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नागर खण्ड · अध्याय 19

पितृकूपिका तीर्थ की महिमा

अध्याय 18अध्याय-सूचीअध्याय 20

श्लोक 1 (skanda.6.19.1)

सूत उवाच । एतस्मिन्नंतरे प्राप्तास्तस्य भूपस्य सेवकाः । केचिच्च दैवयो गेन श्वापदैरर्धभक्षिताः

sūta uvāca etasminnaṁtare prāptāstasya bhūpasya sevakāḥ kecicca daivayo gena śvāpadairardhabhakṣitāḥ

सूत जी ने कहा — इसी बीच उस राजा के कुछ सेवक, जो दैवयोग से हिंसक पशुओं द्वारा आधे खाए जा चुके थे, वहाँ आ पहुँचे।

श्लोक 2 (skanda.6.19.2)

क्षुत्पिपासातुरा दीना दुःखेन महताऽन्विताः । पदपद्धतिमार्गेण येन यातः स भूपतिः

kṣutpipāsāturā dīnā duḥkhena mahatā'nvitāḥ padapaddhatimārgeṇa yena yātaḥ sa bhūpatiḥ

वे भूख-प्यास से पीड़ित, दीन और महान दुःख से युक्त, उसी पगडंडी के मार्ग से आए, जिससे वह राजा गया था।

श्लोक 3 (skanda.6.19.3)

ते दृष्ट्वा पार्थिवं तत्र दिष्ट्यादिष्ट्येति सादरम् । ब्रुवंतः पादयोस्तस्य पतिता हर्षसंयुताः

te dṛṣṭvā pārthivaṁ tatra diṣṭyādiṣṭyeti sādaram bruvaṁtaḥ pādayostasya patitā harṣasaṁyutāḥ

वहाँ राजा को देखकर वे आदरपूर्वक "धन्य भाग्य, धन्य भाग्य" कहते हुए हर्ष से भरकर उसके चरणों में गिर पड़े।

श्लोक 4 (skanda.6.19.4)

ततस्तस्य नरेन्द्रस्य व्यसनं सैन्यसंभवम् । प्रोचुश्चैव यथादृष्टम नुभूतं यथाश्रुतम्

tatastasya narendrasya vyasanaṁ sainyasaṁbhavam procuścaiva yathādṛṣṭama nubhūtaṁ yathāśrutam

तब उन्होंने राजा को सेना पर आई विपत्ति के विषय में बताया, जैसा उन्होंने देखा था, अनुभव किया था, और सुना था।

श्लोक 5 (skanda.6.19.5)

अथ ते तापसाः सर्वे स च राजा ससेवकः । प्रसुप्ताः पादपस्याधः पर्णान्यास्तीर्यभूतले

atha te tāpasāḥ sarve sa ca rājā sasevakaḥ prasuptāḥ pādapasyādhaḥ parṇānyāstīryabhūtale

फिर वे सब तपस्वी, वह राजा और उसके सेवक, वृक्ष के नीचे पत्ते बिछाकर भूमि पर सो गए।

श्लोक 6 (skanda.6.19.6)

ततस्तेषां प्रसुप्तानां सर्वेषां तत्र कानने । अतिक्रांता सुखेनैव रजनी सा महात्मनाम्

tatasteṣāṁ prasuptānāṁ sarveṣāṁ tatra kānane atikrāṁtā sukhenaiva rajanī sā mahātmanām

उन सब सोए हुए महात्माओं की वह रात्रि उस वन में सुखपूर्वक ही बीत गई।

श्लोक 7 (skanda.6.19.7)

ततः स प्रातरुत्थाय कृतपूर्वाह्णिकक्रियः । तं मुनिं प्रणिपत्योच्चैरनुज्ञाप्य मुहु र्मुहुः

tataḥ sa prātarutthāya kṛtapūrvāhṇikakriyaḥ taṁ muniṁ praṇipatyoccairanujñāpya muhu rmuhuḥ

फिर प्रातःकाल उठकर, पूर्वाह्न की क्रियाएँ करके, उस मुनि को ऊँचे स्वर में प्रणाम करके और बार-बार आज्ञा लेकर —

श्लोक 8 (skanda.6.19.8)

निजैस्तैः सेवकैः सार्धं प्रस्थितः स्वपुरीं प्रति । माहिष्मतीं समुद्दिश्य दृष्ट्वा मार्गे शनैःशनैः

nijaistaiḥ sevakaiḥ sārdhaṁ prasthitaḥ svapurīṁ prati māhiṣmatīṁ samuddiśya dṛṣṭvā mārge śanaiḥśanaiḥ

— वह अपने उन्हीं सेवकों के साथ अपनी नगरी माहिष्मती की ओर, मार्ग देखते हुए धीरे-धीरे प्रस्थान कर गया।

श्लोक 9 (skanda.6.19.9)

ततो निजगृहं प्राप्य कञ्चि त्कालं महीपतिः । विश्रम्य प्रययौ पश्चात्तूर्णं पुण्यं गयाशिरः

tato nijagṛhaṁ prāpya kañci tkālaṁ mahīpatiḥ viśramya prayayau paścāttūrṇaṁ puṇyaṁ gayāśiraḥ

फिर अपने घर पहुँचकर, कुछ काल विश्राम करके, वह राजा शीघ्र ही पुण्यमय गयाशीर्ष की ओर चला गया।

श्लोक 10 (skanda.6.19.10)

तच्च कालेन संप्राप्य स्नात्वा धौतांबरः शुचिः । मांसादाय ददौ श्राद्धं श्रद्धापूतेन चेतसा

tacca kālena saṁprāpya snātvā dhautāṁbaraḥ śuciḥ māṁsādāya dadau śrāddhaṁ śraddhāpūtena cetasā

वहाँ पहुँचकर, स्नान करके, धुले वस्त्र पहनकर, पवित्र होकर, उसने श्रद्धा से पवित्र हृदय से मांसाद के लिए श्राद्ध किया।

श्लोक 11 (skanda.6.19.11)

अथाऽसौ पृथिवीपालः स्वप्नांते च ददर्श तम् । दिव्यमाल्यांबरधरं दिव्यगंधानुलेपनम् । विमानवरमारूढं स्तूयमानं च किंनरैः

athā'sau pṛthivīpālaḥ svapnāṁte ca dadarśa tam divyamālyāṁbaradharaṁ divyagaṁdhānulepanam vimānavaramārūḍhaṁ stūyamānaṁ ca kiṁnaraiḥ

तब उस राजा ने स्वप्न के अंत में उसे देखा — दिव्य माला और वस्त्र धारण किए हुए, दिव्य सुगंध से अनुलिप्त, उत्तम विमान पर आरूढ़, तथा किन्नरों द्वारा स्तुति किए जाते हुए।

श्लोक 12 (skanda.6.19.12)

मांसाद उवाच । प्रसादात्तव भूपाल मुक्तोऽहं प्रेतयोनितः । स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि सांप्रतं त्रिदिवा लयम्

māṁsāda uvāca prasādāttava bhūpāla mukto'haṁ pretayonitaḥ svasti te'stu gamiṣyāmi sāṁprataṁ tridivā layam

मांसाद ने कहा — "हे राजन्! आपकी कृपा से मैं प्रेत-योनि से मुक्त हो गया हूँ। आपका कल्याण हो; अब मैं स्वर्गलोक को जाऊँगा।"

श्लोक 13 (skanda.6.19.13)

ततः स प्रातरुत्थाय हर्षाविष्टो महीपतिः । विदैवतं समुद्दिश्य चक्रे श्राद्धं यथोचितम्

tataḥ sa prātarutthāya harṣāviṣṭo mahīpatiḥ vidaivataṁ samuddiśya cakre śrāddhaṁ yathocitam

फिर प्रातःकाल उठकर हर्ष से भरे उस राजा ने विदैवत के लिए यथोचित श्राद्ध किया।

श्लोक 14 (skanda.6.19.14)

सोऽपि तेनैव रूपेण तस्य संदर्शनं गतः । स्वप्नांऽते भूमिपालस्य तद्वच्चोक्त्वा दिवं गतः

so'pi tenaiva rūpeṇa tasya saṁdarśanaṁ gataḥ svapnāṁ'te bhūmipālasya tadvaccoktvā divaṁ gataḥ

वह भी उसी रूप में राजा के स्वप्न के अंत में दर्शन देने आया, और वही बात कहकर स्वर्ग को चला गया।

श्लोक 15 (skanda.6.19.15)

ततः प्रातस्तृतीयेऽह्नि कृतघ्नस्य महीपतिः । चक्रे श्राद्धं यथापूर्वं श्रद्धापूतेन चेतसा

tataḥ prātastṛtīye'hni kṛtaghnasya mahīpatiḥ cakre śrāddhaṁ yathāpūrvaṁ śraddhāpūtena cetasā

फिर तीसरे दिन प्रातःकाल उस राजा ने पूर्व की भाँति श्रद्धा से पवित्र हृदय से कृतघ्न के लिए श्राद्ध किया।

श्लोक 16 (skanda.6.19.16)

ततः सोऽपि समायातस्तस्य स्वप्ने महीपतेः । तेनैव प्रेतरूपेण दुःखेन महता वृतः

tataḥ so'pi samāyātastasya svapne mahīpateḥ tenaiva pretarūpeṇa duḥkhena mahatā vṛtaḥ

तब वह भी उस राजा के स्वप्न में उसी प्रेत-रूप में, महान दुःख से घिरा हुआ, आया।

श्लोक 17 (skanda.6.19.17)

कृतघ्न उवाच । न मे गतिर्महाराज संजाता पापकर्मिणः । तडागवित्तचौरस्य कृतघ्नस्य तथैव च

kṛtaghna uvāca na me gatirmahārāja saṁjātā pāpakarmiṇaḥ taḍāgavittacaurasya kṛtaghnasya tathaiva ca

कृतघ्न ने कहा — "हे महाराज! मुझ पापकर्मी की, तालाब का धन चुराने वाले और कृतघ्न की, कोई गति प्राप्त नहीं हुई।"

श्लोक 18 (skanda.6.19.18)

तस्मात्संजायते मुक्तिर्यथा मे पार्थिवोत्तम । तथैव त्वं कुरुष्याऽद्य सत्यवाक्यपरो भव

tasmātsaṁjāyate muktiryathā me pārthivottama tathaiva tvaṁ kuruṣyā'dya satyavākyaparo bhava

"हे राजश्रेष्ठ! जिस प्रकार मेरी मुक्ति हो सके, आप वैसा ही आज कीजिए, और सत्यवचन में तत्पर रहें।"

श्लोक 19 (skanda.6.19.19)

सत्यमेव परं ब्रह्म सत्यमेव परं तपः । सत्यमेव परं ज्ञानं सत्यमेव परं श्रुतम्

satyameva paraṁ brahma satyameva paraṁ tapaḥ satyameva paraṁ jñānaṁ satyameva paraṁ śrutam

"सत्य ही परम ब्रह्म है, सत्य ही परम तप है, सत्य ही परम ज्ञान है, सत्य ही परम श्रुति है।"

श्लोक 20 (skanda.6.19.20)

सत्येन वायु र्वहति सत्येन तपते रविः । सागरः सत्यवाक्येन मर्यादां न विलंघयेत्

satyena vāyu rvahati satyena tapate raviḥ sāgaraḥ satyavākyena maryādāṁ na vilaṁghayet

"सत्य के ही बल से वायु बहती है, सत्य के ही बल से सूर्य तपता है, और सत्य के वचन से ही समुद्र अपनी मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता।"

श्लोक 21 (skanda.6.19.21)

तीर्थसेवा तपो दानं स्वाध्यायो गुरुसेवनम् । सर्वं सत्यविहीनस्य व्यर्थं संजायते यतः

tīrthasevā tapo dānaṁ svādhyāyo gurusevanam sarvaṁ satyavihīnasya vyarthaṁ saṁjāyate yataḥ

"तीर्थसेवा, तप, दान, स्वाध्याय और गुरुसेवा — यह सब सत्यरहित व्यक्ति का व्यर्थ ही हो जाता है।"

श्लोक 22 (skanda.6.19.22)

सर्वे धर्मा धृताः पूर्वमेकत्राऽन्यत्र चाप्यृतम् । तुलायां कौतुकाद्देवैर्जातं तत्र ऋतं गुरु

sarve dharmā dhṛtāḥ pūrvamekatrā'nyatra cāpyṛtam tulāyāṁ kautukāddevairjātaṁ tatra ṛtaṁ guru

"पहले देवताओं ने कौतूहलवश तराजू के एक पलड़े में सभी धर्मों को रखा और दूसरे पलड़े में सत्य को — तब सत्य ही भारी सिद्ध हुआ।"

श्लोक 23 (skanda.6.19.23)

तस्मात्सत्यं पुरस्कृत्य मां तारय महामते । एतत्ते परमं श्रेयस्तपसोऽपि भविष्यति

tasmātsatyaṁ puraskṛtya māṁ tāraya mahāmate etatte paramaṁ śreyastapaso'pi bhaviṣyati

"इसलिए, हे महामते! सत्य को आगे रखकर मुझे तार दीजिए। यही आपके लिए तप से भी बढ़कर परम कल्याणकारी होगा।"

श्लोक 24 (skanda.6.19.24)

विदूरथ उवाच । कथं ते जायते मुक्तिर्वद मे प्रेत सत्वरम् । करोमि येन तत्कर्म यद्यपि स्यात्सुदुष्करम् ः

vidūratha uvāca kathaṁ te jāyate muktirvada me preta satvaram karomi yena tatkarma yadyapi syātsuduṣkaram ḥ

विदूरथ ने कहा — "हे प्रेत! शीघ्र मुझे बताओ कि तुम्हारी मुक्ति कैसे हो सकती है, जिससे मैं वह कर्म कर सकूँ, चाहे वह कितना ही कठिन क्यों न हो।"

श्लोक 25 (skanda.6.19.25)

प्रेत उवाच । चमत्कारपुरे भूप श्रीक्षेत्रे हाटकेश्वरे । आस्ते पांसुभिराच्छन्नं कलेर्भीतं गयाशिरः

preta uvāca camatkārapure bhūpa śrīkṣetre hāṭakeśvare āste pāṁsubhirācchannaṁ kalerbhītaṁ gayāśiraḥ

प्रेत ने कहा — "हे राजन्! चमत्कारपुर के उस श्रीक्षेत्र हाटकेश्वर में, कलियुग से मानो भयभीत होकर धूल से ढका हुआ गयाशीर्ष स्थित है।"

श्लोक 26 (skanda.6.19.26)

अधस्तात्प्लक्षवृक्षस्य दर्भस्थानैः समंततः । कालशाकैस्तथानेकैस्तिलैश्चारण्यसंभवैः

adhastātplakṣavṛkṣasya darbhasthānaiḥ samaṁtataḥ kālaśākaistathānekaistilaiścāraṇyasaṁbhavaiḥ

वह एक पाकड़ (प्लक्ष) वृक्ष के नीचे स्थित है, चारों ओर कुश के स्थानों, कालशाक (काले साग) तथा वन में उत्पन्न अनेक तिलों से घिरा हुआ है।

श्लोक 27 (skanda.6.19.27)

तत्र गत्वा तिलैस्तैस्त्वं तैः शाकैस्तैः कुशैस्तथा । श्राद्धं देहि द्रुतं येन मुक्तिः संजायते मम

tatra gatvā tilaistaistvaṁ taiḥ śākaistaiḥ kuśaistathā śrāddhaṁ dehi drutaṁ yena muktiḥ saṁjāyate mama

वहाँ जाकर उन्हीं तिलों, उन्हीं साग-पत्तों और उन्हीं कुशों के साथ शीघ्र मेरा श्राद्ध करो, जिससे मेरी मुक्ति हो सके।

श्लोक 28 (skanda.6.19.28)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा स दीनस्य दयान्वितः । जगाम तत्र यत्राऽऽस्ते स वृक्षः प्लक्षसंज्ञकः

tasya tadvacanaṁ śrutvā sa dīnasya dayānvitaḥ jagāma tatra yatrā''ste sa vṛkṣaḥ plakṣasaṁjñakaḥ

उसके ये वचन सुनकर, उस दीन प्रेत पर दया करते हुए, वह उस स्थान पर गया जहाँ वह प्लक्ष नामक वृक्ष स्थित था।

श्लोक 29 (skanda.6.19.29)

दृष्ट्वा शाकांस्तिलांस्तांस्तु दर्भांस्तेन यथोदितान् । अखनत्तत्र देशे च जलार्थे लघु कूपिकाम्

dṛṣṭvā śākāṁstilāṁstāṁstu darbhāṁstena yathoditān akhanattatra deśe ca jalārthe laghu kūpikām

उसके द्वारा बताए गए उन साग-पत्तों, तिलों और कुशों को देखकर, उस स्थान पर जल के लिए एक छोटा कुआँ खोदा।

श्लोक 30 (skanda.6.19.30)

ततः कृतघ्नमुद्दिश्य श्राद्धं चक्रे यथोदितम् । आनीय ब्राह्मणाञ्छ्रेष्ठान्वेदवेदांगपारगान्

tataḥ kṛtaghnamuddiśya śrāddhaṁ cakre yathoditam ānīya brāhmaṇāñchreṣṭhānvedavedāṁgapāragān

फिर वेद और वेदांगों में पारंगत श्रेष्ठ ब्राह्मणों को बुलाकर, उसने कृतघ्न के उद्देश्य से यथोचित श्राद्ध किया।

श्लोक 31 (skanda.6.19.31)

कृतमात्रे ततः श्राद्धे दिव्य रूपधरः पुमान् । विमानवरमारूढो विदूरथमथाऽब्रवीत्

kṛtamātre tataḥ śrāddhe divya rūpadharaḥ pumān vimānavaramārūḍho vidūrathamathā'bravīt

श्राद्ध पूर्ण होते ही, दिव्य रूप धारण किए हुए एक पुरुष, उत्तम विमान पर आरूढ़ होकर, विदूरथ से बोला।

श्लोक 32 (skanda.6.19.32)

मुक्तोऽहं त्वत्प्रसादाच्च प्रेतत्वाद्दारुणाद्विभो । स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि सांप्रतं त्रिदशालयम्

mukto'haṁ tvatprasādācca pretatvāddāruṇādvibho svasti te'stu gamiṣyāmi sāṁprataṁ tridaśālayam

"हे प्रभु! आपकी कृपा से मैं इस भयंकर प्रेतत्व से मुक्त हो गया हूँ। आपका कल्याण हो; अब मैं देवलोक को जाऊँगा।"

श्लोक 33 (skanda.6.19.33)

सूत उवाच । ततः प्रभृति सा तत्र कूपिका ख्यातिमागता । पितॄणां पुष्टिदा नित्यं गयाशीर्षसमुद्भवा

sūta uvāca tataḥ prabhṛti sā tatra kūpikā khyātimāgatā pitṝṇāṁ puṣṭidā nityaṁ gayāśīrṣasamudbhavā

सूत जी ने कहा — तब से वह छोटा कुआँ वहाँ प्रसिद्ध हो गया, जो गयाशीर्ष से उत्पन्न हुआ, और सदा पितरों को तृप्ति देने वाला है।

श्लोक 34 (skanda.6.19.34)

प्रेतपक्षस्य दर्शायां यस्तस्यां श्राद्धमाचरेत् । कालशाकेन विप्रेंद्रास्तथारण्योद्भवैस्तिलैः

pretapakṣasya darśāyāṁ yastasyāṁ śrāddhamācaret kālaśākena vipreṁdrāstathāraṇyodbhavaistilaiḥ

हे श्रेष्ठ विप्रो! प्रेत-पक्ष की अमावस्या के दिन जो कालशाक और वन में उत्पन्न तिलों के साथ वहाँ श्राद्ध करता है —

श्लोक 35 (skanda.6.19.35)

कृंतितैश्च तथा दर्भैः सम्यक्छ्रद्धासमन्वितः । स प्राप्नोति फलं कृत्स्नं कृतघ्नप्रेततीर्थतः

kṛṁtitaiśca tathā darbhaiḥ samyakchraddhāsamanvitaḥ sa prāpnoti phalaṁ kṛtsnaṁ kṛtaghnapretatīrthataḥ

— तथा काटे हुए कुशों के साथ, पूर्ण श्रद्धा से युक्त होकर करता है, वह कृतघ्न-प्रेत-तीर्थ से संपूर्ण फल प्राप्त करता है।

श्लोक 36 (skanda.6.19.36)

अग्निष्वात्ताः पितृगणास्तथा बर्हिषदश्च ये । तत्र संनिहिता नित्यमाज्यपाः सोमपास्तथा

agniṣvāttāḥ pitṛgaṇāstathā barhiṣadaśca ye tatra saṁnihitā nityamājyapāḥ somapāstathā

वहाँ अग्निष्वात्त, बर्हिषद, आज्यप और सोमप नाम के पितृगण सदा उपस्थित रहते हैं।

श्लोक 37 (skanda.6.19.37)

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन श्राद्धं तत्र समाचरेत् । काले वा । यदि वाऽकाले पितॄणां तुष्टये सदा

tasmātsarvaprayatnena śrāddhaṁ tatra samācaret kāle vā yadi vā'kāle pitṝṇāṁ tuṣṭaye sadā

अतः पितरों की सदा तृप्ति के लिए, चाहे उचित समय पर हो या अनुचित समय पर, हर प्रयत्न से वहाँ श्राद्ध करना चाहिए।

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