottamāḥ| na saṁtoṣaśca saṁjajñe brahmalokābhi kāṁkṣayā

हे श्रेष्ठ द्विजो! त्रिभुवन का राज्य पाकर भी उसे संतोष नहीं हुआ, क्योंकि वह ब्रह्मलोक की कामना करने लगा।

श्लोक 56 (skanda.6.8.56)

ततः शुक्रं समाहूय प्रोवाच मधुरं वचः। विनयावनतो भूत्वा चतुर्भिः सचिवैः सह

tataḥ śukraṁ samāhūya provāca madhuraṁ vacaḥ| vinayāvanato bhūtvā caturbhiḥ sacivaiḥ saha

तब शुक्राचार्य को बुलाकर, चार मंत्रियों सहित विनयपूर्वक झुककर उसने मधुर वचन कहा।

श्लोक 57 (skanda.6.8.57)

वृत्र उवाच। ब्रह्मलोकं गतः शक्रो भयाद्गुरुकुलोद्वह। कथं गतिर्भवेत्तत्र मम ब्रूहि यथातथम्

vṛtra uvāca| brahmalokaṁ gataḥ śakro bhayādgurukulodvaha| kathaṁ gatirbhavettatra mama brūhi yathātatham

वृत्र ने कहा — हे गुरुकुलोद्वह! इंद्र भय से ब्रह्मलोक चला गया है। मुझे वहाँ जाने का मार्ग यथार्थ रूप से बताइए।

श्लोक 58 (skanda.6.8.58)

येन शक्रं विरंचिं च सूदयिष्ये तथाखिलम्। तुभ्यं दत्त्वा ब्रह्म लोकं भोक्ष्यामि त्रिदिवं स्वयम्

yena śakraṁ viraṁciṁ ca sūdayiṣye tathākhilam| tubhyaṁ dattvā brahma lokaṁ bhokṣyāmi tridivaṁ svayam

जिससे मैं इंद्र, ब्रह्मा और समस्त देवगण को नष्ट कर दूँ, और ब्रह्मलोक आपको देकर स्वयं स्वर्गलोक का भोग करूँ।

श्लोक 59 (skanda.6.8.59)

शुक्र उवाच। न गतिर्विद्यते तत्र तव दानवसत्तम। तस्मात्त्रैलोक्यराज्येन संतोषं कर्तुम र्हसि

śukra uvāca| na gatirvidyate tatra tava dānavasattama| tasmāttrailokyarājyena saṁtoṣaṁ kartuma rhasi

शुक्राचार्य ने कहा — हे दानवसत्तम! तुम्हारे लिए वहाँ जाने का कोई मार्ग नहीं है; अतः तुम त्रिभुवन के राज्य से ही संतोष करो।

श्लोक 60 (skanda.6.8.60)

वृत्र उवाच। यावत्तिष्ठति सुत्रामा तावन्नास्ति सुखं मम। तस्मान्निष्कंटकार्थाय यतिष्येऽहं द्विजोत्तम

vṛtra uvāca| yāvattiṣṭhati sutrāmā tāvannāsti sukhaṁ mama| tasmānniṣkaṁṭakārthāya yatiṣye'haṁ dvijottama

वृत्र ने कहा — जब तक इंद्र जीवित है, तब तक मुझे सुख नहीं है; अतः हे द्विजोत्तम! उसे निष्कंटक करने के लिए मैं प्रयत्न करूँगा।

श्लोक 61 (skanda.6.8.61)

कथं शक्रस्य संजाता गतिस्तत्र भृगूद्वह। न भविष्यति मे ब्रूहि कथं साऽद्य महामते

kathaṁ śakrasya saṁjātā gatistatra bhṛgūdvaha| na bhaviṣyati me brūhi kathaṁ sā'dya mahāmate

हे भृगुकुलोद्वह! इंद्र को वहाँ जाने की गति कैसे प्राप्त हुई? हे महामते! मुझे भी वह गति क्यों न मिले, यह बताइए।

श्लोक 62 (skanda.6.8.62)

शुक्र उवाच। तेन पूर्वं तपस्तप्तं नैमिषे दानवोत्तम। यावद्वर्षसहस्रांतं ध्यायमानेन शंकरम्

śukra uvāca| tena pūrvaṁ tapastaptaṁ naimiṣe dānavottama| yāvadvarṣasahasrāṁtaṁ dhyāyamānena śaṁkaram

शुक्राचार्य ने कहा — हे दानवोत्तम! उसने पूर्वकाल में नैमिष में एक सहस्र वर्ष तक शंकर का ध्यान करते हुए तप किया था।

श्लोक 63 (skanda.6.8.63)

तत्प्रभावाद्गतिस्तस्य तत्र जाता सदैव हि। सभृत्यपरिवारस्य नान्यदस्तीह कारणम्

tatprabhāvādgatistasya tatra jātā sadaiva hi| sabhṛtyaparivārasya nānyadastīha kāraṇam

उसी के प्रभाव से उसे सेवकों और परिवार सहित वहाँ सदा गति प्राप्त हुई; इसका अन्य कोई कारण नहीं है।

श्लोक 64 (skanda.6.8.64)

योऽन्योऽपि नैमिषारण्ये तद्रूपं कुरुते तपः। ब्रह्मलोके गतिस्तस्य जायते नात्र संशयः

yo'nyo'pi naimiṣāraṇye tadrūpaṁ kurute tapaḥ| brahmaloke gatistasya jāyate nātra saṁśayaḥ

जो भी अन्य नैमिषारण्य में वैसा ही तप करता है, उसे भी निःसंदेह ब्रह्मलोक में गति प्राप्त होती है।

श्लोक 65 (skanda.6.8.65)

सूत उवाच। तच्छ्रुत्वा सत्वरं गत्वा नैमिषं तीर्थमुत्तमम्। तपश्चक्रे ततस्तीव्रं ध्यायमानो महेश्वरम्

sūta uvāca| tacchrutvā satvaraṁ gatvā naimiṣaṁ tīrthamuttamam| tapaścakre tatastīvraṁ dhyāyamāno maheśvaram

सूत जी ने कहा — यह सुनकर वह शीघ्र नैमिष नामक उत्तम तीर्थ में जाकर, महेश्वर का ध्यान करते हुए घोर तप करने लगा।

श्लोक 66 (skanda.6.8.66)

त्रैलोक्यरक्षणार्थाय संनिरूप्य दनूत्त मान्। महाबलसमोपेताञ्छक्राधिकपराक्रमान्

trailokyarakṣaṇārthāya saṁnirūpya danūtta mān| mahābalasamopetāñchakrādhikaparākramān

त्रिभुवन की रक्षा के लिए, महाबली तथा इंद्र से भी अधिक पराक्रमी श्रेष्ठ दानवों को एकत्र करने के उद्देश्य से —

श्लोक 67 (skanda.6.8.67)

वर्षास्वाकाशस्थायी स हेमन्ते सलिलाश्रयः। पंचाग्निसाधको ग्रीष्मे स वभूवा निलाशनः

varṣāsvākāśasthāyī sa hemante salilāśrayaḥ| paṁcāgnisādhako grīṣme sa vabhūvā nilāśanaḥ

वह वर्षा ऋतु में आकाश में खुले रहकर, हेमंत में जलाश्रय में, तथा ग्रीष्म में पंचाग्नि साधना करते हुए केवल वायु का आहार लेता था।

श्लोक 68 (skanda.6.8.68)

एवं तस्य व्रतस्थस्य जग्मुर्वर्षशतानि च। तत्र भीतास्ततो देवा ब्रह्मविष्णुपुरःसराः

evaṁ tasya vratasthasya jagmurvarṣaśatāni ca| tatra bhītāstato devā brahmaviṣṇupuraḥsarāḥ

इस प्रकार व्रत में स्थित उसके सैकड़ों वर्ष बीत गए; तब ब्रह्मा और विष्णु आदि देवगण भयभीत हो उठे।

श्लोक 69 (skanda.6.8.69)

चक्रुश्च सततं मंत्रं तद्विनाशाय केवलम्। वीक्षयंति च च्छिद्राणि न च पश्यंति दुःखिताः

cakruśca satataṁ maṁtraṁ tadvināśāya kevalam| vīkṣayaṁti ca cchidrāṇi na ca paśyaṁti duḥkhitāḥ

वे केवल उसके विनाश के लिए ही निरंतर मंत्रणा करते और छिद्र ढूँढ़ते, किंतु दुःखी होकर भी कुछ न पाते।

श्लोक 70 (skanda.6.8.70)

अथाब्रवीत्स्वयं विष्णुश्चिरं निश्चित्य चेतसा। वधोपायं समालोक्य वृत्रस्य प्रमुदान्वितः

athābravītsvayaṁ viṣṇuściraṁ niścitya cetasā| vadhopāyaṁ samālokya vṛtrasya pramudānvitaḥ

तब स्वयं विष्णु ने चिरकाल तक मन में सोचकर, वृत्र के वध का उपाय ढूँढ़कर, प्रसन्नतापूर्वक कहा।

श्लोक 71 (skanda.6.8.71)

विष्णुरुवाच। तस्य शक्र वधोपायो मया ज्ञातोऽधुना ध्रुवम्। तच्छ्रुत्वा कुरु शीघ्रं त्वमुपायो नास्ति कश्चन

viṣṇuruvāca| tasya śakra vadhopāyo mayā jñāto'dhunā dhruvam| tacchrutvā kuru śīghraṁ tvamupāyo nāsti kaścana

विष्णु ने कहा — हे इंद्र! अब मुझे निश्चय ही उसके वध का उपाय ज्ञात हो गया है; इसे सुनकर शीघ्र करो, अन्य कोई उपाय नहीं है।

श्लोक 72 (skanda.6.8.72)

अवध्यः सर्वशस्त्राणां स कृतः शूलपाणिना। तस्मादस्थिमयं वज्रं तद्वधार्थं निरूपय

avadhyaḥ sarvaśastrāṇāṁ sa kṛtaḥ śūlapāṇinā| tasmādasthimayaṁ vajraṁ tadvadhārthaṁ nirūpaya

उसे शूलपाणि (शिव) ने समस्त शस्त्रों से अवध्य बना दिया है; अतः उसके वध के लिए अस्थिमय वज्र बनवाओ।

श्लोक 73 (skanda.6.8.73)

इन्द्र उवाच। अस्थिभिः कस्य जीवस्य वज्रं देव भविष्यति। गजस्य शरभस्याथ किं वान्यस्य वदस्व मे

indra uvāca| asthibhiḥ kasya jīvasya vajraṁ deva bhaviṣyati| gajasya śarabhasyātha kiṁ vānyasya vadasva me

इंद्र ने कहा — हे देव! किस जीव की अस्थियों से वज्र बनेगा? हाथी की, शरभ की, अथवा किसी अन्य की? मुझे बताइए।

श्लोक 74 (skanda.6.8.74)

विष्णुरुवाच। शतहस्तप्रमाणं तत्षडस्रि च सुराधिप। मध्ये क्षामं तु पार्श्वाभ्यां स्थूलं रौद्रसमाकृति

viṣṇuruvāca| śatahastapramāṇaṁ tatṣaḍasri ca surādhipa| madhye kṣāmaṁ tu pārśvābhyāṁ sthūlaṁ raudrasamākṛti

विष्णु ने कहा — हे सुराधिप! वह वज्र सौ हाथ लंबा, छह धार वाला, मध्य में पतला किंतु दोनों ओर से मोटा, भयंकर आकार वाला होना चाहिए।

श्लोक 75 (skanda.6.8.75)

इंद्र उवाच। न तादृग्दृश्यते सत्त्वं त्रैलोक्येपि सुरेश्वर। यस्यास्थिभिर्विधीयेत वजमेवंविधाकृति

iṁdra uvāca| na tādṛgdṛśyate sattvaṁ trailokyepi sureśvara| yasyāsthibhirvidhīyeta vajamevaṁvidhākṛti

इंद्र ने कहा — हे सुरेश्वर! तीनों लोकों में भी ऐसा कोई प्राणी नहीं दिखता, जिसकी अस्थियों से इस प्रकार का वज्र बन सके।

श्लोक 76 (skanda.6.8.76)

विष्णुरुवाच। दधीचिर्नाम विप्रोऽस्ति तपः परममा स्थितः। द्विगुणं च तथा दीर्घः सरस्वत्यां कृताश्रमः

viṣṇuruvāca| dadhīcirnāma vipro'sti tapaḥ paramamā sthitaḥ| dviguṇaṁ ca tathā dīrghaḥ sarasvatyāṁ kṛtāśramaḥ

विष्णु ने कहा — दधीचि नामक एक ब्राह्मण है, जो परम तप में स्थित है, सामान्य से दुगुनी लंबाई वाला है, और सरस्वती के तट पर आश्रम बनाए हुए है।

श्लोक 77 (skanda.6.8.77)

तं गत्वा प्रार्थयाशु त्वं स्वान्यस्थीनि प्रदास्यति। नादेयं विद्यते किंचित्तस्य संप्रार्थितस्य हि

taṁ gatvā prārthayāśu tvaṁ svānyasthīni pradāsyati| nādeyaṁ vidyate kiṁcittasya saṁprārthitasya hi

उसके पास जाकर शीघ्र प्रार्थना करो; वह अपनी अस्थियाँ अवश्य दे देगा — भलीभाँति प्रार्थना करने पर उसके लिए कुछ भी अदेय नहीं है।

श्लोक 78 (skanda.6.8.78)

ततः शक्रः सुरैः सार्धं गत्वा तस्य तदाश्रमम्। प्राचीसरस्वतीतीरे पुष्करे द्विजसत्तमाः

tataḥ śakraḥ suraiḥ sārdhaṁ gatvā tasya tadāśramam| prācīsarasvatītīre puṣkare dvijasattamāḥ

हे श्रेष्ठ द्विजो! तब इंद्र देवताओं सहित पुष्कर में प्राचीसरस्वती के तट पर स्थित उसके आश्रम में गए।

श्लोक 79 (skanda.6.8.79)

अथ देवान्समालोक्य संप्राप्तान्निजमंदिरे। दधीचिः संप्रहृष्टात्मा सत्वरः संमुखं ययौ

atha devānsamālokya saṁprāptānnijamaṁdire| dadhīciḥ saṁprahṛṣṭātmā satvaraḥ saṁmukhaṁ yayau

अपने आश्रम में आए देवताओं को देखकर दधीचि प्रसन्नमन होकर तुरंत उनके सम्मुख गए।

श्लोक 80 (skanda.6.8.80)

स प्रणम्य सहस्राक्षं तथान्यानपि सन्मुनिः। अर्घ्यादिभिस्ततः पूजां चक्रे तेषां ततः परम्

sa praṇamya sahasrākṣaṁ tathānyānapi sanmuniḥ| arghyādibhistataḥ pūjāṁ cakre teṣāṁ tataḥ param

उस सन्मुनि ने इंद्र तथा अन्य देवताओं को प्रणाम कर, अर्घ्य आदि से उनका पूजन किया।

श्लोक 81 (skanda.6.8.81)

ततः प्रोवाच हृष्टात्मा विनयावनतः स्थितः। स्वयमेव सहस्राक्षं प्रणिपत्य मुहुर्मुहुः

tataḥ provāca hṛṣṭātmā vinayāvanataḥ sthitaḥ| svayameva sahasrākṣaṁ praṇipatya muhurmuhuḥ

फिर हर्षित मन से विनम्रतापूर्वक झुककर, स्वयं इंद्र को बार-बार प्रणाम करते हुए उसने कहा।

श्लोक 82 (skanda.6.8.82)

दधीचिरुवाच। किमर्थमागता देवाः कृत्यं चाशु निवेद्यताम्। धन्योऽहमागतो यस्य गृहे त्वं बलसूदन

dadhīciruvāca| kimarthamāgatā devāḥ kṛtyaṁ cāśu nivedyatām| dhanyo'hamāgato yasya gṛhe tvaṁ balasūdana

दधीचि ने कहा — देवगण किसलिए आए हैं? कार्य शीघ्र बताइए। हे बलसूदन! मैं धन्य हूँ कि आप मेरे घर पधारे।

श्लोक 83 (skanda.6.8.83)

शक्र उवाच। वृत्रेण निर्जिताः सर्वे वयं ब्राह्मणसत्तम। स वध्यो नहि शस्त्राणां सर्वेषां वरपुष्टितः

śakra uvāca| vṛtreṇa nirjitāḥ sarve vayaṁ brāhmaṇasattama| sa vadhyo nahi śastrāṇāṁ sarveṣāṁ varapuṣṭitaḥ

इंद्र ने कहा — हे ब्राह्मणसत्तम! वृत्र ने हम सबको परास्त कर दिया है; वरदान से पुष्ट होने के कारण वह किसी भी शस्त्र से वध्य नहीं है।

श्लोक 84 (skanda.6.8.84)

सोऽस्थिसंभववज्रस्य वध्यः स्यादब्रवीद्धरिः। शतहस्तप्रमाणस्य न च जीवोस्ति तादृशः

so'sthisaṁbhavavajrasya vadhyaḥ syādabravīddhariḥ| śatahastapramāṇasya na ca jīvosti tādṛśaḥ

हरि ने कहा कि वह केवल अस्थि से बने सौ हाथ लंबे वज्र से ही वध्य होगा, किंतु ऐसा कोई जीव नहीं है।

श्लोक 85 (skanda.6.8.85)

त्वां मुक्त्वा ब्राह्मणश्रेष्ठ तस्मादस्थीनि यच्छ नः। स्वकीयानि भवेद्येन वज्रं तस्य विनाशकम्

tvāṁ muktvā brāhmaṇaśreṣṭha tasmādasthīni yaccha naḥ| svakīyāni bhavedyena vajraṁ tasya vināśakam

हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! आपके अतिरिक्त कोई अन्य नहीं है, अतः अपनी अस्थियाँ हमें दीजिए, जिनसे उसके विनाशक वज्र बन सके।

श्लोक 86 (skanda.6.8.86)

कुरु कृत्यं द्विजश्रेष्ठ देवानामार्तिनाशनम्। अन्यथा विबुधाः सर्वे नाशं यास्यंति कृत्स्नशः

kuru kṛtyaṁ dvijaśreṣṭha devānāmārtināśanam| anyathā vibudhāḥ sarve nāśaṁ yāsyaṁti kṛtsnaśaḥ

हे द्विजश्रेष्ठ! देवताओं की पीड़ा दूर करने वाला यह कार्य कीजिए, अन्यथा समस्त देवगण नष्ट हो जाएँगे।

श्लोक 87 (skanda.6.8.87)

सूत उवाच। तच्छ्रुत्वा संप्रहृष्टात्मा दधीचिर्भगवान्मुनिः। अत्यजज्जीवितं तेषां हितार्थाय दिवौकसाम्

sūta uvāca| tacchrutvā saṁprahṛṣṭātmā dadhīcirbhagavānmuniḥ| atyajajjīvitaṁ teṣāṁ hitārthāya divaukasām

सूत जी ने कहा — यह सुनकर हर्षित मन से भगवान मुनि दधीचि ने देवताओं के हित के लिए अपने प्राण त्याग दिए।

श्लोक 88 (skanda.6.8.88)

ततो देवाः प्रहृष्टास्ते गृहीत्वास्थीनि कृत्स्नशः। ततश्चक्रुर्महावज्रं यादृशं विष्णुनोदितम्

tato devāḥ prahṛṣṭāste gṛhītvāsthīni kṛtsnaśaḥ| tataścakrurmahāvajraṁ yādṛśaṁ viṣṇunoditam

तब हर्षित देवताओं ने उनकी समस्त अस्थियाँ लेकर विष्णु द्वारा बताए गए स्वरूप का महावज्र बनाया।

श्लोक 89 (skanda.6.8.89)

अथ शक्रस्तदादाय नैमिषाभिमुखो ययौ। भयेन महता युक्तो वेपमानो निशागमे

atha śakrastadādāya naimiṣābhimukho yayau| bhayena mahatā yukto vepamāno niśāgame

तब इंद्र उस वज्र को लेकर, रात्रि होने पर, अत्यंत भय से काँपते हुए नैमिष की ओर चल पड़ा।

श्लोक 90 (skanda.6.8.90)

तत्र ध्यानस्थितं वृत्रं दूरस्थस्त्रिदशाधिपः। वज्रेण ताडयामास पलायनपरायणः

tatra dhyānasthitaṁ vṛtraṁ dūrasthastridaśādhipaḥ| vajreṇa tāḍayāmāsa palāyanaparāyaṇaḥ

वहाँ दूर खड़े होकर देवराज इंद्र ने ध्यानस्थ वृत्र पर वज्र से प्रहार किया और फिर भागने लगे।

श्लोक 91 (skanda.6.8.91)

सोऽपि वजप्रहारेण भस्मसात्सम पद्यत। वृत्रो दानवशार्दूलो वह्निं प्राप्य पतंगवत्

so'pi vajaprahāreṇa bhasmasātsama padyata| vṛtro dānavaśārdūlo vahniṁ prāpya pataṁgavat

दानवश्रेष्ठ वृत्र भी वज्र के प्रहार से उसी प्रकार भस्म हो गया, जैसे पतंगा अग्नि को पाकर भस्म हो जाता है।

श्लोक 92 (skanda.6.8.92)

शक्रोऽपि भयसंत्रस्तो गत्वा सागरमध्यगम्। पर्वतं सुदुरारोहं तुंगशृंगं समाश्रितः

śakro'pi bhayasaṁtrasto gatvā sāgaramadhyagam| parvataṁ sudurārohaṁ tuṁgaśṛṁgaṁ samāśritaḥ

इंद्र भी अत्यंत भयभीत होकर समुद्र के मध्य स्थित, अत्यंत दुर्गम, ऊँचे शिखर वाले पर्वत का आश्रय ले बैठा।

श्लोक 93 (skanda.6.8.93)

न जानाति हतं वृत्रं वज्रघातेन तेन तम्। केवलं वीक्षते मार्गं वृत्रागमनसंभवम्

na jānāti hataṁ vṛtraṁ vajraghātena tena tam| kevalaṁ vīkṣate mārgaṁ vṛtrāgamanasaṁbhavam

उसे यह ज्ञात नहीं था कि वज्र के प्रहार से वृत्र मारा जा चुका है; वह केवल वृत्र के आने की आशंका से मार्ग देखता रहता था।

श्लोक 94 (skanda.6.8.94)

एतस्मिन्नंतरे देवाः संप्रहृष्टतनूरुहाः। सूत्रं विनिहतं दृष्ट्वा तुष्टुवुस्त्रिदशाधिपम्

etasminnaṁtare devāḥ saṁprahṛṣṭatanūruhāḥ| sūtraṁ vinihataṁ dṛṣṭvā tuṣṭuvustridaśādhipam

इसी बीच रोमांचित देवगण वृत्र के मारे जाने को देखकर देवराज इंद्र की स्तुति करने लगे।

श्लोक 95 (skanda.6.8.95)

न जानंति भयान्नष्टं तस्मिन्सागरपर्वते। अन्विष्य चिरकालेन कृच्छ्रात्संप्राप्य तं ततः

na jānaṁti bhayānnaṣṭaṁ tasminsāgaraparvate| anviṣya cirakālena kṛcchrātsaṁprāpya taṁ tataḥ

भय से कहाँ छिप गया, यह न जानते हुए, वे बहुत काल तक खोजते रहे और अंततः कष्ट से उस समुद्र-पर्वत पर उसे पा गए।

श्लोक 96 (skanda.6.8.96)

वीक्षांचक्रुः समासीनं विषमे गिरिगह्वरे। तेजोहीनं तथा दीनं ब्रह्महत्यापरिप्लुतम्

vīkṣāṁcakruḥ samāsīnaṁ viṣame girigahvare| tejohīnaṁ tathā dīnaṁ brahmahatyāpariplutam

उन्होंने उसे विषम पर्वत-गुफा में बैठा हुआ, तेजहीन, दीन तथा ब्रह्महत्या से आच्छादित देखा —

श्लोक 97 (skanda.6.8.97)

गात्रदुर्गंधितासंगैः पूरयन्तं दिशो दश

gātradurgaṁdhitāsaṁgaiḥ pūrayantaṁ diśo daśa

— जिसके शरीर की दुर्गंध से दसों दिशाएँ भर रही थीं।

श्लोक 98 (skanda.6.8.98)

अथोवाच चतुर्वक्त्रो दृष्ट्वा शक्रं तथाविधम्। समस्तान्देवसंघातान्दूरस्थः पापशंकया

athovāca caturvaktro dṛṣṭvā śakraṁ tathāvidham| samastāndevasaṁghātāndūrasthaḥ pāpaśaṁkayā

इंद्र को उस दशा में देखकर चतुर्मुख ब्रह्मा ने पाप की आशंका से दूर खड़े होकर समस्त देवसमूह से कहा।

श्लोक 99 (skanda.6.8.99)

शक्रोऽयं विबुधश्रेष्ठा ब्रह्महत्यापरिप्लुतः। तस्मातत्त्याज्यः सुदूरेण नो चेत्पापमवाप्स्यथ

śakro'yaṁ vibudhaśreṣṭhā brahmahatyāpariplutaḥ| tasmātattyājyaḥ sudūreṇa no cetpāpamavāpsyatha

हे श्रेष्ठ देवो! यह इंद्र ब्रह्महत्या से आच्छादित है; अतः इसे बहुत दूर से त्याग दो, अन्यथा तुम भी पाप को प्राप्त होगे।

श्लोक 100 (skanda.6.8.100)

पश्यध्वं सर्वलिंगानि ब्रह्महत्यान्वितानि च। अस्य गात्रेषु दृश्यंते तस्माद्गच्छामहे दिवि

paśyadhvaṁ sarvaliṁgāni brahmahatyānvitāni ca| asya gātreṣu dṛśyaṁte tasmādgacchāmahe divi

देखो, इसके शरीर पर ब्रह्महत्या के समस्त चिह्न दिखाई दे रहे हैं; अतः हम स्वर्ग को चलें।

श्लोक 101 (skanda.6.8.101)

पितामहमुखान्दृष्ट्वा देवान्प्राप्तान्सुराधिपः। पराङ्मुखानकस्माच्च संजातान्विस्मयान्वितः

pitāmahamukhāndṛṣṭvā devānprāptānsurādhipaḥ| parāṅmukhānakasmācca saṁjātānvismayānvitaḥ

पितामह आदि देवताओं को आया देखकर, फिर उन्हें अकस्मात मुख फेरते देख देवराज इंद्र आश्चर्यचकित हो गए।

श्लोक 102 (skanda.6.8.102)

ततः प्रोवाच संभ्रांतः किमिदं गम्यते सुराः। दृष्ट्वापि मामनाभाष्य कच्चित्क्षेमं गृहे मम

tataḥ provāca saṁbhrāṁtaḥ kimidaṁ gamyate surāḥ| dṛṣṭvāpi māmanābhāṣya kaccitkṣemaṁ gṛhe mama

तब घबराकर उन्होंने कहा — हे देवो! यह क्या है, तुम कहाँ जा रहे हो? मुझे देखकर भी बिना बोले — क्या मेरे घर में सब कुशल है?

श्लोक 103 (skanda.6.8.103)

कच्चित्स निहतस्तेन मम वज्रेण दानवः। कच्चिन्न मां स युद्धार्थमन्वेष यति दुर्मतिः

kaccitsa nihatastena mama vajreṇa dānavaḥ| kaccinna māṁ sa yuddhārthamanveṣa yati durmatiḥ

क्या वह दानव मेरे वज्र से मारा गया है? क्या वह दुर्बुद्धि पुनः युद्ध के लिए मुझे खोज तो नहीं रहा?

श्लोक 104 (skanda.6.8.104)

ब्रह्मोवाच। निहतः स त्वया शक्र तेन वज्रेण दानवः। गतो मृत्युवशं पापो न भयं कर्तुमर्हसि

brahmovāca| nihataḥ sa tvayā śakra tena vajreṇa dānavaḥ| gato mṛtyuvaśaṁ pāpo na bhayaṁ kartumarhasi

ब्रह्मा ने कहा — हे इंद्र! वह पापी दानव तुम्हारे उसी वज्र से मारा गया और मृत्यु के वश हो गया; तुम्हें भय करना उचित नहीं है।

श्लोक 105 (skanda.6.8.105)

परं तस्य वधाज्जाता ब्रह्महत्या सुगर्हिता। तव शक्र न तेनाद्य स्पृशामोऽस्पृश्यतां गतम्

paraṁ tasya vadhājjātā brahmahatyā sugarhitā| tava śakra na tenādya spṛśāmo'spṛśyatāṁ gatam

किंतु उसके वध से तुम्हें अत्यंत निंदित ब्रह्महत्या का पाप लगा है; अतः हे इंद्र! अस्पृश्य हुए तुम्हें आज हम स्पर्श नहीं करते।

श्लोक 106 (skanda.6.8.106)

इन्द्र उवाच। मया विनिहताः पूर्वं बहवः किल दानवाः। ब्रह्महत्या न संजाता मम हत्याधुना कथम्

indra uvāca| mayā vinihatāḥ pūrvaṁ bahavaḥ kila dānavāḥ| brahmahatyā na saṁjātā mama hatyādhunā katham

इंद्र ने कहा — मैंने पूर्व में भी बहुत से दानव मारे हैं, तब ब्रह्महत्या नहीं लगी; अब यह हत्या ब्रह्महत्या कैसे हो गई?

श्लोक 107 (skanda.6.8.107)

ब्रह्मोवाच। ते त्वया निहता युद्धे क्षात्रधर्मेण वासव। विशुद्धा दानवाः सर्वे तेन जातं न पातकम्

brahmovāca| te tvayā nihatā yuddhe kṣātradharmeṇa vāsava| viśuddhā dānavāḥ sarve tena jātaṁ na pātakam

ब्रह्मा ने कहा — हे वासव! वे सब दानव विशुद्ध थे, जिन्हें तुमने युद्ध में क्षत्रियधर्म के अनुसार मारा; इसलिए वहाँ पाप नहीं लगा।

श्लोक 108 (skanda.6.8.108)

एष यज्ञोपवीताढ्यो विशेषात्तपसि स्थितः। छलेन निहतः शक्र तेन त्वं पापसंयुतः

eṣa yajñopavītāḍhyo viśeṣāttapasi sthitaḥ| chalena nihataḥ śakra tena tvaṁ pāpasaṁyutaḥ

किंतु यह वृत्र यज्ञोपवीतधारी था, विशेष रूप से तप में स्थित था, और उसे तुमने छल से मारा — इसीलिए हे इंद्र! तुम पापयुक्त हुए हो।

श्लोक 109 (skanda.6.8.109)

इन्द्र उवाच। जानाम्यहं चतुर्वक्त्र स्वं कायं पापसंयुतम्। चिह्नैर्ब्रह्मवधोद्भूतैस्तस्माच्छुद्धिं वदस्व मे

indra uvāca| jānāmyahaṁ caturvaktra svaṁ kāyaṁ pāpasaṁyutam| cihnairbrahmavadhodbhūtaistasmācchuddhiṁ vadasva me

इंद्र ने कहा — हे चतुर्मुख! मैं जानता हूँ कि ब्रह्महत्या से उत्पन्न चिह्नों से मेरा शरीर पापयुक्त है; अतः मुझे शुद्धि का उपाय बताइए।

श्लोक 110 (skanda.6.8.110)

यया याति द्रुतं पापं ब्रह्महत्यासमुद्भवम्। स्पृश्यो भवामि सर्वेषां देवानां प्रपितामह

yayā yāti drutaṁ pāpaṁ brahmahatyāsamudbhavam| spṛśyo bhavāmi sarveṣāṁ devānāṁ prapitāmaha

हे प्रपितामह! जिससे यह ब्रह्महत्या-जनित पाप शीघ्र नष्ट हो जाए, और मैं सब देवताओं के लिए पुनः स्पृश्य हो जाऊँ।

श्लोक 111 (skanda.6.8.111)

ब्रह्मोवाच। तीर्थयात्रां सुरश्रेष्ठ तदर्थं कर्तुमर्हसि। तया विना न ते पापं नाशमायाति कृत्स्नशः

brahmovāca| tīrthayātrāṁ suraśreṣṭha tadarthaṁ kartumarhasi| tayā vinā na te pāpaṁ nāśamāyāti kṛtsnaśaḥ

ब्रह्मा ने कहा — हे सुरश्रेष्ठ! उसके लिए तुम्हें तीर्थयात्रा करनी चाहिए; उसके बिना तुम्हारा पाप पूर्णतः नष्ट नहीं होगा।

श्लोक 112 (skanda.6.8.112)

सूत उवाच। ततस्तद्वचनाच्छक्रस्तीर्थयात्रापरायणः। बभ्राम सकलां पृथ्वीं स्नानं कुर्वन्पृथक्पृथक्

sūta uvāca| tatastadvacanācchakrastīrthayātrāparāyaṇaḥ| babhrāma sakalāṁ pṛthvīṁ snānaṁ kurvanpṛthakpṛthak

सूत जी ने कहा — तब उस वचन से इंद्र तीर्थयात्रा में तत्पर होकर, अलग-अलग स्नान करते हुए संपूर्ण पृथ्वी पर भ्रमण करने लगा।

श्लोक 113 (skanda.6.8.113)

तीर्थेषु सुप्रसिद्धेषु नदीनदयुतेषु च। वाराणस्यां प्रयागे च प्रभासे कुरुजांगले

tīrtheṣu suprasiddheṣu nadīnadayuteṣu ca| vārāṇasyāṁ prayāge ca prabhāse kurujāṁgale

अत्यंत प्रसिद्ध तीर्थों में, नद-नदियों के तटों पर, वाराणसी में, प्रयाग में, प्रभास में, कुरुजांगल में —

श्लोक 114 (skanda.6.8.114)

तथान्येषु सहस्राक्षो विपाप्मा न व्यजायत। ततो वैराग्यमापन्नश्चिन्तयामास चेतसि

tathānyeṣu sahasrākṣo vipāpmā na vyajāyata| tato vairāgyamāpannaścintayāmāsa cetasi

तथा अन्य अनेक तीर्थों में भी वह पापमुक्त नहीं हुआ। तब निराश होकर वह मन में सोचने लगा।

श्लोक 115 (skanda.6.8.115)

अहं स्नातः समस्तेषु तीर्थेषु धरणीतले। न च पापेन निर्मुक्तः किं करोमि च सांप्रतम्

ahaṁ snātaḥ samasteṣu tīrtheṣu dharaṇītale| na ca pāpena nirmuktaḥ kiṁ karomi ca sāṁpratam

मैं पृथ्वी के समस्त तीर्थों में स्नान कर चुका, फिर भी पापमुक्त नहीं हुआ; अब मैं क्या करूँ?

श्लोक 116 (skanda.6.8.116)

किं पतामि गिरेः शृंगाद्विषं वा भक्षयामि किम्। त्रैलोक्यराज्यविभ्रष्टो नाहं जीवितुमुत्सहे

kiṁ patāmi gireḥ śṛṁgādviṣaṁ vā bhakṣayāmi kim| trailokyarājyavibhraṣṭo nāhaṁ jīvitumutsahe

क्या मैं पर्वत के शिखर से गिर पड़ूँ, अथवा विष खा लूँ? त्रिभुवन के राज्य से भ्रष्ट होकर अब जीने की इच्छा भी नहीं है।

श्लोक 117 (skanda.6.8.117)

एवं वैराग्यमापन्नो गिरिमारुह्य वासवः। यावत्क्षिपति चात्मानं मरणे कृतनिश्चयः

evaṁ vairāgyamāpanno girimāruhya vāsavaḥ| yāvatkṣipati cātmānaṁ maraṇe kṛtaniścayaḥ

इस प्रकार निराशा से भरे इंद्र पर्वत पर चढ़कर मृत्यु का निश्चय कर स्वयं को गिराने ही वाले थे कि —

श्लोक 118 (skanda.6.8.118)

तावद्देवोत्थिता वाणी गगनाद्द्विजसत्तमाः। मा शक्र साहसं कार्षीर्वैराग्यं प्राप्य चेतसि

tāvaddevotthitā vāṇī gaganāddvijasattamāḥ| mā śakra sāhasaṁ kārṣīrvairāgyaṁ prāpya cetasi

हे श्रेष्ठ द्विजो! तभी आकाश से एक दिव्य वाणी हुई — हे इंद्र! मन में निराश होकर साहस मत करो।

श्लोक 119 (skanda.6.8.119)

त्वया राज्यं प्रकर्तव्यं स्वर्गेऽद्यापि युगाष्टकम्। तस्मात्पापविशुद्ध्यर्थं शृणु शक्र समा हितः

tvayā rājyaṁ prakartavyaṁ svarge'dyāpi yugāṣṭakam| tasmātpāpaviśuddhyarthaṁ śṛṇu śakra samā hitaḥ

तुम्हें अभी भी आठ युगों तक स्वर्ग का राज्य करना है; अतः हे इंद्र! पाप की शुद्धि के लिए एकाग्र होकर सुनो।

श्लोक 120 (skanda.6.8.120)

कुरुष्व वचनं शीघ्रं भावनीयं न चान्यथा। यत्त्वया पांसुभिः पूर्वं विवरं परिपूरितः

kuruṣva vacanaṁ śīghraṁ bhāvanīyaṁ na cānyathā| yattvayā pāṁsubhiḥ pūrvaṁ vivaraṁ paripūritaḥ

मेरे वचन का शीघ्र पालन करो, अन्यथा मत सोचो; जो बिल तुमने पहले धूल से भर दिया था —

श्लोक 121 (skanda.6.8.121)

हाटकेश्वरजे क्षेत्रे यत्र देवः स्वयं हरः। तत्र नागबिलो जातो वल्मीकात्त्रिदशाधिप

hāṭakeśvaraje kṣetre yatra devaḥ svayaṁ haraḥ| tatra nāgabilo jāto valmīkāttridaśādhipa

हे त्रिदशाधिप! हाटकेश्वर क्षेत्र में, जहाँ देव हर स्वयं विराजते हैं, वहाँ बाँबी से जो नागबिल बना है —

श्लोक 122 (skanda.6.8.122)

येन नागा धरापृष्ठे निर्गच्छंति व्रजंति च। तेन मार्गेण गत्वा त्वं पाताले हाटकेश्वरम्। स्नात्वा पातालगंगायां पूजयस्व महेश्वरम्

yena nāgā dharāpṛṣṭhe nirgacchaṁti vrajaṁti ca| tena mārgeṇa gatvā tvaṁ pātāle hāṭakeśvaram| snātvā pātālagaṁgāyāṁ pūjayasva maheśvaram

जिस मार्ग से नाग पृथ्वी पर निकलते और लौटते हैं, उसी मार्ग से जाकर तुम पाताल में हाटकेश्वर के पास पहुँचो; वहाँ पातालगंगा में स्नान कर महेश्वर की पूजा करो।

श्लोक 123 (skanda.6.8.123)

ततः पापविनिर्मुक्तो भविष्यसि न संशयः। संप्राप्स्यसि च भूयोऽपि देवराज्यमकण्टकम्

tataḥ pāpavinirmukto bhaviṣyasi na saṁśayaḥ| saṁprāpsyasi ca bhūyo'pi devarājyamakaṇṭakam

इससे तुम निःसंदेह पापमुक्त हो जाओगे और पुनः निष्कंटक देवराज्य को प्राप्त करोगे।

श्लोक 124 (skanda.6.8.124)

सूत उवाच। अथ शक्रः समाकर्ण्य तां गिरं गगनोत्थिताम्। जगाम सत्वरं तत्र यत्र नागबिलः स च

sūta uvāca| atha śakraḥ samākarṇya tāṁ giraṁ gaganotthitām| jagāma satvaraṁ tatra yatra nāgabilaḥ sa ca

सूत जी ने कहा — तब इंद्र आकाशवाणी सुनकर शीघ्र ही वहाँ गए, जहाँ वह नागबिल था।

श्लोक 125 (skanda.6.8.125)

ततः प्रविश्य पातालं गंगातोयपरिप्लुतः। पूजयामास तल्लिंगं हाटकेश्वरसंज्ञितम्

tataḥ praviśya pātālaṁ gaṁgātoyapariplutaḥ| pūjayāmāsa talliṁgaṁ hāṭakeśvarasaṁjñitam

फिर पाताल में प्रवेश कर गंगाजल में स्नान कर उन्होंने हाटकेश्वर नामक उस लिंग की पूजा की।

श्लोक 126 (skanda.6.8.126)

अथ तस्य क्षणाज्जातं शरीरं मलवर्जितम्। दुर्गन्धश्च गतो नाशं तेजोवृद्धिर्बभूव ह

atha tasya kṣaṇājjātaṁ śarīraṁ malavarjitam| durgandhaśca gato nāśaṁ tejovṛddhirbabhūva ha

उसी क्षण उनका शरीर मलरहित हो गया, दुर्गंध नष्ट हो गई, और तेज बढ़ने लगा।

श्लोक 127 (skanda.6.8.127)

एतस्मिन्नंतरे प्राप्ता ब्रह्मविष्णुमुखाः सुराः। प्रोचुश्च देवराजं तं मुक्तपापं प्रहर्षिताः

etasminnaṁtare prāptā brahmaviṣṇumukhāḥ surāḥ| procuśca devarājaṁ taṁ muktapāpaṁ praharṣitāḥ

इसी बीच ब्रह्मा-विष्णु आदि देवगण वहाँ पहुँचे और पापमुक्त देवराज से हर्षपूर्वक बोले।

श्लोक 128 (skanda.6.8.128)

प्राप्तस्तु मेध्यतां शक्र विमुक्तो ब्रह्महत्यया। तस्मादागच्छ गच्छामः सहितास्त्रिदशालयम्

prāptastu medhyatāṁ śakra vimukto brahmahatyayā| tasmādāgaccha gacchāmaḥ sahitāstridaśālayam

हे इंद्र! अब तुम ब्रह्महत्या से मुक्त होकर पवित्र हो गए हो; अतः आओ, हम सब मिलकर देवलोक चलें।

श्लोक 129 (skanda.6.8.129)

एतन्नाग बिलं शक्र पुनः पूरय पांसुभिः। नो चेदागत्य चानेन मानुषाः सिद्धिहेतवः

etannāga bilaṁ śakra punaḥ pūraya pāṁsubhiḥ| no cedāgatya cānena mānuṣāḥ siddhihetavaḥ

किंतु हे इंद्र! इस नागबिल को पुनः धूल से भर दो, अन्यथा इस मार्ग से आकर मनुष्य सिद्धि प्राप्त कर लेंगे —

श्लोक 130 (skanda.6.8.130)

एतल्लिंगं समभ्यर्च्य स्नात्वा भागीरथीजले। अपि पापसमायुक्ता यास्यंति परमां गतिम्

etalliṁgaṁ samabhyarcya snātvā bhāgīrathījale| api pāpasamāyuktā yāsyaṁti paramāṁ gatim

— क्योंकि इस लिंग की पूजा और भागीरथी जल में स्नान करके पापयुक्त मनुष्य भी परम गति को प्राप्त कर लेंगे।

श्लोक 131 (skanda.6.8.131)

ततस्ते त्रिदशाः सर्वे स च देवं शतक्रतुः। प्रणिपत्य पुनः प्रोच्चैः प्रजग्मुस्त्रिदशालयम्

tataste tridaśāḥ sarve sa ca devaṁ śatakratuḥ| praṇipatya punaḥ proccaiḥ prajagmustridaśālayam

फिर वे समस्त देवगण तथा इंद्र, देव को पुनः प्रणाम कर हर्षपूर्वक देवलोक को चले गए।

श्लोक 132 (skanda.6.8.132)

ततो जज्ञे महांस्तत्र स्वर्गे वृत्रवधोत्सवः। देवेन्द्रत्वमनुप्राप्ते पुनः शक्रे द्विजोत्तमाः

tato jajñe mahāṁstatra svarge vṛtravadhotsavaḥ| devendratvamanuprāpte punaḥ śakre dvijottamāḥ

हे श्रेष्ठ द्विजो! तब इंद्रपद पुनः प्राप्त होने पर स्वर्ग में वृत्रवध का महान उत्सव मनाया गया।

श्लोक 133 (skanda.6.8.133)

सूत उवाच। एतद्वः सर्वमाख्यातं हाटकेश्वरसंभवम्। माहात्म्यं ब्राह्मणश्रेष्ठाः सर्वपातकनाशनम्

sūta uvāca| etadvaḥ sarvamākhyātaṁ hāṭakeśvarasaṁbhavam| māhātmyaṁ brāhmaṇaśreṣṭhāḥ sarvapātakanāśanam

सूत जी ने कहा — हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! यह हाटकेश्वर से उत्पन्न, समस्त पापों का नाश करने वाला माहात्म्य मैंने तुम सबको सुना दिया।

श्लोक 134 (skanda.6.8.134)

यश्चैतत्कीर्तयेद्भक्त्या शृणोति च समाहितः। स याति परमं स्थानं जरा मरणवर्जितम्

yaścaitatkīrtayedbhaktyā śṛṇoti ca samāhitaḥ| sa yāti paramaṁ sthānaṁ jarā maraṇavarjitam

जो भी इसका भक्तिपूर्वक कीर्तन करता है अथवा एकाग्रचित्त होकर सुनता है, वह जरा-मरण से रहित परम स्थान को प्राप्त करता है।

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