नागर खण्ड · अध्याय 18
विदूरथ का आश्रम-आगमन
श्लोक 1 (skanda.6.18.1)
सूत उवाच । ततः सोऽपि महीपालः क्षुत्पिपासासमाकुलः । पपात धरणीपृष्ठे पद्भ्यां गत्वा वनांतरम्
sūta uvāca tataḥ so'pi mahīpālaḥ kṣutpipāsāsamākulaḥ papāta dharaṇīpṛṣṭhe padbhyāṁ gatvā vanāṁtaram
सूत जी ने कहा — तब भूख-प्यास से व्याकुल हुआ वह राजा भी, पैदल चलकर वन के भीतरी भाग में जा पहुँचा और भूमि पर गिर पड़ा।
श्लोक 2 (skanda.6.18.2)
अथाऽपश्यद्वियत्स्थानात्स त्रीन्प्रेतान्सु दारुणान् । ऊर्ध्वकेशान्सुरक्ताक्षान्कृष्णदन्तान्कृशोदरान्
athā'paśyadviyatsthānātsa trīnpretānsu dāruṇān ūrdhvakeśānsuraktākṣānkṛṣṇadantānkṛśodarān
तब उसने आकाश-मार्ग से आते हुए तीन अत्यंत भयंकर प्रेतों को देखा, जिनके बाल ऊपर की ओर खड़े थे, आँखें लाल थीं, दाँत काले थे, और पेट दुबले थे।
श्लोक 3 (skanda.6.18.3)
तान्दृष्ट्वा भयसंत्रस्तो विशेषेण स भूपतिः । निराशो जीविते कृच्छ्रादिदं वचनमब्रवीत्
tāndṛṣṭvā bhayasaṁtrasto viśeṣeṇa sa bhūpatiḥ nirāśo jīvite kṛcchrādidaṁ vacanamabravīt
उन्हें देखकर वह राजा अत्यंत भय से व्याकुल हो गया, अपने जीवन से निराश होकर कठिनाई से यह वचन बोला।
श्लोक 4 (skanda.6.18.4)
के यूयं विकृताकारा मया दृष्टा न कर्हिचित् । एवंविधा नृलोकेऽत्र भ्रमता प्राग्विभीषणाः
ke yūyaṁ vikṛtākārā mayā dṛṣṭā na karhicit evaṁvidhā nṛloke'tra bhramatā prāgvibhīṣaṇāḥ
"तुम कौन हो, जिनका ऐसा विकृत रूप मैंने पहले कभी नहीं देखा? मैंने पहले मनुष्यलोक में इस प्रकार के इतने भयंकर रूप कभी नहीं देखे।"
श्लोक 5 (skanda.6.18.5)
विदूरथो नरेन्द्रोऽहं क्षुत्पिपासातिपीडितः । मृगलिप्सुरिह प्राप्तो वने जन्तुविवर्जिते
vidūratho narendro'haṁ kṣutpipāsātipīḍitaḥ mṛgalipsuriha prāpto vane jantuvivarjite
"मैं राजा विदूरथ हूँ, भूख-प्यास से अत्यंत पीड़ित। मृग को पकड़ने की इच्छा से इस जीवरहित वन में आ पहुँचा हूँ।"
श्लोक 6 (skanda.6.18.6)
ततस्तेषां तु यो ज्येष्ठो मांसादः प्रत्युवाच तम् । कृतांजलिपुटो भूत्वा विनयावनतः स्थितः
tatasteṣāṁ tu yo jyeṣṭho māṁsādaḥ pratyuvāca tam kṛtāṁjalipuṭo bhūtvā vinayāvanataḥ sthitaḥ
तब उनमें से जो सबसे ज्येष्ठ था, मांसाद नामक प्रेत, हाथ जोड़कर विनयपूर्वक झुककर खड़ा होकर उसे उत्तर देने लगा।
श्लोक 7 (skanda.6.18.7)
वयं प्रेता महाराज निवसामोऽत्र कानने । स्वकर्मजनिताद्दोषाद्दुःखेन महता वृताः
vayaṁ pretā mahārāja nivasāmo'tra kānane svakarmajanitāddoṣādduḥkhena mahatā vṛtāḥ
"हे महाराज! हम प्रेत हैं, इस वन में निवास करते हैं, अपने ही कर्मों से उत्पन्न दोष के कारण महान दुःख से घिरे हुए हैं।"
श्लोक 8 (skanda.6.18.8)
अहं मांसादकोनाम द्वितीयोऽयं विदैवतः । कृतघ्नश्च तृतीयस्तु त्रयाणामेष पापकृत्
ahaṁ māṁsādakonāma dvitīyo'yaṁ vidaivataḥ kṛtaghnaśca tṛtīyastu trayāṇāmeṣa pāpakṛt
"मेरा नाम मांसादक है, यह दूसरा विदैवत है, और यह तीसरा कृतघ्न है — हम तीनों ही पापकर्मी हैं।"
श्लोक 9 (skanda.6.18.9)
राजोवाच । सर्वेषां देहि नां नाम जायते पितृमातृजम् । किमेतत्कारणं येन सर्वे यूयं स्वनामकाः
rājovāca sarveṣāṁ dehi nāṁ nāma jāyate pitṛmātṛjam kimetatkāraṇaṁ yena sarve yūyaṁ svanāmakāḥ
राजा ने कहा — सब देहधारियों का नाम माता-पिता के द्वारा दिया जाता है। यह क्या कारण है कि तुम सब अपने-अपने (गुण-सूचक कर्म-) नामों से जाने जाते हो?
श्लोक 10 (skanda.6.18.10)
तच्छ्रुत्वा प्राह मांसादः कर्मनामानि पार्थिव । मिथः कृतानि संज्ञार्थमस्माभिः स्वयमेव हि
tacchrutvā prāha māṁsādaḥ karmanāmāni pārthiva mithaḥ kṛtāni saṁjñārthamasmābhiḥ svayameva hi
यह सुनकर मांसाद ने कहा — हे राजन्! ये हमारे कर्मों से बने नाम हैं, जो हमने आपस में पहचान के लिए स्वयं ही रख लिए हैं।
श्लोक 11 (skanda.6.18.11)
शृणुष्वाऽवहितो भूत्वा सर्वेषां नः पृथक्पृथक् । कर्मणा येन संजातं प्रेतत्वमिह भूमिप
śṛṇuṣvā'vahito bhūtvā sarveṣāṁ naḥ pṛthakpṛthak karmaṇā yena saṁjātaṁ pretatvamiha bhūmipa
हे राजन्! एकाग्रचित्त होकर सुनिए — किस-किस कर्म के कारण हम में से प्रत्येक को यहाँ प्रेतत्व प्राप्त हुआ।
श्लोक 12 (skanda.6.18.12)
वयं हि ब्राह्मणा जात्या वैदिशाख्ये पुरे नृप । देवरातस्य विप्रस्य गृहे जाता महात्मनः
vayaṁ hi brāhmaṇā jātyā vaidiśākhye pure nṛpa devarātasya viprasya gṛhe jātā mahātmanaḥ
हे राजन्! हम जाति से ब्राह्मण हैं, विदिशा नामक नगर में महात्मा देवरात नामक विप्र के घर में उत्पन्न हुए।
श्लोक 13 (skanda.6.18.13)
नास्तिका भिन्नमर्यादाः परदाररताः सदा । पाप कर्मरतास्तत्र शुभकर्मविवर्जिताः
nāstikā bhinnamaryādāḥ paradāraratāḥ sadā pāpa karmaratāstatra śubhakarmavivarjitāḥ
हम नास्तिक थे, मर्यादाओं को तोड़ने वाले, सदा परस्त्रीगामी, पापकर्मों में रत और शुभकर्मों से रहित थे।
श्लोक 14 (skanda.6.18.14)
जिह्वालौल्यप्रसंगेन मया भुक्तं सदाऽऽमिषम् । तेन मे कर्मजं नाम मांसादाख्यं व्यवस्थितम्
jihvālaulyaprasaṁgena mayā bhuktaṁ sadā''miṣam tena me karmajaṁ nāma māṁsādākhyaṁ vyavasthitam
जिह्वा के लोलुपतावश मैंने सदा मांस खाया — इसी कारण मेरा यह कर्मजनित नाम "मांसाद" पड़ा।
श्लोक 15 (skanda.6.18.15)
द्वितीयोऽयं महाराज यस्तिष्ठति तवाऽग्रतः । अनेनाऽन्नं सदा भुक्तमकृत्वा देवतार्चनम्
dvitīyo'yaṁ mahārāja yastiṣṭhati tavā'grataḥ anenā'nnaṁ sadā bhuktamakṛtvā devatārcanam
हे महाराज! यह दूसरा जो आपके सामने खड़ा है, इसने सदा देवताओं की पूजा किए बिना ही भोजन किया।
श्लोक 16 (skanda.6.18.16)
तेन कर्मविपाकेन प्रेतयोनिं समाश्रितः । विदैवत इति ख्यातो द्वितीयोऽयं सुपापकृत्
tena karmavipākena pretayoniṁ samāśritaḥ vidaivata iti khyāto dvitīyo'yaṁ supāpakṛt
उसी कर्म के फलस्वरूप यह प्रेत-योनि को प्राप्त हुआ, और यह दूसरा महापापी "विदैवत" नाम से प्रसिद्ध हुआ।
श्लोक 17 (skanda.6.18.17)
सदैवाऽनुष्ठिताऽनेन सुपापेन कृतघ्नता । कृतघ्नः प्रोच्यते तेन कर्मणा नृपसत्तम
sadaivā'nuṣṭhitā'nena supāpena kṛtaghnatā kṛtaghnaḥ procyate tena karmaṇā nṛpasattama
हे राजश्रेष्ठ! इस महापापी ने सदा कृतघ्नता का ही आचरण किया, इसी कर्म के कारण यह "कृतघ्न" कहलाता है।
श्लोक 18 (skanda.6.18.18)
राजोवाच । आहारेण नृलोकेऽस्मिन्सर्वे जीवन्ति जन्तवः । युष्माकं कतमो योऽत्र प्रोच्यतां मे सविस्तरम्
rājovāca āhāreṇa nṛloke'sminsarve jīvanti jantavaḥ yuṣmākaṁ katamo yo'tra procyatāṁ me savistaram
राजा ने कहा — इस मनुष्यलोक में समस्त प्राणी आहार से जीवित रहते हैं। तुम्हारा आहार क्या है, यह मुझे विस्तार से बताओ।
श्लोक 19 (skanda.6.18.19)
मांसाद उवाच । भोज्यकाले गृहे यत्र स्त्रीणां युद्धं प्रवर्तते । अपि मन्त्रौषधीप्रायं प्रेता भुंजति तत्र हि
māṁsāda uvāca bhojyakāle gṛhe yatra strīṇāṁ yuddhaṁ pravartate api mantrauṣadhīprāyaṁ pretā bhuṁjati tatra hi
मांसाद ने कहा — जिस घर में भोजन के समय स्त्रियों में झगड़ा होता है, वहाँ प्रेत ही उस भोजन को खाते हैं, चाहे वह मंत्र और औषधियों से सिद्ध क्यों न हो।
श्लोक 20 (skanda.6.18.20)
भुज्यते यत्र भूपाल वेंश्वदेवं विना नरैः । पाकस्याग्रमदत्त्वा च प्रेता भुंजति तत्र च
bhujyate yatra bhūpāla veṁśvadevaṁ vinā naraiḥ pākasyāgramadattvā ca pretā bhuṁjati tatra ca
हे राजन्! जहाँ लोग वैश्वदेव किए बिना भोजन करते हैं, और जहाँ बिना पहला भाग अर्पित किए भोजन बनाया जाता है, वहाँ भी प्रेत ही भोजन करते हैं।
श्लोक 21 (skanda.6.18.21)
रात्रौ यत्क्रियते श्राद्धं दानं वा पर्ववर्जितम् । तत्सर्वं नृपशार्दूल प्रेतानां भोजनं भवेत्
rātrau yatkriyate śrāddhaṁ dānaṁ vā parvavarjitam tatsarvaṁ nṛpaśārdūla pretānāṁ bhojanaṁ bhavet
हे राजाओं में सिंह! रात्रि में किया गया श्राद्ध या पर्व-रहित दान — यह सब भी प्रेतों का ही भोजन बन जाता है।
श्लोक 22 (skanda.6.18.22)
यस्मिन्नो मार्जनं हर्म्ये क्रियते नोपलेपनम् । न मांगल्यं च सत्कारः प्रेता भुंजति तत्र हि
yasminno mārjanaṁ harmye kriyate nopalepanam na māṁgalyaṁ ca satkāraḥ pretā bhuṁjati tatra hi
जिस घर में झाड़ू नहीं लगाई जाती, लीपा नहीं जाता, न मंगल कार्य होता है और न सत्कार, वहाँ भी प्रेत ही भोजन करते हैं।
श्लोक 23 (skanda.6.18.23)
भिन्नभाण्डपरित्यागो यत्र न क्रियते गृहे । न च वेदध्वनिर्यत्र प्रेता भुञ्जंति तत्र हि
bhinnabhāṇḍaparityāgo yatra na kriyate gṛhe na ca vedadhvaniryatra pretā bhuñjaṁti tatra hi
जिस घर में टूटे बर्तनों को त्यागा नहीं जाता, और जहाँ वेदध्वनि नहीं सुनाई देती, वहाँ भी प्रेत ही भोजन करते हैं।
श्लोक 24 (skanda.6.18.24)
यच्छ्राद्धं दक्षिणाहीनं क्रियाहीनं च वा नृप । तथा रजस्वलादृष्टं तदस्माकं प्रजायते
yacchrāddhaṁ dakṣiṇāhīnaṁ kriyāhīnaṁ ca vā nṛpa tathā rajasvalādṛṣṭaṁ tadasmākaṁ prajāyate
हे राजन्! जो श्राद्ध दक्षिणा से रहित, विधि-क्रिया से रहित हो, तथा जिसे रजस्वला स्त्री ने देख लिया हो — वह सब हमारा ही भोजन बनता है।
श्लोक 25 (skanda.6.18.25)
हीनांगा ह्यधिकांगा वा यस्मिञ्च्छ्राद्धे द्विजातयः । भुंजते वृषलीनाथास्तदस्माकं प्रजायते
hīnāṁgā hyadhikāṁgā vā yasmiñcchrāddhe dvijātayaḥ bhuṁjate vṛṣalīnāthāstadasmākaṁ prajāyate
जिस श्राद्ध में अंगहीन या अधिक अंगों वाले द्विज, अथवा शूद्र-पत्नी वाले ब्राह्मण भोजन करते हैं, वह भी हमारा ही भोजन बनता है।
श्लोक 26 (skanda.6.18.26)
अतिथिर्यत्र संप्राप्तः श्राद्धकाल उपस्थिते । अपूजितो गृहाद्याति तच्छ्राद्धं प्रेततृप्तिदम्
atithiryatra saṁprāptaḥ śrāddhakāla upasthite apūjito gṛhādyāti tacchrāddhaṁ pretatṛptidam
जहाँ श्राद्ध के समय आया हुआ अतिथि बिना सम्मान के घर से लौट जाता है, वह श्राद्ध भी प्रेतों को ही तृप्त करता है।
श्लोक 27 (skanda.6.18.27)
किं वा ते बहुनोक्तेन शृणु संक्षेपतो नृप । अस्माकं भोजनं नित्यं यत्त्वं श्रुत्वा विगर्हसि
kiṁ vā te bahunoktena śṛṇu saṁkṣepato nṛpa asmākaṁ bhojanaṁ nityaṁ yattvaṁ śrutvā vigarhasi
हे राजन्! अधिक कहने से क्या लाभ? संक्षेप में सुनिए — हमारा नित्य भोजन वही है, जिसे सुनकर आप स्वयं ही घृणा करेंगे।
श्लोक 28 (skanda.6.18.28)
यदन्नं केशसूत्रास्थिश्लेष्मादिभिरुपप्लुतम् । हीनजात्यैश्च संस्पृष्टं तदस्माकं प्रजायते
yadannaṁ keśasūtrāsthiśleṣmādibhirupaplutam hīnajātyaiśca saṁspṛṣṭaṁ tadasmākaṁ prajāyate
जो अन्न बाल, धागे, हड्डी, कफ आदि से दूषित हो, अथवा नीच जाति वालों के द्वारा स्पर्श किया गया हो — वह भी हमारा भोजन बनता है।
श्लोक 29 (skanda.6.18.29)
राजोवाच । केन कर्मविपाकेन प्रेतत्वं जायते नृणाम् । एतन्मे सर्वमाचक्ष्व मांसाद मम पृच्छतः
rājovāca kena karmavipākena pretatvaṁ jāyate nṛṇām etanme sarvamācakṣva māṁsāda mama pṛcchataḥ
राजा ने कहा — हे मांसाद! किस कर्म के फल से मनुष्यों को प्रेतत्व प्राप्त होता है? मेरे पूछने पर तुम मुझे यह सब बताओ।
श्लोक 30 (skanda.6.18.30)
मांसाद उवाच । यो भवेन्मानवः क्षुद्रस्तथा पैशुन्यसूचकः । मृष्टमांसाशने सक्तः स प्रेतो जायते नरः
māṁsāda uvāca yo bhavenmānavaḥ kṣudrastathā paiśunyasūcakaḥ mṛṣṭamāṁsāśane saktaḥ sa preto jāyate naraḥ
मांसाद ने कहा — जो मनुष्य क्षुद्र स्वभाव का हो, चुगलखोर हो, और स्वादिष्ट मांस खाने में आसक्त हो, वह मनुष्य प्रेत बनता है।
श्लोक 31 (skanda.6.18.31)
अकृत्वा देवकार्यं च तथा च पितृतर्पणम् । योऽश्नात्यदत्त्वा भृत्येभ्यः स प्रेतो जायते नरः
akṛtvā devakāryaṁ ca tathā ca pitṛtarpaṇam yo'śnātyadattvā bhṛtyebhyaḥ sa preto jāyate naraḥ
जो देवकार्य और पितृतर्पण किए बिना, तथा सेवकों को दिए बिना ही भोजन कर लेता है, वह मनुष्य प्रेत बनता है।
श्लोक 32 (skanda.6.18.32)
परदाररतश्चैव परवित्तापहारकः । परापवादसंतुष्टः स प्रेतो जायते नरः
paradārarataścaiva paravittāpahārakaḥ parāpavādasaṁtuṣṭaḥ sa preto jāyate naraḥ
जो परस्त्रीगामी हो, दूसरों का धन हरने वाला हो, और दूसरों की निंदा में प्रसन्न रहता हो, वह मनुष्य प्रेत बनता है।
श्लोक 33 (skanda.6.18.33)
कन्यां यच्छति वृद्धाय नीचाय धनलिप्सया । कुरूपाय कुशीलाय स प्रेतो जायते नरः
kanyāṁ yacchati vṛddhāya nīcāya dhanalipsayā kurūpāya kuśīlāya sa preto jāyate naraḥ
जो धन के लोभ से अपनी कन्या किसी वृद्ध, नीच, कुरूप अथवा दुराचारी पुरुष को दे देता है, वह मनुष्य प्रेत बनता है।
श्लोक 34 (skanda.6.18.34)
कुले जातां विनीतां च धर्मपत्नीं सुखोच्छ्रिताम् । यस्त्यजेद्दोषनिर्मुक्तां स प्रेतो जायते नरः
kule jātāṁ vinītāṁ ca dharmapatnīṁ sukhocchritām yastyajeddoṣanirmuktāṁ sa preto jāyate naraḥ
जो अपनी कुलीन, विनम्र, गुणी और निर्दोष धर्मपत्नी को, जिसने उसे सुख दिया है, त्याग देता है, वह मनुष्य प्रेत बनता है।
श्लोक 35 (skanda.6.18.35)
देवस्त्रीगुरुवित्तानि यो गृहीत्वा न यच्छति । विशेषाद्ब्राह्मणस्वं च स प्रेतो जायते नरः
devastrīguruvittāni yo gṛhītvā na yacchati viśeṣādbrāhmaṇasvaṁ ca sa preto jāyate naraḥ
जो देवता, स्त्री अथवा गुरु का धन लेकर लौटाता नहीं, और विशेष रूप से ब्राह्मण की संपत्ति को हड़प लेता है, वह मनुष्य प्रेत बनता है।
श्लोक 36 (skanda.6.18.36)
परव्यसनसंतुष्टः कृतघ्नो गुरुतल्पगः । दूषको देवविप्राणां स प्रेतो जायते नरः
paravyasanasaṁtuṣṭaḥ kṛtaghno gurutalpagaḥ dūṣako devaviprāṇāṁ sa preto jāyate naraḥ
जो दूसरों की विपत्ति में प्रसन्न होता है, कृतघ्न है, गुरु-पत्नी के साथ व्यभिचार करता है, और देवताओं तथा ब्राह्मणों को दूषित करता है, वह मनुष्य प्रेत बनता है।
श्लोक 37 (skanda.6.18.37)
दीयमानस्य वित्तस्य ब्राह्मणेभ्यः सुपापकृत् । विघ्नमारभते यस्तु स प्रेतो जायते नरः
dīyamānasya vittasya brāhmaṇebhyaḥ supāpakṛt vighnamārabhate yastu sa preto jāyate naraḥ
जो महापापी ब्राह्मणों को दिए जाने वाले धन में बाधा उत्पन्न करता है, वह मनुष्य प्रेत बनता है।
श्लोक 38 (skanda.6.18.38)
शूद्रान्नेनोदरस्थेन ब्राह्मणो म्रियते यदि । स प्रेतो जायते राजन्यद्यपि स्यात्षडंगवित्
śūdrānnenodarasthena brāhmaṇo mriyate yadi sa preto jāyate rājanyadyapi syātṣaḍaṁgavit
हे राजन्! यदि कोई ब्राह्मण शूद्र के अन्न को उदर में रखे हुए ही मर जाए, तो वह प्रेत बनता है, भले ही वह छहों वेदांगों का ज्ञाता क्यों न हो।
श्लोक 39 (skanda.6.18.39)
कुलदेशोचितं धर्मं यस्त्यक्त्वाऽन्यत्समाचरेत् । कामाद्वा यदि वा लोभात्स प्रेतो जायते नरः
kuladeśocitaṁ dharmaṁ yastyaktvā'nyatsamācaret kāmādvā yadi vā lobhātsa preto jāyate naraḥ
जो मनुष्य अपने कुल और देश के अनुकूल धर्म को त्यागकर, काम अथवा लोभवश किसी अन्य आचरण को अपनाता है, वह मनुष्य प्रेत बनता है।
श्लोक 40 (skanda.6.18.40)
एतत्ते सर्वमाख्यातं मया पार्थिवसत्तम । येन कर्मविपाकेन प्रेतः संजायते नरः
etatte sarvamākhyātaṁ mayā pārthivasattama yena karmavipākena pretaḥ saṁjāyate naraḥ
हे राजश्रेष्ठ! मैंने आपको यह सब बता दिया, कि किस-किस कर्म के फल से मनुष्य प्रेत बनता है।
श्लोक 41 (skanda.6.18.41)
राजोवाच । कृतेन कर्मणा येन न प्रेतो जायते नरः । तन्मे कीर्तय मांसाद विस्तरेण विशेषतः
rājovāca kṛtena karmaṇā yena na preto jāyate naraḥ tanme kīrtaya māṁsāda vistareṇa viśeṣataḥ
राजा ने कहा — हे मांसाद! जिस कर्म को करने से मनुष्य प्रेत नहीं बनता, वह भी मुझे विशेष रूप से विस्तार से बताओ।
श्लोक 42 (skanda.6.18.42)
मांसाद उवाच । मातृवत्परदारान्यः परद्रव्याणि लोष्टवत् । यः पश्यत्यात्मवज्जंतून्न प्रेतो जायते नरः
māṁsāda uvāca mātṛvatparadārānyaḥ paradravyāṇi loṣṭavat yaḥ paśyatyātmavajjaṁtūnna preto jāyate naraḥ
मांसाद ने कहा — जो पराई स्त्रियों को माता के समान, दूसरों के धन को मिट्टी के ढेले के समान, और सब प्राणियों को अपने समान देखता है, वह मनुष्य प्रेत नहीं बनता।
श्लोक 43 (skanda.6.18.43)
अन्नदानपरो नित्यं विशेषेणातिथिप्रियः । स्वाध्यायव्रतशीलो यो न प्रेतो जायते नरः
annadānaparo nityaṁ viśeṣeṇātithipriyaḥ svādhyāyavrataśīlo yo na preto jāyate naraḥ
जो सदा अन्नदान में तत्पर रहता है, विशेष रूप से अतिथियों से प्रेम रखता है, और स्वाध्याय-व्रत में निष्ठ रहता है, वह मनुष्य प्रेत नहीं बनता।
श्लोक 44 (skanda.6.18.44)
समः शत्रौ च मित्रे च समलोष्टाश्मकांचनः । समो मानापमानेषु न प्रेतो जायते नरः
samaḥ śatrau ca mitre ca samaloṣṭāśmakāṁcanaḥ samo mānāpamāneṣu na preto jāyate naraḥ
जो शत्रु और मित्र में समान भाव रखता है, मिट्टी, पत्थर और सोने को समान समझता है, तथा मान-अपमान में समभाव रखता है, वह मनुष्य प्रेत नहीं बनता।
श्लोक 45 (skanda.6.18.45)
दानधर्मप्रवृत्तानां धर्ममार्गा नुयायिनाम् । प्रोत्साहं वर्धयेद्यस्तु न प्रेतो जायते नरः
dānadharmapravṛttānāṁ dharmamārgā nuyāyinām protsāhaṁ vardhayedyastu na preto jāyate naraḥ
जो दान-धर्म में लगे हुए और धर्म-मार्ग के अनुयायी लोगों के उत्साह को बढ़ाता है, वह मनुष्य प्रेत नहीं बनता।
श्लोक 46 (skanda.6.18.46)
यूकामत्कुणदंशादीन्सर्वसत्त्वानि यो नरः । पुत्रवत्पालयेन्नित्यं न प्रेतो जायते नरः
yūkāmatkuṇadaṁśādīnsarvasattvāni yo naraḥ putravatpālayennityaṁ na preto jāyate naraḥ
जो मनुष्य जूँ, खटमल, डाँस आदि समस्त प्राणियों का भी पुत्र के समान सदा पालन करता है, वह मनुष्य प्रेत नहीं बनता।
श्लोक 47 (skanda.6.18.47)
सदा यज्ञक्रियोपेतः सदा तीर्थपरायणः । शास्त्रश्रवणसंयुक्तो न प्रेतो जायते नरः
sadā yajñakriyopetaḥ sadā tīrthaparāyaṇaḥ śāstraśravaṇasaṁyukto na preto jāyate naraḥ
जो सदा यज्ञ-कर्म में युक्त रहता है, सदा तीर्थों में निष्ठ रहता है, और शास्त्र-श्रवण में लगा रहता है, वह मनुष्य प्रेत नहीं बनता।
श्लोक 48 (skanda.6.18.48)
वापीकूपतडागानामारामाणां विशे षतः । आरोपकः प्रपाणां च न प्रेतो जायते नरः
vāpīkūpataḍāgānāmārāmāṇāṁ viśe ṣataḥ āropakaḥ prapāṇāṁ ca na preto jāyate naraḥ
जो बावड़ी, कुआँ, तालाब, बगीचे और विशेष रूप से जलदान की प्याऊ बनवाता है, वह मनुष्य प्रेत नहीं बनता।
श्लोक 49 (skanda.6.18.49)
एतद्वः सर्वमाख्यातं स्वगुह्यं वसुधाधिप । निर्विण्णाः प्रेतभावेन तस्मात्त्वं नो गतिर्भव
etadvaḥ sarvamākhyātaṁ svaguhyaṁ vasudhādhipa nirviṇṇāḥ pretabhāvena tasmāttvaṁ no gatirbhava
हे राजन्! हमने आपको यह अपना संपूर्ण रहस्य बता दिया। हम प्रेत-भाव से खिन्न हो चुके हैं, इसलिए अब आप ही हमारी गति बनिए।
श्लोक 50 (skanda.6.18.50)
गत्वा गयाशिरः पुण्यमेकैकस्य पृथक्पृथक् । श्राद्धं देहि महीपाल त्रयाणामपि सादरम्
gatvā gayāśiraḥ puṇyamekaikasya pṛthakpṛthak śrāddhaṁ dehi mahīpāla trayāṇāmapi sādaram
हे राजन्! उस पुण्यमय गयाशीर्ष में जाकर, हम तीनों में से प्रत्येक के लिए अलग-अलग आदरपूर्वक श्राद्ध कीजिए।
श्लोक 51 (skanda.6.18.51)
प्रेतत्वं याति येनेदं त्वत्प्र सादात्सुदारुणम् । नाऽन्यथा मुक्तिरस्माकं भविष्यति कथंचन
pretatvaṁ yāti yenedaṁ tvatpra sādātsudāruṇam nā'nyathā muktirasmākaṁ bhaviṣyati kathaṁcana
जिससे आपकी कृपा से यह हमारा भयंकर प्रेतत्व नष्ट हो जाए; अन्यथा हमारी मुक्ति किसी भी प्रकार संभव नहीं होगी।
श्लोक 52 (skanda.6.18.52)
राजोवाच । ईदृग्जातिस्मृतिर्यस्यां प्रेतयोनौ च खे गतिः । धर्माधर्मपरिज्ञानं तच्च कस्मात्प्रनिंदसि
rājovāca īdṛgjātismṛtiryasyāṁ pretayonau ca khe gatiḥ dharmādharmaparijñānaṁ tacca kasmātpraniṁdasi
राजा ने कहा — जिस प्रेत-योनि में इस प्रकार पूर्वजन्म का स्मरण रहता है, आकाश में गति होती है, और धर्म-अधर्म का ज्ञान बना रहता है, उसकी तुम इस प्रकार निंदा क्यों करते हो?
श्लोक 53 (skanda.6.18.53)
मांसाद उवाच । प्रेतयोनिरियं राजन्नवमी देवसंज्ञिता । गुणत्रयसमायुक्ता शेषैर्दोषैः समंततः
māṁsāda uvāca pretayoniriyaṁ rājannavamī devasaṁjñitā guṇatrayasamāyuktā śeṣairdoṣaiḥ samaṁtataḥ
मांसाद ने कहा — हे राजन्! यह प्रेत-योनि नौवीं गिनी जाने वाली, देव-योनि के समान कही जाती है; यह तीन गुणों से युक्त है, परंतु शेष सब दोषों से भी घिरी हुई है।
श्लोक 54 (skanda.6.18.54)
एका जातिस्मृतिः सम्यगस्यामेवप्रजायते । खेचरत्वं तथैवान्यद्धर्माधर्मविनिश्चयः
ekā jātismṛtiḥ samyagasyāmevaprajāyate khecaratvaṁ tathaivānyaddharmādharmaviniścayaḥ
इसी योनि में एक तो पूर्वजन्म का पूर्ण स्मरण उत्पन्न होता है, दूसरा आकाशगमन, और तीसरा धर्म-अधर्म का निश्चित ज्ञान होता है।
श्लोक 55 (skanda.6.18.55)
एतद्गुणत्रयं प्रोक्तं प्रेतयोनौ नृपोत्तम । दोषानपि च ते वच्मि ताञ्च्छृणुष्व समाहितः
etadguṇatrayaṁ proktaṁ pretayonau nṛpottama doṣānapi ca te vacmi tāñcchṛṇuṣva samāhitaḥ
हे राजश्रेष्ठ! यही तीन गुण प्रेत-योनि में कहे गए हैं। अब मैं उसके दोष भी बताता हूँ, उन्हें भी एकाग्रचित्त होकर सुनिए।
श्लोक 56 (skanda.6.18.56)
यदि तावद्वनादस्माद्यामोन्यत्र वयं नृप । अदृष्टमुद्गराघातैर्नूनं हन्यामहे ततः
yadi tāvadvanādasmādyāmonyatra vayaṁ nṛpa adṛṣṭamudgarāghātairnūnaṁ hanyāmahe tataḥ
हे राजन्! यदि हम इस वन को छोड़कर कहीं और जाना चाहें, तो हमें अदृश्य मुद्गरों की मार से निश्चय ही मारा जाता है।
श्लोक 57 (skanda.6.18.57)
तथा धर्मक्रियाः सर्वा मानुषाणामुदाहृताः । न प्रेतानां न देवानां नान्येषां मानुषं विना
tathā dharmakriyāḥ sarvā mānuṣāṇāmudāhṛtāḥ na pretānāṁ na devānāṁ nānyeṣāṁ mānuṣaṁ vinā
तथा समस्त धर्म-क्रियाएँ मनुष्यों के लिए ही बताई गई हैं, न प्रेतों के लिए, न देवताओं के लिए, न मनुष्य के अतिरिक्त किसी और के लिए।
श्लोक 58 (skanda.6.18.58)
पश्यामो दूरतो राजञ्जलपूर्णाञ्जला शयान् । पिपासाकुलिताः श्रांता भास्करे वृषसंस्थिते
paśyāmo dūrato rājañjalapūrṇāñjalā śayān pipāsākulitāḥ śrāṁtā bhāskare vṛṣasaṁsthite
हे राजन्! जब सूर्य वृष राशि में रहता है, तब हम प्यास से व्याकुल और थके हुए, दूर से ही जल से भरे हुए तालाबों को देखते रहते हैं।
श्लोक 59 (skanda.6.18.59)
गच्छामः संनिधौ तेषां यदि पार्थिवसतम । अदृष्टमुद्गराघातैर्वयं हन्यामहे ततः
gacchāmaḥ saṁnidhau teṣāṁ yadi pārthivasatama adṛṣṭamudgarāghātairvayaṁ hanyāmahe tataḥ
हे राजश्रेष्ठ! यदि हम उनके निकट जाना चाहें, तो हमें वहाँ भी अदृश्य मुद्गरों की मार से मारा जाता है।
श्लोक 60 (skanda.6.18.60)
तथा रसवती सिद्धाः पश्यामो दूरसंस्थिताः । क्षुधाविष्टा गृहस्थानां गृहेषु विविधा नृप
tathā rasavatī siddhāḥ paśyāmo dūrasaṁsthitāḥ kṣudhāviṣṭā gṛhasthānāṁ gṛheṣu vividhā nṛpa
हे राजन्! उसी प्रकार भूख से व्याकुल होकर हम गृहस्थों के घरों में दूर से ही बनाए हुए विविध स्वादिष्ट पकवानों को देखते रहते हैं।
श्लोक 61 (skanda.6.18.61)
तथा सुफलिनो वृक्षान्कलपक्षिभिरावृतान् । स्निग्धान्सच्छाययोपेतान्सेवितुं न लभामहे
tathā suphalino vṛkṣānkalapakṣibhirāvṛtān snigdhānsacchāyayopetānsevituṁ na labhāmahe
उसी प्रकार सुंदर पक्षियों से घिरे, मधुर फलों से लदे, स्निग्ध और घनी छाया वाले वृक्षों का भी हम आश्रय नहीं ले पाते।
श्लोक 62 (skanda.6.18.62)
किंवा ते बहुनोक्तेन यद्यत्कर्म विगर्हितम् । क्लेशदं च तदस्माकं स्वयमेवोपतिष्ठते
kiṁvā te bahunoktena yadyatkarma vigarhitam kleśadaṁ ca tadasmākaṁ svayamevopatiṣṭhate
हे राजन्! अधिक कहने से क्या लाभ? जो-जो निंदित और क्लेशदायक कर्म है, वह सब स्वयं ही हमारे सामने उपस्थित हो जाता है।
श्लोक 63 (skanda.6.18.63)
न च्छिद्रेण विनाऽस्माकं प्राणयात्रा प्रजायते । न जलानि न च च्छाया न यानं न च वाहनम्
na cchidreṇa vinā'smākaṁ prāṇayātrā prajāyate na jalāni na ca cchāyā na yānaṁ na ca vāhanam
हमारा जीवन-निर्वाह भी बिना किसी अवसर (छिद्र) के संभव नहीं होता — न जल, न छाया, न सवारी, न वाहन ही हमें सहज मिलता है।
श्लोक 64 (skanda.6.18.64)
एतस्मात्कारणान्नित्यं भ्रमामश्छिद्रहेतवे । प्राप्ते रात्रिमुखे राजन्न प्रातर्न च वासरे
etasmātkāraṇānnityaṁ bhramāmaśchidrahetave prāpte rātrimukhe rājanna prātarna ca vāsare
इसी कारण हम सदा किसी अवसर की खोज में भटकते रहते हैं — हे राजन्! केवल रात्रि के आरंभ में ही, न प्रातःकाल में और न दिन में।
श्लोक 65 (skanda.6.18.65)
यत्त्वं शंससि चाऽस्माकं खेचरत्वं महीपते । व्यर्थं तदपि न श्रेयः शृणु तत्रापि कारणम्
yattvaṁ śaṁsasi cā'smākaṁ khecaratvaṁ mahīpate vyarthaṁ tadapi na śreyaḥ śṛṇu tatrāpi kāraṇam
हे राजन्! आपने जो हमारी आकाशगमन-शक्ति की प्रशंसा की, वह भी व्यर्थ है, उससे कोई कल्याण नहीं होता — इसका कारण भी सुनिए।
श्लोक 66 (skanda.6.18.66)
क्रियते खेचरत्वेन किंकिं धर्मं विनिश्चयैः । यतो न सिध्यते मोक्षो जाति स्मृत्यादिकं तथा
kriyate khecaratvena kiṁkiṁ dharmaṁ viniścayaiḥ yato na sidhyate mokṣo jāti smṛtyādikaṁ tathā
आकाशगमन से क्या लाभ, और धर्म के निश्चित ज्ञान से भी क्या लाभ, जब उनसे न तो मोक्ष सिद्ध होता है और न पूर्वजन्म-स्मृति आदि का कोई फल मिलता है?
श्लोक 67 (skanda.6.18.67)
तस्माद्दोषादिमे राजन्गुणा यद्यपि कीर्तिताः । प्रेतानां यान्समाश्रित्य काचित्सिद्धिर्न जायते
tasmāddoṣādime rājanguṇā yadyapi kīrtitāḥ pretānāṁ yānsamāśritya kācitsiddhirna jāyate
हे राजन्! इसी दोष के कारण, यद्यपि ये गुण कहे गए हैं, तथापि इनका आश्रय लेकर प्रेतों को कोई सिद्धि प्राप्त नहीं होती।
श्लोक 68 (skanda.6.18.68)
विषादो जायते भूयो गुणैरेतैर्नराधिप । अशक्ताः प्रेतयोगाद्वै सर्वस्य शुभकर्मणः
viṣādo jāyate bhūyo guṇairetairnarādhipa aśaktāḥ pretayogādvai sarvasya śubhakarmaṇaḥ
हे राजन्! ये गुण भी उलटे और अधिक खेद ही उत्पन्न करते हैं, क्योंकि प्रेत-योनि में पड़े रहने के कारण हम किसी भी शुभ कर्म को कर पाने में असमर्थ हैं।
श्लोक 69 (skanda.6.18.69)
राजोवाच । यदि यास्यामि भूयोऽहं गृहमस्मान्महावनात् । तत्करिष्यामि सर्वेषां गयाश्राद्धमसंशयम्
rājovāca yadi yāsyāmi bhūyo'haṁ gṛhamasmānmahāvanāt tatkariṣyāmi sarveṣāṁ gayāśrāddhamasaṁśayam
राजा ने कहा — यदि मैं इस महावन से पुनः अपने घर लौट पाऊँ, तो मैं निःसंदेह तुम सबका गया-श्राद्ध अवश्य करूँगा।
श्लोक 70 (skanda.6.18.70)
तारयिष्यामि सर्वांश्च सर्वपापैः प्रयत्नतः । अप्यात्मदेहदानेन सत्येनात्मानमालभे
tārayiṣyāmi sarvāṁśca sarvapāpaiḥ prayatnataḥ apyātmadehadānena satyenātmānamālabhe
मैं प्रयत्नपूर्वक तुम सबको समस्त पापों से मुक्त कराऊँगा, चाहे इसके लिए मुझे अपने शरीर का दान ही क्यों न देना पड़े — मैं सत्य की शपथ लेकर यह कहता हूँ।
श्लोक 71 (skanda.6.18.71)
यस्माद्धृद्गतशंका मे हृता युष्माभिरद्य वै । येन तत्प्राप्य युष्माकमुपकारं करोम्यहम्
yasmāddhṛdgataśaṁkā me hṛtā yuṣmābhiradya vai yena tatprāpya yuṣmākamupakāraṁ karomyaham
क्योंकि आज तुमने मेरे हृदय में उठी हुई शंका को दूर कर दिया है, इसलिए इसके बदले में मैं भी तुम सबका उपकार करूँगा।
श्लोक 72 (skanda.6.18.72)
मांसाद उवाच । इतः स्थानान्महाराज नातिदूरे जलाशयः । अस्ति नानाद्रुमोपेतश्चित्ताह्लादकरः परः
māṁsāda uvāca itaḥ sthānānmahārāja nātidūre jalāśayaḥ asti nānādrumopetaścittāhlādakaraḥ paraḥ
मांसाद ने कहा — हे महाराज! इस स्थान से अधिक दूर नहीं, एक जलाशय है, जो अनेक वृक्षों से सुशोभित और मन को अत्यंत आनंदित करने वाला है।
श्लोक 73 (skanda.6.18.73)
तस्मादुदङ्मुखो गच्छ यत्र ते जलपक्षिणः । दृश्यंते व्योममार्गेण प्रगच्छतः समंततः
tasmādudaṅmukho gaccha yatra te jalapakṣiṇaḥ dṛśyaṁte vyomamārgeṇa pragacchataḥ samaṁtataḥ
इसलिए आप उत्तर दिशा की ओर मुख करके जाइए, जहाँ आकाश-मार्ग से चारों ओर जाते हुए जल-पक्षी दिखाई दे रहे हैं।
श्लोक 74 (skanda.6.18.74)
सूत उवाच । अथासौ नृपशार्दूलः समुत्थाय शनैःशनैः । सौम्यां दिशं समुद्दिश्य प्रतस्थे स तु दुःखितः
sūta uvāca athāsau nṛpaśārdūlaḥ samutthāya śanaiḥśanaiḥ saumyāṁ diśaṁ samuddiśya pratasthe sa tu duḥkhitaḥ
सूत जी ने कहा — तब वह श्रेष्ठ राजा धीरे-धीरे उठकर, दुःखी होते हुए भी, उत्तर दिशा की ओर मुख करके चल पड़ा।
श्लोक 75 (skanda.6.18.75)
एवं प्रगच्छता तेन क्षुत्पिपासाकुलेन च । अदूरादेव संदृष्टं नीलं द्रुमकदंबकम् । भ्रममाणैर्बकैर्हंसैः सारसैर्मद्गुभिस्तथा
evaṁ pragacchatā tena kṣutpipāsākulena ca adūrādeva saṁdṛṣṭaṁ nīlaṁ drumakadaṁbakam bhramamāṇairbakairhaṁsaiḥ sārasairmadgubhistathā
इस प्रकार चलते हुए, भूख-प्यास से व्याकुल उस राजा ने कुछ ही दूरी पर, चारों ओर मँडराते बगुलों, हंसों, सारसों और जलकौओं से युक्त एक हरा-भरा वृक्ष-समूह देखा।
श्लोक 76 (skanda.6.18.76)
स गत्वा सलिलं तत्र तद्वातेन महीपतिः । आहूत इव शीतेन प्रययौ त्वरयान्वितः
sa gatvā salilaṁ tatra tadvātena mahīpatiḥ āhūta iva śītena prayayau tvarayānvitaḥ
वहाँ के जल की शीतल हवा से मानो बुलाया गया वह राजा तेजी से उस ओर बढ़ चला।
श्लोक 77 (skanda.6.18.77)
अथाऽपश्यन्मनोहारि सौम्यसत्त्वनिषेवितम् । आश्रमं ह्रदतीरस्थं तापसैः सर्वतो वृतम्
athā'paśyanmanohāri saumyasattvaniṣevitam āśramaṁ hradatīrasthaṁ tāpasaiḥ sarvato vṛtam
तब उसने सरोवर के तट पर स्थित एक मनोहर आश्रम देखा, जो सौम्य प्राणियों से सेवित था और चारों ओर तपस्वियों से घिरा हुआ था।
श्लोक 78 (skanda.6.18.78)
पुष्पितैः फलितैर्वृक्षैः समंतात्परिवेष्टितम् । विचित्रैर्मधुरारावैर्नादितं विहगोत्तमैः
puṣpitaiḥ phalitairvṛkṣaiḥ samaṁtātpariveṣṭitam vicitrairmadhurārāvairnāditaṁ vihagottamaiḥ
वह पुष्पित और फलित वृक्षों से चारों ओर घिरा हुआ था, तथा विचित्र और मधुर बोलने वाले श्रेष्ठ पक्षियों की ध्वनि से गूँज रहा था।
श्लोक 79 (skanda.6.18.79)
तत्रापश्यन्नगाधस्तात्तपस्विगणसेवितम् । शिवधर्मपरं शांतं जैमिनिं मुनिसत्तमम्
tatrāpaśyannagādhastāttapasvigaṇasevitam śivadharmaparaṁ śāṁtaṁ jaiminiṁ munisattamam
वहाँ उसने एक वृक्ष के नीचे तपस्वियों के समूह से सेवित, शिव-धर्म में निष्ठ, शांत मुनिश्रेष्ठ जैमिनि को देखा।
श्लोक 80 (skanda.6.18.80)
अथ गत्वा स राजेंद्रः प्रणिपत्य मुनीश्वरम् । तथान्यानपि तच्छिष्यान्निपपात धरातले
atha gatvā sa rājeṁdraḥ praṇipatya munīśvaram tathānyānapi tacchiṣyānnipapāta dharātale
तब वह श्रेष्ठ राजा वहाँ जाकर उस मुनीश्वर तथा उनके अन्य शिष्यों को प्रणाम करते हुए भूमि पर गिर पड़ा।
श्लोक 81 (skanda.6.18.81)
ते दृष्ट्वाऽदृष्टपूर्वं तं राजलक्षणलक्षितम् । धूलिधूसरितांगं च भस्मावृतमिवाचलम्
te dṛṣṭvā'dṛṣṭapūrvaṁ taṁ rājalakṣaṇalakṣitam dhūlidhūsaritāṁgaṁ ca bhasmāvṛtamivācalam
उसे पहले कभी न देखा हुआ, राजोचित लक्षणों से युक्त, धूल से धूसरित अंगों वाला, मानो भस्म से ढके पर्वत के समान देखकर —
श्लोक 82 (skanda.6.18.82)
मन्यमाना महीपालं विस्मयोत्फुल्ललोचनाः । प्रोचुश्च मधुरैर्वाक्यैराशीर्वादपुरःसरैः
manyamānā mahīpālaṁ vismayotphullalocanāḥ procuśca madhurairvākyairāśīrvādapuraḥsaraiḥ
— और उसे राजा समझते हुए, आश्चर्य से खिले हुए नेत्रों वाले वे तपस्वी आशीर्वाद से युक्त मधुर वचनों में बोले।
श्लोक 83 (skanda.6.18.83)
कुतस्त्वमनुसंप्राप्तो वनेऽस्मिञ्जनवर्जिते । एकाकी सुकुमारांगः पदातिः श्रमविह्वलः
kutastvamanusaṁprāpto vane'smiñjanavarjite ekākī sukumārāṁgaḥ padātiḥ śramavihvalaḥ
"तुम कहाँ से इस जनरहित वन में आए हो — अकेले, कोमल अंगों वाले, पैदल और थकान से व्याकुल?"
श्लोक 84 (skanda.6.18.84)
पार्थिवस्येव लिंगानि दृश्यंते तव भूरिशः । न विद्मो निश्चयं तस्माद्वदागमनकारणम्
pārthivasyeva liṁgāni dṛśyaṁte tava bhūriśaḥ na vidmo niścayaṁ tasmādvadāgamanakāraṇam
"तुम्हारे शरीर पर एक राजा के ही अनेक चिह्न दिखाई देते हैं। हमें इसका निश्चय नहीं है, इसलिए अपने आने का कारण बताओ।"
श्लोक 85 (skanda.6.18.85)
अथोवाच नृपः कृच्छ्रात्पिपासा मां प्रबाधते । तस्माद्वदत पानीयं यत्पीत्वा कीर्तयाम्यहम्
athovāca nṛpaḥ kṛcchrātpipāsā māṁ prabādhate tasmādvadata pānīyaṁ yatpītvā kīrtayāmyaham
तब राजा ने बड़ी कठिनाई से कहा — "प्यास मुझे बहुत सता रही है। इसलिए पहले मुझे जल दिखाइए, जिसे पीकर मैं अपना सब वृत्तांत सुनाऊँगा।"
श्लोक 86 (skanda.6.18.86)
ततस्तैर्दर्शितं तोयं समीपे यन्महीपतेः । सोऽपि पीत्वाऽवगाह्याथ वितृष्णः समपद्यत
tatastairdarśitaṁ toyaṁ samīpe yanmahīpateḥ so'pi pītvā'vagāhyātha vitṛṣṇaḥ samapadyata
तब उन्होंने राजा के निकट का जल उसे दिखाया। उस जल में डुबकी लगाकर, उसे पीकर, वह प्यास से मुक्त हो गया।
श्लोक 87 (skanda.6.18.87)
ततः फलानि पक्वानि तरूणां पतितान्यधः । सुमृष्टानि समादाय भक्षयामास वांछया
tataḥ phalāni pakvāni tarūṇāṁ patitānyadhaḥ sumṛṣṭāni samādāya bhakṣayāmāsa vāṁchayā
फिर वृक्षों से नीचे गिरे हुए पके, स्वादिष्ट फलों को लेकर उसने इच्छानुसार खाया।
श्लोक 88 (skanda.6.18.88)
ततस्तृप्तिं परां प्राप्य गत्वा जैमिनिसंनिधौ । उपविष्टः प्रणम्योच्चैस्तथान्यांश्च मुनीन्क्रमात्
tatastṛptiṁ parāṁ prāpya gatvā jaiminisaṁnidhau upaviṣṭaḥ praṇamyoccaistathānyāṁśca munīnkramāt
तब पूर्ण तृप्ति प्राप्त करके, जैमिनि के निकट जाकर, उन्हें ऊँचे स्वर से प्रणाम करते हुए, तथा क्रमशः अन्य मुनियों को भी प्रणाम करके, वह बैठ गया।
श्लोक 89 (skanda.6.18.89)
उवाच च निजां वार्तां कृतांजलिपुटः स्थितः । स पृष्टस्तापसैः सर्वैः सुविस्मयसमन्वितैः
uvāca ca nijāṁ vārtāṁ kṛtāṁjalipuṭaḥ sthitaḥ sa pṛṣṭastāpasaiḥ sarvaiḥ suvismayasamanvitaiḥ
हाथ जोड़कर खड़े होकर उसने अपना संपूर्ण वृत्तांत कहा, जब उन सब तपस्वियों ने अत्यंत आश्चर्य से युक्त होकर उससे पूछा।
श्लोक 90 (skanda.6.18.90)
विदूरथो महीपोऽहं माहिष्मत्यां कृतास्पदः । मृगलिप्सुर्वने घोरे प्रविष्टः सैनिकैः सह
vidūratho mahīpo'haṁ māhiṣmatyāṁ kṛtāspadaḥ mṛgalipsurvane ghore praviṣṭaḥ sainikaiḥ saha
"मैं राजा विदूरथ हूँ, माहिष्मती नगरी में निवास करने वाला। मृग को पकड़ने की इच्छा से सैनिकों के साथ इस भयंकर वन में प्रविष्ट हुआ था।"
श्लोक 91 (skanda.6.18.91)
ततो मे भ्रममाणस्य प्रणष्टाः सर्वसैनिकाः । गुल्मैरंतरिताश्चाऽन्ये न जानेऽहं कथं स्थिताः
tato me bhramamāṇasya praṇaṣṭāḥ sarvasainikāḥ gulmairaṁtaritāścā'nye na jāne'haṁ kathaṁ sthitāḥ
"फिर मेरे भटकते-भटकते सब सैनिक खो गए। कुछ झाड़ियों में छिप गए, मैं नहीं जानता कि वे कहाँ किस दशा में हैं।"
श्लोक 92 (skanda.6.18.92)
आसीद्धयो ममाऽधस्ताज्जात्यः सर्वगुणान्वितः । सोऽपि कर्मविपाकेन पञ्चत्वं समुपस्थितः । भ्रममाणस्त्वहं प्राप्त आयुःशेषतयात्र च । तद्ब्रूत कः प्रदेशोऽयं कियद्दूरे च मे पुरी
āsīddhayo mamā'dhastājjātyaḥ sarvaguṇānvitaḥ so'pi karmavipākena pañcatvaṁ samupasthitaḥ bhramamāṇastvahaṁ prāpta āyuḥśeṣatayātra ca tadbrūta kaḥ pradeśo'yaṁ kiyaddūre ca me purī
"मेरे नीचे उत्तम नस्ल का, सब गुणों से युक्त घोड़ा था। कर्म के फलस्वरूप वह भी मृत्यु को प्राप्त हो गया। भटकते हुए मैं यहाँ अपनी शेष आयु के बल पर ही पहुँच पाया हूँ। अब बताइए, यह कौन-सा प्रदेश है, और मेरी नगरी यहाँ से कितनी दूर है?"
श्लोक 93 (skanda.6.18.93)
ततस्ते तापसाः प्रोचुर्विद्महे न वयं पुरीम् । त्वां च देशं च ते राजन्कोऽयं देशश्च कीर्त्यते
tataste tāpasāḥ procurvidmahe na vayaṁ purīm tvāṁ ca deśaṁ ca te rājanko'yaṁ deśaśca kīrtyate
तब उन तपस्वियों ने कहा — हे राजन्! हम न तो तुम्हारी नगरी को जानते हैं, न तुम्हारे देश को। यह भी नहीं जानते कि तुम्हारे देश का क्या नाम है।
श्लोक 94 (skanda.6.18.94)
नरेन्द्रैर्नैव नः कार्यं न दिशैर्न पुरैर्नृप । वनेचरा वयं नित्यं शिवाराधनतत्पराः
narendrairnaiva naḥ kāryaṁ na diśairna purairnṛpa vanecarā vayaṁ nityaṁ śivārādhanatatparāḥ
हे राजन्! हमें न राजाओं से कोई प्रयोजन है, न दिशाओं से, न नगरों से। हम सदा वन में विचरने वाले, शिव की आराधना में तत्पर रहने वाले हैं।
श्लोक 95 (skanda.6.18.95)
सर्वे शीर्णानि वृक्षाणां पुष्पाणि च फलानि च । भक्षयामोऽथ पत्राणि शरी रस्थितिहेतुना
sarve śīrṇāni vṛkṣāṇāṁ puṣpāṇi ca phalāni ca bhakṣayāmo'tha patrāṇi śarī rasthitihetunā
हम सब वृक्षों के गिरे हुए फूल, फल और पत्तों को ही शरीर के निर्वाह के लिए खाते हैं।
श्लोक 96 (skanda.6.18.96)
मानुषैः सह संसर्गं संभाषं च नराधिप । न कुर्मो न च पश्यामो गच्छामोऽन्यत्र दूरतः
mānuṣaiḥ saha saṁsargaṁ saṁbhāṣaṁ ca narādhipa na kurmo na ca paśyāmo gacchāmo'nyatra dūrataḥ
हे राजन्! हम मनुष्यों के साथ न तो संपर्क रखते हैं, न बातचीत करते हैं, न उन्हें देखते हैं — हम सदा दूर, कहीं और चले जाते हैं।
श्लोक 97 (skanda.6.18.97)
एकैकस्य तरोर्मूले दिवसं वा दिनद्वयम् । तिष्ठामो न भवेद्येन ममत्वं तत्समुद्भवम्
ekaikasya tarormūle divasaṁ vā dinadvayam tiṣṭhāmo na bhavedyena mamatvaṁ tatsamudbhavam
हम प्रत्येक वृक्ष के नीचे एक या दो दिन ही ठहरते हैं, जिससे उससे उत्पन्न होने वाली ममता (आसक्ति) न हो सके।
श्लोक 98 (skanda.6.18.98)
कारणात्तव राजेंद्र निशामेतां वनस्पतौ । नेष्यामोऽन्यत्र यास्यामः प्रभा तेऽन्यत्र कानने
kāraṇāttava rājeṁdra niśāmetāṁ vanaspatau neṣyāmo'nyatra yāsyāmaḥ prabhā te'nyatra kānane
हे राजेंद्र! तुम्हारे ही कारण हम आज की यह रात्रि इसी वृक्ष के नीचे बिताएँगे, अन्यत्र नहीं जाएँगे; प्रातःकाल हम अन्य वन में चले जाएँगे।
श्लोक 99 (skanda.6.18.99)
एकाकिनं पदातिं च विशस्त्रं श्रमविह्वलम् । त्वां दृष्ट्वा भूपतेऽस्माकं दया जाता ततोऽधिका
ekākinaṁ padātiṁ ca viśastraṁ śramavihvalam tvāṁ dṛṣṭvā bhūpate'smākaṁ dayā jātā tato'dhikā
हे राजन्! तुम्हें अकेला, पैदल, शस्त्रहीन और थकान से व्याकुल देखकर हमें अत्यंत दया आ गई है।
श्लोक 100 (skanda.6.18.100)
एकाकी पार्थिवेन्द्रोऽयं नेष्यति च कथं निशाम् । वनेऽस्मिन्मंत्रयित्वैवं ततोऽत्रैव व्यवस्थिताः
ekākī pārthivendro'yaṁ neṣyati ca kathaṁ niśām vane'sminmaṁtrayitvaivaṁ tato'traiva vyavasthitāḥ
"यह अकेला राजा इस वन में रात्रि कैसे बिताएगा?" — ऐसा विचार-विमर्श करके हम सब यहीं ठहर गए हैं।
श्लोक 101 (skanda.6.18.101)
तस्मादत्रैव नेष्यामः समेताः शर्वरीमिमाम् । गंतव्यं प्रातरुत्थाय ततः सर्वैर्यदृच्छया
tasmādatraiva neṣyāmaḥ sametāḥ śarvarīmimām gaṁtavyaṁ prātarutthāya tataḥ sarvairyadṛcchayā
इसलिए हम सब मिलकर आज की यह रात्रि यहीं बिताएँगे, फिर प्रातःकाल उठकर सब अपनी-अपनी इच्छा से चले जाएँगे।
श्लोक 102 (skanda.6.18.102)
एवं संवदतां तेषां भगवांस्तीक्ष्णदीधितिः । अस्ताचलमनुप्राप्तः कुंकुमक्षोदसंनिभः
evaṁ saṁvadatāṁ teṣāṁ bhagavāṁstīkṣṇadīdhitiḥ astācalamanuprāptaḥ kuṁkumakṣodasaṁnibhaḥ
वे इस प्रकार बातचीत कर ही रहे थे कि तीक्ष्ण किरणों वाले भगवान सूर्य, कुंकुम-चूर्ण के समान लाल होकर, अस्ताचल पर्वत पर जा पहुँचे।
श्लोक 103 (skanda.6.18.103)
अथ तास्तापसान्राजा प्रोवाच प्रणतः स्थितः । संध्याकालः समायातः सांप्रतं मुनिसत्तमाः । तस्मात्संध्याविधिः कार्यः सर्वैरेव यथोचितः
atha tāstāpasānrājā provāca praṇataḥ sthitaḥ saṁdhyākālaḥ samāyātaḥ sāṁprataṁ munisattamāḥ tasmātsaṁdhyāvidhiḥ kāryaḥ sarvaireva yathocitaḥ
तब राजा ने विनम्रतापूर्वक खड़े होकर उन तपस्वियों से कहा — "हे श्रेष्ठ मुनियो! अब संध्या का समय आ गया है, इसलिए सबको यथोचित संध्या-विधि करनी चाहिए।"
श्लोक 104 (skanda.6.18.104)
अथ ते मुनयः सर्वे स च राजा तथा द्विजाः । चक्रुः सायंतनं कर्म यथोद्दिष्टं पुरातनैः
atha te munayaḥ sarve sa ca rājā tathā dvijāḥ cakruḥ sāyaṁtanaṁ karma yathoddiṣṭaṁ purātanaiḥ
तब वे सब मुनि, वह राजा, तथा अन्य द्विज — सबने प्राचीन ऋषियों द्वारा बताई हुई विधि के अनुसार संध्या-कर्म किया।
श्लोक 105 (skanda.6.18.105)
कामिभिः कामिनीलोकैः प्रियोक्तैरभिवां छिता । असत्स्त्रीभिर्विशेषेण संप्राप्ता रजनी ततः
kāmibhiḥ kāminīlokaiḥ priyoktairabhivāṁ chitā asatstrībhirviśeṣeṇa saṁprāptā rajanī tataḥ
तब वह रात्रि आ पहुँची, जिसे कामी पुरुष प्रिय स्त्रियों के मधुर वचनों की कामना करते हैं, और विशेष रूप से दुष्ट स्त्रियाँ चाहती हैं।
श्लोक 106 (skanda.6.18.106)
पीयूषार्णववेलेव विषवृक्षलतेव च । उलूकैश्चक्रवाकैश्च युगपद्या विलोक्यते
pīyūṣārṇavaveleva viṣavṛkṣalateva ca ulūkaiścakravākaiśca yugapadyā vilokyate
वह रात्रि अमृत-सागर के तट के समान भी है और विषवृक्ष की लता के समान भी — उसे उल्लू और चक्रवाक पक्षी एक साथ, किंतु भिन्न-भिन्न दृष्टि से देखते हैं।
श्लोक 107 (skanda.6.18.107)
उलूका राक्षसाश्चौराः कामिनः कुलटांऽगनाः । यां वांछंति सदा सोत्काः सुवृष्टिमिव कर्षुकाः
ulūkā rākṣasāścaurāḥ kāminaḥ kulaṭāṁ'ganāḥ yāṁ vāṁchaṁti sadā sotkāḥ suvṛṣṭimiva karṣukāḥ
उल्लू, राक्षस, चोर, कामी पुरुष और कुलटा स्त्रियाँ — ये सब उस रात्रि की उसी प्रकार सदा उत्सुकतापूर्वक कामना करते हैं, जैसे किसान अच्छी वर्षा की कामना करते हैं।