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नागर खण्ड · अध्याय 210

नागवल्ली की उत्पत्ति और तांबूल-प्रायश्चित्त

अध्याय 209अध्याय-सूचीअध्याय 211

श्लोक 1 (skanda.6.210.1)

विश्वामित्र उवाच तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य देवर्षेर्नारदस्य च सिद्धसेनो महीपालः प्राप्य तं योगमुत्तमम्

viśvāmitra uvāca tacchrutvā vacanaṁ tasya devarṣernāradasya ca siddhaseno mahīpālaḥ prāpya taṁ yogamuttamam

विश्वामित्र जी ने कहा — देवर्षि नारद के उस वचन को सुनकर, राजा सिद्धसेन उस उत्तम पर्व-योग को प्राप्त करके—

श्लोक 2 (skanda.6.210.2)

माधवे मासि संप्राप्ते अष्टम्यां सूर्यवासरे सूर्योदये तु संप्राप्ते यावत्स्नात्वाऽर्चयेद्रविम्

mādhave māsi saṁprāpte aṣṭamyāṁ sūryavāsare sūryodaye tu saṁprāpte yāvatsnātvā'rcayedravim

—वैशाख मास की अष्टमी को, रविवार के दिन, सूर्योदय होते ही जैसे ही स्नान कर सूर्यदेव की पूजा की—

श्लोक 3 (skanda.6.210.3)

तावत्कुष्ठविनिर्मुक्तः सहसा समपद्यत ततो दिव्यवपुर्भूत्वा सन्तोषं परमं गतः

tāvatkuṣṭhavinirmuktaḥ sahasā samapadyata tato divyavapurbhūtvā santoṣaṁ paramaṁ gataḥ

—वैसे ही वह तत्काल कुष्ठरोग से मुक्त हो गया, और दिव्य शरीर पाकर परम संतोष को प्राप्त हुआ।

श्लोक 4 (skanda.6.210.4)

प्रायश्चित्तं ततश्चक्रे तांबूलस्य च भक्षणम् अज्ञानेन कृतं यच्च चूर्णपत्रसमन्वितम्

prāyaścittaṁ tataścakre tāṁbūlasya ca bhakṣaṇam ajñānena kṛtaṁ yacca cūrṇapatrasamanvitam

तत्पश्चात उसने अज्ञानवश किए गए चूर्ण-सहित पान-भक्षण का प्रायश्चित्त भी किया।

श्लोक 5 (skanda.6.210.5)

ततश्च परमां लक्ष्मीं संप्राप्तः स महीपतिः पितृपैतामहं राज्यं स प्रचक्रे यथा पुरा

tataśca paramāṁ lakṣmīṁ saṁprāptaḥ sa mahīpatiḥ pitṛpaitāmahaṁ rājyaṁ sa pracakre yathā purā

तत्पश्चात उस राजा ने परम लक्ष्मी को प्राप्त किया, और अपने पितृ-पितामह के राज्य को पूर्ववत् चलाने लगा।

श्लोक 6 (skanda.6.210.6)

एतत्ते सर्वमाख्यातं शंखतीर्थसमुद्भवम् माहात्म्यं पार्थिवश्रेष्ठ किं भूयः श्रोतुमिच्छसि

etatte sarvamākhyātaṁ śaṁkhatīrthasamudbhavam māhātmyaṁ pārthivaśreṣṭha kiṁ bhūyaḥ śrotumicchasi

हे राजश्रेष्ठ, मैंने तुम्हें शंखतीर्थ की उत्पत्ति का यह सम्पूर्ण माहात्म्य कह दिया; अब और क्या सुनना चाहते हो?

श्लोक 7 (skanda.6.210.7)

आनर्त उवाच अत्याश्चर्यमिदं ब्रह्मन्यत्त्वया परिकीर्तितम् यल्लक्ष्मीस्तस्य सन्नष्टा चूर्णपत्रस्य भक्षणात्

ānarta uvāca atyāścaryamidaṁ brahmanyattvayā parikīrtitam yallakṣmīstasya sannaṣṭā cūrṇapatrasya bhakṣaṇāt

आनर्त ने कहा — हे ब्रह्मन्, आपने जो कहा वह अत्यंत आश्चर्यजनक है, कि चूर्ण-पान खाने से उसकी लक्ष्मी नष्ट हो गई थी।

श्लोक 8 (skanda.6.210.8)

कीदृक्तेन कृतं तस्य प्रायश्चित्तं विशुद्धये कीदृक्तेन कृतं तच्च निजराज्यं यथा पुरा

kīdṛktena kṛtaṁ tasya prāyaścittaṁ viśuddhaye kīdṛktena kṛtaṁ tacca nijarājyaṁ yathā purā

उसने अपनी शुद्धि के लिए कैसा प्रायश्चित्त किया, और किस प्रकार अपने राज्य को पूर्ववत् पुनः प्राप्त किया?

श्लोक 9 (skanda.6.210.9)

विश्वामित्र उवाच एषा पुण्यतमा मेध्या नागवल्ली नराधिप अयथावत्कृता वक्त्रे बहून्दोषान्प्रयच्छति तस्माद्यत्नेन संभक्ष्या दत्त्वा चैव स्वशक्तितः

viśvāmitra uvāca eṣā puṇyatamā medhyā nāgavallī narādhipa ayathāvatkṛtā vaktre bahūndoṣānprayacchati tasmādyatnena saṁbhakṣyā dattvā caiva svaśaktitaḥ

विश्वामित्र जी ने कहा — हे राजन्, यह नागवल्ली (पान) अत्यंत पवित्र और पुण्यकारी वस्तु है; किंतु विधिपूर्वक न खाई जाए तो मुख में अनेक दोष उत्पन्न करती है। इसलिए इसे यत्नपूर्वक तथा अपनी शक्ति के अनुसार दान देकर ही खाना चाहिए।

श्लोक 10 (skanda.6.210.10)

आनर्त उवाच नागवल्ली कथं जाता कस्माद्दोषो महान्स्मृतः अयथावद्भक्षणाच्च तन्मे वक्तुमिहार्हसि

ānarta uvāca nāgavallī kathaṁ jātā kasmāddoṣo mahānsmṛtaḥ ayathāvadbhakṣaṇācca tanme vaktumihārhasi

आनर्त ने कहा — नागवल्ली कैसे उत्पन्न हुई, और अविधिपूर्वक खाने से इतना बड़ा दोष क्यों माना गया है? यह मुझे बताइए।

श्लोक 11 (skanda.6.210.11)

विश्वामित्र उवाच प्रश्नभारो महानेष त्वया मे परिकीर्तितः तथापि च वदिष्यामि यदि ते कौतुकं नृप यस्मात्सञ्जायते दोषश्चूर्णपत्रस्य भक्षणात्

viśvāmitra uvāca praśnabhāro mahāneṣa tvayā me parikīrtitaḥ tathāpi ca vadiṣyāmi yadi te kautukaṁ nṛpa yasmātsañjāyate doṣaścūrṇapatrasya bhakṣaṇāt

विश्वामित्र जी ने कहा — तुमने मुझसे यह एक बड़ा प्रश्न पूछ लिया है; फिर भी, हे राजन्, यदि तुम्हें कुतूहल है तो मैं बताता हूँ कि चूर्ण-पान खाने से दोष क्यों उत्पन्न होता है।

श्लोक 12 (skanda.6.210.12)

अमृतार्थं पुरा देवैर्मथितः कलशोदधिः मन्थानं मन्दरं कृत्वा नेत्रं कृत्वा तु वासुकिम्

amṛtārthaṁ purā devairmathitaḥ kalaśodadhiḥ manthānaṁ mandaraṁ kṛtvā netraṁ kṛtvā tu vāsukim

पूर्वकाल में अमृत के लिए देवताओं ने मंदराचल को मथानी और वासुकि नाग को नेतरा (रस्सी) बनाकर क्षीरसागर का मंथन किया।

श्लोक 13 (skanda.6.210.13)

मुखदेशे बलिर्लग्नः पुच्छदेशेऽखिलाः सुराः वासुदेवमतेनैव सन्दधाराथ कच्छपः

mukhadeśe balirlagnaḥ pucchadeśe'khilāḥ surāḥ vāsudevamatenaiva sandadhārātha kacchapaḥ

बलि आदि दानव सर्प के मुखभाग में लगे और सारे देवता पुच्छभाग में; और वासुदेव की सम्मति से ही एक कच्छप ने उस पर्वत को धारण किया।

श्लोक 14 (skanda.6.210.14)

मन्दरे भ्रममाणे तु प्रागेव नृपसत्तम आनर्तसहसा जातं रत्नत्रितयमेव च

mandare bhramamāṇe tu prāgeva nṛpasattama ānartasahasā jātaṁ ratnatritayameva ca

हे नृपसत्तम, मन्दराचल के घूमते ही सबसे पहले अकस्मात तीन रत्न उत्पन्न हुए।

श्लोक 15 (skanda.6.210.15)

नीलांबरधरः कृष्णः पुरुषो वक्रनासिकः कृष्णदन्तः स्थूलशिरा दीर्घग्रीवो महोदरः शूर्पाकारांघ्रिरेवाऽसौ चिपिटाक्षो भयावहः

nīlāṁbaradharaḥ kṛṣṇaḥ puruṣo vakranāsikaḥ kṛṣṇadantaḥ sthūlaśirā dīrghagrīvo mahodaraḥ śūrpākārāṁghrirevā'sau cipiṭākṣo bhayāvahaḥ

उनमें से एक नीले वस्त्र धारण किए हुए काले वर्ण का पुरुष था — टेढ़ी नाक, काले दाँत, स्थूल सिर, लंबी गर्दन, बड़ा पेट, सूप जैसे पैर और चपटी आँखों वाला, अत्यंत भयावह।

श्लोक 16 (skanda.6.210.16)

तथा तद्रूपिणी तस्य कुभार्या राक्षसी यथा शिशुनांगुलिलग्नेन गर्भश्रमपरायणा

tathā tadrūpiṇī tasya kubhāryā rākṣasī yathā śiśunāṁgulilagnena garbhaśramaparāyaṇā

और उसी के समान रूप वाली उसकी पत्नी, राक्षसी के समान कुरूप, अपने बालक की उँगली पकड़े हुए, गर्भ के श्रम से थकी हुई थी।

श्लोक 17 (skanda.6.210.17)

ततो देवगणाः सर्वे दानवाश्च विशेषतः मन्थानं तत्परित्यज्य तान्ग्रहीतुं प्रधाविताः

tato devagaṇāḥ sarve dānavāśca viśeṣataḥ manthānaṁ tatparityajya tāngrahītuṁ pradhāvitāḥ

तब सारे देवगण और विशेषतः दानव भी मन्थन को छोड़कर उन्हें पकड़ने के लिए दौड़ पड़े।

श्लोक 18 (skanda.6.210.18)

अथ तान्विकृतान्दृष्ट्वा सर्वे शंकासमन्विताः जगृहुर्नैव राजेंद्र जहसुश्च परस्परम्

atha tānvikṛtāndṛṣṭvā sarve śaṁkāsamanvitāḥ jagṛhurnaiva rājeṁdra jahasuśca parasparam

किंतु उन विकृत रूपों को देखकर सब शंकित हो गए; हे राजेन्द्र, कोई भी उन्हें पकड़ न सका और सब एक-दूसरे को देखकर हँसने लगे।

श्लोक 19 (skanda.6.210.19)

अथोवाच बलिर्दैत्यः कृतांजलिपुटः स्थितः ब्रह्माऽऽदि यल्लभेत्सर्वं यत्पुरस्तात्प्रजायते

athovāca balirdaityaḥ kṛtāṁjalipuṭaḥ sthitaḥ brahmā''di yallabhetsarvaṁ yatpurastātprajāyate

तब हाथ जोड़कर खड़े हुए दैत्य बलि ने कहा — जो कुछ सबसे पहले उत्पन्न हो, वह सब ब्रह्मा जी आदि को प्राप्त होना चाहिए।

श्लोक 20 (skanda.6.210.20)

रत्नत्रितयमेतद्धि तस्माद्गृह्णातु पद्मजः येन सिद्धिर्भवेदस्मिन्मन्थने कस्य चाऽर्पणात्

ratnatritayametaddhi tasmādgṛhṇātu padmajaḥ yena siddhirbhavedasminmanthane kasya cā'rpaṇāt

इसलिए यह त्रिरत्न ब्रह्मा जी ही ग्रहण करें, जिससे इस मंथन-कार्य में सिद्धि हो, चाहे वह किसी को भी अर्पित हो।

श्लोक 21 (skanda.6.210.21)

तद्वाक्यं विष्णुना तस्य शंसितं शंकरेण तु इंद्राद्यैश्च सुरैः सर्वैर्दानवैश्च विशेषतः

tadvākyaṁ viṣṇunā tasya śaṁsitaṁ śaṁkareṇa tu iṁdrādyaiśca suraiḥ sarvairdānavaiśca viśeṣataḥ

उसके इस वचन की विष्णु और शंकर ने, तथा इन्द्र आदि समस्त देवताओं और विशेषतः दानवों ने भी प्रशंसा की।

श्लोक 22 (skanda.6.210.22)

एतस्मिन्नंतरे ब्रह्मा जग्राह त्रितयं च तत् दाक्षिण्यात्सर्वदेवानामनिच्छन्नपि पार्थिव ममन्थुः सागरं राजन्पुनस्ते यत्नमाश्रिताः

etasminnaṁtare brahmā jagrāha tritayaṁ ca tat dākṣiṇyātsarvadevānāmanicchannapi pārthiva mamanthuḥ sāgaraṁ rājanpunaste yatnamāśritāḥ

इसी बीच, न चाहते हुए भी, सब देवताओं की विनय के कारण ब्रह्मा जी ने उस त्रिरत्न को ग्रहण किया। हे राजन्, फिर सब पुनः प्रयत्नपूर्वक समुद्र-मंथन में जुट गए।

श्लोक 23 (skanda.6.210.23)

ततश्च वारुणी जाता दिव्यगन्धसमन्विता बलिना संगृहीता सा प्रत्यक्षं बलविद्विषः

tataśca vāruṇī jātā divyagandhasamanvitā balinā saṁgṛhītā sā pratyakṣaṁ balavidviṣaḥ

तब दिव्य सुगंध से युक्त वारुणी (मदिरा) उत्पन्न हुई, जिसे बल के शत्रु इन्द्र के समक्ष ही बलि ने ले लिया।

श्लोक 24 (skanda.6.210.24)

आवर्ते चापरे जाते निष्क्रांतः कौस्तुभो मणिः स गृहीतो महाराज विष्णुना प्रभविष्णुना

āvarte cāpare jāte niṣkrāṁtaḥ kaustubho maṇiḥ sa gṛhīto mahārāja viṣṇunā prabhaviṣṇunā

फिर अगले आवर्त में कौस्तुभ मणि प्रकट हुई, जिसे हे महाराज, महाप्रभावशाली विष्णु ने ग्रहण किया।

श्लोक 25 (skanda.6.210.25)

अथापरे स्थिते तत्र महावर्ते निशापतिः सञ्जातः स वृषांकेन संगृहीतश्च तत्क्षणात्

athāpare sthite tatra mahāvarte niśāpatiḥ sañjātaḥ sa vṛṣāṁkena saṁgṛhītaśca tatkṣaṇāt

फिर एक और महान आवर्त में चंद्रमा प्रकट हुआ, जिसे वृषभध्वज शिव ने उसी क्षण ग्रहण कर लिया।

श्लोक 26 (skanda.6.210.26)

पारिजातस्ततो जातो दिव्यगन्धसमन्वितः स गृहीत्वा सुरैः सर्वैः स्थापितो नंदने वने

pārijātastato jāto divyagandhasamanvitaḥ sa gṛhītvā suraiḥ sarvaiḥ sthāpito naṁdane vane

तत्पश्चात दिव्य सुगंधयुक्त पारिजात वृक्ष उत्पन्न हुआ, जिसे सब देवताओं ने लेकर नंदनवन में स्थापित कर दिया।

श्लोक 27 (skanda.6.210.27)

तस्यानंतरमेवाथ सुरभी वत्ससंयुता निष्क्रांता व्योममार्गेण गोलोकं समवस्थिता

tasyānaṁtaramevātha surabhī vatsasaṁyutā niṣkrāṁtā vyomamārgeṇa golokaṁ samavasthitā

उसके तुरंत बाद बछड़े सहित कामधेनु सुरभि प्रकट हुई, जो आकाशमार्ग से निकलकर गोलोक में जा बसी।

श्लोक 28 (skanda.6.210.28)

ततो धन्वंतरिर्जातो बिभ्रद्धस्ते कमंडलुम् संपूर्णममृतेनैव स देवैर्दानवैर्नृप

tato dhanvaṁtarirjāto bibhraddhaste kamaṁḍalum saṁpūrṇamamṛtenaiva sa devairdānavairnṛpa

फिर धन्वंतरि प्रकट हुए, हाथ में अमृत से भरा हुआ कमंडल लिए हुए। हे राजन्, उन्हें देवों और दानवों दोनों ने—

श्लोक 29 (skanda.6.210.29)

गृहीतो युगपत्क्रुद्धैः परस्परजिगीषया देवानां हस्तगो वैद्यो दैत्यानां च कमण्डलुः

gṛhīto yugapatkruddhaiḥ parasparajigīṣayā devānāṁ hastago vaidyo daityānāṁ ca kamaṇḍaluḥ

—एक साथ क्रोधित होकर आपस में जीतने की इच्छा से पकड़ लिया; अंततः वैद्य देवताओं के हाथ लगे और कमंडल दैत्यों के हाथ।

श्लोक 30 (skanda.6.210.30)

ततस्तं लोभसंयुक्ता ममंथुः सागरं नृप पद्महस्तात्र संजाता ततो लक्ष्मीः सितांबरा

tatastaṁ lobhasaṁyuktā mamaṁthuḥ sāgaraṁ nṛpa padmahastātra saṁjātā tato lakṣmīḥ sitāṁbarā

हे राजन्, फिर लोभयुक्त होकर वे पुनः समुद्र को मथने लगे, तब हाथ में कमल लिए हुए श्वेत वस्त्रधारिणी लक्ष्मी प्रकट हुईं।

श्लोक 31 (skanda.6.210.31)

स्वयमेव वृतो विष्णुस्तया पार्थिवसत्तम मथ्यमाने ततोतीव समुद्रे देवदानवैः

svayameva vṛto viṣṇustayā pārthivasattama mathyamāne tatotīva samudre devadānavaiḥ

हे राजश्रेष्ठ, उन्होंने स्वयं ही विष्णु को अपना पति चुन लिया। तत्पश्चात देवों और दानवों द्वारा समुद्र का अत्यंत मंथन होते रहने पर—

श्लोक 32 (skanda.6.210.32)

कालकूटं समुत्पन्नं येन सर्वे सुरासुराः संप्राप्ताः परमं कष्टं प्रभग्नाश्च दिशो दश

kālakūṭaṁ samutpannaṁ yena sarve surāsurāḥ saṁprāptāḥ paramaṁ kaṣṭaṁ prabhagnāśca diśo daśa

—कालकूट विष उत्पन्न हुआ, जिससे सभी देव-दानव अत्यंत कष्ट को प्राप्त हुए और दसों दिशाओं में भाग गए।

श्लोक 33 (skanda.6.210.33)

तं दृष्ट्वा भगवाञ्छंभुस्तीव्रं तीव्रपराक्रमः भक्षयामास राजेंद्र नीलकण्ठस्ततोऽभवत्

taṁ dṛṣṭvā bhagavāñchaṁbhustīvraṁ tīvraparākramaḥ bhakṣayāmāsa rājeṁdra nīlakaṇṭhastato'bhavat

उस भयंकर विष को देखकर अत्यंत पराक्रमी भगवान शंभु ने उसे पी लिया; हे राजेन्द्र, उसी से वे नीलकंठ कहलाए।

श्लोक 34 (skanda.6.210.34)

अथ संत्यज्य मंथानं मंदरं वासुकिं तथा अमृतार्थेऽभवद्युद्धं दैत्यानां विबुधैः सह

atha saṁtyajya maṁthānaṁ maṁdaraṁ vāsukiṁ tathā amṛtārthe'bhavadyuddhaṁ daityānāṁ vibudhaiḥ saha

तत्पश्चात मंदराचल और वासुकि दोनों मथानी छोड़ दिए गए, और अमृत के लिए दैत्यों तथा देवताओं में युद्ध छिड़ गया।

श्लोक 35 (skanda.6.210.35)

अथ स्त्रीरूपमाधाय विष्णुर्दैत्यानुवाच तान् ततो हृष्टो बलिस्तस्यै दत्त्वा पीयूषमेव तत्

atha strīrūpamādhāya viṣṇurdaityānuvāca tān tato hṛṣṭo balistasyai dattvā pīyūṣameva tat

तब विष्णु ने स्त्री का रूप धारण कर उन दैत्यों को समझाया; तब प्रसन्न हुए बलि ने उस अमृत को उस (मायाविनी) को सौंप दिया।

श्लोक 36 (skanda.6.210.36)

विश्वासं परमं गत्वा युद्धं चक्रे सुरैः सह ततो विष्णुः परित्यज्य स्त्रीरूपं पुरुषाकृतिः

viśvāsaṁ paramaṁ gatvā yuddhaṁ cakre suraiḥ saha tato viṣṇuḥ parityajya strīrūpaṁ puruṣākṛtiḥ

पूर्ण विश्वास कर लेने पर वह देवताओं से युद्ध करने लगा। तब विष्णु ने स्त्रीरूप त्यागकर पुनः पुरुषरूप धारण किया।

श्लोक 37 (skanda.6.210.37)

तदेवामृतमादाय ययौ यत्र दिवौकसः अब्रवीत्तान्सुहृष्टात्मा पिवध्वममृतं सुराः

tadevāmṛtamādāya yayau yatra divaukasaḥ abravīttānsuhṛṣṭātmā pivadhvamamṛtaṁ surāḥ

वे उसी अमृत को लेकर वहाँ गए जहाँ देवगण थे, और अत्यंत प्रसन्न होकर उनसे कहा — हे देवगणों, यह अमृत पी लो।

श्लोक 38 (skanda.6.210.38)

येनामरत्वमासाद्य व्यापादयत दानवान् ते तथेति प्रतिज्ञाय पपुः पीयूषमुत्तमम्

yenāmaratvamāsādya vyāpādayata dānavān te tatheti pratijñāya papuḥ pīyūṣamuttamam

इससे अमरत्व पाकर तुम दानवों का संहार करो। उन्होंने 'ऐसा ही करेंगे' कहकर उस उत्तम अमृत को पी लिया।

श्लोक 39 (skanda.6.210.39)

अमराश्च ततो जाता जघ्नुः संख्ये महासुरान्

amarāśca tato jātā jaghnuḥ saṁkhye mahāsurān

तत्पश्चात अमर होकर उन्होंने युद्ध में महादानवों का वध कर डाला।

श्लोक 40 (skanda.6.210.40)

तेषां पानविधौ तत्र वर्तमाने महीपते राहुर्विबुधरूपेण पपौ पीयूषमुत्सुकः

teṣāṁ pānavidhau tatra vartamāne mahīpate rāhurvibudharūpeṇa papau pīyūṣamutsukaḥ

हे राजन्, उस अमृतपान के कार्यक्रम के चलते हुए ही राहु देवता का रूप धारण कर उत्सुकतापूर्वक अमृत पी बैठा।

श्लोक 41 (skanda.6.210.41)

स लक्षितो महादैत्यश्चंद्रार्काभ्यां च तत्क्षणात् निवेदितो हरे राजन्नायं देवो महासुरः

sa lakṣito mahādaityaścaṁdrārkābhyāṁ ca tatkṣaṇāt nivedito hare rājannāyaṁ devo mahāsuraḥ

उस महादैत्य को चंद्रमा और सूर्य ने तत्क्षण पहचान लिया, और हे राजन्, विष्णु को बता दिया कि यह देव नहीं, महादानव है।

श्लोक 42 (skanda.6.210.42)

तच्छ्रुत्वा वासुदेवेन तस्य चक्रं सुदर्शनम् वधाय पार्थिवश्रेष्ठ मुक्तं वज्रसमप्रभम्

tacchrutvā vāsudevena tasya cakraṁ sudarśanam vadhāya pārthivaśreṣṭha muktaṁ vajrasamaprabham

यह सुनकर हे राजश्रेष्ठ, वासुदेव ने वज्र के समान तेजस्वी सुदर्शन चक्र उसके वध के लिए छोड़ा।

श्लोक 43 (skanda.6.210.43)

यावन्मात्रं शरीरं तत्तस्य व्याप्तं महीपते अमृतेन ततः कृत्तममोघेनापि तच्छिरः

yāvanmātraṁ śarīraṁ tattasya vyāptaṁ mahīpate amṛtena tataḥ kṛttamamoghenāpi tacchiraḥ

हे राजन्, उसका जितना शरीर अमृत से व्याप्त हो चुका था, उतना बचा; उस अमोघ चक्र से उसका सिर काट दिया गया।

श्लोक 44 (skanda.6.210.44)

ततोऽमरत्वमापन्नः स यावत्सिंहिकासुतः तावत्प्रोक्तोऽच्युतेनाथ साम्ना परमवल्गुना

tato'maratvamāpannaḥ sa yāvatsiṁhikāsutaḥ tāvatprokto'cyutenātha sāmnā paramavalgunā

इस प्रकार सिंहिका-पुत्र अमरत्व को प्राप्त हो गया; तब भगवान अच्युत ने उससे अत्यंत मधुर वाणी में कहा।

श्लोक 45 (skanda.6.210.45)

त्यज दैत्यान्महाभाग देवानां संमतो भव संप्राप्स्यसि परां पूजां सदा त्वं ग्रहमंडले

tyaja daityānmahābhāga devānāṁ saṁmato bhava saṁprāpsyasi parāṁ pūjāṁ sadā tvaṁ grahamaṁḍale

हे महाभाग, अब दैत्यों को त्याग दो और देवताओं में सम्मानित बनो; तुम्हें सदा ग्रहमंडल में परम पूजा प्राप्त होगी।

श्लोक 46 (skanda.6.210.46)

स तथेति प्रतिज्ञाय त्यक्त्वा तान्दैत्यसत्तमान् पूजां प्राप्नोति मर्त्यानां संस्थितो ग्रहमण्डले

sa tatheti pratijñāya tyaktvā tāndaityasattamān pūjāṁ prāpnoti martyānāṁ saṁsthito grahamaṇḍale

उसने 'ऐसा ही होगा' कहकर उन श्रेष्ठ दैत्यों को त्याग दिया, और तभी से ग्रहमंडल में स्थित होकर मनुष्यों की पूजा पाता है।

श्लोक 47 (skanda.6.210.47)

एतस्मिन्नंतरे दैत्या निर्जिताः सुरसत्तमैः दिशो जग्मुः परित्रस्ताः केचिन्मृत्युमुपागताः

etasminnaṁtare daityā nirjitāḥ surasattamaiḥ diśo jagmuḥ paritrastāḥ kecinmṛtyumupāgatāḥ

इसी बीच देवताओं द्वारा पराजित हुए दैत्य भयभीत होकर दिशाओं में भाग गए, और कुछ मृत्यु को प्राप्त हो गए।

श्लोक 48 (skanda.6.210.48)

पीतशेषं च पीयूषं स्थापितं नन्दने वने नागराजस्य यत्रैव स्थितमालानमेव च

pītaśeṣaṁ ca pīyūṣaṁ sthāpitaṁ nandane vane nāgarājasya yatraiva sthitamālānameva ca

पीने के बाद जो अमृत शेष बचा था, वह नंदनवन में उसी स्थान पर रखा गया जहाँ नागराज (ऐरावत) का खूँटा (आलान-स्तंभ) स्थित था।

श्लोक 49 (skanda.6.210.49)

अहर्निशं मदस्रावी करींद्रः सोऽपि संस्थितः तत्प्रभावैः प्रभिन्नः स पीयूषस्य कमंडलुः

aharniśaṁ madasrāvī karīṁdraḥ so'pi saṁsthitaḥ tatprabhāvaiḥ prabhinnaḥ sa pīyūṣasya kamaṁḍaluḥ

वहाँ रात-दिन मद स्रवित करने वाला वह गजराज खड़ा था; उसी के मद के प्रभाव से अमृत का वह कमंडल फूट गया।

श्लोक 50 (skanda.6.210.50)

ततो वल्ली समुत्पन्ना तस्माच्चैव कमण्डलोः तत्रालानसमारूढा वृद्धिं च परमां गता

tato vallī samutpannā tasmāccaiva kamaṇḍaloḥ tatrālānasamārūḍhā vṛddhiṁ ca paramāṁ gatā

उसी कमंडल से एक बेल उत्पन्न हुई, जो उसी खूँटे के सहारे चढ़कर अत्यंत बढ़ने लगी।

श्लोक 51 (skanda.6.210.51)

तदुद्भवानि पत्राणि गृहीत्वा सुरसत्तमाः अपूर्वाणि सुगंधीनि मत्वा ते भक्षयंति च

tadudbhavāni patrāṇi gṛhītvā surasattamāḥ apūrvāṇi sugaṁdhīni matvā te bhakṣayaṁti ca

उससे उत्पन्न पत्तों को अद्भुत और सुगंधित समझकर श्रेष्ठ देवगण उन्हें लेकर खाने लगे।

श्लोक 52 (skanda.6.210.52)

वक्त्रशुद्धिकृते राजन्विशेषेण प्रहर्षिताः

vaktraśuddhikṛte rājanviśeṣeṇa praharṣitāḥ

हे राजन्, मुख की शुद्धि के लिए वे विशेष रूप से प्रसन्न होते थे।

श्लोक 53 (skanda.6.210.53)

अथ धन्वतरिर्वैद्यः स्वबुद्ध्या पृथिवीपते नागालाने यतो जाता नागवल्ली भविष्यति

atha dhanvatarirvaidyaḥ svabuddhyā pṛthivīpate nāgālāne yato jātā nāgavallī bhaviṣyati

हे राजन्, तब वैद्य धन्वंतरि ने अपनी बुद्धि से सोचा कि चूँकि यह नागराज के खूँटे में उत्पन्न हुई है, इसलिए इसका नाम नागवल्ली होगा।

श्लोक 54 (skanda.6.210.54)

सदा स्मरस्य संस्थानं मम वाक्याद्भविष्यति नागवल्लीति वै नाम तस्याश्चक्रे ततः परम्

sadā smarasya saṁsthānaṁ mama vākyādbhaviṣyati nāgavallīti vai nāma tasyāścakre tataḥ param

और मेरे वचन से यह सदा कामदेव का निवासस्थान बनेगी। इसके बाद उन्होंने उसका नाम नागवल्ली रख दिया।

श्लोक 55 (skanda.6.210.55)

संयोगं च चकाराथ तांबूलं जायते यथा पूगीफलेन चूर्णेन खदिरेणापि पार्थिव

saṁyogaṁ ca cakārātha tāṁbūlaṁ jāyate yathā pūgīphalena cūrṇena khadireṇāpi pārthiva

हे राजन्, तत्पश्चात उन्होंने ही यह संयोजन किया कि उसके पत्ते, सुपारी, चूना और खदिर (कत्था) मिलाकर 'तांबूल' कैसे बनता है।

श्लोक 56 (skanda.6.210.56)

कस्यचित्त्वथ कालस्य वाणीवत्सरको नृपः प्रतोषं नीतवाञ्छक्रं तपसा निर्मलेन च

kasyacittvatha kālasya vāṇīvatsarako nṛpaḥ pratoṣaṁ nītavāñchakraṁ tapasā nirmalena ca

कालांतर में वाणीवत्सरक नामक राजा ने अपने निर्मल तप से इन्द्र को अत्यंत संतुष्ट कर दिया।

श्लोक 57 (skanda.6.210.57)

ततस्तत्तपसा तुष्ट इन्द्रो वचनमब्रवीत्

tatastattapasā tuṣṭa indro vacanamabravīt

तब उसके उस तप से प्रसन्न होकर इन्द्र ने यह वचन कहा।

श्लोक 58 (skanda.6.210.58)

इन्द्र उवाच भोभोः पार्थिव तुष्टोऽस्मि तपसाऽनेन सांप्रतम् ब्रूहि यत्ते वरं दद्मि मनसा वांछितं सदा

indra uvāca bhobhoḥ pārthiva tuṣṭo'smi tapasā'nena sāṁpratam brūhi yatte varaṁ dadmi manasā vāṁchitaṁ sadā

इन्द्र ने कहा — हे राजन्, मैं इस तप से अभी संतुष्ट हूँ; कहो, जो भी तुम्हारे मन में सदा से अभिलषित रहा हो, वह वर मैं तुम्हें दूँगा।

श्लोक 59 (skanda.6.210.59)

सोऽब्रवीद्यदि मे तुष्टो यदि देयो वरो मम विमानं खेचरं देहि येनागच्छामि ते गृहे नित्यमेव धरापृष्ठाद्वंदनार्थं तव प्रभो

so'bravīdyadi me tuṣṭo yadi deyo varo mama vimānaṁ khecaraṁ dehi yenāgacchāmi te gṛhe nityameva dharāpṛṣṭhādvaṁdanārthaṁ tava prabho

उसने कहा — हे प्रभु, यदि आप मुझसे संतुष्ट हैं और मुझे वर देना चाहते हैं, तो मुझे आकाशगामी विमान दीजिए, जिससे मैं पृथ्वी से नित्य ही आपके भवन में आपकी वंदना के लिए आ सकूँ।

श्लोक 60 (skanda.6.210.60)

स तथेति प्रतिज्ञाय हंसबर्हिणनादितम् विमानं प्रददौ तस्मै मनोमारुतवेगधृक्

sa tatheti pratijñāya haṁsabarhiṇanāditam vimānaṁ pradadau tasmai manomārutavegadhṛk

इन्द्र ने 'ऐसा ही होगा' कहकर हंस और मयूरों की ध्वनि से गुंजित, तथा मन और वायु के समान वेगवान वह विमान उसे प्रदान किया।

श्लोक 61 (skanda.6.210.61)

स तत्र नित्यमारुह्य प्रयाति त्रिदशालयम् भक्त्या परमया युक्तः सहस्राक्षं प्रवंदितुम्

sa tatra nityamāruhya prayāti tridaśālayam bhaktyā paramayā yuktaḥ sahasrākṣaṁ pravaṁditum

वह उसमें नित्य ही सवार होकर, परम भक्तिभाव से युक्त होकर इन्द्र की वंदना के लिए स्वर्गलोक को जाता था।

श्लोक 62 (skanda.6.210.62)

तस्य शक्रः स्वहस्तेन तांबूलं च प्रयच्छति स च तद्भक्षयामास प्रहृष्टेनांतरात्मना

tasya śakraḥ svahastena tāṁbūlaṁ ca prayacchati sa ca tadbhakṣayāmāsa prahṛṣṭenāṁtarātmanā

इन्द्र उसे अपने ही हाथ से तांबूल प्रदान करता था, और वह अत्यंत प्रसन्न मन से उसे खाया करता था।

श्लोक 63 (skanda.6.210.63)

वृद्धभावेऽपि संप्राप्ते तस्य कामोऽत्यवर्द्धत तांबूलस्य प्रभावेन सुमहान्पृथिवीपते

vṛddhabhāve'pi saṁprāpte tasya kāmo'tyavarddhata tāṁbūlasya prabhāvena sumahānpṛthivīpate

हे राजन्, वृद्धावस्था को प्राप्त हो जाने पर भी, उस तांबूल के प्रभाव से उसकी कामेच्छा अत्यधिक बढ़ गई।

श्लोक 64 (skanda.6.210.64)

अथ शक्रमुवाचेदं स राजा विनयान्वितः नागवल्लीप्रदानेन प्रसादो मे विधीयताम्

atha śakramuvācedaṁ sa rājā vinayānvitaḥ nāgavallīpradānena prasādo me vidhīyatām

तब उस विनम्र राजा ने इन्द्र से कहा — मुझे नागवल्ली प्रदान कर मुझ पर कृपा कीजिए।

श्लोक 65 (skanda.6.210.65)

मर्त्यलोके समानेतुं प्रचारं येन गच्छति स तथेति प्रतिज्ञाय तस्मै तां प्रददौ तदा

martyaloke samānetuṁ pracāraṁ yena gacchati sa tatheti pratijñāya tasmai tāṁ pradadau tadā

जिससे मैं इसे मृत्युलोक में ले जाकर प्रचलित कर सकूँ। इन्द्र ने 'ऐसा ही होगा' कहकर उसे वह बेल प्रदान कर दी।

श्लोक 66 (skanda.6.210.66)

गत्वा निजपुरं सोपि स्वोद्यानेऽस्थापयत्तदा ततः कालेन महता प्रचारं सा गता क्षितौ

gatvā nijapuraṁ sopi svodyāne'sthāpayattadā tataḥ kālena mahatā pracāraṁ sā gatā kṣitau

अपने नगर को लौटकर उसने उसे अपने ही उद्यान में स्थापित कर दिया; तत्पश्चात दीर्घकाल में वह पृथ्वी पर सर्वत्र प्रचलित हो गई।

श्लोक 67 (skanda.6.210.67)

यस्याः स्वादनतो लोकः कामात्मा समपद्यत न कश्चिद्यजनं चक्रे याजनं च विशेषतः अन्या धर्मक्रियाः सर्वाः प्रणष्टा धर्मसंभवाः

yasyāḥ svādanato lokaḥ kāmātmā samapadyata na kaścidyajanaṁ cakre yājanaṁ ca viśeṣataḥ anyā dharmakriyāḥ sarvāḥ praṇaṣṭā dharmasaṁbhavāḥ

उसके स्वाद से लोग कामासक्त हो गए; न कोई यज्ञ करता, न विशेष रूप से यजन-याजन करवाता; धर्म से उत्पन्न अन्य सभी धर्मक्रियाएँ नष्ट हो गईं।

श्लोक 68 (skanda.6.210.68)

ततो देवगणाः सर्वे यज्ञभागविवर्जिताः पीड्यमानाः क्रुधाविष्टा गत्वा प्रोचुः पितामहम्

tato devagaṇāḥ sarve yajñabhāgavivarjitāḥ pīḍyamānāḥ krudhāviṣṭā gatvā procuḥ pitāmaham

तब यज्ञभाग से वंचित सारे देवगण पीड़ित और क्रोधाविष्ट होकर ब्रह्मा जी के पास गए और बोले।

श्लोक 69 (skanda.6.210.69)

मर्त्यलोके सुरश्रेष्ठ नष्टा धर्मक्रिया भृशम् कामासक्तो यतो लोकस्तांबूलस्य च भक्षणात् तस्मात्कुरु प्रसादं नो येनास्माकं क्रिया भवेत्

martyaloke suraśreṣṭha naṣṭā dharmakriyā bhṛśam kāmāsakto yato lokastāṁbūlasya ca bhakṣaṇāt tasmātkuru prasādaṁ no yenāsmākaṁ kriyā bhavet

हे देवश्रेष्ठ, मृत्युलोक में धर्मक्रियाएँ पूरी तरह नष्ट हो गई हैं, क्योंकि तांबूल-भक्षण से लोग कामासक्त हो गए हैं; इसलिए हमें प्रसन्न कीजिए, जिससे हमारी यज्ञ-क्रियाएँ पुनः चलें।

श्लोक 70 (skanda.6.210.70)

एतस्मिन्नेव काले तु पुष्करस्थं पितामहम् यजनार्थे समायातं दरिद्रो वीक्ष्य पार्थिव

etasminneva kāle tu puṣkarasthaṁ pitāmaham yajanārthe samāyātaṁ daridro vīkṣya pārthiva

हे राजन्, उसी समय पुष्कर में यज्ञ के लिए आए हुए ब्रह्मा जी को एक दरिद्र मनुष्य ने देखा।

श्लोक 71 (skanda.6.210.71)

प्रणिपत्य ततः प्राह विनयावनतः स्थितः निर्विण्णोऽहं सुरश्रेष्ठ ब्राह्मणानां गृहे स्थितः

praṇipatya tataḥ prāha vinayāvanataḥ sthitaḥ nirviṇṇo'haṁ suraśreṣṭha brāhmaṇānāṁ gṛhe sthitaḥ

उसने प्रणाम कर विनम्रतापूर्वक झुककर कहा — हे देवश्रेष्ठ, ब्राह्मणों के घर पड़े रहते-रहते मैं ऊब चुका हूँ।

श्लोक 72 (skanda.6.210.72)

तस्मात्कीर्तय मे स्थानं श्रेष्ठं वित्तवतां हि यत् तत्र सञ्जायते तृप्तिः शाश्वती प्रचुरा प्रभो

tasmātkīrtaya me sthānaṁ śreṣṭhaṁ vittavatāṁ hi yat tatra sañjāyate tṛptiḥ śāśvatī pracurā prabho

इसलिए हे प्रभु, मुझे धनवानों का वह श्रेष्ठ स्थान बताइए जहाँ शाश्वत और प्रचुर तृप्ति प्राप्त होती है।

श्लोक 73 (skanda.6.210.73)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा चिरं ध्यात्वा पितामहः अब्रवीच्च दरिद्रं तं छिद्रार्थं धनिनामिह

tasya tadvacanaṁ śrutvā ciraṁ dhyātvā pitāmahaḥ abravīcca daridraṁ taṁ chidrārthaṁ dhanināmiha

उसकी यह बात सुनकर ब्रह्मा जी बहुत देर तक विचार कर उस दरिद्र से बोले, धनवानों की कमजोरी बताने के उद्देश्य से।

श्लोक 74 (skanda.6.210.74)

चूर्णपत्रे त्वया वासः सदा कार्यो दरिद्र भोः तांबूलस्य तु पर्णाग्रे भार्यया मम वाक्यतः

cūrṇapatre tvayā vāsaḥ sadā kāryo daridra bhoḥ tāṁbūlasya tu parṇāgre bhāryayā mama vākyataḥ

उन्होंने कहा — हे दरिद्र, तुम मेरे वचन से सदा चूने और पान में — मेरी पत्नी की सहायता से पान के पत्तों के अगले भाग में—

श्लोक 75 (skanda.6.210.75)

पर्णानां चैव वृंतेषु सर्वेषु त्वत्सुतेन च रात्रौ खदिरसारे च त्वं ताभ्यां सर्वदा वस

parṇānāṁ caiva vṛṁteṣu sarveṣu tvatsutena ca rātrau khadirasāre ca tvaṁ tābhyāṁ sarvadā vasa

—तथा अपने पुत्र की सहायता से सभी पत्तों की डंठलों में, और रात्रि में खदिर (कत्था) के सार में — इन्हीं दोनों के साथ तुम सदा निवास करो।

श्लोक 76 (skanda.6.210.76)

धनिनां छिद्रकृत्प्रोक्तमेतत्स्थानचतुष्टयम् पार्थिवानां विशेषेण मम वाक्याद्व्रज द्रुतम्

dhanināṁ chidrakṛtproktametatsthānacatuṣṭayam pārthivānāṁ viśeṣeṇa mama vākyādvraja drutam

मेरे वचन से यह चार स्थान — विशेषतः राजाओं के — धनवानों की दुर्बलता का साधन बताए गए हैं; अब शीघ्र जाओ।

श्लोक 77 (skanda.6.210.77)

नारद उवाच एतत्ते सर्वमाख्यातं यत्पृष्टोऽस्मि नराधिप

nārada uvāca etatte sarvamākhyātaṁ yatpṛṣṭo'smi narādhipa

नारद जी ने कहा — हे राजन्, आपने जो पूछा था, वह सब मैंने कह दिया।

श्लोक 78 (skanda.6.210.78)

तांबूलोत्थानि छिद्राणि यथा स्युर्धनिनामिह तानि सर्वाणि चीर्णानि त्वया राजन्नजानता तेन वै विभवोच्छित्तिः संजाता सहसा नृप

tāṁbūlotthāni chidrāṇi yathā syurdhanināmiha tāni sarvāṇi cīrṇāni tvayā rājannajānatā tena vai vibhavocchittiḥ saṁjātā sahasā nṛpa

तांबूल से उत्पन्न धनवानों की जो दुर्बलताएँ हैं, वे सब तुमने, हे राजन्, अनजाने में ही खा डालीं; उसी से तुम्हारे वैभव का सहसा नाश हो गया।

श्लोक 79 (skanda.6.210.79)

राजोवाच तदर्थमपि मे ब्रूहि प्रायश्चित्तं मुनीश्वर कदाचिद्भक्षणं मे स्यात्तांबूलस्य तथाविधम्

rājovāca tadarthamapi me brūhi prāyaścittaṁ munīśvara kadācidbhakṣaṇaṁ me syāttāṁbūlasya tathāvidham

राजा ने कहा — हे मुनीश्वर, इसके लिए भी मुझे प्रायश्चित्त बताइए, यदि कभी मुझसे तांबूल का ऐसा भक्षण हो जाए—

श्लोक 80 (skanda.6.210.80)

येन सञ्जायते शुद्धिः कुतांबूलसमुद्भवा

yena sañjāyate śuddhiḥ kutāṁbūlasamudbhavā

—जिससे कु-तांबूल भक्षण से उत्पन्न पाप की शुद्धि हो सके।

श्लोक 81 (skanda.6.210.81)

विश्वामित्र उवाच शृणु राजन्प्रवक्ष्यामि प्रायश्चित्तं तु यच्चरेत् आश्वासनेन शुद्ध्यर्थं कुतांबूलस्य भक्षणात्

viśvāmitra uvāca śṛṇu rājanpravakṣyāmi prāyaścittaṁ tu yaccaret āśvāsanena śuddhyarthaṁ kutāṁbūlasya bhakṣaṇāt

विश्वामित्र जी ने कहा — हे राजन्, सुनो, मैं वह प्रायश्चित्त बताता हूँ जो कु-तांबूल भक्षण से शुद्धि के लिए, धैर्यपूर्वक, आचरण में लाना चाहिए।

श्लोक 82 (skanda.6.210.82)

पर्वकालं समुद्दिश्य सम्यक्छ्रद्धासमन्वितः आनयेद्ब्राह्मणं राजन्वेदवेदांगपारगम्

parvakālaṁ samuddiśya samyakchraddhāsamanvitaḥ ānayedbrāhmaṇaṁ rājanvedavedāṁgapāragam

किसी पर्वकाल को लक्ष्य कर, पूर्ण श्रद्धा से युक्त होकर, हे राजन्, वेद-वेदांगपारंगत एक ब्राह्मण को बुलाना चाहिए।

श्लोक 83 (skanda.6.210.83)

प्रक्षाल्य चरणौ तस्य वाससी परिधापयेत् संपूज्य गंधपुष्पाद्यैस्ततः पत्रं हिरण्मयम् स्वशक्त्या कारयित्वाऽथ चूर्णे मुक्ताफलं न्यसेत्

prakṣālya caraṇau tasya vāsasī paridhāpayet saṁpūjya gaṁdhapuṣpādyaistataḥ patraṁ hiraṇmayam svaśaktyā kārayitvā'tha cūrṇe muktāphalaṁ nyaset

उसके चरण धोकर उसे दो वस्त्र पहनाने चाहिए, गंध-पुष्प आदि से उसकी पूजा करके, फिर अपनी शक्ति के अनुसार सोने का एक पत्ता बनवाकर, उसके चूने में एक मोती रख देना चाहिए।

श्लोक 84 (skanda.6.210.84)

पूगीफलं च वैडूर्यं खदिरं रूप्यमेव च मन्त्रेणानेन विप्राय तथैव च समर्पयेत्

pūgīphalaṁ ca vaiḍūryaṁ khadiraṁ rūpyameva ca mantreṇānena viprāya tathaiva ca samarpayet

सुपारी के स्थान पर वैडूर्यमणि, खदिर के स्थान पर चाँदी रखकर, इसी मंत्र के साथ वह ब्राह्मण को अर्पित कर देना चाहिए।

श्लोक 85 (skanda.6.210.85)

यन्मया भक्षितं पूर्वं वृन्तं पत्रसमुद्भवम् चूर्णपत्रं तथैवान्यद्रात्रौ खदिरमेव च

yanmayā bhakṣitaṁ pūrvaṁ vṛntaṁ patrasamudbhavam cūrṇapatraṁ tathaivānyadrātrau khadirameva ca

मंत्र यह है — 'मैंने पहले जो पत्ते की डंठल, चूर्णयुक्त पान, और इसी प्रकार रात्रि में खदिर आदि खाया है—

श्लोक 86 (skanda.6.210.86)

तस्य पापस्य शुद्ध्यर्थं तांबूलं प्रतिगृह्यताम् ततस्तु ब्राह्मणो मंत्रमेवं राजन्नुदाहरेत्

tasya pāpasya śuddhyarthaṁ tāṁbūlaṁ pratigṛhyatām tatastu brāhmaṇo maṁtramevaṁ rājannudāharet

—उस पाप की शुद्धि के लिए यह तांबूल ग्रहण कीजिए।' हे राजन्, तब वह ब्राह्मण इस प्रकार मंत्र का उच्चारण करे।

श्लोक 87 (skanda.6.210.87)

यजमानहितार्थाय सर्वपापविशुद्धये अज्ञानाज्ज्ञानतो वापि कुतांबूलं प्रभक्षितम्

yajamānahitārthāya sarvapāpaviśuddhaye ajñānājjñānato vāpi kutāṁbūlaṁ prabhakṣitam

यजमान के हित के लिए और उसके सभी पापों की शुद्धि के लिए — 'तुमने अज्ञान से या जानते हुए भी जो कुतांबूल खाया है—

श्लोक 88 (skanda.6.210.88)

भक्षयिष्यसि यच्चान्यत्कदाचिन्मे प्रसादनात् तस्य दोषो न ते भावी मम वाक्यादसंशयम्

bhakṣayiṣyasi yaccānyatkadācinme prasādanāt tasya doṣo na te bhāvī mama vākyādasaṁśayam

—और जो भी अन्य ऐसा तुम कभी खाओगे, मेरी कृपा से मेरे इस वचन से निःसंदेह उसका दोष तुम्हें नहीं लगेगा।'

श्लोक 89 (skanda.6.210.89)

अनेन विधिना दत्त्वा तांबूलं शुद्धिमाप्नुयात् कुतांबूलस्य दोषेण गृह्यते न नरो नृप

anena vidhinā dattvā tāṁbūlaṁ śuddhimāpnuyāt kutāṁbūlasya doṣeṇa gṛhyate na naro nṛpa

इस विधि से तांबूल दान करके मनुष्य शुद्धि को प्राप्त करता है; हे राजन्, तब वह कुतांबूल के दोष से बद्ध नहीं होता।

श्लोक 90 (skanda.6.210.90)

तस्मात्त्वं हि महाराज व्रतमेतत्समाचर बहु पुण्यतमं ह्येतन्महाभोगविवर्द्धनम्

tasmāttvaṁ hi mahārāja vratametatsamācara bahu puṇyatamaṁ hyetanmahābhogavivarddhanam

इसलिए हे महाराज, तुम भी इस व्रत का आचरण करो; यह अत्यंत पुण्यकारी और महाभोग-वर्धक है।

श्लोक 91 (skanda.6.210.91)

यः प्रयच्छति राजेन्द्र विधिनानेन भक्तितः जन्मजन्मान्तरे वापि न तांबूलेन मुच्यते

yaḥ prayacchati rājendra vidhinānena bhaktitaḥ janmajanmāntare vāpi na tāṁbūlena mucyate

हे राजेन्द्र, जो कोई इस विधि से भक्तिपूर्वक तांबूल दान करता है, वह जन्म-जन्मांतर में भी तांबूल से वंचित नहीं होता।

श्लोक 92 (skanda.6.210.92)

तांबूलं भक्षयित्वा यो नैतद्दानं प्रयच्छति तांबूलवर्जितः सोऽत्र भवेज्जन्मनिजन्मनि

tāṁbūlaṁ bhakṣayitvā yo naitaddānaṁ prayacchati tāṁbūlavarjitaḥ so'tra bhavejjanmanijanmani

किंतु जो तांबूल खाकर यह दान नहीं देता, वह जन्म-जन्म में तांबूल से वंचित ही रहता है।

श्लोक 93 (skanda.6.210.93)

तांबूलवर्जितं यस्य मुखं स्यात्पृथिवीपते कृपणस्य दरिद्रस्य तद्बिलं न हि तन्मुखम्

tāṁbūlavarjitaṁ yasya mukhaṁ syātpṛthivīpate kṛpaṇasya daridrasya tadbilaṁ na hi tanmukham

हे राजन्, जिस कंजूस और दरिद्र मनुष्य का मुख तांबूल से रहित हो, वह मुख नहीं, बिल के समान है।

श्लोक 94 (skanda.6.210.94)

तांबूलं ब्राह्मणेन्द्राय यो दत्त्वा प्राक्प्रभक्षयेत् सुरूपो भाग्यवान्दक्षो भवेज्जन्मनिजन्मनि

tāṁbūlaṁ brāhmaṇendrāya yo dattvā prākprabhakṣayet surūpo bhāgyavāndakṣo bhavejjanmanijanmani

जो श्रेष्ठ ब्राह्मण को पहले तांबूल देकर तब स्वयं खाता है, वह जन्म-जन्मांतर में सुंदर, भाग्यवान और चतुर होता है।

श्लोक 95 (skanda.6.210.95)

एतत्ते सर्वमाख्यातं कुतांबूलस्य भक्षणात् यत्फलं जायते पुंसां यद्दानेन महीपते

etatte sarvamākhyātaṁ kutāṁbūlasya bhakṣaṇāt yatphalaṁ jāyate puṁsāṁ yaddānena mahīpate

हे राजन्, कुतांबूल-भक्षण से मनुष्यों को जो फल प्राप्त होता है और दान से जो फल मिलता है, वह सब मैंने तुम्हें बता दिया।

श्लोक 96 (skanda.6.210.96)

शंखादित्यानुषंगेण तांबूलस्य च भक्षणे ये दोषा ये गुणा राजन्दानं चैव प्रभक्षणे

śaṁkhādityānuṣaṁgeṇa tāṁbūlasya ca bhakṣaṇe ye doṣā ye guṇā rājandānaṁ caiva prabhakṣaṇe

शंखादित्य के प्रसंग से जुड़े हुए तांबूल-भक्षण के जो दोष और गुण हैं, तथा दान और भक्षण की जो विधि है, हे राजन्, वह सब मैंने कह दिया।

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