नागर खण्ड · अध्याय 276
एकादश रुद्रों की उत्पत्ति का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.6.276.1)
सूत उवाच तथान्येऽपि वसन्तीह रुद्रा एकादशैव तु सञ्जाता ब्राह्मणश्रेष्ठा मुनीनां हितकाम्यया
sūta uvāca tathānye'pi vasantīha rudrā ekādaśaiva tu sañjātā brāhmaṇaśreṣṭhā munīnāṁ hitakāmyayā
सूत जी ने कहा — हे द्विजश्रेष्ठो, यहाँ मुनियों के हित हेतु उत्पन्न हुए अन्य ग्यारह रुद्र भी निवास करते हैं।
श्लोक 2 (skanda.6.276.2)
यैर्दृष्टैः पूजितै र्वापि स्तुतैर्वाथ नमस्कृतैः विपाप्मा जायते मर्त्यः सर्वदोषविवर्जितः
yairdṛṣṭaiḥ pūjitai rvāpi stutairvātha namaskṛtaiḥ vipāpmā jāyate martyaḥ sarvadoṣavivarjitaḥ
जिनके दर्शन, पूजन, स्तवन अथवा नमस्कार से मनुष्य पापरहित होकर समस्त दोषों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 3 (skanda.6.276.3)
ऋषय ऊचुः एक एव श्रुतो रुद्रो न द्वितीयः कथंचन गौरी भार्याप्रिया यस्य स्कन्दः पुत्रः प्रकीर्तितः
ṛṣaya ūcuḥ eka eva śruto rudro na dvitīyaḥ kathaṁcana gaurī bhāryāpriyā yasya skandaḥ putraḥ prakīrtitaḥ
ऋषियों ने कहा — हमने तो केवल एक ही रुद्र सुना है, किसी प्रकार दूसरा नहीं, जिनकी प्रिय पत्नी गौरी हैं तथा पुत्र स्कंद कहलाते हैं।
श्लोक 4 (skanda.6.276.4)
तेनैकं विद्महे रुद्रं नान्यमीशं कथंचन तस्माद्ब्रूहि महाभाग सर्वानेतान्सुविस्तरात्
tenaikaṁ vidmahe rudraṁ nānyamīśaṁ kathaṁcana tasmādbrūhi mahābhāga sarvānetānsuvistarāt
इसीलिए हम एक ही रुद्र को जानते हैं, अन्य किसी ईश को नहीं; अतः हे महाभाग, हमें इन सभी (ग्यारह) के विषय में विस्तारपूर्वक बताइए।
श्लोक 5 (skanda.6.276.5)
सूत उवाच सत्यमेतन्महाभागा यद्भवद्भिरुदाहृतम् एक एव स्थितो रुद्रो न द्वितीयः कथंचन
sūta uvāca satyametanmahābhāgā yadbhavadbhirudāhṛtam eka eva sthito rudro na dvitīyaḥ kathaṁcana
सूत जी ने कहा — हे महाभागो, आपने जो कहा वह सत्य है — रुद्र निश्चय ही एक ही हैं, किसी प्रकार दूसरे नहीं।
श्लोक 6 (skanda.6.276.6)
परं यथा च सञ्जाता रुद्रा एकादशात्र भोः तथाहं कीर्तयिष्यामि शृणुध्वं सुसमाहिताः
paraṁ yathā ca sañjātā rudrā ekādaśātra bhoḥ tathāhaṁ kīrtayiṣyāmi śṛṇudhvaṁ susamāhitāḥ
किन्तु यहाँ ग्यारह रुद्र किस प्रकार उत्पन्न हुए, वह मैं बताता हूँ; एकाग्रचित्त होकर सुनिए।
श्लोक 7 (skanda.6.276.7)
वाराणस्यां पुरा संस्था मुनयः शंसितव्रताः हाटकेश्वरदेवस्य दर्शनार्थं समुत्सुकाः
vārāṇasyāṁ purā saṁsthā munayaḥ śaṁsitavratāḥ hāṭakeśvaradevasya darśanārthaṁ samutsukāḥ
पूर्वकाल में वाराणसी में निवास करने वाले सुव्रती मुनि हाटकेश्वर देव के दर्शन हेतु अत्यंत उत्सुक हुए।
श्लोक 8 (skanda.6.276.8)
प्रस्थिताः समयं कृत्वा स्पर्धमानाः परस्परम् अहंपूर्वमहं पूर्वं वीक्षयिष्यामि तं विभुम्
prasthitāḥ samayaṁ kṛtvā spardhamānāḥ parasparam ahaṁpūrvamahaṁ pūrvaṁ vīkṣayiṣyāmi taṁ vibhum
परस्पर स्पर्धा करते हुए एक-दूसरे से यह प्रण करके वे चल पड़े — 'मैं पहले, मैं पहले उस विभु को देखूँगा!'
श्लोक 9 (skanda.6.276.9)
सर्वेषामग्रतो भूत्वा पाताले हाटकेश्वरम् यश्चादौ तत्र गत्वा च नेक्षयिष्यति तं हरम् सर्वेषां श्रमजं पापं तस्यैकस्य भविष्यति
sarveṣāmagrato bhūtvā pātāle hāṭakeśvaram yaścādau tatra gatvā ca nekṣayiṣyati taṁ haram sarveṣāṁ śramajaṁ pāpaṁ tasyaikasya bhaviṣyati
'जो सबसे आगे होकर पाताल में सबसे पहले हाटकेश्वर के पास जाकर भी उस हर को न देख पाए, उसी एक पर सबके परिश्रम से उत्पन्न पाप लगेगा।'
श्लोक 10 (skanda.6.276.10)
एवमुक्त्वा ततः सर्वे वाराणस्यां ततः परम् प्रस्थिता धावमानाश्च वेगेन महता ततः
evamuktvā tataḥ sarve vārāṇasyāṁ tataḥ param prasthitā dhāvamānāśca vegena mahatā tataḥ
ऐसा कहकर तत्पश्चात वे सब वाराणसी से महान वेग से दौड़ते हुए चल पड़े।
श्लोक 11 (skanda.6.276.11)
एतस्मिन्नन्तरे देवो हाटकेश्वरसंज्ञितः ज्ञात्वा तेषामभिप्रायं मिथः स्पर्द्धासमुद्भवम् आत्मनो दर्शनार्थाय बहुभक्तिपुरस्कृतम्
etasminnantare devo hāṭakeśvarasaṁjñitaḥ jñātvā teṣāmabhiprāyaṁ mithaḥ sparddhāsamudbhavam ātmano darśanārthāya bahubhaktipuraskṛtam
इसी बीच हाटकेश्वर नामक देव ने उनकी परस्पर स्पर्धा से उत्पन्न मंशा को जानकर, यद्यपि वह भक्ति की अधिकता से प्रेरित थी...
श्लोक 12 (skanda.6.276.12)
लघुना रक्ष्यमाणेन सर्वेषां च महात्मनाम् नागरंध्रेण निष्क्रम्य पातालाच्चैव तत्क्षणात्
laghunā rakṣyamāṇena sarveṣāṁ ca mahātmanām nāgaraṁdhreṇa niṣkramya pātālāccaiva tatkṣaṇāt
...उन सभी महात्माओं की रक्षा हेतु सूक्ष्म रूप धारण कर, नागरंध्र (सर्प-बिल) से पाताल से उसी क्षण निकलकर...
श्लोक 13 (skanda.6.276.13)
एकादशप्रकारं स कृत्वा रूपं मनोहरम् त्रिशूलभृत्त्रिनेत्रं च कपर्देन विभूषितम्
ekādaśaprakāraṁ sa kṛtvā rūpaṁ manoharam triśūlabhṛttrinetraṁ ca kapardena vibhūṣitam
...अपना मनोहर रूप ग्यारह प्रकार का बनाकर, त्रिशूलधारी, त्रिनेत्र, जटाओं से विभूषित...
श्लोक 14 (skanda.6.276.14)
शशिखंडधरं चैव रुण्डमालाप्रधारकम् समं चैव स्थितस्तेषां दर्शने शंकरः प्रभुः
śaśikhaṁḍadharaṁ caiva ruṇḍamālāpradhārakam samaṁ caiva sthitasteṣāṁ darśane śaṁkaraḥ prabhuḥ
...चंद्रकला धारण किए, मुण्डमाला पहने हुए, प्रभु शंकर उन सबके समक्ष एक साथ, समान रूप से, दर्शन हेतु खड़े हो गए।
श्लोक 15 (skanda.6.276.15)
ततस्ते वै समालोक्य पुरस्थं वृषभध्वजम् जानुभ्यां धरणीं गत्वा स्तुतिं चक्रुस्ततस्ततः
tataste vai samālokya purasthaṁ vṛṣabhadhvajam jānubhyāṁ dharaṇīṁ gatvā stutiṁ cakrustatastataḥ
तब उन सबने अपने-अपने समक्ष खड़े वृषभध्वज को देखकर, घुटनों के बल भूमि पर बैठकर, अपनी-अपनी ओर से स्तुति करने लगे।
श्लोक 16 (skanda.6.276.16)
एको जानाति देवोऽयं मम संदर्शनं गतः देवदेवो महादेवः प्रथमं भक्तवत्सलः
eko jānāti devo'yaṁ mama saṁdarśanaṁ gataḥ devadevo mahādevaḥ prathamaṁ bhaktavatsalaḥ
एक ने सोचा — यह देव मेरे ही दर्शन को आए हैं; भक्तवत्सल देवदेव महादेव मेरे पास सबसे पहले आए हैं।
श्लोक 17 (skanda.6.276.17)
अन्यो जानाति मे पूर्वं जातस्ते तापसोत्तमः स्तुतिं चक्रुश्च विप्रेंद्रा जानुभ्यामवनिं गताः
anyo jānāti me pūrvaṁ jātaste tāpasottamaḥ stutiṁ cakruśca vipreṁdrā jānubhyāmavaniṁ gatāḥ
दूसरे ने सोचा — मुझे ही सबसे पहले दर्शन दिए। हे विप्रेन्द्रो, इस प्रकार वे सभी श्रेष्ठ तापस घुटनों के बल भूमि पर बैठकर स्तुति करने लगे।
श्लोक 18 (skanda.6.276.18)
तापसा ऊचुः नमो देवाधिदेवाय सर्वदेवमयाय च नमः शांताय सूक्ष्माय नमश्चांधकभेदिने
tāpasā ūcuḥ namo devādhidevāya sarvadevamayāya ca namaḥ śāṁtāya sūkṣmāya namaścāṁdhakabhedine
तापसों ने कहा — देवाधिदेव को नमस्कार, सर्वदेवमय को नमस्कार; शांत, सूक्ष्म को नमस्कार; अंधक के भेदक को नमस्कार।
श्लोक 19 (skanda.6.276.19)
नमोऽस्तु सर्वरुद्रेभ्यो ये दिवं संश्रिताः सदा जीवापयंति जगतीं वायुभिश्च पृथग्विधैः
namo'stu sarvarudrebhyo ye divaṁ saṁśritāḥ sadā jīvāpayaṁti jagatīṁ vāyubhiśca pṛthagvidhaiḥ
'उन समस्त रुद्रों को नमस्कार जो सदा आकाश में स्थित रहकर विविध वायुओं से जगत् को जीवित रखते हैं।'
श्लोक 20 (skanda.6.276.20)
नमोऽस्तु सर्वरुद्रेभ्यो ये स्थिता वारुणीं दिशम् रक्षंति सर्वलोकांश्च पिशाचानां दुरात्मनाम्
namo'stu sarvarudrebhyo ye sthitā vāruṇīṁ diśam rakṣaṁti sarvalokāṁśca piśācānāṁ durātmanām
'उन समस्त रुद्रों को नमस्कार जो वारुणी दिशा में स्थित रहकर समस्त लोकों को दुष्ट पिशाचों से बचाते हैं।'
श्लोक 21 (skanda.6.276.21)
नमोऽस्तु सर्वरुद्रेभ्यो दिशमूर्ध्वं समाश्रिताः रक्षंति सकलांल्लोकान्भूतार्नां जंभकाद्भयात्
namo'stu sarvarudrebhyo diśamūrdhvaṁ samāśritāḥ rakṣaṁti sakalāṁllokānbhūtārnāṁ jaṁbhakādbhayāt
'उन समस्त रुद्रों को नमस्कार जो ऊर्ध्व दिशा में स्थित रहकर समस्त लोकों को भूतों में जंभक-भय से बचाते हैं।'
श्लोक 22 (skanda.6.276.22)
नमोऽस्तु सर्वरुद्रेभ्यो येऽध ऊर्ध्वं समाश्रिताः रक्षंति सकलांल्लोकान्कूष्मांडानां भयात्सदा
namo'stu sarvarudrebhyo ye'dha ūrdhvaṁ samāśritāḥ rakṣaṁti sakalāṁllokānkūṣmāṁḍānāṁ bhayātsadā
'उन समस्त रुद्रों को नमस्कार जो ऊपर-नीचे दोनों दिशाओं में स्थित रहकर समस्त लोकों को सदा कूष्मांडों के भय से बचाते हैं।'
श्लोक 23 (skanda.6.276.23)
असंख्याताः सहस्राणि ये रुद्रा भूमिमाश्रिताः नमस्तेभ्योऽपि सर्वेभ्यस्तेषां रक्षंति ये रुजः
asaṁkhyātāḥ sahasrāṇi ye rudrā bhūmimāśritāḥ namastebhyo'pi sarvebhyasteṣāṁ rakṣaṁti ye rujaḥ
'पृथ्वी पर स्थित असंख्य सहस्रों रुद्रों को भी नमस्कार, जो रोगों से रक्षा करते हैं।'
श्लोक 24 (skanda.6.276.24)
एवं स्तुतास्तु ते रुद्रा एकादशतपस्विभिः एकादशापि तान्प्रोचुर्भक्तिनम्रांस्तु तापसान्
evaṁ stutāstu te rudrā ekādaśatapasvibhiḥ ekādaśāpi tānprocurbhaktinamrāṁstu tāpasān
इस प्रकार उन ग्यारह तापसों द्वारा स्तुत होकर, वे ग्यारह रुद्र भी उन भक्तिनम्र तापसों से बोले।
श्लोक 25 (skanda.6.276.25)
रुद्रा ऊचुः एकादशप्रकारोऽहं तुष्टो वस्तापसोत्तमाः बहुभक्त्यतिरेकेण व्रियतां च यथेप्सितम्
rudrā ūcuḥ ekādaśaprakāro'haṁ tuṣṭo vastāpasottamāḥ bahubhaktyatirekeṇa vriyatāṁ ca yathepsitam
रुद्रों ने कहा — हे तापसोत्तमो, मैं इस ग्यारह-रूप में तुम्हारी अत्यधिक भक्ति से प्रसन्न हूँ; जो भी अभीष्ट हो, माँग लो।
श्लोक 26 (skanda.6.276.26)
तापसा ऊचुः यदि तुष्टोसि नो देव यदि यच्छसि वांछितम् एकादशप्रकारैस्तु सदा स्थेयमिहैव तु
tāpasā ūcuḥ yadi tuṣṭosi no deva yadi yacchasi vāṁchitam ekādaśaprakāraistu sadā stheyamihaiva tu
तापसों ने कहा — हे देव, यदि आप हमसे प्रसन्न हैं, यदि अभीष्ट देना चाहते हैं, तो इसी ग्यारह-रूप में सदा यहीं स्थित रहें।
श्लोक 27 (skanda.6.276.27)
हाटकेश्वरजे क्षेत्रे सर्वतीर्थमये शुभे आराधनं प्रकुर्वाणा वसामो येन वै वयम्
hāṭakeśvaraje kṣetre sarvatīrthamaye śubhe ārādhanaṁ prakurvāṇā vasāmo yena vai vayam
'सर्वतीर्थमय शुभ हाटकेश्वर क्षेत्र में, जहाँ हम आराधना करते हुए निवास कर सकें।'
श्लोक 28 (skanda.6.276.28)
श्रीभगवानुवाच एकादशप्रकारा या मूर्तयो निर्मिता मया एताभिरेव सर्वाभिः स्थास्याम्यत्र सदैव हि
śrībhagavānuvāca ekādaśaprakārā yā mūrtayo nirmitā mayā etābhireva sarvābhiḥ sthāsyāmyatra sadaiva hi
श्री भगवान ने कहा — जो ये ग्यारह प्रकार की मूर्तियाँ मैंने बनाई हैं, इन्हीं सबके रूप में मैं सदा यहीं स्थित रहूँगा।
श्लोक 29 (skanda.6.276.29)
आद्या तु मम या मूर्तिः सा कैलासं समाश्रिता संतिष्ठति सदैवात्र कैलासे पर्वतोत्तमे
ādyā tu mama yā mūrtiḥ sā kailāsaṁ samāśritā saṁtiṣṭhati sadaivātra kailāse parvatottame
मेरी जो प्रथम मूर्ति है, वह कैलास का आश्रय लेकर, इस उत्तम पर्वत कैलास पर सदा स्थित रहती है।
श्लोक 30 (skanda.6.276.30)
एतास्तु मूर्तयोऽस्माकं स्थास्यंत्यत्रैव सर्वदा सर्वेषामेव लोकानां हिताय द्विजसत्तमाः
etāstu mūrtayo'smākaṁ sthāsyaṁtyatraiva sarvadā sarveṣāmeva lokānāṁ hitāya dvijasattamāḥ
हे द्विजसत्तमो, हमारी ये (शेष) मूर्तियाँ यहीं सदा समस्त लोकों के हित हेतु स्थित रहेंगी।
श्लोक 31 (skanda.6.276.31)
नामभिश्च क्रमेणैव युष्मदीयैः स्वयं द्विजाः विश्वामित्रह्रदे स्नात्वा एता मूर्तीर्ममात्र वै पूजयिष्यंति ये मर्त्यास्ते यास्यंति परां गतिम्
nāmabhiśca krameṇaiva yuṣmadīyaiḥ svayaṁ dvijāḥ viśvāmitrahrade snātvā etā mūrtīrmamātra vai pūjayiṣyaṁti ye martyāste yāsyaṁti parāṁ gatim
हे द्विजो, तुम्हारे ही नामों से क्रमशः — विश्वामित्र-ह्रद में स्नान कर जो भी मनुष्य यहाँ मेरी इन मूर्तियों की पूजा करेंगे, वे परम गति को प्राप्त होंगे।
श्लोक 32 (skanda.6.276.32)
किं वाचा बहुनोक्तेन भूयोभूयो द्विजोत्तमाः या तासां क्रियते पूजा एकादशगुणा भवेत्
kiṁ vācā bahunoktena bhūyobhūyo dvijottamāḥ yā tāsāṁ kriyate pūjā ekādaśaguṇā bhavet
हे द्विजोत्तमो, बहुत कहने से क्या लाभ? इनकी जो भी पूजा की जाएगी, वह ग्यारहगुणी फलदायी होगी।
श्लोक 33 (skanda.6.276.33)
एवमुक्त्वा त्रिनेत्रस्तु तत्रैवादर्शनं गतः तेऽपि तत्राश्रमं कृत्वा श्रद्धया परया युताः मूर्तीश्च ताः समाराध्य संप्राप्ताः परमं पदम्
evamuktvā trinetrastu tatraivādarśanaṁ gataḥ te'pi tatrāśramaṁ kṛtvā śraddhayā parayā yutāḥ mūrtīśca tāḥ samārādhya saṁprāptāḥ paramaṁ padam
ऐसा कहकर त्रिनेत्र देव वहीं से अंतर्धान हो गए। वे तापस भी वहाँ आश्रम बनाकर, परम श्रद्धा से युक्त होकर उन मूर्तियों की आराधना कर परम पद को प्राप्त हुए।
श्लोक 34 (skanda.6.276.34)
अन्योऽपि यः पुमांस्ताश्च आराधयति श्रद्धया स याति परमं स्थानं यत्र देवो महेश्वरः
anyo'pi yaḥ pumāṁstāśca ārādhayati śraddhayā sa yāti paramaṁ sthānaṁ yatra devo maheśvaraḥ
जो कोई अन्य मनुष्य भी श्रद्धापूर्वक उन मूर्तियों की आराधना करता है, वह उस परम स्थान को प्राप्त होता है जहाँ देव महेश्वर विराजते हैं।
श्लोक 35 (skanda.6.276.35)
ततः प्रभृति ते जाता रुद्रा एकादशैव तु संख्यया देवदेवस्य महेश्वरवपुर्धराः
tataḥ prabhṛti te jātā rudrā ekādaśaiva tu saṁkhyayā devadevasya maheśvaravapurdharāḥ
तब से वे संख्या में ग्यारह रुद्र, देवदेव महेश्वर का ही स्वरूप धारण किए हुए, प्रसिद्ध हुए।
श्लोक 36 (skanda.6.276.36)
तेजोत्तमास्ते संयुक्तास्त्रिनेत्राः शूलपाणयः एतद्वः सर्वमाख्यातं यत्पृष्टोऽस्मि द्विजोत्तमाः
tejottamāste saṁyuktāstrinetrāḥ śūlapāṇayaḥ etadvaḥ sarvamākhyātaṁ yatpṛṣṭo'smi dvijottamāḥ
हे द्विजोत्तमो, वे परम तेजस्वी, त्रिनेत्र, शूलपाणि हैं — जो तुमने पूछा था, वह सब मैंने तुम्हें बता दिया।
श्लोक 37 (skanda.6.276.37)
एकादशप्रकारस्तु यथा जातो महेश्वरः चैत्रे मासि सिते पक्षे चतुर्दश्यां दिने स्थिते
ekādaśaprakārastu yathā jāto maheśvaraḥ caitre māsi site pakṣe caturdaśyāṁ dine sthite
जैसे महेश्वर ग्यारह-रूप में उत्पन्न हुए, वैसे ही चैत्र मास के शुक्लपक्ष की चतुर्दशी को स्थित होकर...
श्लोक 38 (skanda.6.276.38)
यस्तान्पूजयते भक्त्या स याति परमां गतिम् अधनो धनमाप्नोति ह्यपुत्रः पुत्रवान्भवेत्
yastānpūjayate bhaktyā sa yāti paramāṁ gatim adhano dhanamāpnoti hyaputraḥ putravānbhavet
...जो कोई भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है; निर्धन धन प्राप्त करता है, निःसंतान पुत्रवान बनता है।
श्लोक 39 (skanda.6.276.39)
सरोगो रोगमुक्तस्तु पराभूतो रिपुक्षयम् तत्समाराधनादेव कामानंत्यमवाप्नुयात्
sarogo rogamuktastu parābhūto ripukṣayam tatsamārādhanādeva kāmānaṁtyamavāpnuyāt
रोगी रोगमुक्त हो जाता है, पराजित शत्रु का नाश कर देता है; इसी आराधना से मनुष्य अपनी अनंत कामनाएँ पूर्ण कर लेता है।
श्लोक 40 (skanda.6.276.40)
यः पुनः शिवदीक्षाढ्यो भस्मस्नानपरायणः तत्समाराधनं कुर्याच्छृणु तस्यापि यत्फलम्
yaḥ punaḥ śivadīkṣāḍhyo bhasmasnānaparāyaṇaḥ tatsamārādhanaṁ kuryācchṛṇu tasyāpi yatphalam
और जो शिवदीक्षा से युक्त, भस्म-स्नान में तत्पर होकर उनकी आराधना करता है, उसका भी फल सुनो।
श्लोक 41 (skanda.6.276.41)
यदन्यः प्राप्नुयान्मर्त्यस्तत्पूजासंभवं फलम् षडक्षरेण मंत्रेण पुष्पेणैकेन तत्फलम्
yadanyaḥ prāpnuyānmartyastatpūjāsaṁbhavaṁ phalam ṣaḍakṣareṇa maṁtreṇa puṣpeṇaikena tatphalam
साधारण मनुष्य को जो फल उस पूजा से मिलता है, वही फल षडक्षर मंत्र से केवल एक पुष्प अर्पित करने से प्राप्त हो जाता है।
श्लोक 42 (skanda.6.276.42)
शिवदीक्षाधरो यस्तु शतघ्नं लभते फलम् तस्माच्छतघ्नमाप्नोति शैवात्पाशुपतश्च यः तस्मात्कालमुखो यश्च महाव्रतधरश्च यः
śivadīkṣādharo yastu śataghnaṁ labhate phalam tasmācchataghnamāpnoti śaivātpāśupataśca yaḥ tasmātkālamukho yaśca mahāvratadharaśca yaḥ
शिवदीक्षाधारी को शतगुणा फल प्राप्त होता है; उससे भी शतगुणा शैव से पाशुपत को प्राप्त होता है; उससे भी अधिक कालमुख को, तथा उससे भी अधिक महाव्रतधारी को।
श्लोक 43 (skanda.6.276.43)
मूर्तीर्यास्ताश्च ये भक्त्या विनताः पूजयंति च सर्वेषामेव तेषां तु फलं शतगुणं भवेत्
mūrtīryāstāśca ye bhaktyā vinatāḥ pūjayaṁti ca sarveṣāmeva teṣāṁ tu phalaṁ śataguṇaṁ bhavet
तथा जो भी भक्तिपूर्वक झुककर उन मूर्तियों की पूजा करते हैं, उन सबका फल शतगुणा हो जाता है।