नागर खण्ड · अध्याय 17
विदूरथ की मृगया
श्लोक 1 (skanda.6.17.1)
ऋषय ऊचुः । चमत्कारपुरोत्पत्तिः श्रुता त्वत्तो महामते । तत्क्षेत्रस्य प्रमाणं यत्तदस्माकं प्रकीर्तय
ṛṣaya ūcuḥ camatkārapurotpattiḥ śrutā tvatto mahāmate tatkṣetrasya pramāṇaṁ yattadasmākaṁ prakīrtaya
ऋषियों ने कहा — हे महामते! हमने आपसे चमत्कारपुर की उत्पत्ति सुनी। अब उस क्षेत्र का जो विस्तार-प्रमाण है, वह हमें बताइए।
श्लोक 2 (skanda.6.17.2)
यानि तत्र च पुण्यानि तीर्थान्यायतनानि च । सहितानि प्रभावेण तानि सर्वाणि कीर्तय
yāni tatra ca puṇyāni tīrthānyāyatanāni ca sahitāni prabhāveṇa tāni sarvāṇi kīrtaya
वहाँ जो भी पुण्य तीर्थ और देवालय हैं, उन सबको उनके प्रभाव के साथ हमें बताइए।
श्लोक 3 (skanda.6.17.3)
सूत उवाच । पञ्चक्रोशप्रमाणेन क्षेत्रं ब्राह्मणसत्तमाः । आयामव्यासतश्चैव चमत्कारपुरोत्तमम्
sūta uvāca pañcakrośapramāṇena kṣetraṁ brāhmaṇasattamāḥ āyāmavyāsataścaiva camatkārapurottamam
सूत जी ने कहा — हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! वह श्रेष्ठ चमत्कारपुर क्षेत्र लंबाई और चौड़ाई दोनों में पाँच-पाँच क्रोश के प्रमाण वाला है।
श्लोक 4 (skanda.6.17.4)
प्राच्यां तस्य गयाशीर्षं पश्चिमेन हरेः पदम् । दक्षिणोत्तरयोश्चैव गोकर्णेश्वरसंज्ञितौ
prācyāṁ tasya gayāśīrṣaṁ paścimena hareḥ padam dakṣiṇottarayoścaiva gokarṇeśvarasaṁjñitau
उसके पूर्व में गयाशीर्ष है, पश्चिम में हरि का चरण-चिह्न (हरिपद), तथा दक्षिण और उत्तर में गोकर्णेश्वर नाम के दो स्थान हैं।
श्लोक 5 (skanda.6.17.5)
हाटकेश्वर संज्ञं तु पूर्वमासीद्द्विजोत्तमाः । तत्क्षेत्रं प्रथितं लोके सर्वपातकनाशनम्
hāṭakeśvara saṁjñaṁ tu pūrvamāsīddvijottamāḥ tatkṣetraṁ prathitaṁ loke sarvapātakanāśanam
हे श्रेष्ठ द्विजो! पहले वह क्षेत्र हाटकेश्वर नाम से जाना जाता था, और संसार में समस्त पापों का नाश करने वाला के रूप में प्रसिद्ध था।
श्लोक 6 (skanda.6.17.6)
यतः प्रभृति विप्रेभ्यो दत्तं तेन महात्मना । चमत्कारेण तत्स्थानं नाम्ना ख्यातिं ततो गतम्
yataḥ prabhṛti viprebhyo dattaṁ tena mahātmanā camatkāreṇa tatsthānaṁ nāmnā khyātiṁ tato gatam
जब से उस महात्मा चमत्कार ने वह स्थान ब्राह्मणों को दान किया, तब से वह स्थान उन्हीं के नाम से प्रसिद्ध हो गया।
श्लोक 7 (skanda.6.17.7)
ब्राह्मणा ऊचुः । यदेतद्भवता प्रोक्तं तस्य पूर्वे गयाशिरः । माहात्म्यं तस्य नो ब्रूहि सूतपुत्र सविस्तरम्
brāhmaṇā ūcuḥ yadetadbhavatā proktaṁ tasya pūrve gayāśiraḥ māhātmyaṁ tasya no brūhi sūtaputra savistaram
ब्राह्मणों ने कहा — हे सूतपुत्र! आपने जो कहा कि उसके पूर्व में गयाशीर्ष है, उसकी महिमा हमें विस्तार से बताइए।
श्लोक 8 (skanda.6.17.8)
सूत उवाच । आसीद्विदूरथोनाम हैहयाधिपतिः पुरा । यो वै दानपतिर्दक्षः शत्रुपक्षक्षयावहः
sūta uvāca āsīdvidūrathonāma haihayādhipatiḥ purā yo vai dānapatirdakṣaḥ śatrupakṣakṣayāvahaḥ
सूत जी ने कहा — प्राचीन काल में विदूरथ नाम का एक हैहयवंशी राजा था, जो दान देने में उदार, कुशल और शत्रुपक्ष का नाश करने वाला था।
श्लोक 9 (skanda.6.17.9)
स कदाचिन्मृगान्हंतुं नृपः सेनावृतो ययौ । नानावृक्षलताकीर्णं वनं श्वापदसंकुलम्
sa kadācinmṛgānhaṁtuṁ nṛpaḥ senāvṛto yayau nānāvṛkṣalatākīrṇaṁ vanaṁ śvāpadasaṁkulam
एक बार वह राजा हिरणों का शिकार करने के लिए सेना से घिरा हुआ, अनेक वृक्षों और लताओं से भरे तथा हिंसक पशुओं से युक्त वन में गया।
श्लोक 10 (skanda.6.17.10)
स जघान मृगांस्तत्र शरैराशीविषोपमैः । महिषांश्चवराहांश्च तरक्षूञ्च्छम्बरान्रुरून्
sa jaghāna mṛgāṁstatra śarairāśīviṣopamaiḥ mahiṣāṁścavarāhāṁśca tarakṣūñcchambarānrurūn
उसने वहाँ विष-सर्प के समान बाणों से भैंसों, सूअरों, लकड़बग्घों, शंबरों और रुरु मृगों को मार गिराया।
श्लोक 11 (skanda.6.17.11)
सिंहान्व्याघ्रान्गजान्मत्ताञ्च्छतशोऽथ सहस्रशः । अथ तेन मृगो विद्धः शरेणाऽऽनतपर्वणा
siṁhānvyāghrāngajānmattāñcchataśo'tha sahasraśaḥ atha tena mṛgo viddhaḥ śareṇā''nataparvaṇā
सैकड़ों और हजारों की संख्या में सिंहों, व्याघ्रों और मस्त हाथियों को भी उसने मार गिराया। तब उसके द्वारा एक झुके हुए पर्व वाले बाण से एक मृग बींध दिया गया।
श्लोक 12 (skanda.6.17.12)
न पपात धरापृष्ठे सशरो दुद्रुवे द्रुतम् । ततः स कौतुकाविष्टस्तस्य पृष्ठे हयोत्तमम् । प्रेरयामास वेगेन मनोमारुतवेगधृक्
na papāta dharāpṛṣṭhe saśaro dudruve drutam tataḥ sa kautukāviṣṭastasya pṛṣṭhe hayottamam prerayāmāsa vegena manomārutavegadhṛk
वह मृग भूमि पर नहीं गिरा, बल्कि बाण सहित तीव्र गति से भाग गया। तब कौतूहल से भरे उस राजा ने उसके पीछे मन और वायु के समान वेग वाले श्रेष्ठ घोड़े को तेजी से दौड़ाया।
श्लोक 13 (skanda.6.17.13)
ततः सैन्यं समुत्सज्य मृगं लिप्सुर्महीपतिः । अन्यद्वनांतरं प्राप्तो रौद्रं चित्तभयावहम्
tataḥ sainyaṁ samutsajya mṛgaṁ lipsurmahīpatiḥ anyadvanāṁtaraṁ prāpto raudraṁ cittabhayāvaham
तब सेना को छोड़कर, मृग को पकड़ने की इच्छा से वह राजा एक अन्य वन में जा पहुँचा, जो भयंकर और मन में भय उत्पन्न करने वाला था।
श्लोक 14 (skanda.6.17.14)
कण्टकीबदरीप्रायं शाल्मलीवनसंकुलम् । तथान्यैः कण्टकाकीर्णै रूक्षै र्वृक्षैः समन्वितम्
kaṇṭakībadarīprāyaṁ śālmalīvanasaṁkulam tathānyaiḥ kaṇṭakākīrṇai rūkṣai rvṛkṣaiḥ samanvitam
वह वन प्रायः कँटीले बेर के वृक्षों और शाल्मली वृक्षों से भरा हुआ था, तथा अन्य भी कँटीले, रूखे वृक्षों से युक्त था।
श्लोक 15 (skanda.6.17.15)
तत्र रूक्षाऽखिला भूमिर्निर्जला तमसा वृता । चीरिकोलूकगृधाढ्या शीर्षच्छायाविवर्जिता
tatra rūkṣā'khilā bhūmirnirjalā tamasā vṛtā cīrikolūkagṛdhāḍhyā śīrṣacchāyāvivarjitā
वहाँ की समस्त भूमि रूखी, जलरहित, अंधकार से आच्छादित थी, जो चील, उल्लू और गिद्धों से भरी हुई थी, और सिर पर छाया से रहित थी।
श्लोक 16 (skanda.6.17.16)
ग्रीष्मे मध्यगते सूर्ये मृगाकृष्टः स पार्थिवः । दूराध्वानं जगामाऽथ प्रासपाणिर्वराश्वगः
grīṣme madhyagate sūrye mṛgākṛṣṭaḥ sa pārthivaḥ dūrādhvānaṁ jagāmā'tha prāsapāṇirvarāśvagaḥ
ग्रीष्म ऋतु में सूर्य के मध्याह्न में रहते हुए, मृग के पीछे खिंचा हुआ वह राजा, हाथ में भाला लिए, श्रेष्ठ घोड़े पर सवार होकर दूर के मार्ग पर चला गया।
श्लोक 17 (skanda.6.17.17)
तेन तस्यानुगा भृत्याः सर्वे सुश्रांतवाहनाः । क्षुत्पिपासाकुलाः श्रांताः स्थाने स्थाने समाश्रिताः
tena tasyānugā bhṛtyāḥ sarve suśrāṁtavāhanāḥ kṣutpipāsākulāḥ śrāṁtāḥ sthāne sthāne samāśritāḥ
इसके कारण उसके पीछे चलने वाले सभी सेवक, जिनके वाहन अत्यंत थक गए थे, भूख-प्यास से व्याकुल और थके हुए, यहाँ-वहाँ ठहर गए।
श्लोक 18 (skanda.6.17.18)
सिंहव्याघ्रैस्तथा चान्यैः पतिता नष्टचेतनाः । भक्ष्यंते चेतयन्तोऽपि तथाऽन्ये चलनाक्षमाः
siṁhavyāghraistathā cānyaiḥ patitā naṣṭacetanāḥ bhakṣyaṁte cetayanto'pi tathā'nye calanākṣamāḥ
गिरकर बेहोश हुए कुछ लोगों को सिंहों, व्याघ्रों तथा अन्य हिंसक पशुओं ने खा डाला, और कुछ अन्य लोग होश में रहते हुए भी चलने में असमर्थ होकर वहीं खाए गए।
श्लोक 19 (skanda.6.17.19)
ततः सोऽपि महीपालः क्षुत्पिपासासमाकुलः । दृष्ट्वा तद्व्यसनं प्राप्तमात्मनः सेवकैः समम्
tataḥ so'pi mahīpālaḥ kṣutpipāsāsamākulaḥ dṛṣṭvā tadvyasanaṁ prāptamātmanaḥ sevakaiḥ samam
तब वह राजा भी भूख-प्यास से व्याकुल होकर, अपने सेवकों के साथ अपने ऊपर आई इस विपत्ति को देखकर —
श्लोक 20 (skanda.6.17.20)
कांतारस्यांतमन्विच्छन्प्रेरयामास तं हयम् । जात्यं सर्वगुणोपेतं कशाघातैः प्रताडयन्
kāṁtārasyāṁtamanvicchanprerayāmāsa taṁ hayam jātyaṁ sarvaguṇopetaṁ kaśāghātaiḥ pratāḍayan
— उस दुर्गम वन के अंत की खोज करते हुए, कोड़ों की मार से उस उत्तम नस्ल और सब गुणों से युक्त घोड़े को दौड़ाने लगा।
श्लोक 21 (skanda.6.17.21)
ततः स नृपतिस्तेन वायुवेगेन वाजिना । नीतो दूरं दुर्गमार्गं सर्वजंतुविवर्जितम्
tataḥ sa nṛpatistena vāyuvegena vājinā nīto dūraṁ durgamārgaṁ sarvajaṁtuvivarjitam
तब उस वायु के समान वेग वाले घोड़े के द्वारा वह राजा दूर, एक दुर्गम मार्ग पर ले जाया गया, जो समस्त जीवों से रहित था।
श्लोक 22 (skanda.6.17.22)
एवं तस्य नरेन्द्रस्य कांदिशीकेऽनवस्थिते । सोऽश्वोऽपतद्धरापृष्ठे सोऽप्यधस्तात्तुरंगमात्
evaṁ tasya narendrasya kāṁdiśīke'navasthite so'śvo'pataddharāpṛṣṭhe so'pyadhastātturaṁgamāt
इस प्रकार जब वह राजा दिशाहीन होकर अस्थिर अवस्था में भटक रहा था, तभी वह घोड़ा भूमि पर गिर पड़ा, और राजा भी उस घोड़े के नीचे आ गिरा।