नागर खण्ड · अध्याय 219
काम्य श्राद्ध का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.219.1)
भर्तृयज्ञ उवाच काम्यानि तेऽधुना वच्मि श्राद्धानि पृथिवीपते यैः कृतैः समवाप्नोति मर्त्यो हृदयसंस्थितम्
bhartṛyajña uvāca kāmyāni te'dhunā vacmi śrāddhāni pṛthivīpate yaiḥ kṛtaiḥ samavāpnoti martyo hṛdayasaṁsthitam
भर्तृयज्ञ ने कहा — हे पृथ्वीपते! अब मैं तुम्हें काम्य श्राद्ध बताता हूँ, जिन्हें करने से मनुष्य अपने हृदय में स्थित कामना को प्राप्त कर लेता है।
श्लोक 2 (skanda.6.219.2)
यो नारीं वांछते क्ष्माप रूपाढ्यां शीलमण्डनाम् इह लोके परे चैव तस्यार्हं प्रथमं दिनम्
yo nārīṁ vāṁchate kṣmāpa rūpāḍhyāṁ śīlamaṇḍanām iha loke pare caiva tasyārhaṁ prathamaṁ dinam
हे राजन्! जो रूपवती तथा शीलमंडित स्त्री की कामना करता है, इस लोक और परलोक दोनों में, उसके लिए [प्रेतपक्ष का] पहला दिन उपयुक्त है।
श्लोक 3 (skanda.6.219.3)
श्राद्धीयप्रेतपक्षस्य मुख्यभूतं च यन्नृप य इच्छेत्कन्यकां श्रेष्ठां सुशीलां रूपसंयुताम् द्वितीयादिवसे तेन श्राद्धं कार्यं महीपते
śrāddhīyapretapakṣasya mukhyabhūtaṁ ca yannṛpa ya icchetkanyakāṁ śreṣṭhāṁ suśīlāṁ rūpasaṁyutām dvitīyādivase tena śrāddhaṁ kāryaṁ mahīpate
जो [दिन] श्राद्धीय प्रेतपक्ष में मुख्य माना गया है, हे राजन् — जो श्रेष्ठ, सुशील तथा रूपसंपन्न कन्या की कामना करे, उसे दूसरे दिन श्राद्ध करना चाहिए, हे महीपते।
श्लोक 4 (skanda.6.219.4)
यो वांछति नरोऽश्वांश्च वायुवेगसमाञ्जवे तृतीयादिवसे श्राद्धं तेन कार्यं विपश्चिता
yo vāṁchati naro'śvāṁśca vāyuvegasamāñjave tṛtīyādivase śrāddhaṁ tena kāryaṁ vipaścitā
जो मनुष्य वायु के वेग के समान गतिशील अश्वों की कामना करे, बुद्धिमान को उसके लिए तीसरे दिन श्राद्ध करना चाहिए।
श्लोक 5 (skanda.6.219.5)
यो वांछति पशून्मुख्यान्कुप्याकुप्यधनानि च चतुर्थ्यां तेन कर्तव्यं श्राद्धं पितृप्रतुष्टये
yo vāṁchati paśūnmukhyānkupyākupyadhanāni ca caturthyāṁ tena kartavyaṁ śrāddhaṁ pitṛpratuṣṭaye
जो प्रमुख पशुओं तथा काष्ठ-धातु आदि धन की कामना करे, उसे पितरों की तुष्टि के लिए चतुर्थी को श्राद्ध करना चाहिए।
श्लोक 6 (skanda.6.219.6)
पुत्रान्वांछति योऽभीष्टान्सुशीलान्वंशमंडनान् पञ्चम्यां तेन कर्तव्यं सदा श्राद्धं नराधिप
putrānvāṁchati yo'bhīṣṭānsuśīlānvaṁśamaṁḍanān pañcamyāṁ tena kartavyaṁ sadā śrāddhaṁ narādhipa
जो अभीष्ट, सुशील तथा वंश को सुशोभित करने वाले पुत्रों की कामना करता है, हे नराधिप, उसे सदा पंचमी को श्राद्ध करना चाहिए।
श्लोक 7 (skanda.6.219.7)
यः श्राद्धं वंशजैर्दत्तं परलोकगतो नृप वांछते तेन कर्तव्यं षष्ठ्यां श्राद्धं विपश्चिता
yaḥ śrāddhaṁ vaṁśajairdattaṁ paralokagato nṛpa vāṁchate tena kartavyaṁ ṣaṣṭhyāṁ śrāddhaṁ vipaścitā
हे राजन्! जो पितर परलोकगत होकर वंशजों द्वारा दिए गए श्राद्ध की कामना करता है, उसके लिए बुद्धिमान को षष्ठी के दिन श्राद्ध करना चाहिए।
श्लोक 8 (skanda.6.219.8)
कृषिसिद्धिं य इच्छेत ग्रैष्मिकीं शारदीमपि सप्तम्यां युज्यते तस्य श्राद्धं कर्तुं न संशयः
kṛṣisiddhiṁ ya iccheta graiṣmikīṁ śāradīmapi saptamyāṁ yujyate tasya śrāddhaṁ kartuṁ na saṁśayaḥ
जो ग्रीष्मकालीन तथा शरदकालीन कृषि की सिद्धि चाहे, उसके लिए सप्तमी को श्राद्ध करना उचित है — इसमें संदेह नहीं।
श्लोक 9 (skanda.6.219.9)
य इच्छेत्पण्यसंसिद्धिं व्यवहारसमुद्भवाम् अष्टम्यां युज्यते श्राद्धं तस्य कर्तुं नराधिप
ya icchetpaṇyasaṁsiddhiṁ vyavahārasamudbhavām aṣṭamyāṁ yujyate śrāddhaṁ tasya kartuṁ narādhipa
जो व्यापार से उत्पन्न होने वाली व्यापारिक सिद्धि चाहे, हे नराधिप, उसके लिए अष्टमी को श्राद्ध करना उचित है।
श्लोक 10 (skanda.6.219.10)
नवम्यां श्राद्धकृन्नाना चतुष्पदगणाल्लँभेत् सौभाग्यं रोगनाशं च तथा वल्लभसंगमम्
navamyāṁ śrāddhakṛnnānā catuṣpadagaṇālla~bhet saubhāgyaṁ roganāśaṁ ca tathā vallabhasaṁgamam
नवमी के दिन श्राद्धकर्ता विविध चतुष्पद पशुओं का समूह, सौभाग्य, रोगनाश तथा प्रियजन का समागम प्राप्त करता है।
श्लोक 11 (skanda.6.219.11)
दशमीदिवसे श्राद्धं यः करोति समाहितः तस्य स्याद्वांछिता सिद्धिः सर्वकृत्येषु सर्वदा
daśamīdivase śrāddhaṁ yaḥ karoti samāhitaḥ tasya syādvāṁchitā siddhiḥ sarvakṛtyeṣu sarvadā
जो एकाग्रचित्त होकर दशमी के दिन श्राद्ध करता है, उसे सब कार्यों में सदा वांछित सिद्धि प्राप्त होती है।
श्लोक 12 (skanda.6.219.12)
एकादश्यां धनं धान्यं श्राद्धकर्ता लभेन्नरः तथा भूपप्रसादं च यच्चान्यन्मनसि स्थितम्
ekādaśyāṁ dhanaṁ dhānyaṁ śrāddhakartā labhennaraḥ tathā bhūpaprasādaṁ ca yaccānyanmanasi sthitam
एकादशी को श्राद्धकर्ता मनुष्य धन-धान्य, राजा की कृपा, तथा और जो कुछ भी उसके मन में स्थित हो, वह प्राप्त करता है।
श्लोक 13 (skanda.6.219.13)
यः करोति च द्वादश्यां श्राद्धं श्रद्धासमन्वितः पुत्रांस्तु प्रवरांश्चैव स पशून्वांछिताल्लँभेत्
yaḥ karoti ca dvādaśyāṁ śrāddhaṁ śraddhāsamanvitaḥ putrāṁstu pravarāṁścaiva sa paśūnvāṁchitālla~bhet
जो श्रद्धा से युक्त होकर द्वादशी को श्राद्ध करता है, वह श्रेष्ठ पुत्रों तथा अपने वांछित पशुओं को प्राप्त करता है।
श्लोक 14 (skanda.6.219.14)
यो वांछति नरो मुक्तिं पितृभिः सह चात्मनः असंतानश्च यस्तस्य श्राद्धे प्रोक्ता त्रयोदशी
yo vāṁchati naro muktiṁ pitṛbhiḥ saha cātmanaḥ asaṁtānaśca yastasya śrāddhe proktā trayodaśī
जो मनुष्य पितरों के साथ अपनी मुक्ति की कामना करे, तथा जिसकी कोई संतान न हो, उसके श्राद्ध के लिए त्रयोदशी कही गई है।
श्लोक 15 (skanda.6.219.15)
संतानकामो यः कुर्यात्तस्य वंशक्षयो भवेत् न संतानविवृद्धयै च तस्य प्रोक्ता त्रयोदशी
saṁtānakāmo yaḥ kuryāttasya vaṁśakṣayo bhavet na saṁtānavivṛddhayai ca tasya proktā trayodaśī
संतान की कामना करने वाला यदि इस तिथि को श्राद्ध करे, तो उसके वंश का क्षय होता है; संतान की वृद्धि के लिए त्रयोदशी नहीं कही गई है।
श्लोक 16 (skanda.6.219.16)
श्राद्धकर्मणि राजेंद्र श्रुतिरेषा पुरातनी अपि नः स कुले भूयाद्यो नो दद्यात्त्रयोदशीम्
śrāddhakarmaṇi rājeṁdra śrutireṣā purātanī api naḥ sa kule bhūyādyo no dadyāttrayodaśīm
हे राजेन्द्र! श्राद्धकर्म के विषय में यह प्राचीन श्रुति है — 'जो हमारे कुल में त्रयोदशी का श्राद्ध न दे, वह भी हमारा ही हो [अर्थात् उसका कल्याण हो]।'
श्लोक 17 (skanda.6.219.17)
पायसं मधुसर्पिर्भ्यां वर्षासु च मघासु च मघात्रयोदशीयोगे पायसेन यजेत्पितॄन्
pāyasaṁ madhusarpirbhyāṁ varṣāsu ca maghāsu ca maghātrayodaśīyoge pāyasena yajetpitṝn
वर्षा ऋतु में तथा मघा नक्षत्र में मधु और घी के साथ पायस [खीर] अर्पित करनी चाहिए; मघा-त्रयोदशी के योग में पायस से पितरों का पूजन करना चाहिए।
श्लोक 18 (skanda.6.219.18)
पितरस्तस्य नेच्छंति तद्वर्षं श्राद्धसत्क्रियाम् पुण्यातिशयभीतेन पिंडदानं निराकृतम्
pitarastasya necchaṁti tadvarṣaṁ śrāddhasatkriyām puṇyātiśayabhītena piṁḍadānaṁ nirākṛtam
[अन्यथा] उस वर्ष उसके पितर श्राद्ध की उस उत्तम क्रिया की इच्छा नहीं करते; अत्यधिक पुण्य से भयभीत होकर पिण्डदान उनके द्वारा ही अस्वीकार कर दिया गया।
श्लोक 19 (skanda.6.219.19)
शक्रेण तद्दिने पुत्रमरणं दर्शितं भयम् येषां च शस्त्रमृत्युः स्यादपमृत्युरथापि वा
śakreṇa taddine putramaraṇaṁ darśitaṁ bhayam yeṣāṁ ca śastramṛtyuḥ syādapamṛtyurathāpi vā
उस दिन इंद्र द्वारा पुत्र की मृत्यु का भय दिखाया गया था। अब सुनो — जिनकी मृत्यु शस्त्र से हुई हो, अथवा अपमृत्यु से हुई हो,
श्लोक 20 (skanda.6.219.20)
उपसर्गमृतानां च विषमृत्युमुपेयुषाम् वह्निना तु प्रदग्धानां जलमृत्युमुपेयुषाम्
upasargamṛtānāṁ ca viṣamṛtyumupeyuṣām vahninā tu pradagdhānāṁ jalamṛtyumupeyuṣām
जो उपसर्ग [रोग/उत्पात] से मरे हों, विष से मृत्यु को प्राप्त हुए हों, अग्नि से दग्ध हुए हों, अथवा जल में डूबकर मृत्यु को प्राप्त हुए हों,
श्लोक 21 (skanda.6.219.21)
सर्पव्यालहतानां च शृंगैरुद्बन्धनैरपि एकोद्दिष्टं प्रकर्तव्यं चतुर्दश्यां नराधिप
sarpavyālahatānāṁ ca śṛṁgairudbandhanairapi ekoddiṣṭaṁ prakartavyaṁ caturdaśyāṁ narādhipa
तथा सर्प या हिंसक पशुओं से मारे गए हों, या सींगों से अथवा फाँसी से मरे हों — इन सबके लिए, हे नराधिप, चतुर्दशी को एकोद्दिष्ट श्राद्ध करना चाहिए।
श्लोक 22 (skanda.6.219.22)
तेषां तस्मिन्कृते तृप्तिस्ततस्तत्पक्षजा भवेत्
teṣāṁ tasminkṛte tṛptistatastatpakṣajā bhavet
उनके लिए वह श्राद्ध किए जाने पर, उस [प्रेत] पक्ष से उत्पन्न होने वाली तृप्ति उन्हें प्राप्त होती है।
श्लोक 23 (skanda.6.219.23)
सर्वे कामाः पुरः प्रोक्ता युष्माकं ये मया नृप अमावास्यादिने श्राद्धात्तानाप्नोति न संशयः
sarve kāmāḥ puraḥ proktā yuṣmākaṁ ye mayā nṛpa amāvāsyādine śrāddhāttānāpnoti na saṁśayaḥ
हे राजन्! ये सब कामनाएँ, जो मैंने पहले तुमसे कहीं, अमावस्या के दिन श्राद्ध करने से भी प्राप्त होती हैं — इसमें संदेह नहीं।
श्लोक 24 (skanda.6.219.24)
एतत्ते सर्वमाख्यातं काम्यश्राद्धफलं नृप यच्छ्रुत्वा वांछितान्कामान्सर्वानाप्नोति मानवः
etatte sarvamākhyātaṁ kāmyaśrāddhaphalaṁ nṛpa yacchrutvā vāṁchitānkāmānsarvānāpnoti mānavaḥ
हे राजन्! यह सब मैंने तुम्हें काम्य श्राद्ध का फल बताया, जिसे सुनकर मनुष्य अपनी सब वांछित कामनाओं को प्राप्त कर लेता है।