नागर खण्ड · अध्याय 20
बालमंडन तीर्थ की महिमा
श्लोक 1 (skanda.6.20.1)
सूत उवाच । तत्र दाशरथी रामो वनवासाय दीक्षितः । भ्रममाणो धरापृष्ठे सीतालक्ष्मणसंयुतः
sūta uvāca tatra dāśarathī rāmo vanavāsāya dīkṣitaḥ bhramamāṇo dharāpṛṣṭhe sītālakṣmaṇasaṁyutaḥ
सूत जी ने कहा — वहाँ वनवास के लिए प्रतिज्ञाबद्ध दशरथ-पुत्र राम, सीता और लक्ष्मण के साथ पृथ्वी पर भ्रमण करते हुए —
श्लोक 2 (skanda.6.20.2)
समाऽऽयातो द्विजश्रेष्ठा यत्र सा पितृकूपिका । तृषार्तश्च श्रमार्तश्च निषसाद धरातले
samā''yāto dvijaśreṣṭhā yatra sā pitṛkūpikā tṛṣārtaśca śramārtaśca niṣasāda dharātale
हे श्रेष्ठ द्विजो! — वहाँ आ पहुँचे जहाँ वह पितृकूपिका थी, और प्यास तथा थकान से पीड़ित होकर वे भूमि पर बैठ गए।
श्लोक 3 (skanda.6.20.3)
एतस्मिन्नंतरे प्राप्तो भगवान्दिननायकः । अस्ताचलं जपापुष्पसन्निभो द्विजसत्तमाः
etasminnaṁtare prāpto bhagavāndinanāyakaḥ astācalaṁ japāpuṣpasannibho dvijasattamāḥ
हे श्रेष्ठ द्विजो! इसी बीच दिन के स्वामी भगवान सूर्य, जपाकुसुम के समान लाल होकर, अस्ताचल पर्वत पर पहुँच गए।
श्लोक 4 (skanda.6.20.4)
ततः प्लक्षनगाधस्तात्पर्णान्यास्तीर्य भूतले । सायंतनं विधिं कृत्वा सुष्वाप रघुनन्दनः
tataḥ plakṣanagādhastātparṇānyāstīrya bhūtale sāyaṁtanaṁ vidhiṁ kṛtvā suṣvāpa raghunandanaḥ
तब पाकड़ वृक्ष के नीचे भूमि पर पत्ते बिछाकर, संध्या-विधि करके, रघुनंदन (राम) सो गए।
श्लोक 5 (skanda.6.20.5)
अथाऽवलोकयामास स्वप्ने दशरथं नृपम् । यद्वत्पूर्वं प्रियाऽऽलापसंसक्तं हृष्टमानसम्
athā'valokayāmāsa svapne daśarathaṁ nṛpam yadvatpūrvaṁ priyā''lāpasaṁsaktaṁ hṛṣṭamānasam
तब उन्होंने स्वप्न में राजा दशरथ को देखा — वैसे ही, जैसे वे पहले प्रिय वचनों में लीन, प्रसन्नचित्त हुआ करते थे।
श्लोक 6 (skanda.6.20.6)
ततः प्रभाते विमले प्रोद्गते रविमण्डले । विप्रानाहूय तत्सर्वं कथयामास राघवः
tataḥ prabhāte vimale prodgate ravimaṇḍale viprānāhūya tatsarvaṁ kathayāmāsa rāghavaḥ
फिर स्वच्छ प्रभात होने पर, सूर्यमंडल के उदय होने पर, राघव ने ब्राह्मणों को बुलाकर उन्हें वह सब कह सुनाया।
श्लोक 7 (skanda.6.20.7)
अद्य स्वप्ने मया विप्राः प्रियालापपरः पिता । अतिहृष्टमना दृष्टः श्वेतमाल्यानुलेपनः
adya svapne mayā viprāḥ priyālāpaparaḥ pitā atihṛṣṭamanā dṛṣṭaḥ śvetamālyānulepanaḥ
"हे विप्रो! आज स्वप्न में मैंने अपने पिता को देखा — प्रिय वचन बोलते हुए, अत्यंत प्रसन्नचित्त, श्वेत माला और अनुलेपन से युक्त।"
श्लोक 8 (skanda.6.20.8)
तत्कीदृक्परिणामोऽस्य स्वप्नस्य द्विजसत्तमाः । भविष्यति प्रजल्पध्वं परं कौतूहलं यतः
tatkīdṛkpariṇāmo'sya svapnasya dvijasattamāḥ bhaviṣyati prajalpadhvaṁ paraṁ kautūhalaṁ yataḥ
"हे श्रेष्ठ द्विजो! इस स्वप्न का परिणाम कैसा होगा — यह मुझे बताइए, क्योंकि मुझे इसके विषय में अत्यंत कुतूहल है।"
श्लोक 9 (skanda.6.20.9)
ब्राह्मणा ऊचुः । पितरः श्राद्धकामा ये वृद्धिं पश्यंति वा नृप । ते स्वप्ने दर्शनं यांति पुत्राणामिति नः श्रुतम्
brāhmaṇā ūcuḥ pitaraḥ śrāddhakāmā ye vṛddhiṁ paśyaṁti vā nṛpa te svapne darśanaṁ yāṁti putrāṇāmiti naḥ śrutam
ब्राह्मणों ने कहा — हे राजन्! जो पितर श्राद्ध चाहते हैं, अथवा जिनकी वृद्धि (श्रद्धा-वृद्धि श्राद्ध) होनी हो, वे पुत्रों के स्वप्न में दर्शन देते हैं — ऐसा हमने सुना है।
श्लोक 10 (skanda.6.20.10)
तदस्यां कूपिकायां च स्वयमेव गया स्थिता । तेन त्वया पिता दृष्टः स्वप्ने श्राद्धस्य वांछकः
tadasyāṁ kūpikāyāṁ ca svayameva gayā sthitā tena tvayā pitā dṛṣṭaḥ svapne śrāddhasya vāṁchakaḥ
और इस छोटे कुएँ में स्वयं गया ही स्थित है; इसीलिए आपने स्वप्न में अपने पिता को श्राद्ध की कामना करते हुए देखा है।
श्लोक 11 (skanda.6.20.11)
तस्मात्कुरु रघुश्रेष्ठ श्राद्धमत्र यथोदितम् । नीवारैः शाक मूलैश्च तथाऽरण्योद्भवैस्तिलैः
tasmātkuru raghuśreṣṭha śrāddhamatra yathoditam nīvāraiḥ śāka mūlaiśca tathā'raṇyodbhavaistilaiḥ
अतः हे रघुश्रेष्ठ! यहाँ यथोचित विधि से नीवार (जंगली चावल), साग, कंद-मूल तथा वन में उत्पन्न तिलों के साथ श्राद्ध कीजिए।
श्लोक 12 (skanda.6.20.12)
अथैवामन्त्रयामास तान्विप्रान्रघुसत्तमः । श्राद्धेषु श्रद्धया युक्तः प्रसादः क्रियतामिति
athaivāmantrayāmāsa tānviprānraghusattamaḥ śrāddheṣu śraddhayā yuktaḥ prasādaḥ kriyatāmiti
तब उस श्रेष्ठ रघुवंशी ने उन ब्राह्मणों को श्रद्धापूर्वक श्राद्ध के लिए आमंत्रित करते हुए कहा — "कृपा कीजिए।"
श्लोक 13 (skanda.6.20.13)
बाढमित्येव ते चोक्त्वा स्नानार्थं द्विजसत्तमाः । गताः सर्वे सुसंहृष्टा स्वकीयानाश्रमान्प्रति
bāḍhamityeva te coktvā snānārthaṁ dvijasattamāḥ gatāḥ sarve susaṁhṛṣṭā svakīyānāśramānprati
"अवश्य" ऐसा कहकर वे श्रेष्ठ द्विज, अत्यंत प्रसन्न होते हुए, स्नान के लिए अपने-अपने आश्रमों की ओर चले गए।
श्लोक 14 (skanda.6.20.14)
अथ तेषु प्रयातेषु ब्राह्मणेषु रघूत्तमः । प्रोवाच लक्ष्मणं पार्श्वे विनयावनतं स्थितम्
atha teṣu prayāteṣu brāhmaṇeṣu raghūttamaḥ provāca lakṣmaṇaṁ pārśve vinayāvanataṁ sthitam
फिर उन ब्राह्मणों के चले जाने पर, उस श्रेष्ठ रघुवंशी ने अपने पास विनम्रतापूर्वक खड़े लक्ष्मण से कहा।
श्लोक 15 (skanda.6.20.15)
शाकमूलफलान्याशु श्राद्धार्थं समुपानय । सौमित्रानय वैदेही स्वयं पचति भामिनी
śākamūlaphalānyāśu śrāddhārthaṁ samupānaya saumitrānaya vaidehī svayaṁ pacati bhāminī
"श्राद्ध के लिए शीघ्र साग, कंद-मूल और फल ले आओ, हे सौमित्रि! वैदेही (सीता) स्वयं उन्हें पकाएगी।"
श्लोक 16 (skanda.6.20.16)
तच्छ्रुत्वा लक्ष्मणस्तूर्णं जगामाऽरण्यमेव हि । श्राद्धार्थमानिनायाऽऽशु फलानि विविधानि च
tacchrutvā lakṣmaṇastūrṇaṁ jagāmā'raṇyameva hi śrāddhārthamānināyā''śu phalāni vividhāni ca
यह सुनकर लक्ष्मण तुरंत वन की ओर चले गए, और श्राद्ध के लिए शीघ्र ही विविध प्रकार के फल ले आए।
श्लोक 17 (skanda.6.20.17)
धात्रीफलानि चाऽऽम्राणि चिर्भटानीं गुदानि च । करीराणि कपित्थानि तथैवाऽन्यानि भूरिशः
dhātrīphalāni cā''mrāṇi cirbhaṭānīṁ gudāni ca karīrāṇi kapitthāni tathaivā'nyāni bhūriśaḥ
आँवले, आम, ककड़ी के फल, गुडुची के फल, केर और कैथ के फल, तथा और भी अनेक फल —
श्लोक 18 (skanda.6.20.18)
ततश्च पाचयामास तदर्थे जनकोद्भवा । रामादेशात्स्वयं साध्वी विनयेन समन्विता
tataśca pācayāmāsa tadarthe janakodbhavā rāmādeśātsvayaṁ sādhvī vinayena samanvitā
— इन सबको फिर जनक-पुत्री साध्वी सीता ने, राम की आज्ञा से, स्वयं विनयपूर्वक श्राद्ध के लिए पकाया।
श्लोक 19 (skanda.6.20.19)
ततश्च कुतपे प्राप्ते काले ते द्विजसत्तमाः । कृताह्निकाः समायाता रामभक्तिसमन्विताः
tataśca kutape prāpte kāle te dvijasattamāḥ kṛtāhnikāḥ samāyātā rāmabhaktisamanvitāḥ
तब कुतप काल आने पर वे श्रेष्ठ द्विज, अपनी नित्य-क्रियाएँ करके, राम-भक्ति से युक्त होकर वहाँ आए।
श्लोक 20 (skanda.6.20.20)
एतस्मिन्नंतरे सीता प्लक्षवृक्षांतरे स्थिता । आत्मानं गोपयामास यथा वेत्ति न राघवः
etasminnaṁtare sītā plakṣavṛkṣāṁtare sthitā ātmānaṁ gopayāmāsa yathā vetti na rāghavaḥ
इसी बीच सीता पाकड़ वृक्ष के पीछे जाकर छिप गईं, इस प्रकार कि राघव को उसका पता न चले।
श्लोक 21 (skanda.6.20.21)
स तां सीतेति सीतेति व्याहृत्याथ मुहुर्मुहुः । स्त्रीधर्मिणीति मत्वा तु लक्ष्मणं चेदमब्रवीत्
sa tāṁ sīteti sīteti vyāhṛtyātha muhurmuhuḥ strīdharmiṇīti matvā tu lakṣmaṇaṁ cedamabravīt
तब उन्होंने बार-बार "सीता, सीता" पुकारा, और उसे स्त्री-धर्म (रजस्वला) में समझकर लक्ष्मण से यह कहा।
श्लोक 22 (skanda.6.20.22)
वत्स लक्ष्मण शुश्रूषां विप्राणां श्राद्धसंभवाम् । पादप्रक्षालनाद्यां त्वं यथावत्कर्तुमर्हसि
vatsa lakṣmaṇa śuśrūṣāṁ viprāṇāṁ śrāddhasaṁbhavām pādaprakṣālanādyāṁ tvaṁ yathāvatkartumarhasi
"हे वत्स लक्ष्मण! श्राद्ध के अवसर पर होने वाली विप्रों की सेवा — चरण-प्रक्षालन आदि — तुम्हीं यथोचित रीति से करो।"
श्लोक 23 (skanda.6.20.23)
बाढमित्येव संप्रोक्तो लक्ष्मणः शुभलक्षणः । चक्रे सर्वं तथा कर्म यथा नारी विचक्षणा
bāḍhamityeva saṁprokto lakṣmaṇaḥ śubhalakṣaṇaḥ cakre sarvaṁ tathā karma yathā nārī vicakṣaṇā
"अवश्य" ऐसा कहकर, शुभ लक्षणों वाले लक्ष्मण ने वह सब कार्य वैसे ही किया, जैसे कोई कुशल स्त्री करती है।
श्लोक 24 (skanda.6.20.24)
ततो निर्वर्तिते श्राद्धे ब्राह्मणेषु गतेष्वथ । जनकस्य सुता साध्वी तत्क्षणात्समुपस्थिता
tato nirvartite śrāddhe brāhmaṇeṣu gateṣvatha janakasya sutā sādhvī tatkṣaṇātsamupasthitā
फिर श्राद्ध समाप्त हो जाने पर, ब्राह्मणों के चले जाने पर, जनक-पुत्री साध्वी सीता उसी क्षण वहाँ आ उपस्थित हुईं।
श्लोक 25 (skanda.6.20.25)
तां दृष्ट्वा राघवः सीतां कोपसंरक्तलोचनः । प्रोवाच परुषैर्वाक्यैर्भर्त्समानो मुहुर्मुहुः
tāṁ dṛṣṭvā rāghavaḥ sītāṁ kopasaṁraktalocanaḥ provāca paruṣairvākyairbhartsamāno muhurmuhuḥ
उसे देखकर राघव, क्रोध से लाल हुए नेत्रों वाले, कठोर वचनों में बार-बार भर्त्सना करते हुए बोले।
श्लोक 26 (skanda.6.20.26)
आयातेषु द्विजातेषु श्राद्धकाल उपस्थिते । क्व गता वद पापे त्वं मां परित्यज्य दूरतः
āyāteṣu dvijāteṣu śrāddhakāla upasthite kva gatā vada pāpe tvaṁ māṁ parityajya dūrataḥ
"जब द्विज आ चुके थे और श्राद्ध का समय उपस्थित था, तब हे पापिनी! मुझे छोड़कर दूर तुम कहाँ चली गई थीं — यह बताओ।"
श्लोक 27 (skanda.6.20.27)
नैतद्युक्तं कुलस्त्रीणां विशेषादत्र कानने । विहर्तुं दूरतः शून्ये तस्मात्त्याज्याऽसि मैथिलि
naitadyuktaṁ kulastrīṇāṁ viśeṣādatra kānane vihartuṁ dūrataḥ śūnye tasmāttyājyā'si maithili
"कुलीन स्त्रियों के लिए यह उचित नहीं, विशेष रूप से इस वन में, कि वे दूर सुनसान स्थान में भटकती फिरें। इसलिए, हे मैथिली! तुम त्याज्य हो।"
श्लोक 28 (skanda.6.20.28)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा भीता सा जनकोद्भवा । उवाच वेपमानांगी प्रस्खलंत्या गिरा ततः
tasya tadvacanaṁ śrutvā bhītā sā janakodbhavā uvāca vepamānāṁgī praskhalaṁtyā girā tataḥ
उनके ये वचन सुनकर, भयभीत हुई वह जनक-पुत्री, काँपते हुए शरीर से, लड़खड़ाती वाणी में यह बोली।
श्लोक 29 (skanda.6.20.29)
न मामर्हसि कार्येऽस्मिन्गर्हितुं रघुसत्तम । यस्मादहमतिक्रान्ता स्थानादस्माच्छ्रणुष्व तत्
na māmarhasi kārye'smingarhituṁ raghusattama yasmādahamatikrāntā sthānādasmācchraṇuṣva tat
"हे श्रेष्ठ रघुवंशी! इस विषय में आपको मुझे दोष नहीं देना चाहिए। मैं जिस कारण इस स्थान से हट गई थी, वह सुनिए।"
श्लोक 30 (skanda.6.20.30)
पिता तव मया दृष्टः साक्षाद्दशरथः स्वयम् । ब्राह्मणस्य शरीरस्थो द्वितीयश्च पितामहः
pitā tava mayā dṛṣṭaḥ sākṣāddaśarathaḥ svayam brāhmaṇasya śarīrastho dvitīyaśca pitāmahaḥ
"मैंने साक्षात् आपके पिता दशरथ को स्वयं एक ब्राह्मण के शरीर में देखा, और दूसरे को आपके पितामह के रूप में।"
श्लोक 31 (skanda.6.20.31)
पितुः पितामहोऽन्यस्य तृतीयस्य रघूत्तम । त्रयाणां च तथान्येषां त्रयोऽन्ये नृपसंनिभाः
pituḥ pitāmaho'nyasya tṛtīyasya raghūttama trayāṇāṁ ca tathānyeṣāṁ trayo'nye nṛpasaṁnibhāḥ
"हे रघुश्रेष्ठ! तीसरे में आपके पिता के पितामह को देखा। और इन तीनों के समान ही तीन अन्य राजा जैसे पुरुष भी थे।"
श्लोक 32 (skanda.6.20.32)
ब्राह्मणानां मया दृष्टाः शरीरस्थाः सुहर्षिताः । मातामहानहं मन्ये तानपि त्रीनहं स्फुटम्
brāhmaṇānāṁ mayā dṛṣṭāḥ śarīrasthāḥ suharṣitāḥ mātāmahānahaṁ manye tānapi trīnahaṁ sphuṭam
"मैंने उन ब्राह्मणों के शरीर में अत्यंत प्रसन्न रूप देखा; मैं समझती हूँ कि वे तीनों स्पष्ट रूप से मेरे नानागण थे।"
श्लोक 33 (skanda.6.20.33)
ततो ऽहं लज्जया नष्टा दृष्ट्वा श्वशुरसंगमान् । येन भुक्तानि भोज्यानि पुरा मृष्टान्यनेकशः
tato 'haṁ lajjayā naṣṭā dṛṣṭvā śvaśurasaṁgamān yena bhuktāni bhojyāni purā mṛṣṭānyanekaśaḥ
"उन श्वशुर-पक्ष के लोगों को देखकर मैं लज्जा से गायब हो गई — क्योंकि जिन्होंने पहले अनेक बार सुंदर भोज्य पदार्थ खाए थे —"
श्लोक 34 (skanda.6.20.34)
तथा खाद्यानि लेह्यानि चोष्याणि च विशेषतः । पिता तव कथं सोऽद्य कषायाणि कटूनि च । भक्षयिष्यति दत्तानि स्वहस्तेन मया विभो
tathā khādyāni lehyāni coṣyāṇi ca viśeṣataḥ pitā tava kathaṁ so'dya kaṣāyāṇi kaṭūni ca bhakṣayiṣyati dattāni svahastena mayā vibho
"— तथा विशेष रूप से खाद्य, लेह्य, चोष्य पदार्थ, वह आपका पिता आज मेरे ही हाथों से दिए गए कसैले और कटु पदार्थों को कैसे खाएगा, हे प्रभु?"
श्लोक 35 (skanda.6.20.35)
एतस्मात्कारणान्नष्टा त्वत्समीपादहं विभो । श्राद्धकालेऽपि संप्राप्ते सत्येनात्मानमालभे
etasmātkāraṇānnaṣṭā tvatsamīpādahaṁ vibho śrāddhakāle'pi saṁprāpte satyenātmānamālabhe
"इसी कारण से, हे प्रभु, मैं श्राद्ध का समय होते हुए भी आपके पास से हट गई थी — मैं सत्य की शपथ लेकर यह कहती हूँ।"
श्लोक 36 (skanda.6.20.36)
तच्छ्रुत्वा संप्रहृष्टात्मा रामो राजीवलोचनः । साधुसाध्विति तां प्राह परिष्वज्य मुहुर्मुहुः
tacchrutvā saṁprahṛṣṭātmā rāmo rājīvalocanaḥ sādhusādhviti tāṁ prāha pariṣvajya muhurmuhuḥ
यह सुनकर कमल-नेत्र राम अत्यंत प्रसन्न हुए, और बार-बार उसे गले लगाकर "साधु, साधु" कहने लगे।
श्लोक 37 (skanda.6.20.37)
ततो भुक्त्वा स्वयं रामो लक्ष्मणेन समन्वितः । सायाह्ने समनुप्राप्ते संध्याकार्यं विधाय च
tato bhuktvā svayaṁ rāmo lakṣmaṇena samanvitaḥ sāyāhne samanuprāpte saṁdhyākāryaṁ vidhāya ca
फिर स्वयं भोजन करके, लक्ष्मण के साथ, संध्या का समय आने पर संध्या-कार्य करके —
श्लोक 38 (skanda.6.20.38)
प्रोवाच लक्ष्मणं वत्स पर्णान्यास्तीर्य भूतले । शय्यां कुरु समानीय पादशौचाय सज्जलम्
provāca lakṣmaṇaṁ vatsa parṇānyāstīrya bhūtale śayyāṁ kuru samānīya pādaśaucāya sajjalam
— राम ने लक्ष्मण से कहा — "हे वत्स! भूमि पर पत्ते बिछाकर शय्या बनाओ, और चरण धोने के लिए जल भर लाओ।"
श्लोक 39 (skanda.6.20.39)
ततः कोपपरीतात्मा सौमित्रिः प्राह राघवम् । नाहं शय्यां करिष्यामि पादप्रक्षालनं न च
tataḥ kopaparītātmā saumitriḥ prāha rāghavam nāhaṁ śayyāṁ kariṣyāmi pādaprakṣālanaṁ na ca
तब क्रोध से भरे हुए सौमित्रि (लक्ष्मण) ने राघव से कहा — "मैं न शय्या बनाऊँगा, न आपके चरण धोऊँगा।"
श्लोक 40 (skanda.6.20.40)
तथाऽन्यदपि यत्किंचित्कर्म स्वल्पमपि प्रभो । त्वां वा त्यक्त्वा गमिष्यामि कुत्रचित्पीडितो भृशम्
tathā'nyadapi yatkiṁcitkarma svalpamapi prabho tvāṁ vā tyaktvā gamiṣyāmi kutracitpīḍito bhṛśam
"हे प्रभु! तथा अन्य जो भी थोड़ा-सा भी कार्य हो, वह भी नहीं करूँगा। मैं अत्यंत पीड़ित होकर आपको छोड़कर कहीं और चला जाऊँगा।"
श्लोक 41 (skanda.6.20.41)
प्रेष्यत्वेन रघुश्रेष्ठ सत्यमेतन्मयोदितम् । सीतायाः किं समादेश्यं न किंचित्संप्रयच्छसि । अपि स्वल्पतरं राम मया त्वं किं करिष्यसि
preṣyatvena raghuśreṣṭha satyametanmayoditam sītāyāḥ kiṁ samādeśyaṁ na kiṁcitsaṁprayacchasi api svalpataraṁ rāma mayā tvaṁ kiṁ kariṣyasi
"हे रघुश्रेष्ठ! सेवक के रूप में मैंने यह सत्य ही कहा है। सीता को क्या आज्ञा देनी है — यह आप मुझे कुछ भी नहीं बताते। हे राम! क्या इतना भी थोड़ा काम आप मुझसे करवाएँगे?"
श्लोक 42 (skanda.6.20.42)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा विकृतं चापि राघवः । तूष्णीं बभूव मेधावी हास्यं कृत्वा मनाक्ततः
tasya tadvacanaṁ śrutvā vikṛtaṁ cāpi rāghavaḥ tūṣṇīṁ babhūva medhāvī hāsyaṁ kṛtvā manāktataḥ
उसके इन विकृत वचनों को सुनकर भी बुद्धिमान राघव कुछ हँसी करके चुप हो गए।
श्लोक 43 (skanda.6.20.43)
ततः स्वयं समुत्थाय कृत्वा स्वा स्तरकं शुभम् । सीतया क्षालितांघ्रिस्तु सुष्वाप तदनंतरम्
tataḥ svayaṁ samutthāya kṛtvā svā starakaṁ śubham sītayā kṣālitāṁghristu suṣvāpa tadanaṁtaram
फिर स्वयं उठकर, अपना शुभ बिछौना बनाकर, सीता द्वारा चरण धुलवाकर, उसके बाद वे सो गए।
श्लोक 44 (skanda.6.20.44)
लक्ष्मणोऽपि विदूरस्थः कोपसंरक्तलोचनः । वृक्षमूलं समाश्रित्य सुप्तश्चित्ते व्यचिंतयत्
lakṣmaṇo'pi vidūrasthaḥ kopasaṁraktalocanaḥ vṛkṣamūlaṁ samāśritya suptaścitte vyaciṁtayat
लक्ष्मण भी दूर जाकर, क्रोध से लाल नेत्रों वाले होकर, एक वृक्ष के नीचे आश्रय लेकर सोते हुए मन में विचार करने लगे।
श्लोक 45 (skanda.6.20.45)
हत्वैनं राघवं सुप्तं सीतां पत्नीं विधाय च । किं गच्छामि निजं स्थानं विदेशं वाऽपिदूरतः
hatvainaṁ rāghavaṁ suptaṁ sītāṁ patnīṁ vidhāya ca kiṁ gacchāmi nijaṁ sthānaṁ videśaṁ vā'pidūrataḥ
"इस सोए हुए राघव को मारकर, सीता को अपनी पत्नी बनाकर, क्या मैं अपने स्थान को जाऊँ, या दूर किसी विदेश को?"
श्लोक 46 (skanda.6.20.46)
एवं चिंतयतस्तस्य बहुधा लक्ष्मणस्य सा । व्यतिक्रांता निशा विप्राः कृच्छ्रेण महता ततः
evaṁ ciṁtayatastasya bahudhā lakṣmaṇasya sā vyatikrāṁtā niśā viprāḥ kṛcchreṇa mahatā tataḥ
हे विप्रो! इस प्रकार बहुत तरह से सोचते हुए लक्ष्मण की वह रात्रि तब बड़ी कठिनाई से बीती।
श्लोक 47 (skanda.6.20.47)
न तस्य निश्चयो जज्ञे तस्मिन्कृत्ये कथंचन । कोपात्प्रणष्टनिद्रस्य सोष्णं निःश्वसतो मुहुः
na tasya niścayo jajñe tasminkṛtye kathaṁcana kopātpraṇaṣṭanidrasya soṣṇaṁ niḥśvasato muhuḥ
क्रोध के कारण जिनकी नींद उड़ गई थी, और जो बार-बार गरम साँसें ले रहे थे, उनका उस कृत्य के विषय में कोई निश्चय नहीं हो पाया।
श्लोक 48 (skanda.6.20.48)
ततः प्रभाते विमले कृतपूर्वाह्णिकक्रियः । रामः सीतां समादाय प्रस्थितो दक्षिणां दिशम्
tataḥ prabhāte vimale kṛtapūrvāhṇikakriyaḥ rāmaḥ sītāṁ samādāya prasthito dakṣiṇāṁ diśam
फिर स्वच्छ प्रभात होने पर, पूर्वाह्न की क्रियाएँ करके, राम सीता को साथ लेकर दक्षिण दिशा की ओर चल पड़े।
श्लोक 49 (skanda.6.20.49)
लक्ष्मणोऽपि धनुः सज्यं कृत्वा संधाय सायकम् । अनुव्रजति पृष्ठस्थस्तस्य च्छिद्रं विलोकयन्
lakṣmaṇo'pi dhanuḥ sajyaṁ kṛtvā saṁdhāya sāyakam anuvrajati pṛṣṭhasthastasya cchidraṁ vilokayan
लक्ष्मण भी धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाकर, बाण जोड़कर, उनके पीछे-पीछे चलते हुए, उनके किसी छिद्र (अवसर) को देखते रहे।
श्लोक 50 (skanda.6.20.50)
ततो गोकर्णमासाद्य प्रणम्य च महेश्वरम् । प्रतस्थे राघवो यावत्सौमित्रिस्तावदागतः
tato gokarṇamāsādya praṇamya ca maheśvaram pratasthe rāghavo yāvatsaumitristāvadāgataḥ
फिर गोकर्ण पहुँचकर, महेश्वर को प्रणाम करके, जब राघव आगे बढ़ने लगे, तभी सौमित्रि (लक्ष्मण) उनके पास आ गए।
श्लोक 51 (skanda.6.20.51)
बाष्पपर्याकुलाक्षश्च व्रीडयाऽधोमुखः स्थितः । प्रणम्य शिरसा रामं ततः प्राह सुदुः खितः
bāṣpaparyākulākṣaśca vrīḍayā'dhomukhaḥ sthitaḥ praṇamya śirasā rāmaṁ tataḥ prāha suduḥ khitaḥ
उनकी आँखों में आँसू भरे थे, लज्जा से उनका सिर झुका हुआ था। सिर झुकाकर राम को प्रणाम करके, फिर वे अत्यंत दुःखी होकर बोले।
श्लोक 52 (skanda.6.20.52)
कुरु मे निग्रहं नाथ स्वामिद्रोहसमुद्भवम् । अतिपापस्य दुष्टस्य कृतघ्नस्य रघूत्तम
kuru me nigrahaṁ nātha svāmidrohasamudbhavam atipāpasya duṣṭasya kṛtaghnasya raghūttama
"हे नाथ! स्वामि-द्रोह से उत्पन्न मुझ अत्यंत पापी, दुष्ट और कृतघ्न को दंड दीजिए, हे रघुश्रेष्ठ!"
श्लोक 53 (skanda.6.20.53)
उत्तराणि विरुद्धानि तव दत्तानि भूरिशः । मया विनाऽपराधेन वधोपायश्च चिंतितः
uttarāṇi viruddhāni tava dattāni bhūriśaḥ mayā vinā'parādhena vadhopāyaśca ciṁtitaḥ
"मैंने आपको बार-बार अनुचित उत्तर दिए हैं, और बिना किसी अपराध के, मैंने आपके वध का उपाय भी सोचा है।"
श्लोक 54 (skanda.6.20.54)
ततश्च तं परिष्वज्य रामोऽपि निजबांधवम् । बाष्पक्लिन्नमुखः प्राह क्षांतं वत्स मया तव
tataśca taṁ pariṣvajya rāmo'pi nijabāṁdhavam bāṣpaklinnamukhaḥ prāha kṣāṁtaṁ vatsa mayā tava
तब राम ने भी अपने उस बंधु को गले लगाकर, आँसुओं से भीगे मुख से कहा — "हे वत्स! मैंने तुम्हें क्षमा कर दिया।"
श्लोक 55 (skanda.6.20.55)
न ते त्वन्यः प्रियः कश्चिन्मां मुक्त्वा वेद्म्यहं स्फुटम् । तस्मादागच्छ गच्छामो मार्गं वेलाधिका भवेत्
na te tvanyaḥ priyaḥ kaścinmāṁ muktvā vedmyahaṁ sphuṭam tasmādāgaccha gacchāmo mārgaṁ velādhikā bhavet
"मुझे स्पष्ट रूप से पता है कि मुझे छोड़कर तुम्हारा कोई और प्रिय नहीं है। इसलिए आओ, चलें — मार्ग में समय अधिक हुआ जा रहा है।"
श्लोक 56 (skanda.6.20.56)
लक्ष्मण उवाच । यदि मे निग्रहं नाथ न करिष्यसि सांप्रतम् । प्राणत्यागं करिष्यामि वह्नावात्मविशुद्धये
lakṣmaṇa uvāca yadi me nigrahaṁ nātha na kariṣyasi sāṁpratam prāṇatyāgaṁ kariṣyāmi vahnāvātmaviśuddhaye
लक्ष्मण ने कहा — "हे नाथ! यदि आप अभी मुझे दंड नहीं देंगे, तो मैं अपनी शुद्धि के लिए अग्नि में अपने प्राणों का त्याग कर दूँगा।"
श्लोक 57 (skanda.6.20.57)
रामलक्ष्मणयोरेवं वदतोस्तत्र कानने । आजगाम मुनिश्रेष्ठो मार्कंड इति यः स्मृतः
rāmalakṣmaṇayorevaṁ vadatostatra kānane ājagāma muniśreṣṭho mārkaṁḍa iti yaḥ smṛtaḥ
राम और लक्ष्मण इस प्रकार उस वन में बातचीत कर ही रहे थे कि वहाँ मार्कंड (मार्कंडेय) नामक श्रेष्ठ मुनि आ पहुँचे।
श्लोक 58 (skanda.6.20.58)
ततः प्रणम्य तं रामः सीतालक्ष्मणसंयुतः । प्रोवाच स्वागतं तेस्तु कुतः प्राप्तोऽसि सन्मुने
tataḥ praṇamya taṁ rāmaḥ sītālakṣmaṇasaṁyutaḥ provāca svāgataṁ testu kutaḥ prāpto'si sanmune
तब सीता और लक्ष्मण के साथ उन्हें प्रणाम करके राम ने कहा — "हे सत्पुरुष मुनि! आपका स्वागत है। आप कहाँ से पधारे हैं?"
श्लोक 59 (skanda.6.20.59)
मार्कंडेय उवाच । प्रभासादहमायातः सांप्रतं रघुनंदन । स्वमाश्रमं गमिष्यामि क्षेत्रेऽत्रैव व्यवस्थितम्
mārkaṁḍeya uvāca prabhāsādahamāyātaḥ sāṁprataṁ raghunaṁdana svamāśramaṁ gamiṣyāmi kṣetre'traiva vyavasthitam
मार्कंडेय ने कहा — "हे रघुनंदन! मैं अभी प्रभास से आया हूँ, और अब इसी क्षेत्र में स्थित अपने आश्रम को जाऊँगा।"
श्लोक 60 (skanda.6.20.60)
मया राघव तत्राऽस्ति स्थापितः प्रपितामहः । तस्याऽद्य दिवसे यात्रा बहुश्रेयःप्रदा स्मृता
mayā rāghava tatrā'sti sthāpitaḥ prapitāmahaḥ tasyā'dya divase yātrā bahuśreyaḥpradā smṛtā
"हे राघव! वहाँ मैंने प्रपितामह (सूर्य) को स्थापित किया है। आज के दिन उनकी यात्रा (उत्सव) बहुत कल्याणकारी मानी जाती है।"
श्लोक 61 (skanda.6.20.61)
तस्मात्त्वमपि तत्रैव तूर्णमेव मया सह । ममाश्रमपदे स्थित्वा पश्य देवं पितामहम्
tasmāttvamapi tatraiva tūrṇameva mayā saha mamāśramapade sthitvā paśya devaṁ pitāmaham
"अतः आप भी शीघ्र ही मेरे साथ वहीं चलिए; मेरे आश्रम में ठहरकर उस देव पितामह के दर्शन कीजिए।"
श्लोक 62 (skanda.6.20.62)
येन स्याः सर्वशत्रूणामगम्यस्त्वं रघूद्वह । ज्येष्ठपञ्चदशीयोगे ज्येष्ठपुत्रः समाहितः
yena syāḥ sarvaśatrūṇāmagamyastvaṁ raghūdvaha jyeṣṭhapañcadaśīyoge jyeṣṭhaputraḥ samāhitaḥ
"जिससे, हे रघुकुलश्रेष्ठ, आप समस्त शत्रुओं के लिए अगम्य हो जाएँ — ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा के योग में, ज्येष्ठा नक्षत्र से युक्त होकर एकाग्रचित्त होइए।"
श्लोक 63 (skanda.6.20.63)
यस्तत्र कुरुते स्नानं तस्य मृत्युभयं कुतः । साऽद्य पंचदशी राम ज्येष्ठमाससमुद्भवा । ज्येष्ठानक्षत्रसंयुक्ता तस्मात्स्नातुं त्वमर्हसि
yastatra kurute snānaṁ tasya mṛtyubhayaṁ kutaḥ sā'dya paṁcadaśī rāma jyeṣṭhamāsasamudbhavā jyeṣṭhānakṣatrasaṁyuktā tasmātsnātuṁ tvamarhasi
"जो वहाँ स्नान करता है, उसे मृत्यु का भय कहाँ रहता है? हे राम! आज वही ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा है, जो ज्येष्ठा नक्षत्र से युक्त है; इसलिए आपको स्नान करना चाहिए।"
श्लोक 64 (skanda.6.20.64)
ततः संप्रस्थितं रामं दृष्ट्वा प्रोवाच लक्ष्मणः । कुरु मे निग्रहं तावद्गच्छ तीर्थं ततः प्रभो
tataḥ saṁprasthitaṁ rāmaṁ dṛṣṭvā provāca lakṣmaṇaḥ kuru me nigrahaṁ tāvadgaccha tīrthaṁ tataḥ prabho
तब राम को आगे बढ़ते देखकर लक्ष्मण ने कहा — "हे प्रभु! पहले मुझे दंड दीजिए, फिर तीर्थ को जाइए।"
श्लोक 65 (skanda.6.20.65)
राम उवाच । स्थितेऽस्मिन्मुनिशार्दूले समीपे वत्स लक्ष्मण । अनर्हा निष्कृतिः कर्तुं तस्मादेनं प्रयाचय
rāma uvāca sthite'sminmuniśārdūle samīpe vatsa lakṣmaṇa anarhā niṣkṛtiḥ kartuṁ tasmādenaṁ prayācaya
राम ने कहा — "हे वत्स लक्ष्मण! जब यह श्रेष्ठ मुनि यहाँ निकट में उपस्थित हैं, तब मेरे लिए दंड देना उचित नहीं है; इसलिए इन्हीं से प्रार्थना करो।"
श्लोक 66 (skanda.6.20.66)
लक्ष्मण उवाच । स्वामिद्रोहे कृते ब्रह्मन्प्रायश्चित्तं यदीक्ष्यते । तन्मे देहि स्फुटं येन कायशुद्धिः प्रजायते
lakṣmaṇa uvāca svāmidrohe kṛte brahmanprāyaścittaṁ yadīkṣyate tanme dehi sphuṭaṁ yena kāyaśuddhiḥ prajāyate
लक्ष्मण ने कहा — "हे ब्रह्मन्! स्वामि-द्रोह करने पर जो प्रायश्चित्त उचित समझा जाता हो, वह मुझे स्पष्ट रूप से बताइए, जिससे मेरे शरीर की शुद्धि हो सके।"
श्लोक 67 (skanda.6.20.67)
मार्कंडेय उवाच । ममाऽऽश्रमसमीपेऽस्ति सुतीर्थं बालमंडनम् । स्वामिद्रोहरताः स्नाता मुच्यंते तत्र पातकैः
mārkaṁḍeya uvāca mamā''śramasamīpe'sti sutīrthaṁ bālamaṁḍanam svāmidroharatāḥ snātā mucyaṁte tatra pātakaiḥ
मार्कंडेय ने कहा — "मेरे आश्रम के निकट बालमंडन नामक उत्तम तीर्थ है। स्वामि-द्रोह में लगे हुए लोग भी वहाँ स्नान करके पापों से मुक्त हो जाते हैं।"
श्लोक 68 (skanda.6.20.68)
तत्र शक्रो विपाप्माभूद्धत्वा गर्भं दितेः पुरा । विश्वस्ताया विशेषेण मातुः काकुत्स्थसत्तम । तस्मात्तत्र द्रुतं गत्वा स्नानं कुरु महामते
tatra śakro vipāpmābhūddhatvā garbhaṁ diteḥ purā viśvastāyā viśeṣeṇa mātuḥ kākutsthasattama tasmāttatra drutaṁ gatvā snānaṁ kuru mahāmate
"हे काकुत्स्थश्रेष्ठ! पूर्वकाल में दिति के गर्भ को नष्ट करके, विशेष रूप से विश्वासी माता के प्रति द्रोह करके, इंद्र भी वहाँ स्नान करके पापरहित हो गए थे। इसलिए हे महामते! शीघ्र वहाँ जाकर स्नान कीजिए।"
श्लोक 69 (skanda.6.20.69)
ततः प्रमुच्यसे पापात्स्वामिद्रोहसमुद्भवात् । अपरं नास्ति ते दोषो मनसा पातकं कृतम्
tataḥ pramucyase pāpātsvāmidrohasamudbhavāt aparaṁ nāsti te doṣo manasā pātakaṁ kṛtam
"इससे तुम स्वामि-द्रोह से उत्पन्न पाप से मुक्त हो जाओगे। इसके अतिरिक्त तुम्हारा कोई और दोष नहीं है — तुमने केवल मन से ही पाप किया है।"
श्लोक 70 (skanda.6.20.70)
मनस्तापेन शुध्येत मतमेतन्मनीषिणाम् । त्वया तु मनसा द्रोहः कृतो रामकृते यतः
manastāpena śudhyeta matametanmanīṣiṇām tvayā tu manasā drohaḥ kṛto rāmakṛte yataḥ
"विद्वानों का यह मत है कि मन का पाप मानसिक संताप से ही शुद्ध हो जाता है। और तुमने भी केवल मन से ही राम के प्रति द्रोह किया है।"
श्लोक 71 (skanda.6.20.71)
ईदृक्षान्मनसस्तापात्तस्माच्छुद्धोऽसि लक्ष्मण । अपरं शृणु मे वाक्यं नास्ति दोषस्तवा नघ
īdṛkṣānmanasastāpāttasmācchuddho'si lakṣmaṇa aparaṁ śṛṇu me vākyaṁ nāsti doṣastavā nagha
"इस प्रकार के मानसिक संताप से ही, हे लक्ष्मण, तुम शुद्ध हो चुके हो। हे निष्पाप! मेरा एक और वचन सुनो — तुम्हारा कोई दोष नहीं है।"
श्लोक 72 (skanda.6.20.72)
ईदृक्क्षेत्रप्रभावोऽयं सौभ्रात्रेण विवर्जितः । पंचक्रोशात्मके क्षेत्रे ये वसन्त्यत्र लक्ष्मण
īdṛkkṣetraprabhāvo'yaṁ saubhrātreṇa vivarjitaḥ paṁcakrośātmake kṣetre ye vasantyatra lakṣmaṇa
"यह ऐसे ही एक क्षेत्र का प्रभाव है, जो भ्रातृ-प्रेम से रहित है। हे लक्ष्मण! जो लोग इस पाँच क्रोश वाले क्षेत्र में निवास करते हैं —"
श्लोक 73 (skanda.6.20.73)
अपि स्वल्पं न सौभ्रात्रं तेषां संजायते क्वचित्
api svalpaṁ na saubhrātraṁ teṣāṁ saṁjāyate kvacit
"— उनमें कभी भी थोड़ा भी भ्रातृ-प्रेम उत्पन्न नहीं होता।"
श्लोक 74 (skanda.6.20.74)
तावत्स्नेहपरो मर्त्यस्तावद्वदति कोमलम् । चमत्कारोद्भवं क्षेत्रं यावन्न स्पृशतेंऽघ्रिभिः
tāvatsnehaparo martyastāvadvadati komalam camatkārodbhavaṁ kṣetraṁ yāvanna spṛśateṁ'ghribhiḥ
"मनुष्य तभी तक स्नेह से भरा रहता है, तभी तक कोमल वचन बोलता है, जब तक वह चमत्कार से उत्पन्न उस क्षेत्र को अपने पैरों से नहीं छूता।"
श्लोक 75 (skanda.6.20.75)
येऽन्येपि निवसंत्यत्र पशवः पक्षिणो मृगाः । तेऽपि सौहार्द्दनिर्मुक्ताः सस्पर्द्धा इतरेतरम्
ye'nyepi nivasaṁtyatra paśavaḥ pakṣiṇo mṛgāḥ te'pi sauhārddanirmuktāḥ sasparddhā itaretaram
"यहाँ जो अन्य पशु, पक्षी और मृग भी निवास करते हैं, वे भी स्नेह से रहित होकर आपस में एक-दूसरे से स्पर्धा करते हैं।"
श्लोक 76 (skanda.6.20.76)
कस्यचित्केनचित्सार्धं सौहार्दं नैव विद्यते । तस्मान्नैवास्ति ते दोष ईदृक्क्षे त्रस्य संस्थितिः
kasyacitkenacitsārdhaṁ sauhārdaṁ naiva vidyate tasmānnaivāsti te doṣa īdṛkkṣe trasya saṁsthitiḥ
"किसी का भी किसी के साथ स्नेह नहीं रहता। इसलिए तुम्हारा कोई दोष नहीं है — यह तो इस क्षेत्र की ही ऐसी प्रकृति है।"
श्लोक 77 (skanda.6.20.77)
तथापि यदि ते काचिच्छंका चित्ते व्यवस्थिता । तत्स्नानं कुरु गत्वा तु तस्मिंस्तीर्थे सुशोभने
tathāpi yadi te kācicchaṁkā citte vyavasthitā tatsnānaṁ kuru gatvā tu tasmiṁstīrthe suśobhane
"फिर भी, यदि तुम्हारे मन में कोई शंका बनी रहे, तो उस सुशोभित तीर्थ में जाकर स्नान कर लो।"
श्लोक 78 (skanda.6.20.78)
यत्र शक्रो विपाप्माऽभूद्द्रोहं कृत्वा सुदारुणम् । विश्वस्ताया दितेः पूर्वं गर्भपातसमुद्रवम्
yatra śakro vipāpmā'bhūddrohaṁ kṛtvā sudāruṇam viśvastāyā diteḥ pūrvaṁ garbhapātasamudravam
"जहाँ इंद्र भी, पूर्वकाल में विश्वासी दिति के गर्भ को गिराने का अत्यंत भयंकर द्रोह करके, पापरहित हो गए थे।"
श्लोक 79 (skanda.6.20.79)
एवमुक्तस्तु सौमित्रिर्गत्वा तत्र द्विजोत्तमाः । तीर्थे स्नानाच्च संपन्नो विशुद्धः शक्रसेविते । रामोऽपि तत्र गत्वाशु मार्कंडेयवराश्रमे
evamuktastu saumitrirgatvā tatra dvijottamāḥ tīrthe snānācca saṁpanno viśuddhaḥ śakrasevite rāmo'pi tatra gatvāśu mārkaṁḍeyavarāśrame
हे श्रेष्ठ द्विजो! इस प्रकार कहे जाने पर सौमित्रि वहाँ गए, और इंद्र-सेवित उस तीर्थ में स्नान करके पूर्ण रूप से शुद्ध हो गए। राम भी वहाँ मार्कंडेय के श्रेष्ठ आश्रम में शीघ्र जाकर —
श्लोक 80 (skanda.6.20.80)
स्नानं कृत्वा यथान्यायं ददर्शाऽथ पितामहम् । जगामाऽथ दिशं याम्यां सीतालक्ष्मणसंयुतः
snānaṁ kṛtvā yathānyāyaṁ dadarśā'tha pitāmaham jagāmā'tha diśaṁ yāmyāṁ sītālakṣmaṇasaṁyutaḥ
— विधिपूर्वक स्नान करके, उन्होंने पितामह (सूर्यदेव) के दर्शन किए, फिर सीता और लक्ष्मण के साथ दक्षिण दिशा की ओर चले गए।
श्लोक 81 (skanda.6.20.81)
तत्प्रभावाज्जघानाऽथ खरादीन्राक्षसोत्तमान् । तथा वै रावणं रौद्रं मेघनादसमन्वितम्
tatprabhāvājjaghānā'tha kharādīnrākṣasottamān tathā vai rāvaṇaṁ raudraṁ meghanādasamanvitam
उसी के प्रभाव से उन्होंने आगे चलकर खर आदि श्रेष्ठ राक्षसों को, तथा भयंकर रावण को उसके पुत्र मेघनाद सहित मार गिराया।