नागर खण्ड · अध्याय 211
ब्राह्मणों के शासनपत्रों की पुनःस्थापना
श्लोक 1 (skanda.6.211.1)
विश्वामित्र उवाच राज्ञो दारिद्र्यदोषस्य कुष्ठव्याधेश्च कारणम् कथयित्वा पुनः प्राह नारदो मुनिसत्तमः
viśvāmitra uvāca rājño dāridryadoṣasya kuṣṭhavyādheśca kāraṇam kathayitvā punaḥ prāha nārado munisattamaḥ
विश्वामित्र जी ने कहा — राजा की दरिद्रता के दोष और कुष्ठरोग का कारण बताकर मुनिश्रेष्ठ नारद जी ने पुनः कहा।
श्लोक 2 (skanda.6.211.2)
नारद उवाच एतत्ते सर्वमाख्यातं राजन्कुष्ठस्य कारणम् दारिद्र्यस्य च यत्सम्यग्ज्ञात्वा दिव्येन चक्षुषा
nārada uvāca etatte sarvamākhyātaṁ rājankuṣṭhasya kāraṇam dāridryasya ca yatsamyagjñātvā divyena cakṣuṣā
नारद जी ने कहा — हे राजन्, अपने दिव्य नेत्र से भलीभाँति जानकर मैंने तुम्हारे कुष्ठरोग और दरिद्रता का कारण तुम्हें बता दिया है।
श्लोक 3 (skanda.6.211.3)
अधुना संप्रवक्ष्यामि यथा तव पराभवः शत्रुभ्यः संप्रजातोऽत्र द्विजानामपमानतः
adhunā saṁpravakṣyāmi yathā tava parābhavaḥ śatrubhyaḥ saṁprajāto'tra dvijānāmapamānataḥ
अब मैं यह बताता हूँ कि किस प्रकार यहाँ शत्रुओं से तुम्हारा पराभव ब्राह्मणों के अपमान के कारण हुआ।
श्लोक 4 (skanda.6.211.4)
आनर्ताधिपतिर्योऽत्र कश्चिद्राज्येऽभिषिच्यते स पूर्वं गच्छति ग्रामं नागराणां प्रभक्तितः
ānartādhipatiryo'tra kaścidrājye'bhiṣicyate sa pūrvaṁ gacchati grāmaṁ nāgarāṇāṁ prabhaktitaḥ
आनर्त देश का जो भी राजा राज्याभिषिक्त होता है, वह सबसे पहले भक्तिपूर्वक नागर ब्राह्मणों के ग्राम में जाता है।
श्लोक 5 (skanda.6.211.5)
त्वया तत्कल्पितं राजन्नैव दत्तं प्रमादतः पराभूता द्विजास्ते च याचमाना मुहुर्मुहुः
tvayā tatkalpitaṁ rājannaiva dattaṁ pramādataḥ parābhūtā dvijāste ca yācamānā muhurmuhuḥ
हे राजन्, वह जो प्रथा तुम्हें भी करनी थी, वह तुमने प्रमादवश नहीं की; इससे वे ब्राह्मण, बार-बार याचना करने पर भी, अनादृत हुए।
श्लोक 6 (skanda.6.211.6)
तथा कोपवशाद्यानि शासनानि द्विजन्मनाम् लोपितानि त्वयान्यानि पितृपैतामहानि च
tathā kopavaśādyāni śāsanāni dvijanmanām lopitāni tvayānyāni pitṛpaitāmahāni ca
तथा क्रोधवश तुमने ब्राह्मणों के जो अन्य शासनपत्र (भूमि-अनुदान) थे, यहाँ तक कि तुम्हारे पिता-पितामह द्वारा दिए हुए भी, लुप्त कर दिए।
श्लोक 7 (skanda.6.211.7)
तेन तेऽत्र पराभूतिः संजाता शत्रुसंभवा एवं ज्ञात्वा द्विजेंद्राणां शासनानि प्रयच्छ भोः
tena te'tra parābhūtiḥ saṁjātā śatrusaṁbhavā evaṁ jñātvā dvijeṁdrāṇāṁ śāsanāni prayaccha bhoḥ
उसी के कारण तुम्हें शत्रुओं से यह पराजय प्राप्त हुई है। यह जानकर हे राजन्, अब उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों को उनके शासनपत्र लौटा दो।
श्लोक 8 (skanda.6.211.8)
गृहीतानि च यान्येव तेषां मोक्षं समाचर तच्छ्रुत्वा पार्थिवः सोऽथ शंखतीर्थे प्रभक्तितः
gṛhītāni ca yānyeva teṣāṁ mokṣaṁ samācara tacchrutvā pārthivaḥ so'tha śaṁkhatīrthe prabhaktitaḥ
जो-जो भी तुमने छीने हैं, उन्हें उनसे मुक्त कर दो। यह सुनकर वह राजा शंखतीर्थ में भक्तिपूर्वक—
श्लोक 9 (skanda.6.211.9)
स्नात्वा विप्रान्समाहूय मध्यगेन समन्वितान् शंखादित्यस्य पुरतः प्रक्षाल्य चरणौ नृप
snātvā viprānsamāhūya madhyagena samanvitān śaṁkhādityasya purataḥ prakṣālya caraṇau nṛpa
—स्नान करके, मध्यग-वर्ग सहित उन ब्राह्मणों को बुलाकर, हे राजन्, शंखादित्य के समक्ष उनके चरण धोकर—
श्लोक 10 (skanda.6.211.10)
ददौ च शासनशतं प्रक्षाल्य चरणांस्ततः षड्विंशत्यधिकं राजा नागराणां महात्मनाम्
dadau ca śāsanaśataṁ prakṣālya caraṇāṁstataḥ ṣaḍviṁśatyadhikaṁ rājā nāgarāṇāṁ mahātmanām
—और उन महात्मा नागर ब्राह्मणों के चरण धोकर उन्हें एक सौ छब्बीस शासनपत्र लौटा दिए।
श्लोक 11 (skanda.6.211.11)
एतस्मिन्नंतरे तत्र शत्रवो ये च संस्थिताः सर्वे मृत्युं समापन्ना ब्राह्मणानां प्रसादतः
etasminnaṁtare tatra śatravo ye ca saṁsthitāḥ sarve mṛtyuṁ samāpannā brāhmaṇānāṁ prasādataḥ
इसी बीच जो शत्रु वहाँ स्थित थे, वे सब ब्राह्मणों की कृपा से मृत्यु को प्राप्त हो गए।
श्लोक 12 (skanda.6.211.12)
विश्वामित्र उवाच एतत्ते सर्वमाख्यातं शंखतीर्थसमुद्भवम् प्रभावं पार्थिवश्रेष्ठ किं भूयः श्रोतुमिच्छसि
viśvāmitra uvāca etatte sarvamākhyātaṁ śaṁkhatīrthasamudbhavam prabhāvaṁ pārthivaśreṣṭha kiṁ bhūyaḥ śrotumicchasi
विश्वामित्र जी ने कहा — हे राजश्रेष्ठ, मैंने तुम्हें शंखतीर्थ की उत्पत्ति का यह सम्पूर्ण प्रभाव बता दिया; अब और क्या सुनना चाहते हो?