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नागर खण्ड · अध्याय 275

निम्बेश्वर एवं शाकंभरी की उत्पत्ति की महिमा

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श्लोक 1 (skanda.6.275.1)

सूत उवाच दुःशीलोऽपि च तत्कृत्वा गुरोर्नाम्ना शिवालयम् निम्बेश्वर इति ख्यातं दक्षिणां दिशमाश्रितम्

sūta uvāca duḥśīlo'pi ca tatkṛtvā gurornāmnā śivālayam nimbeśvara iti khyātaṁ dakṣiṇāṁ diśamāśritam

सूत जी ने कहा — दुःशील ने भी अपने गुरु के नाम पर वह शिवालय बनवाकर, जो निम्बेश्वर नाम से प्रसिद्ध हुआ, दक्षिण दिशा में स्थित...

श्लोक 2 (skanda.6.275.2)

चकार परया भक्त्या तत्पादाब्जमनुस्मरन् तथा तस्य तु भार्या या नाम्ना शाकंभरी स्मृता

cakāra parayā bhaktyā tatpādābjamanusmaran tathā tasya tu bhāryā yā nāmnā śākaṁbharī smṛtā

...गुरु के चरणकमलों का स्मरण करते हुए परम भक्तिपूर्वक उसकी सेवा की। तथा उसकी पत्नी, जो शाकंभरी नाम से स्मृत है...

श्लोक 3 (skanda.6.275.3)

स्वनामांका तत्र दुर्गा तथा संस्थापिता तया ततस्तु तद्धनं ताभ्यां किचिच्छेषं व्यवस्थितम्

svanāmāṁkā tatra durgā tathā saṁsthāpitā tayā tatastu taddhanaṁ tābhyāṁ kiciccheṣaṁ vyavasthitam

...उसने वहाँ अपने ही नाम से अंकित दुर्गा की स्थापना की। तत्पश्चात उन दोनों के पास जो धन शेष रह गया था...

श्लोक 4 (skanda.6.275.4)

पूजार्थं देवताभ्यां च ब्राह्मणेभ्यः समर्पितम् भिक्षाभुजौ ततो जातौ दम्पती तौ ततः परम्

pūjārthaṁ devatābhyāṁ ca brāhmaṇebhyaḥ samarpitam bhikṣābhujau tato jātau dampatī tau tataḥ param

...वह दोनों देवताओं की पूजा हेतु तथा ब्राह्मणों को समर्पित कर दिया गया; तत्पश्चात वह दंपती केवल भिक्षा पर निर्वाह करने लगे।

श्लोक 5 (skanda.6.275.5)

कस्यचित्त्वथ कालस्य दुःशीलो निधनं गतः

kasyacittvatha kālasya duḥśīlo nidhanaṁ gataḥ

कुछ समय बाद दुःशील की मृत्यु हो गई।

श्लोक 6 (skanda.6.275.6)

शाकंभर्यपि तत्कायं गृहीत्वा हव्यवाहनम् प्रविष्टा नृपशार्दूल निर्विकल्पेन चेतसा

śākaṁbharyapi tatkāyaṁ gṛhītvā havyavāhanam praviṣṭā nṛpaśārdūla nirvikalpena cetasā

हे नृपशार्दूल, शाकंभरी ने भी उसका शरीर लेकर, निर्विकल्प चित्त से अग्नि में प्रवेश किया।

श्लोक 7 (skanda.6.275.7)

ततो विमानमारुह्य वराप्सरःसुसेवितम् गतौ तौ द्वावपि स्वर्गं संप्रहृष्टतनूरुहौ

tato vimānamāruhya varāpsaraḥsusevitam gatau tau dvāvapi svargaṁ saṁprahṛṣṭatanūruhau

तत्पश्चात उत्तम अप्सराओं से सुसेवित विमान पर आरूढ़ होकर, हर्षित रोमांच सहित वे दोनों स्वर्ग को चले गए।

श्लोक 8 (skanda.6.275.8)

एतं दुःशीलजं यस्तु पठेदाख्यानमुत्तमम् स सर्वैर्मुच्यते पापैरज्ञानविहितैर्नृप

etaṁ duḥśīlajaṁ yastu paṭhedākhyānamuttamam sa sarvairmucyate pāpairajñānavihitairnṛpa

हे नृप, जो कोई भी दुःशील से उत्पन्न इस उत्तम आख्यान को पढ़ता है, वह अज्ञानवश किए गए समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

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