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नागर खण्ड · अध्याय 16

रक्तशृंग-सांनिध्य-सेवन का फल

अध्याय 15अध्याय-सूचीअध्याय 17

श्लोक 1 (skanda.6.16.1)

सूत उवाच । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन त्यक्त्वाऽन्या निखिलाः क्रियाः । रक्तशृंगस्य सांनिध्यं सेवनीयं विचक्षणैः

sūta uvāca tasmātsarvaprayatnena tyaktvā'nyā nikhilāḥ kriyāḥ raktaśṛṁgasya sāṁnidhyaṁ sevanīyaṁ vicakṣaṇaiḥ

सूत जी ने कहा — इसलिए बुद्धिमान लोगों को अन्य सभी कर्मों को त्यागकर, पूर्ण प्रयत्न से रक्तशृंग के सांनिध्य का सेवन करना चाहिए।

श्लोक 2 (skanda.6.16.2)

किं दानैः किं क्रियाकांडैः किं यज्ञैः किं व्रतैरपि । तत्क्षेत्रं सेवयेद्भक्त्या हाटकेश्वरसंभवम्

kiṁ dānaiḥ kiṁ kriyākāṁḍaiḥ kiṁ yajñaiḥ kiṁ vratairapi tatkṣetraṁ sevayedbhaktyā hāṭakeśvarasaṁbhavam

दान से क्या, कर्मकांडों से क्या, यज्ञों से क्या, व्रतों से भी क्या लाभ? मनुष्य को भक्तिपूर्वक हाटकेश्वर से उत्पन्न उस क्षेत्र का ही सेवन करना चाहिए।

श्लोक 3 (skanda.6.16.3)

अग्निष्टोमादयो यज्ञाः सर्वे संपूर्णदक्षिणाः । तस्य क्षेत्रस्य पुरतः कलां नार्हंति षोडशीम्

agniṣṭomādayo yajñāḥ sarve saṁpūrṇadakṣiṇāḥ tasya kṣetrasya purataḥ kalāṁ nārhaṁti ṣoḍaśīm

अग्निष्टोम आदि समस्त यज्ञ, चाहे वे संपूर्ण दक्षिणा से युक्त क्यों न हों, उस क्षेत्र की सोलहवीं कला के भी योग्य नहीं हैं।

श्लोक 4 (skanda.6.16.4)

चान्द्रायणानि कृच्छ्राणि तथा सांतपनानि च । तस्य क्षेत्रस्य पुरतः कलां नार्हंति षोडशीम्

cāndrāyaṇāni kṛcchrāṇi tathā sāṁtapanāni ca tasya kṣetrasya purataḥ kalāṁ nārhaṁti ṣoḍaśīm

चांद्रायण व्रत, कृच्छ्र व्रत तथा सांतपन व्रत भी उस क्षेत्र की सोलहवीं कला के योग्य नहीं हैं।

श्लोक 5 (skanda.6.16.5)

प्रभासाद्यानि तीर्थानि गङ्गाद्याः सरितस्तथा । तस्य क्षेत्रस्य पुरतः कलां नार्हंति षोडशीम्

prabhāsādyāni tīrthāni gaṅgādyāḥ saritastathā tasya kṣetrasya purataḥ kalāṁ nārhaṁti ṣoḍaśīm

प्रभास आदि तीर्थ, तथा गंगा आदि नदियाँ भी उस क्षेत्र की सोलहवीं कला के योग्य नहीं हैं।

श्लोक 6 (skanda.6.16.6)

भूमिदानानि सर्वाणि धर्माः सर्वे दयादिकाः । तस्य क्षेत्रस्य पुरतः कलां नार्हंति षोडशीम्

bhūmidānāni sarvāṇi dharmāḥ sarve dayādikāḥ tasya kṣetrasya purataḥ kalāṁ nārhaṁti ṣoḍaśīm

समस्त भूमि-दान, दया आदि से युक्त सभी धर्म भी उस क्षेत्र की सोलहवीं कला के योग्य नहीं हैं।

श्लोक 7 (skanda.6.16.7)

तत्र राजर्षयः पूर्वं प्रभूताः सिद्धिमागताः । पशवः पक्षिणः सर्पाः सिंहव्याघ्रा मृगादयः

tatra rājarṣayaḥ pūrvaṁ prabhūtāḥ siddhimāgatāḥ paśavaḥ pakṣiṇaḥ sarpāḥ siṁhavyāghrā mṛgādayaḥ

वहाँ पहले अनेक राजर्षियों ने सिद्धि प्राप्त की, तथा पशु, पक्षी, सर्प, सिंह, व्याघ्र और मृग आदि ने भी।

श्लोक 8 (skanda.6.16.8)

तत्र कालवशान्नष्टास्तेऽपि प्राप्ता दिवालयम् । यस्तत्र व्रतहीनोऽपि कृषिकर्मरतोऽपि वा

tatra kālavaśānnaṣṭāste'pi prāptā divālayam yastatra vratahīno'pi kṛṣikarmarato'pi vā

वहाँ काल के वशीभूत होकर मरने पर भी वे स्वर्गलोक को प्राप्त हुए। जो व्यक्ति वहाँ व्रतहीन होकर भी, अथवा कृषिकर्म में लगा हुआ भी —

श्लोक 9 (skanda.6.16.9)

निवासं कुरुते विप्रा मृतस्तत्र दिवं व्रजेत् । किंवा च बहुनोक्तेन भूयोभूयो द्विजोत्तमाः

nivāsaṁ kurute viprā mṛtastatra divaṁ vrajet kiṁvā ca bahunoktena bhūyobhūyo dvijottamāḥ

हे विप्रो! वहाँ निवास करता है, वह मरणोपरांत स्वर्ग को प्राप्त होता है। हे श्रेष्ठ द्विजो! अधिक कहने से क्या लाभ — बार-बार यही कहूँगा —

श्लोक 10 (skanda.6.16.10)

श्रूयतां परमं गुह्यं तस्य क्षेत्रस्य संभवम् । पुनंति क्षेत्रतीर्थानि संवासादिह मानवान्

śrūyatāṁ paramaṁ guhyaṁ tasya kṣetrasya saṁbhavam punaṁti kṣetratīrthāni saṁvāsādiha mānavān

— उस क्षेत्र की उत्पत्ति का यह परम गोपनीय रहस्य सुनिए। यहाँ निवास करने मात्र से क्षेत्र के तीर्थ मनुष्यों को पवित्र कर देते हैं।

श्लोक 11 (skanda.6.16.11)

हाटकेश्वरजं क्षेत्रं पुनाति स्मरणादपि । किं पुनर्दर्शनाद्विप्राः स्पर्शनाच्च विशेषतः

hāṭakeśvarajaṁ kṣetraṁ punāti smaraṇādapi kiṁ punardarśanādviprāḥ sparśanācca viśeṣataḥ

हाटकेश्वर से उत्पन्न वह क्षेत्र केवल स्मरण मात्र से ही मनुष्यों को पवित्र कर देता है। हे विप्रो! फिर दर्शन और विशेष रूप से स्पर्श से तो कहना ही क्या?

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