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नागर खण्ड · अध्याय 274

दुर्वासा-स्थापित शिवलिंग का दुःशीलेश्वर नाम प्राप्ति का वृत्तांत

अध्याय 273अध्याय-सूचीअध्याय 275

श्लोक 1 (skanda.6.274.1)

सूत उवाच तथान्यदपि तत्रास्ति दुर्वासःस्थापितं पुरा तल्लिंगं देवदेवस्य त्रिनेत्रस्य महात्मनः

sūta uvāca tathānyadapi tatrāsti durvāsaḥsthāpitaṁ purā talliṁgaṁ devadevasya trinetrasya mahātmanaḥ

सूत जी ने कहा — वहाँ एक और लिंग है, जो पूर्वकाल में दुर्वासा द्वारा स्थापित किया गया — महात्मा त्रिनेत्र देवदेव का वह लिंग।

श्लोक 2 (skanda.6.274.2)

चैत्रमासि नरो यस्तु तमाराधयते द्विजाः नृत्यगीतप्रवाद्यैश्च त्रिकालं विहितक्षणः स नूनं तत्प्रसादेन गन्धर्वाधिपतिर्भवेत् १

caitramāsi naro yastu tamārādhayate dvijāḥ nṛtyagītapravādyaiśca trikālaṁ vihitakṣaṇaḥ sa nūnaṁ tatprasādena gandharvādhipatirbhavet 1

हे द्विजो, जो मनुष्य चैत्र मास में उनकी नृत्य-गीत-वाद्य सहित त्रिकाल, नियत समय पर आराधना करता है, वह निश्चय ही उनकी कृपा से गंधर्वों का अधिपति बनता है।

श्लोक 3 (skanda.6.274.3)

ऋषय ऊचुः दुर्वासा नामकश्चायं केनायं स्थापितो हरः कस्मिन्काले महाभाग सर्वं नो विस्तराद्वद

ṛṣaya ūcuḥ durvāsā nāmakaścāyaṁ kenāyaṁ sthāpito haraḥ kasminkāle mahābhāga sarvaṁ no vistarādvada

ऋषियों ने कहा — यह दुर्वासा नामक कौन हैं, जिनके द्वारा यह हर स्थापित हुए, तथा किस काल में? हे महाभाग, यह सब विस्तार से बताइए।

श्लोक 4 (skanda.6.274.4)

सूत उवाच आसीत्पुरा निंबशुचो वैदिशे च पुरोत्तमे

sūta uvāca āsītpurā niṁbaśuco vaidiśe ca purottame

सूत जी ने कहा — पूर्वकाल में श्रेष्ठ वैदिश नगर में निंबशुच नामक व्यक्ति रहते थे।

श्लोक 5 (skanda.6.274.5)

स च पूजयते लिंगं किंचिन्मठपतिः स्थितः स यत्किंचिदवाप्नोति वस्त्राद्यं च तथा परम्

sa ca pūjayate liṁgaṁ kiṁcinmaṭhapatiḥ sthitaḥ sa yatkiṁcidavāpnoti vastrādyaṁ ca tathā param

वे एक मठाधिपति के रूप में स्थित होकर एक लिंग की पूजा करते थे; जो कुछ भी उन्हें वस्त्र आदि प्राप्त होता...

श्लोक 6 (skanda.6.274.6)

माहेश्वरस्य लोकस्य विक्रीणीते ततस्ततः ततो गृह्णाति नित्यं स हेम मूल्येन तस्य च

māheśvarasya lokasya vikrīṇīte tatastataḥ tato gṛhṇāti nityaṁ sa hema mūlyena tasya ca

...माहेश्वर भक्तों की ओर से, उसे वे इधर-उधर बेचकर उसके बदले सदा सुवर्ण ग्रहण करते थे।

श्लोक 7 (skanda.6.274.7)

न करोति व्ययं तस्य केवलं संचये रतः ततः कालेन महता मंजूषाऽस्य निरर्गला जाता हेममयी विप्राः कार्पण्यनिरतस्य च

na karoti vyayaṁ tasya kevalaṁ saṁcaye rataḥ tataḥ kālena mahatā maṁjūṣā'sya nirargalā jātā hemamayī viprāḥ kārpaṇyaniratasya ca

वे उसे कभी खर्च नहीं करते थे, केवल संचय में लीन रहते थे; तब हे विप्रो, दीर्घकाल पश्चात उस कृपण व्यक्ति की एक विशाल स्वर्णमय पेटी भर गई।

श्लोक 8 (skanda.6.274.8)

अथ संस्थाप्य भूमध्ये मंजूषां तां प्रपूरिताम् करोति व्यवहारं स कक्षां तां नैव मुंचति

atha saṁsthāpya bhūmadhye maṁjūṣāṁ tāṁ prapūritām karoti vyavahāraṁ sa kakṣāṁ tāṁ naiva muṁcati

तब उस भरी हुई पेटी को भूमि के भीतर स्थापित कर वे व्यवहार करते, किन्तु उस कक्ष को कभी नहीं छोड़ते थे।

श्लोक 9 (skanda.6.274.9)

कदाचिद्देवपूजायां सोऽपि ब्राह्मणसत्तमाः विश्वासं नैव निर्याति कस्यचिच्च कथंचन

kadāciddevapūjāyāṁ so'pi brāhmaṇasattamāḥ viśvāsaṁ naiva niryāti kasyacicca kathaṁcana

हे ब्राह्मणसत्तमो, देवपूजा के समय भी वे कभी किसी पर पूर्ण विश्वास नहीं करते थे और कभी दृष्टि से ओझल नहीं होते थे।

श्लोक 10 (skanda.6.274.10)

कस्यचित्त्वथ कालस्य परवित्तापहारकः अलक्षद्ब्राह्मणस्तच्च दुःशीलाख्यो व्यचिंतयत्

kasyacittvatha kālasya paravittāpahārakaḥ alakṣadbrāhmaṇastacca duḥśīlākhyo vyaciṁtayat

कुछ समय बाद, दूसरों का धन हरने वाला दुःशील नामक एक ब्राह्मण ने यह देखकर सोचा।

श्लोक 11 (skanda.6.274.11)

ततः शिष्यो भविष्यामि विश्वासार्थं दुरात्मनः सुदीनैः कृपणैर्वाक्यैश्चाटुकारैः पृथग्विधैः

tataḥ śiṣyo bhaviṣyāmi viśvāsārthaṁ durātmanaḥ sudīnaiḥ kṛpaṇairvākyaiścāṭukāraiḥ pṛthagvidhaiḥ

'मैं इस दुष्टात्मा का विश्वास जीतने हेतु उसका शिष्य बन जाऊँगा, अत्यंत दीन, दयनीय तथा विविध चाटुकारी वचनों से।'

श्लोक 12 (skanda.6.274.12)

आलस्यं च दिवानक्तं साधयिष्याम्यसंशयम् अन्यस्मिन्नहनि प्राप्ते दृष्ट्वा तं मठमध्यगम्

ālasyaṁ ca divānaktaṁ sādhayiṣyāmyasaṁśayam anyasminnahani prāpte dṛṣṭvā taṁ maṭhamadhyagam

'दिन-रात यह छल निःसंदेह मैं सिद्ध कर लूँगा।' एक अन्य दिन उसे मठ के मध्य बैठा देखकर...

श्लोक 13 (skanda.6.274.13)

ततः समीपमगमद्दंडाकारं प्रणम्य च अब्रवीत्प्रांजलिर्भूत्वा विनयावनतः स्थितः

tataḥ samīpamagamaddaṁḍākāraṁ praṇamya ca abravītprāṁjalirbhūtvā vinayāvanataḥ sthitaḥ

...वह उसके समीप गया, दंड के समान लेटकर प्रणाम किया, फिर हाथ जोड़कर विनयपूर्वक झुककर बोला।

श्लोक 14 (skanda.6.274.14)

भगवंस्ते प्रभावोऽद्य तपसा वै मया श्रुतः

bhagavaṁste prabhāvo'dya tapasā vai mayā śrutaḥ

'हे भगवन्, आज मैंने आपके तप के प्रभाव को सुना है।'

श्लोक 15 (skanda.6.274.15)

यदन्यस्तापसो नास्ति ईदृशोऽत्र धरातले तेनाहं दूरतः प्राप्तो वैराग्येण समन्वितः

yadanyastāpaso nāsti īdṛśo'tra dharātale tenāhaṁ dūrataḥ prāpto vairāgyeṇa samanvitaḥ

'चूँकि इस पृथ्वीतल पर आपके समान अन्य कोई तपस्वी नहीं है, इसीलिए वैराग्ययुक्त होकर मैं दूर से यहाँ आया हूँ।'

श्लोक 16 (skanda.6.274.16)

संसारासारतां ज्ञात्वा जन्ममृत्युजरात्मिकाम् अर्थात्स्वप्नप्रतीकाशं यौवनं च नृणा मिह

saṁsārāsāratāṁ jñātvā janmamṛtyujarātmikām arthātsvapnapratīkāśaṁ yauvanaṁ ca nṛṇā miha

'संसार की असारता जानकर, जो जन्म-मृत्यु-जरामय है, तथा यह भी जानकर कि मनुष्यों का यौवन यहाँ वस्तुतः स्वप्न-सदृश है...'

श्लोक 17 (skanda.6.274.17)

यद्वत्पर्वतसंजाता नदी च क्षणभंगुरा पुत्राः कलत्राणि च वा ये चान्ये बांधवादयः

yadvatparvatasaṁjātā nadī ca kṣaṇabhaṁgurā putrāḥ kalatrāṇi ca vā ye cānye bāṁdhavādayaḥ

'...जैसे पर्वत से उत्पन्न नदी क्षणभंगुर होती है, वैसे ही पुत्र, पत्नी तथा अन्य बांधव भी...'

श्लोक 18 (skanda.6.274.18)

ते सर्वे च परिज्ञेया यथा पाप समागमाः तत्संसारसमुद्रस्य तारणार्थं ब्रवीहि मे

te sarve ca parijñeyā yathā pāpa samāgamāḥ tatsaṁsārasamudrasya tāraṇārthaṁ bravīhi me

'...ये सब पापमय संगति के समान ही जानने योग्य हैं — इस संसार-सागर से तरने हेतु मुझे बताइए...'

श्लोक 19 (skanda.6.274.19)

उपायं कंचिदद्यैव उपदेशे व्यवस्थितम् तरामि येन संसारं प्रसादात्तव सुव्रत

upāyaṁ kaṁcidadyaiva upadeśe vyavasthitam tarāmi yena saṁsāraṁ prasādāttava suvrata

'...कोई ऐसा उपाय, उपदेश में स्थित, आज ही, जिससे हे सुव्रत, आपकी कृपा से मैं संसार को तर जाऊँ।'

श्लोक 20 (skanda.6.274.20)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा रोमांचित तनूरुहः ज्ञात्वा माहेश्वरः कोऽयं चिंतावान्समुपस्थितः

tasya tadvacanaṁ śrutvā romāṁcita tanūruhaḥ jñātvā māheśvaraḥ ko'yaṁ ciṁtāvānsamupasthitaḥ

उसके वचन सुनकर, शरीर के रोमांचित होने पर, 'यह कैसा माहेश्वर भक्त है' यह सोचकर वे उसकी चिंता में पड़ गए।

श्लोक 21 (skanda.6.274.21)

यथा ब्रवीषि धन्योऽसि यस्य ते मतिरीदृशी तारुण्ये वर्तमानस्य सुकुमारस्य चैव हि

yathā bravīṣi dhanyo'si yasya te matirīdṛśī tāruṇye vartamānasya sukumārasya caiva hi

'जैसा तुम कहते हो, तुम धन्य हो, जिसकी ऐसी बुद्धि है — यौवन में स्थित, अत्यंत सुकुमार होते हुए भी।'

श्लोक 22 (skanda.6.274.22)

तारुण्ये वर्तमानो यः शांतः सोऽत्र निगद्यते धातुषु क्षीयमाणेषु शमः कस्य न जायते

tāruṇye vartamāno yaḥ śāṁtaḥ so'tra nigadyate dhātuṣu kṣīyamāṇeṣu śamaḥ kasya na jāyate

'यौवन में रहते हुए भी जो शांत है, वही यहाँ प्रशंसनीय कहा जाता है; धातुओं के क्षीण होने पर तो शांति किसे नहीं होती?'

श्लोक 23 (skanda.6.274.23)

यद्येवं सुविरक्तिः स्यात्संसारोपरि संस्थिता समाराधय देवेशं शंकरं शशिशेखरम्

yadyevaṁ suviraktiḥ syātsaṁsāropari saṁsthitā samārādhaya deveśaṁ śaṁkaraṁ śaśiśekharam

'यदि ऐसा ही सुदृढ़ वैराग्य तुम्हारे संसार से ऊपर स्थित है, तो देवेश शंकर, शशिशेखर की आराधना करो।'

श्लोक 24 (skanda.6.274.24)

नान्यथा घोरजाप्येन तीर्यते भवसागरः मया सम्यक्परिज्ञातमेतच्छास्त्रसमागमात्

nānyathā ghorajāpyena tīryate bhavasāgaraḥ mayā samyakparijñātametacchāstrasamāgamāt

'अन्यथा किसी घोर जप से भी भवसागर पार नहीं होता। मैंने शास्त्रों के अध्ययन से इसे भलीभाँति जान लिया है।'

श्लोक 25 (skanda.6.274.25)

शूद्रो वा यदि वा विप्रो म्लेछो वा पापकृन्नरः शिवदीक्षासमोपेतः पुष्पमेकं तु यो न्यसैत्

śūdro vā yadi vā vipro mlecho vā pāpakṛnnaraḥ śivadīkṣāsamopetaḥ puṣpamekaṁ tu yo nyasait

'चाहे शूद्र हो, चाहे विप्र, चाहे म्लेच्छ, चाहे पापी मनुष्य — शिवदीक्षा से युक्त होकर जो भी एक पुष्प भी अर्पित करता है...'

श्लोक 26 (skanda.6.274.26)

षडक्षरेण मंत्रेण लिंगस्योपरि भक्तितः स तां गतिमवाप्नोति यांयां यांतीह यज्विनः

ṣaḍakṣareṇa maṁtreṇa liṁgasyopari bhaktitaḥ sa tāṁ gatimavāpnoti yāṁyāṁ yāṁtīha yajvinaḥ

'...षडक्षर मंत्र से भक्तिपूर्वक लिंग के ऊपर, वह वही गति प्राप्त करता है जो यहाँ यज्ञ करने वाले प्राप्त करते हैं।'

श्लोक 27 (skanda.6.274.27)

यो ददाति प्रभक्त्या च शिवदीक्षान्विताय च वस्त्रोपानहकौपीनं स यज्ञैः किं करिष्यति

yo dadāti prabhaktyā ca śivadīkṣānvitāya ca vastropānahakaupīnaṁ sa yajñaiḥ kiṁ kariṣyati

'जो भी शिवदीक्षा-युक्त व्यक्ति को भक्तिपूर्वक वस्त्र, जूते तथा कौपीन देता है, उसे यज्ञों से क्या प्रयोजन?'

श्लोक 28 (skanda.6.274.28)

तच्छ्रुत्वा चरणौ तस्य दुःशीलोऽसौ तदाऽऽददे विन्यस्य स्वशिर स्ताभ्यां ततोवाक्यमुवाच ह

tacchrutvā caraṇau tasya duḥśīlo'sau tadā''dade vinyasya svaśira stābhyāṁ tatovākyamuvāca ha

यह सुनकर दुःशील ने उसी समय उनके चरण पकड़ लिए, उन पर अपना सिर रखकर तत्पश्चात यह वचन कहा।

श्लोक 29 (skanda.6.274.29)

शिवदीक्षाप्रमाणेन प्रसादं कुरु मे प्रभो शुश्रूषां येन ते नित्यं प्रकरोमि समाहितः

śivadīkṣāpramāṇena prasādaṁ kuru me prabho śuśrūṣāṁ yena te nityaṁ prakaromi samāhitaḥ

'हे प्रभो, शिवदीक्षा-विधि से मुझ पर कृपा कीजिए, जिससे मैं सदा एकाग्रचित्त होकर आपकी सेवा करूँ।'

श्लोक 30 (skanda.6.274.30)

ततोऽसौ तापसो विप्राश्चिंतयामास चेतमि दक्षोऽयं दृश्यते कोऽपि पुमांश्चैव समागतः

tato'sau tāpaso viprāściṁtayāmāsa cetami dakṣo'yaṁ dṛśyate ko'pi pumāṁścaiva samāgataḥ

हे विप्रो, तब उस तापस ने मन में सोचा — यह कोई दक्ष पुरुष आया हुआ प्रतीत होता है।

श्लोक 31 (skanda.6.274.31)

ममास्ति नापरः शिष्यस्तस्मादेनं करोम्यहम् ततोऽब्रवीत्करे गृह्य यद्येवं वत्स मे समम् समयं कुरु येन त्वां दीक्षयाम्यद्य चैव हि

mamāsti nāparaḥ śiṣyastasmādenaṁ karomyaham tato'bravītkare gṛhya yadyevaṁ vatsa me samam samayaṁ kuru yena tvāṁ dīkṣayāmyadya caiva hi

'मेरा कोई अन्य शिष्य नहीं है, अतः इसी को बना लेता हूँ।' तब उसका हाथ पकड़कर बोले — 'यदि ऐसा है, हे वत्स, तो मुझसे यह समझौता करो, जिससे आज ही तुम्हें दीक्षा दूँ।'

श्लोक 32 (skanda.6.274.32)

त्वया कुटीरकं कार्यं मठस्यास्य विदूरतः प्रवेशो नैव कार्यस्तु ममात्रास्तं गते रवौ

tvayā kuṭīrakaṁ kāryaṁ maṭhasyāsya vidūrataḥ praveśo naiva kāryastu mamātrāstaṁ gate ravau

'तुम्हें इस मठ से कुछ दूर एक कुटिया बनानी होगी; सूर्यास्त के पश्चात मेरे न रहने पर तुम्हें कभी भी अंदर प्रवेश नहीं करना है।'

श्लोक 33 (skanda.6.274.33)

दुःशील उवाच तवादेशः प्रमाणं मे केवलं तापसोत्तम किं मठेन करिष्यामि विशेषाद्रा त्रिसंगमे

duḥśīla uvāca tavādeśaḥ pramāṇaṁ me kevalaṁ tāpasottama kiṁ maṭhena kariṣyāmi viśeṣādrā trisaṁgame

दुःशील ने कहा — हे तापसोत्तम, आपका आदेश ही मेरे लिए प्रमाण है; रात्रि-संगम के समय विशेष रूप से मुझे मठ से क्या प्रयोजन?

श्लोक 34 (skanda.6.274.34)

यः शिष्यो गुरुवाक्यं तु न करोति यथोदितम् तस्य व्रतं च तद्व्यर्थं नरकं च ततः परम्

yaḥ śiṣyo guruvākyaṁ tu na karoti yathoditam tasya vrataṁ ca tadvyarthaṁ narakaṁ ca tataḥ param

'जो शिष्य गुरु के वचन के अनुसार आचरण नहीं करता, उसका व्रत व्यर्थ हो जाता है, तथा उसके पश्चात नरक प्राप्त होता है।'

श्लोक 35 (skanda.6.274.35)

तच्छ्रुत्वा तुष्टिमापन्नः शिवदीक्षां ततो ददौ तस्मै विनययुक्ताय तदा निंबशुचो मुनिः

tacchrutvā tuṣṭimāpannaḥ śivadīkṣāṁ tato dadau tasmai vinayayuktāya tadā niṁbaśuco muniḥ

यह सुनकर प्रसन्न होकर मुनि निंबशुच ने उस विनयी को शिवदीक्षा प्रदान की।

श्लोक 36 (skanda.6.274.36)

ततःप्रभृति सोऽतीव तस्य शुश्रूषणे रतः रंजयामास तच्चित्तं परिचर्यापरायणः

tataḥprabhṛti so'tīva tasya śuśrūṣaṇe rataḥ raṁjayāmāsa taccittaṁ paricaryāparāyaṇaḥ

तब से वह अत्यंत सेवा में लीन रहकर, परिचर्या में तत्पर होकर उसका मन प्रसन्न रखने लगा।

श्लोक 37 (skanda.6.274.37)

मनसा चिन्तयानस्तु तन्मात्रार्थं दिनेदिने न च्छिद्रं वीक्षते किंचिद्वीक्षमाणोऽपि यत्नतः

manasā cintayānastu tanmātrārthaṁ dinedine na cchidraṁ vīkṣate kiṁcidvīkṣamāṇo'pi yatnataḥ

किन्तु मन में प्रतिदिन उसी (छिपे धन) के विषय में सोचते हुए, प्रयत्नपूर्वक देखने पर भी उसे कोई छिद्र नहीं मिलता था।

श्लोक 38 (skanda.6.274.38)

शैवोऽपि च स कक्ष्यां तां तां मात्रां हेमसंभवाम् कथंचिन्मोक्षते भूमौ भोज्ये देवार्चनेऽपि न

śaivo'pi ca sa kakṣyāṁ tāṁ tāṁ mātrāṁ hemasaṁbhavām kathaṁcinmokṣate bhūmau bhojye devārcane'pi na

क्योंकि वह शैव तापस उस भूमिगत स्वर्ण-कक्ष को कभी नहीं छोड़ता था — भोजन के समय भी नहीं, देवपूजा के समय भी नहीं।

श्लोक 39 (skanda.6.274.39)

ततोऽसौ चिन्तयामास दुःशीलो निजचेतसि मठे तावत्प्रवेशोऽस्ति नैव रात्रौ कथंचन

tato'sau cintayāmāsa duḥśīlo nijacetasi maṭhe tāvatpraveśo'sti naiva rātrau kathaṁcana

तब दुःशील ने अपने मन में सोचा — मठ में रात्रि के समय प्रवेश तो किसी भी प्रकार संभव नहीं है।

श्लोक 40 (skanda.6.274.40)

सूर्यास्तमानवेलायां यत्प्रयच्छति तत्क्षणात् परिघं सुदृढं पापस्तत्करोमि च किं पुनः

sūryāstamānavelāyāṁ yatprayacchati tatkṣaṇāt parighaṁ sudṛḍhaṁ pāpastatkaromi ca kiṁ punaḥ

'सूर्यास्त के समय वह पापी जो सुदृढ़ अर्गला लगाता है, उसके रहते फिर मैं क्या कर सकता हूँ?'

श्लोक 41 (skanda.6.274.41)

मठोऽयं सुशिलाबद्धो नैव खातं प्रजायते तुंगत्वान्न प्रवेशः स्यादुपायैर्विविधैः परैः

maṭho'yaṁ suśilābaddho naiva khātaṁ prajāyate tuṁgatvānna praveśaḥ syādupāyairvividhaiḥ paraiḥ

'यह मठ सुदृढ़ शिलाओं से बना है, इसमें सुरंग भी नहीं खोदी जा सकती; ऊँचा होने के कारण अन्य किसी भी उपाय से प्रवेश संभव नहीं है।'

श्लोक 42 (skanda.6.274.42)

तत्किं विषं प्रयच्छामि शस्त्रैर्व्यापादयामि किम् दिवापि पशुमारेण पंचत्वं वा नयामि किम्

tatkiṁ viṣaṁ prayacchāmi śastrairvyāpādayāmi kim divāpi paśumāreṇa paṁcatvaṁ vā nayāmi kim

'तो क्या मैं उसे विष दूँ? शस्त्रों से उसका वध करूँ? या दिन में ही किसी पशु के समान मारकर उसे मृत्यु के मुख में भेज दूँ?'

श्लोक 43 (skanda.6.274.43)

एवं चिन्तयतस्तस्य प्रावृट्काल उपस्थितः श्रावणस्यासिते पक्षे कर्कटस्थे दिवाकरे

evaṁ cintayatastasya prāvṛṭkāla upasthitaḥ śrāvaṇasyāsite pakṣe karkaṭasthe divākare

इस प्रकार सोचते हुए उसे वर्षा ऋतु आ गई, श्रावण के कृष्णपक्ष में, जब सूर्य कर्क राशि में थे।

श्लोक 44 (skanda.6.274.44)

प्राप्तो महेश्वरस्तस्य कोऽपि तत्र धनी द्रुतम् तेनोक्तं प्रणिपत्योच्चैः करिष्यामि पवित्रकम्

prāpto maheśvarastasya ko'pi tatra dhanī drutam tenoktaṁ praṇipatyoccaiḥ kariṣyāmi pavitrakam

उस महात्मा तपस्वी के पास शीघ्रता से कोई धनी व्यक्ति आया; उसने उच्च स्वर में प्रणाम कर कहा — मैं एक पवित्र अनुष्ठान करना चाहता हूँ।

श्लोक 45 (skanda.6.274.45)

चतुर्द्दश्यामहं स्वामिन्यद्यादेशो भवेत्तव यद्यागच्छसि मे ग्रामं प्रसादेन सम न्वितः

caturddaśyāmahaṁ svāminyadyādeśo bhavettava yadyāgacchasi me grāmaṁ prasādena sama nvitaḥ

'हे स्वामिन्, चतुर्दशी को, यदि आपकी आज्ञा हो, तथा यदि आप कृपापूर्वक मेरे ग्राम पधारें...'

श्लोक 46 (skanda.6.274.46)

सूत उवाच तच्छ्रुत्वा तुष्टिमापन्नस्ततो निंबशुचो मुनिः तथेति चैवमुक्त्वा तं प्रेषयामास तत्क्षणात्

sūta uvāca tacchrutvā tuṣṭimāpannastato niṁbaśuco muniḥ tatheti caivamuktvā taṁ preṣayāmāsa tatkṣaṇāt

सूत जी ने कहा — यह सुनकर प्रसन्न होकर मुनि निंबशुच ने 'तथास्तु' कहकर उसी क्षण उसे विदा किया।

श्लोक 47 (skanda.6.274.47)

आगमिष्याम्यहं काले स्वशिष्येण समन्वितः करिष्यामि परं श्रेयस्तव वत्स न संशयः

āgamiṣyāmyahaṁ kāle svaśiṣyeṇa samanvitaḥ kariṣyāmi paraṁ śreyastava vatsa na saṁśayaḥ

'मैं अपने शिष्य सहित नियत समय पर आऊँगा; हे वत्स, निःसंदेह मैं तुम्हारा परम कल्याण करूँगा।'

श्लोक 48 (skanda.6.274.48)

अथ काले तु संप्राप्ते चिन्तयित्वा प्रभातिकम् प्रभातसमये प्राप्ते स शैवः प्रस्थितस्तदा दुःशीलेन समायुक्तः संप्रहृष्टतनूरुहः

atha kāle tu saṁprāpte cintayitvā prabhātikam prabhātasamaye prāpte sa śaivaḥ prasthitastadā duḥśīlena samāyuktaḥ saṁprahṛṣṭatanūruhaḥ

तब समय आने पर, प्रातःकालीन विधि की व्यवस्था कर, प्रातःकाल में वह शैव तापस, हर्षित रोमांच सहित दुःशील के साथ चल पड़ा।

श्लोक 49 (skanda.6.274.49)

ततो वै गच्छमानस्य तस्य मार्गे व्यवस्थिता पुण्या नदी सुविख्याता मुरला सागरंगमा

tato vai gacchamānasya tasya mārge vyavasthitā puṇyā nadī suvikhyātā muralā sāgaraṁgamā

तब मार्ग में जाते हुए उन्हें एक पवित्र, सुविख्यात, समुद्र में मिलने वाली मुरला नामक नदी मिली।

श्लोक 50 (skanda.6.274.50)

स तां दृष्ट्वाऽब्रवीद्वाक्यं वत्स शिष्य करोम्यहम् भवता सह देवार्चां मुरलायां स्थिरो भव

sa tāṁ dṛṣṭvā'bravīdvākyaṁ vatsa śiṣya karomyaham bhavatā saha devārcāṁ muralāyāṁ sthiro bhava

उसे देखकर उन्होंने कहा — 'वत्स शिष्य, मैं तुम्हारे साथ देव-पूजा करूँगा; मुरला के तट पर स्थिर हो जाओ।'

श्लोक 51 (skanda.6.274.51)

बाढमित्येव स प्रोक्त्वा संस्थितोऽस्यास्तटे शुभे सोऽपि निंबशुचस्तस्य रंजितः सर्वदा गुणैः

bāḍhamityeva sa proktvā saṁsthito'syāstaṭe śubhe so'pi niṁbaśucastasya raṁjitaḥ sarvadā guṇaiḥ

'बहुत अच्छा' ऐसा कहकर वह उसके शुभ तट पर स्थित हो गया; निंबशुच भी उसके गुणों से सदा प्रसन्न थे।

श्लोक 52 (skanda.6.274.52)

सुशिष्यं तं परिज्ञाय विश्वासं परमं गतः स्थगितां तां समादाय हेममात्रासमुद्भवाम्

suśiṣyaṁ taṁ parijñāya viśvāsaṁ paramaṁ gataḥ sthagitāṁ tāṁ samādāya hemamātrāsamudbhavām

उसे सुयोग्य शिष्य जानकर परम विश्वास को प्राप्त होकर, स्वर्ण-मात्रा से बनी वह ढकी हुई पोटली लेकर...

श्लोक 53 (skanda.6.274.53)

जागेश्वरसमोपेतां स कन्थां व्याक्षिपत्क्षितौ पुरीषोत्सर्गकार्येण ततस्तोकांतरं गतः

jāgeśvarasamopetāṁ sa kanthāṁ vyākṣipatkṣitau purīṣotsargakāryeṇa tatastokāṁtaraṁ gataḥ

...जागेश्वर के साथ उस कंथा (गुदड़ी) को उन्होंने भूमि पर बिछा दिया, फिर शौच हेतु कुछ दूर चले गए।

श्लोक 54 (skanda.6.274.54)

यावच्चादर्शनं प्राप्तो वेतसैः परिवारितः तावन्मात्रां समादाय दुःशीलः प्रस्थितो द्रुतम् उत्तरां दिशमाश्रित्य प्रहृष्टेनांतरात्मना

yāvaccādarśanaṁ prāpto vetasaiḥ parivāritaḥ tāvanmātrāṁ samādāya duḥśīlaḥ prasthito drutam uttarāṁ diśamāśritya prahṛṣṭenāṁtarātmanā

जैसे ही वे बेंत की झाड़ियों के मध्य ओझल हुए, वैसे ही दुःशील उस स्वर्ण-मात्रा को लेकर, प्रसन्नचित्त होकर तुरंत उत्तर दिशा की ओर चल पड़ा।

श्लोक 55 (skanda.6.274.55)

अथासौ चागतो यावद्दुःशीलं नैव पश्यति केवलं दृश्यते कन्था जागेश्वरसमन्विता

athāsau cāgato yāvadduḥśīlaṁ naiva paśyati kevalaṁ dṛśyate kanthā jāgeśvarasamanvitā

तब जब वे लौटकर आए, तो उन्हें दुःशील कहीं दिखाई नहीं दिया; केवल जागेश्वर सहित वह कंथा ही दिखाई दे रही थी।

श्लोक 56 (skanda.6.274.56)

ततः शीघ्रतरं शौचं किञ्चित्कृत्वा सुदुर्मनाः विनैवाचमनं प्राप्तः सा कन्था यत्र तिष्ठति

tataḥ śīghrataraṁ śaucaṁ kiñcitkṛtvā sudurmanāḥ vinaivācamanaṁ prāptaḥ sā kanthā yatra tiṣṭhati

तब अत्यंत दुखी मन से शीघ्रता से थोड़ा शौच-कर्म कर, बिना आचमन किए ही वे उस स्थान पर पहुँचे जहाँ कंथा रखी थी।

श्लोक 57 (skanda.6.274.57)

यावन्मात्राविहीनां च ततो ज्ञात्वा च तां हृताम् तेन शिष्येण मूर्च्छाढ्यो निपपात महीतले

yāvanmātrāvihīnāṁ ca tato jñātvā ca tāṁ hṛtām tena śiṣyeṇa mūrcchāḍhyo nipapāta mahītale

उसे स्वर्ण-मात्रा से रहित देखकर तथा यह जानकर कि वह उसी शिष्य द्वारा हरी गई है, वे मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़े।

श्लोक 58 (skanda.6.274.58)

ततश्च चेतनां प्राप्य कृच्छ्राच्चोत्थाय तत्क्षणात् शिलायां ताडयामास निजांगानि शिरस्तथा

tataśca cetanāṁ prāpya kṛcchrāccotthāya tatkṣaṇāt śilāyāṁ tāḍayāmāsa nijāṁgāni śirastathā

फिर चेतना पाकर, कठिनाई से उठकर उसी क्षण उन्होंने पत्थर पर अपने अंगों और सिर को पीटना आरंभ कर दिया।

श्लोक 59 (skanda.6.274.59)

हा हतोऽस्मि विनष्टोऽस्मि मुष्टस्तेन दुरात्मना किं करोमि क्व गच्छामि कथं तं वीक्षयाम्यहम्

hā hato'smi vinaṣṭo'smi muṣṭastena durātmanā kiṁ karomi kva gacchāmi kathaṁ taṁ vīkṣayāmyaham

'हाय, मैं मारा गया, नष्ट हो गया, उस दुष्टात्मा ने मुझे लूट लिया! अब क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, उसे फिर कैसे देख पाऊँगा?'

श्लोक 60 (skanda.6.274.60)

ततस्तु पदवीं वीक्ष्य तस्य तां चलितो ध्रुवम् वृद्ध भावात्परिश्रांतो वावृत्य स मठं गतः

tatastu padavīṁ vīkṣya tasya tāṁ calito dhruvam vṛddha bhāvātpariśrāṁto vāvṛtya sa maṭhaṁ gataḥ

तब उसके पदचिह्नों को देखकर वे चल पड़े, किन्तु वृद्धावस्था के कारण थककर, लौटकर मठ की ओर चले गए।

श्लोक 61 (skanda.6.274.61)

दुःशीलोऽपि समादाय मात्रां स्थानांतरं गतः ततस्तेन सुवर्णेन व्यवहारान्करोति सः

duḥśīlo'pi samādāya mātrāṁ sthānāṁtaraṁ gataḥ tatastena suvarṇena vyavahārānkaroti saḥ

दुःशील भी वह स्वर्ण-मात्रा लेकर किसी अन्य स्थान पर चला गया, तथा उस सुवर्ण से अपना व्यवहार चलाने लगा।

श्लोक 62 (skanda.6.274.62)

ततो गृहस्थतां प्राप्तः कृतदारपरिग्रहः वृद्धभावं समापन्नः संतानेन विवर्जितः

tato gṛhasthatāṁ prāptaḥ kṛtadāraparigrahaḥ vṛddhabhāvaṁ samāpannaḥ saṁtānena vivarjitaḥ

तत्पश्चात वह गृहस्थ बना, विवाह किया, वृद्धावस्था को प्राप्त हुआ, किन्तु संतान से रहित रहा।

श्लोक 63 (skanda.6.274.63)

कस्यचित्त्वथ कालस्य तीर्थयात्रापरायणः भार्यया सहितो विप्रश्चमत्कारपुरं गतः

kasyacittvatha kālasya tīrthayātrāparāyaṇaḥ bhāryayā sahito vipraścamatkārapuraṁ gataḥ

कुछ समय बाद, तीर्थयात्रा में तत्पर होकर, वह विप्र अपनी पत्नी सहित चमत्कारपुर गया।

श्लोक 64 (skanda.6.274.64)

स्नात्वा तीर्थेषु सर्वेषु देवतायतनेषु च भ्रममाणेन संदृष्टो दुर्वासा नाम सन्मुनिः

snātvā tīrtheṣu sarveṣu devatāyataneṣu ca bhramamāṇena saṁdṛṣṭo durvāsā nāma sanmuniḥ

समस्त तीर्थों तथा देवालयों में स्नान कर, घूमते हुए, उसने दुर्वासा नामक सज्जन मुनि को देखा।

श्लोक 65 (skanda.6.274.65)

निजदेवस्य सद्भक्त्या नृत्यगीतपरायणः तं च दृष्ट्वा नमस्कृत्य वाक्यमेतदुवाच सः

nijadevasya sadbhaktyā nṛtyagītaparāyaṇaḥ taṁ ca dṛṣṭvā namaskṛtya vākyametaduvāca saḥ

वे अपने इष्टदेव की सच्ची भक्ति से नृत्य-गीत में तल्लीन थे। उन्हें देखकर, नमस्कार कर, उसने यह वचन कहा।

श्लोक 66 (skanda.6.274.66)

केनैतत्स्थापितं लिंगं निर्मलं शंकरोद्भवम् किं त्वं नृत्यसि गीतं च पुरोऽस्य प्रकरोषि च मुनीनां युज्यते नैव यदेतत्तव चेष्टितम्

kenaitatsthāpitaṁ liṁgaṁ nirmalaṁ śaṁkarodbhavam kiṁ tvaṁ nṛtyasi gītaṁ ca puro'sya prakaroṣi ca munīnāṁ yujyate naiva yadetattava ceṣṭitam

'यह निर्मल, शंकर-उद्भव लिंग किसने स्थापित किया? आप इसके समक्ष नृत्य और गीत क्यों करते हैं? यह आचरण मुनियों के लिए उचित नहीं है।'

श्लोक 67 (skanda.6.274.67)

दुर्वासा उवाच मयैतत्स्थापितं लिंगं देवदेवस्य शूलिनः नृत्यगीतप्रियो यस्माद्देवदेवो महेश्वरः

durvāsā uvāca mayaitatsthāpitaṁ liṁgaṁ devadevasya śūlinaḥ nṛtyagītapriyo yasmāddevadevo maheśvaraḥ

दुर्वासा ने कहा — यह शूलधारी देवदेव का लिंग मैंने ही स्थापित किया है; चूँकि देवदेव महेश्वर नृत्य-गीत के प्रिय हैं...

श्लोक 68 (skanda.6.274.68)

न मेऽस्ति विभवः कश्चिद्येन भोगं करोम्यहम्

na me'sti vibhavaḥ kaścidyena bhogaṁ karomyaham

'...मेरे पास ऐसा कोई वैभव नहीं है जिससे मैं उन्हें अन्य भोग अर्पित कर सकूँ।'

श्लोक 69 (skanda.6.274.69)

एतस्मिन्नंतरे प्राप्तश्चिर्भटिर्नाम योगवित् तेन पृष्टः स दुर्वासा वेदांतिकमिदं वचः

etasminnaṁtare prāptaścirbhaṭirnāma yogavit tena pṛṣṭaḥ sa durvāsā vedāṁtikamidaṁ vacaḥ

इसी बीच चिर्भटि नामक एक योगवेत्ता वहाँ आ पहुँचे; उन्होंने दुर्वासा से यह वेदांतिक प्रश्न पूछा।

श्लोक 70 (skanda.6.274.70)

चिर्भटि असूर्या नाम ते लोका अंधेन तमसा वृताः तांस्ते प्रेत्याऽभिगच्छंति ये केचात्महनो जनाः

cirbhaṭi asūryā nāma te lokā aṁdhena tamasā vṛtāḥ tāṁste pretyā'bhigacchaṁti ye kecātmahano janāḥ

चिर्भटि ने कहा — 'अंधकार से घिरे सूर्यरहित लोक कहलाते हैं, जिन्हें मृत्यु के पश्चात वे लोग प्राप्त होते हैं जो आत्मघाती हैं।'

श्लोक 71 (skanda.6.274.71)

उपविश्य ततस्तेन तस्य दत्तस्तु निर्णयः दुःशीलेनापि तत्सर्व विज्ञातं तस्य संस्तुतम्

upaviśya tatastena tasya dattastu nirṇayaḥ duḥśīlenāpi tatsarva vijñātaṁ tasya saṁstutam

तब बैठकर उन्होंने (दुर्वासा ने) इस प्रश्न का समाधान दिया; दुःशील ने भी वह सब समझ लिया, जो कहा गया था।

श्लोक 72 (skanda.6.274.72)

ततो विशेषतो जाता भक्तिस्तस्य हरं प्रति तं प्रणम्य ततश्चोच्चैर्वाक्यमेतदुवाच ह

tato viśeṣato jātā bhaktistasya haraṁ prati taṁ praṇamya tataścoccairvākyametaduvāca ha

तब उसकी हर के प्रति भक्ति विशेष रूप से बढ़ गई; उन्हें प्रणाम कर उसने उच्च स्वर में यह वचन कहा।

श्लोक 73 (skanda.6.274.73)

भगवन् ब्राह्मणोऽस्मीति जात्या चैव न कर्मणा न कस्यचिन्मया दत्तं कदाचिन्नैव भोजनम् केवलं देवविप्राणां वंचयित्वा धनं हृतम् व्यसनेनाभिभूतेन द्यूतवेश्योद्भवेन च

bhagavan brāhmaṇo'smīti jātyā caiva na karmaṇā na kasyacinmayā dattaṁ kadācinnaiva bhojanam kevalaṁ devaviprāṇāṁ vaṁcayitvā dhanaṁ hṛtam vyasanenābhibhūtena dyūtaveśyodbhavena ca

'हे भगवन्, मैं जाति से ही ब्राह्मण हूँ, कर्म से नहीं; मैंने कभी किसी को एक भी भोजन नहीं कराया; मैंने केवल जुए और वेश्या-व्यसन से ग्रस्त होकर, धोखे से देवताओं और ब्राह्मणों का धन हरा है।'

श्लोक 74 (skanda.6.274.74)

तथा च ब्राह्मणेनापि मया शैवो गुरुः कृतः वंचितश्च तथानेकैश्चाटुभिर्विहृतं धनम्

tathā ca brāhmaṇenāpi mayā śaivo guruḥ kṛtaḥ vaṁcitaśca tathānekaiścāṭubhirvihṛtaṁ dhanam

'तथा मैंने ब्राह्मण होते हुए भी एक शैव तापस को अपना गुरु बनाकर उसे धोखा दिया, तथा अनेक चाटुकारी वचनों से उसका धन हर लिया।'

श्लोक 75 (skanda.6.274.75)

तस्य सक्तं धनं भूयः साधुमार्गेण चाहृतम् स चापि च गुरुर्मह्यं परलोकमिहागतः

tasya saktaṁ dhanaṁ bhūyaḥ sādhumārgeṇa cāhṛtam sa cāpi ca gururmahyaṁ paralokamihāgataḥ

'साधु-मार्ग से एकत्र किया गया उसका वह धन मैंने हर लिया; और वह मेरा गुरु अब परलोक को प्राप्त हो चुका है।'

श्लोक 76 (skanda.6.274.76)

पश्चात्तापेन तेनैव प्रदह्यामि दिवानिशम् पुरश्चरणदानेन तत्प्रसादं कुरुष्व मे

paścāttāpena tenaiva pradahyāmi divāniśam puraścaraṇadānena tatprasādaṁ kuruṣva me

'उसी पश्चाताप से मैं दिन-रात जलता रहता हूँ; किसी पुरश्चरण-दान से मुझ पर कृपा कीजिए।'

श्लोक 77 (skanda.6.274.77)

अस्ति मे विपुलं वित्तं न संतानं मुनीश्वर तन्मे वद मुने श्रेयस्तद्वित्तस्य यथा भवेत् इह लोके परे चैव येन सर्वं करोम्यहम्

asti me vipulaṁ vittaṁ na saṁtānaṁ munīśvara tanme vada mune śreyastadvittasya yathā bhavet iha loke pare caiva yena sarvaṁ karomyaham

'हे मुनीश्वर, मेरे पास विपुल धन है, किन्तु संतान नहीं; हे मुने, बताइए वह कल्याणकारी उपाय, जिससे उस धन का इस लोक और परलोक दोनों में सदुपयोग हो सके।'

श्लोक 78 (skanda.6.274.78)

दुर्वासा उवाच कृत्वा पापसहस्राणि पश्चाद्धर्मपरो भवेत् यः पुमान्सोऽतिकृच्छ्रेण तरेत्संसारसागरम्

durvāsā uvāca kṛtvā pāpasahasrāṇi paścāddharmaparo bhavet yaḥ pumānso'tikṛcchreṇa taretsaṁsārasāgaram

दुर्वासा ने कहा — जो पुरुष सहस्रों पाप करके पश्चात धर्मपरायण होता है, वह अत्यंत कठिनाई से ही संसार-सागर को तर पाता है।

श्लोक 79 (skanda.6.274.79)

दिनेनापि गुरुर्योऽसौ त्वया शैवो विनिर्मितः अधर्मेणापि संजातः स गुरुस्तेन संशयः

dinenāpi gururyo'sau tvayā śaivo vinirmitaḥ adharmeṇāpi saṁjātaḥ sa gurustena saṁśayaḥ

'तुमने जिस शैव गुरु को एक ही दिन में बना लिया, वह भी अधर्म से ही प्राप्त हुआ था, इसलिए उसके गुरुत्व में ही संशय है।'

श्लोक 80 (skanda.6.274.80)

ब्राह्मणो ब्रह्मचारी स्याद्ग्रहस्थस्तदनंतरम् वानप्रस्थो यतिश्चैव तत श्चैव कुटीचरः

brāhmaṇo brahmacārī syādgrahasthastadanaṁtaram vānaprastho yatiścaiva tata ścaiva kuṭīcaraḥ

'ब्राह्मण को पहले ब्रह्मचारी होना चाहिए, फिर गृहस्थ, फिर वानप्रस्थ, फिर यति, तथा उसके पश्चात कुटीचर।'

श्लोक 81 (skanda.6.274.81)

बहूदकस्ततो हंसः परमश्च ततो भवेत् ततश्च मुक्तिमायाति मार्गमेनं समाश्रितः

bahūdakastato haṁsaḥ paramaśca tato bhavet tataśca muktimāyāti mārgamenaṁ samāśritaḥ

'फिर बहूदक, फिर हंस, फिर परम — इसी मार्ग का आश्रय लेते हुए मुक्ति प्राप्त होती है।'

श्लोक 82 (skanda.6.274.82)

त्वया पुनः कुमार्गेण यद्व्रतं ब्राह्मणेन च शैवमार्गं समास्थाय तन्महापातकं कृतम्

tvayā punaḥ kumārgeṇa yadvrataṁ brāhmaṇena ca śaivamārgaṁ samāsthāya tanmahāpātakaṁ kṛtam

'किन्तु तुमने कुमार्ग से, ब्राह्मण होते हुए भी शैव-मार्ग अपनाकर वह व्रत लिया, यह एक महापातक है।'

श्लोक 83 (skanda.6.274.83)

दुःशील उवाच सर्वेष्वेव हि वेदेषु रुद्रः संकीर्त्यते प्रभुः तत्किं दोषस्त्वया प्रोक्तस्तस्य दीक्षासमुद्भवः

duḥśīla uvāca sarveṣveva hi vedeṣu rudraḥ saṁkīrtyate prabhuḥ tatkiṁ doṣastvayā proktastasya dīkṣāsamudbhavaḥ

दुःशील ने कहा — समस्त वेदों में ही रुद्र को प्रभु कहकर पुकारा गया है; फिर उनकी दीक्षा से उत्पन्न दोष आपने क्यों बताया?

श्लोक 84 (skanda.6.274.84)

दुर्वासा उवाच सत्यमेतत्त्वया ख्यातं वेदे रुद्रः प्रकीर्तितः बहुधा वासुदेवोऽपि ब्रह्मा चैव विशेषतः

durvāsā uvāca satyametattvayā khyātaṁ vede rudraḥ prakīrtitaḥ bahudhā vāsudevo'pi brahmā caiva viśeṣataḥ

दुर्वासा ने कहा — यह सत्य है जो तुमने कहा, वेद में रुद्र अनेक प्रकार से प्रकीर्तित हैं, तथा विशेष रूप से वासुदेव और ब्रह्मा भी।

श्लोक 85 (skanda.6.274.85)

परं विप्रस्य या दीक्षा व्रतवंधसमुद्भवा गायत्री परमा जाप्ये गुरुर्व्रतपरो हि सः वैष्णवीं चाथ शैवीं च योऽन्यां दीक्षां समाचरेत्

paraṁ viprasya yā dīkṣā vratavaṁdhasamudbhavā gāyatrī paramā jāpye gururvrataparo hi saḥ vaiṣṇavīṁ cātha śaivīṁ ca yo'nyāṁ dīkṣāṁ samācaret

'किन्तु ब्राह्मण की वास्तविक दीक्षा तो उपनयन-व्रत से उत्पन्न होती है, जिसका परम जप गायत्री है, और जिसका गुरु उसी व्रत में तत्पर होता है। जो कोई अन्य वैष्णवी या शैवी दीक्षा ग्रहण करता है...'

श्लोक 86 (skanda.6.274.86)

ब्राह्मणो न भवेत्सोऽत्र यद्यपि स्यात्षडंगवित् अपरं लिंगभेदस्ते संजातः कपटादिषु

brāhmaṇo na bhavetso'tra yadyapi syātṣaḍaṁgavit aparaṁ liṁgabhedaste saṁjātaḥ kapaṭādiṣu

'...वह यहाँ ब्राह्मण नहीं रह जाता, चाहे वह षडंग-वेत्ता ही क्यों न हो। इसके अतिरिक्त तुम्हारे छल आदि से तुम्हारे स्वरूप में भी भेद उत्पन्न हो चुका है।'

श्लोक 87 (skanda.6.274.87)

व्रतत्यागान्न संदेहस्तत्र ते नास्ति किंचन प्रायश्चित्तं मया सम्यक्स्मृतिमार्गेण चिंतितम्

vratatyāgānna saṁdehastatra te nāsti kiṁcana prāyaścittaṁ mayā samyaksmṛtimārgeṇa ciṁtitam

'व्रत-त्याग में तुम्हें कोई संदेह नहीं होना चाहिए। मैंने स्मृति-मार्ग के अनुसार तुम्हारे लिए भलीभाँति प्रायश्चित्त सोच लिया है।'

श्लोक 88 (skanda.6.274.88)

दुःशील उवाच सतां सप्तपदीं मैत्रीं प्रवदंति मनीषिणः मित्रतां तु पुरस्कृत्य किंचिद्वक्ष्यामि तच्छृणु

duḥśīla uvāca satāṁ saptapadīṁ maitrīṁ pravadaṁti manīṣiṇaḥ mitratāṁ tu puraskṛtya kiṁcidvakṣyāmi tacchṛṇu

दुःशील ने कहा — विद्वान लोग सज्जनों की मित्रता को सप्तपदी कहते हैं; उसी मित्रता के आधार पर मैं कुछ कहूँगा, सुनिए।

श्लोक 89 (skanda.6.274.89)

अस्ति मे विपुलं वित्तं यदि तेन प्रसिद्ध्यति तद्वदस्व महाभाग येन सर्वं करोम्यहम्

asti me vipulaṁ vittaṁ yadi tena prasiddhyati tadvadasva mahābhāga yena sarvaṁ karomyaham

'मेरे पास विपुल धन है; यदि उससे सिद्धि हो सके तो, हे महाभाग, बताइए, जिससे मैं वह सब करूँ।'

श्लोक 90 (skanda.6.274.90)

दुर्वासा उवाच एक एव ह्युपायोऽस्ति तव पातकनाशने तं चेत्करोषि मे वाक्याद्विशुद्धः संभविष्यसि

durvāsā uvāca eka eva hyupāyo'sti tava pātakanāśane taṁ cetkaroṣi me vākyādviśuddhaḥ saṁbhaviṣyasi

दुर्वासा ने कहा — तुम्हारे पाप-नाश हेतु एक ही उपाय है; यदि तुम मेरे वचन से उसे करते हो, तो तुम शुद्ध हो जाओगे।

श्लोक 91 (skanda.6.274.91)

तपः कृते प्रशंसंति त्रेतायां ज्ञानमेव च द्वापरे तीर्थयात्रां च दानमेव कलौ युगे

tapaḥ kṛte praśaṁsaṁti tretāyāṁ jñānameva ca dvāpare tīrthayātrāṁ ca dānameva kalau yuge

'कृतयुग में तप की प्रशंसा की जाती है, त्रेता में ज्ञान की, द्वापर में तीर्थयात्रा की, तथा कलियुग में केवल दान की।'

श्लोक 92 (skanda.6.274.92)

सांप्रतं कलिकालोऽयं वर्तते दारुणाकृतिः तस्मात्कृष्णाजिनं देहि सर्वपापविशुद्धये

sāṁprataṁ kalikālo'yaṁ vartate dāruṇākṛtiḥ tasmātkṛṣṇājinaṁ dehi sarvapāpaviśuddhaye

'अभी यह भयंकर स्वरूप वाला कलिकाल चल रहा है; अतः समस्त पापों की शुद्धि हेतु कृष्णाजिन (काला मृगचर्म) दान करो।'

श्लोक 93 (skanda.6.274.93)

तथा च ते घृणाऽप्यस्ति गुरुवित्तसमुद्भवा तदर्थं कुरु तन्नाम्ना शंकरस्य निवेशनम्

tathā ca te ghṛṇā'pyasti guruvittasamudbhavā tadarthaṁ kuru tannāmnā śaṁkarasya niveśanam

'तथा चूँकि तुम्हें गुरु के धन से उत्पन्न घृणा (पश्चाताप) भी है, इसलिए उसके निमित्त उन्हीं के नाम पर शंकर का एक निवास (मंदिर) बनवाओ।'

श्लोक 94 (skanda.6.274.94)

येन तस्मादपि त्वं हि आनृण्यं यासि तत्क्षणात् अन्यत्रापि च तद्वित्तं यत्किंचिच्च प्रपद्यते

yena tasmādapi tvaṁ hi ānṛṇyaṁ yāsi tatkṣaṇāt anyatrāpi ca tadvittaṁ yatkiṁcicca prapadyate

'इससे तुम उस ऋण से भी उसी क्षण मुक्त हो जाओगे; तथा जो भी अन्य वैसा ही धन शेष रह जाए...'

श्लोक 95 (skanda.6.274.95)

ब्राह्मणेभ्यो विशिष्टेभ्यो नित्यं देहि समाहितः तिलपात्रं सदा देहि सहिरण्यं विशेषतः

brāhmaṇebhyo viśiṣṭebhyo nityaṁ dehi samāhitaḥ tilapātraṁ sadā dehi sahiraṇyaṁ viśeṣataḥ

'...उसे विशिष्ट ब्राह्मणों को सदा एकाग्रचित्त होकर दो; विशेष रूप से सुवर्ण सहित तिल-पात्र सदा दान करो।'

श्लोक 96 (skanda.6.274.96)

येन ते सकलं पापं देहान्नाशं प्रगच्छति अपरं चैत्रमासेऽहं सदाऽऽगच्छामि भक्तितः

yena te sakalaṁ pāpaṁ dehānnāśaṁ pragacchati aparaṁ caitramāse'haṁ sadā''gacchāmi bhaktitaḥ

'इससे तुम्हारा सम्पूर्ण पाप शरीर से पूर्णतः नष्ट हो जाएगा। इसके अतिरिक्त, चैत्र मास में मैं सदा भक्तिवश आऊँगा...'

श्लोक 97 (skanda.6.274.97)

कल्पग्रामात्सुदूराच्च प्रासादेऽत्र स्वयं कृते पुनर्यामि च तत्रैव व्रतमेतद्धि मे स्थितम्

kalpagrāmātsudūrācca prāsāde'tra svayaṁ kṛte punaryāmi ca tatraiva vratametaddhi me sthitam

'...दूरस्थ कल्पग्राम से, इस तुम्हारे बनवाए मंदिर में; तथा वहीं पुनः लौट जाऊँगा — यह मेरा व्रत है।'

श्लोक 98 (skanda.6.274.98)

तस्माच्चिंत्यस्त्वयाह्येष प्रासादो यो मया कृतः चिंतनीयं सदैवेह स्नानादिभिरनेकशः

tasmācciṁtyastvayāhyeṣa prāsādo yo mayā kṛtaḥ ciṁtanīyaṁ sadaiveha snānādibhiranekaśaḥ

'अतः यह मंदिर जो मैंने बनवाया है, इसकी देखभाल तुम्हें करनी होगी; इसकी स्नान आदि सेवा सदैव बार-बार करनी होगी।'

श्लोक 99 (skanda.6.274.99)

दुःशील उवाच करिष्यामि वचस्तेऽहं यथा वदसि सन्मुने

duḥśīla uvāca kariṣyāmi vacaste'haṁ yathā vadasi sanmune

दुःशील ने कहा — हे सन्मुने, जैसा आप कहते हैं, मैं वैसा ही करूँगा।

श्लोक 100 (skanda.6.274.100)

दुर्वासा उवाच सर्वपापविशुद्ध्यर्थं दत्ते कृष्णाजिने द्विजः प्रयच्छ तिलपात्राणि गुप्तपापस्य शुद्धये

durvāsā uvāca sarvapāpaviśuddhyarthaṁ datte kṛṣṇājine dvijaḥ prayaccha tilapātrāṇi guptapāpasya śuddhaye

दुर्वासा ने कहा — समस्त पापों की शुद्धि हेतु कृष्णाजिन दान करने के पश्चात, हे द्विज, गुप्त पापों की शुद्धि हेतु तिल-पात्र भी दान करो।

श्लोक 101 (skanda.6.274.101)

सूत उवाच तस्य तद्वचनं श्रुत्वा दत्तं तेन महात्मना ततः कृष्णाजिनं भक्त्या ब्राह्मणायाहिताग्नये

sūta uvāca tasya tadvacanaṁ śrutvā dattaṁ tena mahātmanā tataḥ kṛṣṇājinaṁ bhaktyā brāhmaṇāyāhitāgnaye

सूत जी ने कहा — उनके वचन सुनकर उस महात्मा ने अग्निहोत्री ब्राह्मण को भक्तिपूर्वक कृष्णाजिन दान किया।

श्लोक 102 (skanda.6.274.102)

दुर्वाससः समा देशाद्यथोक्तविधिना द्विजाः यच्छतस्तिलपात्राणि तस्य नित्यं प्रभक्तितः

durvāsasaḥ samā deśādyathoktavidhinā dvijāḥ yacchatastilapātrāṇi tasya nityaṁ prabhaktitaḥ

हे द्विजो, दुर्वासा की आज्ञा से यथोक्त विधि से वह प्रतिदिन भक्तिपूर्वक तिल-पात्र दान करता रहा।

श्लोक 103 (skanda.6.274.103)

गतपापस्य दीक्षां च ददौ निर्वाणसंभवाम् तथासौ गतपापस्य दीक्षां दत्त्वा यथाविधि

gatapāpasya dīkṣāṁ ca dadau nirvāṇasaṁbhavām tathāsau gatapāpasya dīkṣāṁ dattvā yathāvidhi

तब उन्होंने पापरहित हो चुके उसे मोक्षदायी दीक्षा दी; इस प्रकार उस निष्पाप को विधिपूर्वक दीक्षा देकर...

श्लोक 104 (skanda.6.274.104)

ततः प्रोवाच मधुरं देहि मे गुरुदक्षिणाम्

tataḥ provāca madhuraṁ dehi me gurudakṣiṇām

...उन्होंने मधुर वाणी में कहा — मुझे गुरु-दक्षिणा दो।

श्लोक 105 (skanda.6.274.105)

दुःशील उवाच याचस्व त्वं प्रभो शीघ्रं यां ते यच्छामि दक्षिणाम् तां प्रदास्यामि चेच्छक्तिर्वित्तशाठ्यविवर्जिताम्

duḥśīla uvāca yācasva tvaṁ prabho śīghraṁ yāṁ te yacchāmi dakṣiṇām tāṁ pradāsyāmi cecchaktirvittaśāṭhyavivarjitām

दुःशील ने कहा — हे प्रभो, शीघ्र माँगिए मैं आपको क्या दक्षिणा दूँ; यदि सामर्थ्य हो तो मैं वह निःसंकोच अवश्य दूँगा।

श्लोक 106 (skanda.6.274.106)

दुर्वासा उवाच कल्पग्रामं गमिष्यामि सांप्रतं वर्तते कलिः नाहमत्रागमिष्यामि यावन्नैव कृतं भवेत्

durvāsā uvāca kalpagrāmaṁ gamiṣyāmi sāṁprataṁ vartate kaliḥ nāhamatrāgamiṣyāmi yāvannaiva kṛtaṁ bhavet

दुर्वासा ने कहा — मैं अभी कल्पग्राम जाऊँगा, कलियुग चल रहा है; जब तक यह पूर्ण न हो जाए, तब तक मैं यहाँ नहीं आऊँगा।

श्लोक 107 (skanda.6.274.107)

अर्धनिष्पादितो ह्येष प्रासादो यो मया कृतः परिपूर्तिं त्वया नेय एषा मे गुरुदक्षिणा

ardhaniṣpādito hyeṣa prāsādo yo mayā kṛtaḥ paripūrtiṁ tvayā neya eṣā me gurudakṣiṇā

'मेरे द्वारा बनवाया गया यह मंदिर आधा ही पूर्ण हुआ है; इसकी पूर्णता तुम्हें करानी होगी — यही मेरी गुरु-दक्षिणा है।'

श्लोक 108 (skanda.6.274.108)

नृत्यगीतादिकं यच्च तथा कार्यं स्वशक्तितः पुरतोऽस्य बलिर्देयस्तथान्यत्कुसुमादिकम्

nṛtyagītādikaṁ yacca tathā kāryaṁ svaśaktitaḥ purato'sya balirdeyastathānyatkusumādikam

'नृत्य-गीत आदि जो कुछ भी अपनी शक्ति के अनुसार करना है, तथा इसके समक्ष बलि और अन्य पुष्पादि भी अर्पित करना है।'

श्लोक 109 (skanda.6.274.109)

एवमुक्त्वा गतः सोऽथ कल्पग्रामं मुनीश्वरः दुःशीलोऽपि तथा चक्रे यत्तेन समुदाहृतम्

evamuktvā gataḥ so'tha kalpagrāmaṁ munīśvaraḥ duḥśīlo'pi tathā cakre yattena samudāhṛtam

ऐसा कहकर वे मुनिश्रेष्ठ कल्पग्राम चले गए; दुःशील ने भी वैसा ही किया जैसा उन्होंने बताया था।

श्लोक 110 (skanda.6.274.110)

सूत उवाच एवं तस्य प्रभक्तस्य तत्कार्याणि प्रकुर्वतः तन्नाम्ना कीर्त्यते सोऽथ दुःशील इति संज्ञितः

sūta uvāca evaṁ tasya prabhaktasya tatkāryāṇi prakurvataḥ tannāmnā kīrtyate so'tha duḥśīla iti saṁjñitaḥ

सूत जी ने कहा — इस प्रकार उस भक्त द्वारा उन कार्यों को करते रहने के कारण, वह लिंग उसी के नाम से 'दुःशील' कहलाया।

श्लोक 111 (skanda.6.274.111)

चैत्रमासे च यो नित्यं तं च देवं प्रपश्यति क्षणं कृत्वा स पापेन वार्षिकेण प्रमुच्यते

caitramāse ca yo nityaṁ taṁ ca devaṁ prapaśyati kṣaṇaṁ kṛtvā sa pāpena vārṣikeṇa pramucyate

जो चैत्र मास में प्रतिदिन उस देव का दर्शन करता है, वह एक क्षण में भी वर्षभर के पाप से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 112 (skanda.6.274.112)

यः पुनः स्नपनं तस्य सर्वं चैव करोति च त्रिंशद्वर्षोद्भवं पापं तस्य गात्रात्प्रणश्यति

yaḥ punaḥ snapanaṁ tasya sarvaṁ caiva karoti ca triṁśadvarṣodbhavaṁ pāpaṁ tasya gātrātpraṇaśyati

जो पुनः उनका सम्पूर्ण स्नपन करता है, उसके शरीर से तीस वर्षों में उत्पन्न पाप नष्ट हो जाता है।

श्लोक 113 (skanda.6.274.113)

यः पुनर्नृत्यगीताद्यं कुरुते च तदग्रतः आजन्ममरणात्पापात्सोऽपि मुक्तिमवाप्नुयात्

yaḥ punarnṛtyagītādyaṁ kurute ca tadagrataḥ ājanmamaraṇātpāpātso'pi muktimavāpnuyāt

जो पुनः उनके समक्ष नृत्य-गीत आदि करता है, वह भी जन्म से मृत्यु तक के पाप से मुक्ति प्राप्त कर लेता है।

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